अगर आपको भी कब्ज की समस्या रहती है तो या अपनी गट हेल्थ को बेहतर बनाना चाहते हैं तो अपनी डाइट में शकरकंद को शामिल करें। नैचुरल और फाइबर से भरपूर शकरकंद डाइट में शामिल करने से पाचन और पेट साफ़ होने में मदद मिलता है। हालाँकि, आप इसे कैसे बनाते और खाते हैं, इसका भी पाचन पर पड़ने वाले फ़ायदे पर असर पड़ सकता है। फ़्लोरिडा के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेल्थ कंटेंट क्रिएटर डॉ. सलहाब, ने शकरकंद बनाने का एक आसान तरीका बताया है जिससे गट हेल्थ बेहतर हो सकती है और कब्ज़ से राहत मिल सकती है।
शकरकंद कब्ज में क्यों हैं फायदेमंद?
डॉक्टर जोसेफ़ सलहाब कहते हैं शकरकंद में घुलनशील और अघुलनशील फाइबर भी होते हैं, जो मल को नरम करने, उसे भारी बनाने और पाचन तंत्र को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं। और इनमें नैचुरली मैनिटोल होता है, जो एक तरह का शुगर अल्कोहल है। यह आंतों में पानी खींच सकता है और मल को नरम करने व पेट साफ़ करने में मदद कर सकता है।
शकरकंद रेसिपी के लिए सामग्री
1 मध्यम आकार की शकरकंद, थोड़ा सा ऑलिव ऑयल, स्वादानुसार काली मिर्च
गट हेल्थ के लिए शकरकंद की रेसिपी कैसे बनाएं?
पहला स्टेप: शकरकंद को आधा काट लें, उसमें थोड़ा ऑलिव ऑयल और काली मिर्च डालें, फिर कटे हुए हिस्से को नीचे की तरफ़ करके पार्चमेंट पेपर पर रखें।
दूसरा स्टेप: अब, इसे 45 मिनट तक नरम होने तक बेक करें। जब यह बेक हो जाए तो उसे 24 घंटे के लिए फ्रिज में रखें। अब इसे लगभग 24 घंटे बाद, दोबारा गर्म करें और फिर उसके बाद खाएं
यह तरीका क्यों है फायदेमंद?
डॉक्टर जोसेफ़ सलहाब कहते हैं जब शकरकंद ठंडा होता है, तो उसका कुछ स्टार्च ‘रेसिस्टेंट स्टार्च’ में बदल जाता है। वह रेसिस्टेंट स्टार्च आपकी आंतों में आगे तक पहुँचता है, जहाँ अच्छे गट बैक्टीरिया उसे खाते हैं। यह मल को भारी बनाने और पेट साफ़ होने की प्रक्रिया को नियमित करने में भी मदद कर सकता है।
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। 30 की उम्र के बाद शरीर में होने वाले बदलाव हमेशा लक्षणों के रूप में सामने नहीं आते। कई बार ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, थायरॉइड या हीमोग्लोबिन में बदलाव काफी समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रहते हैं। यही कारण है कि उम्र बढ़ने के साथ नियमित हेल्थ चेकअप जरूरी है। हालांकि हर महिला के लिए हर टेस्ट साल में कराना जरूरी नहीं होता। जांच की जरूरत उम्र, परिवार के इतिहास, वजन, मेंस्ट्रुअल साइकिल, प्रेग्नेंसी के इतिहास पर निर्भर करती है। लेकिन डॉ.बता रहे हैं कि 30 की उम्र पार कर चुकी महिलाओं को कौन कौन से टेस्ट जरूर करवाने चाहिए।
1. HbA1c और फास्टिंग ब्लड शुगर
डायबिटीज शुरुआत में अक्सर बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकती है। ऐसे में HbA1c पिछले लगभग दो से तीन महीनों में औसत ब्लड शुगर की जानकारी देता है, जबकि फास्टिंग ब्लड शुगर उस समय ब्लड में मौजूद ग्लूकोज का लेवल बताता है। 2026 के American Diabetes Association स्टैंडर्ड के अनुसार सामान्य जोखिम वाली महिलाओं में डायबिटीज की स्क्रीनिंग 35 साल की उम्र से शुरू करने की सलाह दी जाती है। इससे पहले भी अधिक वजन, परिवार में डायबिटीज, PCOS, हाई ब्लड प्रेशर या गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज का इतिहास होने पर जांच की जरूरत हो सकती है।
2. लिपिड प्रोफाइल
इसमें LDL, HDL, ट्राइग्लिसराइड और कुल कोलेस्ट्रॉल की जांच होती है। बढ़ा हुआ LDL अक्सर किसी तरह का लक्षण नहीं देता, लेकिन लंबे समय तक धमनियों में प्लाक बनने का कारण बन सकता है और हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है। WHO के अनुसार 2023 में बढ़ा हुआ LDL वर्ल्ड लेवल पर अनुमानित 36 लाख मौतों से जुड़ा था।
3. CBC और हीमोग्लोबिन
महिलाओं में आयरन की कमी और एनीमिया एक कॉमन प्रॉब्लम हो सकती है, खासकर जिन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती है। CBC से हीमोग्लोबिन के साथ रेड और व्हाइट ब्लड सेल्स तथा प्लेटलेट्स की स्थिति का पता चलता है। लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर या सांस फूलने जैसी समस्याओं में यह जांच फायदेमंद हो सकती है। वहीं जिन महिलाओं को एनीमिया की शिकायत है उन्हें फेरिटिन और आयरन प्रोफाइल जैसी जांच भी करानी चाहिए।
4. TSH
थायरॉइड हार्मोन में बदलाव महिलाओं में वजन, मासिक धर्म, एनर्जी, नींद और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। केवल उम्र के आधार पर हर महिला में हर साल TSH कराना आवश्यक नहीं माना जाता। लेकिन थायरॉइड की बीमारी का पारिवारिक इतिहास, मासिक धर्म में बदलाव, वजन में अचानक बदलाव, बहुत ज्यादा थकान या गर्भधारण होने पर डॉक्टर इसकी सलाह दे सकते हैं।
5. किडनी फंक्शन टेस्ट
क्रिएटिनिन और eGFR जैसी जांचें किडनी की कार्यक्षमता का आकलन करने में मदद करती हैं। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी या लंबे समय से कुछ दवाएं लेने वाली महिलाओं में इनकी जरूरत बढ़ जाती है। किडनी की बीमारी शुरुआती चरण में बिना लक्षण के रह सकती है, इसलिए जोखिम वाले लोगों में समय पर जांच जरूरी है।
6. लिवर फंक्शन टेस्ट
ALT, AST, बिलिरुबिन और अन्य मापदंडों से लिवर की स्थिति का प्रारंभिक आकलन किया जाता है। मोटापा, डायबिटीज, ट्राइग्लिसराइड, शराब का सेवन या कुछ दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल में लिवर से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर लिवर फंक्शन की जांच के साथ आगे की जांच भी सलाह दे सकते हैं।
डायबिटीज एक बहुत कॉमन बीमारी है। आज के समय में ज्यादातर लोग आपको इस बीमारी की चपेट में दिखेंगे। यंगस्टर्स और बच्चे भी इस बीमारी की चपेट में हैं। डायबिटीज का खतरा आमतौर पर बढ़ती उम्र, ज्यादा वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, खानपान, पारिवारिक इतिहास और लाइफस्टाइल जैसे कारणों से जुड़ा माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में हुए शोध ने ब्लड ग्रुप और टाइप 2 डायबिटीज के खतरे के बीच एक संभावित संबंध की तरफ भी लोगों का ध्यान खींचा है। डॉ. बता रहे हैं कि किन ब्लड ग्रुप वाले लोगों को रहता है सबसे ज्यादा डायबिटीज का खतरा।
क्या कहते हैं अनुपम बिस्वास
रिसर्च के अनुसार, बी ब्लड ग्रुप वाले लोगों में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा अन्य ब्लड ग्रुप की तुलना में सबसे ज्यादा रहता है। 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में कई पूर्व अध्ययनों के परिणामों का विश्लेषण किया गया। इसमें बी ब्लड ग्रुप और टाइप 2 डायबिटीज के बीच संबंध पाया गया। अध्ययन के अनुसार, बी ब्लड ग्रुप वाले लोगों में अन्य ब्लड ग्रुप वाले लोगों की तुलना में डायबिटीज का खतरा लगभग 28 प्रतिशत ज्यादा पाया गया। हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि बी ब्लड ग्रुप होने से किसी व्यक्ति को डायबिटीज होना तय है। ब्लड ग्रुप केवल एक संभावना को बताता है। अलग अलग अध्ययनों में ए, एबी और ओ ब्लड ग्रुप को लेकर परिणाम पूरी तरह एक जैसे नहीं रहे हैं। कुछ अध्ययनों में ओ ब्लड ग्रुप वाले लोगों में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कम देखा गया है, लेकिन इसके पीछे के कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
ब्लड ग्रुप और डायबिटीज के बीच यह संबंध क्यों दिखाई देता है, इसका निश्चित जवाब अभी उपलब्ध नहीं है। एबी, ओ ब्लड ग्रुप शरीर में ब्लड वेसल्स और कुछ बायोलॉडिकल प्रोसेस से जुड़ा होता है। सूजन, ब्लड में थक्के बनाने की प्रक्रिया और ब्लड वेसल्स के काम करने के तरीके पर इसके संभावित प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है। हालांकि, इन संभावित संबंधों को डायबिटीज का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। सबसे जरूरी बात यह है कि ब्लड ग्रुप को बदला नहीं जा सकता, लेकिन डायबिटीज के कई प्रमुख जोखिम कारकों को नियंत्रित किया जा सकता है। हेल्दी वेट बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और समय समय पर ब्लड शुगर लेवल की जांच डायबिटीज से बचाव और उसकी समय पर पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिन लोगों के परिवार में डायबिटीज का इतिहास रहा है, जिनका वजन अधिक है, पेट के आसपास चर्बी अधिक है या जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, उनके लिए नियमित जांच महत्वपूर्ण है।
कब बढ़ सकता है खतरा
डायबिटीज की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि लंबे समय तक ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ा रहने से शरीर के ब्लड वेसल्स और नसों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, आंखों की रोशनी से जुड़ी समस्याएं और नसों को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए ब्लड ग्रुप ए हो, बी हो, एबी हो या ओ, डायबिटीज की रोकथाम और समय पर पहचान सभी के लिए महत्वपूर्ण है।
आज की व्यस्त जिंदगी में कई लोग पूरे सप्ताह ऑफिस, घर और दूसरी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में एक्सरसाइज के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। कुछ लोग सोमवार से शुक्रवार तक बिल्कुल एक्सरसाइज नहीं करते और शनिवार-रविवार को एक साथ लंबे समय तक वर्कआउट करके इसकी भरपाई करने की कोशिश करते हैं। लीड कंसल्टेंट- कार्डियोलॉजी डॉक्टर कहते हैं कि इसे आम तौर पर ‘वीकेंड वॉरियर’ एक्टिविटी कहते हैं। लेकिन क्या वीकेंड की एक्सरसाइज फायदेमंद है और हेल्दी हार्ट के लिए कितना वर्कआउट करना चाहिए बता रहे हैं डॉक्टर
क्या वीकेंड की एक्सरसाइज है फायदेमंद?
अगर पूरे हफ्ते रोजाना एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो वीकेंड पर की गई फिजिकल एक्टिविटी कुछ न करने से तो बेहतर है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हफ्ते के बाकी दिनों में आप सिर्फ बैठे रहें। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद अचानक बहुत तेज वर्कआउट करने से मांसपेशियों में चोट और कुछ लोगों में हृदय पर अचानक दबाव बढ़ने की समस्या हो सकती है। कोशिश करें कि आप अपनी डेली रूटीन में आधे घंटे की वॉक को ज़रूर शामिल करें।
हेल्दी हार्ट के लिए हफ्ते में कितने दिन वर्कआउट करना चाहिए?
हेल्दी हार्ट के लिए हफ्ते में कम से कम 150 मिनट मीडियम तीव्रता वाली एरोबिक फिजिकल एक्टिविटी या 75 मिनट तेज तीव्रता वाली एक्टिविटी करने की सलाह दी जाती है। रोज करीब 30 मिनट की ब्रिस्क वॉक सबसे आसान और बेहतरीन विकल्प है। साथ ही हफ्ते में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज को भी शामिल करें। तेज चलना, सीढ़ियां चढ़ना, साइकिल चलाना और लंबे समय तक बैठने के बीच छोटे-छोटे एक्टिव ब्रेक लेना भी रोजमर्रा की फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाने में मदद कर सकता है।
पूरे सप्ताह अपने आप को रखें एक्टिव
अगर किसी व्यक्ति के पास सिर्फ शनिवार और रविवार को समय है, तो वह इन दिनों एक्सरसाइज जरूर करे, लेकिन धीरे-धीरे सप्ताह के दूसरे दिनों में भी छोटी अवधि की एक्टिविटी जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि दिल की सेहत के लिए सबसे जरूरी बात है नियमित रूप से एक्टिव रहना। इसलिए सिर्फ वीकेंड पर वर्कआउट करने के बजाय पूरे सप्ताह अपने शरीर को एक्टिव रखें।
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
अगर आप रोजाना कम नींद लेते हैं या आधी रात तक जागते हैं तो हो सकता है कि शुरुआत में आपको कोई संकेत न दिखाई दें। लेकिन ये आदत धीरे धीरे दिमाग को कमजोर कर रही होती है। दरअसल, कम नींद की वजह से सिर्फ़ दिमाग थकता नहीं है, बल्कि उसकी काम करने की क्षमता भी कम हो जाती है। डॉक्टर कहती हैं कि नींद के दौरान दिमाग़ जानकारी को प्रोसेस करता है, यादों को पक्का करता है और फ़ैसले लेने की क्षमता को कंट्रोल करने वाले सिस्टम को ठीक रखता है। लेकिन जब आप लगातार नींद कम लेते हैं तो इससे आपके दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।
कम नींद लेने से दिमाग पर कैसा असर पड़ता है?
ध्यान देने की क्षमता पर असर : कम नींद लेने से सबसे पहले ध्यान देने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। नींद की कमी वाले लोगों में ध्यान बनाए रखना और लगातार सही प्रतिक्रिया देना मुश्किल हो जाता है। हो सकता है कि आप रोज़मर्रा के काम तो पूरे कर लें, लेकिन आपका ध्यान आसानी से भटक सकता है। इस स्थिति में कोई व्यक्ति काम करने में खुद को सक्षम महसूस कर सकता है, लेकिन सामान्य से ज़्यादा छोटी-छोटी गलतियां कर सकता है।
हर समय चिड़चिड़ापन महसूस होना : कई रातों तक ठीक से न सो पाने के बाद, छोटी-सी बात में भी लोग ज़्यादा परेशान हो सकते हैं। नींद की कमी से भावनाओं को संभालने की क्षमता पर असर पड़ सकता है, जिससे लोग ज़्यादा चिड़चिड़े या कम सब्र वाले हो सकते हैं। यानी कभी-कभी जिसे हम “खराब मूड” कहते हैं, वह असल में दिमाग का बिना ठीक से आराम किए काम करते रहने का नतीजा होता है।
ठीक से कोई भी निर्णय नहीं ले पाना : कम नींद की वजह से आपके फ़ैसले लेने की क्षमता में भी बदलाव देखा जा सकता है। जब दिमाग को पूरी नींद नहीं मिलती, तो सही फ़ैसला लेने, समस्या सुलझाने और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
कितनी नींद है ज़रूरी?
डॉक्टर नेहा पंडिता कहती हैं कि नींद को काम और जागने के बीच का बचा हुआ समय नहीं समझना चाहिए। यह वह समय है जब दिमाग अगले दिन के काम के लिए खुद को तैयार करता है। इसलिए वयस्कों के लिए आम तौर पर सात या उससे ज़्यादा घंटे की नींद की सलाह दी जाती है, हालाँकि हर व्यक्ति की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं। नींद का रेगुलर होना और उसकी क्वालिटी भी मायने रखती है।
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
भारतीय घरों में ज़्यादातर लोगों के दिन की शुरुआत चाय की गर्म गर्म सिप के साथ होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं चाय का सेवन कुछ लोगों के लिए नुस्कानदायक हो सकता है। गैस्ट्रोलॉजिस्ट ने बताया है कि किन लोगों को चाय पीने से बचना चाहिए और ज्यादा चाय पीने से सेहत को क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं।
चाय पीने से हो सकते हैं कौन से नुकसान?
चाय में मौजूद टैनिन चाय को डार्क कलर और उसे स्वाद में कड़क बनाते हैं। वैसे तो ये तुरंत एनर्जी को बूस्ट करते हैं लेकिन कुछ देर बाद उतनी ही जल्दी लो डाउन फील करा सकते हैं। दरअसल, चाय में मौजूद टैनिन एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं लेकिन इनका ज़्यादा सेवन करने से गैस्ट्रिक बैरियर इरिटेट होता है जिससे एसिडिटी या जलन महसूस हो सकती है। वहीं, जब चाय में दूध और चीनी मिलाते हैं तो इससे कैलोरी और शुगर की मात्रा बढ़ती है, जो इंसुलिन स्तर को प्रभावित कर सकती है।
किन लोगों को चाय पीने से बचना चाहिए?
कुछ मेडिकल कंडीशन में आपको चाय का सेवन करने से बचना चाहिए। गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD जूझ रहे लोगों को खासकर गंभीर स्थिति में चाय पीने से बचना चाहिए। वहीं, गर्भवती महिलाओं को भी चाय का सेवन सीमित रखना चाहिए क्योंकि इसमें मौजूद कैफीन प्लेसेंटा के ज़रिए बच्चे तक पहुंच सकता है। अगर आपके शरीर में आयरन की कमी है तब भी चाव का सेवन कम या बंद करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा जिन लोगों को एंजायटी या पैनिक अटैक की समस्या है उन्हें बजी कैफीन वाले चाय का सेवन करने से बचना चाहिए।
क्या है चाय पीने का सही तरीका?
अगर आपको कोई मेडिकल कंडीशन नहीं है तब भी आप हर रोज दो कप से ज़्यादा चाय न पिएं। अच्छी नींद के लिए आप पांच बजे के बाद चाय न पिएं। चाय में रिफाइंड शुगर का इस्तेमाल करने से बचें। सुबह उठकर खाली पेट चाय पीना गट हेल्थ के लिए नुकसानदायक है इसलिए सुबह पहले गुनगुना पानी पिएं हल्का नाश्ता करें और फिर चालीस मिनट बाद चाय पियें। चाय को हेवी मील्स के साथ कभी भी न पिएं क्योंकि ये बॉडी में आयरन, ज़िंक और प्रोटीन के अब्सॉर्प्शन को ब्लॉक कर देते हैं। मील लेने से 45 मिनट पहले और बाद में चाय पीने से बचें।
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
फाइबर हमारे शरीर के लिए बेहद ज़रूरी पोषक तत्व है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के साथ, पेट की सेहत को बेहतर बनाने और मल त्याग को आसान बनाने जैसे कई कामों में मदद करता है। डाइट में इसकी कमी होने पर शरीर कई तरह के संकेत दे सकता है। कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉक्टर सेठी ने ने ऐसे संकेत बताए जिनसे पता चलता है कि आपकी डाइट में फाइबर की कमी है
फाइबर की कमी होने पर शरीर देता है ऐसे संकेत
खाना खाने के बाद जल्दी भूख लगना: डॉक्टर कहते हैं कि अगर किसी को खाना खाने के तुरंत बाद भूख लगती है, तो हो सकता है कि उस खाने में पर्याप्त फाइबर न हो।
खाना खाने के बाद ब्लड शुगर तेज़ी से बढ़ना: डॉक्टर सेठी ने बताया कि घुलनशील फाइबर कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण को धीमा कर सकता है और खाना खाने के बाद ग्लूकोज़ के स्तर में होने वाली तेज़ी को कम करने में मदद कर सकता है।
बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ना: डॉक्टर सेठी कहते हैं कि फाइबर की कमी होने पर शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। बता दें, शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से हार्ट से जुड़ी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है ।
मल का सख्त होना: मल का सख्त होना भी फाइबर की कमी का एक मुख्य संकेत है। डॉक्टर सेठी ने बताया कि फाइबर मल की मात्रा बढ़ाता है और पानी को बनाए रखता है, जिससे मल त्याग करना आसान हो जाता है।
मल का ढीला होना: डॉक्टर के अनुसार, फाइबर सिर्फ कब्ज के लिए नहीं है। घुलनशील, जेल बनाने वाला फाइबर पानी को अवशोषित कर सकता है और ढीले मल को सख्त करने में मदद कर सकता है।
कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाने के बाद थकान: डॉक्टर कहते हैं कि कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाना खाने के तुरंत बाद थकान महसूस होना शुगर क्रैश का संकेत हो सकता है, जो खाने में फाइबर की कमी की वजह से हो सकता है।
नियमित रूप से मल त्याग नहीं होना: फाइबर की मात्रा बढ़ाने से कब्ज़ से पीड़ित लोगों में मल त्याग की फ्रीक्वेंसी में सुधार हो सकता है। डॉक्टर सेठी ने बताया कि कब्ज़ के कारण पेट पूरी तरह साफ नहीं हो पाता है, और सही प्रकार और मात्रा में फाइबर लेने से मल की बनावट और नियमितता में सुधार हो सकता है।
शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का का मतलब है आपके दिल की धमिकयों में ब्लॉकेज की वजह से उसका कमजोर होना। लेकिन क्या आप जानते हैं सिर्फ बैड कोलेस्ट्रॉल की वजह से ही दिल कमजोर नहीं होता है। गोरखपुर स्थित रीजेंसी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट-कार्डियोलॉजी डॉक्टर सिंह, बता रही हैं बैड कोलेस्ट्रॉल के अलावा किन वजहों से आपका हार्ट कमजोर हो सकता है?
बैड कोलेस्ट्रॉल के अलावा किन वजहों से हो सकता है हार्ट अटैक:
ब्लड प्रेशर – हार्ट कमजोर होएं के पीछे हाई बीपी भी एक बहुत बड़ी वजह है। लंबे समय तक हाई बीपी की वजह से धमनियों पर लगातार दबाव पड़ता है, जिससे हार्ट को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए, समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच करवाना और इसे नियंत्रित रखना दिल की लंबी उम्र के लिए ज़रूरी है।
ब्लड शुगर – डायबिटीज या बॉर्डरलाइन शुगर होने पर हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ग्लूकोज का बढ़ा हुआ स्तर रक्त वाहिकाओं को कमजोर कर सकता है। इसलिए, सिर्फ कोलेस्ट्रॉल की चिंता करने के बजाय ब्लड शुगर के स्तर पर भी नजर रखना बेहद जरूरी है।
नींद की कमी- कम सोने या खराब स्लीप पैटर्न के कारण शरीर में तनाव के हॉर्मोन बढ़ते हैं और ब्लड प्रेशर पर नकारात्मक असर पड़ता है। रोजाना 7 से 8 घंटे की गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद लेना दिल को रीचार्ज करने और उसे स्वस्थ रखने के लिए एक अचूक उपाय है।
सुस्त जीवनशैली – सुस्त या आरामदेह जीवनशैली दिल की मांसपेशियों को कमजोर बना सकती है। नियमित रूप से एक्सरसाइज, योग या तेज कदमों से वॉक न करने पर शरीर में कैलोरी और चर्बी जमा होने लगती है, जो मोटापे और दिल की बीमारियों को न्योता देती है।
तंबाकू और सिगरेट- तंबाकू या सिगरेट का सेवन दिल की सेहत के लिए सबसे बड़े और घातक खतरों में से एक है। इसमें मौजूद हानिकारक रसायन धमनियों को संकुचित करते हैं, रक्त के थक्के जमाने में मदद करते हैं और हृदय तक ऑक्सीजन की आपूर्ति को बाधित करते हैं। इसलिए दिल को सुरक्षित रखना है, तो तंबाकू उत्पादों से पूरी तरह दूरी बनाना सबसे जरूरी कदम है।
आजकल घंटों स्क्रीन पर बिताना और खराब लाइफस्टाइल हमारी आंखों की सेहत पर सीधा असर डाल रहा हैं। कई बार सुबह अखबार पढ़ते समय अक्षर धुंधले दिखाई देने लगते हैं या कुछ देर पढ़ने के बाद ही आंखों में तेज दर्द और भारीपन महसूस होने लगता है। अगर आप भी अक्सर ऐसी ही समस्या का सामना करते हैं, तो इसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। आंखों को आराम देने और उनकी कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने के लिए भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र (Hansa Yogendra) के मुताबिक कुछ आसान टिप्स और लाइफस्टाइल में किया गया बदलाव आंखों को हेल्दी बनाने में मददगार साबित होता है। अगर आपकी आंखों में लगातार तेज दर्द है या कम दिखने की समस्या हो रही है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं और उसके साथ ही कुछ देसी तरीकों को भी अपनाएं आपकी आंखों की रिकवरी फास्ट होगी और आंखों की रोशनी भी बढ़ेगी।
योगेंद्र त्राटक: एकाग्रता और आंखों की सेहत के लिए असरदार अभ्यास
योग में कहा जाता है कि जहां मन होता है, वहीं ऊर्जा प्रवाहित होती है। त्राटक अभ्यास केवल आंखों की एक्सरसाइज नहीं, बल्कि एकाग्रता बढ़ाने का अभ्यास भी है। आज हमारी आंखें लगातार एक स्क्रीन से दूसरे स्क्रीन और एक नोटिफिकेशन से दूसरे नोटिफिकेशन पर जाती रहती हैं, जिससे आंखों की मांसपेशियों को आराम नहीं मिल पाता। इस अभ्यास के लिए आराम से बैठें और आंखों की सीध में लगभग एक हाथ की दूरी पर जलती हुई मोमबत्ती रखें। बिना जबरदस्ती पलक झपकाए लौ को तब तक देखें, जब तक सहज महसूस हो। जब आंखों में पानी आने लगे, तो आंखें बंद करके दोनों भौंहों के बीच लौ की छवि को देखने की कोशिश करें। इस प्रक्रिया को 3 से 5 बार दोहराएं। सामान्य रूप से पलक झपकना ठीक है, लेकिन जानबूझकर बार-बार पलकें न झपकाएं।
यह अभ्यास एकाग्रता बढ़ाने, आंखों की अनावश्यक गतिविधियों को कम करने और फोकस बेहतर बनाने में मदद करता है। हालांकि, यदि आपको ग्लूकोमा, हाल ही में आंखों की सर्जरी हुई है या आंखों में संक्रमण है, तो यह अभ्यास नहीं करें।
आंखों की मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज
शरीर की अन्य मांसपेशियों की तरह आंखों की मांसपेशियां भी नियमित गतिविधि से मजबूत होती हैं। यदि आप पूरे दिन स्क्रीन पर देखते रहते हैं, तो रोज 3 से 5 मिनट आंखों की एक्सरसाइज जरूर करें। धीरे-धीरे आंखों को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, तिरछी दिशा में और फिर गोल-गोल घुमाएं। इसके बाद अपने अंगूठे को चेहरे के पास रखें, पहले उस पर फोकस करें और फिर दूर रखी किसी वस्तु पर नजर डालें। इस पूरी प्रक्रिया को 10 बार दोहराएं। यदि पहली बार कर रहे हैं, तो शुरुआत 5 बार से करें। अंत में दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर गर्म करें और बंद आंखों पर हल्के से रखें। इसे पामिंग (Palming) कहा जाता है, जो आंखों की थकान दूर करने का आसान तरीका है।
गर्म सिकाई से आंखों को दें आराम
यदि लंबे समय तक पढ़ने या कंप्यूटर पर काम करने के बाद आंखों में भारीपन महसूस हो, तो हल्की गर्म सिकाई फायदेमंद हो सकती है। इसके लिए एक साफ सूती कपड़े में हल्के भुने हुए अलसी के बीज या चावल भरें और उसे हल्का गर्म करें। इसे 3 से 5 मिनट तक बंद आंखों पर रखें। इससे आंखों के आसपास की छोटी मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं, रक्त संचार बेहतर होता है और आंखों को आराम मिलता है।
आंखों की जलन और सूखेपन के लिए कूलिंग आई पैक
अगर आंखों में जलन, गर्माहट या सूखापन महसूस हो तो ठंडी खीरे की स्लाइस या शुद्ध एलोवेरा जेल या फिर गुलाब जल में भीगे कॉटन पैड को बंद पलकों पर 10 मिनट के लिए रखें।ध्यान रखें कि एलोवेरा जेल या गुलाब जल सीधे आंखों के अंदर नहीं जाना चाहिए। इनका इस्तेमाल केवल पलकों के ऊपर ही करें।
स्क्रीन का इस्तेमाल करते समय बरतें ये सावधानियां
डिजिटल आई स्ट्रेन आज धुंधला दिखाई देने, आंखों में दर्द, सिरदर्द और थकान की बड़ी वजह बन चुका है। इससे बचने के लिए 20-20-20 नियम अपनाएं। हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें।
स्क्रीन देखते समय बार-बार पलक झपकाना न भूलें, क्योंकि स्क्रीन इस्तेमाल करते समय लोग सामान्य से कम पलक झपकाते हैं, जिससे आंखें सूखने लगती हैं।
इसके अलावा स्क्रीन को आंखों की सीध में या थोड़ा नीचे रखें, छोटे अक्षरों को पढ़ने के लिए आंखों पर जोर देने के बजाय फॉन्ट साइज बढ़ाएं और पूरी तरह अंधेरे में मोबाइल का इस्तेमाल करने से बचें।
आंखों की सेहत के लिए डाइट भी है जरूरी है। आंखों को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना आंवला, गाजर, पालक, कद्दू, शकरकंद, भीगे हुए बादाम, अखरोट और रंग-बिरंगे फल व सब्जियां अपनी डाइट में शामिल करें। इनमें विटामिन A, विटामिन C, ल्यूटिन और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं, जो आंखों की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाने और लंबे समय तक दृष्टि को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं।
आंखों की रिकवरी का सबसे अच्छा समय नींद के दौरान होता है। इसलिए पर्याप्त पानी पीना और रोज 7–8 घंटे की अच्छी नींद लेना भी उतना ही जरूरी है। आंखों की रोशनी अचानक कमजोर नहीं होती, बल्कि हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे इसका असर दिखाती हैं। यदि आप रोज सिर्फ 10 मिनट यौगिक अभ्यास करें, स्क्रीन से जुड़े अच्छे नियम अपनाएं और पौष्टिक आहार लें, तो आंखों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी, सुझाव और टिप्स योग गुरु के अनुभवों और सामान्य पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। यह जानकारी किसी भी तरह से योग्य नेत्र रोग विशेषज्ञ या डॉक्टर की पेशेवर चिकित्सा सलाह, जांच, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। आंखों में दर्द, धुंधलापन या दृष्टि से जुड़ी किसी भी गंभीर समस्या के लिए हमेशा संबंधित डॉक्टर या विशेषज्ञ चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें।
वजन कम करने और खुद को फिट रखने के लिए ‘वॉक’ यानी पैदल चलना सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है। वजन घटाने और फिट रहने के लिए वॉकिंग को सबसे आसान, सुरक्षित और प्रभावी एक्सरसाइज मानी जाती है। इसे करने के लिए न किसी महंगे उपकरण की जरूरत होती है और न ही जिम जाने की। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि नियमित वॉकिंग से वजन कंट्रोल रहता है, दिल की सेहत में सुधार होता है और मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है। फिटनेस की दुनिया में सालों से रोजाना 10,000 कदम चलने का नियम बेहद लोकप्रिय रहा है, लेकिन हाल ही में ‘जापानी वॉक’ तेजी से सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही है। दावा किया जा रहा है कि यह पारंपरिक वॉक से कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से पेट की चर्बी (Belly Fat) और वजन को कम करने में मददगार हो सकती है।
हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से शिक्षित कैलिफोर्निया स्थित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी ने वजन कम करने के इन दोनों तरीकों की वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर तुलना की और बताया फिट रहने के लिए दस हजार कदम चलना ज्यादा असरदार है या फिर जापानी वॉक। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि जापानी वॉक और दस हजार कदम चलना दोनों तरीके में कौन सा तरीका तेजी से वजन को घटाता है।
रोज़ 10,000 कदम चलने के क्या फायदे हैं?
रोजाना 10,000 कदम चलना फिटनेस का एक लोकप्रिय लक्ष्य माना जाता है, जो औसतन 7–8 किलोमीटर के बराबर होता है। नियमित रूप से इतनी वॉक करने से शरीर अधिक सक्रिय रहता है, कैलोरी तेजी से बर्न होती है और वजन कंट्रोल करना आसान होता है। वैज्ञानिक रिसर्च के मुताबिक रोजाना पर्याप्त कदम चलने से दिल की सेहत बेहतर होती है, हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है। टाइप-2 डायबिटीज और तनाव को कंट्रोल करने में वॉक असरदार साबित होती है।
2022 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में यूके के 78,430 वयस्कों के रोजाना कदमों और उनकी चलने की गति का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग नियमित रूप से अधिक कदम चलते थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम कम था। अध्ययन के अनुसार, प्रतिदिन करीब 9,800 कदम चलना डिमेंशिया के खतरे को कम करने से जुड़ा पाया गया। उम्र, फिटनेस, जोड़ों की समस्या और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार कदमों की संख्या अलग-अलग हो सकती है। इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार नियमित वॉक करना सबसे बेहतर तरीका माना जाता है।
जापानी वॉकिंग तकनीक क्या है?
जापानी इंटरवल वॉकिंग (Japanese Interval Walking) जापान में विकसित एक विशेष वॉकिंग तकनीक है जिसमें 3 मिनट तेज़ गति से चलने और 3 मिनट सामान्य या धीमी गति से चलने का क्रम लगभग 30 मिनट तक दोहराया जाता है। तेज और धीमी चाल के इस पैटर्न को ही इंटरवल वॉकिंग कहा जाता है।
वजन घटाने के लिए कौन-सा तरीका ज्यादा बेहतर है?
हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से शिक्षित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी के अनुसार वजन घटाने और फिटनेस के लिए जापानी इंटरवल वॉकिंग पारंपरिक 10,000 कदम चलने की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकती है। इस तकनीक में 3 मिनट सामान्य गति और 3 मिनट तेज़ गति से चलने का क्रम लगभग 30 मिनट तक दोहराया जाता है। इससे कम समय में शरीर की तीव्रता बढ़ती है, जिससे अधिक कैलोरी बर्न हो सकती है।
डॉ. के मुताबिक, नियमित रूप से इंटरवल वॉकिंग करने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने, दिल की कार्यक्षमता सुधारने, स्ट्रोक के जोखिम को कम करने, नींद की गुणवत्ता बेहतर बनाने और मूड में सुधार करने में मदद मिल सकती है। यह तकनीक जोड़ों पर अपेक्षाकृत कम दबाव डालती है, इसलिए कई लोगों के लिए इसे अपनाना आसान होता है। शुरुआत करने वालों को पहले 3 से 5 मिनट वार्म-अप करना चाहिए, फिर तेज और धीमी चाल के इंटरवल अपनाने चाहिए और अंत में 3-5 मिनट कूल-डाउन वॉक करनी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी चिकित्सा विशेषज्ञों के अध्ययनों, सामान्य फिटनेस गाइडलाइंस और डॉ. सौरभ सेठी के वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित है। वजन घटाना और फिटनेस एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है जो आपकी डाइट, उम्र और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करती है। जापानी इंटरवल वॉकिंग और 10,000 कदम चलना दोनों ही सेहत के लिए बेहतरीन हैं। हालांकि, यदि आप घुटनों या जोड़ों के दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या, दिल की बीमारी या किसी अन्य गंभीर चिकित्सीय स्थिति से जूझ रहे हैं, तो किसी भी नई वॉकिंग तकनीक या एक्सरसाइज को शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या प्रमाणित फिजियोथेरेपिस्ट से परामर्श जरूर लें। जनसत्ता इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता है।