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  • खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ स्वादिष्ट खाना खाना ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि आपकी थाली में क्या शामिल है। ज्यादा तला-भुना भोजन, अतिरिक्त चीनी, जरूरत से ज्यादा नमक और लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि की कमी दिल की सेहत पर बुरा असर डाल सकती है। समय के साथ ये आदतें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती हैं, जो हृदय रोगों से जुड़ी हैं।

    दिल की धमनियों में जब वसा, कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थों से बना प्लाक जमा होने लगता है, तो उन्हें एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। इससे धमनियां संकरी हो सकती हैं। यदि प्लाक फट जाए और वहां खून का थक्का बन जाए, तो रक्त प्रवाह अचानक रुक सकता है और हार्ट अटैक हो सकता है। यह प्रक्रिया लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी आगे बढ़ सकती है।

    कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल झांजेर ने दिल की सेहत के लिए जीवनशैली में सुधार और जोखिम कारकों को नियंत्रित रखने पर जोर दिया है। आइए जानते हैं ऐसी 10 आदतें, जो हृदय रोगों का खतरा कम करने में मदद कर सकती हैं।

    1. कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर रखें नजर

    खून में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से धमनियों में प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना और उसके स्तर को नियंत्रित रखना जरूरी है।

    इसके लिए खाने में ओट्स, दालें, फल, सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे और फाइबर से भरपूर चीजें शामिल करें। घी, मक्खन, वसायुक्त मांस और अधिक सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें।

    कितनी बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराना चाहिए, यह आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों पर निर्भर करता है। इसके लिए डॉक्टर से सलाह लें।

    2. ट्राइग्लिसराइड बढ़ाने वाली आदतों से बचें

    ट्राइग्लिसराइड खून में पाया जाने वाला एक प्रकार का फैट है। इसका स्तर बढ़ने पर हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है, खासकर जब इसके साथ खराब कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज या मोटापे जैसी समस्याएं भी हों।

    ज्यादा मीठे पेय, मिठाइयां, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेने से ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ सकता है। इसलिए मीठे पेय और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। भोजन में संतुलन रखें और नियमित शारीरिक गतिविधि अपनाएं।

    3. रोजाना टहलें और शारीरिक रूप से सक्रिय रहें

    नियमित व्यायाम दिल की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। इससे ब्लड प्रेशर, वजन और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

    वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि की सलाह दी जाती है। उदाहरण के लिए, सप्ताह में पांच दिन 30 मिनट तेज चाल से चल सकते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार शुरुआत करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

    अगर आपको पहले से हृदय रोग है या व्यायाम के दौरान सीने में दर्द, सांस फूलने या चक्कर आने की समस्या होती है, तो व्यायाम शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।

    4. योग और प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करें

    योग और सांस से जुड़े कुछ अभ्यास तनाव कम करने, मन को शांत रखने और सामान्य स्वास्थ्य बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। नियमित योग से शारीरिक सक्रियता भी बढ़ सकती है।

    हालांकि, यह समझना जरूरी है कि योग या प्राणायाम धमनियों में मौजूद ब्लॉकेज को सीधे खत्म नहीं करते और न ही हार्ट अटैक से पूरी सुरक्षा की गारंटी देते हैं। इन्हें संतुलित आहार, व्यायाम और डॉक्टर की सलाह के साथ अपनाएं।

    5. तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश करें

    लंबे समय तक तनाव में रहने से नींद, खानपान और ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकते हैं। तनाव के दौरान कुछ लोग ज्यादा खाते

  • कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    मुंह और गले के कैंसर की रोकथाम और इलाज के क्षेत्र में वैज्ञानिक लगातार नए तरीकों पर काम कर रहे हैं। इसी दिशा में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के शोधकर्ताओं ने एक खास बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर अध्ययन किया है। शुरुआती शोध में इस गम से जुड़े तत्वों ने मुंह के नमूनों में कुछ कैंसर-संबंधी संक्रमणों और बैक्टीरिया के स्तर को कम करने की क्षमता दिखाई। हालांकि, इसे कैंसर का इलाज या बीमारी से बचाव का प्रमाणित तरीका मानना अभी सही नहीं होगा।

    यह शोध इसलिए चर्चा में है क्योंकि सामान्य च्युइंग गम की तरह इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद के जरिए मुंह में मौजूद कुछ खास सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाने की संभावना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस तकनीक की प्रभावशीलता और सुरक्षा को समझने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी हैं।

    क्या है यह खास बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम?

    शोधकर्ताओं ने लैब में तैयार की गई एक खास गम पर काम किया, जो लैबलैब बीन्स (Lablab beans) से जुड़े प्रोटीन FRIL का इस्तेमाल करती है। इस प्रोटीन में कुछ वायरस से जुड़ने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता का अध्ययन किया गया है।

    शोध का उद्देश्य मुंह में मौजूद ऐसे सूक्ष्मजीवों को कम करना है, जिनका संबंध सिर और गर्दन के कुछ कैंसर या उनके परिणामों से पाया गया है। वैज्ञानिक यह भी देख रहे हैं कि क्या इस तरीके से मुंह में मौजूद उपयोगी बैक्टीरिया को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखा जा सकता है।

    रिसर्च में किन तीन माइक्रोब्स पर ध्यान दिया गया?

    अध्ययन में तीन प्रमुख सूक्ष्मजीवों पर ध्यान दिया गया:

    • ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV): HPV के कुछ प्रकार गले के ऊपरी हिस्से के कैंसर, खासकर ऑरोफैरिंक्स के कैंसर, से जुड़े हैं। हालांकि, HPV संक्रमण होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर हो ही जाएगा।
    • Porphyromonas gingivalis (Pg): यह बैक्टीरिया मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है। कुछ शोधों में इसका संबंध मुंह और दूसरे कैंसरों से भी देखा गया है, लेकिन संबंध पाए जाने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि बैक्टीरिया सीधे कैंसर पैदा करता है।
    • Fusobacterium nucleatum (Fn): यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जा सकता है और मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है। इसके कुछ कैंसरों के साथ संबंध पर भी वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं।

    इन सूक्ष्मजीवों पर शोध का उद्देश्य कैंसर से जुड़े जोखिमों और संक्रमण की भूमिका को बेहतर समझना है।

    अध्ययन में HPV का स्तर कितना कम हुआ?

    शोध में बताए गए परिणामों के अनुसार, बीन गम से प्राप्त तत्वों के इस्तेमाल के बाद लार के नमूनों में HPV का स्तर लगभग 93 प्रतिशत तक और माउथ-रिंस नमूनों में करीब 80 प्रतिशत तक कम पाया गया।

    इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने प्रोटेग्रिन नामक एक एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड के साथ Pg और Fn बैक्टीरिया पर प्रभाव का भी अध्ययन किया। प्रयोगों में इन बैक्टीरिया के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई।

    यहां एक अहम बात समझना जरूरी है: नमूनों में किसी वायरस या बैक्टीरिया का स्तर कम होना, शरीर में कैंसर का खत्म हो जाना या भविष्य में कैंसर न होने की गारंटी नहीं है। ये परिणाम शुरुआती शोध के संकेत हैं, जिन्हें वास्तविक मरीजों में आगे जांचने की जरूरत है।

    क्या यह च्युइंग गम मुंह के अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखती है?

    शोधकर्ताओं की दिलचस्पी ऐसे तरीके विकसित करने में है, जो हानिकारक माने जाने वाले खास सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाएं और मुंह के सामान्य माइक्रोबायोम पर कम असर डालें। शुरुआती प्रयोगों में कुछ उपयोगी सूक्ष्मजीवों को सुरक्षित रखने की संभावना दिखाई गई।

    हालांकि, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि यह गम हर व्यक्ति के मुंह में सभी अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखेगी। इसके लिए अधिक विस्तृत और स्वतंत्र क्लिनिकल अध्ययनों की जरूरत होगी।

    सिर और गर्दन के कैंसर के लिए यह शोध क्यों महत्वपूर्ण है?

    सिर और गर्दन के कैंसर में मुंह, गले और आसपास के कुछ हिस्सों में होने वाले कैंसर शामिल हैं। इन बीमारियों का उपचार कैंसर के प्रकार और उसकी अवस्था के अनुसार सर्जरी, रेडिएशन, दवाओं या अन्य तरीकों से किया जा सकता है।

    HPV संक्रमण कुछ प्रकार के गले के कैंसर का महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। वहीं, Pg और Fn जैसे बैक्टीरिया की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक अभी अध्ययन कर रहे हैं। यदि भविष्य में इस तरह की तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो इसे मौजूदा चिकित्सा के साथ सहायक उपाय के रूप में परखने की संभावना हो सकती है।

    फिलहाल इस गम को कैंसर का प्रमाणित इलाज या कैंसर रोकने का स्थापित उपाय नहीं माना जाना चाहिए। इसकी प्रभावशीलता, सही खुराक, लंबे समय की सुरक्षा और वास्तविक मरीजों पर असर की पुष्टि के लिए आगे के क्लिनिकल परीक्षण आवश्यक हैं।

    मुंह के कैंसर से बचाव के लिए अभी क्या करें?

    किसी नई तकनीक के उपलब्ध होने का इंतजार करने के बजाय मुंह की सेहत और कैंसर के ज्ञात जोखिमों पर ध्यान देना जरूरी है।

    • तंबाकू, गुटखा, खैनी और सुपारी से दूर रहें।
    • शराब का सेवन न करें या इससे बचें, क्योंकि यह मुंह और गले के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकती है।
    • नियमित रूप से दांतों और मसूड़ों की सफाई करें और जरूरत के अनुसार दंत चिकित्सक से जांच कराएं।
    • पात्रता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार HPV टीकाकरण पर विचार करें।
    • मुंह में लंबे समय तक रहने वाला घाव, सफेद या लाल धब्बा, गांठ, निगलने में परेशानी या आवाज में लगातार बदलाव हो, तो डॉक्टर या दंत विशेषज्ञ से जांच कराएं।

    निष्कर्ष: बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर हुआ शोध कैंसर से जुड़े कुछ वायरस और बैक्टीरिया को निशाना बनाने की एक संभावित नई दिशा दिखाता है। शुरुआती प्रयोगों में HPV के स्तर में कमी देखी गई, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि इस गम से कैंसर ठीक हो सकता है या इसे रोका जा सकता है। इसे फिलहाल शोध के शुरुआती नतीजों के रूप में ही देखना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं। शोध में मिले शुरुआती परिणामों को प्रमाणित उपचार न समझें। मुंह या गले से जुड़ी किसी समस्या के लिए योग्य डॉक्टर से सलाह लें और निर्धारित कैंसर उपचार को किसी अप्रमाणित उत्पाद से न बदलें।

  • गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बलगम जमा होना, बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस होना या सुबह उठते ही खांसी आना कई लोगों की आम परेशानी है। बलगम यानी म्यूकस शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा है। यह नाक, गले और सांस की नलियों को नम रखने के साथ धूल, कीटाणुओं और दूसरे बाहरी कणों को बाहर निकालने में मदद करता है। लेकिन जब बलगम ज्यादा महसूस होने लगे या गाढ़ा होकर गले में अटकने लगे, तो रोजमर्रा के कामों में परेशानी हो सकती है।

    सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और नाक से गले की ओर म्यूकस बहने जैसी स्थितियां इसकी वजह हो सकती हैं। कुछ लोगों को खानपान की कुछ चीजों से भी परेशानी महसूस होती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं है कि हर व्यक्ति में कुछ खास खाद्य पदार्थ सीधे बलगम का उत्पादन बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए और राहत पाने के लिए क्या किया जा सकता है।

    1. दूध और डेयरी उत्पाद

    दूध, पनीर, दही और चीज जैसे डेयरी उत्पादों को अक्सर बलगम बढ़ने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह साबित नहीं करते कि दूध सामान्य रूप से शरीर में बलगम का उत्पादन बढ़ाता है।

    कुछ लोगों को दूध पीने के बाद मुंह या गले में गाढ़ी परत जैसा एहसास हो सकता है। यह दूध की बनावट के कारण भी हो सकता है, न कि वास्तव में बलगम बनने की मात्रा बढ़ने के कारण।

    अगर आपको लगता है कि किसी खास डेयरी उत्पाद से परेशानी बढ़ती है, तो अपने लक्षणों पर ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से सलाह लें। बिना कारण दूध और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थों को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है।

    2. ज्यादा चीनी और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ

    मिठाइयां, मीठे पेय, बिस्कुट और ज्यादा चीनी वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थ सीमित मात्रा में खाना बेहतर है। इनमें से कई चीजों में अतिरिक्त चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

    हालांकि, यह दावा कि चीनी खाते ही बलगम बढ़ जाता है या शरीर में पानी की कमी होने लगती है, सभी लोगों के लिए सही नहीं है। बलगम की परेशानी को केवल चीनी से जोड़ने के बजाय अपने संपूर्ण खानपान, पानी के सेवन और दूसरे लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए।

    3. तली-भुनी चीजें और ज्यादा वसा वाला भोजन

    समोसे, पकौड़े, फ्रेंच फ्राइज और बहुत ज्यादा वसा वाले भोजन को नियमित रूप से अधिक मात्रा में खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि तली-भुनी चीजें सीधे बलगम का उत्पादन बढ़ाती हैं।

    कुछ लोगों में भारी या तैलीय भोजन एसिड रिफ्लक्स की परेशानी बढ़ा सकता है। एसिड रिफ्लक्स में पेट का एसिड गले तक पहुंचने से खांसी, गले में जलन या बार-बार गला साफ करने की समस्या हो सकती है। यदि खाने के बाद ऐसे लक्षण बढ़ते हैं, तो भोजन की मात्रा कम रखना और खाने के तुरंत बाद न लेटना मददगार हो सकता है।

    4. रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट

    बीफ, पोर्क और लैम्ब जैसे रेड मीट के साथ-साथ सॉसेज और बेकन जैसे प्रोसेस्ड मीट का अधिक सेवन सीमित रखना बेहतर है। खासकर प्रोसेस्ड मीट का नियमित अधिक सेवन कई स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है।

    हालांकि, रेड मीट खाने से सीधे बलगम ज्यादा बनने लगता है, इसका ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यदि आपको गले में बलगम की शिकायत है, तो केवल मीट को दोष देने के बजाय एलर्जी, संक्रमण, साइनस और एसिड रिफ्लक्स जैसे संभावित कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    5. चाय, कॉफी और अल्कोहल

    चाय और कॉफी में कैफीन होता है। सामान्य मात्रा में कैफीन लेने से हर व्यक्ति में शरीर में पानी की कमी नहीं होती, लेकिन बहुत अधिक कैफीन लेने से कुछ लोगों को परेशानी हो सकती है। अल्कोहल का सेवन भी कुछ लोगों में गले में जलन या एसिड रिफ्लक्स के लक्षण बढ़ा सकता है।

    यदि चाय, कॉफी या अल्कोहल लेने के बाद गले में परेशानी महसूस होती है, तो इसकी मात्रा कम करके देखें। पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, क्योंकि शरीर में पानी की कमी होने पर म्यूकस गाढ़ा महसूस हो सकता है।

    बलगम कम करने के लिए क्या करें?

    पर्याप्त पानी पिएं

    दिनभर नियमित रूप से पानी पीते रहें। पर्याप्त तरल पदार्थ म्यूकस को कम गाढ़ा रखने में मदद कर सकते हैं, जिससे उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। जरूरत हर व्यक्ति की उम्र, गतिविधि, मौसम और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकती है।

    गर्म पेय से मिल सकती है राहत

    गुनगुना पानी या गर्म सूप गले को आराम दे सकता है। अदरक या पुदीने की चाय भी कुछ लोगों को सुखद लग सकती है, लेकिन इन्हें बलगम का प्रमाणित इलाज नहीं मानना चाहिए।

    नाक की सफाई पर ध्यान दें

    यदि नाक से म्यूकस गले में गिरता रहता है, तो सलाइन नेजल स्प्रे या सलाइन से नाक की सफाई कुछ लोगों को राहत दे सकती है। नाक धोने के लिए केवल स्टेराइल, डिस्टिल्ड या उबालकर ठंडा किया हुआ पानी इस्तेमाल करें। सामान्य नल का पानी सीधे नाक में इस्तेमाल न करें।

    भाप लेते समय सावधानी बरतें

    गर्म भाप से कुछ लोगों को अस्थायी आराम महसूस हो सकता है, लेकिन उबलते पानी के बर्तन के ऊपर झुककर भाप लेना जलने का जोखिम पैदा करता है। इसलिए इस तरीके से बचें। कमरे में हवा की नमी उचित रखना या गर्म शॉवर लेना अधिक सुरक्षित विकल्प हो सकता है। यूकेलिप्टस या दूसरे एसेंशियल ऑयल हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं होते और संवेदनशील लोगों में जलन पैदा कर सकते हैं।

    शहद का इस्तेमाल कब करें?

    एक साल से अधिक उम्र के लोगों में शहद खांसी को कुछ हद तक शांत करने में मदद कर सकता है। लेकिन एक साल से कम उम्र के बच्चों को शहद बिल्कुल न दें। डायबिटीज वाले लोग शहद को भी चीनी के स्रोत के रूप में ध्यान में रखें।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

    यदि बलगम लंबे समय तक बना रहे, बार-बार लौट आए या उसके साथ अन्य लक्षण हों, तो चिकित्सकीय जांच कराना उचित है। खासकर इन स्थितियों में डॉक्टर से सलाह लें:

    • कई सप्ताह तक खांसी या बलगम बना रहना।
    • बार-बार बुखार आना या सीने में दर्द होना।
    • बलगम में खून दिखाई देना।
    • बिना वजह वजन कम होना या लगातार कमजोरी महसूस होना।
    • सांस लेने में परेशानी होना।

    यदि सांस लेने में गंभीर कठिनाई हो या सीने में तेज दर्द हो, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।

    निष्कर्ष

    गले में बलगम जमा होने की वजह हमेशा खानपान नहीं होती। सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और एसिड रिफ्लक्स भी इसके कारण हो सकते हैं। दूध, चीनी या तली-भुनी चीजों को सभी लोगों के लिए बलगम बढ़ाने वाला मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। बेहतर है कि संतुलित भोजन करें, पर्याप्त पानी पिएं और जिन चीजों से व्यक्तिगत रूप से परेशानी बढ़ती है, उन पर ध्यान दें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं। बलगम या खांसी लंबे समय तक बनी रहे, बढ़ती जाए या सांस लेने में परेशानी हो, तो योग्य डॉक्टर से परामर्श लें। अपनी डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले भी स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

  • क्या गेहूं की रोटी सच में सेहत बिगाड़ती है? जानें ग्लूटेन के फायदे, नुकसान और किन लोगों को इससे बचना चाहिए.

    क्या गेहूं की रोटी सच में सेहत बिगाड़ती है? जानें ग्लूटेन के फायदे, नुकसान और किन लोगों को इससे बचना चाहिए.

    क्या गेहूं की रोटी सच में सेहत बिगाड़ती है? जानें ग्लूटेन के फायदे, नुकसान और किन लोगों को इससे बचना चाहिए.

    भारतीय खानपान में गेहूं की रोटी रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा है। लेकिन पिछले कुछ समय से ग्लूटेन-फ्री डाइट का चलन बढ़ा है। सोशल मीडिया पर कई बार दावा किया जाता है कि गेहूं का सेवन पेट की समस्याओं से लेकर दूसरी बीमारियों तक की वजह बन सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हर किसी के लिए ग्लूटेन नुकसानदायक है या फिर कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियों में ही इससे परहेज करना जरूरी होता है?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लूटेन को सभी लोगों के लिए हानिकारक मानना सही नहीं है। ज्यादातर लोग इसे बिना किसी परेशानी के खा सकते हैं, जबकि कुछ लोगों को इससे जुड़ी विशेष बीमारियां या संवेदनशीलता हो सकती है। इसलिए बिना सही जानकारी के गेहूं की रोटी छोड़ने के बजाय ग्लूटेन से जुड़ी वास्तविकता समझना जरूरी है।

    ग्लूटेन क्या है और किन चीजों में पाया जाता है?

    ग्लूटेन प्रोटीन का एक समूह है, जो गेहूं, जौ और राई जैसे अनाजों में पाया जाता है। यह आटे को लचीलापन और संरचना देने में मदद करता है। इसी वजह से गेहूं से बनी रोटी और ब्रेड की बनावट खास होती है।

    ग्लूटेन केवल रोटी तक सीमित नहीं है। यह ब्रेड, पास्ता, नूडल्स, कुछ नाश्ते के सीरियल और कई पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में भी मौजूद हो सकता है। कुछ सॉस और तैयार खाद्य उत्पादों में भी ग्लूटेन वाले घटक इस्तेमाल किए जाते हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर उत्पाद का लेबल पढ़ना जरूरी है।

    क्या गेहूं की रोटी से हर किसी को नुकसान होता है?

    नहीं। अधिकांश स्वस्थ लोगों के लिए गेहूं की रोटी संतुलित आहार का हिस्सा हो सकती है। साबुत गेहूं से बनी रोटी में फाइबर, प्रोटीन और कुछ जरूरी विटामिन व खनिज पाए जाते हैं। फाइबर पाचन को बेहतर रखने और सामान्य मल त्याग में मदद करता है, जबकि प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों और ऊतकों के रखरखाव के लिए जरूरी है।

    हालांकि, रोटी से मिलने वाले पोषक तत्वों की मात्रा उसके आकार, आटे की मात्रा और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है। केवल रोटी खाने से ही फाइबर या प्रोटीन की दैनिक जरूरत पूरी नहीं होती। दाल, सब्जियां, फल, दूध या अन्य उपयुक्त प्रोटीन स्रोतों के साथ संतुलित भोजन करना अधिक फायदेमंद है।

    किन लोगों के लिए ग्लूटेन नुकसानदायक हो सकता है?

    कुछ स्वास्थ्य स्थितियों में ग्लूटेन से परहेज करना जरूरी हो सकता है। इनमें प्रमुख हैं:

    1. सीलिएक डिजीज

    सीलिएक डिजीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें ग्लूटेन का सेवन करने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत की परत को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे पोषक तत्वों के अवशोषण में परेशानी हो सकती है।

    इसके संभावित लक्षणों में पेट फूलना, दस्त, पेट दर्द, वजन कम होना, थकान और खून की कमी शामिल हैं। कुछ लोगों में स्पष्ट पाचन संबंधी लक्षण न होने पर भी यह बीमारी मौजूद हो सकती है।

    सीलिएक डिजीज की पुष्टि के लिए डॉक्टर रक्त जांच और जरूरत पड़ने पर अन्य परीक्षण कराने की सलाह दे सकते हैं। इसका निदान होने पर आमतौर पर जीवनभर सख्त ग्लूटेन-फ्री डाइट अपनानी पड़ती है।

    2. नॉन-सीलिएक ग्लूटेन सेंसिटिविटी

    कुछ लोगों को गेहूं या ग्लूटेन वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद पेट फूलने, पेट दर्द, थकान या अन्य परेशानियों का अनुभव हो सकता है, लेकिन जांच में सीलिएक डिजीज नहीं मिलती।

    इसे नॉन-सीलिएक ग्लूटेन सेंसिटिविटी कहा जा सकता है। हालांकि, ऐसे लक्षणों की वजह हमेशा ग्लूटेन ही नहीं होता। गेहूं में मौजूद कुछ कार्बोहाइड्रेट, जिन्हें FODMAPs कहा जाता है, भी कुछ लोगों में गैस और पेट फूलने की समस्या बढ़ा सकते हैं। इसलिए सही कारण पहचानने के लिए चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।

    3. गेहूं से एलर्जी

    गेहूं से एलर्जी ग्लूटेन से जुड़ी दूसरी समस्याओं से अलग है। इसमें गेहूं के कुछ प्रोटीन के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिक्रिया कर सकती है। लक्षणों में त्वचा पर खुजली, पित्ती, उल्टी या सांस लेने में परेशानी शामिल हो सकती है।

    यदि गेहूं खाने के बाद सांस लेने में कठिनाई, गले में सूजन या गंभीर एलर्जी के लक्षण हों, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।

    क्या आधुनिक गेहूं में ग्लूटेन ज्यादा होने के कारण बीमारियां बढ़ रही हैं?

    कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि आधुनिक गेहूं में ग्लूटेन की मात्रा पहले की तुलना में बहुत बढ़ गई है और इसी वजह से लोगों में पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। लेकिन इस दावे को सभी लोगों और सभी किस्मों के गेहूं पर लागू करने के लिए पर्याप्त ठोस प्रमाण नहीं हैं।

    गेहूं की अलग-अलग किस्मों में प्रोटीन की मात्रा अलग हो सकती है। इसके अलावा व्यक्ति की आनुवंशिक बनावट, आंतों की स्थिति, भोजन की आदतें और अन्य स्वास्थ्य कारक भी लक्षणों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हर स्वास्थ्य समस्या का कारण आधुनिक गेहूं या ग्लूटेन को मानना सही नहीं है।

    क्या स्वस्थ लोगों को भी ग्लूटेन-फ्री डाइट अपनानी चाहिए?

    यदि किसी व्यक्ति को सीलिएक डिजीज, गेहूं से एलर्जी या ग्लूटेन से जुड़ी प्रमाणित समस्या नहीं है, तो केवल ट्रेंड देखकर ग्लूटेन छोड़ना आमतौर पर जरूरी नहीं होता।

    बिना जरूरत ग्लूटेन-फ्री डाइट अपनाने से कुछ परेशानियां हो सकती हैं:

    • फाइबर की कमी: यदि साबुत गेहूं की जगह कम फाइबर वाले विकल्प ले लिए जाएं, तो भोजन में फाइबर कम हो सकता है।
    • पोषक तत्वों की कमी: कुछ ग्लूटेन-फ्री उत्पादों में आयरन, विटामिन बी समूह और अन्य पोषक तत्व कम हो सकते हैं।
    • अधिक खर्च: पैकेटबंद ग्लूटेन-फ्री खाद्य पदार्थ कई बार महंगे होते हैं।
    • **खानपान में अनावश्यक प्रतिब
  • रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    नई दिल्ली: आजकल खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, बढ़ता वजन और हाई कोलेस्ट्रॉल दिल की सेहत के लिए बड़ी चिंता बन चुके हैं। ऐसे में डाइट में कौन-सी चीजें शामिल की जाएं, इसे लेकर लगातार रिसर्च सामने आती रहती हैं। एक नई स्टडी में एवोकाडो को लेकर दिलचस्प जानकारी सामने आई है।

    रिसर्च के मुताबिक, पेट के आसपास मोटापे की समस्या से जूझ रहे लोगों ने करीब 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाया तो उनके LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं ने इस बदलाव के आधार पर हृदय रोग के जोखिम में करीब 4% की संभावित कमी का अनुमान लगाया।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रोज एक एवोकाडो खाने से हार्ट अटैक या स्ट्रोक से बचाव की गारंटी मिल जाती है। अध्ययन में वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक की घटनाओं को कम होते हुए सीधे नहीं मापा गया था।

    786 लोगों पर की गई स्टडी

    इस रिसर्च में 25 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 786 वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों में पेट के आसपास मोटापे की समस्या थी।

    अध्ययन में पुरुषों की कमर का आकार करीब 40 इंच या उससे अधिक और महिलाओं की कमर करीब 35 इंच या उससे अधिक थी। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह ने अपनी सामान्य डाइट जारी रखी, जबकि दूसरे समूह को 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाने के लिए कहा गया।

    अध्ययन के अंत में एवोकाडो खाने वाले समूह में LDL से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। वहीं, शरीर के वजन और कमर की चौड़ाई में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया।

    LDL के कणों में बदलाव क्यों है महत्वपूर्ण?

    LDL को आमतौर पर बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। खून में LDL का अधिक स्तर धमनियों में प्लाक बनने से जुड़ा हुआ है, जिससे समय के साथ हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

    रिसर्च में एवोकाडो खाने वाले लोगों में LDL से जुड़े कणों में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के बदलाव हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

    लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि LDL कणों में बदलाव और वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक में कमी एक ही बात नहीं है। इसके लिए लंबे समय तक बड़े स्तर पर और ऐसे अध्ययन जरूरी हैं जिनमें वास्तविक हृदय संबंधी घटनाओं को देखा जाए।

    एवोकाडो में क्या खास होता है?

    एवोकाडो में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट, फाइबर, फाइटोस्टेरॉल्स, विटामिन ई और विभिन्न पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक शामिल हैं।

    इसमें मौजूद फाइबर और हेल्दी फैट संतुलित डाइट का हिस्सा बनने पर हृदय और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकते हैं। फाइटोस्टेरॉल्स भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं।

    हालांकि, किसी एक पोषक तत्व या फल को हृदय रोग से बचाव का अकेला उपाय नहीं माना जा सकता।

    एवोकाडो को डाइट में कैसे शामिल करें?

    अगर आप एवोकाडो खाना चाहते हैं तो इसे ऐसी चीजों की जगह इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर हो सकता है जिनमें संतृप्त वसा या ज्यादा कैलोरी होती है।

    • मक्खन की जगह होल ग्रेन टोस्ट पर मैश किया हुआ एवोकाडो लें।
    • सैंडविच में मेयोनीज की जगह एवोकाडो इस्तेमाल कर सकते हैं।
    • सलाद या ग्रेन बाउल में इसे शामिल करें।
    • क्रीमी ड्रेसिंग की जगह सीमित मात्रा में एवोकाडो इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • इसे सब्जियों और साबुत अनाज के साथ संतुलित भोजन का हिस्सा बनाएं।

    ध्यान रखें कि एवोकाडो में हेल्दी फैट जरूर होता है, लेकिन यह कैलोरी से भरपूर फल भी है। इसलिए जरूरत से ज्यादा खाना वजन नियंत्रण के लिहाज से फायदेमंद नहीं होगा।

    क्या रोज एक एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी खत्म हो जाएगी?

    नहीं। एवोकाडो को स्वस्थ डाइट का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन यह हृदय रोग से बचाव की कोई गारंटी या इलाज नहीं है।

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, स्वस्थ वजन, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा धूम्रपान से दूरी बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

    इस रिसर्च की एक बड़ी सीमा यह भी है कि इसमें मुख्य रूप से पेट के आसपास मोटापे वाले लोगों को शामिल किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

    सबसे जरूरी बात: 4% की कमी का आंकड़ा LDL से जुड़े बदलावों के आधार पर लगाया गया अनुमान है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति में हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा वास्तव में 4% कम हो जाएगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख वैज्ञानिक शोध में सामने आए निष्कर्षों पर आधारित है। एवोकाडो किसी दवा या डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का विकल्प नहीं है। अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, हृदय रोग है या आप पहले से कोई दवा लेते हैं, तो अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या रजिस्टर्ड डायटीशियन से सलाह लें।

  • डिलीवरी के बाद फैटी: लिवर की समस्या, इन हेल्दी स्नैक्स से बदली डाइट; जानें मखाना, चना और सीड्स कैसे मदद कर सकते हैं

    डिलीवरी के बाद फैटी: लिवर की समस्या, इन हेल्दी स्नैक्स से बदली डाइट; जानें मखाना, चना और सीड्स कैसे मदद कर सकते हैं

    डिलीवरी के बाद फैटी: लिवर की समस्या, इन हेल्दी स्नैक्स से बदली डाइट; जानें मखाना, चना और सीड्स कैसे मदद कर सकते हैं

    नई दिल्ली: गर्भावस्था और डिलीवरी के बाद महिलाओं के शरीर में कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं। इस दौरान वजन बढ़ना, थकान, पाचन संबंधी परेशानी और कब्ज जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। कई बार इन्हें सामान्य बदलाव मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन लगातार परेशानी रहने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

    ऐसा ही एक मामला 34 वर्षीय एक महिला का सामने आया, जिनका डिलीवरी के बाद वजन बढ़ गया था और उन्हें थकान, ब्लोटिंग व कब्ज की शिकायत रहने लगी। जांच के बाद उन्हें फैटी लिवर का पता चला। इसके बाद उन्होंने अपनी स्नैकिंग आदतों और पूरी डाइट में बदलाव किया। उनकी डाइट में मखाना, भुना चना, बिना चीनी वाला ग्रीक योगर्ट, सीड्स और ताजे फल जैसे विकल्प शामिल हुए।

    हालांकि, यह एक व्यक्तिगत अनुभव है और केवल इन खाद्य पदार्थों के सेवन से फैटी लिवर ठीक होने का दावा नहीं किया जा सकता। फैटी लिवर में वजन, शारीरिक गतिविधि, ब्लड शुगर, खानपान और अन्य मेटाबॉलिक कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    फैटी लिवर में डाइट क्यों है महत्वपूर्ण?

    फैटी लिवर का संबंध कई बार अधिक वजन, इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल और असंतुलित खानपान जैसी स्थितियों से होता है। इसलिए डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल करना उपयोगी हो सकता है जिनमें फाइबर, प्रोटीन और पोषक तत्व अच्छी मात्रा में हों।

    इसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और वजन को स्वस्थ सीमा में रखना भी महत्वपूर्ण है।

    1. भुना मखाना बना हेल्दी स्नैक

    रात में भूख लगने पर तले-भुने या मीठे स्नैक्स खाने की आदत वजन बढ़ाने में योगदान दे सकती है। ऐसे में भुना हुआ मखाना अपेक्षाकृत हल्का स्नैक विकल्प हो सकता है।

    मखाने में कार्बोहाइड्रेट के साथ कुछ प्रोटीन और फाइबर भी मिलता है। इसे कम तेल और कम नमक के साथ तैयार करके स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है।

    हालांकि, केवल मखाना खाने से फैटी लिवर कम होने की गारंटी नहीं है। इसकी मात्रा और पूरी डाइट को ध्यान में रखना जरूरी है।

    2. भुना चना रख सकता है पेट भरा हुआ

    पैकेज्ड नमकीन और तले हुए स्नैक्स की जगह भुना चना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इसमें प्रोटीन और फाइबर पाए जाते हैं, जो लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकते हैं।

    फाइबर युक्त भोजन वजन को नियंत्रित रखने और बेहतर मेटाबॉलिक हेल्थ में मदद कर सकता है, जो फैटी लिवर के प्रबंधन में महत्वपूर्ण है।

    3. ग्रीक योगर्ट और सीड्स

    शाम के समय बिना चीनी वाला ग्रीक योगर्ट, चिया सीड्स और फ्लैक्स सीड्स को डाइट में शामिल किया जा सकता है। ग्रीक योगर्ट प्रोटीन का अच्छा स्रोत हो सकता है, जबकि चिया और फ्लैक्स सीड्स में फाइबर और हेल्दी फैट पाए जाते हैं।

    कुछ डेयरी उत्पादों में प्रोबायोटिक बैक्टीरिया भी हो सकते हैं, लेकिन हर ग्रीक योगर्ट प्रोबायोटिक हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए पैकेट पर दी गई जानकारी देखना बेहतर है।

    4. पैकेज्ड मिठाइयों की जगह ताजे फल

    मीठा खाने की इच्छा होने पर पैकेज्ड डेजर्ट, कुकीज और ज्यादा चीनी वाले स्नैक्स की जगह साबुत फल बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

    सेब, अमरूद और बेरीज जैसे फलों में फाइबर और विभिन्न पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। साबुत फल खाने से जूस की तुलना में फाइबर भी मिलता है और अतिरिक्त शुगर का सेवन कम रखा जा सकता है।

    5. चिप्स की जगह ह्यूमस और सब्जियां

    चिप्स और अन्य अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स की जगह खीरा, गाजर और शिमला मिर्च जैसी सब्जियों को ह्यूमस के साथ लिया जा सकता है।

    सब्जियों से फाइबर और ह्यूमस से प्लांट प्रोटीन व कुछ हेल्दी फैट मिल सकते हैं। हालांकि, ह्यूमस की मात्रा और उसमें मौजूद तेल व नमक को भी ध्यान में रखना चाहिए।

    6. ओट्स और पीनट बटर

    ओट्स में बीटा-ग्लूकान नामक घुलनशील फाइबर पाया जाता है। यह पेट भरा रखने और ब्लड शुगर व कोलेस्ट्रॉल के बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकता है।

    ओट्स के साथ पीनट बटर लिया जा सकता है, लेकिन ऐसा पीनट बटर चुनना बेहतर है जिसमें अतिरिक्त चीनी और बहुत ज्यादा नमक न हो। कैलोरी अधिक होने के कारण इसकी मात्रा भी सीमित रखना जरूरी है।

    डिलीवरी के बाद फैटी लिवर में किन बातों का रखें ध्यान?

    फैटी लिवर को केवल किसी एक खाद्य पदार्थ से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। डाइट में बदलाव के साथ पूरी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी है।

    • डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह के अनुसार संतुलित डाइट लें।
    • तले हुए और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को सीमित करें।
    • मीठे पेय और ज्यादा चीनी वाले खाद्य पदार्थ कम करें।
    • पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर वाली डाइट लें।
    • डॉक्टर की अनुमति के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि शुरू करें।
    • वजन ज्यादा है तो धीरे-धीरे स्वस्थ तरीके से वजन कम करने पर ध्यान दें।
    • ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराएं।
    • पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश करें।

    एक जरूरी बात: डिलीवरी के बाद महिलाओं को बिना सलाह के बहुत कम कैलोरी वाली डाइट या तेजी से वजन घटाने वाली डाइट नहीं अपनानी चाहिए, खासकर अगर वे स्तनपान करा रही हों। इस स्थिति में पोषण की जरूरत अलग हो सकती है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख एक व्यक्तिगत अनुभव और सामान्य पोषण संबंधी जानकारी पर आधारित है। मखाना, चना, सीड्स या किसी अन्य खाद्य पदार्थ को फैटी लिवर का इलाज न समझें। फैटी लिवर की पुष्टि होने पर डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से व्यक्तिगत डाइट और उपचार संबंधी सलाह लें।

  • दूषित हवा सिर्फ फेफड़ों; नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकती है नुकसान, 10 साल की रिसर्च में सामने आया PM2.5 का असर

    दूषित हवा सिर्फ फेफड़ों; नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकती है नुकसान, 10 साल की रिसर्च में सामने आया PM2.5 का असर

    दूषित हवा सिर्फ फेफड़ों; नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकती है नुकसान, 10 साल की रिसर्च में सामने आया PM2.5 का असर

    नई दिल्ली: वायु प्रदूषण को आमतौर पर फेफड़ों और सांस से जुड़ी बीमारियों के लिए बड़ा जोखिम माना जाता है, लेकिन इसका असर शरीर के दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है। एक हालिया अध्ययन में वायु प्रदूषण और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संबंध सामने आया है।

    Kidney International Reports में प्रकाशित इस शोध में 12 हजार से ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य और प्रदूषण के संपर्क का लंबे समय तक अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि हवा में मौजूद PM2.5 के अधिक संपर्क का संबंध किडनी की फिल्टर करने की क्षमता में कमी से था। यह संबंध डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे कुछ प्रमुख जोखिम कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी देखा गया।

    दिल्ली और चेन्नई के लोगों पर हुई तुलना

    अध्ययन में दिल्ली और चेन्नई जैसे अलग-अलग वायु प्रदूषण स्तर वाले शहरों के लोगों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की किडनी की कार्यक्षमता को eGFR (estimated glomerular filtration rate) के जरिए आंका।

    अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में PM2.5 का स्तर चेन्नई की तुलना में काफी अधिक था और दिल्ली के प्रतिभागियों में किडनी की फिल्ट्रेशन क्षमता अपेक्षाकृत कम पाई गई।

    शोध में यह भी पाया गया कि PM2.5 के संपर्क में हर 5 μg/m³ की वृद्धि किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट से जुड़ी थी। हालांकि, ऐसे अध्ययन किसी संबंध को दिखाते हैं और अकेले यह साबित नहीं करते कि प्रदूषण ही हर व्यक्ति में किडनी की बीमारी का प्रत्यक्ष कारण है।

    PM2.5 किडनी को कैसे प्रभावित कर सकता है?

    PM2.5 बेहद छोटे प्रदूषण कण होते हैं, जो सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में इनके कारण शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाएं बढ़ सकती हैं।

    विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से कई तरह की जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिनका असर रक्त वाहिकाओं और शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ सकता है।

    किडनी में बहुत महीन रक्त वाहिकाओं का जाल होता है और यह अंग लगातार रक्त को फिल्टर करता है। इसलिए लंबे समय तक होने वाली सूजन, रक्त वाहिकाओं को नुकसान और अन्य मेटाबॉलिक बदलाव किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकते हैं।

    सिर्फ बुजुर्गों के लिए चिंता की बात नहीं

    किडनी पर प्रदूषण के संभावित प्रभाव को केवल बुजुर्गों या पहले से किडनी की बीमारी वाले लोगों तक सीमित नहीं माना जा सकता। अध्ययन में अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों को शामिल किया गया था।

    हालांकि, जिन लोगों को पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा या किडनी की बीमारी है, उनमें किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कई जोखिम एक साथ मौजूद हो सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए प्रदूषण के साथ-साथ इन बीमारियों को नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण है।

    भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च?

    भारत के कई बड़े शहरों में वायु प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। वहीं क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD भी बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करती है।

    ऐसे में प्रदूषण और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण है। यह शोध इस बात की ओर संकेत करता है कि खराब हवा का प्रभाव केवल सांस और फेफड़ों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि लंबे समय में शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं।

    प्रदूषण के दिनों में किडनी और फेफड़ों का कैसे रखें ध्यान?

    जब हवा

  • गॉल ब्लैडर की सर्जरी: के बाद क्या बढ़ जाता है फैटी लिवर का खतरा? जानें डॉक्टर की राय.

    गॉल ब्लैडर की सर्जरी: के बाद क्या बढ़ जाता है फैटी लिवर का खतरा? जानें डॉक्टर की राय.

    गॉल ब्लैडर की सर्जरी: के बाद क्या बढ़ जाता है फैटी लिवर का खतरा? जानें डॉक्टर की राय.

    नई दिल्ली: गॉल ब्लैडर यानी पित्ताशय में पथरी या दूसरी गंभीर परेशानी होने पर कई मरीजों को इसे निकालने की सलाह दी जाती है। इस सर्जरी को मेडिकल भाषा में कोलेसिस्टेक्टॉमी (Cholecystectomy) कहा जाता है। सर्जरी के बाद ज्यादातर लोग सामान्य जीवन जीते हैं, लेकिन कुछ लोगों को कुछ समय तक ब्लोटिंग, अपच, ढीला मल या तला-भुना खाना खाने के बाद पेट में असहजता जैसी शिकायत हो सकती है।

    ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या गॉल ब्लैडर निकलवाने से फैटी लिवर का खतरा बढ़ जाता है? विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल गॉल ब्लैडर की सर्जरी को फैटी लिवर का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि, कुछ शोधों में पित्ताशय हटाने और फैटी लिवर के बीच संभावित संबंध के संकेत जरूर मिले हैं।

    गॉल ब्लैडर कब निकाला जाता है?

    गॉल ब्लैडर को पित्ताशय भी कहा जाता है। इसमें पित्त यानी बाइल जमा रहता है। गॉल ब्लैडर में पथरी, बार-बार सूजन, पित्त की नली में पथरी फंसना या कुछ अन्य स्थितियों में डॉक्टर सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।

    हालांकि हर मरीज में गॉल ब्लैडर निकालने की जरूरत नहीं होती। सर्जरी का फैसला बीमारी की गंभीरता, लक्षणों और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है।

    गॉल ब्लैडर निकलने के बाद शरीर में क्या बदलता है?

    गॉल ब्लैडर खुद बाइल नहीं बनाता। बाइल का निर्माण लिवर करता है और गॉल ब्लैडर इसे जमा करके जरूरत के समय आंत में पहुंचाने में मदद करता है।

    खासकर वसा वाला भोजन खाने के दौरान गॉल ब्लैडर सिकुड़कर बाइल को छोटी आंत में छोड़ता है। यह वसा के पाचन और फैट में घुलने वाले विटामिनों के अवशोषण में भूमिका निभाता है।

    गॉल ब्लैडर निकाल दिए जाने के बाद भी लिवर बाइल बनाता रहता है। फर्क यह होता है कि बाइल अब गॉल ब्लैडर में जमा नहीं होता और छोटी मात्रा में लगातार आंत तक पहुंचता रहता है।

    अधिकांश लोग इस बदलाव के साथ आसानी से सामंजस्य बैठा लेते हैं। हालांकि कुछ लोगों को शुरुआत में खासकर ज्यादा तला-भुना या वसायुक्त भोजन खाने के बाद पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है।

    क्या गॉल ब्लैडर निकलने के बाद फैट पचाने में परेशानी होती है?

    कुछ मरीजों में सर्जरी के बाद भारी या ज्यादा वसायुक्त भोजन पचाने में परेशानी महसूस हो सकती है। इसके कारण ब्लोटिंग, गैस, अपच, पेट में असहजता या ढीला मल जैसी शिकायत हो सकती है।

    आमतौर पर शरीर समय के साथ बाइल के नए प्रवाह के अनुसार खुद को ढाल लेता है और ये लक्षण कम हो सकते हैं। हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग हो सकता है।

    क्या गॉल ब्लैडर हटाने से फैटी लिवर हो जाता है?

    सिर्फ गॉल ब्लैडर की सर्जरी को फैटी लिवर का सीधा कारण नहीं माना जाता।

    फैटी लिवर के पीछे आमतौर पर कई मेटाबॉलिक और लाइफस्टाइल से जुड़े कारण होते हैं। इनमें मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई कोलेस्ट्रॉल, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी प्रमुख हैं।

    दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई जोखिम कारक गॉल ब्लैडर में पथरी और फैटी लिवर दोनों से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को सर्जरी के बाद फैटी लिवर का पता चलता है तो यह जरूरी नहीं कि इसकी वजह सर्जरी ही हो।

    फिर गॉल ब्लैडर और फैटी लिवर के बीच संबंध की बात क्यों होती है?

    वैज्ञानिकों ने बाइल के प्रवाह, गट माइक्रोबायोम और मेटाबॉलिज्म के बीच संबंध पर भी अध्ययन किया है। गॉल ब्लैडर हटने के बाद बाइल के आंत तक पहुंचने का तरीका बदल जाता है। इससे कुछ लोगों में आंतों के बैक्टीरिया के संतुलन में बदलाव हो सकता है।

    बाइल एसिड केवल वसा के पाचन में ही भूमिका नहीं निभाते, बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इनमें ग्लूकोज और फैट मेटाबॉलिज्म जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।

    इसी वजह

  • बार-बार कब्ज रहती: है तो डाइट में शामिल करें ये 5 फल, जानें कैसे मिल सकती है राहत.

    बार-बार कब्ज रहती: है तो डाइट में शामिल करें ये 5 फल, जानें कैसे मिल सकती है राहत.

    बार-बार कब्ज रहती: है तो डाइट में शामिल करें ये 5 फल, जानें कैसे मिल सकती है राहत.

    नई दिल्ली: कब्ज आजकल एक आम पाचन संबंधी समस्या बन गई है। कम फाइबर वाला भोजन, पर्याप्त पानी न पीना, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव और अनियमित दिनचर्या जैसी कई वजहों से मल त्याग में परेशानी हो सकती है। अगर कब्ज लंबे समय तक बनी रहे या बार-बार वापस आए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    कब्ज की समस्या में डाइट में फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करना मददगार हो सकता है। कुछ फल ऐसे हैं जिनमें फाइबर के साथ पानी या प्राकृतिक रूप से मौजूद ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो मल को नरम करने और नियमित मल त्याग में मदद कर सकते हैं।

    कब्ज होने की प्रमुख वजहें क्या हैं?

    कब्ज का मतलब केवल कई दिनों तक मल त्याग न होना नहीं है। मल का बहुत कठोर होना, मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाना या पेट पूरी तरह साफ न होने जैसा महसूस होना भी कब्ज के लक्षण हो सकते हैं।

    इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। डाइट में फाइबर की कमी, कम पानी पीना, शारीरिक गतिविधि कम होना, मल को बार-बार रोकना और कुछ दवाओं का सेवन इसके कारणों में शामिल हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ कुछ लोगों में आंतों की गति धीमी होने से भी कब्ज की शिकायत बढ़ सकती है।

    1. पपीता

    पपीता कब्ज की समस्या में खाए जाने वाले लोकप्रिय फलों में शामिल है। इसमें फाइबर और पानी की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन और मल त्याग को सपोर्ट कर सकती है।

    पपीते में पपेन (Papain) नामक एंजाइम भी पाया जाता है, जो प्रोटीन के पाचन में भूमिका निभाता है। इसे सामान्य मात्रा में फल के तौर पर डाइट में शामिल किया जा सकता है।

    2. आलूबुखारा और प्रून्स

    सूखा आलूबुखारा यानी प्रून्स (Prunes) कब्ज में राहत के लिए सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले खाद्य पदार्थों में से एक है। इसमें फाइबर के साथ सॉर्बिटोल नामक प्राकृतिक शुगर अल्कोहल पाया जाता है, जो आंतों में पानी खींचने और मल को नरम करने में मदद कर सकता है।

    कुछ लोगों को प्रून्स या प्रून जूस से मल त्याग में आसानी महसूस हो सकती है। हालांकि, अधिक मात्रा लेने पर गैस या दस्त की समस्या हो सकती है। डायबिटीज वाले लोगों को प्रून जूस में मौजूद प्राकृतिक शुगर को भी ध्यान में रखना चाहिए।

    3. कीवी

    कीवी भी फाइबर से भरपूर फल है और इसे नियमित डाइट में शामिल करने से कुछ लोगों को कब्ज की समस्या में फायदा मिल सकता है। इसमें एक्टिनिडिन (Actinidin) नामक एंजाइम पाया जाता है, जो प्रोटीन के पाचन में भूमिका निभाता है।

    कीवी में मौजूद फाइबर आंतों की गतिविधि और मल की बनावट को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इसे साबुत फल के रूप में खाना जूस की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है।

    4. अंजीर

    ताजा और सूखा दोनों तरह का अंजीर फाइबर का अच्छा स्रोत हो सकता है। खासकर सूखे अंजीर में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, इसलिए सीमित मात्रा में इसका सेवन कब्ज से परेशान कुछ लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है।

    कई लोग सूखे अंजीर को रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाते हैं। हालांकि, इसे किसी पक्के इलाज के तौर पर नहीं देखना चाहिए। अधिक मात्रा में अंजीर खाने से कुछ लोगों को गैस, पेट फूलने या दस्त की समस्या हो सकती है।

    5. नाशपाती

    नाशपाती में घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह के फाइबर पाए जाते हैं। फाइबर मल में पानी बनाए रखने और उसके आकार को बढ़ाने में मदद कर सकता है, जिससे मल त्याग आसान हो सकता है।

    नाशपाती को अच्छी तरह धोकर छिलके समेत खाना अधिक फाइबर पाने का एक तरीका है। हालांकि, जिन लोगों को किसी फल से एलर्जी या पाचन संबंधी विशेष समस्या है, उन्हें अपनी सहनशीलता के अनुसार इसका सेवन करना चाहिए।

    सिर्फ फल खाना ही काफी नहीं

    कब्ज से राहत के लिए केवल एक या दो फल खाना पर्याप्त नहीं होता। पूरी जीवनशैली और डाइट पर ध्यान देना जरूरी है।

    • दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
    • खाने में धीरे-धीरे फाइबर की मात्रा बढ़ाएं।
    • रोजाना पैदल चलने या दूसरी नियमित शारीरिक गतिविधि की आदत डालें।
    • मल त्याग की इच्छा को बार-बार न रोकें।
    • लंबे समय तक बैठे रहने से बचें।
    • तनाव को नियंत्रित करने और पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करें।
    • अगर फाइबर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ा दिया जाए तो गैस और ब्लोटिंग हो सकती है, इसलिए इसे धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर है।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

    अगर कब्ज कई हफ्तों तक बनी रहती है, बार-बार होती है या घरेलू बदलावों के बावजूद ठीक नहीं होती तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। मल में खून आना, बिना वजह वजन कम होना, लगातार या तेज पेट दर्द, उल्टी, पेट बहुत फूलना या अचानक शुरू हुई गंभीर कब्ज जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    खासकर लंबे समय से कब्ज की समस्या होने पर बार-बार खुद से लैक्सेटिव या चूर्ण लेने के बजाय इसके पीछे की वजह जानना ज्यादा जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। किसी फल या घरेलू उपाय को कब्ज का निश्चित इलाज न मानें। यदि कब्ज लंबे समय से बनी हुई है या इसके साथ गंभीर लक्षण हैं, तो योग्य चिकित्सक या गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लें।

  • एवरेस्ट जीरा पाउडर Recall: इस बैच में मिले तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक, इस्तेमाल कर लिया तो क्या करें?

    एवरेस्ट जीरा पाउडर Recall: इस बैच में मिले तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक, इस्तेमाल कर लिया तो क्या करें?

    एवरेस्ट जीरा पाउडर Recall: इस बैच में मिले तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक, इस्तेमाल कर लिया तो क्या करें?

    नई दिल्ली: भारतीय रसोई में जीरा पाउडर का इस्तेमाल रोजाना होने वाले मसालों में किया जाता है। ऐसे में इससे जुड़ी खाद्य सुरक्षा चेतावनी सामने आने के बाद उपभोक्ताओं के लिए अपने घर में रखे पैकेट का बैच नंबर जांचना जरूरी हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, एवरेस्ट के जीरा पाउडर के एक खास बैच की जांच में निर्धारित सीमा से अधिक कीटनाशक अवशेष पाए गए हैं, जिसके बाद उसे Recall करने का निर्देश दिया गया है।

    भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की ओर से संबंधित कंपनी को प्रभावित प्री-पैक्ड जीरा पाउडर को बाजार से वापस लेने का निर्देश दिया गया है। ऐसे में अगर आपके घर में भी यह उत्पाद मौजूद है तो इस्तेमाल जारी रखने के बजाय पहले पैकेट का बैच नंबर जरूर जांचें।

    कौन सा बैच जांच में आया?

    रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित एवरेस्ट जीरा पाउडर का Batch No. E080668761 जांच में असुरक्षित पाया गया। लैब टेस्ट में इसमें Azoxystrobin और Thiamethoxam के अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक बताए गए हैं।

    यहां यह समझना जरूरी है कि चेतावनी एक खास बैच से संबंधित है। इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में मौजूद सभी एवरेस्ट जीरा पाउडर या सभी पैकेज्ड मसाले असुरक्षित हैं।

    अगर गलती से इस्तेमाल कर लिया तो क्या होगा?

    किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक मिलने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि उसे खाने वाले व्यक्ति को तुरंत विषाक्तता या बीमारी हो जाएगी। स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव कई बातों पर निर्भर कर सकता है, जैसे व्यक्ति ने कितनी मात्रा में उत्पाद खाया, कितने समय तक उसका सेवन किया और संबंधित पदार्थ का स्तर कितना था।

    Thiamethoxam एक नियोनिकोटिनॉयड श्रेणी का कीटनाशक है, जबकि Azoxystrobin फफूंदनाशक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इनके अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाने के बाद उत्पाद को लेकर सावधानी जरूरी है, लेकिन केवल सामान्य लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई परेशानी इसी उत्पाद के सेवन की वजह से हुई है।

    एक बार खा लिया है तो क्या करें?

    अगर आपने प्रभावित बैच के जीरा पाउडर का इस्तेमाल कर लिया है तो सबसे पहले आगे उसका सेवन बंद कर दें। घबराने या खुद से कोई इलाज करने की जरूरत नहीं है।

    खुद से उल्टी कराने या किसी तरह का तथाकथित ‘डिटॉक्स’ करने की कोशिश न करें। यदि बहुत अधिक मात्रा में सेवन हुआ है या इसके बाद लगातार उल्टी, तेज चक्कर, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

    डॉक्टर से संपर्क करते समय उत्पाद का पैकेट, बैच नंबर और उपलब्ध खरीद संबंधी जानकारी अपने पास रखना उपयोगी हो सकता है। बच्चों और कम वजन वाले व्यक्तियों में किसी पदार्थ का एक्सपोजर शरीर के वजन के हिसाब से अलग प्रभाव डाल सकता है, इसलिए ऐसे मामलों में अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।

    पैकेज्ड मसाला खरीदते समय क्या देखें?

    पैक्ड मसाले खरीदते समय केवल ब्रांड देखकर फैसला करने के बजाय पैकेट की पूरी जानकारी जांचना बेहतर है।

    • Batch या Lot Number
    • Manufacturing Date
    • Best Before Date
    • FSSAI Licence Details
    • पैकेट की सील और पैकेजिंग
    • पैकेट फटा, खुला या छेड़छाड़ किया हुआ तो नहीं

    अगर किसी खास ब्रांड या बैच के खिलाफ Recall या खाद्य सुरक्षा चेतावनी जारी हुई है तो खरीदने या इस्तेमाल करने से पहले संबंधित आधिकारिक जानकारी भी देख लें।

    पिसे मसालों में मिलावट का खतरा क्यों रहता है?

    पिसे हुए मसालों में मिलावट का पता लगाना कई बार मुश्किल हो सकता है, क्योंकि मसाला पहले से ही पाउडर के रूप में होता है। कुछ मामलों में सस्ते पदार्थ या दूसरे पाउडर मिलाए जाने की आशंका रहती है।

    जीरा और दूसरे पिसे मसालों में मिलावट को लेकर खाद्य सुरक्षा एजेंसियां समय-समय पर उपभोक्ताओं को सावधान करती रही हैं। इसलिए पैकेट खरीदते समय उसकी सील, बैच नंबर, तारीख और खाद्य सुरक्षा संबंधी जानकारी जरूर जांचनी चाहिए।

    क्या सभी पैकेज्ड जीरा पाउडर से बचना चाहिए?

    नहीं। किसी एक बैच में समस्या मिलने का मतलब यह नहीं है कि सभी पैकेज्ड जीरा पाउडर असुरक्षित हैं। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात प्रभावित बैच की पहचान करना और उसे इस्तेमाल न करना है।

    रोजाना इस्तेमाल होने वाले मसालों के मामले में भी यही सावधानी अपनानी चाहिए—पैकेट की जानकारी पढ़ें, संदिग्ध या क्षतिग्रस्त पैकेट न खरीदें और किसी आधिकारिक Recall की जानकारी सामने आने पर संबंधित बैच का इस्तेमाल तुरंत रोक दें।

    डिस्क्लेमर: यह खबर खाद्य सुरक्षा से संबंधित उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञ की राय पर आधारित है। यदि आपने प्रभावित उत्पाद का सेवन किया है और आपको कोई गंभीर या लगातार बने रहने वाला लक्षण महसूस हो रहा है, तो डॉक्टर से सलाह लें। यह लेख चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है।