
30 साल का बब्लू पेशे से कामयाब बिजनेसमैन है, लेकिन उसका गुस्सा काफी तेज है। छोटी-सी बात पर उसका गुस्सा कब सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, न तो उसे खुद अंदाजा होता है और न ही आसपास के लोगों को। बब्लू का स्वभाव बचपन से ऐसा नहीं था। पिता के निधन के बाद वह कुछ ज्यादा चिड़चिड़ा और गुस्सैल रहने लगा। परिवार ने इसे खराब मूड या स्वभाव में आए बदलाव के तौर पर देखा और धीरे-धीरे नजरअंदाज कर दिया। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बार-बार और छोटी-छोटी बातों पर जरूरत से ज्यादा गुस्सा आना महज आदत नहीं हो सकता। यह लंबे समय से चले आ रहे तनाव (Stress), एंग्जायटी (Anxiety) या डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा लक्षण भी हो सकता है।
बब्लू की परेशानी को लेकर जब जनसत्ता ने मनोचिकित्सक से बात की, तो उन्होंने बताया कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के मनोचिकित्सक (Psychiatrist) डॉ. समीर भार्गव ने जनसत्ता को बताया कि बहुत ज्यादा गुस्सा आना कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा कर सकता है। इनमें एंग्जायटी यानी घबराहट से जुड़ी समस्या भी शामिल है। इसमें व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता करने लगता है, जिससे चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति में गुस्से की वजह एक जैसी नहीं होती। कुछ मामलों में यह व्यक्ति के स्वभाव से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ लोगों में इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या हो सकती है।
साइकोसिस हो सकता है गुस्से और अजीब स्वभाव की वजह
डॉक्टर समीर ने बताया कि साइकोसिस जैसी मानसिक स्थिति में भी व्यक्ति को गुस्सा आ सकता है। इसमें व्यक्ति को ऐसे भ्रम हो सकते हैं, जिनमें उसे ऐसी बातों पर विश्वास होने लगता है जो वास्तविकता से मेल नहीं खातीं। कुछ लोगों को ऐसी चीजें दिखाई या सुनाई भी दे सकती हैं, जो वास्तव में मौजूद नहीं होतीं। इसके अलावा उनका व्यवहार असामान्य या अव्यवस्थित हो सकता है और वे अपने रोजमर्रा के काम या खुद की देखभाल ठीक से नहीं कर पाते।
स्वभाव भी हो सकता है ज्यादा गुस्से की वजह
हर बार गुस्से को किसी मानसिक बीमारी से जोड़ना सही नहीं है। डॉक्टर के मुताबिक, कुछ लोगों का स्वभाव या टेंपरामेंट ऐसा हो सकता है कि वे परिस्थितियों को संभालने में कम सक्षम महसूस करें। उनकी भावनात्मक सहनशीलता कम होने की वजह से उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा जल्दी आ सकता है। ऐसे मामलों में जरूरी नहीं कि गुस्सा एंग्जायटी या साइकोसिस से जुड़ा हो। अगर किसी व्यक्ति को अचानक बहुत तेज गुस्सा आता है और वह उस समय खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाता, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। डॉक्टर ने बताया कि कुछ स्थितियों में व्यक्ति अचानक गुस्से का आउटबर्स्ट कर सकता है और आवेग में प्रतिक्रिया दे सकता है। उन्होंने इसके पीछे मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स से जुड़ी गड़बड़ी या न्यूरोकेमिकल असंतुलन की संभावना का जिक्र किया। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह जरूरी हो सकती है।
नींद पूरी न होने से बढ़ सकती है चिड़चिड़ाहट
नींद और मानसिक स्वास्थ्य का भी गहरा संबंध है। डॉक्टर समीर के मुताबिक नींद पूरी न होने पर एंग्जायटी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है, जिससे व्यक्ति को ज्यादा गुस्सा आने की समस्या हो सकती है। डॉक्टर समीर ने बताया युवा वयस्कों को आमतौर पर पर्याप्त नींद लेने की जरूरत होती है। लगातार कम सोने से मूड, एकाग्रता और याददाश्त जैसी चीजें प्रभावित हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति पूरे सप्ताह पर्याप्त नींद नहीं लेता और फिर एक दिन ज्यादा सोकर उसकी भरपाई करना चाहता है, तो इसे पूरी तरह से पर्याप्त नहीं माना जा सकता। डॉक्टर के अनुसार, नींद रोज होने वाली प्रक्रिया है। सोने के दौरान शरीर और मस्तिष्क में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं होती हैं। अलग-अलग नींद के चरणों का अपना महत्व होता है, इसलिए रोज पर्याप्त नींद लेना जरूरी है।
गुस्से के समय डोपामिन, नोरएपिनेफ्रीन और सेरोटोनिन की भूमिका
डॉक्टर समीर ने बताया कि बहुत तेज गुस्सा या आवेश आने के दौरान मस्तिष्क के कुछ न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका हो सकती है। इनमें डोपामिन और नोरएपिनेफ्रीन शामिल हैं। एंग्जायटी जैसी स्थितियों में सेरोटोनिन भी अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभा सकता है। हालांकि, गुस्से को केवल किसी एक केमिकल की कमी या बढ़ोतरी से समझना सही नहीं होगा, क्योंकि इसमें मानसिक स्थिति, परिस्थितियों और व्यवहार जैसे कई कारक शामिल हो सकते हैं।
गुस्से के लिए आर्थिक कारक भी हो सकते हैं जिम्मेदार
कुछ लोगों में फैमिली, आर्थिक परेशानी और रिश्तों का तनाव भी गुस्सा बढ़ा सकता है। पारिवारिक समस्याएं, आर्थिक तनाव और रिश्तों से जुड़ी परेशानियां भी व्यक्ति की चिंता और चिड़चिड़ेपन को बढ़ा सकती हैं। डॉक्टर के अनुसार, खासकर जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर जैसी स्थिति में व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर ज्यादा चिंता कर सकता है और इसका असर उसके व्यवहार पर पड़ सकता है।
स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया भी बढ़ा सकते हैं चिड़चिड़ापन
डॉक्टर ने लगातार और बिना जरूरत स्क्रीन देखने तथा सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग को भी चिड़चिड़ापन और गुस्से के लिए जिम्मेदार ठहराया है। सोशल मीडिया और लगातार मिलने वाले डिजिटल रिवॉर्ड मस्तिष्क की डोपामिन प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर गुस्से का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। अत्यधिक स्क्रीन टाइम नींद और रोजमर्रा की दिनचर्या को प्रभावित करके भी मूड पर असर डाल सकता है।
कैसे पहचानें कि गुस्सा एंग्जायटी से जुड़ा है?
एंग्जायटी में व्यक्ति हर छोटी बात को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता कर सकता है। वह हमेशा बेचैनी या घबराहट महसूस कर सकता है और उसे लगातार किसी बुरी घटना की आशंका रह सकती है। इसके अलावा नींद खराब होना, रात में दिमाग में लगातार विचार चलते रहना, ध्यान लगाने में परेशानी और पहले की तुलना में ज्यादा चिड़चिड़ापन भी देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति छोटी बात पर भी जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
सामान्य गुस्सा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े गुस्से में क्या फर्क है?
डॉक्टर समीर के मुताबिक यह देखने की जरूरत है कि गुस्से का असर व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, काम और रिश्तों पर पड़ रहा है या नहीं। अगर गुस्से की वजह से रिश्ते खराब होने लगें, काम प्रभावित हो, सहकर्मियों या परिवार के साथ समस्याएं बढ़ें या व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियां ठीक से पूरी न कर पाए, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। वहीं, परिस्थितियों के अनुसार कभी-कभार गुस्सा आना अपने आप में मानसिक बीमारी का संकेत नहीं है।
गुस्से के साथ ये लक्षण हो सकते हैं रेड फ्लैग
अगर गुस्से के साथ व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या बिगड़ने लगे, काम पर ध्यान न लगे, रिश्ते खराब होने लगें, नींद या भूख में बदलाव आए, लगातार चिड़चिड़ापन और घबराहट बनी रहे या व्यक्ति बिना वजह शक करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर के अनुसार, ऐसे लक्षण मानसिक स्वास्थ्य समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं और इस स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।
गुस्सा आने पर तुरंत खुद को शांत करने के लिए क्या करें?
गुस्सा आने के समय व्यक्ति कुछ देर के लिए उस स्थिति या जगह से खुद को अलग कर सकता है। डॉक्टर ने ब्रीदिंग एक्सरसाइज और 5-4-3-2-1 ग्राउंडिंग तकनीक का सुझाव दिया। इसमें आसपास की पांच चीजों को देखना, चार चीजों को छूकर महसूस करना, तीन आवाजों को सुनना, दो चीजों की गंध पर ध्यान देना और एक चीज का स्वाद महसूस करना शामिल है। इससे ध्यान वर्तमान क्षण पर लाने में मदद मिल सकती है। गुस्से में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय लेकर जवाब देना भी उपयोगी हो सकता है।
लगातार गुस्सा रहने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर
अगर चिड़चिड़ापन और गुस्सा लंबे समय तक बना रहे, तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ सकता है। डॉक्टर ने बताया कि लंबे समय तक तनाव और खराब तरीके से भावनाओं से निपटने की आदतें आगे चलकर एंग्जायटी, अवसाद और तनाव से जुड़ी समस्याओं से जुड़ सकती हैं। इसके साथ ही कम शारीरिक गतिविधि, ज्यादा खाना या अन्य अस्वस्थ आदतों के कारण वजन, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
गुस्सा कंट्रोल करने के लिए क्या करें?
डॉक्टर समीर ने बताया गुस्सा कंट्रोल करने के लिए माइंडफुलनेस और मेडिटेशन करें। गुस्से को संभालने के लिए रोजमर्रा की आदतों में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। डॉक्टर ने माइंडफुलनेस, मेडिटेशन और योग जैसी गतिविधियों को नियमित रूप से अपनाने की सलाह दी। इसके अलावा अपने वर्क प्लेस पर एक दूसरे को सॉरी और थैंक्यू कहने की आदत डालें। जरूरत पड़ने पर ‘थैंक यू’ और ‘सॉरी’ कहना तथा सकारात्मक संवाद बनाए रखना भी तनावपूर्ण माहौल को कम करने में मदद कर सकता है।
हर गुस्सा मानसिक बीमारी नहीं होता
सबसे जरूरी बात यह है कि केवल गुस्सा आने के आधार पर किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। गुस्से की वजह, उसकी तीव्रता, बार-बार होने की स्थिति और व्यक्ति की जिंदगी पर उसके प्रभाव को देखना जरूरी है। अगर गुस्सा लगातार बढ़ रहा है और काम, रिश्तों, नींद या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है। यदि गुस्सा आपके दैनिक जीवन या रिश्तों को प्रभावित कर रहा है, तो किसी योग्य मनोचिकित्सक (Psychiatrist/Psychologist) से परामर्श अवश्य लें।

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