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  • हार्ट अटैक के इन लक्षणों को गैस समझने की भूल न करें! ठंडा पसीना, सांस फूलना और सीने में दर्द हो सकते हैं खतरे के संकेत..

    हार्ट अटैक के इन लक्षणों को गैस समझने की भूल न करें! ठंडा पसीना, सांस फूलना और सीने में दर्द हो सकते हैं खतरे के संकेत..

    हार्ट अटैक के इन लक्षणों को गैस समझने की भूल न करें! ठंडा पसीना, सांस फूलना और सीने में दर्द हो सकते हैं खतरे के संकेत..

    हार्ट अटैक के शुरुआती संकेत पहचानना क्यों है जरूरी?

    दिल से जुड़ी बीमारियां आज दुनिया में मौत के सबसे बड़े कारणों में शामिल हैं। कई बार लोग हार्ट अटैक के शुरुआती लक्षणों को गैस, अपच या सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे इलाज में देरी हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि हार्ट अटैक के संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए और तुरंत चिकित्सा सहायता ली जाए, तो गंभीर जटिलताओं और जान का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    किन कारणों से बढ़ता है हार्ट अटैक का खतरा?

    हार्ट अटैक और अन्य हृदय रोगों का जोखिम कई कारणों से बढ़ सकता है, जैसे—

    • असंतुलित और अस्वस्थ खानपान।
    • शारीरिक गतिविधि की कमी।
    • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन।
    • अत्यधिक शराब पीना।
    • हाई ब्लड प्रेशर।
    • डायबिटीज या बढ़ा हुआ ब्लड शुगर।
    • बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल।
    • मोटापा।
    • लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहना।

    हार्ट अटैक के प्रमुख लक्षण

    हार्ट अटैक के दौरान निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं—

    • सीने के बीच में तेज दर्द, दबाव या भारीपन महसूस होना।
    • दर्द का बाएं हाथ, दोनों हाथों, कंधे, जबड़े, गर्दन या पीठ तक फैलना।
    • सांस लेने में तकलीफ या सांस फूलना।
    • ठंडा पसीना आना।
    • जी मिचलाना या उल्टी होना।
    • चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होना।
    • चेहरा पीला पड़ जाना।
    • अचानक अत्यधिक कमजोरी महसूस होना।

    ध्यान रखें, हर व्यक्ति में हार्ट अटैक के लक्षण एक जैसे नहीं होते। कुछ लोगों, विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और डायबिटीज के मरीजों में लक्षण हल्के या अलग तरह के भी हो सकते हैं।

    स्ट्रोक के चेतावनी संकेत

    हार्ट अटैक की तरह स्ट्रोक भी मेडिकल इमरजेंसी है। इसके सामान्य लक्षण हैं—

    • चेहरे, हाथ या पैर का अचानक सुन्न या कमजोर पड़ जाना, खासकर शरीर के एक तरफ।
    • बोलने या दूसरों की बात समझने में कठिनाई होना।
    • एक या दोनों आंखों से धुंधला दिखाई देना।
    • चलने में परेशानी, संतुलन बिगड़ना या चक्कर आना।
    • बिना किसी स्पष्ट कारण के तेज सिरदर्द होना।

    हार्ट अटैक और गैस में अंतर

    कई बार गैस और हार्ट अटैक के कुछ लक्षण मिलते-जुलते लग सकते हैं, लेकिन यदि—

    • सीने में दर्द लगातार बना रहे,
    • दर्द हाथ, जबड़े या पीठ तक फैल रहा हो,
    • सांस लेने में परेशानी हो,
    • ठंडा पसीना आ रहा हो,
    • या चक्कर और कमजोरी महसूस हो रही हो,

    तो इसे गैस मानकर घर पर इलाज करने के बजाय तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।

    दिल को स्वस्थ रखने के आसान उपाय

    • संतुलित और पौष्टिक आहार लें।
    • नियमित रूप से व्यायाम या तेज चाल से चलें।
    • धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाएं।
    • शराब का सेवन सीमित या पूरी तरह बंद करें।
    • ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराएं।
    • स्वस्थ वजन बनाए रखें।
    • तनाव कम करने और पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करें।

    निष्कर्ष

    हार्ट अटैक और स्ट्रोक दोनों ही जानलेवा स्थितियां हो सकती हैं, लेकिन इनके शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सकती है। यदि सीने में दर्द, ठंडा पसीना, सांस लेने में तकलीफ या स्ट्रोक के अन्य लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें और इलाज में देरी न करें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसे लक्षण दिखाई देने पर स्वयं इलाज करने के बजाय तुरंत नजदीकी अस्पताल जाएं या योग्य चिकित्सक से संपर्क करें।

  • क्या आप भी खाते हैं वनस्पति घी डाइटीशियन ने बताया दिल के लिए कितना खतरनाक है ट्रांस फैट..

    क्या आप भी खाते हैं वनस्पति घी डाइटीशियन ने बताया दिल के लिए कितना खतरनाक है ट्रांस फैट..

    क्या आप भी खाते हैं वनस्पति घी डाइटीशियन ने बताया दिल के लिए कितना खतरनाक है ट्रांस फैट..

    डालडा और ट्रांस फैट से बढ़ सकता है हार्ट डिजीज का खतरा

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ एक्सरसाइज ही नहीं, बल्कि सही खानपान भी बेहद जरूरी है। कई लोग आज भी वनस्पति घी (डालडा) से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसमें मौजूद ट्रांस फैट (Trans Fat) दिल की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है?

    डाइटीशियन के अनुसार, ट्रांस फैट का अधिक सेवन हृदय रोग, खराब कोलेस्ट्रॉल और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए रोजमर्रा के भोजन में इसकी मात्रा कम रखना जरूरी है।

    ट्रांस फैट क्या होता है?

    ट्रांस फैट एक प्रकार की अस्वस्थ वसा (Unhealthy Fat) है, जो मुख्य रूप से वनस्पति तेल को हाइड्रोजनेशन प्रक्रिया से ठोस रूप यानी वनस्पति घी (डालडा) में बदलने पर बनती है।

    हालांकि दूध और मांस जैसे कुछ खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से भी थोड़ी मात्रा में ट्रांस फैट पाया जाता है, लेकिन कृत्रिम (Artificial) ट्रांस फैट को स्वास्थ्य के लिए अधिक हानिकारक माना जाता है।

    WHO क्या कहता है?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार—

    • यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 2000 कैलोरी का भोजन करता है, तो उसके आहार में 2 ग्राम से कम ट्रांस फैट होना चाहिए।
    • ट्रांस फैट की मात्रा कुल दैनिक कैलोरी के 1 प्रतिशत से भी कम रखने की सलाह दी जाती है।
    • जितना कम ट्रांस फैट का सेवन किया जाएगा, दिल की सेहत के लिए उतना ही बेहतर होगा।

    ट्रांस फैट दिल पर कैसे असर डालता है?

    विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक ट्रांस फैट का सेवन—

    • खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ा सकता है।
    • अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को कम कर सकता है।
    • हृदय रोग का खतरा बढ़ा सकता है।
    • रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
    • लंबे समय में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है।

    किन चीजों में ज्यादा होता है ट्रांस फैट?

    ट्रांस फैट अक्सर इन खाद्य पदार्थों में पाया जा सकता है—

    • वनस्पति घी (डालडा)
    • बेकरी प्रोडक्ट्स
    • पफ, पेस्ट्री और कुकीज़
    • नमकीन और पैकेज्ड स्नैक्स
    • बार-बार गर्म किए गए तेल में तले खाद्य पदार्थ
    • कुछ फास्ट फूड और स्ट्रीट फूड

    पैकेट खरीदते समय क्या देखें?

    यदि आप पैकेज्ड फूड खरीद रहे हैं, तो सबसे पहले उसका Nutrition Label और Ingredients List जरूर पढ़ें।

    ध्यान रखें—

    • ट्रांस फैट की मात्रा जितनी कम हो, उतना बेहतर।
    • यदि सामग्री (Ingredients) में Hydrogenated Vegetable Oil, Partially Hydrogenated Oil या Vanaspati लिखा हो, तो ऐसे उत्पादों का सेवन सीमित करें।
    • केवल “0% Trans Fat” लिखे होने पर भरोसा न करें, सामग्री सूची भी अवश्य जांचें।

    तेल का दोबारा इस्तेमाल क्यों नहीं करना चाहिए?

    एक ही तेल को बार-बार गर्म करने से उसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है और हानिकारक यौगिक बनने लगते हैं।

    ऐसे तेल की पहचान—

    • तेल का रंग गहरा हो जाना।
    • तेल का गाढ़ा या चिपचिपा होना।
    • बार-बार झाग बनना।
    • लगातार धुआं निकलना।

    ऐसे तेल में बना भोजन खाने से बचना चाहिए।

    घर में रखें ये सावधानियां

    • वनस्पति घी के बजाय स्वस्थ तेलों का सीमित मात्रा में उपयोग करें।
    • तली हुई चीजें कम खाएं।
    • एक बार इस्तेमाल किए गए तेल को बार-बार गर्म न करें।
    • पैकेज्ड फूड खरीदते समय लेबल पढ़ने की आदत डालें।
    • ताजे और घर के बने भोजन को प्राथमिकता दें।

    निष्कर्ष

    दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए ट्रांस फैट का सेवन जितना संभव हो कम करना चाहिए। वनस्पति घी (डालडा), बार-बार गर्म किए गए तेल और अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थों से दूरी बनाकर हृदय रोग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली बेहतर हृदय स्वास्थ्य की कुंजी है।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी बीमारी, आहार या उपचार से जुड़ा निर्णय लेने से पहले योग्य डॉक्टर या डाइटीशियन से सलाह अवश्य लें।

  • डायबिटीज के 11 शुरुआती चेतावनी संकेत! ICMR की रिपोर्ट में बताए गए लक्षण, समय रहते पहचानना है बेहद जरूरी..

    डायबिटीज के 11 शुरुआती चेतावनी संकेत! ICMR की रिपोर्ट में बताए गए लक्षण, समय रहते पहचानना है बेहद जरूरी..

    डायबिटीज के 11 शुरुआती चेतावनी संकेत! ICMR की रिपोर्ट में बताए गए लक्षण, समय रहते पहचानना है बेहद जरूरी..

    डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

    डायबिटीज (मधुमेह) एक ऐसी मेटाबॉलिक बीमारी है, जिसमें शरीर में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन समय पर पहचान और सही इलाज से इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

    भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की मेडिकल जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज के कई शुरुआती संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें अक्सर लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यदि इन लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो बीमारी को बढ़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है।

    डायबिटीज के 11 वॉर्निंग साइन

    ICMR की रिपोर्ट के अनुसार, निम्नलिखित लक्षण डायबिटीज के शुरुआती संकेत हो सकते हैं—

    1. बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना।
    2. हर समय थकान और कमजोरी महसूस होना।
    3. बार-बार चिड़चिड़ापन या मूड में बदलाव होना।
    4. त्वचा, जननांग, मूत्र मार्ग या मुंह में बार-बार संक्रमण होना तथा घाव का देर से भरना।
    5. मुंह का बार-बार सूखना।
    6. पैरों में जलन, दर्द, झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होना।
    7. शरीर में लगातार खुजली रहना।
    8. खाना खाने के कुछ घंटे बाद ब्लड शुगर का अचानक कम हो जाना।
    9. गर्दन, बगल या जननांगों के आसपास त्वचा का काला पड़ना, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है।
    10. धुंधला दिखाई देना या नजर कमजोर होना।
    11. पुरुषों में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (स्तंभन संबंधी समस्या) होना।

    डायबिटीज के सामान्य लक्षण भी जान लें

    इन शुरुआती संकेतों के अलावा डायबिटीज में कुछ सामान्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे—

    • बार-बार पेशाब आना।
    • जरूरत से ज्यादा प्यास लगना।
    • बार-बार भूख लगना।
    • ब्लड शुगर का लगातार बढ़ा रहना।
    • शरीर में दर्द और बेचैनी महसूस होना।

    प्री-डायबिटीज को पहचानना भी जरूरी

    प्री-डायबिटीज वह अवस्था है, जिसमें ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है लेकिन डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता। इस दौरान शरीर में इंसुलिन का असर कम होने लगता है।

    यदि खाना खाने के 2–3 घंटे बाद ब्लड शुगर अचानक गिरने लगे, तो यह इंसुलिन मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में ब्लड शुगर की जांच और डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    किन लोगों में डायबिटीज का खतरा ज्यादा होता है?

    कुछ लोगों में डायबिटीज होने का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है, जैसे—

    • परिवार में किसी सदस्य को डायबिटीज होना।
    • 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र।
    • अधिक वजन या मोटापा।
    • कमर और पेट के आसपास अधिक चर्बी होना।
    • हाई ब्लड प्रेशर की समस्या।
    • हाल के समय में तेजी से वजन बढ़ना।
    • शारीरिक गतिविधि की कमी।
    • महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज (Gestational Diabetes) का इतिहास।

    समय पर जांच क्यों है जरूरी?

    डायबिटीज कई वर्षों तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए यदि ऊपर बताए गए संकेत बार-बार दिखाई दें या आपके पास जोखिम कारक मौजूद हों, तो ब्लड शुगर की जांच कराना और डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर पहचान और जीवनशैली में बदलाव से डायबिटीज को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी लक्षण के दिखाई देने पर स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर से परामर्श लें और आवश्यक जांच अवश्य कराएं।

  • बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    फिट रहने के लिए रोज कितनी एक्सरसाइज करनी चाहिए?

    आज के समय में फिट और हेल्दी रहने के लिए लोग वॉकिंग, रनिंग, योग, जिम और दूसरी तरह की एक्सरसाइज करते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हर उम्र के व्यक्ति को कितनी देर तक फिजिकल एक्टिविटी करनी चाहिए? क्या रोज 10 हजार कदम चलना ही पर्याप्त है या इससे ज्यादा भी जरूरी है?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ कदम गिनना ही जरूरी नहीं है, बल्कि पूरे सप्ताह की कुल शारीरिक गतिविधि ज्यादा मायने रखती है। हर उम्र के लोगों के लिए एक्सरसाइज की जरूरत अलग-अलग होती है।

    क्या रोज 10 हजार कदम चलना जरूरी है?

    WHO के अनुसार, 10 हजार कदम चलना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह एक सामान्य लक्ष्य हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और जीवनशैली के अनुसार फिजिकल एक्टिविटी की जरूरत अलग होती है। इसलिए केवल स्टेप काउंट पर ध्यान देने के बजाय नियमित रूप से सक्रिय रहना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सिर्फ कदम नहीं, एक्टिव लाइफस्टाइल भी जरूरी

    फिट रहने के लिए केवल वॉक करना ही काफी नहीं है। पूरे दिन में की जाने वाली कई गतिविधियां भी फिजिकल एक्टिविटी का हिस्सा होती हैं, जैसे—

    • तेज चलना
    • साइकिल चलाना
    • दौड़ना
    • तैराकी
    • खेलकूद
    • योग
    • घर के काम
    • सीढ़ियां चढ़ना

    जितना अधिक शरीर सक्रिय रहेगा, उतना ही स्वास्थ्य को लाभ मिलेगा।

    5 से 17 साल के बच्चों और किशोरों के लिए

    WHO की गाइडलाइन के अनुसार 5 से 17 वर्ष के बच्चों और किशोरों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए।

    इसमें शामिल हो सकते हैं—

    • आउटडोर गेम्स
    • दौड़ना
    • साइकिल चलाना
    • तैराकी
    • डांस
    • अन्य खेल गतिविधियां

    सप्ताह में कम से कम 3 दिन ऐसी गतिविधियां भी करनी चाहिए जो हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाएं।

    18 से 64 साल के वयस्कों के लिए

    18 से 64 वर्ष की उम्र के लोगों के लिए WHO की सलाह है कि वे सप्ताहभर में—

    • कम से कम 150 से 300 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • या 75 से 150 मिनट तेज तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • बेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए सप्ताह में दो या उससे अधिक दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज भी करें।

    65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए

    65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को भी सप्ताह में कम से कम 150 मिनट शारीरिक गतिविधि करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा उन्हें ऐसी एक्सरसाइज भी करनी चाहिए जो—

    • संतुलन (Balance) बेहतर बनाए,
    • गिरने के जोखिम को कम करे,
    • मांसपेशियों को मजबूत रखे,
    • शरीर की लचीलापन बनाए रखे।

    लंबे समय तक बैठे रहना भी नुकसानदायक

    WHO का कहना है कि केवल एक्सरसाइज करना ही काफी नहीं है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहना भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए काम के दौरान बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना, स्ट्रेचिंग करना और शरीर को सक्रिय रखना जरूरी है।

    निष्कर्ष

    स्वस्थ रहने के लिए किसी एक तय संख्या में कदम चलना जरूरी नहीं है। असली लक्ष्य नियमित रूप से सक्रिय रहना और उम्र के अनुसार पर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी करना है। चाहे बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग—हर किसी को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिए। यदि पहले से कोई गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य समस्या है, तो नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज शुरू करने या अपनी दिनचर्या में बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक या फिटनेस विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह की शुरुआत चाय से करना पड़ सकता है भारी

    भारत में लाखों लोगों की सुबह की शुरुआत एक कप गर्म चाय से होती है। कई लोगों का मानना है कि बिना चाय के उनकी नींद ही नहीं खुलती। लेकिन अगर आप रोजाना खाली पेट चाय पीते हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे आपकी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से गैस, एसिडिटी या पाचन संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें इस आदत से बचने की सलाह दी जाती है।

    1. बढ़ सकती है एसिडिटी और पेट में जलन

    खाली पेट चाय पीने से पेट में एसिड का स्तर बढ़ सकता है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें और एसिडिटी जैसी समस्याएं होने की संभावना रहती है। जिन लोगों को पहले से एसिड रिफ्लक्स की शिकायत है, उनके लिए यह आदत परेशानी बढ़ा सकती है।

    2. पाचन तंत्र पर पड़ सकता है असर

    चाय में मौजूद कैफीन और अन्य प्राकृतिक तत्व कुछ लोगों के पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसके कारण पेट में भारीपन, गैस, अपच या असहजता महसूस हो सकती है।

    3. बेचैनी और घबराहट महसूस हो सकती है

    सुबह खाली पेट कैफीन लेने से कुछ लोगों में घबराहट, बेचैनी, हाथ कांपना या दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। यह असर व्यक्ति की कैफीन सहन करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।

    4. इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    अगर सुबह चाय पीने के बाद बार-बार पेट दर्द, मितली, उल्टी, जलन या गैस की समस्या होने लगे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके।

    5. दिन की शुरुआत पानी से करना बेहतर

    विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह उठने के बाद शरीर को सबसे पहले पानी की जरूरत होती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है और पाचन तंत्र भी बेहतर तरीके से काम करता है। इसके बाद हल्का नाश्ता करके चाय पीना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना जाता है।

    6. किन लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए?

    • जिन लोगों को एसिडिटी या गैस की समस्या रहती है।
    • जिन्हें पेट का अल्सर या एसिड रिफ्लक्स है।
    • जिन्हें कैफीन से घबराहट या धड़कन बढ़ने की शिकायत होती है।
    • गर्भवती महिलाओं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही चाय का सेवन करना चाहिए।

    निष्कर्ष

    सुबह खाली पेट चाय पीना हर व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन अगर इससे आपको पेट में जलन, गैस, बेचैनी या अन्य समस्याएं होती हैं, तो इस आदत में बदलाव करना बेहतर रहेगा। दिन की शुरुआत पहले पानी और फिर पौष्टिक नाश्ते से करें। यदि कोई परेशानी लगातार बनी रहती है, तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या आहार में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बारिश के मौसम में सर्दी-जुकाम, खांसी और फेफड़ों से जुड़ी समस्या का रिस्क काफी बढ़ जाता है. इस मौसम में सबसे ज्यादा असर बच्चे, कमजोर इम्यूनिटी और बुजुर्गों पर पड़ता है. दरअसल बरसात के मौसम में तापमान में उतार-चढ़ाव, नमी और घरों में सीलन की वजह से इंफेक्शन का रिस्क बढ़ जाता है.

    SWORD स्टडी के अनुसार मानसून के दौरान रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के मामले लगभग 13 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. इंडियन जर्नल ऑफ चेस्ट डिजीज एंड अलाइड साइंस 2014 में पब्लिश स्टडी के अनुसार बरसात के दिनों में गीले रहने की वजह से निमोनिया का रिस्क बढ़ सकता है.

    क्या है निमोनिया?

    निमोनिया फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी है. निमोनिया होने पर फेफड़ों में सूजन और पानी भरने की समस्या हो सकती है. निमोनिया होने पर सांस लेने में दिक्कत आती है. क्योंकि शरीर में ऑक्सीजन सही पहुंच नहीं पाता है. लंबे समय तक सर्दी, खांसी, फ्लू की समस्या निमोनिया में बदल सकता है.

    बरसात के मौसम में क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क

    बारिश के दिनों में नमी की वजह से वायरस और बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं. बरसात के मौसम में घर में सीलन और गंदगी भी बढ़ जाती है. बारिश में बार-बार गीले होने की वजह से भी निमोनिया का रिस्क बढ़ जाता है.

    इन लोगों में निमोनिया होने का रिस्क अधिक

    कुछ लोगों में निमोनिया का रिस्क अन्य लोगों की तुलना में अधिक होता है. 
    अस्थमा मरीज में निमोनिया का रिस्क सबसे अधिक है
    डायबिटीज मरीज में भी निमोनिया का जोखिम अन्य लोगों से अधिक है. 
    हार्ट पेशेंट में भी निमोनिया होने का रिस्क होता है 
    5 साल के छोटे बच्चे और 60 साल से अधिक उम्र के लोगों में भी निमोनिया का रिस्क अधिक होता है.

    निमोनिया के शुरुआती लक्षण

    निमोनिया होने पर सर्दी-खांसी जैसे नॉर्मल लक्षण नजर आते हैं.
    निमोनिया होने पर तेज बुखार आता है. 
    लगातारी खांसी आना भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है. 
    बलगम आना भी निमोनिया का संकेत हो सकता है. 
    सांस फूलने की समस्या भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है. 
    सीने में दर्द होना निमोनिया का संकेत हो सकता है. 
    थकान, कमजोरी और ठंड लगने की समस्या भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है.

    सर्दी खांसी और निमोनिया में फर्क

    सर्दी-खांसी में हल्का बुखार होता है वहीं निमोनिया में तेज बुखार, सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द और कमजोरी होती है. कई दिनों तक सांस फूलने की समस्या निमोनिया का लक्षण हो सकता है.

    बच्चों में निमोनिया के लक्षण

    बच्चों में निमोनिया के लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बच्चें अक्सर अपनी समस्या को सही से बता नहीं पाते हैं ऐसे में आप उनके इन लक्षणों को नजरअंदाज ना करें. 
    बहुत तेज सांस चलना 
    बच्चे का सुस्त पड़ जाना 
    पसलियों का अंदर धंसना 
    होंठ का नीला पड़ना 
    खाना ना खाना 
    लगातार तेज बुखार 
    बार-बार उल्टी होना 
    हिहाइड्रेशन होना

  • पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    रिलेशनशिप में कई बार लोगों के मन में ख्याल आता है उसने मेरा मैसेज देख लिया, लेकिन रिप्लाई नहीं किया, कहीं वो मुझसे बोर हो गया है? कल रात उसने की बात में प्यार का लहजा नहीं था. कहीं उसका चक्कर तो नहीं चला रहा? वो मुझे छोड़ तो नहीं देगा. कुछ लोगों का रिश्ता बहुत अच्छा होता है लेकिन किसी एक मन में ख्याल रहता है कि कहीं रिश्ता खत्म ना हो जाए. इस कंडीशन को रिलेशनशिप एंग्यायटी कहते हैं.

    ओवरथिंकिंग

    ओवरथिंकिंग की वजह से रिश्ते पर ज्यादा असर पड़ता है. दरअसल ओवरथिंकिंग की वजह से पार्टनर के हर छोटे एक्शन और बात का काफी गहरा मतलब निकाल लेते हैं. जैसे गुड नाइट के साथ हार्ट इमोजी नहीं भेजा, मेरे प्यार भरे मैसेज में हार्ट का इमोजी क्यों नहीं भेजा. इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है.

    बार-बार पूछना

    अपने पार्टनर से बार-बार सवाल करना या पूछना कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं? तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे? बार पर इस तरह के सवाल आने की वजह से भी रिश्ता कमजोर होने लगता है.

    पार्टनर के मूड से खुद का मूड तय करना

    अगर आपके पार्टनर का दिन खराब रहा है वो शांत है तो आप अगर मान लेते है को वह अपने नाराज है. फिर आप अपना मूड भी खराब कर लेते हैं. इससे आपका रिश्ता मजबूत नहीं बल्कि और ज्यादा खराब हो जाएगा.

    लड़ाई-झगड़े से डरना

    रिश्ते में छोटी-मोटी बहस होना बेहद आम है. लेकिन रिलेशनशिप एंग्जायटी से परेशान लोग छोटी सी बहसको ब्रेकअप मान लेते हैं. उनको लगता है कि ये छोटी सी लड़ाई ब्रेकअप बन सकती है.

    रिलेशनशिप एंग्जायटी के नुकसान

    रिलेशनशिप एंग्जायटी ना केवल आपने मेंटल हेल्थ बल्कि पार्टनर के मेंटल हेल्थ के लिए भी खराब है. इससे आपका पार्टनर भी मानसिक रूप से थक जाता है. जिससे रिश्ते की नींव कमजोर होने लगती है.

    रिलेशनशिप एंग्जायटी से छुटकारा कैसे मिलेगा

    आपके मन में जो भी चल रहा है, जो भी अजीब सा डर है उसे लकर पार्टनर के साथ खुलकर बात करनी चाहिए. ताकि पार्टनर को आपके बारे में पता चल पाए. 
    खुद को बिजी रखना चाहिए. जिम जाना चाहिए, दोस्तों से मिलना-जुलना चाहिए.

  • मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    आज के समय में मार्केट में मिलने वाली मेहंदी का रंग बहुत ही आसानी से चढ़ जाता है. मेहंदी में केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है. केमिकल वाली मेहंदी लगाने से 2 दिन बाद मेहंदी पपड़ी की तरह हाथ से उतरने लगती है. जिसकी वजह से हाथ रफ हो जाते हैं. इस तरह उतरती हुई मेहंदी बेहद खराब लगती है. ऐसे में आप घर पर मेहंदी बना सकते हैं.

    घर पर बनी मेहंदी का रंग नहीं चढ़ता है लेकिन इन चीजों को मिलाने से मेहंदी का रंग गहरा आएगा. होममेड मेहंदी को लगाने से हाथ पर चढ़ा रंग कई दिनों पर हल्का होता है. आइए जानते हैं घर पर कैसे बनाएं मेहंदी.

    घर पर बनाएं मेहंदी कोन

    तीन छोटे चम्मच चीनी
    तीनी छोटे चम्मच चाय की पत्ती 
    2 छोटे चम्मच कॉफी 
    लौंग 
    मेहंदी का पाउडर 
    पानी

    इस तरह बनाएं मेहंदी

    एक बर्तन लें, इसमें पानी डालकर पानी को गर्म कर लें. इसके बाद इसमें चीनी, चाय की पत्ती, लौंग और कॉफी डाल दें.

    अब इस पानी को अच्छे से उबाल लें, जैसे ही पानी डार्क ब्राउन हो जाए तो गैस बंद कर दें.

    अब इस पानी को मेहंदी पाउडर में मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें. मेहंदी का घोल ना ज्यादा पतला और ना ही ज्यादा गाढ़ा होना चाहिए.

    अब तैयार करें मेहंदी का कोन

    मेहंदी का पेस्ट बनकर तैयार है. इसके बाद मेहंदी को कुछ घंटों के लिए ढककर रख दें. इसके बाद प्लास्टिक की शीट लें. इस को कोन की शेप दें. इस कोन में मेहंदी भर दें. लीजिए आपकी होममेड मेहंदी कोन बनकर तैयार है.

    होममेड मेहंदी लगाने के फायदे

    चाय की पत्ती और लौंग का पानी मिलाने से मेहंदी का रंग गाढ़ा आता है. कॉफी मिलाने से भी मेहंदी का रंग हाथों पर बेहद खूबसूरत आता है.

    चीनी मिलाने से मेहंदी लगाने के बाद जल्दी सूखकर हटती नहीं है.

    होममेड मेहंदी लगाने के बाद इसे जल्दी नहीं धोना चाहिए.

    मेहंदी सूखने के बाद हल्के हाथों से मेहंदी हटाना चाहिए

    पानी में तुरंत हाथ नहीं धोना चाहिए

    मेहंदी हटाने के बाद हाथों पर तेल लगा सकते हैं.

  • किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर लोगों में एक आम डर बैठा है कि एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो गई तो जिंदगीभर चलती रहेगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? शरीर के खून को साफ करने और टॉक्सिन्स बाहर निकालने का काम किडनी ही करती है। गलत खान-पान, लाइफस्टाइल और बीमारियों से किडनी खराब होने लगती है। शुरू में हल्की लगने वाली यह समस्या एंड स्टेज तक पहुंच जाती है, जहां डायलिसिस जरूरी हो जाता है। सवाल वही है- क्या इससे वापसी संभव है?​

    डायलिसिस की अवधि

    सफदरजंग अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग प्रमुख डॉ. हिमांशु वर्मा से हुई विशेष बातचीत में यह साफ हो गया कि डायलिसिस की अवधि मरीज की स्थिति पर निर्भर करती है। “कुछ मामलों में यह थोड़े समय के लिए होती है, तो कई में लाइफलॉन्ग या ट्रांसप्लांट तक चलती है,” डॉ. वर्मा ने कहा। एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) में, जैसे डेंगू, मलेरिया या डिहाइड्रेशन से अचानक किडनी फेल हो जाए, तो डायलिसिस अस्थायी होती है। किडनी रिकवर होते ही, यानी 10-15% फंक्शन लौटते ही, इसे बंद किया जा सकता है। 10-15% मामलों में पूर्ण रिकवरी हो जाती है।​

    डायलिसिस के प्रकार और प्रक्रिया

    डायलिसिस दो मुख्य प्रकार की होती है- हीमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस। हीमोडायलिसिस में मशीन ब्लड को फिल्टर करती है। हफ्ते में 3 बार, 3-4 घंटे का सेशन अस्पताल में होता है। पेरिटोनियल में पेट की झिल्ली फिल्टर का काम करती है, घर पर ही किया जा सकता है।

    क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) में, जो डायबिटीज, हाई BP या सालों की नेग्लिजेंस से होती है, किडनी परमानेंट डैमेज हो जाती है। यहां डायलिसिस सपोर्ट सिस्टम बन जाता है, जो जिंदगी 5-25 साल बढ़ा सकता है। बंद करने का रास्ता सिर्फ किडनी ट्रांसप्लांट है।

    एक्सपर्ट्स की राय

    डॉ. जितेंद्र कुमार जैसे एक्सपर्ट्स स्पष्ट कहते हैं कि डायलिसिस न किडनी ठीक करती है, न खराब। यह सिर्फ किडनी का आर्टिफिशियल काम करती है। एक्यूट केस में हफ्तों बाद बंद हो जाती है, लेकिन CKD स्टेज-5 में लाइफलॉन्ग।​​

    किडनी खराब होने के कारण और बचाव

    किडनी डैमेज के प्रमुख कारण- ज्यादा नमक, स्मोकिंग, शराब, कम पानी पीना। डॉ. हिमांशु ने सलाह दी, “डाइट में नमक कम करें, रोज व्यायाम करें, 3-4 लीटर पानी पिएं।” प्रिवेंशन ही बेस्ट ट्रीटमेंट है।

    शुरुआती लक्षण नजरअंदाज न करें

    • पैरों में सूजन।
    • बार-बार पेशाब या रंग बदलना।
    • स्किन में खुजली।
    • थकान, उल्टी।

    लोगों में मिथक है कि डायलिसिस ‘डरावनी’ है, लेकिन सही समय पर इलाज से लाखों जिंदगियां बच रही हैं। नेफ्रोलॉजिस्ट से नियमित चेकअप करवाएं। किडनी हेल्थ के लिए जागरूकता जरूरी है।

  • रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    नारी डेस्क: आजकल हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पहले इसे बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि हाई कोलेस्ट्रॉल अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ता रहता है, इसलिए इसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है। अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह हार्ट अटैक, स्ट्रोक और दिल से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोलेस्ट्रॉल किसी एक दिन में नहीं बढ़ता, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कुछ गलत आदतें धीरे-धीरे इसकी वजह बनती हैं।

    हाई कोलेस्ट्रॉल क्यों बढ़ता है

    खराब खानपान और असंतुलित जीवनशैली हाई कोलेस्ट्रॉल के सबसे बड़े कारणों में शामिल हैं। अगर लंबे समय तक शरीर को जरूरत से ज्यादा अनहेल्दी फैट और कम शारीरिक गतिविधि मिलती है, तो शरीर में एलडीएल (LDL) यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने लगता है।

    तला-भुना और जंक फूड बढ़ा सकता है खतरा

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन काफी बढ़ गया है। तला-भुना खाना, पिज्जा, बर्गर, पैकेज्ड स्नैक्स, मैदे से बनी चीजें, ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ और ज्यादा मीठे पेय पदार्थ शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने का काम कर सकते हैं। इन चीजों का नियमित सेवन करने से शरीर में फैट जमा होने लगता है, जिससे हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी भी है बड़ी वजह

    अगर आप पूरे दिन एक ही जगह बैठकर काम करते हैं और नियमित व्यायाम नहीं करते, तो यह भी हाई कोलेस्ट्रॉल का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रोजाना कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने और खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करती है।

    ये भी पढ़ें: शैंपू से भी नहीं रुक रहा हेयर फॉल? डाइट में शामिल करें ये 5 फूड्स

    बढ़ता वजन और गलत लाइफस्टाइल

    मोटापा भी हाई कोलेस्ट्रॉल का एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, देर रात तक जागना और पर्याप्त नींद न लेना भी शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। इसलिए केवल खानपान ही नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली को संतुलित रखना जरूरी है।

    कुछ बीमारियां भी बढ़ा सकती हैं कोलेस्ट्रॉल

    हर बार हाई कोलेस्ट्रॉल की वजह सिर्फ खानपान नहीं होती। कुछ स्वास्थ्य समस्याएं भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकती हैं। डायबिटीज, थायरॉयड की बीमारी, किडनी से जुड़ी समस्याएं और आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों की वजह से भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। जिन लोगों के परिवार में पहले से हाई कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोग का इतिहास है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

    शुरुआती लक्षण अक्सर नहीं दिखते

    हाई कोलेस्ट्रॉल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में इसके कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोगों को तब तक इसकी जानकारी नहीं होती, जब तक किसी नियमित जांच में इसका पता नहीं चलता या फिर इससे जुड़ी कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आ जाती। इसी वजह से 30 वर्ष की उम्र के बाद या जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराने की सलाह दी जाती है।

    कोलेस्ट्रॉल को कैसे रखें नियंत्रण में

    हाई कोलेस्ट्रॉल से बचाव के लिए सबसे पहले अपने खानपान में सुधार करना जरूरी है। ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ और हेल्दी फैट को अपनी डाइट में शामिल करें। इसके साथ ही रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें, वजन नियंत्रित रखें, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं तथा पर्याप्त नींद लें। अगर डॉक्टर ने दवाएं लिखी हैं, तो उन्हें नियमित रूप से लेना भी जरूरी है।

    नियमित जांच है सबसे जरूरी

    क्योंकि हाई कोलेस्ट्रॉल अक्सर बिना किसी संकेत के बढ़ता है, इसलिए केवल लक्षणों का इंतजार करना सही नहीं है। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, संतुलित जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह का पालन करके इसे काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है। सही समय पर उठाया गया छोटा-सा कदम भविष्य में दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है।