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  • दिल को स्वस्थ रखने के 25: आसान तरीके, डाइट से लेकर एक्सरसाइज और तनाव कम करने तक.

    दिल को स्वस्थ रखने के 25: आसान तरीके, डाइट से लेकर एक्सरसाइज और तनाव कम करने तक.

    दिल को स्वस्थ रखने के 25: आसान तरीके, डाइट से लेकर एक्सरसाइज और तनाव कम करने तक.

    आजकल खराब खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव, धूम्रपान और बढ़ते वजन जैसी कई आदतें हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। अच्छी बात यह है कि रोजमर्रा की जिंदगी में किए गए कुछ छोटे बदलाव दिल को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार धूम्रपान और अन्य तंबाकू उत्पादों से दूरी बनाना हृदय स्वास्थ्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। इसके अलावा खान-पान, एक्सरसाइज, नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है।

    आइए जानते हैं ऐसे 25 तरीके, जिन्हें अपनी दिनचर्या में शामिल करके आप अपने दिल की सेहत का बेहतर ख्याल रख सकते हैं।

    1. पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने पर ध्यान दें

    कमर के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी का संबंध हाई ब्लड प्रेशर और खून में अस्वस्थ वसा के स्तर से हो सकता है। अगर वजन बढ़ रहा है, तो भोजन की मात्रा और कैलोरी पर ध्यान देने के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि करना मददगार हो सकता है।

    2. डाइट में फाइबर बढ़ाएं

    फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ हृदय के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। खासकर घुलनशील फाइबर LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद कर सकता है।

    इसके लिए ओट्स, जौ, बीन्स, सेब, नाशपाती और एवोकाडो जैसे खाद्य पदार्थ डाइट में शामिल किए जा सकते हैं।

    3. पौष्टिक नाश्ता करें

    दिन की शुरुआत पौष्टिक भोजन से करना अच्छी खान-पान की आदतों को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    नाश्ते में साबुत अनाज, ओट्स, फल, सब्जियां, सीमित मात्रा में नट्स और प्रोटीन के अच्छे स्रोत शामिल किए जा सकते हैं।

    4. मछली को डाइट में शामिल करें

    सैल्मन, टूना, सार्डिन और हेरिंग जैसी कुछ मछलियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। संतुलित आहार के हिस्से के रूप में मछली खाना हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    5. थोड़े-थोड़े नट्स खाएं

    बादाम, अखरोट और अन्य नट्स में स्वस्थ वसा, प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है। इन्हें संतुलित मात्रा में खाने से हृदय के लिए बेहतर डाइट बनाने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि नट्स में कैलोरी भी काफी होती है, इसलिए इनका सेवन सीमित मात्रा में करना बेहतर है।

    6. नमक का सेवन कम करें

    बहुत ज्यादा सोडियम का सेवन हाई ब्लड प्रेशर का कारण बन सकता है, जो हृदय रोग के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है।

    पैकेज्ड फूड, प्रोसेस्ड फूड और रेस्टोरेंट के कई खाद्य पदार्थों में नमक की मात्रा अधिक हो सकती है। इसलिए खाने में अतिरिक्त नमक डालने की आदत को कम करने की कोशिश करें।

    अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर या हृदय से जुड़ी कोई बीमारी है, तो नमक की मात्रा के बारे में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    7. सैचुरेटेड फैट कम करें

    बहुत अधिक सैचुरेटेड फैट वाली डाइट हृदय स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इसलिए खाद्य पदार्थों के पोषण लेबल पर ध्यान दें और अत्यधिक सैचुरेटेड फैट वाले भोजन को सीमित करें।

    इसके बजाय एवोकाडो, जैतून का तेल, नट्स और अन्य स्वस्थ वसा वाले खाद्य पदार्थों को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    8. चाय का आनंद लें

    ग्रीन या ब्लैक टी को संतुलित मात्रा में पीना कुछ लोगों के लिए हृदय स्वास्थ्य से जुड़े लाभों से जुड़ा पाया गया है। हालांकि चाय में ज्यादा चीनी डालने से बचना बेहतर है।

    9. डार्क चॉकलेट सीमित मात्रा में खाएं

    डार्क चॉकलेट में फ्लेवोनॉयड जैसे पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। सीमित मात्रा में ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    हालांकि इसे ज्यादा खाने से कैलोरी और चीनी का सेवन बढ़ सकता है, इसलिए मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।

    एक्सरसाइज और शारीरिक गतिविधि को बनाएं दिनचर्या का हिस्सा

    10. लंबे समय तक लगातार न बैठें

    अगर आपका काम ज्यादातर बैठकर करने वाला है, तो बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना जरूरी है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

    काम के बीच छोटे ब्रेक लें और कुछ देर चलने की कोशिश करें।

    11. योग करें

    योग शरीर को लचीला बनाने, संतुलन और मांसपेशियों की ताकत बढ़ाने के साथ तनाव कम करने में मदद कर सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि के रूप में योग को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है।

    12. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें

    सिर्फ कार्डियो ही जरूरी नहीं है। मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज भी फिटनेस का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    अपनी क्षमता के अनुसार नियमित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से मांसपेशियों की ताकत और शरीर की फिटनेस बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।

    13. इंटरवल ट्रेनिंग आजमाएं

    इंटरवल ट्रेनिंग में कुछ समय तेज गतिविधि करने के बाद हल्की गतिविधि या आराम किया जाता है।

    यह एक्सरसाइज का एक तरीका है, लेकिन इसे अपनी फिटनेस और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही करें। हृदय संबंधी बीमारी होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    14. डांस करें

    डांस सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि शारीरिक गतिविधि का एक अच्छा तरीका भी हो सकता है। इससे हृदय गति बढ़ती है और शरीर सक्रिय रहता है।

    अपनी पसंद का संगीत लगाकर नियमित रूप से डांस करना एक्सरसाइज को मजेदार बनाने का तरीका हो सकता है।

    15. शारीरिक रूप से सक्रिय रहें

    रोजाना कुछ समय पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैरना या अन्य गतिविधियां करना शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है।

    16. रोज थोड़ा पैदल चलें

    अगर आप तनाव महसूस कर रहे हैं तो कुछ देर टहलना आपको मानसिक रूप से रिलैक्स करने में मदद कर सकता है।

    रोजाना नियमित वॉक को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का आसान तरीका है।

    17. सीढ़ियों का इस्तेमाल करें

    जहां संभव हो, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। ऑफिस में सहकर्मी से छोटी बात करने के लिए मैसेज या ईमेल करने के बजाय चलकर जाना भी दिनभर की गतिविधि बढ़ा सकता है।

    छोटी-छोटी गतिविधियां मिलकर आपकी कुल शारीरिक सक्रियता बढ़ा सकती हैं।

    18. घर के काम को भी एक्टिविटी समझें

    फर्श साफ करना, वैक्यूम करना, सामान व्यवस्थित करना या दूसरे घरेलू काम आपको सक्रिय रखते हैं।

    इन कामों को रोजमर्रा की शारीरिक गतिविधि बढ़ाने के एक तरीके के रूप में देखा जा सकता है।

    19. ऐसी गतिविधियां करें जिनमें आपको मजा आए

    फिटनेस का मतलब हमेशा जिम जाना नहीं है। डांस, बॉलिंग, स्केटिंग, खेल या परिवार के साथ पार्क में सक्रिय रहना भी शरीर को चलाने के अच्छे तरीके हो सकते हैं।

    मानसिक स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान

    20. अपनी पसंद का शौक अपनाएं

    तनाव कम करने के लिए ऐसा काम करें जिसमें आपका मन लगे। किताब पढ़ना, खाना बनाना, बागवानी, सिलाई, पेंटिंग, पहेलियां हल करना या लकड़ी का काम जैसे शौक मन को व्यस्त और रिलैक्स रखने में मदद कर सकते हैं।

    21. खुलकर हंसें

    हंसना तनाव कम करने और मूड बेहतर करने में मदद कर सकता है। दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना, मजेदार फिल्म देखना या ऐसी गतिविधियां करना जिनसे आपको खुशी मिलती है, मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा हो सकता है।

    22. तनाव को नियंत्रित करना सीखें

    लगातार तनाव, चिंता और गुस्सा शरीर पर असर डाल सकते हैं। इसलिए तनाव को संभालने के लिए मेडिटेशन, योग, गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज, वॉक या किसी पसंदीदा गतिविधि का सहारा लिया जा सकता है।

    अगर तनाव या चिंता रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही है, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी हो सकता है।

    23. अपने हेल्थ नंबरों पर नजर रखें

    हृदय स्वास्थ्य के लिए केवल लक्षणों का इंतजार करना जरूरी नहीं है। समय-समय पर ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड जैसे स्वास्थ्य संकेतकों की जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    अपने टेस्ट की रिपोर्ट संभालकर रखें और डॉक्टर से नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान इनके बारे में चर्चा करें।

    24. पालतू जानवर के साथ समय बिताएं

    पालतू जानवर लोगों को साथ और भावनात्मक सहयोग दे सकते हैं। उनके साथ खेलना और टहलना आपकी शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का एक तरीका भी हो सकता है।

    हालांकि किसी बीमारी से बचाव या इलाज के लिए केवल पालतू जानवर रखने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    25. ड्राइविंग के दौरान तनाव कम रखें

    सड़क पर ट्रैफिक या दूसरे ड्राइवरों की गलतियों को लेकर लगातार गुस्सा और तनाव लेने के बजाय शांत रहने की कोशिश करें।

    ड्राइविंग के दौरान फोन का इस्तेमाल न करें और सड़क पर सुरक्षित तरीके से ध्यान केंद्रित करें। तनाव कम रखने की आदत आपके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए बेहतर हो सकती है।

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी बातें

    हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कई स्वस्थ आदतों को साथ अपनाना जरूरी है।

    धूम्रपान और तंबाकू से दूरी, संतुलित आहार, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन, तनाव प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य जांच हृदय की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, हृदय रोग या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है, तो अपनी डाइट और एक्सरसाइज में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

    जरूरी बात: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। किसी बीमारी के इलाज या दवा में बदलाव के लिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

  • क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.

    क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.

    क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.

    पेट और आंतों से जुड़ी कुछ बीमारियों के नाम सुनकर अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं। IBD यानी Inflammatory Bowel Disease, Crohn’s Disease और Ulcerative Colitis (UC) को कई बार एक ही बीमारी समझ लिया जाता है। हालांकि, इन तीनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।

    आसान भाषा में समझें तो IBD एक व्यापक श्रेणी है, जिसमें मुख्य रूप से क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस शामिल हैं। दोनों बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली आंतों में लंबे समय तक सूजन पैदा कर सकती है। इनके कई लक्षण एक जैसे होते हैं, लेकिन आंत के किस हिस्से में सूजन होती है और बीमारी शरीर को किस तरह प्रभावित करती है, इसमें अंतर होता है।

    IBD क्या होता है?

    IBD यानी Inflammatory Bowel Disease ऐसी स्थितियों का समूह है, जिसमें पाचन तंत्र में लंबे समय तक सूजन बनी रह सकती है। इसमें क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस प्रमुख रूप से शामिल हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार IBD के विकास में आनुवंशिक कारणों के साथ-साथ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और आंतों के बैक्टीरिया से जुड़े कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।

    IBD आमतौर पर लंबे समय तक रहने वाली स्थिति होती है। इसमें कभी लक्षण कम हो जाते हैं या पूरी तरह शांत हो सकते हैं, जिसे रिमिशन कहा जाता है। वहीं जब लक्षण दोबारा बढ़ जाते हैं तो इसे फ्लेयर-अप कहा जाता है।

    फिलहाल IBD का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन उपलब्ध उपचारों की मदद से बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और कई लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं। उपचार का मुख्य उद्देश्य सूजन और लक्षणों को कम करना तथा बीमारी को रिमिशन में रखना होता है।

    क्रोहन डिजीज क्या है?

    Crohn’s Disease IBD का एक प्रकार है। यह पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। मुंह से लेकर गुदा तक इसका असर हो सकता है, हालांकि यह अक्सर छोटी आंत के अंतिम हिस्से और बड़ी आंत की शुरुआत को प्रभावित करता है।

    क्रोहन डिजीज के लक्षण

    इस बीमारी में व्यक्ति को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे:

    • बार-बार दस्त होना
    • कभी-कभी कब्ज की समस्या
    • पेट में दर्द या ऐंठन
    • बुखार
    • मल में खून आना
    • लगातार थकान
    • वजन कम होना
    • भूख कम लगना
    • पोषण की कमी
    • जोड़ों में दर्द
    • त्वचा से जुड़ी समस्याएं

    क्रोहन डिजीज का असर केवल पाचन तंत्र तक सीमित नहीं रहता। कुछ लोगों में त्वचा, आंखों, जोड़ों और लिवर से जुड़ी समस्याएं भी दिखाई दे सकती हैं।

    खाना खाने के बाद लक्षण बढ़ने की वजह से कुछ लोग भोजन कम करने लगते हैं, जिससे वजन कम होने और पोषण की कमी का खतरा बढ़ सकता है।

    क्रोहन डिजीज की जटिलताएं

    अगर बीमारी को नियंत्रित करना मुश्किल हो, तो आंत में सूजन और निशान पड़ने के कारण आंत में रुकावट जैसी समस्या हो सकती है।

    आंत में घाव यानी अल्सर भी बन सकते हैं। कुछ मामलों में ये असामान्य रास्ते बना सकते हैं, जिन्हें फिस्टुला कहा जाता है।

    अगर क्रोहन डिजीज बड़ी आंत के काफी हिस्से को प्रभावित करती है, तो लंबे समय में कोलन कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि जोखिम व्यक्ति की बीमारी की स्थिति और प्रभावित आंत के हिस्से समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।

    क्रोहन डिजीज का इलाज कैसे होता है?

    इलाज बीमारी की गंभीरता और व्यक्ति की स्थिति के अनुसार तय किया जाता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:

    • कुछ स्थितियों में सीमित अवधि के लिए स्टेरॉयड
    • संक्रमण या फोड़े जैसी समस्या होने पर एंटीबायोटिक्स
    • इम्यून सिस्टम की गतिविधि को नियंत्रित करने वाली दवाएं
    • बायोलॉजिक दवाएं

    कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि सर्जरी से क्रोहन डिजीज हमेशा के लिए खत्म नहीं होती।

    अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है?

    Ulcerative Colitis यानी UC भी IBD का एक प्रकार है, लेकिन यह क्रोहन डिजीज से अलग तरीके से आंतों को प्रभावित करता है।

    UC मुख्य रूप से बड़ी आंत और मलाशय तक सीमित रहता है और आमतौर पर आंत की अंदरूनी परत में लगातार सूजन पैदा करता है।

    अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण

    इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:

    • पेट में दर्द
    • बार-बार ढीला मल आना
    • मल में खून
    • अचानक शौच जाने की तेज इच्छा
    • थकान
    • भूख कम लगना
    • वजन कम होना
    • पोषण की कमी

    लक्षण इस बात पर भी निर्भर कर सकते हैं कि बड़ी आंत का कितना हिस्सा प्रभावित हुआ है।

    UC के प्रमुख प्रकार

    अल्सरेटिव कोलाइटिस को प्रभावित हिस्से के आधार पर अलग-अलग प्रकारों में समझा जाता है।

    अल्सरेटिव प्रोक्टाइटिस: इसमें मुख्य रूप से मलाशय प्रभावित होता है और इसे UC का सीमित रूप माना जाता है।

    लेफ्ट-साइडेड कोलाइटिस: इसमें मलाशय के साथ बड़ी आंत का बायां हिस्सा प्रभावित हो सकता है।

    एक्सटेंसिव कोलाइटिस: इसमें बड़ी आंत का काफी बड़ा हिस्सा या पूरी बड़ी आंत प्रभावित हो सकती है।

    अल्सरेटिव कोलाइटिस की जटिलताएं

    गंभीर या लंबे समय तक अनियंत्रित UC में कुछ जटिलताएं हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं:

    • बड़ी आंत में छेद होना
    • कोलन कैंसर का बढ़ा हुआ जोखिम
    • लिवर से जुड़ी समस्याएं
    • एनीमिया
    • हड्डियों की कमजोरी या ऑस्टियोपोरोसिस

    इसलिए लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

    Crohn’s और UC में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

    दोनों IBD के प्रकार हैं, लेकिन इनके बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।

    क्रोहन डिजीज पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है और सूजन आंत की अलग-अलग गहराई तक पहुंच सकती है।

    वहीं अल्सरेटिव कोलाइटिस मुख्य रूप से बड़ी आंत और मलाशय को प्रभावित करता है तथा सूजन आमतौर पर आंत की अंदरूनी परत तक सीमित रहती है।

    दोनों में पेट दर्द, दस्त, थकान और वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर खुद से बीमारी की पहचान करना सही नहीं है।

    डॉक्टर Crohn’s और UC की पहचान कैसे करते हैं?

    अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से दस्त, मल में खून, पेट दर्द, वजन कम होना या बार-बार शौच की समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

    स्थिति के अनुसार डॉक्टर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट यानी पाचन तंत्र के विशेषज्ञ के पास भेज सकते हैं।

    जांच में जरूरत के अनुसार:

    • ब्लड टेस्ट
    • स्टूल टेस्ट
    • कोलोनोस्कोपी
    • सिग्मॉइडोस्कोपी
    • CT स्कैन
    • अन्य इमेजिंग या एंडोस्कोपिक जांच

    का इस्तेमाल किया जा सकता है।

    इन जांचों से डॉक्टर यह समझने की कोशिश करते हैं कि सूजन कहां है और बीमारी किस प्रकार की है। इसके आधार पर इलाज की योजना बनाई जाती है।

    IBD में रोजमर्रा की जिंदगी कैसी हो सकती है?

    IBD लंबे समय तक चलने वाली बीमारी हो सकती है, लेकिन उचित चिकित्सा, नियमित फॉलो-अप और डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार से इसके लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    दवाएं नियमित रूप से लेना, अपनी बीमारी के ट्रिगर को समझना, पर्याप्त पोषण लेना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार जीवनशैली में बदलाव करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    अगर पेट की समस्या लगातार बनी हुई है, मल में खून आ रहा है, बिना वजह वजन कम हो रहा है या बार-बार दस्त हो रहे हैं, तो इसे सामान्य पेट की समस्या मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज न करें।

    जरूरी बात: क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और अन्य आंतों की समस्याओं के लक्षण एक-दूसरे से मिल सकते हैं। इसलिए सही बीमारी की पहचान के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी है। इलाज और दवाएं व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग हो सकती हैं।

  • लोग आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हैं? 6 जरूरी सवालों के जवाब.

    लोग आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हैं? 6 जरूरी सवालों के जवाब.

    लोग आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हैं? 6 जरूरी सवालों के जवाब.

    आत्महत्या के बारे में बात करना आसान नहीं होता। कई लोगों के लिए यह विषय डरावना और समझ से परे लग सकता है। अक्सर यह सवाल सामने आता है कि कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी खत्म करने के बारे में आखिर क्यों सोचने लगता है।

    आत्महत्या से जुड़े विचारों के पीछे कोई एक कारण नहीं होता। मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक दर्द, जीवन की कठिन परिस्थितियां और सामाजिक परिस्थितियां मिलकर व्यक्ति की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।

    आइए ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब समझते हैं।

    1. लोग आत्महत्या के बारे में क्यों सोचने लगते हैं?

    विशेषज्ञ अभी तक पूरी तरह यह नहीं समझ पाए हैं कि कुछ लोगों में आत्महत्या के विचार क्यों आते हैं और कुछ में नहीं। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और जीवन में होने वाली गंभीर परेशानियां जोखिम बढ़ा सकती हैं।

    अवसाद, बाइपोलर डिसऑर्डर, कुछ प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, नशे से जुड़ी समस्याएं और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी स्थितियां आत्महत्या के विचारों से जुड़ी हो सकती हैं।

    इसके अलावा कई कठिन परिस्थितियां भी व्यक्ति पर गहरा असर डाल सकती हैं, जैसे:

    • रिश्ते का टूटना या किसी करीबी को खोना
    • बच्चे या करीबी दोस्त की मृत्यु
    • आर्थिक परेशानियां
    • लगातार असफलता या शर्मिंदगी महसूस करना
    • गंभीर या जानलेवा बीमारी
    • कानूनी समस्याएं
    • बचपन में हिंसा, दुर्व्यवहार या बुलिंग का अनुभव
    • सामाजिक भेदभाव या अकेलापन
    • परिवार या करीबी लोगों से पर्याप्त भावनात्मक समर्थन न मिलना

    कई बार एक साथ कई परेशानियां होने पर भावनात्मक दबाव और बढ़ सकता है।

    2. कैसे पता चले कि कोई व्यक्ति आत्महत्या के बारे में सोच रहा है?

    हर व्यक्ति अपने विचारों या भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं करता। इसलिए किसी व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है।

    कुछ संभावित चेतावनी संकेतों में शामिल हो सकते हैं:

    • मौत या मरने की बात करना
    • खुद को निराश, बेकार या दूसरों पर बोझ बताना
    • बहुत ज्यादा निराशा या फंसा हुआ महसूस करना
    • अचानक मूड में बड़े बदलाव
    • दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना
    • सामान्य से बहुत ज्यादा या बहुत कम सोना
    • अत्यधिक बेचैनी या चिंता
    • नशीले पदार्थों का बढ़ता इस्तेमाल
    • अपनी सुरक्षा को लेकर लापरवाह व्यवहार
    • लंबे समय तक परेशान रहने के बाद अचानक असामान्य रूप से शांत दिखाई देना

    इनमें से कोई एक संकेत अपने आप में आत्महत्या के विचार का प्रमाण नहीं है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति में कई चिंताजनक बदलाव दिखाई दे रहे हों, तो उससे बात करना और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है।

    3. क्या किसी से सीधे पूछना ठीक है कि उसके मन में आत्महत्या के विचार हैं?

    कई लोगों को डर लगता है कि अगर उन्होंने किसी व्यक्ति से आत्महत्या के बारे में सीधे पूछा तो इससे उसके मन में यह विचार और बढ़ सकता है।

    यह धारणा सही नहीं मानी जाती।

    अगर आपको किसी करीबी की सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो शांत और संवेदनशील तरीके से सीधे पूछना बातचीत शुरू करने में मदद कर सकता है।

    उदाहरण के लिए आप पूछ सकते हैं:

    “क्या तुम्हारे मन में खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या के विचार आ रहे हैं?”

    सामने वाले की बात को बिना जज किए सुनें। उसे यह महसूस कराएं कि वह अपनी परेशानी आपके साथ साझा कर सकता है।

    अगर स्थिति गंभीर लगे, तो केवल बातचीत तक सीमित न रहें और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या तत्काल चिकित्सा सहायता से संपर्क करें।

    4. क्या आत्महत्या की बात सिर्फ ध्यान आकर्षित करने के लिए होती है?

    किसी व्यक्ति की आत्महत्या से जुड़ी बातों को केवल “ध्यान खींचने की कोशिश” मानना उचित नहीं है।

    ऐसी बातें अक्सर गंभीर भावनात्मक दर्द और परेशानी का संकेत हो सकती हैं। व्यक्ति भले ही अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त न कर पा रहा हो, लेकिन उसकी परेशानी को गंभीरता से लेना जरूरी है।

    उसे शर्मिंदा करने, दोष देने या यह कहने से बचें कि वह अपने परिवार के बारे में नहीं सोच रहा।

    इसके बजाय उसकी बात सुनें और पूछें कि वह किस परेशानी से गुजर रहा है और उसे किस तरह की मदद चाहिए।

    5. क्या हम किसी व्यक्ति की सोच बदल सकते हैं?

    किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों और फैसलों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। लेकिन आपका व्यवहार और आपकी बातचीत महत्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकती है।

    अगर आपको लगता है कि कोई व्यक्ति गंभीर जोखिम में है, तो उसकी बात को नजरअंदाज करने के बजाय मदद की दिशा में कदम उठाना बेहतर है।

    आप ये काम कर सकते हैं:

    उसकी बात को गंभीरता से लें

    अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करता है, तो इसे मजाक या सिर्फ गुस्से की बात समझकर नजरअंदाज न करें।

    बिना जज किए सुनें

    उसे दोष देने या शर्मिंदा करने के बजाय उसकी परेशानी समझने की कोशिश करें।

    अकेला न छोड़ें

    अगर आपको लगता है कि व्यक्ति तत्काल खतरे में है, तो उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत भरोसेमंद परिवार के सदस्य, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करें।

    पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करें

    थेरेपिस्ट, मनोचिकित्सक या अन्य योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ व्यक्ति की स्थिति का आकलन करके उचित सहायता उपलब्ध करा सकते हैं।

    सुरक्षित वातावरण बनाने में मदद करें

    अगर व्यक्ति को खुद को नुकसान पहुंचाने का तत्काल खतरा है, तो उसे ऐसी चीजों से दूर रखने में मदद करें जिनसे वह खुद को चोट पहुंचा सकता है। यह काम उसकी स्थिति के अनुसार किसी भरोसेमंद व्यक्ति या पेशेवर की मदद से किया जाना चाहिए।

    6. संकट की स्थिति में मदद कहां से मिलेगी?

    अगर किसी व्यक्ति को अभी आत्महत्या के विचार आ रहे हैं या उसे लगता है कि वह खुद को नुकसान पहुंचा सकता है, तो उसे अकेले इससे निपटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

    भारत में मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए Tele-MANAS हेल्पलाइन 14416 या 1-800-891-4416 पर संपर्क किया जा सकता है।

    अगर तत्काल खतरा हो, तो नजदीकी अस्पताल की इमरजेंसी में जाएं या स्थानीय आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।

    अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हैं जिसे तत्काल खतरा महसूस हो रहा है, तो उसे अकेला न छोड़ें और जल्द से जल्द पेशेवर सहायता प्राप्त करें।

    किसी की परेशानी को छोटा न समझें

    कभी-कभी व्यक्ति खुद को अकेला, असहाय या दूसरों पर बोझ महसूस करने लगता है। ऐसे समय में उसे यह महसूस कराना जरूरी है कि उसकी बात सुनी जा रही है और उसे मदद मिल सकती है।

    “सब ठीक हो जाएगा” कहकर बातचीत खत्म करने के बजाय यह पूछना ज्यादा मददगार हो सकता है कि “मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूं?”

    निष्कर्ष

    आत्महत्या के विचारों के पीछे कई जटिल कारण हो सकते हैं और हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है। ऐसे विचारों को न तो नजरअंदाज करना चाहिए और न ही व्यक्ति को दोष देना चाहिए।

    अगर किसी करीबी में चिंताजनक बदलाव दिखाई दें, तो उससे संवेदनशीलता से बात करें, उसकी बात सुनें और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद तक पहुंचने में उसका साथ दें।

    अगर आपको खुद अभी आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हैं, तो अकेले न रहें और तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताएं। भारत में Tele-MANAS 14416 / 1-800-891-4416 से मानसिक स्वास्थ्य सहायता ली जा सकती है।

  • आत्महत्या के विचार क्यों आते हैं? संकेत पहचानें और ऐसे समय में मदद लेने के तरीके जानें.

    आत्महत्या के विचार क्यों आते हैं? संकेत पहचानें और ऐसे समय में मदद लेने के तरीके जानें.

    आत्महत्या के विचार क्यों आते हैं? संकेत पहचानें और ऐसे समय में मदद लेने के तरीके जानें.

    कभी-कभी जीवन में तनाव, निराशा, अकेलापन या किसी बेहद मुश्किल परिस्थिति के कारण व्यक्ति को ऐसा महसूस हो सकता है कि अब दर्द से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। कुछ लोगों के मन में ऐसे समय में मौत या आत्महत्या से जुड़े विचार भी आ सकते हैं।

    ऐसे विचार कमजोरी या व्यक्तिगत असफलता का प्रमाण नहीं हैं। लेकिन इन्हें गंभीरता से लेना और समय रहते मदद लेना बहुत जरूरी है।

    आत्महत्या से जुड़े विचार क्या होते हैं?

    हर व्यक्ति में ऐसे विचार एक जैसे नहीं होते। कुछ लोगों के मन में आत्महत्या को लेकर स्पष्ट विचार या योजना हो सकती है, जबकि कुछ लोग बिना किसी योजना के बार-बार अपनी मौत के बारे में सोच सकते हैं।

    उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को:

    • बार-बार मौत के विचार आना
    • यह महसूस होना कि जीवन जारी रखना बहुत मुश्किल है
    • खुद को दूसरों पर बोझ समझना
    • भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश महसूस करना
    • अपनी जिंदगी खत्म करने की इच्छा महसूस होना

    जैसी भावनाएं हो सकती हैं।

    इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    मदद मांगना इतना मुश्किल क्यों लगता है?

    कई लोग अपने मन की बात इसलिए नहीं बताते क्योंकि उन्हें डर होता है कि दूसरे लोग उन्हें समझ नहीं पाएंगे या उनकी परेशानी को छोटा समझेंगे।

    कभी-कभी व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखाई दे सकता है, उसके पास नौकरी, परिवार या दोस्त हो सकते हैं, फिर भी वह अंदर से गंभीर भावनात्मक परेशानी से गुजर रहा हो सकता है।

    इसलिए केवल बाहरी परिस्थितियों को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को मदद की जरूरत है या नहीं।

    अगर आत्महत्या के विचार आ रहे हों तो सबसे पहले क्या करें?

    अगर आपको इस समय अपनी जान लेने के विचार आ रहे हैं या आपको लगता है कि आप खुद को नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो अकेले न रहें।

    किसी भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं कि आप किस स्थिति से गुजर रहे हैं। आप सिर्फ इतना भी कह सकते हैं:

    “मैं अभी बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहा हूं। कृपया मेरे साथ रहो।”

    अगर आपको तत्काल खतरा महसूस हो रहा है, तो अपने स्थानीय आपातकालीन नंबर पर संपर्क करें या नजदीकी अस्पताल की इमरजेंसी में जाएं।

    भारत में आप Tele-MANAS हेल्पलाइन 14416 या 1-800-891-4416 पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए संपर्क कर सकते हैं।

    सुरक्षित जगह पर जाएं

    अगर आप खुद को नुकसान पहुंचाने को लेकर चिंतित हैं, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति के पास रहें या ऐसी जगह जाएं जहां दूसरे लोग मौजूद हों।

    अकेले रहने के बजाय परिवार के सदस्य, दोस्त या किसी अन्य विश्वसनीय व्यक्ति को अपने साथ रखें।

    खतरनाक चीजों से दूरी बनाएं

    अगर आपको डर है कि आप खुद को नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो ऐसी चीजों से दूर रहें जिनसे आपको चोट पहुंच सकती है।

    किसी भरोसेमंद व्यक्ति से कहें कि वह कुछ समय तक आपके साथ रहे और जरूरत पड़ने पर ऐसी चीजों को आपकी पहुंच से दूर करने में मदद करे।

    शराब और नशीले पदार्थों से बचें

    भावनात्मक दर्द को कम करने के लिए कुछ लोग शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेते हैं। लेकिन ये निर्णय लेने की क्षमता और भाव

  • मेनोपॉज क्या है? पीरियड्स बंद होने से पहले और बाद में शरीर में होते हैं ये बदलाव.

    मेनोपॉज क्या है? पीरियड्स बंद होने से पहले और बाद में शरीर में होते हैं ये बदलाव.

    मेनोपॉज क्या है? पीरियड्स बंद होने से पहले और बाद में शरीर में होते हैं ये बदलाव.

    महिलाओं के जीवन में मेनोपॉज यानी रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक अवस्था है। इस दौरान शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं और धीरे-धीरे मासिक धर्म यानी पीरियड्स हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। यह कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण कई महिलाओं को अलग-अलग शारीरिक और मानसिक लक्षणों का सामना करना पड़ सकता है।

    मेनोपॉज हर महिला में अलग तरीके से दिखाई दे सकता है। किसी को बहुत कम परेशानी होती है, जबकि कुछ महिलाओं में हॉट फ्लैश, नींद की समस्या, मूड में बदलाव और वजन बढ़ने जैसे लक्षण अधिक महसूस हो सकते हैं।

    मेनोपॉज कब माना जाता है?

    जब किसी महिला को लगातार 12 महीने तक पीरियड्स नहीं आते, तो आम तौर पर इसे मेनोपॉज माना जाता है। यह महिला की प्रजनन क्षमता के प्राकृतिक रूप से समाप्त होने का चरण है।

    मेनोपॉज से पहले शरीर एक संक्रमणकाल से गुजरता है, जिसे पेरिमेनोपॉज कहा जाता है। इस दौरान पीरियड्स के समय और उनकी अवधि में बदलाव हो सकता है और हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होने लगता है।

    मेनोपॉज के दौरान कौन से लक्षण हो सकते हैं?

    हर महिला में लक्षण अलग हो सकते हैं। आमतौर पर इनमें शामिल हैं:

    • अचानक शरीर में गर्मी महसूस होना यानी हॉट फ्लैश
    • रात में ज्यादा पसीना आना
    • नींद आने या सोते रहने में परेशानी
    • मूड में बदलाव
    • चिड़चिड़ापन या बेचैनी
    • थकान
    • वजन में बदलाव
    • त्वचा और बालों में बदलाव
    • योनि में सूखापन
    • यौन संबंध के दौरान असहजता
    • ध्यान केंद्रित करने में परेशानी

    कुछ महिलाओं में मुंह और मसूड़ों से जुड़ी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं।

    मेनोपॉज में वजन क्यों बढ़ सकता है?

    मेनोपॉज के आसपास कई महिलाओं को वजन बढ़ने की समस्या महसूस होती है। इसके पीछे उम्र बढ़ने के साथ होने वाले शरीर के बदलाव, हार्मोनल परिवर्तन, शारीरिक गतिविधि में कमी और मांसपेशियों में बदलाव जैसे कई कारण हो सकते हैं।

    इस दौरान केवल वजन कम करने पर ध्यान देने के बजाय संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना अधिक उपयोगी हो सकता है।

    डाइट का रखें खास ध्यान

    मेनोपॉज के दौरान पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार लेना महत्वपूर्ण है। डाइट में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, पर्याप्त प्रोटीन और स्वस्थ वसा जैसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

    बहुत अधिक मीठे, अत्यधिक प्रोसेस्ड और पोषक तत्वों से कम खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना भी बेहतर हो सकता है।

    एक्सरसाइज और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मददगार हो सकती है

    नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को सक्रिय रखने के साथ मांसपेशियों और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।

    वॉकिंग, हल्की एरोबिक एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग और अपनी क्षमता के अनुसार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है।

    हॉट फ्लैश से कैसे निपटें?

    हॉट फ्लैश मेनोपॉज का एक आम लक्षण हो सकता है। बहुत गर्म वातावरण से बचना, हल्के कपड़े पहनना और कमरे को ठंडा रखना कुछ महिलाओं के लिए आरामदायक हो सकता है।

    अगर हॉट फ्लैश बहुत ज्यादा हों या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित कर रहे हों, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।

    योनि में सूखापन और असहजता

    हार्मोनल बदलावों के कारण कुछ महिलाओं को योनि में सूखापन या यौन संबंध के दौरान असहजता महसूस हो सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से बात करना उपयोगी है, क्योंकि इसके लिए अलग-अलग उपचार विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।

    क्या हार्मोन थेरेपी ली जा सकती है?

    मेनोपॉज के कुछ गंभीर लक्षणों के लिए डॉक्टर हार्मोन थेरेपी सहित अन्य उपचार विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

    हालांकि, हार्मोन थेरेपी हर महिला के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसके फायदे और संभावित जोखिम व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य जोखिम कारकों के आधार पर अलग हो सकते हैं। इसलिए इसे डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू नहीं करना चाहिए।

    विटामिन D और हड्डियों का रखें ध्यान

    मेनोपॉज के बाद हड्डियों का स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। पर्याप्त कैल्शियम, विटामिन D और नियमित वजन उठाने वाली गतिविधियां हड्डियों को स्वस्थ रखने में भूमिका निभा सकती हैं।

    अगर शरीर में विटामिन D या किसी अन्य पोषक तत्व की कमी का संदेह हो, तो जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार सप्लीमेंट लिया जाना चाहिए।

    तनाव और मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें

    मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलाव और नींद की समस्या कुछ महिलाओं के मूड और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

    परिवार और दोस्तों से जुड़े रहना, पर्याप्त नींद लेना, नियमित गतिविधि करना और मेडिटेशन जैसी तनाव प्रबंधन तकनीकों को अपनाना मददगार हो सकता है।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

    अगर पीरियड्स में असामान्य बदलाव हों, बहुत ज्यादा रक्तस्राव हो, लक्षण बेहद परेशान करने वाले हों या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    मेनोपॉज जीवन का एक प्राकृतिक चरण है। सही जानकारी, स्वस्थ जीवनशैली और जरूरत पड़ने पर उचित चिकित्सा सहायता के जरिए इस बदलाव को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।

  • सेहतमंद रहने के 17 आसान तरीके, जिनका समर्थन करता है वैज्ञानिक शोध.

    सेहतमंद रहने के 17 आसान तरीके, जिनका समर्थन करता है वैज्ञानिक शोध.

    सेहतमंद रहने के 17 आसान तरीके, जिनका समर्थन करता है वैज्ञानिक शोध.

    आजकल इंटरनेट और सोशल मीडिया पर हेल्थ से जुड़ी तमाम तरह की सलाह देखने को मिलती है। कई बार अलग-अलग विशेषज्ञों की राय भी एक-दूसरे से अलग होती है, जिससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर स्वस्थ रहने के लिए किन आदतों को अपनाना चाहिए।

    हालांकि, कुछ ऐसी आदतें हैं जिनके फायदे को वैज्ञानिक शोध का अच्छा समर्थन मिला है। अच्छी नींद से लेकर संतुलित खान-पान और नियमित व्यायाम तक, रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे बदलाव लंबे समय में सेहत के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

    1. भरपूर और अच्छी नींद लें

    स्वस्थ शरीर और दिमाग के लिए पर्याप्त नींद बेहद जरूरी है। लगातार कम या खराब नींद लेने से शरीर में इंसुलिन संवेदनशीलता, भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन और मानसिक तथा शारीरिक प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है।

    हर व्यक्ति के लिए नींद की जरूरत अलग हो सकती है, लेकिन अपनी दिनचर्या के अनुसार पर्याप्त और नियमित नींद लेना जरूरी है।

    2. सोने से पहले तेज रोशनी और स्क्रीन से दूरी रखें

    रात में मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे डिजिटल उपकरणों की तेज रोशनी नींद के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित कर सकती है। खासतौर पर स्क्रीन से मिलने वाली नीली रोशनी शरीर में मेलाटोनिन के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।

    इसलिए सोने से पहले कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाना और कमरे में बहुत तेज रोशनी न रखना नींद की गुणवत्ता के लिए मददगार हो सकता है।

    3. डाइट में नट्स और बीज शामिल करें

    बादाम, अखरोट और दूसरे नट्स के साथ-साथ अलग-अलग बीज पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, स्वस्थ वसा, विटामिन और कई जरूरी मिनरल पाए जाते हैं।

    शोध में नट्स के नियमित सेवन को हृदय स्वास्थ्य और टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम से जुड़े बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जोड़ा गया है।

    4. फैटी फिश खाएं

    सैल्मन जैसी फैटी फिश उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत होती है।

    संतुलित डाइट के हिस्से के रूप में मछली का सेवन हृदय स्वास्थ्य समेत कई पहलुओं के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    5. फल और सब्जियां ज्यादा खाएं

    फल और सब्जियां फाइबर, विटामिन, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्वों के अच्छे स्रोत हैं।

    डाइट में पर्याप्त मात्रा में फल और सब्जियां शामिल करने को बेहतर हृदय स्वास्थ्य और कई पुरानी बीमारियों के कम जोखिम से जोड़ा गया है।

    6. शरीर को पर्याप्त पानी दें

    शरीर के सामान्य कामकाज के लिए पर्याप्त पानी जरूरी है। पानी की जरूरत व्यक्ति की उम्र, मौसम, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    इसलिए केवल किसी तय संख्या के पीछे जाने के बजाय शरीर की प्यास और अपनी परिस्थितियों के अनुसार पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहतर है।

    7. पर्याप्त प्रोटीन लें

    प्रोटीन शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों के निर्माण और मरम्मत के लिए जरूरी पोषक तत्व है।

    डाइट में पर्याप्त प्रोटीन शामिल करने से लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है और यह वजन को संतुलित रखने में भी मदद कर सकता है। अंडे, मछली, दालें, बीन्स, डेयरी और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ इसके अच्छे स्रोत हो सकते हैं।

    8. एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल का इस्तेमाल करें

    एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल में मुख्य रूप से मोनोअनसैचुरेटेड फैट और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।

    इसे संतुलित आहार में शामिल करना हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। हालांकि, किसी भी तेल की तरह इसकी मात्रा भी संतुलित रखना जरूरी है।

    9. मीठे पेय पदार्थों का सेवन कम करें

    सोडा, मीठी चाय, मीठे ड्रिंक और दूसरे शुगर-स्वीटेंड बेवरेज शरीर में अतिरिक्त चीनी की मात्रा बढ़ा सकते हैं।

    इनका ज्यादा सेवन मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय संबंधी समस्याओं के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा पाया गया है।

    इनकी जगह बिना चीनी वाली चाय, सादा या स्पार्कलिंग पानी और बिना अतिरिक्त चीनी वाली कॉफी जैसे विकल्प लिए जा सकते हैं।

    10. अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कम खाएं

    पैकेज्ड स्नैक्स, कई तरह के फास्ट फूड, पैकेज्ड कुकीज, चिप्स और कुछ तैयार भोजन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की श्रेणी में आ सकते हैं।

    इनमें अक्सर ज्यादा नमक, अतिरिक्त चीनी, रिफाइंड तेल और अन्य एडिटिव्स होते हैं, जबकि फाइबर और कुछ जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम हो सकते हैं।

    ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन वजन बढ़ने और कई पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़े जोखिम से जुड़ा पाया गया है।

    11. अतिरिक्त चीनी पर नियंत्रण रखें

    आज कई पैकेज्ड खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में अतिरिक्त चीनी मौजूद होती है। ज्यादा मात्रा में अतिरिक्त चीनी का सेवन वजन बढ़ने और टाइप-2 डायबिटीज तथा हृदय रोग जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है।

    खरीदारी करते समय फूड लेबल पढ़ना और ऐसे उत्पादों का चयन करना उपयोगी हो सकता है जिनमें अतिरिक्त चीनी कम हो।

    12. रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करें

    सभी कार्बोहाइड्रेट एक जैसे नहीं होते। रिफाइंड कार्ब्स से प्रोसेसिंग के दौरान फाइबर और कुछ पोषक तत्व कम हो सकते हैं।

    मैदा और अत्यधिक प्रोसेस्ड अनाज से बने खाद्य पदार्थों की जगह साबुत अनाज, फल, सब्जियां और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    13. हर सप्ताह नियमित शारीरिक गतिविधि करें

    व्यायाम शरीर के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। तेज चलना, साइकिल चलाना, तैराकी या अन्य एरोबिक गतिविधियां नियमित रूप से करने से फिटनेस और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

    अमेरिकी Physical Activity Guidelines के अनुसार वयस्कों के लिए हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि एक सामान्य लक्ष्य माना जाता है।

    14. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को दिनचर्या में शामिल करें

    मांसपेशियों को मजबूत रखने के लिए रेजिस्टेंस या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग उपयोगी है। इसके लिए जिम में भारी वजन उठाना जरूरी नहीं है।

    बॉडीवेट एक्सरसाइज, रेजिस्टेंस बैंड और अन्य प्रतिरोध वाले व्यायाम भी किए जा सकते हैं। नियमित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मांसपेशियों की ताकत और शरीर की संरचना को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती है।

    15. विटामिन D का ध्यान रखें

    विटामिन D हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। शरीर में इसकी कमी होने पर डॉक्टर से सलाह लेकर जांच और जरूरत के अनुसार सप्लीमेंट लेने पर विचार किया जा सकता है।

    बिना जरूरत या बिना चिकित्सकीय सलाह के विटामिन D की ज्यादा मात्रा लेना उचित नहीं है।

    16. परिवार और दोस्तों से जुड़े रहें

    स्वस्थ रहने का मतलब केवल सही खाना और व्यायाम करना नहीं है। परिवार, दोस्तों और करीबी लोगों के साथ अच्छे सामाजिक संबंध मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    सामाजिक जुड़ाव तनाव को संभालने और मानसिक कल्याण को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    17. तनाव कम करने के लिए मेडिटेशन करें

    तनाव रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे संभालने के लिए स्वस्थ तरीके अपनाना जरूरी है।

    मेडिटेशन और माइंडफुलनेस जैसी गतिविधियां कुछ लोगों में तनाव और चिंता को कम करने में मदद कर सकती हैं। रोजाना कुछ मिनट शांत बैठकर सांस पर ध्यान देना एक आसान शुरुआत हो सकती है।

    निष्कर्ष

    स्वस्थ रहने के लिए किसी एक सुपरफूड या एक खास नुस्खे पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। अच्छी नींद, संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी, नियमित शारीरिक गतिविधि, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और तनाव को नियंत्रित करने जैसी छोटी-छोटी आदतें मिलकर बेहतर लाइफस्टाइल बनाने में मदद कर सकती हैं।

    हालांकि, हर व्यक्ति की पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें अलग होती हैं। किसी बीमारी, पोषक तत्वों की कमी या सप्लीमेंट से जुड़ी समस्या होने पर डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

  • टैनिंग और डल स्किन से परेशान हैं? भुनी हल्दी से बनाएं ये आसान फेस पैक, ऐसे करें इस्तेमाल.

    टैनिंग और डल स्किन से परेशान हैं? भुनी हल्दी से बनाएं ये आसान फेस पैक, ऐसे करें इस्तेमाल.

    टैनिंग और डल स्किन से परेशान हैं? भुनी हल्दी से बनाएं ये आसान फेस पैक, ऐसे करें इस्तेमाल.

    चेहरे की टैनिंग, डलनेस और मुंहासों की वजह से त्वचा की चमक कम नजर आ सकती है। ऐसे में कई लोग महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स और तरह-तरह के स्क्रब का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रबिंग करने से त्वचा में जलन और लालिमा भी हो सकती है।

    ऐसे में कुछ लोग घर पर मौजूद चीजों से तैयार फेस पैक का इस्तेमाल करते हैं। भुनी हुई हल्दी से तैयार किया जाने वाला ऐसा ही एक घरेलू फेस पैक है, जिसमें हल्दी के साथ कॉफी, नींबू और शहद का इस्तेमाल किया जाता है।

    आखिर क्यों होती है चेहरे पर टैनिंग?

    टैनिंग का सबसे बड़ा कारण सूरज की UV किरणों के संपर्क में आना है। धूप के संपर्क में आने पर त्वचा में मेलेनिन का उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे त्वचा का रंग कुछ हिस्सों में गहरा नजर आने लगता है।

    सन प्रोटेक्शन का इस्तेमाल न करना और लंबे समय तक धूप में रहना इस समस्या को बढ़ा सकता है। इसलिए घरेलू उपायों के साथ धूप से बचाव और सनस्क्रीन का इस्तेमाल भी जरूरी है।

    त्वचा के लिए हल्दी क्यों की जाती है इस्तेमाल?

    हल्दी में करक्यूमिन नाम का प्राकृतिक यौगिक पाया जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। इसी वजह से पारंपरिक तौर पर हल्दी का इस्तेमाल त्वचा की देखभाल के लिए किया जाता रहा है।

    हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हल्दी हर व्यक्ति की त्वचा पर एक जैसा असर करे। टैनिंग, मुंहासों या दाग-धब्बों के लिए इसे किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    भुनी हल्दी का फेस पैक कैसे बनाएं?

    इस फेस पैक को बनाने के लिए सबसे पहले थोड़ी सी हल्दी को तवे पर धीमी आंच पर हल्का भून लें। इसे ठंडा होने के बाद एक कटोरी में निकालें।

    अब इसमें थोड़ी मात्रा में कॉफी पाउडर मिलाएं। इसके बाद थोड़ा शहद और नींबू का रस डालकर सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लें। जब गाढ़ा पेस्ट तैयार हो जाए तो इसे फेस पैक की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

    चेहरे पर कैसे लगाएं?

    फेस

  • चेहरे की टैनिंग और डलनेस: से परेशान हैं? भुनी हल्दी में मिलाएं ये 3 चीजें, ऐसे तैयार करें घरेलू फेस पैक

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    चेहरे की टैनिंग और डलनेस: से परेशान हैं? भुनी हल्दी में मिलाएं ये 3 चीजें, ऐसे तैयार करें घरेलू फेस पैक

    धूप में ज्यादा समय बिताने की वजह से चेहरे पर टैनिंग और असमान स्किन टोन की समस्या हो सकती है। इसके अलावा धूल, प्रदूषण और त्वचा की सही देखभाल न करने से चेहरा बेजान भी नजर आने लगता है। ऐसे में लोग महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स के साथ-साथ घर पर मौजूद चीजों से बने फेस पैक भी इस्तेमाल करते हैं।

    ऐसा ही एक घरेलू नुस्खा भुनी हुई हल्दी से तैयार किया जाने वाला फेस पैक है। इसमें हल्दी के साथ कॉफी, नींबू और शहद का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, किसी भी घरेलू नुस्खे से टैनिंग या दाग-धब्बे पूरी तरह खत्म होने की गारंटी नहीं होती।

    हल्दी को भूनकर क्यों किया जाता है इस्तेमाल?

    हल्दी में करक्यूमिन नाम का प्राकृतिक यौगिक पाया जाता है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं। त्वचा पर हल्दी का इस्तेमाल कुछ लोगों को सूजन या जलन जैसी समस्या में राहत देने में मदद कर सकता है।

    हालांकि, संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को हल्दी या किसी भी नए फेस पैक का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए।

    फेस पैक बनाने के लिए चाहिए ये चीजें

    इस घरेलू फेस पैक को बनाने के लिए आपको हल्दी, कॉफी पाउडर, नींबू का रस और शहद की जरूरत होगी।

    सबसे पहले थोड़ी सी हल्दी लें और उसे तवे पर धीमी आंच पर हल्का भून लें। इसके बाद इसे ठंडा होने दें। अब एक कटोरी में भुनी हुई हल्दी लें और उसमें थोड़ी मात्रा में कॉफी पाउडर मिलाएं।

    इसके बाद इसमें थोड़ा नींबू का रस और शहद डालकर सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाएं। जब मिश्रण गाढ़े पेस्ट जैसा हो जाए तो इसे फेस पैक की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

    चेहरे पर कैसे लगाएं?

    फेस पैक लगाने से पहले चेहरे को साफ पानी से धो लें। इसके बाद तैयार मिश्रण को चेहरे पर हल्के हाथों से लगाएं। इसे करीब 10 से 15 मिनट तक लगा रहने दें।

    जब पैक सूखने लगे तो चेहरे को हल्के गुनगुने पानी से धो लें। इसके बाद त्वचा पर अपनी जरूरत के अनुसार मॉइश्चराइजर लगाएं।

    नींबू इस्तेमाल करते समय रखें सावधानी

    इस फेस पैक में नींबू का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यह हर व्यक्ति की त्वचा के लिए उपयुक्त नहीं होता। नींबू कुछ लोगों में जलन, लालिमा या संवेदनशीलता बढ़ा सकता है।

    इसलिए चेहरे पर लगाने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर है। अगर जलन, खुजली या लालिमा महसूस हो तो इसे तुरंत धो दें और दोबारा इस्तेमाल न करें।

    अगर त्वचा पहले से संवेदनशील है या कोई स्किन कंडीशन है, तो घरेलू नुस्खे आजमाने से पहले त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

  • वनस्पति घी vs देसी घी: सेहत के लिए कौन सा है बेहतर विकल्प? जानें डॉक्टरों की राय और गाइडलाइंस

    वनस्पति घी vs देसी घी: सेहत के लिए कौन सा है बेहतर विकल्प? जानें डॉक्टरों की राय और गाइडलाइंस

    वनस्पति घी vs देसी घी: सेहत के लिए कौन सा है बेहतर विकल्प? जानें डॉक्टरों की राय और गाइडलाइंस

    भारतीय रसोई में सदियों से देसी घी का इस्तेमाल भोजन, पारंपरिक व्यंजनों, आयुर्वेद और धार्मिक कार्यों में होता रहा है। वहीं पिछले कुछ दशकों में कम कीमत और लंबी शेल्फ लाइफ के कारण वनस्पति घी जैसे डालडा का चलन भी बढ़ा है। ऐसे में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या देसी घी और वनस्पति घी सेहत के लिए एक जैसे फायदेमंद हैं, या फिर दोनों में से कौन-सा विकल्प स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर माना जाता है।

    गैस्ट्रो लीवर हॉस्पिटल, स्वरूप नगर, कानपुर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. वी.के. मिश्रा के मुताबिक देसी घी गाय या भैंस के दूध से तैयार किया जाता है। इसमें प्राकृतिक रूप से सैचुरेटेड फैट, वसा में घुलनशील विटामिन A, D, E और K मौजूद होता है। इसके अलावा घी में दूसरे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। सेहत के लिए फायदेमंद है फिर भी डॉक्टर इसका सीमित सेवन करने की सलाह देते हैं। दूसरी तरफ वनस्पति घी की बात करें तो इसे वनस्पति तेलों जैसे सोयाबीन, पाम (ताड़), कपास के बीज या दूसरे वनस्पति ऑयल से बनाया जाता है। इन तेलों को प्रोसेस करके घी जैसी बनावट दी जाती है। इसे कई जगह वेजिटेबल घी या डालडा भी कहा जाता है।

    देसी घी और वनस्पति घी में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

    देसी घी में मुख्य रूप से सैचुरेटेड फैट होता है, जबकि वनस्पति घी में ट्रांस फैट हो सकता है, अगर ये घी खासतौर पर हाइड्रोजेनेटेड तेल (Partially Hydrogenated Oil) से बना हो तो। दोनों घी के बीच यहीं सबसे बड़ा अंतर है। डॉक्टर ट्रांस फैट को सेहत के लिए नुकसानदायक मानते है। ये दिल की सेहत के लिए खतरा है। इस घी का सेवन करने से  खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ सकता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) का स्तर कम हो सकता है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में ट्रांस फैट का सेवन करने से दिल के रोग, मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।

    क्या देसी घी पूरी तरह सुरक्षित है?

    गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. वी.के. मिश्रा के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को घी से एलर्जी या कोई विशेष चिकित्सा समस्या नहीं है, तो रोजाना सीमित मात्रा में लगभग 1 चम्मच गाय के घी का सेवन सेहत को कई तरह से फायदा पहुंचा सकता है। देसी घी में ट्रांस फैट न के बराबर होता है, लेकिन इसमें सैचुरेटेड फैट अधिक होता है। इसलिए इसका अत्यधिक सेवन भी कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है। डॉक्टर देसी घी का सेवन भी सीमित मात्रा में करने की सलाह देते हैं। देसी घी और पारंपरिक हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति घी के बीच देसी घी को बेहतर विकल्प माना जाता हैं।

    डॉ. मिश्रा के अनुसार घी आंतों की कोशिकाओं के लिए फायदेमंद माना जाता है। यह आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और पाचन प्रक्रिया को सुचारू रखने में मदद कर सकता है। इसका सेवन करने से बॉडी को एनर्जी मिलती है और बॉडी गर्म रहती है। सर्दी में घी का सेवन खासतौर पर करने की सलाह दी जाती है। घी में कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं जिनमें सूजन कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं। अक्सर लोगों को सर्दी में जोड़ों के दर्द और अकड़न की शिकायत होती है ऐसे में घी का सेवन जोड़ों और हड्डियों की सेहत को सहारा दे सकता है। आयुर्वेद और मेडिकल साइंस दोनों ही घी को सेहत के लिए फायदेमंद मानते हैं। घी में मौजूद हेल्दी फैटी एसिड मस्तिष्क के कामों को सपोर्ट देते हैं। ये मानसिक स्पष्टता, याददाश्त और एकाग्रता के लिए लाभकारी माना गया है।

    क्या कहती है गाइड लाइन

    ICMR-NIN के अनुसार डाइट में किसी एक तरह के फैट पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग स्रोतों से संतुलित मात्रा में फैट लेना चाहिए। सैचुरेटेड फैट का सेवन सीमित रखें और ट्रांस फैट से जितना हो सके बचें। WHO के मुताबिक ट्रांस फैट का सेवन कुल दैनिक ऊर्जा का 1% से कम होना चाहिए। ट्रांस फैट हृदय रोग का खतरा बढ़ाता है, इसलिए इससे बचना चाहिए। FSSAI ने भी खाद्य उद्योग में ट्रांस फैट की मात्रा कम करने के लिए नियम बनाए हैं और उपभोक्ताओं को पैकेट पर Partially Hydrogenated Vegetable Oil या ट्रांस फैट की जानकारी पढ़कर उत्पाद चुनने की सलाह दी जाती है।

    दिल के लिए क्यों वनस्पति घी से दूरी जरूरी है?

    डॉक्टरों के मुताबिक, हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति घी में मौजूद ट्रांस फैट हमारी धमनियों (arteries) को ब्लॉक कर सकता है। इससे न केवल दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ता है, बल्कि यह शरीर में सूजन (inflammation) को भी बढ़ावा देता है। इसके विपरीत, देसी घी में मौजूद ब्यूटिरिक एसिड (Butyric Acid) हमारी आंतों और पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। देसी घी का सेवन करने से इम्यूनिटी मजबूत होती है और पाचन दुरुस्त रहता है। वनस्पति घी में मौजूद ट्रांस फैट से मोटापे का खतरा बढ़ जाता है। ट्रांस फैट आपको दूसरे फूड्स के मुकाबले ज़्यादा मोटा करता है बेशक दोनों में कैलोरी की मात्रा ज्यादा हो। वनस्पति घी का सेवन कमर और पेट के आसपास अधिक फैट बढ़ता है।

    देसी घी और वनस्पति घी दोनों का कितना सेवन करें?

    देसी घी और वनस्पति घी में, सीमित मात्रा में देसी घी को आमतौर पर बेहतर विकल्प माना जाता है। देसी घी प्राकृतिक रूप से दूध से बनाया जाता है और इसमें वसा में घुलनशील विटामिन तथा लाभकारी फैटी एसिड पाए जाते हैं। वहीं पारंपरिक वनस्पति घी हाइड्रोजेनेटेड वेजिटेबल ऑयल में ट्रांस फैट हो सकता है, जो दिल के रोग, खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) और दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम को बढ़ा सकता है। इसलिए संतुलित मात्रा में देसी घी का सेवन अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। किसी भी प्रकार के घी का सेवन आपकी उम्र, स्वास्थ्य, कोलेस्ट्रॉल स्तर और अन्य चिकित्सा स्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। यदि आपको हृदय रोग, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या डायबिटीज है, तो अपने डॉक्टर या क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह के अनुसार ही घी का सेवन करें।

  • अगर एक महीने तक रोजाना ओट्स का भिगोकर सेवन किया जाए तो सेहत पर कैसा होगा असर, डॉक्टर से जानिए

    अगर एक महीने तक रोजाना ओट्स का भिगोकर सेवन किया जाए तो सेहत पर कैसा होगा असर, डॉक्टर से जानिए

    अगर एक महीने तक रोजाना ओट्स का भिगोकर सेवन किया जाए तो सेहत पर कैसा होगा असर, डॉक्टर से जानिए

    हेल्दी नाश्ते का नाम आते ही सबसे पहले ओट्स का ख्याल आता है। मेडिकल साइंस भी इसे नाश्ते के लिए एक पौष्टिक विकल्प मानती है। ओट्स एक साबुत अनाज है, जिसका सेवन लोग आमतौर पर दूध, दही या उबालकर करते हैं। इसमें फाइबर, कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और कई जरूरी मिनरल्स पाए जाते हैं। ओट्स का सेवन करने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, जिससे बार-बार भूख लगने की संभावना कम हो सकती है। साथ ही यह शरीर को जरूरी पोषक तत्व और ऊर्जा देने में भी मदद करता है।

    ISIC मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में गैस्ट्रो साइंसेज के डायरेक्टर और डिपार्टमेंट हेड, डॉ. शुभम वत्स्या के अनुसार रात भर भिगोए हुए ओट्स हेल्दी ब्रेकफास्ट का अहम हिस्सा है। इन्हें पहले से तैयार करना आसान होता है, ये लंबे समय तक पेट भरा रखते हैं और अपनी पसंद के अनुसार इनमें कई पौष्टिक चीजें मिलाई जा सकती हैं। अब सवाल ये उठता है कि अगर रोजाना एक महीने तक ओट्स को भिगोकर उसका सेवन किया जाए तो सेहत पर कैसा असर होता है।

    एक महीने तक रोज़ भीगे हुए ओट्स खाने से सेहत पर कैसा होता है असर?

    डॉ. बताते हैं कि अगर आप रोज़ाना पूरी रात भीगे हुए ओट्स खाते हैं, तो कुछ ही हफ्तों में पाचन बेहतर हो सकता है, पेट लंबे समय तक भरा रह सकता है और बार-बार कुछ अनहेल्दी खाने की इच्छा कम हो सकती है। ओट्स में फाइबर, कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और कई जरूरी मिनरल्स पाए जाते हैं जो हमारी बॉडी को धीरे-धीरे  एनर्जी देते हैं और सुबह लंबे समय तक एक्टिव बनाए रखने में मदद करते हैं। एक्सपर्ट ने बताया हालांकि हर दिन बिल्कुल एक ही तरह का नाश्ता करना ठीक नहीं है। एक जैसा नाश्ता रोज खाने से शरीर को अलग-अलग पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते। इसलिए भोजन में विविधता बनाए रखना भी जरूरी है।

    क्या भीगे हुए ओट्स वजन और शुगर को कंट्रोल करते हैं?

    डॉ. के अनुसार ओट्स का सेवन भिगोकर खाने से वजन को कंट्रोल किया जा सकता है। ओट्स में मौजूद घुलनशील फाइबर (बीटा-ग्लूकॉन) पाचन की गति को धीमा करता है, जिससे लंबे समय तक भूख नहीं लगती और वजन कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। धीमी पाचन प्रक्रिया के कारण ग्लूकोज भी धीरे-धीरे ब्लड में पहुंचता है, जिससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ने की संभावना कम हो सकती है। डॉक्टर ने बताया अगर ओट्स के साथ ग्रीक योगर्ट, बिना नमक वाले मेवे या बीज जैसे प्रोटीन और हेल्दी फैट का सेवन किया जाए तो इसके फायदे और बढ़ सकते हैं।

    क्या भिगोए हुए ओट्स, पके हुए ओट्स से ज्यादा हेल्दी होते हैं?

    डॉ. के मुताबिक पोषण के लिहाज से दूध या दही में भिगोए हुए ओट्स सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं। भिगोने से ओट्स मुलायम हो जाते हैं, जिससे उन्हें पचाना आसान लगता है। इससे फाइटिक एसिड की मात्रा में भी हल्की कमी आ सकती है, जो कुछ मिनरल्स के अवशोषण को प्रभावित करता है। एक्सपर्ट ने बताया आप ओट्स को पका कर और भिगोकर दोनों तरह खा सकते हैं, दोनों तरह खाने से सेहत को फायदा होता है।

    भिगोकर ओट्स खाने से आंतों की सेहत पर कैसा होता है असर?

    ओवरनाइट ओट्स में भरपूर फाइबर होता है, जो आंतों में मौजूद गुड बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। इससे पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करता है और मल त्याग नियमित रहने में मदद मिलती है। कुछ मामलों में भिगोए हुए ओट्स में रेसिस्टेंट स्टार्च भी बन सकता है, जो आंतों के माइक्रोबायोम के लिए फायदेमंद माना जाता है। हालांकि फाइबर का पूरा लाभ तभी मिलता है जब दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी भी पिया जाए।

    किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?

    • डॉ. के अनुसार ओवरनाइट ओट्स अधिकांश लोगों के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन कुछ लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ परेशानियों जैसे डायबिटीज मरीज ओट्स का सेवन करते हैं तो उसमें अतिरिक्त चीनी, शहद या मीठे टॉपिंग्स मिलाने से बचें।
    • इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम से पीड़ित लोगों में अधिक फाइबर गैस और पेट फूलने की समस्या बढ़ा सकता है, इसलिए उन्हें कम मात्रा से शुरुआत करनी चाहिए।
      सीलिएक रोग या ग्लूटेन संवेदनशीलता वाले लोगों को केवल सर्टिफाइड ग्लूटेन-फ्री ओट्स ही चुनने चाहिए, क्योंकि सामान्य ओट्स प्रोसेसिंग के दौरान ग्लूटेन से दूषित हो सकते हैं।

    ओवरनाइट ओट्स बनाने का सबसे हेल्दी तरीका

    डॉ. के मुताबिक ओट्स को रातभर दूध या बिना चीनी वाले दही में भिगोकर रखें। सुबह इसमें ताजे फल, बादाम, अखरोट, चिया सीड्स या फ्लेक्स सीड और थोड़ी-सी दालचीनी मिलाकर खाएं। वहीं चीनी, शहद, फ्लेवर वाले सिरप, चॉकलेट स्प्रेड, मीठा दही या बहुत ज्यादा ड्राई फ्रूट्स मिलाने से बचें, क्योंकि इससे यह हेल्दी नाश्ता अधिक कैलोरी और शुगर वाला बन सकता है। एक्सपर्ट ने बताया अगर ओट्स को ठीक तरीके से तैयार किया जाए तो ओवरनाइट ओट्स रोज़ाना के नाश्ते का एक पौष्टिक विकल्प हो सकते हैं। ये पाचन, वजन कंट्रोल और ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी सार्वजनिक स्रोतों और विशेषज्ञ की राय पर आधारित है। किसी भी नए डाइट प्लान या स्वास्थ्य संबंधी बदलाव को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।