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  • हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा: सकते हैं ये 9 जोखिम कारक, जानिए बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान

    हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा: सकते हैं ये 9 जोखिम कारक, जानिए बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान

    हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा: सकते हैं ये 9 जोखिम कारक, जानिए बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान

    नई दिल्ली: हार्ट अटैक को अक्सर उम्र बढ़ने से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन दिल की बीमारी का जोखिम सिर्फ उम्र पर निर्भर नहीं करता। धूम्रपान, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, खराब कोलेस्ट्रॉल, पेट के आसपास बढ़ती चर्बी और लंबे समय तक रहने वाला तनाव जैसे कई कारक हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

    INTERHEART अध्ययन में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हार्ट अटैक से जुड़े ऐसे जोखिम कारकों का अध्ययन किया गया था, जिनमें से कई को लाइफस्टाइल और उचित चिकित्सा देखभाल के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है।

    INTERHEART रिसर्च में क्या सामने आया?

    INTERHEART एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय केस-कंट्रोल स्टडी थी, जिसमें 52 देशों के प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य यह समझना था कि किन बदले जा सकने वाले जोखिम कारकों का संबंध हार्ट अटैक यानी मायोकार्डियल इन्फार्क्शन से है।

    इस अध्ययन में 15,000 से ज्यादा हार्ट अटैक के मरीजों और करीब 14,800 कंट्रोल प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। यह अध्ययन 2004 में The Lancet में प्रकाशित हुआ था।

    रिसर्च में सामने आए प्रमुख जोखिम कारकों में ये शामिल हैं:

    1. धूम्रपान और तंबाकू

    सिगरेट, बीड़ी और अन्य तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए नुकसानदायक हो सकता है। धूम्रपान छोड़ना हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    2. खून में असामान्य लिपिड्स

    खून में मौजूद कुछ लिपिड्स का असंतुलन हार्ट अटैक के जोखिम से जुड़ा पाया गया। INTERHEART अध्ययन में ApoB/ApoA1 ratio का मायोकार्डियल इन्फार्क्शन के साथ मजबूत संबंध देखा गया था।

    इसलिए समय-समय पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार कोलेस्ट्रॉल और अन्य लिपिड्स की जांच कराना उपयोगी हो सकता है।

    3. हाई ब्लड प्रेशर

    लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन दिल और रक्त वाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव डालता है। लंबे समय तक हाई बीपी रहने से हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

    ब्लड प्रेशर की नियमित जांच और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा व लाइफस्टाइल बदलावों का पालन करना जरूरी है।

    4. डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर

    लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा रहने से रक्त वाहिकाओं और हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। डायबिटीज वाले लोगों में हृदय रोग का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में अधिक हो सकता है।

    इसलिए ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच कराना महत्वपूर्ण है।

    5. पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी

    कमर और पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी सिर्फ वजन बढ़ने की समस्या नहीं है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ी हो सकती है, जो आगे चलकर हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।

    संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि वजन तथा कमर की चर्बी को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है।

    6. तनाव और मनोवैज्ञानिक कारक

    लंबे समय तक रहने वाला तनाव भी हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। INTERHEART अध्ययन में मनोवैज्ञानिक कारकों का संबंध हार्ट अटैक के जोखिम से देखा गया था।

    तनाव को कम करने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, योग या ध्यान जैसी स्वस्थ आदतें मददगार हो सकती हैं।

    7. खानपान की खराब आदतें

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए डाइट में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। वहीं अत्यधिक प्रोसेस्ड और असंतुलित भोजन का सेवन सीमित करना बेहतर है।

    सिर्फ किसी एक खाद्य पदार्थ को खाने से हार्ट अटैक का खतरा खत्म नहीं होता। पूरे

  • सहजन की पत्तियां सेहत: के लिए कितनी फायदेमंद? जानिए इसके पोषक तत्व, सेवन का तरीका और सावधानियां

    सहजन की पत्तियां सेहत: के लिए कितनी फायदेमंद? जानिए इसके पोषक तत्व, सेवन का तरीका और सावधानियां

    सहजन की पत्तियां सेहत: के लिए कितनी फायदेमंद? जानिए इसके पोषक तत्व, सेवन का तरीका और सावधानियां

    नई दिल्ली: सहजन यानी मोरिंगा को भारतीय खानपान में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसकी फलियों के साथ-साथ पत्तियों का भी सेवन किया जाता है। सहजन की पत्तियों में कैल्शियम, पोटैशियम, विटामिन ए और कई एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। इसी वजह से इसे पोषक आहार का हिस्सा माना जाता है।

    हालांकि, सहजन की पत्तियों को किसी बीमारी का इलाज समझना सही नहीं है। इनके कई स्वास्थ्य लाभों को लेकर आयुर्वेदिक मान्यताएं हैं और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में भी संभावित फायदे सामने आए हैं, लेकिन हर दावे के लिए मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

    सहजन की पत्तियों में कौन-कौन से पोषक तत्व होते हैं?

    सहजन की पत्तियों में कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। इनमें कैल्शियम, पोटैशियम, विटामिन ए और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक शामिल हैं। संतुलित डाइट में इन्हें शामिल करने से भोजन की पोषण गुणवत्ता बढ़ सकती है।

    सहजन की पत्तियों को सब्जी, सूप या अन्य व्यंजनों में शामिल किया जा सकता है। इन्हें सुखाकर पाउडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

    आयुर्वेद में सहजन की तासीर कैसी मानी जाती है?

    आयुर्वेदिक परंपरा में सहजन को लघु, रूक्ष और तीक्ष्ण गुणों वाला तथा गर्म तासीर का माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यह वात और कफ को संतुलित करने में मदद कर सकता है, जबकि अधिक सेवन से कुछ लोगों में पित्त से जुड़ी परेशानी बढ़ सकती है।

    अगर किसी व्यक्ति को पहले से शरीर में ज्यादा गर्मी, जलन या ऐसी ही समस्या रहती है, तो उसे इसका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए।

    पाचन के लिए सहजन की पत्तियां

    आयुर्वेद में सहजन की पत्तियों को पाचन और भूख से जुड़ी समस्याओं में उपयोगी माना गया है। इनमें मौजूद फाइबर भी पाचन तंत्र के लिए उपयोगी हो सकता है।

    हालांकि, पेट के कीड़ों या किसी पाचन संबंधी बीमारी का इलाज केवल सहजन के सेवन से किया जा सकता है, ऐसा मानना सही नहीं है। ऐसी समस्या होने पर उचित जांच और चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।

    वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ में संभावित फायदा

    सहजन की पत्तियां कम कैलोरी वाले पोषक खाद्य पदार्थों में शामिल की जा सकती हैं। इनमें मौजूद फाइबर और अन्य पोषक तत्व संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकते हैं।

    कुछ शुरुआती शोध मोरिंगा के सेवन और ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल या शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़े संभावित प्रभावों की ओर इशारा करते हैं, लेकिन इसे वजन घटाने या कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवा नहीं माना जा सकता।

    जोड़ों के लिए भी किया जाता है इस्तेमाल

    आयुर्वेदिक परंपरा में सहजन की पत्तियों का इस्तेमाल जोड़ों से जुड़ी परेशानी और सूजन में भी किया जाता रहा है। पत्तियों का लेप बाहरी रूप से लगाने की परंपरा भी कुछ जगहों पर मिलती है।

    लेकिन गठिया या लंबे समय से होने वाले जोड़ों के दर्द में केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से कारण की जांच कराना जरूरी है।

    सहजन पाउडर का सेवन कैसे करें?

    अगर आप सहजन के पत्तों का पाउडर इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इसकी मात्रा व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और डाइट पर निर्भर कर सकती है। किसी एक्सपर्ट की सलाह के अनुसार इसे कम मात्रा से शुरू किया जा सकता है।

    इसे गुनगुने पानी में मिलाकर लिया जाता है। इसके अलावा कुछ लोग इसे छाछ या भोजन में मिलाकर भी इस्तेमाल करते हैं।

    एक साथ ज्यादा मात्रा में सेवन करने से बचें, क्योंकि इससे कुछ लोगों को पेट संबंधी परेशानी या जलन हो सकती है।

    किन लोगों को सहजन के सेवन में सावधानी रखनी चाहिए?

    सहजन की पत्तियों को सामान्य भोजन की मात्रा में लेना ज्यादातर लोगों के लिए अलग बात है, लेकिन पाउडर, अर्क या सप्लीमेंट की अधिक मात्रा लेने से पहले सावधानी जरूरी है।

    खास तौर पर:

    • गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना सहजन के सप्लीमेंट या अर्क का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी अधिक मात्रा में सेवन से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
    • बच्चों को पाउडर या सप्लीमेंट देने से पहले डॉक्टर से पूछना बेहतर है।
    • जो लोग नियमित रूप से दवाएं लेते हैं, उन्हें सहजन के सप्लीमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
    • अत्यधिक सेवन से कुछ लोगों में पेट की परेशानी, जलन या अन्य असहजता हो सकती है।

    सहजन को डाइट में कैसे शामिल करें?

    सहजन की पत्तियों को रोजाना किसी बीमारी के इलाज के उद्देश्य से लेने के बजाय संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है। इन्हें सब्जी, दाल या सूप में शामिल करना एक आसान तरीका है।

    याद रखें कि किसी एक खाद्य पदार्थ को सुपरफूड मानकर अत्यधिक मात्रा में खाना जरूरी नहीं है। शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व संतुलित और विविध आहार से मिलते हैं।

    डिस्क्लेमर: सहजन की पत्तियों और पाउडर से जुड़े कई स्वास्थ्य लाभ आयुर्वेदिक मान्यताओं और शुरुआती या सीमित वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित हैं। इन्हें किसी बीमारी के इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा का विकल्प न मानें। गर्भावस्था, स्तनपान, बच्चों, किसी गंभीर बीमारी या नियमित दवाओं के सेवन की स्थिति में सहजन का पाउडर, अर्क या सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

  • खाने के बाद एक साथ: ज्यादा पानी पीने से पेट पर क्या असर होता है? जानिए भोजन और पानी का सही तरीका.

    खाने के बाद एक साथ: ज्यादा पानी पीने से पेट पर क्या असर होता है? जानिए भोजन और पानी का सही तरीका.

    खाने के बाद एक साथ: ज्यादा पानी पीने से पेट पर क्या असर होता है? जानिए भोजन और पानी का सही तरीका.

    नई दिल्ली: खाना खाने के साथ या उसके तुरंत बाद पानी पीना हमारी रोजमर्रा की आदत का हिस्सा है। कुछ लोग भोजन के बाद सिर्फ कुछ घूंट पानी पीते हैं, जबकि कुछ लोग एक साथ काफी ज्यादा पानी पी लेते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या खाना खाने के तुरंत बाद ज्यादा पानी पीने से पाचन खराब हो सकता है?

    विशेषज्ञों के मुताबिक, खाने के बाद पानी पीना अपने आप में नुकसानदायक नहीं है और इससे पाचन प्रक्रिया बंद नहीं होती। हालांकि, एक ही बार में बहुत अधिक पानी पीने से कुछ लोगों को पेट फूलना, भारीपन, डकार या असहजता जैसी समस्या हो सकती है। खासकर जिन लोगों को पहले से एसिड रिफ्लक्स या संवेदनशील पाचन तंत्र की परेशानी है, उन्हें ज्यादा तरल लेने पर दिक्कत महसूस हो सकती है।

    क्या खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीने से पाचन रुक जाता है?

    खाने के बाद पानी पीने से पाचन क्रिया रुकने की बात सही नहीं है। भोजन को पचाने के लिए पेट में गैस्ट्रिक जूस और डाइजेस्टिव एंजाइम काम करते हैं। सामान्य मात्रा में पानी पीने से ये प्रक्रियाएं बंद नहीं होतीं।

    बल्कि पानी भोजन को पेट की सामग्री के साथ मिलाने और पाचन तंत्र में आगे बढ़ने में मदद करता है। इसलिए प्यास लगने पर भोजन के बाद पानी पीने से पूरी तरह बचने की जरूरत नहीं है।

    एक साथ ज्यादा पानी पीने से क्यों हो सकता है भारीपन?

    अगर भोजन के तुरंत बाद बड़ी मात्रा में पानी पी लिया जाए तो पेट कुछ समय के लिए ज्यादा भरा हुआ महसूस हो सकता है। इससे कुछ लोगों को ब्लोटिंग, पेट में भारीपन, डकार या असहजता महसूस हो सकती है।

    यह समस्या हर व्यक्ति में नहीं होती। जिन लोगों का पाचन तंत्र संवेदनशील है या जिन्हें पहले से पेट संबंधी परेशानी रहती है, उन्हें इसका अनुभव ज्यादा हो सकता है।

    एसिड रिफ्लक्स वालों को हो सकती है परेशानी

    जिन लोगों को बार-बार एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स की समस्या होती है, उनके लिए भोजन के तुरंत बाद बहुत ज्यादा पानी या अन्य तरल पदार्थ लेने से परेशानी बढ़ सकती है।

    पेट में भोजन और तरल की मात्रा ज्यादा होने से कुछ परिस्थितियों में पेट का दबाव बढ़ सकता है, जिससे कुछ लोगों में एसिड ऊपर आने या सीने में जलन जैसी समस्या महसूस हो सकती है।

    क्या खाना खाने से पहले भी ज्यादा पानी पीना सही है?

    भोजन से ठीक पहले बहुत ज्यादा पानी पीने से पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है। इससे कुछ लोगों की भूख कम हो सकती है और वे सामान्य से कम भोजन कर सकते हैं।

    आयुर्वेद में भोजन से पहले और बाद में पानी की मात्रा और समय को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। हालांकि, इन्हें आधुनिक चिकित्सा के स्थापित नियमों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    खाने के बाद कितना पानी पीना चाहिए?

    खाने के बाद पानी पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। प्यास और शरीर की जरूरत के अनुसार पानी पी सकते हैं। अगर भोजन के बाद पानी पीने से आपको पेट फूलने या भारीपन की शिकायत होती है, तो एक साथ बड़ी मात्रा में पानी पीने के बजाय धीरे-धीरे और जरूरत के अनुसार पानी लेना बेहतर हो सकता है।

    साथ ही पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। पानी की जरूरत मौसम, शारीरिक गतिविधि, उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    क्या ध्यान रखें?

    • खाना खाने के बाद पानी पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है।
    • एक साथ बहुत ज्यादा पानी पीने से बचें, खासकर अगर इससे आपको असहजता होती है।
    • प्यास लगने पर जरूरत के अनुसार पानी पिएं।
    • एसिड रिफ्लक्स या लगातार ब्लोटिंग की समस्या रहती है तो डॉक्टर से सलाह लें।
    • पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत बनाए रखें।

    डिस्क्लेमर: खाना खाने के बाद पानी पीना पाचन को बंद नहीं करता। हालांकि, बहुत ज्यादा पानी एक साथ पीने से कुछ लोगों को असहजता या एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्या हो सकती है। यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है और किसी बीमारी के निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। लगातार पेट या पाचन संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लें।

  • हाथों में दिखने वाले ये बदलाव: हो सकते हैं हाई ब्लड शुगर के संकेत, जानें किन लक्षणों पर देनी चाहिए ध्यान.

    हाथों में दिखने वाले ये बदलाव: हो सकते हैं हाई ब्लड शुगर के संकेत, जानें किन लक्षणों पर देनी चाहिए ध्यान.

    हाथों में दिखने वाले ये बदलाव: हो सकते हैं हाई ब्लड शुगर के संकेत, जानें किन लक्षणों पर देनी चाहिए ध्यान.

    डायबिटीज या लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर शरीर के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। कुछ लोगों में इसके संकेत त्वचा, हाथों और उंगलियों पर भी दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, हाथों में किसी एक बदलाव का नजर आना डायबिटीज की पुष्टि नहीं करता। इसके लिए ब्लड शुगर की जांच जरूरी होती है।

    एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कुछ त्वचा संबंधी बदलाव इंसुलिन रेजिस्टेंस या लंबे समय से बढ़े हुए ब्लड शुगर के साथ देखे जा सकते हैं। ऐसे संकेत लगातार नजर आएं तो उन्हें नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    1. उंगलियों के जोड़ों का काला पड़ना

    अगर उंगलियों के जोड़ों की त्वचा सामान्य से ज्यादा गहरी, मोटी या मखमली दिखाई देने लगे तो यह इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ा हो सकता है। इस स्थिति को एकैंथोसिस नाइग्रिकन्स कहा जाता है।

    यह केवल हाथों पर ही नहीं, बल्कि गर्दन, बगल और शरीर की दूसरी जगहों पर भी दिखाई दे सकती है। हालांकि, भारतीय त्वचा में नकल्स का थोड़ा गहरा होना सामान्य भी हो सकता है। चिंता तब ज्यादा होती है जब रंग के साथ त्वचा मोटी या मखमली भी महसूस हो।

    2. हाथ या शरीर पर स्किन टैग्स

    स्किन टैग्स त्वचा पर दिखाई देने वाली छोटी और नरम लटकन जैसी संरचनाएं होती हैं। ये अक्सर गर्दन, बगल, पलकों और त्वचा की सिलवटों में दिखाई देती हैं।

    कुछ अध्ययनों में स्किन टैग्स और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध देखा गया है। हालांकि, स्किन टैग्स सिर्फ डायबिटीज के कारण नहीं होते। इसलिए इन्हें देखकर खुद से डायबिटीज की पुष्टि नहीं करनी चाहिए।

    3. उंगलियों का अटकना या लॉक होना

    अगर उंगली मोड़ने के बाद अटकती है और सीधी करते समय झटके से खुलती है, तो इसे ट्रिगर फिंगर कहा जा सकता है। डायबिटीज वाले लोगों में इस समस्या का जोखिम कुछ अधिक हो सकता है।

    इसमें उंगली में दर्द, जकड़न या उसे मोड़ने-सीधा करने में परेशानी हो सकती है। हालांकि, ट्रिगर फिंगर के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं।

    4. हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन

    लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा रहने पर नसों को नुकसान पहुंच सकता है, जिसे डायबिटिक न्यूरोपैथी कहा जाता है।

    इसमें हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन, सुन्नपन या चुभन जैसा महसूस हो सकता है। इसके लक्षण अक्सर पैरों से शुरू होते हैं और बाद में हाथों तक भी पहुंच सकते हैं।

    5. बिना चोट के फफोले

    डायबिटीज से जुड़ी एक दुर्लभ त्वचा समस्या बुलोसिस डायबिटिकरम है। इसमें बिना किसी स्पष्ट चोट या जलने के हाथों या पैरों पर फफोले दिखाई दे सकते हैं। ये फफोले कई बार दर्द रहित भी होते हैं।

    ऐसा फफोला दिखाई देने पर उसे खुद से फोड़ने से बचें और डॉक्टर से सलाह लें। डायबिटीज में त्वचा की चोट और संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।

    6. हाथों पर छोटे पीले दाने

    हाथों, कोहनी या शरीर के दूसरे हिस्सों पर अचानक छोटे-छोटे पीले या मोती जैसे दाने गुच्छों में दिखाई दें तो यह इरेक्टिव जैंथोमास हो सकता है।

    इनका संबंध खून में बहुत ज्यादा ट्राइग्लिसराइड्स से हो सकता है। ऐसे बदलाव दिखाई देने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है, क्योंकि बहुत ज्यादा ट्राइग्लिसराइड्स स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    हाथों के इन बदलावों पर कौन सी जांच कराएं?

    अगर हाथों की त्वचा में असामान्य बदलाव के साथ ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, थकान, नजर धुंधली होना या वजन में बिना वजह बदलाव जैसे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से ब्लड शुगर की जांच के बारे में बात करें।

    डायबिटीज और प्रीडायबिटीज की जांच के लिए आमतौर पर फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज और HbA1c जैसे टेस्ट इस्तेमाल किए जाते हैं। डॉक्टर आपकी स्थिति के अनुसार दूसरे टेस्ट भी बता सकते हैं।

    सिर्फ हाथ देखकर डायबिटीज की पुष्टि नहीं होती

    हाथों पर काले निशान, स्किन टैग्स, उंगलियों का अटकना या झुनझुनी कई अन्य कारणों से भी हो सकती है। इसलिए किसी एक लक्षण को देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि व्यक्ति को डायबिटीज है।

    अगर ऐसे बदलाव लगातार बने हुए हैं या उनके साथ दूसरे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। हाथों या त्वचा में दिखने वाले किसी भी बदलाव को डायबिटीज की पक्की पहचान न मानें। सही स्थिति जानने के लिए ब्लड शुगर की जांच और डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

  • बार-बार पेनकिलर और एंटीबायोटिक: लेने से किडनी पर पड़ सकता है असर, इन लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत.

    बार-बार पेनकिलर और एंटीबायोटिक: लेने से किडनी पर पड़ सकता है असर, इन लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत.

    बार-बार पेनकिलर और एंटीबायोटिक: लेने से किडनी पर पड़ सकता है असर, इन लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत.

    सिरदर्द, बदन दर्द या हल्का बुखार होने पर कई लोग बिना डॉक्टर से सलाह लिए पेनकिलर या एंटीबायोटिक लेना शुरू कर देते हैं। कभी-कभार सही दवा का इस्तेमाल आमतौर पर बड़ी समस्या नहीं होता, लेकिन लंबे समय तक या जरूरत से ज्यादा दवाओं का सेवन कुछ लोगों में किडनी समेत शरीर के दूसरे अंगों पर नुकसान का जोखिम बढ़ा सकता है।

    खासकर कुछ दर्द निवारक दवाएं, जैसे NSAIDs, किडनी में रक्त के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं कुछ एंटीबायोटिक्स भी कुछ परिस्थितियों में किडनी पर प्रतिकूल असर डाल सकती हैं। इसलिए इन दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार करना जरूरी है।

    पेनकिलर किडनी को कैसे प्रभावित कर सकती है?

    किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और शरीर में पानी व खनिजों का संतुलन बनाए रखने का काम करती है। कुछ पेनकिलर, खासकर NSAIDs, किडनी में रक्त प्रवाह को कम कर सकती हैं। इससे कुछ लोगों में किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।

    किडनी को नुकसान की खास बात यह है कि शुरुआती चरण में कई बार कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। समस्या का पता कभी-कभी ब्लड टेस्ट में क्रिएटिनिन बढ़ने के बाद चलता है।

    कितनी बार पेनकिलर लेना जोखिम बढ़ा सकता है?

    अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति कभी-कभार थोड़े समय के लिए डॉक्टर या दवा के निर्देश के अनुसार पेनकिलर लेता है तो जोखिम आमतौर पर कम होता है। लेकिन लंबे समय तक या बार-बार खुद से दवा लेने पर खतरा बढ़ सकता है।

    डिहाइड्रेशन, अधिक उम्र, पहले से किडनी की समस्या और कुछ अन्य बीमारियां इस जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को लगातार या बार-बार दर्द के लिए पेनकिलर की जरूरत पड़ रही है, तो दर्द की वजह जानने के लिए डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है नुकसानदायक

    हर बुखार या संक्रमण में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती। खासकर वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक आमतौर पर काम नहीं करतीं। इसके बावजूद कई लोग सर्दी-जुकाम या वायरल बीमारी में खुद से एंटीब

  • क्या मखाना खाने से कंट्रोल; रहता है ब्लड प्रेशर? वजन घटाने और दिल की सेहत में कितना फायदेमंद, जानिए

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल; रहता है ब्लड प्रेशर? वजन घटाने और दिल की सेहत में कितना फायदेमंद, जानिए

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल; रहता है ब्लड प्रेशर? वजन घटाने और दिल की सेहत में कितना फायदेमंद, जानिए

    मखाना आजकल हेल्दी स्नैक के तौर पर काफी पसंद किया जाता है। इसे लोग भूनकर या हल्के मसालों के साथ खाते हैं। इसमें फाइबर, प्रोटीन और कई तरह के मिनरल्स पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे वजन मैनेजमेंट से लेकर हार्ट हेल्थ और ब्लड प्रेशर के लिए उपयोगी डाइट का हिस्सा माना जाता है।

    हालांकि, मखाना अपने आप किसी बीमारी का इलाज नहीं करता। इसकी सही मात्रा और इसे किस तरह खाया जा रहा है, यह काफी मायने रखता है।

    दिल की सेहत के लिए क्यों उपयोगी हो सकता है मखाना?

    मखाने में पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं, जो शरीर के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट यौगिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं।

    इसके अलावा मखाने में फाइबर भी होता है। पर्याप्त फाइबर वाली डाइट कोलेस्ट्रॉल और दिल से जुड़े कुछ जोखिम कारकों को मैनेज करने में मदद कर सकती है।

    क्या मखाना हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है?

    मखाने में सोडियम अपेक्षाकृत कम हो सकता है और इसमें पोटैशियम तथा मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसलिए बिना ज्यादा नमक वाला मखाना हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों के लिए एक बेहतर स्नैक विकल्प हो सकता है।

    लेकिन सिर्फ मखाना खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल नहीं किया जा सकता। हाई बीपी की स्थिति में डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा, कम सोडियम वाली डाइट, नियमित व्यायाम और वजन को नियंत्रित रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

    वजन घटाने में कितना मददगार है?

    मखाना सीधे तौर पर वजन कम नहीं करता। हालांकि, अगर इसे ज्यादा कैलोरी वाले स्नैक्स जैसे तले हुए खाद्य पदार्थों की जगह सीमित मात्रा में लिया जाए तो यह कुल कैलोरी सेवन को मैनेज करने में मदद कर सकता है।

    इसमें मौजूद फाइबर और प्रोटीन कुछ समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकते हैं। इसलिए वजन कम करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भुना हुआ मखाना एक अच्छा स्नैक विकल्प हो सकता है।

    एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं मौजूद

    मखाने में कुछ एंटीऑक्सीडेंट और बायोएक्टिव कंपाउंड पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से निपटने में भूमिका निभा सकते हैं।

    हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि मखाना कैंसर, हार्ट डिजीज या उम्र से जुड़ी बीमारियों से बचाव की गारंटी देता है। किसी भी एक खाद्य पदार्थ को बीमारी की रोकथाम का विकल्प नहीं माना जा सकता।

    डायबिटीज में मखाना खा सकते हैं?

    डायबिटीज वाले लोग भी मखाने को डाइट में शामिल कर सकते हैं, लेकिन मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि इसमें कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं।

    बिना चीनी और कम नमक में भुना हुआ मखाना मीठे या तले हुए स्नैक्स की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है। डायबिटीज वाले लोगों को अपनी व्यक्तिगत डाइट और ब्लड शुगर के अनुसार मात्रा तय करनी चाहिए।

    मखाना खाने का सही तरीका क्या है?

    मखाने को हल्का भूनकर खाना एक आसान विकल्प है। इसमें ज्यादा नमक, घी, मक्खन या चीनी मिलाने से बचें, खासकर अगर आप ब्लड प्रेशर या वजन को लेकर सावधान हैं।

    इसे शाम के समय स्नैक के तौर पर सीमित मात्रा में लिया जा सकता है। अगर आप पहले से हाई बीपी, डायबिटीज या दिल की बीमारी की दवा लेते हैं, तो अपनी डाइट में बड़े बदलाव से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन की सलाह लेना बेहतर है।

    डिस्क्लेमर: मखाना पौष्टिक आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हार्ट डिजीज या किसी अन्य बीमारी का इलाज नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही डाइट और दवाओं में बदलाव करें।

  • मूली के साथ इन चीजों: का सेवन करने से बचने की सलाह, आयुर्वेद में बताया गया है विरुद्ध आहार का नियम.

    मूली के साथ इन चीजों: का सेवन करने से बचने की सलाह, आयुर्वेद में बताया गया है विरुद्ध आहार का नियम.

    मूली के साथ इन चीजों: का सेवन करने से बचने की सलाह, आयुर्वेद में बताया गया है विरुद्ध आहार का नियम.

    सर्दियों में मूली का सेवन काफी आम है। इसे सलाद, सब्जी और पराठे के साथ खाया जाता है। मूली में विटामिन C, फाइबर और कई एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो सामान्य तौर पर संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि, आयुर्वेद में कुछ खाद्य पदार्थों को एक साथ खाने से बचने की सलाह दी जाती है।

    आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. प्रताप चौहान के अनुसार, मूली को कुछ खाद्य पदार्थों के साथ लेने से पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है। आयुर्वेद में ऐसे खाद्य संयोजनों को ‘विरुद्ध आहार’ की अवधारणा से जोड़ा जाता है।

    आयुर्वेद में मूली की तासीर कैसी मानी गई है?

    आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार मूली की प्रकृति गर्म और तीखी मानी जाती है। इसे पाचन को बढ़ावा देने और कफ से जुड़े भारीपन को कम करने वाला खाद्य पदार्थ माना जाता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति का पाचन और स्वास्थ्य अलग होता है। इसलिए किसी भी खाद्य संयोजन का असर व्यक्ति की स्थिति और मात्रा पर निर्भर कर सकता है।

    1. मूली और संतरा

    आयुर्वेदिक सलाह के अनुसार मूली के साथ संतरे का सेवन करने से बचना चाहिए। इस संयोजन को अनुकूल नहीं माना जाता। हालांकि, इसके नुकसान को लेकर मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।

    2. मूली और करेला

    मूली और करेले को भी आयुर्वेद में एक साथ खाने से बचने की सलाह दी जाती है। दोनों के स्वाद और गुण अलग होने के कारण इस संयोजन को कुछ लोगों के लिए पाचन के लिहाज से भारी माना जाता है।

    3. मूली और दूध

    मूली के साथ दूध का सेवन भी आयुर्वेद में विरुद्ध आहार के उदाहरणों में बताया जाता है। अक्सर लोग मूली के पराठे या सब्जी के साथ दूध लेते हैं, लेकिन आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से इस संयोजन से बचने की सलाह दी जाती है।

    4. मूली और शहद

    आयुर्वेदिक मान्यताओं में मूली और शहद को भी एक साथ लेने से बचने की बात कही गई है। दोनों के गुणों में अंतर के कारण इस संयोजन को विरुद्ध आहार की श्रेणी में रखा जाता है।

    5. मूली और दही

    मूली के साथ दही खाने को लेकर भी आयुर्वेद में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। खासकर भोजन में मूली का सलाद और दही दोनों शामिल करने से बचने की सलाह कुछ आयुर्वेदिक विशेषज्ञ देते हैं।

    क्या मूली वाकई इन चीजों के साथ ‘जहर’ बन जाती है?

    ऐसा कहना सही नहीं होगा कि मूली इन खाद्य पदार्थों के साथ खाने पर ‘जहर’ बन जाती है। यह मुख्य रूप से आयुर्वेदिक ‘विरुद्ध आहार’ की अवधारणा से जुड़ी सलाह है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इन सभी संयोजनों को जहरीला या खतरनाक साबित करने वाले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

    अगर किसी व्यक्ति को मूली या किसी अन्य खाद्य पदार्थ को खाने के बाद बार-बार गैस, पेट दर्द, ब्लोटिंग, एसिडिटी या एलर्जी जैसी समस्या होती है, तो उसे अपनी डाइट पर ध्यान देना चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेनी चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है। इसमें बताई गई आयुर्वेदिक मान्यताओं को चिकित्सीय सलाह या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार न माना जाए। किसी बीमारी, एलर्जी या विशेष डाइट की स्थिति में डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लें।

  • क्या आंतों के बैक्टीरिया: बढ़ा सकते हैं अल्जाइमर का खतरा? नई रिसर्च में सामने आया गट-ब्रेन कनेक्शन.

    क्या आंतों के बैक्टीरिया: बढ़ा सकते हैं अल्जाइमर का खतरा? नई रिसर्च में सामने आया गट-ब्रेन कनेक्शन.

    क्या आंतों के बैक्टीरिया: बढ़ा सकते हैं अल्जाइमर का खतरा? नई रिसर्च में सामने आया गट-ब्रेन कनेक्शन.

    नई दिल्ली: हमारी आंतों में मौजूद खरबों सूक्ष्मजीव यानी गट माइक्रोबायोम सिर्फ पाचन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करते, बल्कि शरीर की इम्यूनिटी, मेटाबॉलिज्म और कई अन्य जैविक प्रक्रियाओं में भी भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आंतों के बैक्टीरिया और दिमाग के बीच मौजूद संबंध यानी गट-ब्रेन एक्सिस न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

    एक नए अध्ययन में आंतों के कुछ बैक्टीरिया से बनने वाले रसायन इमिडाजोल प्रोपियोनेट (Imidazole Propionate) और अल्जाइमर से जुड़े कुछ जैविक बदलावों के बीच संबंध पाया गया है। हालांकि, शोध से यह साबित नहीं होता कि यह रसायन अल्जाइमर रोग का कारण है। इस संबंध को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।

    क्या है इमिडाजोल प्रोपियोनेट?

    इमिडाजोल प्रोपियोनेट एक छोटा मॉलिक्यूल है, जिसे आंतों में मौजूद कुछ बैक्टीरिया प्रोटीन में पाए जाने वाले एक अमीनो एसिड के मेटाबॉलिज्म के दौरान बना सकते हैं।

    शोधकर्ताओं ने इंसानों और चूहों में इसके संभावित प्रभावों का अध्ययन किया। इंसानों में खून में इस रसायन के अधिक स्तर और अल्जाइमर से जुड़े कुछ जैविक संकेतकों के बीच संबंध देखा गया।

    करीब 1,200 लोगों के डेटा में क्या मिला?

    अध्ययन में 1,196 ऐसे वयस्कों को शामिल किया गया, जिन्हें अध्ययन के समय याददाश्त या सोचने-समझने से जुड़ी कोई स्पष्ट समस्या नहीं थी।

    शोधकर्ताओं ने पाया कि खून में ImP का स्तर अधिक होने वाले कुछ प्रतिभागियों ने याददाश्त और सोचने-समझने से जुड़े परीक्षणों में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन किया। इनमें अल्जाइमर से जुड़े कुछ जैविक संकेत भी अधिक देखे गए।

    शोध में आंतों के कुछ ऐसे बैक्टीरिया की भी पहचान की गई जो ImP बनाने से जुड़े थे।

    लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—किसी रसायन और बीमारी के बीच संबंध मिलना यह साबित नहीं करता कि वही रसायन बीमारी का कारण है। इसलिए खून में ImP का स्तर ज्यादा होने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को भविष्य में अल्जाइमर जरूर होगा।

    चूहों पर प्रयोग में क्या सामने आया?

    इस संभावित संबंध को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों पर भी प्रयोग किए। लंबे समय तक ImP के संपर्क में रहने वाले चूहों में अल्जाइमर से जुड़े कुछ जैविक बदलाव देखे गए।

    इनमें बीटा-एमिलॉयड और टाऊ प्रोटीन से संबंधित बदलाव शामिल थे। अल्जाइमर में बीटा-एमिलॉयड दिमाग में जमा होकर प्लाक बना सकता है, जबकि असामान्य टाऊ प्रोटीन तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर उलझी हुई संरचनाओं से जुड़ा होता है।

    शोधकर्ताओं को यह संकेत भी मिले कि ImP का संबंध ब्लड-ब्रेन बैरियर में होने वाले बदलावों से हो सकता है।

    क्या होता है ब्लड-ब्रेन बैरियर?

    ब्लड-ब्रेन बैरियर दिमाग की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। यह नियंत्रित करती है कि खून में मौजूद कौन-से पदार्थ दिमाग के ऊतकों तक पहुंच सकते हैं।

    इस सुरक्षा प्रणाली में बदलाव या इसकी कमजोरी को उम्र बढ़ने और कुछ न्यूरोलॉजिकल स्थितियों से जुड़ी प्रक्रियाओं के साथ देखा गया है। हालांकि, ImP और ब्लड-ब्रेन बैरियर के बीच संबंध को पूरी तरह समझने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी हैं।

    क्या प्रोबायोटिक्स लेने से अल्जाइमर से बच सकते हैं?

    अभी ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है कि किसी खास प्रोबायोटिक या एक-दो तरह के बैक्टीरिया का सेवन करने से अल्जाइमर का खतरा कम किया जा सकता है।

    गट माइक्रोबायोम बेहद जटिल होता है। इसमें मौजूद अलग-अलग बैक्टीरिया आपस में और शरीर के साथ कई तरह से प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए सिर्फ किसी एक बैक्टीरिया को बढ़ाने या घटाने से पूरे माइक्रोबायोम पर क्या असर पड़ेगा, यह निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है।

    इसी तरह, इस अध्ययन में ऐसा कोई विशेष भोजन या डाइट नहीं बताई गई है जो शरीर से ImP को पूरी तरह खत्म कर सके।

    अल्जाइमर के प्रमुख जोखिम कारक क्या हैं?

    अल्जाइमर को किसी एक बैक्टीरिया या रसायन से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। उम्र बढ़ना इसका सबसे प्रमुख ज्ञात जोखिम कारक है। इसके अलावा आनुवंशिक कारक, हृदय और रक्त वाहिकाओं की सेहत तथा जीवनशैली से जुड़े कई पहलू भी भूमिका निभा सकते हैं।

    हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, नींद की समस्या और संपूर्ण स्वास्थ्य जैसे कारकों पर ध्यान देना दिमाग और शरीर दोनों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है।

    गट-ब्रेन कनेक्शन पर अभी और रिसर्च की जरूरत

    यह अध्ययन आंतों के माइक्रोबायोम और दिमाग के बीच संभावित संबंध को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संकेत दे सकता है। अब शोधकर्ताओं के सामने कई सवाल हैं—कौन से बैक्टीरिया ज्यादा ImP बनाते हैं, वे ऐसा क्यों करते हैं और शरीर में इस रसायन की मात्रा किन परिस्थितियों में बढ़ती है।

    सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर शरीर में ImP का स्तर कम किया जाए, तो क्या अल्जाइमर से जुड़े मस्तिष्क के बदलावों में वास्तव में कमी आती है। इसका जवाब भविष्य के अध्ययनों से ही मिल सकेगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख वैज्ञानिक शोध के निष्कर्षों पर आधारित सामान्य स्वास्थ्य जानकारी है। अध्ययन में इमिडाजोल प्रोपियोनेट और अल्जाइमर से जुड़े कुछ जैविक बदलावों के बीच संबंध पाया गया है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ImP अल्जाइमर का कारण है या इसे कम करने से बीमारी को रोका जा सकता है। किसी भी सप्लीमेंट, प्रोबायोटिक या उपचार को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू न करें।

  • जीरो फिगर का ‘खतरनाक नशा’; 15 दिन की डाइट के बाद महिला का हुआ ऐसा हाल, लगी पेंगुइन की तरह चलने!

    जीरो फिगर का ‘खतरनाक नशा’; 15 दिन की डाइट के बाद महिला का हुआ ऐसा हाल, लगी पेंगुइन की तरह चलने!

    आज के समय में स्लिम और सुंदर दिखने की दीवानगी लोगों पर इस कदर हावी हो गई है कि वे अपनी सेहत की कीमत पर जानलेवा नुस्खे अपनाने से भी नहीं कतराते. हाल ही में चीन के हेनान प्रांत से एक ऐसी ही झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने सबको हैरान कर दिया है.

    क्या है पूरा मामला?

    5 फीट 3 इंच की एक 31 वर्षीय महिला का वजन 70 किलो था. उसे जल्दी वेट लॉस करना था. इसके लिए उसने ऐसा खतरनाक रास्ता चुना जिसने उससे उसका चलना-फिरना ही छीन लिया. महिला ने लगातार 15 दिनों तक बिना कुछ खाए सिर्फ पानी के सहारे रहने का फैसला किया. इस क्रैश डाइट से उसने 20 किलो वजन तो घटा लिया, लेकिन उसकी हालत ऐसी हो गई कि आज वह अपने पैरों पर ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही है और उसकी चाल बिल्कुल पेंगुइन जैसी हो गई है.

    जानलेवा बीमारी ‘वर्निके एन्सेफेलोपैथी’ का शिकार

    जीरो फिगर का ‘खतरनाक नशा’; 15 दिन की डाइट के बाद महिला का हुआ ऐसा हाल, लगी पेंगुइन की तरह चलने!

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जब हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो डॉक्टरों की रिपोर्ट देख पैरों तले जमीन खिसक गई. महिला को ‘वर्निके एन्सेफेलोपैथी’ (Wernicke Encephalopathy) नाम की गंभीर दिमागी बीमारी हो गई थी. यह बीमारी शरीर में विटामिन B1 की भारी कमी और अत्यधिक कुपोषण की वजह से होती है. इसकी चपेट में आने के बाद महिला को भ्रम होने लगा, याददाश्त कमजोर हो गई, आंखों को हिलाने में दिक्कत आने लगी और शरीर का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया.

    क्या कभी ठीक हो पाएगी उसकी चाल?

    डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखा रहने और पोषण न मिलने से महिला के नर्वस सिस्टम को बहुत गहरा नुकसान पहुंचा है. न्यूरोलॉजिस्ट का कहना है कि तमाम इलाज के बाद भी इस बात की आशंका है कि उसकी यह पेंगुइन जैसी चाल उम्रभर के लिए ऐसी ही बनी रह सकती है.

    सोशल मीडिया पर चल रहा ये खतरनाक ट्रेंड

    पूछताछ में पता चला कि वह महिला चीन की एक प्राचीन ताओवादी प्रथा ‘बिगु’ (Bigu) का पालन कर रही थी, जिसमें बिना खाना खाए सिर्फ हवा या ऊर्जा के सहारे जीने का दावा किया जाता है. आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे एक्सट्रीम वाटर फास्टिंग ट्रेंड्स धड़ल्ले से वायरल हो रहे हैं, जिन्हें देखकर लोग बिना सोचे-समझे अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं

  • सेक्स लाइफ को बेहतर बनाने के आसान तरीके, इन बातों का रखें ध्यान.

    सेक्स लाइफ को बेहतर बनाने के आसान तरीके, इन बातों का रखें ध्यान.

    सेक्स लाइफ को बेहतर बनाने के आसान तरीके, इन बातों का रखें ध्यान.

    कई कपल्स के लिए अच्छी सेक्स लाइफ सिर्फ शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं होती, बल्कि आपसी भरोसे, बातचीत, सहजता और एक-दूसरे की जरूरतों को समझने से जुड़ी होती है। अगर रिश्ते में दोनों पार्टनर अपनी पसंद-नापसंद खुलकर साझा करें और एक-दूसरे की सहमति का सम्मान करें, तो अंतरंगता का अनुभव बेहतर हो सकता है।

    आइए जानते हैं कुछ ऐसे सामान्य और सुरक्षित तरीके, जो कपल्स को अपनी सेक्स लाइफ बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

    1. सुरक्षित सेक्स को दें प्राथमिकता

    यौन संबंधों के दौरान सुरक्षा बेहद जरूरी है। कंडोम का नियमित और सही इस्तेमाल यौन संचारित संक्रमणों (STI) और अनचाही प्रेग्नेंसी के जोखिम को कम करने में मदद करता है।

    पार्टनर के साथ यौन स्वास्थ्य, पिछली मेडिकल हिस्ट्री और सुरक्षा से जुड़ी बातों पर खुलकर चर्चा करना भी जरूरी है। अगर किसी संक्रमण या गर्भनिरोध को लेकर चिंता है तो डॉक्टर या यौन स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर विकल्प है।

    2. अपने शरीर को लेकर सहज रहें

    अपने शरीर को लेकर असहजता या शर्मिंदगी का असर आत्मविश्वास और अंतरंग रिश्ते पर पड़ सकता है। इसलिए अपने शरीर को स्वीकार करना और उसके प्रति सकारात्मक नजरिया रखना महत्वपूर्ण है।

    हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और आकर्षण के लिए किसी खास शारीरिक मानक पर खरा उतरना जरूरी नहीं है। अपने शरीर और अपनी पसंद-नापसंद को समझना पार्टनर के साथ बेहतर संवाद में भी मदद कर सकता है।

    3. पार्टनर से खुलकर बातचीत करें

    अच्छी सेक्स लाइफ के लिए बातचीत सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है। पार्टनर को यह समझना जरूरी है कि आपको क्या अच्छा लगता है और किन चीजों से आप असहज महसूस करते हैं।

    बातचीत करते समय आरोप लगाने के बजाय अपनी भावनाओं को सामने रखें। उदाहरण के लिए, ‘तुम हमेशा ऐसा करते हो’ कहने की बजाय ‘मुझे ऐसा महसूस होता है…’ जैसे वाक्य ज्यादा सहज माहौल बना सकते हैं।

    4. पसंद और नापसंद साफ बताएं

    हर व्यक्ति की पसंद अलग हो सकती है। इसलिए पार्टनर से यह उम्मीद करना सही नहीं है कि वह बिना बताए आपकी जरूरतों को समझ जाएगा।

    जो चीज आपको पसंद है, उसके बारे में सकारात्मक तरीके से बताएं। वहीं, अगर कोई चीज आपको पसंद नहीं है तो बिना झिझक उसे स्पष्ट करें। सबसे जरूरी बात यह है कि दोनों पार्टनर एक-दूसरे की सीमाओं और सहमति का सम्मान करें।

    5. सहमति को सबसे ऊपर रखें

    किसी भी अंतरंग रिश्ते में दोनों लोगों की सहमति जरूरी है। अगर पार्टनर किसी गतिविधि के लिए मना करता है या असहज महसूस करता है तो तुरंत रुक जाना चाहिए।

    यह भी समझना जरूरी है कि चुप रहना हमेशा सहमति का संकेत नहीं होता। इसलिए स्पष्ट और सहज संवाद बनाए रखना बेहतर है। दोनों की इच्छा और आराम को प्राथमिकता देने से रिश्ता अधिक भरोसेमंद बनता है।

    6. जल्दबाजी से बचें

    अंतरंगता को केवल एक निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया न मानें। एक-दूसरे के साथ समय बिताना, बातचीत करना, गले लगना और किस करना जैसे स्नेहपूर्ण व्यवहार भी रिश्ते में नजदीकी बढ़ा सकते हैं।

    धीरे-धीरे आगे बढ़ने से दोनों पार्टनर ज्यादा सहज महसूस कर सकते हैं और एक-दूसरे की प्रतिक्रियाओं को बेहतर समझ सकते हैं।

    7. फोरप्ले को नजरअंदाज न करें

    फोरप्ले कई कपल्स के लिए अंतरंग अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। इसमें प्यार भरी बातचीत, किस करना, गले लगाना और एक-दूसरे के करीब आने जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं।

    इसमें जल्दबाजी करने की बजाय पार्टनर की सहजता और प्रतिक्रिया को समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

    8. जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेंट का इस्तेमाल करें

    अगर अंतरंगता के दौरान सूखापन या घर्षण के कारण असुविधा होती है, तो उपयुक्त व्यक्तिगत लुब्रिकेंट मददगार हो सकता है।

    लुब्रिकेंट चुनते समय उसके प्रकार और कंडोम के साथ उसकी अनुकूलता पर ध्यान दें। खासतौर पर लेटेक्स कंडोम के साथ ऑयल-बेस्ड लुब्रिकेंट इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कंडोम कमजोर होकर फट सकता है।

    अगर बार-बार दर्द, जलन या अत्यधिक सूखापन महसूस होता है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    9. पोर्न को वास्तविक जिंदगी का पैमाना न बनाएं

    पोर्नोग्राफिक कंटेंट मनोरंजन के लिए बनाया जाता है और उसमें दिखाई जाने वाली परिस्थितियां वास्तविक रिश्तों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।

    इसलिए अपनी सेक्स लाइफ की तुलना पोर्न से करना अवास्तविक उम्मीदें पैदा कर सकता है। वास्तविक रिश्ते में दोनों पार्टनर की सहमति, आराम, भावनाएं और संवाद ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

    10. रिश्ते में नयापन बनाए रखें

    लंबे समय तक साथ रहने वाले कपल्स के रिश्ते में कभी-कभी एक जैसी दिनचर्या आ सकती है। इसे बेहतर बनाने के लिए सेक्स के अलावा भी साथ में क्वालिटी टाइम बिताना, डेट पर जाना, बातचीत करना और रोमांटिक माहौल बनाना मददगार हो सकता है।

    किसी भी नई चीज को आजमाने से पहले दोनों पार्टनर की सहमति और सहजता जरूरी है।

    11. अपनी कल्पनाओं पर बातचीत कर सकते हैं

    अगर दोनों पार्टनर सहज हों तो वे अपनी रोमांटिक या अंतरंग इच्छाओं के बारे में बातचीत कर सकते हैं। इससे एक-दूसरे को बेहतर समझने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि, किसी भी ऐसी चीज के लिए दबाव नहीं होना चाहिए जिसे दूसरा व्यक्ति नहीं करना चाहता। ‘नहीं’ को स्वीकार करना उतना ही जरूरी है जितना ‘हां’ का सम्मान करना।

    12. सेक्स के दौरान पार्टनर की प्रतिक्रिया समझें

    अच्छी अंतरंगता सिर्फ अपनी जरूरतों पर ध्यान देने से नहीं बनती। पार्टनर की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है।

    अगर वह असहज, दर्द में या तनाव में दिखाई दे तो रुककर उससे पूछें कि वह ठीक है या नहीं। इससे दोनों के बीच भरोसा और सुरक्षा की भावना मजबूत होती है।

    13. लगातार समस्या हो तो डॉक्टर से मिलें

    कभी-कभी सेक्स लाइफ से जुड़ी परेशानियों के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकते हैं। पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन जैसी समस्या कुछ स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ी हो सकती है, जबकि महिलाओं में दर्द या लगातार योनि में सूखापन जैसी समस्याएं भी चिकित्सकीय कारणों से हो सकती हैं।

    ऐसी समस्या लगातार बनी रहे तो शर्माने की बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। कई यौन स्वास्थ्य समस्याओं का उपचार संभव है।

    14. जरूरत पड़ने पर कपल या सेक्स थेरेपिस्ट की मदद लें

    अगर बातचीत के बावजूद कपल अपनी अंतरंग जिंदगी से जुड़ी समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे हैं तो विशेषज्ञ की मदद ली जा सकती है।

    कपल थेरेपिस्ट या सेक्स थेरेपिस्ट रिश्ते में संवाद, भावनात्मक दूरी और अंतरंगता से जुड़ी परेशानियों को समझने में मदद कर सकते हैं।

    याद रखें

    बेहतर सेक्स लाइफ का मतलब किसी खास तकनीक या पोजीशन से नहीं है। इसकी नींव सहमति, सुरक्षा, आपसी सम्मान, संवाद और सहजता पर टिकी होती है। दोनों पार्टनर जितना खुलकर एक-दूसरे की जरूरतों को समझेंगे, उतना ही स्वस्थ और संतुष्ट रिश्ते की संभावना बढ़ेगी।