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  • हाई प्रोटीन और ओमेगा-3 का बेहतरीन स्रोत है अलसी की चटनी, जानें फायदे और बनाने का आसान तरीका..

    हाई प्रोटीन और ओमेगा-3 का बेहतरीन स्रोत है अलसी की चटनी, जानें फायदे और बनाने का आसान तरीका..

    हाई प्रोटीन और ओमेगा-3 का बेहतरीन स्रोत है अलसी की चटनी, जानें फायदे और बनाने का आसान तरीका..

    अगर आप अपनी डाइट में प्रोटीन बढ़ाना चाहते हैं और साथ ही किसी देसी व पौष्टिक विकल्प की तलाश में हैं, तो अलसी की चटनी एक अच्छा विकल्प हो सकती है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, अलसी (Flaxseed) में प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।

    क्यों फायदेमंद है अलसी की चटनी?

    विशेषज्ञों के अनुसार, अलसी को हल्का भूनकर चटनी के रूप में खाने से इसका स्वाद बेहतर हो जाता है और इसे रोजमर्रा की डाइट में शामिल करना आसान होता है। अलसी में मौजूद पोषक तत्व शरीर के कई कार्यों में सहायक हो सकते हैं।

    अलसी में पाए जाने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड, डाइटरी फाइबर, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स हृदय स्वास्थ्य, पाचन और संपूर्ण फिटनेस के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

    अलसी की चटनी खाने के संभावित फायदे

    नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने पर अलसी की चटनी से ये संभावित लाभ मिल सकते हैं:

    • शरीर को प्रोटीन और हेल्दी फैट्स की अच्छी मात्रा मिलती है।
    • ओमेगा-3 फैटी एसिड हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकता है।
    • फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने और कब्ज की समस्या कम करने में सहायक हो सकता है।
    • लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होने से वजन नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
    • कुछ अध्ययनों के अनुसार, यह खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में सहायक हो सकती है।
    • महिलाओं में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में भी इसकी भूमिका पर शोध जारी है, हालांकि इस संबंध में और वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता है।

    घर पर ऐसे बनाएं अलसी की चटनी

    अलसी की चटनी बनाना काफी आसान है। इसके लिए आपको चाहिए:

    • 1 कप अलसी के बीज
    • 5–6 लहसुन की कलियां
    • 2–3 सूखी लाल मिर्च
    • 1 छोटा चम्मच जीरा
    • कुछ करी पत्ते
    • स्वादानुसार नमक
    • थोड़ा-सा नींबू का रस

    सबसे पहले अलसी, जीरा और अन्य सामग्री को हल्का भून लें। ठंडा होने के बाद सभी चीजों को मिक्सर में पीस लें। तैयार चटनी को रोटी, पराठे, दाल-चावल या सलाद के साथ खाया जा सकता है।

    सेवन से पहले रखें ये सावधानियां

    अलसी का सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए। यदि आप गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं, किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं या ब्लड थिनर जैसी दवाएं ले रहे हैं, तो इसे नियमित रूप से अपनी डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह जरूर लें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी नए आहार या घरेलू उपाय को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • पैरों में आग लगने जैसी फीलिंग को न करें नजरअंदाज, जानें कारण, लक्षण और इलाज..

    पैरों में आग लगने जैसी फीलिंग को न करें नजरअंदाज, जानें कारण, लक्षण और इलाज..

    पैरों में आग लगने जैसी फीलिंग को न करें नजरअंदाज, जानें कारण, लक्षण और इलाज..

    Burning feet : पैरों में होती जलन से अगर आप भी परेशान हो चुके हैं , तो डॉक्टर की सलाह पर सही इलाज करा सकते हैं। क्योंकि ये हेल्थ के लिए बहुत ही जरुरी है।

    Burning feet: अगर आपके पैरों से भी आग निकलती है और तमाम इलाज कराने के बाद भी ये ठीक नहीं हो रहा है तो डॉक्टर से इसका सही कारण जरुर जानें। इसके साथ ही वो इसका इलाज भी बता रही हैं। एम्स दिल्ली की न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रियंका सहरावत का कहना है कि, विटामिन बी12 की कमी के कारण पैरों में जलन, झनझनाहट  और सुन्नपन का असली कारण है। विटामिन बी12 हमारी नसों की  सेफ्टी परत यानी माइलिन शीथ को बनाने और बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है। जब शरीर में इसकी कमी होती है, तो नसें कमजोर होने लगती हैं और पैरों से जुड़े न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखने लगते हैं। जिसकी वजह से रात में सोते हुए पैरों में तेज दर्द और बेचैनी होती है।

    Burning feet क्यों होता है?

    डॉक्टर रावत का कहना है कि, इस दौरान तलवों में हर समय या रात के समय असहज जलन महसूस होना,  इसके साथ ही पैरों और उंगलियों में चींटियां चलने जैसा अहसास होना या हिस्सा सुन्न हो जाना भी इसका एक कारण माना जाता है। इस दौरान मरीज को पैरों में भारीपन महसूस होता है। वहीं, पैरों में ठंडक रहती है। पैरों में होने वाली इस समस्या के प्रमुख कारण विटामिन बी12 कमी होती है। इसकी कमी से पेट भी खराब रहता है । जिसके कारण शरीर में विटामिन बी 12 नहीं बन पाता है।

    पैरों में हो रही जलन का असली कारण

    अगर आपके पैरों में भी इस तरह का दर्द और झुनझनी हो रही है तो सबसे पहले ब्लड टेस्ट करवाएं , फिर डॉक्टर की सलाह पर इलाज कराएं। विटामिन बी 12 की कमी को नॉनवेज से पूरा किया जा सकता है , लेकिन जो लोग वेज खाते हैं, उन्हें  अपनी डाइट में मशरूम, पालक, दूध, दही, पनीर और अंडे लेने चाहिए।डॉक्टर की सलाह पर मरीज विटामिन बी 12 के सप्लीमेंट्स ले सकते हैं। वेज वाले लोग दूध, दही, पनीर और छाछ के साथ फलों और सब्जियों का सेवन कर सकते हैं। वहीं, नॉनवेज खाने वाले लोग अंडा, मछली, किचन और मटन खा सकते हैं। इसके साथ ही डॉक्टर की सलाह पर विटामिन बी12 टैबलेट्स या कैप्सूल का सेवन कर सकते हैं। ध्यान रहे बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी दवा या फिर सप्लीमेंट का सेवन ना करें।

  • सिर्फ करेला ही नहीं, ये 4 चीजें भी ब्लड शुगर मैनेज करने में हो सकती हैं मददगार, जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ..

    सिर्फ करेला ही नहीं, ये 4 चीजें भी ब्लड शुगर मैनेज करने में हो सकती हैं मददगार, जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ..

    सिर्फ करेला ही नहीं, ये 4 चीजें भी ब्लड शुगर मैनेज करने में हो सकती हैं मददगार, जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ..

    डायबिटीज के मरीज अक्सर ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए घरेलू उपायों का सहारा लेते हैं। करेला लंबे समय से इस सूची में शामिल रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थ भी संतुलित आहार और डॉक्टर की सलाह के साथ ब्लड शुगर मैनेजमेंट में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, इन्हें दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    1. मेथी के दाने

    मेथी के दानों में घुलनशील फाइबर अच्छी मात्रा में पाया जाता है। यह भोजन के पाचन और कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण की गति को धीमा करने में मदद कर सकता है, जिससे भोजन के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ने की संभावना कम हो सकती है।

    कुछ अध्ययनों में मेथी में पाए जाने वाले यौगिकों को इंसुलिन की कार्यक्षमता में सहायक बताया गया है, लेकिन इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है।

    2. दालचीनी

    दालचीनी में ऐसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं जिन पर कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। कुछ शोध बताते हैं कि यह शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता (Insulin Sensitivity) को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसके प्रभाव सभी लोगों में समान नहीं होते और इसे उपचार का विकल्प नहीं माना जा सकता।

    3. जामुन के बीज

    आयुर्वेद में जामुन के बीजों का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है। इनमें मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व ब्लड शुगर नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, इनके लाभों को लेकर और अधिक उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता है।

    4. भोजन के बाद टहलना

    विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों के लिए भोजन के बाद 15–20 मिनट की हल्की वॉक काफी फायदेमंद हो सकती है। टहलने से मांसपेशियां रक्त में मौजूद ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करने लगती हैं, जिससे भोजन के बाद बढ़ने वाली ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

    क्या करेला जरूरी है?

    करेला पौष्टिक सब्जी है और इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है, लेकिन केवल करेला खाने या उसका जूस पीने से डायबिटीज नियंत्रित होने का दावा वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं है। ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का नियमित सेवन सबसे महत्वपूर्ण है।

    डायबिटीज के मरीज रखें ये सावधानियां

    • डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद न करें।
    • नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच कराएं।
    • मीठे पेय और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित करें।
    • रोजाना कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि करें।
    • किसी भी हर्बल उपाय या सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प न मानें। डायबिटीज या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या के उपचार के लिए हमेशा योग्य डॉक्टर या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से परामर्श लें।

  • हर दिन टूट रहे हैं मुट्ठीभर बाल? आयुर्वेदाचार्य से जानिए बाल झड़ना रोकने के आसान उपाय..

    हर दिन टूट रहे हैं मुट्ठीभर बाल? आयुर्वेदाचार्य से जानिए बाल झड़ना रोकने के आसान उपाय..

    हर दिन टूट रहे हैं मुट्ठीभर बाल? आयुर्वेदाचार्य से जानिए बाल झड़ना रोकने के आसान उपाय..

    आजकल कम उम्र में ही बाल झड़ना एक आम समस्या बन गई है। लगातार हेयर फॉल के कारण कई लोग गंजेपन की चिंता से भी परेशान रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बाल झड़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें आनुवंशिकता, हार्मोनल बदलाव, तनाव, पोषण की कमी, कुछ दवाएं, टाइट हेयर स्टाइल और बार-बार केमिकल ट्रीटमेंट शामिल हैं।

    आयुर्वेद में मेथी को बालों की देखभाल के लिए उपयोगी माना जाता है। इसमें प्रोटीन, आयरन, पोटैशियम और कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं, जो बालों को पोषण देने और उनकी मजबूती बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

    बालों के लिए मेथी के संभावित फायदे

    • बालों की जड़ों को पोषण देने में मदद कर सकती है।
    • हेयर फॉल कम करने में सहायक हो सकती है।
    • रूसी (डैंड्रफ) की समस्या में राहत दिला सकती है।
    • बालों को मजबूत और मुलायम बनाने में मदद कर सकती है।
    • समय से पहले सफेद होने वाले बालों की समस्या में भी कुछ लोगों को लाभ मिल सकता है।

    मेथी और नारियल तेल का हेयर मास्क कैसे बनाएं?

    • 2–3 चम्मच मेथी दानों को पीसकर बारीक पाउडर बना लें।
    • इसमें 1–2 चम्मच शुद्ध नारियल तेल मिलाकर पेस्ट तैयार करें।
    • इस मिश्रण को बालों की जड़ों और स्कैल्प पर अच्छी तरह लगाएं।
    • 30–45 मिनट तक लगा रहने दें।
    • इसके बाद हल्के (माइल्ड) शैम्पू से बाल धो लें।

    इस हेयर मास्क का इस्तेमाल सप्ताह में 1–2 बार किया जा सकता है।

    ध्यान रखें

    यदि बाल बहुत तेजी से झड़ रहे हैं, सिर पर गोल-गोल पैच बन रहे हैं या अचानक गंजापन बढ़ रहा है, तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें। ऐसी स्थिति में त्वचा रोग विशेषज्ञ (Dermatologist) या योग्य चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है, क्योंकि बाल झड़ने के पीछे कोई चिकित्सीय कारण भी हो सकता है।

    संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, तनाव पर नियंत्रण और सही हेयर केयर रूटीन अपनाने से भी बालों की सेहत बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है।

  • दिखने में भले अजीब लगे, लेकिन पेट की सेहत के लिए किसी औषधि से कम नहीं है ये सब्जी..

    दिखने में भले अजीब लगे, लेकिन पेट की सेहत के लिए किसी औषधि से कम नहीं है ये सब्जी..

    दिखने में भले अजीब लगे, लेकिन पेट की सेहत के लिए किसी औषधि से कम नहीं है ये सब्जी..

    अरबी को अक्सर भारी और गैस बनाने वाली सब्जी मानकर लोग खाने से बचते हैं। लेकिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, सही मात्रा और सही तरीके से बनाई गई अरबी आंतों (Gut) की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हो सकती है। इसमें मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च, फाइबर और कई प्राकृतिक यौगिक पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

    अरबी क्यों है पेट के लिए फायदेमंद?

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अरबी में मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च छोटी आंत में पूरी तरह पचता नहीं है। यह बड़ी आंत तक पहुंचकर वहां मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। इससे आंतों का माइक्रोबायोम बेहतर रहता है और पाचन तंत्र मजबूत बनता है।

    1. रेजिस्टेंट स्टार्च से मिलते हैं ये फायदे

    अरबी में पाया जाने वाला रेजिस्टेंट स्टार्च फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है। इसके परिणामस्वरूप शॉर्ट-चेन फैटी एसिड (SCFAs) बनते हैं, जो आंतों की कोशिकाओं को ऊर्जा देने और उनकी सुरक्षा परत को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

    2. घुलनशील फाइबर से बेहतर पाचन

    अरबी में मौजूद घुलनशील फाइबर और प्राकृतिक म्यूसिलेज पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराते हैं। इससे पाचन प्रक्रिया संतुलित रहती है और कब्ज जैसी समस्याओं में भी राहत मिल सकती है।

    3. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर

    कुछ किस्मों की अरबी में एंथोसायनिन, क्वेरसेटिन और क्लोरोजेनिक एसिड जैसे पॉलीफेनोल्स पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव कम करने और आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं।

    किन लोगों के लिए हो सकती है फायदेमंद?

    • जिनकी पाचन शक्ति कमजोर रहती है।
    • जो फाइबर युक्त संतुलित आहार लेना चाहते हैं।
    • जो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की जगह प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प अपनाना चाहते हैं।
    • जिनका लक्ष्य Gut Health को बेहतर बनाना है।

    अरबी खाते समय रखें ये बातें

    • अरबी को हमेशा अच्छी तरह पकाकर ही खाएं।
    • बहुत अधिक तेल या मसालों के साथ बनाने से इसके स्वास्थ्य लाभ कम हो सकते हैं।
    • यदि किसी को किडनी स्टोन, विशेष चिकित्सीय समस्या या विशेष डाइट का पालन करना हो, तो सेवन से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह लेना बेहतर है।

    संतुलित मात्रा में और सही तरीके से बनाई गई अरबी आपके आहार का पौष्टिक हिस्सा बन सकती है और पेट की सेहत को बेहतर रखने में मदद कर सकती है।

  • स्मोकर Vs नॉन-स्मोकर! वायरल स्कैन में दिखा फेफड़ों का डराने वाला अंतर,

    स्मोकर Vs नॉन-स्मोकर! वायरल स्कैन में दिखा फेफड़ों का डराने वाला अंतर,

    स्मोकर Vs नॉन-स्मोकर! वायरल स्कैन में दिखा फेफड़ों का डराने वाला अंतर,

    सिगरेट पीने की आदत धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खोखला कर देती है। इसका असर सबसे पहले फेफड़ों पर पड़ता है, लेकिन कई लोगों को इसका नुकसान तब तक समझ नहीं आता, जब तक गंभीर समस्या सामने नहीं आ जाती। हाल ही में एक कंटेंट क्रिएटर द्वारा करवाए गए चेस्ट स्कैन ने स्मोकिंग के खतरों की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने रखी।

    कंटेंट क्रिएटर ने एक ऐसे व्यक्ति का चेस्ट स्कैन कराया, जो पिछले 10 वर्षों से नियमित रूप से स्मोकिंग कर रहा था। तुलना के लिए उन्होंने अपना भी स्कैन कराया, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। दोनों की रिपोर्ट में बड़ा अंतर देखने को मिला।

    स्कैन में क्या सामने आया?

    जिस व्यक्ति ने कभी धूम्रपान नहीं किया था, उसके फेफड़े सामान्य और स्वस्थ दिखाई दिए। वहीं लंबे समय से स्मोकिंग करने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में कई जगह सिस्ट (Cysts) दिखाई दिए। डॉक्टरों के अनुसार, ये सिस्ट फेफड़ों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं और संक्रमण का खतरा बढ़ा सकते हैं।

    इसके अलावा स्मोकर के फेफड़े सामान्य से अधिक बड़े दिखाई दिए। विशेषज्ञों ने बताया कि यह लंग्स हाइपरइन्फ्लेशन (Lung Hyperinflation) का संकेत हो सकता है, जो तब होता है जब फेफड़े अपनी प्राकृतिक लचक खोने लगते हैं और पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाते।

    क्या होते हैं एल्वियोलर सैक (Alveolar Sacs)?

    एल्वियोलर सैक फेफड़ों के सबसे अंतिम हिस्से में मौजूद बेहद छोटे-छोटे वायु थैले होते हैं। इन्हीं के जरिए शरीर में ऑक्सीजन पहुंचती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलती है। लगातार धूम्रपान करने से ये नाजुक संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं, जिससे सांस लेने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है।

    स्मोकिंग से होने वाले प्रमुख नुकसान

    • फेफड़ों की क्षमता कम हो सकती है।
    • बार-बार संक्रमण और लगातार खांसी की समस्या हो सकती है।
    • क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और एम्फायसीमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
    • लंबे समय तक धूम्रपान करने से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम भी बढ़ जाता है।

    यदि आप धूम्रपान करते हैं, तो इसे छोड़ने की दिशा में उठाया गया हर कदम आपके फेफड़ों और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी या अन्य लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

  • बारिश में कौन-सी सब्जियां नहीं खानी चाहिए? एक्सपर्ट्स बताते हैं 4 सब्जियां जिनसे रखें परहेज..

    बारिश में कौन-सी सब्जियां नहीं खानी चाहिए? एक्सपर्ट्स बताते हैं 4 सब्जियां जिनसे रखें परहेज..

    बारिश में कौन-सी सब्जियां नहीं खानी चाहिए? एक्सपर्ट्स बताते हैं 4 सब्जियां जिनसे रखें परहेज..

    बारिश का मौसम आते ही चाय और पकौड़ों की याद अपने आप आने लगती है. ठंडी-ठंडी रिमझिम बरसते बादल गर्मी से राहत पहुंचाने हैं. लेकिन इस मौसम में बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. मानसून में हमारा डाइजेशन यानी पाचन तंत्र थोड़ा सुस्त हो जाता है. ऐसे में हम जो कुछ भी खाते हैं, उसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है. ​हरी सब्जियों को सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है और ये बात बिल्कुल सही है, लेकिन बरसात के मौसम में कुछ खास सब्जियों को खाने से बचना चाहिए. अगर आप इस मौसम में इन सब्जियों का परहेज नहीं करते, तो पेट दर्द, उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी परेशानी हो सकती है. तो ​आइए जानते हैं कि इस मौसम में आपको कौन सी 4 सब्जियां नहीं खानी चाहिए.

    ​1. हरी पत्तेदार सब्जियां-

    ​बारिश के मौसम में हवा में नमी यानी मॉइश्चर बहुत बढ़ जाता है. इस वजह से पत्तेदार सब्जियों के पत्तों पर छोटे-छोटे कीड़े, उनके अंडे और बैक्टीरिया आसानी से चिपक जाते हैं. कई बार ये कीड़े इतने बारीक होते हैं कि पानी से अच्छी तरह धोने के बाद भी नहीं निकलते. अगर आप इन्हें खा लेते हैं, तो ये पेट में जाकर इंफेक्शन फैला सकते हैं. इसलिए बरसात में पालक, लाल साग, मेथी और बंदगोभी जैसी चीजों से दूर रहना चाहिए.

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    बरसात में हरी सब्जियों को का सेवन नहीं करना चाहिए. Photo Credit: iStock

    ​2. फूलगोभी-

    ​बरसात के दिनों में फूलगोभी के गद्देदार हिस्सों में कीड़े छिपकर बैठ जाते हैं. अगर आप ध्यान से न देखें, तो ये कीड़े खाने में पक जाते हैं. इसके अलावा, इस मौसम में फूलगोभी खाने से गैस, एसिडिटी और पेट फूलने की समस्या भी हो सकती है.

    ​3. बैंगन-

    ​बैंगन में कीड़े लगना बहुत आम बात है, खासकर बरसात के मौसम में. इस मौसम में बैंगन के अंदर बारीक कीड़े और उनके अंडे आसानी से पनपते हैं. कई बार बाहर से बिल्कुल साफ दिखने वाला बैंगन अंदर से खराब निकलता है. कीड़े वाले बैंगन को खाने से पेट में तेज दर्द और फूड पॉइजनिंग हो सकती है.

    ​4. मशरूम-

    ​बरसात के दिनों में बाजार में मिलने वाले मशरूम में फंगस और बैक्टीरिया लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. मशरूम नमी वाली जगह पर उगते हैं, इसलिए बारिश के मौसम में इन पर बैक्टीरिया बहुत तेजी से पनपते हैं. खराब या ज्यादा दिन पुराना मशरूम खाने से आपको स्किन एलर्जी और पेट का भारी इंफेक्शन हो सकता है.

    क्या कहती है रिसर्च?

    FDA की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नमी वाले मौसम में खुली और पत्तेदार सब्जियों में ई-कोलाई और साल्मोनेला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया बहुत तेजी से फैलते हैं, जो पेट के गंभीर इंफेक्शन का कारण बनते हैं.

  • क्या हर खाने के ऊपर नींबू निचोड़ना सही है? फायदे और नुकसान जानकर हो जाएंगे हैरान..

    क्या हर खाने के ऊपर नींबू निचोड़ना सही है? फायदे और नुकसान जानकर हो जाएंगे हैरान..

    क्या हर खाने के ऊपर नींबू निचोड़ना सही है? फायदे और नुकसान जानकर हो जाएंगे हैरान..

    अभी तक हमने सलाद, पोहा, आलू चाट और सूप जैसी चीजों में नींबू के रस का तड़का लगते हुए देखा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सब्जी के ऊपर भी नींबू निचोड़कर खाना पसंद करते हैं? क्या आप भी ऐसा करते हैं? अगर हां, तो जान लें. आपकी ये आदत सिर्फ खाने का स्वाद ही नहीं बढ़ा रही है, बल्कि शरीर को और भी कई तरह के फायदे पहुंचा रही है. खाने के ऊपर नींबू निचोड़कर खाने से क्या फायदे मिलते हैं, जानते हैं.

    दाल हो या कोई सब्जी, अगर आप सभी चीजों पर खाने के ऊपर नींबू निचोड़कर खा रहे हैं, तो समझ लें आपकी बॉडी को कई तरह के फायदे मिल सकते हैं:

    पहला: पेट के लिए कमाल

    खाने के ऊपर नींबू का रस डालकर खाने से इसमें मौजूद विटामिन सी पाचन एंजाइम्स एक्टिव होते हैं, जिससे हैवी खाना आराम से पच जाता है. इतना ही नहीं, नींबू में पाया जाने वाला फाइबर पेट से जुड़ी दिक्कतें जैसे कब्ज, अपच और गैस को भी कम करने में मदद करता है. अगर आपका पेट खराब रहता है, तो आपको भी इस आदत को अपने डेली रूटीन में जरूर शामिल कर लेना चाहिए.

    दूसरा: आयरन का अवशोषण बढ़ाना

    अगर आप पालक, दाल या चने जैसी चीजों के ऊपर नींबू का रस निचोड़कर खाते हैं, तो ये आपके शरीर में आयरन के अवशोषण को डबल कर सकता है, जिससे कई तरह की बीमारियां जैसे एनीमिया से राहत पाई जा सकती है.

    क्या नहीं करना है?

    आपको एक बात का ध्यान रखना है कि नींबू को खाना पकाते समय नहीं, बल्कि पकने के बाद ऊपर से डालना है, नहीं तो आपके शरीर को विटामिन सी नहीं मिलेगा.

  • बार-बार डाई करने की जरूरत नहीं! सफेद बालों को नेचुरली काला दिखाने का आसान तरीका

    बार-बार डाई करने की जरूरत नहीं! सफेद बालों को नेचुरली काला दिखाने का आसान तरीका

    बार-बार डाई करने की जरूरत नहीं! सफेद बालों को नेचुरली काला दिखाने का आसान तरीका

    आज के समय में कम उम्र में ही लोगों के बाल सफेद हो रहे हैं. गलत खान-पान और बढ़ता प्रदूषण हमारे सफेद बालों की एक बड़ी वजह है. दरअसल जब बाल सफेद होने शुरू होते हैं, तो ज्यादातर लोग तुरंत बाजार में मिलने वाली हेयर डाई या मेहंदी का सहारा लेते हैं. ​लेकिन क्या आप जानते हैं कि केमिकल वाली डाई और बार-बार मेहंदी लगाने से बाल रूखे, बेजान और कमजोर हो सकते हैं, जी हां आपने बिल्कुल सही सुना. अगर आप भी सफेद बालों की वजह से परेशान हैं, तो ​आयुर्वेदाचार्य एवं योग गुरु डॉ. राम अवतार द्वारा बताए इस घरेलू उपाय को जरूर आजमाएं.

    ​क्यों खास है यह घरेलू नुस्खा?

    • करी पत्ता-
      करी पत्ते में विटामिन बी, बीटा-कैरोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं. यह बालों के प्राकृतिक रंग को बनाए रखने में मदद करते हैं और बालों को झड़ने से रोक सकते हैं.
    • ​मेथी के बीज-
      मेथी में प्रोटीन और निकोटिनिक एसिड होता है, जो बालों की जड़ों को पोषण देता है. इससे बाल मजबूत होते हैं, डैंड्रफ खत्म होता है और बालों में चमक आती है.
    • ​नारियल तेल-
       नारियल तेल बालों को अंदर तक नमी देता है. जब इसमें करी पत्ता और मेथी पकते हैं, तो इसके गुण कई गुना बढ़ जाते हैं.

    घर पर कैसे बनाएं ये तेल-

    ​इस तेल को बनाना बहुत ही आसान है. सबसे पहले आपको थोड़ा सा शुद्ध नारियल तेल लेना है. इसके साथ एक मुट्ठी ताजे करी पत्ते और 2 चम्मच मेथी दाना लें. एक लोहे की कढ़ाई या किसी बर्तन में नारियल तेल डालें. अब इसमें मेथी दाना और करी पत्ते मिला दें. तेल को धीमी आंच पर तब तक पकने दें जब तक कि मेथी दाना हल्का काला न हो जाए और करी पत्ते अपना रंग न छोड़ दें. जब तेल ठंडा हो जाए, तो इसे किसी कपड़े या छन्नी से छानकर कांच की शीशी में भर लें.

    कैसे ​इस्तेमाल करें?

    ​हफ्ते में कम से कम 2 से 3 बार इस तेल से अपने सिर और बालों की जड़ों में अच्छी तरह मालिश करें. ​तेल लगाने के बाद इसे कम से कम 1 से 2 घंटे तक बालों में लगा रहने दें. अगर चाहें तो इसे रात भर के लिए भी छोड़ सकते हैं. ​इसके बाद माइल्ड या हर्बल शैम्पू से बाल धो लें.

  • क्या घी सच में मोटापा और कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है या फिर यह आयुर्वेद का एक छुपा हुआ अमृत है..

    क्या घी सच में मोटापा और कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है या फिर यह आयुर्वेद का एक छुपा हुआ अमृत है..

    क्या घी सच में मोटापा और कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है या फिर यह आयुर्वेद का एक छुपा हुआ अमृत है..

    आजकल बहुत से लोग घी से डरते हैं

    अक्सर कहा जाता है कि घी खाने से मोटापा बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है और हार्ट की नसें ब्लॉक हो सकती हैं

    लेकिन आयुर्वेद में घी को अमृत तुल्य माना गया है सदियों से इसका उपयोग केवल भोजन के रूप में नहीं बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण और कई पारंपरिक घरेलू प्रयोगों में भी किया जाता रहा है

    सवाल यह है कि क्या घी वास्तव में इतना नुकसानदायक है जितना आजकल माना जाता है या फिर हम इसके असली गुणों को भूल चुके हैं

    कब्ज और पेट साफ न होने की समस्या

    यदि सुबह पेट ठीक से साफ नहीं होता गैस रहती है या कब्ज की समस्या रहती है तो आयुर्वेद में घी को पाचन तंत्र के लिए उपयोगी माना गया है

    कुछ लोग रात को सोने से पहले या सुबह खाली पेट एक चम्मच देसी घी गुनगुने पानी या दूध के साथ लेते हैं

    कई लोगों को इससे मल त्याग में आसानी और पेट हल्का महसूस होने का अनुभव होता है

    गले की खराश और सूखी खांसी

    घी का उपयोग पारंपरिक रूप से गले की देखभाल में भी किया जाता रहा है

    कुछ लोग घी में हल्दी और काली मिर्च मिलाकर लेते हैं जबकि कुछ घी शहद और अदरक के रस का मिश्रण उपयोग करते हैं

    आयुर्वेद में घी और शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से बचने की सलाह दी गई है

    एसिडिटी और सीने की जलन

    बार बार एसिडिटी खट्टी डकारें या सीने में जलन की समस्या होने पर कुछ लोग सीमित मात्रा में घी का सेवन करते हैं

    आयुर्वेद में घी को पित्त शांत करने वाला माना गया है

    जोड़ों की अकड़न और दर्द

    उम्र बढ़ने के साथ कई लोगों को घुटनों कलाई या अन्य जोड़ों में जकड़न महसूस होने लगती है

    आयुर्वेद के अनुसार घी वात दोष को संतुलित करने में सहायक माना जाता है

    कुछ लोग सीमित मात्रा में घी का सेवन करने के साथ बाहरी मालिश भी करते हैं

    महिलाओं के लिए विशेष महत्व

    आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से घी को स्त्री स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माना गया है

    कई पारंपरिक परिवारों में महिलाओं को भोजन के साथ सीमित मात्रा में घी लेने की सलाह दी जाती रही है

    आंखों के नीचे डार्क सर्कल और रूखापन

    कुछ लोग रात में शुद्ध देसी घी से आंखों के नीचे हल्की मालिश करते हैं

    हालांकि इसका प्रभाव हर व्यक्ति में अलग अलग हो सकता है

    नाक की खुश्की और बंद नाक

    आयुर्वेद में नस्य की परंपरा का वर्णन मिलता है

    कुछ लोग नाक के सूखेपन या मौसमी परेशानी में सीमित मात्रा में घी का उपयोग करते हैं

    नाक में किसी भी प्रकार का पदार्थ डालने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह लेना बेहतर होता है

    अच्छी नींद के लिए

    कई परिवारों में आज भी सोने से पहले पैरों के तलवों पर घी की हल्की मालिश की जाती है

    आयुर्वेद के अनुसार इससे शरीर को आराम और शांति महसूस कराने में सहायता मिल सकती है

    कुछ जरूरी सावधानियां

    घी हमेशा सीमित मात्रा में लें

    शुद्ध और विश्वसनीय स्रोत का घी ही चुनें

    यदि आपको लिवर रोग गंभीर हृदय रोग पीलिया या कोई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्या है तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही सेवन करें

    किसी भी घरेलू नुस्खे को इलाज का विकल्प न समझें

    आयुर्वेद घी को इतना महत्व क्यों देता है

    आयुर्वेद में घृत को केवल भोजन नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण अनुपान और रसायन माना गया है

    चरक संहिता अष्टांग हृदयम और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में घृत के अनेक उपयोगों का उल्लेख मिलता है

    यदि आप आयुर्वेद को उसके मूल ग्रंथों के संदर्भों सहित गहराई से समझना चाहते हैं तो हमारे पास सौ से अधिक दुर्लभ आयुर्वेदिक पुस्तकों और तीन सौ से अधिक सनातन ग्रंथों का डिजिटल संग्रह उपलब्ध है

    यदि आप इसकी जानकारी चाहते हैं तो कमेंट में केवल BOOK लिखें मैं उपलब्धता के अनुसार जानकारी साझा करने का प्रयास करूंगा

    अब आपकी बारी

    क्या आप रोज घी खाते हैं

    आपके घर में गाय का घी उपयोग होता है या भैंस का

    क्या आपने कभी घी का कोई घरेलू प्रयोग किया है

    आपके अनुसार घी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है या नुकसानदायक

    अपना अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें आपका अनुभव दूसरे लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकता है

    स्वास्थ्य संबंधी सूचना

    यह जानकारी केवल सामान्य शिक्षा और जागरूकता के उद्देश्य से साझा की गई है घी के संभावित लाभों से जुड़े कई दावे पारंपरिक आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित हैं और हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं होते किसी भी स्वास्थ्य समस्या दवा या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले योग्य चिकित्सक या आयुर्वेदाचार्य से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें