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  • पुरानी कब्ज और पाचन: से जुड़ी समस्याओं में राहत दे सकते हैं ये 5 फल, रिसर्च से समझें इनके फायदे.

    पुरानी कब्ज और पाचन: से जुड़ी समस्याओं में राहत दे सकते हैं ये 5 फल, रिसर्च से समझें इनके फायदे.

    पुरानी कब्ज और पाचन: से जुड़ी समस्याओं में राहत दे सकते हैं ये 5 फल, रिसर्च से समझें इनके फायदे.

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियमित खानपान और शारीरिक सक्रियता की कमी के कारण पेट से जुड़ी समस्याएं बेहद आम हो गई हैं। खासकर पुरानी कब्ज , गैस और अपच जैसी दिक्कतें न सिर्फ मानसिक सेहत पर असर करती हैं, बल्कि लंबे समय में शरीर में टॉक्सिन्स भी बढ़ाने लगती हैं। ऐसे में अक्सर लोग बिना सोचे-समझे दवाओं या चूर्ण का सहारा लेने लगते हैं, जिसके सेहत पर कई तरह के साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। आप जानते हैं कि हमारी फ्रिज में मौजूद कुछ फल ऐसे हैं जो हमारी क्रॉनिक कब्ज की परेशानी से निजात दिलाने में हमारी मदद कर सकते हैं। ICMR के तहत काम करने वाली संस्था NIN यानी राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने भारतीय डाइटरी गाइडलाइंस में कुछ फलों पर विस्तृत न्यूट्रिशन डेटा और रिसर्च साझा की है जो कब्ज का इलाज करते हैं और पाचन को दुरुस्त करते हैं।

    WHO ने भी वैश्विक स्तर पर क्रोनिक बीमारियों जैसे पेट का कैंसर, मोटापा और कमजोर मेटाबॉलिज्म से बचने के लिए फलों के सेवन का पाचन पर असर के वैज्ञानिक प्रमाण पेश किए है। WHO के अनुसार, एक वयस्क को रोजाना कम से कम 400 ग्राम फल और सब्जियां खानी चाहिए। इसमें सेब, संतरा और पपीता जैसे फाइबर युक्त फल शामिल करने से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी पाचन संबंधी कैंसर का खतरा 19% तक कम हो जाता है। आइए जानते हैं कि क्रोनिक कब्ज को कंट्रोल करने में कौन-कौन से ऐसे रिसर्च बेस्ड फल है जो मदद कर सकते हैं। कौन से फल पाचन को सपोर्ट करते हैं और बॉडी को हेल्दी रखने में मदद करते हैं।

    पपीता: पाचन सुधारने वाला सुपरफूड

    पपीता पाचन के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद पपेन एंजाइम प्रोटीन को पचाने में मदद करता है, जबकि फाइबर आंतों की कार्यप्रणाली बेहतर बनाता है। विटामिन A और C से भरपूर यह फल इम्यूनिटी भी मजबूत करता है। सुबह सीमित मात्रा में पपीता खाने से कब्ज और अपच की समस्या में राहत मिल सकती है। ICMR-NIN की रिसर्च के अनुसार पपीते में मौजूद कैरोटेनॉयड्स, फाइबर व विटामिन C शरीर में फ्री-रेडिकल्स को खत्म कर आंतों की अंदरूनी परत (Gut Lining) को मजबूत करते हैं।

    तरबूज: शरीर को हाइड्रेट रखने वाला फल

    तरबूज में पानी की मात्रा लगभग 90 प्रतिशत होती है, इसलिए यह गर्मी और उमस में शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है। इसका सेवन शरीर में तरल संतुलन बनाए रखता है और ताजगी का एहसास कराता है। हल्का और आसानी से पचने वाला यह फल पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव भी नहीं डालता। NIN की भारतीय खाद्य संरचना तालिका के अनुसार, तरबूज का लाइकोपीन (Lycopene) एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है जो पाचन तंत्र की सूजन (Inflammation) को कम करता है।

    सेब: फाइबर से भरपूर हेल्दी विकल्प

    सेब में मौजूद घुलनशील फाइबर पेक्टिन पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है। यह आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को पोषण देता है और मल त्याग को आसान बनाता है। छिलके सहित सेब खाने से फाइबर की मात्रा अधिक मिलती है, जिससे पेट लंबे समय तक स्वस्थ और संतुष्ट महसूस करता है।

    अनानास: एंजाइम से भरपूर पाचन साथी

    अनानास में पाया जाने वाला ब्रोमेलेन एंजाइम प्रोटीन के पाचन को आसान बनाता है। यह पेट में भारीपन और भोजन के बाद होने वाली असहजता को कम करने में मदद कर सकता है। साथ ही, इसमें विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं, जो इम्यूनिटी को मजबूत रखने में सहायक माने जाते हैं।

    संतरा: विटामिन C और फाइबर का बेहतरीन स्रोत

    संतरा विटामिन C, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर फल है। इसका नियमित सेवन पाचन तंत्र को सक्रिय रखने और शरीर को तरोताजा महसूस कराने में मदद करता है। फाइबर आंतों की सफाई में सहायक होता है, जबकि विटामिन C रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। किसी भी फल का सेवन आपकी उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल कंडीशन के अनुसार अलग-अलग प्रभाव डाल सकता है। यदि आपको डायबिटीज, किडनी रोग, पाचन संबंधी बीमारी या किसी अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, तो अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या पंजीकृत डायटीशियन की सलाह अवश्य लें। यह सामग्री चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं है।

  • क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या आप भी दिल को सेहतमंद रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखने के लिए मखाने का सेवन करते हैं? भारतीय घरों में स्नैक्स के तौर पर खाया जाने वाला मखाना (Fox Nuts) न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटी-ऑक्सीडेंट्स इसे सेहत के लिए काफी खास बनाते हैं। अक्सर माना जाता है कि मखाना वजन घटाने से लेकर हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन क्या सच में यह दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करने में असरदार है और हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे रोजाना खाने को लेकर क्या राय देते हैं?

    एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ बिमल झांजेर के मुताबिक मखाने को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है और खासकर हार्ट हेल्थ, वजन मैनेजमेंट और बेहतर पोषण के लिए इसका सेवन उपयोगी हो सकता है। मखाना को एक पौष्टिक स्नैक्स के तौर पर रोज खाया जा सकता है। इसमें फाइबर, प्रोटीन और कई तरह के मिनरल्स पाए जाते हैं जो बॉडी को हेल्दी रखने में मदद करते हैं। आइए एक्सपर्ट से जानते है्ं कि दिल के लिए क्यों फायदेमंद है मखाना, और ये बीपी को कैसे रखता है नॉर्मल। रोजाना मखाना का सेवन कैसे सेहत को फायदा पहुंचाता है, जानिए।

    दिल की सेहत के लिए कैसे फायदेमंद है मखाना?

    डॉ. बिमल छाजेड़ के अनुसार मखाने में मौजूद पोषक तत्व दिल की कार्यप्रणाली को सुचारू रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसमें मौजूद पोटैशियम और मैग्नीशियम की अधिक मात्रा दिल की मांसपेशियों को हेल्दी रखने और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में बेहद असरदार साबित होती है। इसमें सोडियम की बहुत कम मात्रा होती है जो दिल के मरीजों के लिए इसे एक सुरक्षित स्नैक का विकल्प बनाती है। मखाने में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री-रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव तनाव (Oxidative Stress) को कम करने में मदद करते हैं, जिससे दिल की बीमारियों का जोखिम कम होता है। मखाने में फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। डाइट में पर्याप्त फाइबर लेने से कोलेस्ट्रॉल और एलडीएल जैसे कुछ हार्ट रिस्क फैक्टर्स को मैनेज करने में मदद मिल सकती है।

    पाचन को दुरुस्त करता है मखाना

    मखाने में फाइबर भरपूर पाया जाता है, जो पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है। फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करने से कुल कैलोरी सेवन को मैनेज करने में मदद मिल सकती है। इसका सेवन करने से वेट लॉस जर्नी आसान होती है। वेट लॉस करने के लिए भुना हुआ मखाना एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

    क्या मखाना वजन कम करने में मदद करता है?

    मखाना अपने आप वजन कम नहीं करता, लेकिन इसे ज्यादा कैलोरी वाले स्नैक्स की जगह सीमित मात्रा में लिया जाए तो कुल कैलोरी सेवन को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर के मुताबिक, मखाना खाने से पेट जल्दी भरने का एहसास हो सकता है। इसमें प्रोटीन भी होता है जो वेट लॉस करने में मददगार साबित होता है।

    एंटीऑक्सीडेंट्स से भी मिल सकता है फायदा

    मखाने में कुछ ऐसे बायोएक्टिव कंपाउंड और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं, जो शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। शरीर में फ्री रेडिकल्स की मात्रा बढ़ने पर कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाने में मदद करते हैं। मखाना का सेवन कैंसर, हार्ट डिजीज या बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों से बचाव करने में मददगार साबित होता है।

    डायबिटीज में मखाना खाना कितना सही?

    मखाने में कार्बोहाइड्रेट होते हैं, इसलिए डायबिटीज के मरीजों को इसकी मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। बिना चीनी और कम नमक में भुना हुआ मखाना तले हुए या मीठे स्नैक्स की तुलना में एक बेहतर विकल्प हो सकता है। डायबिटीज मरीज सीमित मात्रा में मखाना का सेवन करें तो पेट लम्बे समय तक भरा रहेगा और खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ने का भी खतरा नहीं रहेगा।

    हाई ब्लड प्रेशर में मखाना कैसे खाएं?

    मखाने में पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं, जो शरीर में बीपी को नॉर्मल रखने में अहम किरदार निभाते हैं। हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को मखाने में अतिरिक्त नमक डालने से बचना चाहिए। ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए रोजाना बीपी की दवा लेना,कम सोडियम वाली डाइट और नियमित शारीरिक गतिविधि बेहद जरूरी है।

    मखाना कैसे खाना ज्यादा बेहतर है?

    मखाने को भूनकर और बिना ज्यादा नमक या तेल के खाना बेहतर विकल्प हो सकता है। इसे शाम के स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है। अगर स्वाद के लिए नमक डाल रहे हैं तो इसकी मात्रा कम रखें, खासकर हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग। मखाने को घी, मक्खन, चीनी या ज्यादा नमक के साथ लेने से इसका कैलोरी और सोडियम कंटेंट बढ़ सकता है।

    डिस्क्लेमर: मखाने में मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन यह किसी बीमारी का इलाज या रोकथाम का विकल्प नहीं हैं। हार्ट डिजीज, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य स्वास्थ्य समस्या होने पर मखाने का सेवन अपनी व्यक्तिगत जरूरत और डॉक्टर की सलाह के अनुसार करें।

  • सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सर्दियों के मौसम में मूली खाने का चलन काफी बढ़ जाता है। मूली को सलाद, सब्जी, पराठे या दूसरी कई तरह की डिश में शामिल किया जाता है। इसमें फाइबर, विटामिन C और कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, इसलिए संतुलित डाइट का हिस्सा होने के नाते इसका सेवन फायदेमंद हो सकता है।

    हालांकि, आयुर्वेद में सिर्फ किसी खाद्य पदार्थ के फायदे ही नहीं, बल्कि किन चीजों के साथ उसका सेवन किया जा रहा है, इस पर भी ध्यान देने की बात कही गई है। इसे आयुर्वेद में ‘विरुद्ध आहार’ की अवधारणा से जोड़ा जाता है।

    आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. प्रताप चौहान के अनुसार मूली को कुछ खाद्य पदार्थों के साथ लेने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, इन संयोजनों से होने वाले नुकसान को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण हर मामले में समान नहीं हैं। इसलिए इन्हें आयुर्वेदिक आहार संबंधी मान्यता के रूप में समझना चाहिए, न कि यह मान लेना चाहिए कि मूली के साथ इन चीजों का सेवन करने से हर व्यक्ति को नुकसान होगा।

    आयुर्वेद में मूली की तासीर कैसी मानी गई है?

    आयुर्वेद में मूली को गर्म यानी उष्ण प्रकृति का खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसके तीखे स्वाद और कुछ गुणों को पाचन से जोड़ा जाता है। पारंपरिक आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार मूली कफ और भारीपन को कम करने में मदद कर सकती है।

    वहीं, आधुनिक पोषण के नजरिए से मूली में फाइबर और विटामिन C जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। कच्ची मूली कुछ लोगों में गैस या पेट फूलने जैसी समस्या भी पैदा कर सकती है, खासकर अगर इसे अधिक मात्रा में खाया जाए।

    क्या होता है विरुद्ध आहार?

    आयुर्वेद में विरुद्ध आहार का मतलब ऐसे खाद्य संयोजन या भोजन करने के तरीकों से है जिन्हें शरीर के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। आयुर्वेदिक मान्यताओं में खाद्य पदार्थों की प्रकृति, उनके गुण, मात्रा और सेवन के समय जैसे पहलुओं को महत्व दिया जाता है।

    इसी आधार पर कुछ विशेषज्ञ मूली को कुछ खाद्य पदार्थों के साथ लेने से बचने की सलाह देते हैं।

    1. मूली और संतरा

    आयुर्वेदिक सलाह के अनुसार मूली के साथ संतरा लेने से बचने की बात कही जाती है। खासकर एक ही समय पर या लगातार दोनों का सेवन करने को अनुकूल संयोजन नहीं माना जाता।

    हालांकि, आधुनिक चिकित्सा में ऐसा मजबूत प्रमाण नहीं है कि सामान्य मात्रा में मूली और संतरा साथ खाने से हर व्यक्ति को नुकसान होगा। अगर किसी व्यक्ति को इस तरह के भोजन के बाद पेट संबंधी परेशानी होती है, तो उसे अपने खान-पान पर ध्यान देना चाहिए।

    2. मूली और करेला

    मूली और करेले दोनों का इस्तेमाल भारतीय भोजन में लंबे समय से होता रहा है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में दोनों को एक साथ खाने से बचने की सलाह कुछ विशेषज्ञ देते हैं।

    अगर किसी व्यक्ति को दोनों सब्जियां खाने के बाद पेट में असहजता, गैस या ब्लोटिंग महसूस होती है, तो इन्हें अलग-अलग समय पर लेना एक विकल्प हो सकता है।

    3. मूली और दूध

    मूली के साथ दूध का सेवन आयुर्वेद में विरुद्ध आहार के उदाहरणों में बताया जाता है। इसका आधार दोनों खाद्य पदार्थों के अलग-अलग गुण और प्रकृति माने जाते हैं।

    भारतीय घरों में मूली के पराठे या मूली की सब्जी के साथ दूध का सेवन आम है। इसलिए इसे लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर किसी व्यक्ति को इस संयोजन के बाद पाचन संबंधी परेशानी होती है तो दोनों के सेवन के बीच अंतर रखा जा सकता है।

    4. मूली और शहद

    आयुर्वेदिक मान्यताओं में मूली और शहद को भी एक साथ लेने से बचने की सलाह दी जाती है। दोनों की प्रकृति अलग मानी जाती है और इसी वजह से इन्हें विरुद्ध आहार की श्रेणी में रखने की बात कही जाती है।

    हालांकि, इस संयोजन को लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि सामान्य मात्रा में इन्हें साथ लेने से निश्चित रूप से विषाक्त प्रभाव होगा। इसलिए इसे आयुर्वेदिक आहार संबंधी सलाह के तौर पर ही समझना उचित है।

    5. मूली और दही

    कई लोग भोजन के साथ मूली का सलाद और दही दोनों लेते हैं। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से इस संयोजन से बचने की सलाह दी जाती है।

    अगर किसी व्यक्ति को मूली और दही साथ लेने पर पेट फूलना, गैस या अन्य पाचन संबंधी परेशानी होती है, तो इन्हें अलग-अलग समय पर लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    6. मूली और कुछ खट्टे खाद्य पदार्थ

    आयुर्वेदिक आहार पद्धति में मूली के साथ कुछ खट्टे खाद्य पदार्थों के संयोजन को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह मिलती है। इसका उद्देश्य पाचन तंत्र पर अनावश्यक दबाव से बचना माना जाता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति की पाचन क्षमता अलग होती है और सामान्य मात्रा में किसी खाद्य पदार्थ का सेवन सभी पर एक जैसा असर नहीं डालता।

    7. मूली का जरूरत से ज्यादा सेवन

    किसी भी स्वस्थ खाद्य पदार्थ का जरूरत से ज्यादा सेवन परेशानी पैदा कर सकता है। मूली में फाइबर और कुछ ऐसे कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो संवेदनशील लोगों में गैस, पेट फूलना या असहजता पैदा कर सकते हैं।

    इसलिए मूली को अपनी डाइट में संतुलित मात्रा में शामिल करना बेहतर है। अगर पहले से पाचन संबंधी समस्या है, तो कच्ची मूली की मात्रा कम रखना या डॉक्टर/डायटीशियन से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

    मूली खाते समय किन बातों का ध्यान रखें?

    मूली को अच्छी तरह धोकर और साफ करके खाना चाहिए। बहुत अधिक मात्रा में कच्ची मूली खाने से कुछ लोगों को गैस या ब्लोटिंग हो सकती है। अगर किसी विशेष खाद्य संयोजन से बार-बार परेशानी होती है, तो उसे अपनी डाइट से अलग करके देख सकते हैं।

    सबसे जरूरी बात यह है कि मूली को किसी चीज के साथ खाने से वह ‘जहर’ नहीं बन जाती। कुछ संयोजनों को लेकर आयुर्वेदिक मान्यताएं जरूर हैं, लेकिन इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ अलग-अलग समझना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित है। किसी खाद्य पदार्थ से एलर्जी, लगातार पाचन संबंधी समस्या या अन्य स्वास्थ्य परेशानी होने पर डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

  • क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    कैंसर का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में धूम्रपान, तंबाकू, खराब खान-पान, मोटापा, शराब या जेनेटिक कारणों का ख्याल आता है। लेकिन कैंसर के कुछ मामलों में लंबे समय तक बने रहने वाले संक्रमण भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। खास तौर पर कुछ वायरस और बैक्टीरिया ऐसे हैं, जिनका लंबे समय तक शरीर में रहना कुछ प्रकार के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा पाया गया है।

    ‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन में संक्रमण से जुड़े कैंसर के वैश्विक बोझ का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में दुनियाभर में करीब 23 लाख नए कैंसर मामले संक्रमण से जुड़े थे। भारत में ऐसे मामलों की अनुमानित संख्या करीब 1.9 लाख बताई गई है।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को HPV, H. pylori या कोई अन्य संक्रमण होने पर उसे कैंसर होना तय है। कैंसर का विकास कई कारकों पर निर्भर करता है और संक्रमण के मामले में भी उसका प्रकार, संक्रमण की अवधि तथा व्यक्ति की अन्य स्वास्थ्य स्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।

    HPV भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर का बड़ा कारण

    भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर के मामलों में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी HPV की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। HPV के कुछ हाई-रिस्क प्रकार सर्वाइकल कैंसर के विकास से जुड़े हैं।

    HPV संक्रमण आम है और कई मामलों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इसे खुद नियंत्रित कर लेती है। लेकिन कुछ मामलों में हाई-रिस्क HPV संक्रमण लंबे समय तक बना रह सकता है और गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में बदलाव का कारण बन सकता है। समय के साथ यही बदलाव कुछ महिलाओं में कैंसर का रूप ले सकते हैं।

    HPV से जुड़े कैंसर के खतरे को कम करने के लिए टीकाकरण और नियमित सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केवल वैक्सीन ही नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार जांच और असामान्य परिणाम आने पर समय पर इलाज भी जरूरी है।

    H. pylori से पेट के कैंसर का खतरा

    Helicobacter pylori यानी H. pylori एक बैक्टीरिया है जो पेट में संक्रमण पैदा कर सकता है। लंबे समय तक रहने वाला संक्रमण पेट की अंदरूनी परत में सूजन और अन्य बदलावों से जुड़ा हो सकता है।

    अध्ययन में 2024 के दौरान दुनियाभर में करीब 7.6 लाख कैंसर मामलों को H. pylori संक्रमण से संबंधित बताया गया है। इसका संबंध मुख्य रूप से पेट के कैंसर से है।

    हालांकि H. pylori संक्रमण होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से पेट का कैंसर होगा। लेकिन कुछ लोगों में लंबे समय तक रहने वाला संक्रमण जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए जिन लोगों में डॉक्टर संक्रमण की जांच या इलाज की सलाह दें, उनके लिए उचित चिकित्सकीय देखभाल महत्वपूर्ण हो सकती है।

    दुनिया में ये पांच संक्रमण कैंसर से सबसे ज्यादा जुड़े

    अध्ययन में कई संक्रमण पैदा करने वाले एजेंट्स का आकलन किया गया। इनमें पांच प्रमुख संक्रमणों को संक्रमण से जुड़े वैश्विक कैंसर मामलों के बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार पाया गया।

    • H. pylori: करीब 7.6 लाख कैंसर मामले
    • HPV: करीब 7.5 लाख मामले
    • हेपेटाइटिस B वायरस: करीब 3.6 लाख मामले
    • Epstein-Barr virus (EBV): करीब 2.6 लाख मामले
    • हेपेटाइटिस C वायरस: करीब 1.6 लाख मामले

    रिपोर्ट के मुताबिक संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ एशिया सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों में काफी अधिक है। ऐसे में टीकाकरण, संक्रमण की पहचान और समय पर इलाज कैंसर की रोकथाम की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    हेपेटाइटिस B और C भी बढ़ा सकते हैं लिवर कैंसर का जोखिम

    लंबे समय तक रहने वाला हेपेटाइटिस B या हेपेटाइटिस C संक्रमण लिवर कैंसर, विशेष रूप से हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा, के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है।

    हेपेटाइटिस B के खिलाफ प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है, इसलिए टीकाकरण संक्रमण से बचाव का महत्वपूर्ण तरीका है। दूसरी ओर, हेपेटाइटिस B और C की समय पर जांच भी जरूरी है, क्योंकि कई लोगों में संक्रमण लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण की पहचान होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार निगरानी और उपचार किया जाना चाहिए।

    सिर्फ वैक्सीन नहीं, स्क्रीनिंग भी जरूरी

    विशेषज्ञों के मुताबिक संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ कम करने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। इनमें HPV और हेपेटाइटिस B का टीकाकरण, जरूरत के अनुसार H. pylori तथा हेपेटाइटिस B और C की जांच, संक्रमण का उचित इलाज और कैंसर स्क्रीनिंग शामिल हैं।

    सर्वाइकल कैंसर के मामले में नियमित स्क्रीनिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि शुरुआती चरण में कैंसर से पहले होने वाले कुछ बदलावों की पहचान की जा सकती है और समय पर उपचार से आगे के जोखिम को कम किया जा सकता है।

    क्या हर संक्रमण कैंसर का कारण बनता है?

    नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है कि हर वायरस, बैक्टीरिया या संक्रमण कैंसर का कारण नहीं बनता।

    वैज्ञानिक शोध में केवल कुछ विशेष संक्रमणों और कुछ खास प्रकार के कैंसर के बीच संबंध स्थापित किया गया है। इसके अलावा संक्रमण होने के बाद कैंसर विकसित होगा या नहीं, यह व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली, संक्रमण की अवधि, अन्य जोखिम कारकों और कई जैविक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    इसलिए किसी संक्रमण की रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर घबराने के बजाय डॉक्टर से सही सलाह लेना और जरूरत पड़ने पर उपचार कराना अधिक महत्वपूर्ण है।

    2050 तक बढ़ सकता है कैंसर का वैश्विक बोझ

    अध्ययन में दुनिया में कैंसर के नए मामलों में आने वाले दशकों में बड़ी वृद्धि का अनुमान भी सामने रखा गया है। 2024 में करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामलों से यह संख्या 2050 तक लगभग 3.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

    इस वृद्धि में मुख्य

  • Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    सर्दी का मौसम आते ही हमारे खानपान की आदतें बदलने लगती हैं, जिसका सीधा असर हमारे पाचन तंत्र (Digestive System) पर पड़ता है। मौसम में बदलाव के कारण अक्सर पेट में भारीपन, गैस या ब्लोटिंग जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। हालांकि, सही डाइट और मौसमी फलों को अपनी डेली डाइट में शामिल करके गट हेल्थ (Gut Health) को आसानी से बेहतर रखा जा सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स और डायटीशियनों के अनुसार, सर्दियों में मिलने वाले कुछ खास फल न केवल पाचन क्रिया को सुचारू बनाते हैं, बल्कि आंतों के गुड बैक्टीरिया को भी बढ़ावा देते हैं।

    सीनियर न्यूट्रिशन एडिटर और डायटीशियन जेसिका बॉल के मुताबिक, मौसम बदलने पर अपनी डाइट में फाइबर से भरपूर फल शामिल करना पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद हो सकता है। सेब, नाशपाती और बेरीज जैसे फलों में डाइटरी फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और दूसरे पोषक तत्व पाए जाते हैं। फाइबर आंतों की सेहत बनाए रखने और मल त्याग को नियमित रखने में मदद करता है।इन फलों को आप दिन में स्नैक के तौर पर या नाश्ते के साथ खा सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति का पाचन तंत्र अलग होता है। कुछ लोगों को सेब और नाशपाती जैसे फलों से गैस या पेट फूलने की समस्या हो सकती है, खासकर अगर उन्हें फ्रुक्टोज पचाने में परेशानी होती है। इसलिए अपनी पाचन क्षमता के अनुसार फलों का चुनाव और मात्रा तय करना बेहतर है। आइए जानते हैं कि सेब, नाशपाती और बेरीज पाचन तंत्र के लिए किस तरह फायदेमंद हो सकते हैं।

    सेब का करें सेवन

    सेब सर्दी के मौसम का प्रमुख फल है जिसकी कई किस्में सर्द मौसम में मौजूद रहती हैं। Journal of Food Science and Technology (2017) में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक सेब के छिलके (Apple Peel) में गूदे की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक फेनोलिक कंपाउंड और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। छिलके में मौजूद क्वेरसेटिन (Quercetin) और कैटेचिन (Catechin) आंतों की अंदरूनी परत को सूजन से बचाते हैं। Nutrients जर्नल (2020) की रिसर्च बताती है कि 100 ग्राम सेब में औसतन 2.4 ग्राम फाइबर होता है । सेब का फाइबर पाचन तंत्र में पानी को सोखकर स्टूल (Stool) के वॉल्यूम को बढ़ाता है, जिससे कब्ज की समस्या दूर होती है।

    सेब को आप सीधे खा सकते हैं या सलाद, डेजर्ट और दूसरे व्यंजनों में शामिल कर सकते हैं। एक सेब में लगभग 4 ग्राम फाइबर होता है, जो पेट को लंबे समय तक भरा रखने और मल त्याग को नियमित रखने में मदद कर सकता है। सेब में कुछ फेनोलिक कंपाउंड भी पाए जाते हैं, जो पेट और छोटी आंत में पाचन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सेब खाते समय कोशिश करें कि उसे छिलके के साथ खाएं, क्योंकि छिलके सहित सेब में छिले हुए सेब की तुलना में फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा ज्यादा होती है।

    नाशपाती का करें सेवन

    नाशपाती भी इस मौसम में मिलने वाला पौष्टिक फल है जिसे आप छिलके के साथ खा सकते हैं। Frontiers in Nutrition और Microorganisms (2021) में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, नाशपाती में प्रचुर मात्रा में घुलनशील फाइबर पेक्टिन पाया जाता है। पेक्टिन आंतों में पहुंचकर एक जेल (Gel Layer) बनाता है, जो पाचन को सुचारू बनाता है। पेक्टिन आंतों में Bifidobacteria और Lactobacillus जैसे गुड बैक्टीरिया के लिए प्रीबायोटिक के रूप में काम करता है, जिससे शॉर्ट-चेन फैटी एसिड (SCFAs) का निर्माण होता है और गट हेल्थ मजबूत होती है। American Journal of Clinical Nutrition के अनुसार, नाशपाती में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सोर्बिटोल और फ्रुक्टोज में माइल्ड लैक्सेटिव गुण होते हैं, जो प्राकृतिक रूप से पेट साफ करने में मदद करते हैं।

    इसे आप सीधे खा सकते हैं या केक, टार्ट और दूसरे व्यंजनों में इस्तेमाल कर सकते हैं। नाशपाती में लगभग 6 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर पेक्टिन आंत में जेल जैसा पदार्थ बनाता है, जिससे मल में मात्रा बढ़ाने और उसे आसानी से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। पेक्टिन एक प्रीबायोटिक की तरह भी काम कर सकता है, यानी यह आंत में मौजूद गुड बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। नाशपाती में मौजूद फ्रुक्टोज, सोर्बिटोल और फाइबर के कारण इसका हल्का प्राकृतिक लैक्सेटिव प्रभाव भी हो सकता है।

    बेरीज का करें सेवन

    USDA Food Data Central और Journal of Agricultural and Food Chemistry के अनुसार, 1 कप रास्पबेरी या ब्लैकबेरी में लगभग 8 ग्राम फाइबर होता है। इनके छोटे-छोटे बीजों में अघुलनशील फाइबर होता है, जो आंतों की पेरीस्टाल्टिक मूवमेंट को बढ़ाता है। Nutrients (2018) और Food & Function जर्नल की रिसर्च में पाया गया कि बेरीज में मौजूद एंथोसायनिन (Anthocyanins) और पॉलीफेनॉल्स (Polyphenols) आंतों की सूजन (Intestinal Inflammation) को कम करते हैं। यह गट बैरियर को मजबूत बनाकर इंफ्लेमेटरी बाउल डिसीज (IBD) और पेट से जुड़ी दूसरी समस्याओं से राहत दिलाने में मददगार साबित होते हैं।

    ब्लैकबेरी और रास्पबेरी जैसी बेरीज को स्मूदी, दही या दूसरे व्यंजनों में आसानी से शामिल किया जा सकता है। ये पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी हो सकती हैं। एक कप ब्लैकबेरी या रास्पबेरी में लगभग 8 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इनमें मौजूद छोटे-छोटे बीज भी अघुलनशील फाइबर देते हैं, जो आंतों में भोजन और मल की गति को बनाए रखने में मदद करता है। बेरीज में पॉलीफेनॉल नामक एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं। कुछ रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि पॉलीफेनॉल आंतों में सूजन को कम करने में मददगार साबित होता है।

    डिस्क्लेमर : यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से प्रदान की गई है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। पाचन से जुड़ी गंभीर समस्या होने पर या डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या प्रमाणित डायटीशियन से परामर्श अवश्य लें।

  • कब्ज से राहत पाने: के लिए लैक्सेटिव पर न रहें निर्भर, डाइट से लेकर योग तक ये 7 आदतें बना सकती हैं पेट की सेहत बेहतर.

    कब्ज से राहत पाने: के लिए लैक्सेटिव पर न रहें निर्भर, डाइट से लेकर योग तक ये 7 आदतें बना सकती हैं पेट की सेहत बेहतर.

    कब्ज से राहत पाने: के लिए लैक्सेटिव पर न रहें निर्भर, डाइट से लेकर योग तक ये 7 आदतें बना सकती हैं पेट की सेहत बेहतर.

    क्या आप भी कब्ज से परेशान रहते हैं और पेट साफ करने के लिए और कब्ज (Constipation) से तुरंत राहत पाने के लिए हर सुबह लैक्सेटिव या गोलियों का सहारा लेते हैं? गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट के मुताबिक लंबे समय तक इन दवाइयों पर निर्भर रहना आपकी आंतों की कार्यप्रणाली को कमजोर बना सकता है। पाचन तंत्र को स्वस्थ और पेट को नेचुरल तरीके से साफ करने के लिए दवाइयों से ज्यादा आपकी डाइट और लाइफस्टाइल मायने रखता है। डाइट, पर्याप्त पानी और नियमित योग जैसे छोटे लेकिन प्रभावी बदलाव न केवल कब्ज की समस्या को जड़ से दूर कर सकते हैं, बल्कि आपकी आंतों की सेहत (Gut Health) को भी मजबूत बनाते हैं।

    भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र के मुताबिक कब्ज आजकल एक आम समस्या बन गई है। कई लोग सुबह पेट साफ न होने पर तुरंत हर्बल चाय, अरंडी का तेल या दूसरी लैक्सेटिव दवाओं का सहारा लेने लगते हैं जिसके सेहत पर साइड इफेक्ट होते हैं। एक्सपर्ट ने बताया कब्ज से राहत पाने के लिए सबसे पहले रोज की दिनचर्या, खानपान, पानी और शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान देना जरूरी है। कुछ लोगों में नियमित रूप से फाइबर युक्त भोजन, पर्याप्त पानी और हल्की एक्सरसाइज करने से मल त्याग को नियमित रखने में मदद मिल सकती है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि ऐसी कौन-कौन सी 5 आदतें है जो कब्ज का इलाज कर सकती है और पाचन को दुरुस्त कर सकती हैं।

    सुबह की शुरुआत करें पानी से

    हंसा जी योगेंद्र ने बताया अगर आप कब्ज से परेशान रहते हैं तो आप सुबह उठते ही एक गिलास गुनगुना पानी पिएं। रात भर सोने के बाद सुबह पानी का सेवन बॉडी को हाइड्रेट करता है और पाचन को दुरुस्त करता है। पानी पीने के बाद आप हल्की पेट की एक्सरसाइज या मूवमेंट कर सकते हैं। सुबह शौचालय जाने के लिए नियमित समय तय करना भी कब्ज से राहत दिलाने में मददगार हो सकता है। अगर तुरंत मल त्याग न हो तो ज्यादा जोर न लगाएं। शरीर को धीरे-धीरे नियमित रूटीन की आदत डालने की कोशिश करें।

    खाने में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं

    कब्ज से बचाव के लिए डाइट में पर्याप्त फाइबर लेना बेहद जरूरी है। रोज करीब 25-30 ग्राम फाइबर का सेवन करें। हालांकि फाइबर का सेवन व्यक्ति की उम्र, लिंग और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकता है। फाइबर के लिए आप खाने में सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और फलों का सेवन करें। नाश्ते में वेजिटेबल ओट्स या दलिया, वेजिटेबल पोहा, इडली-सांभर या सब्जियों से बना बेसन या मूंग दाल के चीला का सेवन करें। मूंग, मसूर, चना, राजमा और हरी मटर जैसी दालें और फलियां भी फाइबर के स्रोत हैं। इसके अलावा गेहूं की रोटी, ब्राउन राइस और मिलेट्स को डाइट में शामिल करें कब्ज से बचाव में मददगार साबित होंगे।

    कब्ज से परेशान हैं तो रोज एक फल खाएं

    अगर आप कब्ज से परेशान हैं तो रोजाना एक फल का सेवन करें। फलों में आप पपीता, अमरूद, नाशपाती, अंजीर, कीवी और प्रून जैसे फलों का सेवन कर सकते हैं। साथ ही थोड़ी मात्रा में नट्स, बीज और सूखे मेवे भी डाइट में शामिल करें।

    मुनक्का और अंजीर का करें सेवन

    अगर आप कब्ज से परेशान रहते हैं तो रोज मुनक्का और अंजीर का सेवन सुबह खाली पेट करें। रात भर भिगोए हुए 8-10 काली किशमिश या मुनक्का सुबह खाएं। दो सूखे अंजीर सुबह खाने से फायदा होता है। ध्यान रखें कि फाइबर बढ़ाने के साथ पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का भी सेवन करें। फाइबर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ाने से कुछ लोगों में गैस और ब्लोटिंग की समस्या हो सकती है, इसलिए इसे धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर है।

    त्रिफला और इसबगोल का करें सेवन

    कब्ज से राहत पाना चाहते हैं तो आप त्रिफला और इसबगोल का सेवन करें। त्रिफला हरड़, बहेड़ा और आंवला से तैयार किया जाता है और आयुर्वेद में इसे पाचन तथा मल त्याग को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कुछ दिनों तक त्रिफला या इसबगोल खाने से आपको कब्ज से राहत मिल सकती है। इसबगोल एक घुलनशील फाइबर है। यह पानी को सोखकर मल को नरम और भारी बनाने में मदद कर सकता है। इसका सेवन पर्याप्त पानी के साथ करना जरूरी है।

    अरंडी के तेल का करें सेवन

    कब्ज को दूर करने के लिए आप अरंडी के तेल का सेवन करें। अरंडी का तेल यानी Castor oil दूसरे उपायों से अलग है। यह एक stimulant laxative है और मल त्याग करा सकता है, लेकिन इससे पेट में ऐंठन, मितली या दस्त जैसी परेशानी हो सकती है इसलिए रोजाना इसका सेवन नहीं करें।

    कब्ज में मदद कर सकते हैं ये योगासन

    पाचन और पेट की गतिविधियों को सपोर्ट करने के लिए कुछ हल्के योग अभ्यास भी आपकी मदद कर सकते हैं। योगा एक्सपर्ट ने बताया आप कब्ज को दूर करने के लिए रोजाना मार्जरी आसन-बितिलासन (Cat-Cow Pose), पवनमुक्तासन, हल्का स्पाइनल ट्विस्ट, पेट से गहरी सांस लेने का अभ्यास, शवासन और निस्पंद भाव करने से आपको राहत मिल सकती है। इन अभ्यासों को अपनी क्षमता के अनुसार आराम से करना चाहिए और किसी भी आसन में दर्द या असहजता होने पर उसे रोक देना चाहिए। भोजन के बाद हल्की वॉक करना भी रोज की शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है।

    बार-बार कब्ज हो तो वजह समझना जरूरी

    अगर अच्छी डाइट, पर्याप्त पानी और नियमित शारीरिक गतिविधि के बावजूद कब्ज बार-बार हो रही है तो केवल घरेलू नुस्खे बदलते रहने के बजाय आप कब्ज के कारण का पता लगाएं। कुछ दवाएं, शरीर में पानी की कमी, कम शारीरिक गतिविधि और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी कब्ज में योगदान दे सकती हैं। तनाव और चिंता भी कुछ लोगों में पाचन संबंधी समस्याओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए पर्याप्त आराम, नियमित नींद, हल्की एक्सरसाइज और तनाव कम करने वाली गतिविधियों को अपनी डेली लाइफ में शामिल करें आपको फायदा होगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। कब्ज लंबे समय तक रहने, बार-बार होने या गंभीर लक्षणों के साथ होने पर डॉक्टर से सलाह लें। किसी भी आयुर्वेदिक उपाय, सप्लीमेंट या लैक्सेटिव का नियमित इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें।

  • सोते समय क्यों बढ़ता है ब्लड प्रेशर? मेडिकल रिसर्च में सामने आया हार्मोनल कारण; जानिए डॉक्टरों की राय.

    सोते समय क्यों बढ़ता है ब्लड प्रेशर? मेडिकल रिसर्च में सामने आया हार्मोनल कारण; जानिए डॉक्टरों की राय.

    सोते समय क्यों बढ़ता है ब्लड प्रेशर? मेडिकल रिसर्च में सामने आया हार्मोनल कारण; जानिए डॉक्टरों की राय.

    क्या आप जानते हैं कि सोते समय भी आपका ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ सकता है? अक्सर हम हाई बीपी का कारण तनाव, खराब डाइट या खराब लाइफस्टाइल मानते हैं, लेकिन मेडिकल रिसर्च के मुताबिक शरीर में मौजूद कुछ हार्मोन का असंतुलन भी रात में बीपी बढ़ने की मुख्य वजह बन सकता है। खासकर एल्डोस्टेरोन (Aldosterone) या कोर्टिसोल (Cortisol) जैसे हार्मोन नींद के दौरान ब्लड प्रेशर के स्तर को प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिकों ने हाई ब्लड प्रेशर के एक ऐसे कारण पर ध्यान दिया है, जो सामान्य जांच में कई बार पकड़ में नहीं आ पाता। यह कारण प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म (Primary Aldosteronism) नाम की हार्मोन संबंधी स्थिति है।

    हमारा एड्रिनल ग्लैंड्स एल्डोस्टेरोन नाम का हार्मोन बनाता हैं। यह शरीर में नमक और पानी का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन जब शरीर में एल्डोस्टेरोन जरूरत से ज्यादा बनने लगे, तो यह ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है और लंबे समय में दिल के रोग और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है।

    रिसर्च में हुआ खुलासा, रात में बढ़ सकता है एल्डोस्टेरोन

    Science Translational Medicine जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च में प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म नाम की एक हार्मोन संबंधी बीमारी पर ध्यान दिया गया है। यह स्थिति हाई ब्लड प्रेशर वाले हर पांच में से एक व्यक्ति तक को प्रभावित कर सकती है और इससे हृदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटीज और दूसरी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इस रिसर्च में ब्रिटेन की University of Bristol और University of Manchester, नॉर्वे की University of Bergen तथा स्टॉकहोम और एथेंस के शोधकर्ता शामिल थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस बीमारी से जूझ रहे मरीजों में हार्मोन का उत्पादन दिन के साथ-साथ रात में सोते समय भी अचानक बढ़ सकता है, जबकि सामान्य ब्लड टेस्ट आमतौर पर रात में नहीं किए जाते।

    घर पर 24 घंटे की गई हार्मोन की निगरानी

    शोधकर्ताओं ने U-RHYTHM नाम के एक पोर्टेबल डिवाइस की मदद से मरीजों के हार्मोन स्तर की 24 घंटे तक निगरानी की। यह डिवाइस University of Bristol में विकसित किया गया है। मोबाइल फोन के आकार का यह हल्का उपकरण कमर पर लगाया जाता है और मरीज की स्किन से हर 20 मिनट में हार्मोन के स्तर की जानकारी लेने में मदद करता है। इससे मरीजों की निगरानी अस्पताल या रिसर्च सेंटर में रखने के बजाय उनके घर पर, उनकी नॉर्मल एक्टिविटी के दौरान की जा सकी। इसमें सोने का समय भी शामिल था। इस तरह हार्मोन में होने वाले ऐसे बदलावों को भी देखा जा सका, जो सामान्य जांच के दौरान छूट सकते हैं।

    University of Bristol में Clinical Research Fellow और Bristol Hospitals NHS Foundation Trust में सीनियर क्लीनिकल फेलो, अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक डॉ. थॉमस अप्टन ने बताया प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म हाई ब्लड प्रेशर का एक महत्वपूर्ण कारण है और सेकेंडरी हाइपरटेंशन के सबसे आम कारणों में से एक है। हार्मोन पूरे दिन बदलता रहता है और बीमारी की जांच की प्रक्रिया जटिल होने के कारण कई मामलों में इसका निदान देर से होता है या बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती।

    सामान्य टेस्ट में क्यों छूट सकती है बीमारी?

    रिसर्च के मुताबिक प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म वाले मरीजों में एल्डोस्टेरोन का स्तर हर समय बढ़ा हुआ नहीं रहता। यहां तक कि बीमारी के कुछ गंभीर मामलों में भी ऐसे समय आए, जब हार्मोन का स्तर बीमारी की पहचान के लिए इस्तेमाल की जाने वाली न्यूनतम सीमा से नीचे चला गया। इसके बजाय शोधकर्ताओं को हार्मोन के स्तर में बार-बार बढ़ोतरी के पैटर्न मिले। खास तौर पर रात में सोते समय हार्मोन के अचानक बढ़ने के मामले सामने आए, जबकि शरीर का सामान्य दिन-रात का हार्मोन रिदम बना रहा। रिसर्च के मुताबिक ये हार्मोन स्पाइक एड्रिनल ग्लैंड से निकल रहे थे और उन मरीजों में ज्यादा स्पष्ट थे, जिनकी बीमारी सिर्फ एक एड्रिनल ग्लैंड की समस्या के कारण थी। खास बात यह रही कि प्रभावित एड्रिनल ग्लैंड को सर्जरी से निकालने के बाद ये असामान्य हार्मोन पैटर्न गायब हो गए। इससे शोधकर्ताओं को इस बात का अतिरिक्त प्रमाण मिला कि ये हार्मोन स्पाइक बीमारी से सीधे जुड़े हुए थे।भविष्य में बदल सकता है हाई BP की जांच का तरीका

    University of Bristol के Professor of Medicine और U-RHYTHM तकनीक के आविष्कारक प्रो. स्टैफर्ड लाइटमैन के अनुसार रिसर्च के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि डॉक्टरों को प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म की पहचान करने के तरीके पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है। भविष्य में केवल एक निश्चित समय पर किए जाने वाले ब्लड टेस्ट की जगह शरीर में हार्मोन के स्तर और उनके दिन-रात के बदलावों की लगातार निगरानी पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है। खासकर रात के समय होने वाले हार्मोन बदलाव बीमारी की पहचान के लिए महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस दिशा में और रिसर्च की जरूरत है। प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म हाई ब्लड प्रेशर का एक ऐसा कारण है, जिसका इलाज संभव है और कुछ मामलों में बीमारी के मूल कारण का इलाज करके इसे ठीक भी किया जा सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। U-RHYTHM या 24-घंटे हार्मोन निगरानी जैसी तकनीकों व जांचों के लिए हमेशा अपने हृदय रोग विशेषज्ञ या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से संपर्क करें। स्वयं कोई डॉक्टरी निष्कर्ष न निकालें।

  • मेडिकल स्टोर्स पर अब सरकार; की होगी पैनी नज़र, प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की बिक्री के लिए CCTV अनिवार्य करने का प्रस्ताव!

    मेडिकल स्टोर्स पर अब सरकार; की होगी पैनी नज़र, प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की बिक्री के लिए CCTV अनिवार्य करने का प्रस्ताव!

    मेडिकल स्टोर्स पर अब सरकार; की होगी पैनी नज़र, प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की बिक्री के लिए CCTV अनिवार्य करने का प्रस्ताव!

    देश में बिना डॉक्टर की पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) के बेची जाने वाली दवाओं की अनियंत्रित बिक्री पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। प्रस्तावित नए नियमों के तहत अब मेडिकल स्टोर पर CCTV कैमरे लगाना अनिवार्य किया जा सकता है, ताकि शेड्यूल दवाओं की खरीद-बिक्री की पारदर्शी निगरानी की जा सके। सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य एंटीबायोटिक्स और आदत बनाने वाली दवाओं के दुरुपयोग को रोकना तथा मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस नए प्रस्ताव में क्या-क्या प्रावधान शामिल हैं और इसका आम जनता व मेडिकल स्टोर संचालकों पर क्या असर पड़ेगा।

    किन दवाओं की केंद्र सरकार करेगा निगरानी?

    केंद्र सरकार दवाओं की बिक्री को लेकर बनाए गए नियमों को और सख्त करने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने Drugs Rules, 1945 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य Schedule H, H1 और X श्रेणी की दवाओं की बिक्री और उपलब्धता पर नियामक निगरानी मजबूत करना है। प्रस्तावित बदलावों के जरिए सरकार का मकसद प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की अनधिकृत बिक्री और बिना वैध प्रिस्क्रिप्शन इनके इस्तेमाल पर रोक लगाना है।

    सरकार का किन दवाओं पर खास फोकस है और क्या है प्रस्ताव?

    सरकार Schedule H, H1 और X श्रेणी की दवाओं की बिक्री बिना प्रिस्क्रिप्शन के बेचने पर रोक लगाना चाहती है। यह प्रस्ताव पहले औषधि Drugs Consultative Committee (DCC) में चर्चा के लिए लाया गया है, जिसके बाद औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (Drugs Technical Advisory Board – DTAB) के सदस्यों ने भी इस पर विचार-विमर्श किया। प्रस्तावित बदलावों का मुख्य उद्देश्य बिना डॉक्टर की सलाह या वैध पर्चे के इन दवाओं की बिक्री और आम लोगों तक उनकी पहुंच को कंट्रोल करना है। अगर प्रस्तावित संशोधन लागू होते हैं, तो प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की बिक्री करने वाले मेडिकल स्टोर्स की निगरानी व्यवस्था और कड़ी हो सकती है।

    प्रस्ताव पास होने पर दवा दुकानों के लिए क्या रहेगा नियम

    फिल्हाल इस प्रस्ताव को ड्राफ्ट कर दिया गया है। प्रस्ताव ड्राफ्ट करने का मकसद लोगों से इसके लिए सुझाव मांगना है। लोगों की आपत्तिया और लोगों की रजामंदी के बाद इसे लागू कर दिया जाएगा। अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो नियमों के मुताबिक दवा की दुकानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य होगा। दवा बेचने वाली मेडिकल दुकानों को बिक्री की रिकॉर्डिंग को कम से कम तीन महीने तक सुरक्षित रखना होगा।

    थोक बिक्री पर लागू नहीं होगा प्रस्तावित CCTV नियम ड्राफ्ट में प्रस्तावित CCTV व्यवस्था रिटेल स्तर पर प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर होने वाली दवा बिक्री के लिए है। इसमें थोक लेनदेन को बाहर रखा गया है। फिलहाल स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों के सुझाव के इंतजार में है। लोगों की रजामंदी जाहिर होने पर ही सरकार अपना आगे कदम बढ़ाएंगी। सरकार का कुछ दवाओं पर निगरानी रखने का मकसद बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दवाई खाने पर रोक लगाना है। सेल्फ मेडिकेशन हेल्थ के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक है।

    डिस्क्लेमर: यह खबर केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित Drugs Rules, 1945 में संशोधन के ड्राफ्ट पर आधारित है। प्रस्तावित नियम अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुए हैं और इनमें बदलाव संभव है। दवाओं का सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह और वैध प्रिस्क्रिप्शन के अनुसार ही करें।

  • क्या बादाम खाने से ‘आंखों’ की रोशनी बढ़ सकती है? जानिए क्या कहते हैं आयुर्वेदाचार्य.

    क्या बादाम खाने से ‘आंखों’ की रोशनी बढ़ सकती है? जानिए क्या कहते हैं आयुर्वेदाचार्य.

    क्या बादाम खाने से ‘आंखों’ की रोशनी बढ़ सकती है? जानिए क्या कहते हैं आयुर्वेदाचार्य.

    अक्सर हमने अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि अगर बच्चे का दिमाग पढ़ाई में कमजोर है, उसको याद करने में दिक्कत होती है तो उसे बादाम खिलाएं। दादी-नानी आज भी कहती हैं कि रोज बादाम खाने से आंखों की रोशनी बेहतर होती है और चश्मे की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन क्या ये सिर्फ पीढ़ियों से चली आ रही बातें हैं या इनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार भी है? क्या बादाम सच में दिमाग और आंखों की सेहत के लिए फायदेमंद है? आइए जानते हैं एक्सपर्ट और वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो बादाम में विटामिन E, राइबोफ्लेविन, फोलेट, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैं। विटामिन E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है जो मस्तिष्क की कोशिकाओं (Brain Cells) और आंखों के पतले ऊतकों को ऑक्सीडेटिव तनाव और फ्री-रेडिकल्स के नुकसान से बचाता है। इसके नियमित सेवन से बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त कमजोर होने की गति धीमी होती है और आंखों में मोतियाबिंद या मैकुलर डिजनरेशन का जोखिम कम हो सकता है। हम सभी जानते हैं कि हमारी हेल्दी डाइट हमारी सेहत पर अहम रोल निभाती है, बादाम भी उसी का हिस्सा है।

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट नित्यानंदम श्री ने बताया अगर आप आंखों को पूरा पोषण देना चाहते हैं और नेचुरल तरीके से आंखों की रोशनी बढ़ाना चाहते हैं तो आप बादाम का सेवन खास तरीके से करें। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के मुताबिक बादाम को रातभर पानी में भिगोकर और उसका छिलका उतारकर उसे पीस लें तो उसकी तासीर नॉर्मल हो जाती है और शरीर इसके पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। आइए जानते हैं कि बादाम का सेवन करने से आंख, ब्रेन और सेहत पर कैसा होता है असर।

    बादाम कैसे ब्रेन पर करता है असर?

    बादाम एक ऐसा सूखा ड्राई फ्रूट है जिसमें विटामिन E, राइबोफ्लेविन, फोलेट और ओमेगा-3 फैटी एसिड मौजूद होता हैं। ये पोषक तत्व मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और याददाश्त को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। Brain Research Bulletin में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक बादाम का नियमित सेवन मस्तिष्क में ‘एसिटाइलकोलाइन’ नामक न्यूरोट्रांसमीटर के स्तर को बढ़ाता है। एसिटाइलकोलाइन वो रसायन है जो न्यूरॉन्स के बीच संदेश भेजने, ध्यान केंद्रित करने और याददाश्त को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार होता है।

    बादाम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, खासकर विटामिन E मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। न्यूरोलॉजिकल रिसर्च के अनुसार, विटामिन E मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है, जिससे डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी समस्याओं का जोखिम कम होता है। बादाम में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड, ओमेगा-6 फैटी एसिड और फोलेट मस्तिष्क की नसों (Neurons) की झिल्ली को लचीला और हेल्दी बनाए रखते हैं। इससे दिमाग नई चीजें सीखने और जानकारी को लंबे समय तक याद रखने में अधिक सक्षम बनता है। Purdue University द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक दोपहर के खाने के समय बादाम खाने से Blood Sugar का स्तर कंट्रोल रहता है। इससे दोपहर में होने वाली दिमागी थकान कम होती है। बादाम में राइबोफ्लेविन (विटामिन B2) और एल-कार्निटाइन जैसे पोषक तत्व होते हैं जो दिमागी गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ न्यूरल पाथवे (Neural Pathways) में सुधार करते हैं।

    बादाम का सेवन कैसे आंखों के लिए असरदार है?

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट नित्यानंदम श्री ने बताया अगर आप आंखों को पूरा पोषण देना चाहते हैं और नेचुरल तरीके से आंखों की रोशनी बढ़ाना चाहते हैं तो आप बादाम का सेवन खास तरीके से करें। आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए आप बादाम को दूध के साथ और काली मिर्च के साथ कॉम्बिनेशन करके खाएं। इस तरह बादाम का सेवन आंखों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और आंखों की रोशनी बढ़ाता है। आंखों की हेल्थ के लिए आप डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, पपीता, बादाम, अखरोट और आंवला का भी सेवन करें।

    बादाम में मौजूद विटामिन E एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करता है और कोशिकाओं को नुकसान से बचाता है। यह उम्र के साथ होने वाली आंखों की समस्याओं की गति धीमा कर सकता है। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, बादाम आंखों की सेहत और रोशनी को लंबे समय तक बनाए रखने में बहुत कारगर है। इसमें मुख्य रूप से विटामिन E, जिंक (Zinc) और ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते हैं जो आंखों की आंतरिक संरचना को बनाए रखते हैं।

    अमेरिका के National Eye Institute द्वारा की गई Age-Related Eye Disease Study के मुताबिक विटामिन E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करता है। बादाम में मौजूद विटामिन E रेटिना की हेल्दी कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाता है। एक मुट्ठी बादाम से आपको अपनी दैनिक जरूरत का लगभग 48-50% विटामिन E मिल जाता है, जो आपकी आंखों की हिफाजत करता है। आयुर्वेद और मेडिकल साइंस दोनों के मुताबिक रोजाना बादाम का सेवन आंख से लेकर ब्रेन तक के लिए उपयोगी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। बादाम या कोई भी घरेलू नुस्खा किसी चिकित्सकीय इलाज का विकल्प नहीं है। आंखों की समस्या या कमजोर याददाश्त के लिए हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें।

  • सिर्फ मसाला नहीं, दवा बनाने में भी काम आती है दालचीनी? शरीर पर इसके असर को समझें आयुर्वेदिक डॉक्टर से.

    सिर्फ मसाला नहीं, दवा बनाने में भी काम आती है दालचीनी? शरीर पर इसके असर को समझें आयुर्वेदिक डॉक्टर से.

    सिर्फ मसाला नहीं, दवा बनाने में भी काम आती है दालचीनी? शरीर पर इसके असर को समझें आयुर्वेदिक डॉक्टर से.

    दालचीनी केवल भारतीय रसोइयों में खाने का स्वाद और सुगंध बढ़ाने वाला मसाला भर नहीं है, बल्कि सदियों से इसका इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता रहा है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर के मेटाबॉलिज्म को सुधारने और ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मददगार माने जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा और शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, दालचीनी का इस्तेमाल खासतौर से टाइप-2 डायबिटीज, पाचन संबंधी समस्याओं जैसे गैस, अपच और पेट फूलने, हाई कोलेस्ट्रॉल और दिल के रोगों, सर्दी-जुकाम या श्वसन संबंधी संक्रमण का इलाज करने में किया जाता रहा है। इतना ही नहीं दालचीनी का सेवन जोड़ों के दर्द और सूजन जैसी स्थितियों में एक स्पोर्टिव रेमेडी के रूप में किया जाता है।

    आदर्श आयुर्वेदिक फार्मेसी, कनखल, हरिद्वार में आयुर्वेद विशेषज्ञ, डॉ. दीपक कुमार (वैद्य) ने बताया दालचीनी को अक्सर लोग खाने के साथ, चाय और दूध के साथ खाते हैं। इस मसाले को मसालों की महारानी माना जाता है। इस मसाले के दो से तीन ही गुण नहीं है बल्कि इसके अनगिनत फायदे हैं। अगर आपके मुंह से बदबू आती है तो आप एक टुकड़ा दालचीनी का चबा लें। दालचीनी चूसने से मुंह की दुर्गंध कम होती है साथ ही दांतों और मसूड़ों की समस्या भी दूर होती है। दालचीनी की खुशबू और इसके कुछ प्राकृतिक यौगिक मुंह की गंध को कुछ समय के लिए कम कर सकते हैं। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि दालचीनी शरीर पर किस तरह असर करती है ।

    पाचन से जुड़ी बीमारियों का करती है उपचार

    वैद्य दीपक कुमार ने बताया कि मौसम बदलने या दूषित भोजन के कारण होने वाले दस्त में 1 से 2 ग्राम दालचीनी पाउडर पानी के साथ खाने से फायदा हो सकता है। इसके अलावा दालचीनी का सेवन कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए भी असरदार साबित होता है।

    डायबिटीज और इंसुलिन सेंसिटिविटी पर होता है असर

    दालचीनी का सेवन ब्लड शुगर कंट्रोल करने और इंसुलिन सेंसिटिविटी पर भी असर करता है। दालचीनी में मौजूद पॉलीफेनॉल एक ऐसा यौगिक है जो इंसुलिन के काम करने की क्षमता को बेहतर करने में मदद कर सकता है। हालांकि, डायबिटीज के इलाज के लिए दालचीनी को डॉक्टर की ओर से दी गई दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    कोलेस्ट्रॉल करता है कंट्रोल और दिल के लिए है जरूरी

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने बताया दालचीनी को हार्ट हेल्थ के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी समस्याओं में मदद कर सकती है। इसका सेवन करने से खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है। ये मासाल ट्राइग्लिसराइड को कम करने और गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। दालचीनी धमनियों में जमा कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मददगार साबित हो सकती है।

    एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण सूजन करते हैं कंट्रोल

    दालचीनी में कुछ ऐसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं जिनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी यानी सूजन कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं। इसे गठिया और जोड़ों की सूजन में उपयोगी माना जाता है। जिन लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत रहती है वो दालचीनी का सेवन करें तो फायदा होता है।

    वेट लॉस में भी है असरदार

    दालचीनी को वजन घटाने और पेट की चर्बी कंट्रोल करने के लिए भी असरदार माना गया है। यह मेटाबॉलिज्म बूस्ट करने और कैलोरी बर्न करने में भी असरदार साबित होती है। संतुलित डाइट, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और कैलोरी कंट्रोल करने के साथ ही इस मसाले का सेवन किया जाए तो तेजी से वजन को कंट्रोल किया जा सकता है।

    सर्दी-जुकाम और गले की परेशानी में है असरदार

    दालचीनी में एंटीऑक्सीडेंट और कुछ एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए जाते हैं अगर इसका सेवन तुलसी, अदरक, दालचीनी और शहद के साथ मिलाकर किया जाए तो ये सर्दी-जुकाम और गले की परेशानी में असरदार होता है। दालचीनी का टुकड़ा या चूर्ण चूसने से गले को आराम मिल सकता है, लेकिन यह वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज नहीं है।

    दालचीनी के एंटीऑक्सीडेंट गुण

    दालचीनी में एंटीऑक्सीडेंट गुण वाले कई प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े तंत्र पर प्रभाव डाल सकती हैं। दालचीनी का सेवन चाय के साथ और उसका काढ़ा बनाकर इस्तेमाल करना असरदार साबित होता है।

    दालचीनी का सेवन कैसे और कितनी मात्रा में करें

    रोजाना 1 से 2 ग्राम दालचीनी का सेवन सेहत के लिए पर्याप्त है। दालचीनी की सही मात्रा व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करताहै। कुछ लोगों को ज्यादा मात्रा में दालचीनी लेने से मुंह या पेट में जलन जैसी परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में दालचीनी का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

    डिस्क्लेमर: दालचीनी किसी बीमारी का इलाज नहीं है। इसका सेवन डॉक्टर की सलाह और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही करें। इसे किसी भी दवा या उपचार का विकल्प न मानें।