Category: Health

  • बलगम, खांसी और नज़ले का दुश्मन है ये मसाला, हाजमे के साथ दिमाग के लिए भी है असरदार,आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से जानिए..?

    बलगम, खांसी और नज़ले का दुश्मन है ये मसाला, हाजमे के साथ दिमाग के लिए भी है असरदार,आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से जानिए..?

    Featured Image

    Health Benefits of Kali Mirch: मौसम में होने वाला बदलाव बॉडी में कई तरह की बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है। मौसम बदलते ही खांसी, जुकाम, गले में खराश और बलगम जमने की समस्या बेहद आम हो जाती है। कई बार दवाइयों का सेवन करने के बाद भी छाती में जकड़न और नजला लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे में भारतीय रसोई में मौजूद ‘मसालों की रानी’ कही जाने वाली काली मिर्च (Black Pepper) का इस्तेमाल सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आयुर्वेद में काली मिर्च को इसके तीखे स्वाद और गर्म तासीर के कारण कफ और वात को संतुलित करने वाला माना गया है।

    यूनानी डॉक्टर हकीम सुलेमान खान के अनुसार, काली मिर्च एक ऐसा मसाला है जिसे भारत के साथ-साथ दूसरे देशों में भी खूब पसंद किया जाता है। अंग्रेज भी इस भारतीय मसाले के मुरीद रहे हैं। इसकी लोकप्रियता सिर्फ इसके तीखे स्वाद की वजह से नहीं, बल्कि इसके पारंपरिक स्वास्थ्य लाभों के कारण भी है। यह मसाला खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचा सकता है। बलगम, खांसी और नज़ले का इलाज करने में ये मसाला बेहद असरदार साबित होता है। अक्सर लोग काली मिर्च का सेवन पाउडर बनाकर खाने के ऊपर छिड़ककर करते हैं। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि बदलते मौसम में काली मिर्च का सेवन किस तरह सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    काली मिर्च के पोषक तत्व

    आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार, काली मिर्च में ‘पाइपेरिन’ (Piperine) नाम का एक प्रमुख एक्टिव कंपाउंड पाया जाता है। पाइपेरिन में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा, पाइपेरिन शरीर में कुछ पोषक तत्वों और दूसरे कंपाउंड् के अवशोषण को बेहतर करने के लिए भी जाना जाता है। यही वजह है कि काली मिर्च को पारंपरिक रूप से सेहत के लिए उपयोगी मसाला माना जाता है। हकीम सुलेमान के मुताबिक काली मिर्च का सेवन सही मात्रा में सही कॉम्बिनेशन के साथ किया जाए तो तो यह मौसमी संक्रमणों से बचाव में अद्भुत असर दिखाती है।

    काली मिर्च क्यों मानी जाती है फायदेमंद?

    काली मिर्च सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं है, बल्कि इसे कई सारे फायदों  के लिए भी जाना जाता है। सही मात्रा और सही तरीके से इसका सेवन करने पर यह पाचन, मौसमी बदलाव के दौरान होने वाली परेशानियों से राहत दिलाने में मददगार हो सकती है। हकीम सुलेमान ने बताया ये एक ऐसा मसाला है जो गर्म मिजाज़ का है। ये मसाला कफ का इलाज है। बदलते मौसम में इसे काढ़े या गर्म पेय में भी शामिल किया जाता है। माना जाता है कि काली मिर्च का सेवन सर्दी-खांसी, बलगम और जुकाम जैसी मौसमी परेशानियों में राहत देने में मदद कर सकता है। इसका सेवन पाचन से लेकर बॉडी से जुड़ी और भी कई परेशानियों में असरदार साबित होता है। मौसम बदलने के दौरान खानपान और दिनचर्या में बदलाव के कारण कई लोगों को अपच, गैस, पेट फूलने या कब्ज जैसी पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में इसका संतुलित मात्रा में सेवन पाचन तंत्र को सपोर्ट कर सकता है।

    पाचन तंत्र को बेहतर रखने में कैसे मददगार है?

    यह मसाला पाचन तंत्र को बेहतर रखने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद फाइबर और अन्य प्राकृतिक पोषक तत्व आंतों की गतिविधि को बेहतर रखने, मल त्याग को आसान बनाने और कब्ज जैसी समस्या से बचाव में मदद कर सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी के साथ इसका सेवन करने से पाचन प्रक्रिया को और बेहतर सपोर्ट मिल सकता है।

    मौसमी बीमारियों से करती है बचाव

    मौसम बदलने पर सर्दी-जुकाम, गले में खराश और वायरल संक्रमण जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में मदद कर सकते हैं। नियमित रूप से संतुलित डाइट का हिस्सा बनाकर इसका सेवन शरीर को संक्रमणों से लड़ने के लिए जरूरी पोषक तत्व मुहैया करा सकता है। हालांकि, इसे किसी मौसमी बीमारी का इलाज या उससे पूरी तरह बचाव की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

    आंखों की रोशनी बढ़ाने में मददगार

    इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट आंखों के स्वास्थ्य को सपोर्ट कर सकते हैं। ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से होने वाले नुकसान से कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद करते हैं। आंखों को हेल्दी रखने के लिए सीमित मात्रा में इस मसाले का सेवन असरदार साबित होता है।

    दिमाग तेज करने में कैसे मददगार

    इसमें मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने और सामान्य ब्रेन फंक्शन को सपोर्ट करने में भूमिका निभा सकते हैं। संतुलित डाइट के हिस्से के रूप में इसका सेवन याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    हाजमा दुरुस्त करने में मददगार

    काली मिर्च में मौजूद फाइबर और अन्य बायोएक्टिव कंपाउंड पाचन तंत्र को सपोर्ट कर सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में सेवन करने पर यह आंतों की सामान्य गतिविधि बनाए रखने, मल त्याग को बेहतर करने और कब्ज जैसी समस्या से बचाव में मदद कर सकता है।

    आयुर्वेद के मुताबिक काली मिर्च का कितना सेवन पर्याप्त है

    आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार हेल्दी इंसान भोजन में रोजाना लगभग 1–2 ग्राम यानी करीब ½–1 चम्मच काली मिर्च का पाउडर खा सकता है। हालांकि, यह मात्रा व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार बदल सकती है। ज्यादा मात्रा में काली मिर्च लेने से कुछ लोगों में एसिडिटी, सीने में जलन या पेट में परेशानी हो सकती है।

    डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के परामर्श पर आधारित है। यह किसी भी तरह से योग्य मेडिकल राय का विकल्प नहीं है। यदि आपको पेट में अल्सर, अत्यधिक एसिडिटी या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, तो इसका सेवन शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक या आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

  • मानसून में डाइट में शामिल कर सकते हैं ये 7 हर्बल फूड्स, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट मानते हैं इन्हें अमृत,

    मानसून में डाइट में शामिल कर सकते हैं ये 7 हर्बल फूड्स, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट मानते हैं इन्हें अमृत,

    Featured Image

    बरसात का मौसम कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खासकर डायबिटीज और कुछ दूसरी क्रोनिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों में संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है और बीमारी होने पर complications की संभावना भी अधिक हो सकती है।आयुर्वेद के मुताबिक बरसात के महीनों में शरीर में ‘पित्त’ और ‘वात’ दोष का असंतुलन हो जाता है जिससे बॉडी में बीमारियों का खतरा बढ़ने लगता है। आयुर्वेद के मुताबिक बरसात के महीने में बॉडी को हेल्दी रखने के लिए और इम्यूनिटी को स्ट्रांग करने के लिए किचन में मौजूद कुछ देसी चीजों का सेवन बेहद असरदार साबित होता है।

    आधुनिक विज्ञान और न्यूट्रिशन रिसर्च भी कुछ हर्ब्स और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-बैक्टीरियल और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुण शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाने में मदद करते हैं। अगर आप भी इस मौसम में बिना बीमार पड़े सेहतमंद रहना चाहते हैं, तो अपनी दैनिक डाइट में इन 7 हर्बल फूड्स को शामिल कर सकते हैं। आइए, आयुर्वेदिक विशेषज्ञों और वैज्ञानिक रिसर्च के नजरिए से जानते हैं कि ये हर्बल फूड्स आपकी सेहत के लिए किस तरह फायदेमंद साबित हो सकते हैं और इसका सेवन कैसे करना चाहिए।

    गुनगुना पानी

    सावन के मौसम में वातावरण में नमी और आर्द्रता बढ़ने से पाचन पर असर पड़ सकता है ऐसे में आपको रोज गुनगुना पानी पीना चाहिए।आयुर्वेदिक एक्सपर्ट और योग गुरु बाबा रामदेव के मुताबिक सुबह खाली पेट और दिनभर हल्का गुनगुना पानी पीने से पाचन दुरुस्त रहता है। रोज गुनगुना पानी पीने से पेट में गैस, ब्लोटिंग, कब्ज और भारीपन जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। उबला या गुनगुना पानी पीना मानसून में जलजनित संक्रमणों से बचाव के लिए भी उपयोगी बताया गया है।

    अदरक का करें सेवन

    नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लिमेंटरी एंड इंटीग्रेटेड हेल्थ (NCCIH) अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ (NIH) का एक प्रमुख हिस्सा है,के मुताबिक संतुलित मात्रा में अदरक का सेवन सेहत को फायदा पहुंचाता है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि अदरक का सेवन पीरियड्स पेन, घुटने के दर्द या ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षणों को कम करने में मददगार होता है। अदरक को मानसून में पाचन और सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं के लिए उपयोगी बताया गया है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और दूसरे बायोएक्टिव कंपाउंड पाए जाते हैं। इसे हर्बल टी, काढ़े या सब्जियों में शामिल किया जा सकता है।

    त्रिफला चूर्ण का करें सेवन

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट नित्यानंदम श्री के मुताबिक त्रिफला एक ऐसी जड़ी बूटी है जो पेट से लेकर डायबिटीज तक का इलाज करती है। एक चम्मच इस हर्ब के पाउडर का सेवन करने से बॉडी में जमा सारी गंदगी बाहर निकल जाती है। त्रिफला आंवला, हरड़ और बहेड़ा से बना पारंपरिक आयुर्वेदिक मिश्रण है। इसे खासतौर पर कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। रात को सोने से पहले आधा चम्मच त्रिफला गुनगुने पानी के साथ लेने से सेहत को फायदा होता है। नियमित या लंबे समय तक सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

    भुना हुआ जीरा खाएं

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट डॉक्टर रूपाली जैन ने बताया है कि जीरे का सेवन पाचन को दुरुस्त करता है। जीरा पाचन को सपोर्ट करने वाला मसाला है। इसे छाछ या पानी में थोड़ा सा मिलाकर लिया जा सकता है। बरसात में जीरे का सेवन करने से पाचन से जुड़ी दिक्कते जैसे गैस, पेट फूलने, भारीपन और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। भोजन में सीमित मात्रा में भुना जीरा शामिल करना मानसून के दौरान एक आसान विकल्प हो सकता है।

    सेंधा नमक का करें सेवन

    सेंधा नमक का इस्तेमाल खासतौर पर व्रत और उपवास के दौरान किया जाता है लेकिन आयुर्वेद इसे सामान्य नमक से बेहतर विकल्प के तौर पर देखता है। netmeds में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक सेंधा नमक पेट में पाचक एंजाइम और हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) के स्राव को बढ़ावा देता है। यह भोजन के बेहतर अवशोषण, गैस, ब्लोटिंग (पेट फूलना) और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मददगार है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सेंधा नमक भी मुख्य रूप से सोडियम क्लोराइड ही है और ज्यादा मात्रा में इसका सेवन हाई ब्लड प्रेशर या वाटर रिटेंशन वाले लोगों के लिए उचित नहीं है। इसलिए इसकी मात्रा सीमित रखना जरूरी है।

    तुलसी के पत्ते

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट आचार्य बालकृष्ण के मुताबिक तुलसी का इस्तेमाल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से किया जाता रहा है। तुलसी में यूजेनॉल समेत कई बायोएक्टिव कंपाउंड पाए जाते हैं। बरसात के मौसम में तुलसी की चाय या काढ़े को पीने से मानसून में सर्दी-जुकाम और गले की परेशानी से बचाव करने में मदद मिलती है। हालांकि, तुलसी को प्राकृतिक एंटीबायोटिक या वायरल संक्रमण का इलाज मानना सही नहीं है।

    नीम की पत्तियां

    नीम में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुणों वाले कई कंपाउंड पाए जाते हैं और पारंपरिक चिकित्सा में इसका इस्तेमाल त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए किया जाता रहा है। बरसात के मौसम में आयुर्वेदिक एक्सपर्ट नीम की कोपलें खाने और नीम के पानी से नहाने की सलाह देते हैं ताकि इम्यूनिटी मजबूत रहे और बॉडी का बीमारियों से बचाव हो।  हालांकि, नीम की पत्तियों का नियमित सेवन हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, बच्चों और दवाएं लेने वाले लोगों को बिना विशेषज्ञ की सलाह इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। इसमें दी गई जानकारी किसी बीमारी के इलाज, दवा या डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी खाद्य पदार्थ, घरेलू नुस्खे या हर्बल उत्पाद का नियमित सेवन शुरू करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति और चल रही दवाओं को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह ले

  • बॉडी की गंदगी बाहर निकालने वाली किडनी ब्लड शुगर भी करती है कंट्रोल, जानिए डायबिटीज और किडनी का क्या है कनेक्शन..

    बॉडी की गंदगी बाहर निकालने वाली किडनी ब्लड शुगर भी करती है कंट्रोल, जानिए डायबिटीज और किडनी का क्या है कनेक्शन..

    Featured Image

    आमतौर पर माना जाता है कि किडनी का काम केवल शरीर से अपशिष्ट पदार्थों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालना है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आपके ब्लड शुगर लेवल को भी सीधे नियंत्रित करती है? आमतौर पर जब ब्लड शुगर की बात होती है, तो हमारा ध्यान पैंक्रियाज, इंसुलिन, खानपान और एक्सरसाइज पर जाता है, लेकिन डायबिटीज और किडनी के बीच का सीधा संबंध भी उतना ही जरूरी है। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, अनियंत्रित डायबिटीज किडनी के बारीक फिल्टर्स को नुकसान पहुंचा कर डायबिटिक नेफ्रोपैथी जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकती है। जानिए कैसे किडनी रीनल ग्लूकोनियोजेनेसिस प्रक्रिया के जरिए शुगर कंट्रोल करती है।

    कंसल्टेंट डायटीशियन और डायबिटीज एजुकेटर कनिका मल्होत्रा ने indianexpress.com को बताया है कि काश ज़्यादा लोग इस बात को समझते है कि किडनी सिर्फ वेस्ट को फिल्टर नहीं करती बल्कि रीनल ग्लूकोनियोजेनेसिस नाम की प्रक्रिया के ज़रिए ग्लूकोज़ को कंट्रोल करने में भी सक्रिय रूप से शामिल होती हैं, जिसमें किडनी के टिश्यू असल में ग्लूकोज़ बनाते हैं। साथ ही वे ग्लूकोज़ रीएब्ज़ॉर्प्शन के ज़रिए फ़िल्टर हुई शुगर को यूरिन में जाने देने के बजाय वापस ब्लडस्ट्रीम में ले आती हैं।

    डायबिटीज और किडनी का कनेक्शन

    • हाई शुगर के कारण किडनी के फिल्टरिंग यूनिट्स (Nephrons) पर दबाव बढ़ता है और वे सख्त या कठोर होने लगते हैं।
    • हेल्दी किडनी खून से प्रोटीन (Albumin) को रोकने देती है, लेकिन डैमेज होने पर प्रोटीन यूरीन के जरिए बाहर निकलने लगता है।
    • जब फिल्टर काम करना बंद कर देते हैं, तो शरीर में पानी, नमक और टॉक्सिन जमा होने लगते हैं।

    किडनी ब्लड शुगर को कैसे कंट्रोल करती है?

    किडनी में Renal Gluconeogenesis नाम की प्रक्रिया होती है। इसमें किडनी का ऊतक जरूरत पड़ने पर ग्लूकोज बनाता है। खासकर जब व्यक्ति लंबे समय तक कुछ नहीं खाता या फास्ट में होता है, तब शरीर में ब्लड ग्लूकोज बनाए रखने में यह प्रक्रिया मदद करती है। इसके अलावा किडनी खून को फिल्टर करते समय ग्लूकोज को भी फिल्टर करती है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर इस ग्लूकोज को पेशाब के रास्ते बाहर नहीं जाने देता, बल्कि उसे दोबारा खून में वापस पहुंचा देता है। इसे Glucose Reabsorption यानी ग्लूकोज का पुनः अवशोषण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में SGLT2 (Sodium-Glucose Cotransporter-2) नाम का ट्रांसपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डायबिटीज की कुछ दवाएं इसी SGLT2 को टारगेट करके काम करती हैं, जिससे अतिरिक्त ग्लूकोज पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकलता है।

    किडनी और ब्लड शुगर का रिश्ता एकतरफा नहीं है

    डायबिटीज और किडनी के बीच संबंध को आमतौर पर इस तरह समझाया जाता है कि लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर किडनी को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन यह रिश्ता सिर्फ एक दिशा में नहीं चलता। किडनी शरीर में इंसुलिन को तोड़ने और साफ करने में भी भूमिका निभाती है। जब किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है, तो इंसुलिन शरीर में ज्यादा समय तक रह सकता है। इसके अलावा किडनी की कार्यक्षमता में बदलाव ग्लूकोज के दोबारा अवशोषण और शरीर की इंसुलिन प्रतिक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।

    इसलिए किडनी की कार्यक्षमता में शुरुआती बदलाव और ब्लड शुगर के कंट्रोल के बीच संबंध हो सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हर व्यक्ति में हल्की किडनी समस्या सीधे डायबिटीज का कारण बनती है। किडनी और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म के बीच संबंध जटिल और कई कारकों पर निर्भर करता है।

    किडनी की सेहत और ब्लड शुगर को कैसे रखें हेल्दी

    किडनी और मेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर रखने के लिए कुछ आदतें मददगार हो सकती हैं जैसे

    • रेगुलर बॉडी को एक्टिव रखें। नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि डायबिटीज कंट्रोल रखती है और किडनी की सेहत भी दुरुस्त रहती है।
    • खाने में अतिरिक्त नमक और ज्यादा सोडियम से बचें। नमक का कम सेवन आपकी सेहत को दुरुस्त रखता है।
    • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित करें।
    • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी पीने की कोशिश न करें।
    • ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखें।
    • डायबिटीज या किडनी की बीमारी का जोखिम होने पर डॉक्टर की सलाह से ब्लड शुगर और किडनी फंक्शन की जांच कराते रहें।
    • बहुत अधिक प्रोटीन वाली डाइट बिना जरूरत या विशेषज्ञ की सलाह के न लें, खासकर अगर किडनी की बीमारी का जोखिम हो।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। डायबिटीज या किडनी से जुड़ी किसी भी समस्या में डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद या शुरू न करें। सही जांच और उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

  • पुरानी कब्ज में नीम के पत्ते कितने असरदार? जानें क्या कहता है आयुर्वेद और मेडिकल साइंस..?

    पुरानी कब्ज में नीम के पत्ते कितने असरदार? जानें क्या कहता है आयुर्वेद और मेडिकल साइंस..?

    Featured Image

    कब्ज एक आम पाचन संबंधी समस्या है, लेकिन इसका असर सिर्फ पेट तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक कब्ज रहने पर पेट में भारीपन, असहजता और दिनभर की सामान्य गतिविधियों में परेशानी हो सकती है। बार-बार होने वाली कब्ज व्यक्ति की मानसिक परेशानी और तनाव को भी बढ़ा सकती है। इसलिए कब्ज को केवल एक छोटी-मोटी समस्या मानकर नजरअंदाज करने के बजाय इसके कारणों को समझना और समय रहते सही उपाय करना जरूरी है। आयुर्वेद में कब्ज का इलाज करने के लिए कई आयुर्वेदिक हर्ब्स को असरदार पाया गया है।  वेदों में नीम को सर्व रोग निवारिणी कहा गया है, जिसका मतलब है सभी बीमारियों का इलाज। नीम एक ऐसा आयुर्वेदिक पेड़ है जिसके पत्ते से लेकर उसकी छाल और उसका फूल सब औषधीय गुणों से भरपूर है।  लोग नीम के बीज, पत्तियां, नीम का रस, फल, फूल, तेल, जड़ें और छाल का इस्तेमाल दवा के तौर पर करते हैं।  पारंपरिक आयुर्वेद में नीम को औषधीय गुणों का भंडार माना गया है।

    healthifyme.com के मुताबिक नीम के एंटी-ऑक्सीडेंट और डिटॉक्सिफाइंग गुण पाचन क्रिया को सुचारू बनाने में मदद कर सकते हैं, बशर्ते इसका सेवन सही मात्रा और सही तरीके से किया जाए। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट आचार्य बालकृष्ण ने बताया नीम का पत्ता पाचन के लिए अमृत की तरह असर करता है। लोग अक्सर पाचन के लिए तुलसी और करी पत्ता खाते हैं लेकिन नीम का पत्ता भी पाचन का अचूक इलाज है। आइए जानते हैं मेडिकल साइंस और आयुर्वेद के मुताबिक नीम का पत्ता कैसे पाचन को दुरुस्त करता है और बॉडी को हेल्दी रखता है।

    नीम का पत्ता कैसे पाचन को दुरुस्त करता है?

    नीम के एंटी-बैक्टीरियल गुण आंतों में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करने और उन्हें साफ करने में मदद करते हैं। इसके अलावा नीम मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाकर पाचन में सुधार करता है। यह शरीर में कफ दोष को बैलेंस करने में भी मदद करता है, जिससे शरीर में पानी जमा नहीं होता और फैट बाहर निकल जाता है।

    नीम में एंटी-फ्लैटुलेंस यानी गैस कम करने वाले और एस्ट्रिंजेंट गुण भी होते हैं, जो पाचन नली में गैस बनने से रोकते हैं। साथ ही, इसमें एंटी-एसिड गुण भी होते हैं जो पेट में ज़रूरत से ज़्यादा एसिड बनने से रोकते हैं। इसके अलावा, नीम में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है। इसलिए, नीम पाउडर का सेवन करने से मल आसानी से पास होता है और कब्ज़ की समस्या नहीं होती। रोज़ सुबह खाली पेट नीम का जूस पीने से पाचन संबंधी समस्याओं से राहत मिल सकती है।

    नीम का पत्ता सेहत पर कैसे करता है असर?

    इम्यूनिटी होती है मजबूत

    नीम के पत्ते का सेवन करने से इम्यूनिटी मजबूत होती है और बॉडी का बीमारियों से बचाव होता है। नीम में कई जैविक सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट और रोगाणुरोधी गुण हो सकते हैं। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि नीम का पत्ता इम्यूनिटी को मजबूत करता है। Journal of Ethnopharmacology और BMC Complementary Medicine and Therapies में प्रकाशित अध्ययनों से पता चलता है कि नीम का अर्क शरीर में T-कोशिकाओं (T-cells) को सक्रिय करता है। यह लिंफोसाइट्स की संख्या बढ़ाकर शरीर के इम्यून रिस्पांस को मजबूत करता है। PubMed Central की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नीम के फ्लैवोनोइड्स शरीर में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को कम करके फ्री रेडिकल्स को बेअसर करते हैं।

    ब्लड शुगर कंट्रोल करने में भी है असरदार

    ब्लड शुगर कंट्रोल करने में भी नीम का पत्ता असरदार साबित होता है। कुछ रिसर्च में नीम के अर्क से ब्लड शुगर कम होने की संभावना सामने आई है। हालांकि, डायबिटीज की दवा के विकल्प के तौर पर नीम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। Journal of Medical Food (2021) में प्रकाशित एक क्लीनिकल ट्रायल में मेटाबॉलिक सिंड्रोम वाले मरीजों को नीम का अर्क दिया गया। 12 हफ्तों के बाद उनके फास्टिंग ब्लड शुगर, पोस्टप्रांडियल शुगर और HbA1c के स्तर में काफी सुधार देखा गया। Pharmacological Research की स्टडी के अनुसार नीम की पत्तियों का अर्क मसल्स में GLUT4 ट्रांसपोर्टर्स को बढ़ावा देता है, जिससे खून में मौजूद अतिरिक्त ग्लूकोज कोशिकाओं में अवशोषित हो जाता है।

    बॉडी की सूजन करते हैं कंट्रोल

    नीम के पत्तों का सेवन करने से सूजन भी कंट्रोल रहती है। नीम में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। नीम में मौजूद निमबीडिन (Nimbidin) और निम्बिन (Nimbin) सूजन बढ़ाने वाले प्रो-इन्फ्लेमेटरी साइटोकाइन (Cytokines) के असर को दबाते हैं। Inflammation Research और Phytotherapy Research के अध्ययनों में देखा गया कि नीम का अर्क शरीर में सूजन पैदा करने वाले साइक्लोऑक्सीजिनेज (COX) और लाइपोक्सीजिनेज (LOX) एंजाइम को ब्लॉक करता है, जिससे जोड़ों या आंतों की पुरानी सूजन (Chronic Inflammation) कम होती है।

    लिवर के लिए भी हैं असरदार

    नीम के पत्तों का सेवन लिवर की हेल्थ में भी सुधार कर सकता है। नीम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट यौगिक ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव में मदद कर सकते हैं। Food and Chemical Toxicology और PMC (2021) में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक नीम के पत्तों का अर्क लिवर एंजाइम्स जैसे ALT (Alanine Transaminase) और AST (Aspartate Aminotransferase) के स्तर को कंट्रोल रखता है। नीम में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स लिवर के टिश्यूज को नुकसान से बचाते हैं।

    नीम के पत्ते नेचुरल ब्लड प्यूरीफायर

    नीम का सेवन करने से खून साफ होता है। ये ब्लड में मौजूद अशुद्धियों को दूर करता है। शरीर से टॉक्सिन निकालने में नीम का जूस बेहद असरदार साबित होता है। International Journal of Ayurveda Research और स्किन-डर्मेटोलॉजी से जुड़ी रिसर्च के मुताबिक, नीम खून से हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर लिवर और किडनी के लोड को कम करता है। यह लिपिड पेरोक्सीडेशन (Lipid Peroxidation) को रोककर लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाव करता है।

    कब्ज का इलाज के लिए नीम का कैसे करें सेवन

    • अगर आप कब्ज का इलाज नीम से करना चाहते हैं तो आप नीम की पत्तियों का पानी पिएं। नीम की कुछ साफ पत्तियों को पीसकर पानी में मिलाएं और उसे छानकर उसका सेवन करें।  नीम को पारंपरिक रूप से पाचन संबंधी परेशानियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
    • नीम की पत्तियों की चाय बनाकर करें उसका सेवन। आप 2–4 नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर उसकी चाय तैयार करें। इसे पारंपरिक तौर पर पाचन और हेल्थ को दुरुस्त करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • नीम का सेवन उसका पाउडर बनाकर करें। नीम की सूखी पत्तियों को पीसकर पाउडर बना लें और उसे फांक लें और फिर पानी पी लें।

    डिस्क्लेमर :यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है। पुरानी कब्ज या पेट से जुड़ी गंभीर समस्याओं में नीम का सेवन करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

  • कोलेस्ट्रॉल बढ़ गया है? ये 10 Foods अपनी Diet में शामिल करें..

    कोलेस्ट्रॉल बढ़ गया है? ये 10 Foods अपनी Diet में शामिल करें..

    Featured Image

    अक्सर जब लोगों को पता चलता है कि उनका cholesterol बढ़ गया है, तो वे तुरंत walking और exercise शुरू कर देते हैं। अच्छी बात है, लेकिन cholesterol को control करने में आपकी diet का भी बहुत बड़ा role होता है।

    आज मैं आपको ऐसे 10 foods के बारे में बताऊंगा जिन्हें अपनी regular diet में शामिल करके cholesterol को कम करने में मदद मिल सकती है।

    इनमें से आप अपनी सुविधा के अनुसार कुछ foods को अपनी daily diet का हिस्सा बना सकते हैं।

    1. ओट्स (Oats)

    कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए पहला food है ओट्स।

    ओट्स में beta-glucan नाम का soluble fiber पाया जाता है। यह पेट और आंतों में एक तरह का gel बनाता है और cholesterol को शरीर से बाहर निकालने में मदद कर सकता है।

    अगर आप oats लेते हैं तो flavored और ज्यादा processed oats की जगह plain rolled oats या steel-cut oats को प्राथमिकता दे सकते हैं।

    इन्हें सब्जियों के साथ नमकीन दलिया बनाकर भी खाया जा सकता है।

    2. जौ (Barley)

    दूसरा बहुत अच्छा food है जौ।

    आयुर्वेद में जौ को मेदहर कहा गया है। इसमें भी soluble fiber पाया जाता है, जो cholesterol management में मदद कर सकता है।

    अगर आप रोज गेहूं की रोटी खाते हैं, तो अपनी diet में कुछ मात्रा में जौ की रोटी शामिल कर सकते हैं।

    3. अलसी (Flax Seeds)

    तीसरा food है अलसी।

    अलसी में:

    • Omega-3 fatty acids
    • Lignans
    • Fiber

    जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

    इसे खाने का एक आसान तरीका है कि अलसी को हल्का भूनकर पीस लें और फिर इसे:

    • दाल
    • सलाद
    • चावल
    • आटा
    • सूप

    आदि में मिलाकर खाएं।

    बेहतर होगा कि एक साथ बहुत ज्यादा powder बनाकर रखने की बजाय थोड़ी मात्रा में ही पीसें।

    4. लहसुन (Garlic)

    लहसुन को cholesterol के लिए एक महत्वपूर्ण food माना जाता है।

    लहसुन में allicin नाम का compound पाया जाता है।

    लहसुन का इस्तेमाल अपनी regular diet में किया जा सकता है। इसे सब्जी, दाल या अन्य भोजन में शामिल करना आसान है।

    5. मेथी दाना (Fenugreek Seeds)

    अगला food है मेथी दाना।

    मेथी में fiber और कई bioactive compounds पाए जाते हैं। इसे cholesterol और blood sugar management के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

    एक तरीका यह है कि मेथी दाने को रातभर पानी में भिगोकर सुबह लिया जाए।

    इसे पीसकर आटे या दाल-सब्जी में मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

    6. आंवला (Amla)

    आंवला आयुर्वेद में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाने वाला food है।

    इसमें antioxidant compounds और vitamin C पाए जाते हैं।

    आप इसे अलग-अलग तरीकों से अपनी diet में शामिल कर सकते हैं:

    • कच्चा आंवला
    • आंवला पाउडर
    • आंवला अचार
    • आंवला मुरब्बा

    अगर मुरब्बा खाते हैं तो उसमें मौजूद अतिरिक्त sugar का भी ध्यान रखना चाहिए।

    7. अखरोट (Walnuts)

    अखरोट में healthy fats और Omega-3 fatty acids पाए जाते हैं।

    इसे snack के रूप में लिया जा सकता है।

    उदाहरण के लिए शाम के समय कुछ अखरोट के साथ आंवला लिया जा सकता है।

    8. भिंडी (Lady Finger)

    भिंडी में soluble fiber पाया जाता है।

    इसलिए cholesterol management के लिए इसे अपनी diet में शामिल किया जा सकता है।

    भिंडी को बहुत ज्यादा तेल में fry करने की बजाय कम तेल में बनाना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    9. इसबगोल (Psyllium Husk)

    इस पूरी list में इसबगोल सबसे महत्वपूर्ण fiber sources में से एक है।

    इसमें बड़ी मात्रा में soluble fiber होता है और cholesterol management में इसका उपयोग किया जाता है।

    इसे दही या पानी के साथ लिया जा सकता है।

    इसबगोल लेते समय पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है।

    10. साबुत दालें और Beans

    हमारी रोज की kitchen में मौजूद एक बहुत underrated food है साबुत दालें और legumes।

    जैसे:

    • राजमा
    • छोले
    • काले चने
    • लोबिया
    • हरी मूंग
    • साबुत मसूर

    इनमें fiber और plant-based protein पाया जाता है।

    Cholesterol को ध्यान में रखते हुए साबुत दालों को diet में शामिल करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

    दालों को पकाने से पहले कुछ घंटे भिगोने से digestion में भी मदद मिल सकती है।

    इन Foods को Diet में कैसे शामिल करें?

    आप एक simple routine इस तरह बना सकते हैं:

    सुबह:
    Steel-cut oats का दलिया

    दोपहर:
    जौ की रोटी + राजमा/छोले/साबुत दाल

    शाम:
    अखरोट + आंवला

    रात:
    जौ की रोटी + साबुत दाल + भिंडी जैसी seasonal vegetable

    और जरूरत के अनुसार अलसी, मेथी दाना, लहसुन और इसबगोल को भी अपनी diet में शामिल किया जा सकता है।

    अगर आपका cholesterol काफी बढ़ा हुआ है या आप पहले से cholesterol की दवा ले रहे हैं, तो अपनी दवा को खुद से बंद करने के बजाय डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही बदलाव करें।

  • किन लोगों को सुबह उठकर गर्म पानी पीना चाहिए और किन लोगों को ठंडा ? योगा एक्सपर्ट ने बताया सही तरीका और सावधावनियां..

    किन लोगों को सुबह उठकर गर्म पानी पीना चाहिए और किन लोगों को ठंडा ? योगा एक्सपर्ट ने बताया सही तरीका और सावधावनियां..

    Featured Image

    दिन की शुरुआत एक गिलास पानी से करना सेहत के लिए हमेशा से फायदेमंद माना जाता रहा है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक साइंस तक, खाली पेट पानी पीने को फायदेमंद मानता है। साइंस के मुताबिक सुबह खाली पेट पानी पीने से बॉडी डिटॉक्स होती है और मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है। कुछ लोग सुबह उठकर 12 महीने गर्म पानी पीते हैं तो कुछ लोग ठंडा पानी पीते हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि सुबह उठकर हर किसी के लिए ठंडा और गर्म पानी पीने के फायदे बराबर हैं क्या? दरअसल, हर इंसान के शरीर की प्रकृति और उसकी शारीरिक जरूरतें अलग-अलग होती हैं। अक्सर लोग बिना अपनी बॉडी टाइप जैसे पित्त, वात या कफ को समझे केवल सुनी-सुनाई बातों पर सुबह-सुबह खौलता हुआ गर्म पानी पीना शुरु कर देते हैं तो कुछ लोग फ्रिज का ठंडा पानी पीना शुरू कर देते हैं, जो फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है।

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट और योग गुरु बाबा रामदेव ने बताया गर्म पानी जहां किसी के शरीर को ठीक कर देता है तो वहीं किसी दूसरे के शरीर में एसिडिटी,पेट में जलन और अपच जैसी घटनाओं को बढ़ा देता है। योग गुरु के मुताबिक अपने शरीर की स्थिति को समझ कर सुबह पानी का सेवन करना जरूरी है और सुबह उठकर प्राणायाम करना भी जरूरी है। आइए जानते हैं कि सेहत और लाइफस्टाइल के हिसाब से पानी का सही तापमान क्या होना चाहिए और इसे पीते समय किन-किन सावधानियों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है ।

    सुबह उठते ही कैसा पानी पिएं?

    सुबह उठकर पानी पीना शरीर में रातभर हुई सामान्य फ्लूइड लॉस की भरपाई करने का आसान तरीका है। लेकिन हर व्यक्ति के लिए पानी का तापमान एक जैसा होना जरूरी नहीं है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति अपनी पसंद और आराम के अनुसार कमरे के तापमान वाला या हल्का गुनगुना पानी पी सकता है। बहुत गर्म या बहुत ठंडा पानी पीना जरूरी नहीं है।

    किन लोगों को ठंडा पानी पीना चाहिए?

    योग गुरु के मुताबिक अगर एक हेल्दी इंसान ठंडा पानी आसानी से पचा और सहन कर पाता है, तो उसे नॉर्मल पानी पी सकता है। ऐसा जरूरी नहीं है कि गर्मियों में हर व्यक्ति के लिए ठंडा पानी नुकसानदायक होता है। योग गुरु ने बताया बहुत ठंडा पानी कुछ लोगों में दांतों की संवेदनशीलता, गले में असहजता या सिर में अचानक दर्द जैसी परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए तापमान का चुनाव व्यक्ति की सहनशीलता पर निर्भर करता है।

    किन लोगों को सुबह गुनगुना पानी पीना चाहिए?

    जिन लोगों को सुबह ठंडा पानी पीने से असहजता होती है, वे हल्का गुनगुना पानी ले सकते हैं। कब्ज वाले लोगों में पर्याप्त पानी पीना मल को नरम रखने और bowel movement को आसान बनाने में मदद कर सकता है। गर्म पानी का सेवन करने से ना सिर्फ कब्ज की समस्या में राहत मिलती है बल्कि वजन कंट्रोल करना भी आसान होता है।

    कौन-कौन सी बीमारियों में गर्म पानी से करें परहेज

    बाबा रामदेव ने बताया जिन लोगों को एसिडिटी और गैस की दिक्कत होती है उन्हें सुबह खाली पेट गर्म पानी का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। ऐसे लोग सामान्य तापमान या हल्का गुनगुना पानी अपनी सुविधा के अनुसार ले सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए बहुत अधिक मात्रा में पानी एक साथ पीने के बजाय दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहतर है। अगर बार-बार एसिडिटी होती है, तो केवल पानी के तापमान पर निर्भर रहने के बजाय इसके कारणों की जांच करना भी जरूरी है।

    पानी पीने का सही तरीका क्या है?

    आयुर्वेद के मुताबिक पानी पीने का तरीका भी बहुत मायने रखता है। आयुर्वेद खड़े होकर पानी पीने के लिए मना करता है। आयुर्वेद के मुताबिक खड़े होकर पानी पीने से घुटनों या जोड़ों में दर्द होता है, या फिर शरीर में ‘वात विकृत’ हो जाता है। आप जब भी पानी पिएं तो बैठकर पिएं। आराम से बैठकर धीरे-धीरे पानी पीना ठीक है। सबसे जरूरी बात है कि पानी को बहुत तेजी से या जबरदस्ती ज्यादा मात्रा में नहीं पिएं।

    सुबह कितना पानी पीना चाहिए?

    सुबह उठकर जरूरी नहीं है कि आप बोतल भरकर या फिर तीन चार गिलास पानी का सेवन करें। आप सुबह उठकर एक से दो गिलास पानी पी सकते हैं। पानी की रिक्वायरमेंट प्यास, मौसम, शारीरिक गतिविधि और दिनभर के कुल fluid intake के अनुसार बदलती रहती है। एक साथ बहुत ज्यादा पानी पीने के बजाय दिनभर नियमित रूप से पानी पीना बेहतर है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। पानी के तापमान और सेवन की मात्रा हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और मौसम के अनुसार अलग हो सकती है। किसी बीमारी के इलाज या वजन कम करने के लिए केवल गर्म या ठंडे पानी पर निर्भर न रहें। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या या लगातार लक्षण होने पर डॉक्टर की सलाह ले।

  • वजन बढ़ने से परेशान है तो सुबह की ये 3 आदतें बदलें, इंसुलिन और वजन रहेगा बैलेंस..

    वजन बढ़ने से परेशान है तो सुबह की ये 3 आदतें बदलें, इंसुलिन और वजन रहेगा बैलेंस..

    Featured Image

    सुबह की शुरुआत आपकी सेहत का मिजाज तय करती है। अगर आपका वजन लगातार बढ़ रहा है और शरीर में इंसुलिन का संतुलन बिगड़ा हुआ है, तो इसकी वजह आपकी सुबह की रूटीन हो सकती है। खराब लाइफस्टाइल और गलत खान-पान के चलते वजन बढ़ना और इंसुलिन असंतुलित होना आज एक आम समस्या बन चुका है। अगर आप भी सुबह उठते ही कुछ ऐसी गलतियां कर रहे हैं जो आपके मेटाबॉलिज्म को धीमा कर रही हैं, तो संभल जाने की जरूरत है। भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र के मुताबिक सुबह की सिर्फ 3 आदतों में बदलाव करके आप अपने इंसुलिन लेवल को मैनेज कर सकते हैं और वजन को भी कंट्रोल कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि सुबह की आदतें कैसे इंसुलिन और वजन को मैनेज करने में मदद कर सकती हैं।

    सुबह की आदतें कैसे इंसुलिन और वजन को मैनेज करने में मदद कर सकती हैं

    अगर आप कम खाना खाने के बावजूद वजन बढ़ने, खासकर पेट के आसपास चर्बी जमा होने से परेशान हैं, तो वजह सिर्फ कैलोरी की मात्रा नहीं हो सकती। शरीर इंसुलिन के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करता है, यह भी महत्वपूर्ण है। सुबह की कुछ आसान आदतें इंसुलिन संवेदनशीलता और हेल्दी वेट को सपोर्ट कर सकती हैं। इंसुलिन एक हार्मोन है जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाता है। जब हम कार्बोहाइड्रेट खाते हैं, तो वे ग्लूकोज में टूटता हैं और ब्लडस्ट्रीम में पहुंचता हैं। इंसुलिन ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है, जहां इसका इस्तेमाल ऊर्जा के लिए किया जाता है। इसलिए इंसुलिन खुद समस्या नहीं है बल्कि लक्ष्य यह है कि शरीर इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करे।

    गुनगुना पानी पिएं

    रात में 6 से 8 घंटे सोने के बाद शरीर थोड़ा डिहाइड्रेट हो सकता है। सांस लेने और पसीने के कारण रातभर शरीर से पानी की कुछ मात्रा कम होती है। इसलिए सुबह उठकर गुनगुना पानी पीना हाइड्रेशन बनाए रखने का आसान तरीका है। ध्यान रखें कि पानी सीधे इंसुलिन का स्तर कम नहीं करता, लेकिन पर्याप्त हाइड्रेशन मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है और कई बार प्यास को भूख समझने से बचा सकता है। सुबह-सुबह बहुत गर्म नहीं बल्कि गुनगुना पानी पीना सेहत के लिए उपयोगी है।

    मांसपेशियों को एक्टिव करें

    आप अपने दिन की शुरुआत करने से पहले अपनी मांसपेशियों को एक्टिव रखें फिर नाश्ता करें। मांसपेशियां शरीर में ग्लूकोज के इस्तेमाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब आप शारीरिक गतिविधि करते हैं, तो मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल करने लगती हैं और इससे इंसुलिन संवेदनशीलता को सपोर्ट मिल सकती है। सुबह नाश्ते से पहले 15 से 20 मिनट की हल्की से मध्यम एक्टिविटी आपके वजन को कम करने में बेहद असरदार साबित होती है। बॉडी एक्टिविटी में सुबह तेज चाल से चलना, सूर्य नमस्कार, स्ट्रेचिंग, सीढ़ियां चढ़ना या अपनी क्षमता के अनुसार हल्की एक्सरसाइज बेहतर विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के लिए खाली पेट एक्सरसाइज जरूरी नहीं है। अपनी क्षमता और हेल्थ कंडीशन के मुताबिक आप बॉडी को एक्टिव रख सकते हैं।

    इंसुलिन-फ्रेंडली नाश्ता खाएं

    आपका सुबह का नाश्ता बैलेंस होना चाहिए जिसमें फाइबर, प्रोटीन, हेल्दी फैट और अच्छी गुणवत्ता वाले कार्बोहाइड्रेट का संतुलन हो। नाश्ते में फाइबर का सेवन करेंगे तो पाचन की गति धीमी रहेगी, जिससे ग्लूकोज धीरे-धीरे ब्लडस्ट्रीम में पहुंचेगा। आप सुबह के नाश्ते में सब्जियां, स्प्राउट्स, साबुत फल, ओट्स, मिलेट्स और साबुत अनाज खा सकते हैं। प्रोटीन डाइट के लिए आप सुबह के नाश्ते में  मूंग, चना, राजमा, पनीर, दही, टोफू, नट्स और बीज खा सकते हैं। प्रोटीन डाइट पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराने, मांसपेशियों को सपोर्ट करने और बार-बार स्नैकिंग से बचने में मदद कर सकती है। हेल्दी फैट की प्राप्ति के लिए आप नाश्ते में नट्स, बीज, मूंगफली, तिल, अलसी और थोड़ी मात्रा में घी का सेवन कर सकते हैं। इन्हें सीमित मात्रा में लेना बेहतर है। सुबह सुबह बॉडी में एनर्जी बनाए रखने के लिए कार्बोहाइड्रेट भी जरूरी हैं, लेकिन बहुत अधिक रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता हैं। आप सुबह के नाश्ते में साबुत अनाज, दालें, बीन्स, साबुत फल, मिलेट और सीमित मात्रा में चपाती या चावल का सेवन कर सकते हैं।

    सुबह की खराब आदतें जो बढ़ाती है वजन और बिगाड़ती है इंसुलिन बैलेंस

    नाश्ता छोड़ने से बचें

    नाश्ता छोड़ने के बाद कुछ लोगों को बहुत ज्यादा भूख लग सकती है, जिसके कारण बाद में ज्यादा खाना या मीठा और रिफाइंड फूड्स लोग ज्यादा खाते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के लिए सिर्फ नाश्ता करना ही जरूरी नहीं बल्कि दिनभर के खाने का ध्यान रखना भी जरूरी है। नाश्ते में पिज्जा, फ्राइड राइस और मिठाइयां न लें। बचे हुए पिज्जा, फ्राइड राइस, नूडल्स और मिठाइयां अक्सर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी और वसा से भरपूर होते हैं। इन्हें नियमित नाश्ते का हिस्सा बनाने के बजाय फाइबर और प्रोटीन से भरपूर विकल्प चुनना बेहतर है।

    नाश्ते में सिर्फ ड्रिंक का ही नहीं करें सेवन

    फ्रूट जूस, मीठी चाय-कॉफी, मिल्क शेक और मीठी लस्सी जैसे ड्रिंक में फाइबर कम हो सकता है और इनमें मौजूद शुगर तेजी से अवशोषित हो सकती है। साबुत फल खाना आमतौर पर जूस पीने से बेहतर विकल्प है।

    जरूरत से ज्यादा खाने से बचें

    बहुत ज्यादा खाना एक साथ लेने से कुल कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ सकती है। इसलिए पेट को बहुत भारी करने के बजाय संतुष्ट होने तक खाना बेहतर है।

    लंबे समय तक लगातार न बैठें

    खाने के बाद थोड़ी देर चलना-फिरना या लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचना ग्लूकोज कंट्रोल के लिए मददगार हो सकता है। दिनभर की छोटी-छोटी एक्टिविटी करके ब्रेक लेना एक अच्छी आदत है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। सुबह की ये आदतें और संतुलित आहार इंसुलिन संवेदनशीलता और वजन कंट्रोल को सपोर्ट कर सकते हैं, लेकिन ये डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस या मोटापे का इलाज नहीं हैं। किसी भी डाइट या एक्सरसाइज में बदलाव से पहले, खासकर यदि आप डायबिटीज की दवा लेते हैं या कोई स्वास्थ्य समस्या है, डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन की सलाह जरूर लें।

  • दिल की बीमारियों से बचना है तो कभी नहीं नजरअंदाज करें ये 5 आदतें, कार्डियोलॉजिस्ट ने दी आदत बदलने की सलाह..

    दिल की बीमारियों से बचना है तो कभी नहीं नजरअंदाज करें ये 5 आदतें, कार्डियोलॉजिस्ट ने दी आदत बदलने की सलाह..

    Featured Image

    दिल को सेहतमंद रखना केवल सही खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि आपकी रोजमर्रा की आदतें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। अक्सर लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो धीरे-धीरे दिल की सेहत को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार अगर आप समय रहते अपने लाइफस्टाइल में सुधार कर लें और कुछ सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली आदतों से दूरी बना लें, तो दिल की बीमारियों के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

    इंस्टाग्राम पोस्ट में बोर्ड-सर्टिफाइड कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. निकोल हार्किन ने दिल को हेल्दी रखने के लिए ऐसी 5 चीजें बताई हैं जिन्हें किसी को भी अपने लाइफस्टाइल में जगह नहीं देना चाहिए।  उन्होंने बताया दिल को हेल्दी रखने के लिए डाइट और लाइफस्टाइल में छोटे छोटे बदलाव असरदार साबित होते हैं। आइए एक्सपर्ट की वीडियो से जानते हैं कि कि कौन-कौन सी 5 आदते हैं जिन्हें दिल को हेल्दी रखने के लिए बदलना जरूरी है।

    स्मोकिंग और वेपिंग दिल के लिए खतरा

    cdc.gov में छपी खबर के मुताबिक सिगरेट का धुआं रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और धमनियों में प्लाक (वसा का जमाव) बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। निकोटीन दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है और ब्लड वैसल्स को संकुचित कर सकता है और खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ा सकता है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। cdc की रिपोर्ट के मुताबिक वेपिंग को भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। ई-सिगरेट के एरोसोल में मौजूद कुछ रसायन ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ा सकते हैं तथा रक्त वाहिकाओं के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। निकोटीन वाले वेपिंग प्रोडक्ट्स ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट बढ़ाकर दिल पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं इसलिए सिगरेट और वेपिंग से परहेज करना जरूरी है।

    प्रोसेस्ड मीट दिल के लिए क्यों चिंता की बात है?

    American Heart Association के मुताबिक सॉसेज, बेकन, सलामी, हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मीट में सोडियम और सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक हो सकती है। इन फूड्स का अधिक सेवन करने से हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल और दूसरे कार्डियो मेटाबोलिक जोखिम बढ़ते हैं। इसी वजह से अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन हार्ट हेल्दी डाइट में प्रोसेस्ड मीट का सेवन कम करने की सलाह देता है।

    सीने में दर्द को नहीं करें नजरअंदाज?

    अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी (ACC) समेत अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं की 2021 की ‘Guideline for the Evaluation and Diagnosis of Chest Pain’ के मुताबिक, सीने में दर्द, दबाव, जकड़न या असहजता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि कंधे, बांह, गर्दन, पीठ, ऊपरी पेट या जबड़े में भी महसूस हो सकता है। सांस फूलना और थकान भी इसके साथ हो सकते हैं।

    हार्ट डिजीज की फैमिली हिस्ट्री है तो सतर्क रहें

    अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) के मुताबिक अगर माता-पिता, भाई-बहन या दादा-दादी को कम उम्र में हार्ट डिजीज या स्ट्रोक हुआ है, तो व्यक्ति में हृदय रोग का जोखिम अधिक हो सकता है। इसका कारण केवल लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि जेनेटिक प्रवृत्ति भी हो सकती है। पारिवारिक इतिहास होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति को हार्ट अटैक जरूर होगा, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण risk signal है। ऐसे लोगों को अपने परिवार का मेडिकल इतिहास जानना और डॉक्टर के साथ ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर आदि की नियमित जांच कराना जरूरी है।

    अच्छी नींद है दिल की जरूरत

    American Heart Association के मुताबिक नींद के दौरान शरीर को रिकवरी का समय मिलता है। लगातार कम या खराब गुणवत्ता वाली नींद का संबंध हाई ब्लड प्रेशर, खराब मेटाबॉलिक हेल्थ, मोटापा, सूजन और दिल के रोग जैसे जोखिम कारकों से पाया गया है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार अधिकांश वयस्कों को औसतन 7–9 घंटे की नींद का लक्ष्य रखना चाहिए। यानी दिल की सुरक्षा सिर्फ खाने और एक्सरसाइज तक सीमित नहीं है है बल्कि आपको स्मोकिंग से दूरी, बेहतर डाइट, पर्याप्त नींद, अपने जोखिमों की जानकारी और चेतावनी संकेतों को समय पर पहचानना भी जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है और इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। सीने में दर्द, दबाव, जकड़न, सांस फूलना, चक्कर या अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें। ऐसे लक्षण अचानक या गंभीर रूप से दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

  • पेट साफ न होने और भारीपन से परेशान हैं? अपनाएं आयुर्वेदिक डॉक्टर के बताए ये 7 असरदार उपाय

    पेट साफ न होने और भारीपन से परेशान हैं? अपनाएं आयुर्वेदिक डॉक्टर के बताए ये 7 असरदार उपाय

    Featured Image

    खराब डाइट, बिगड़ता लाइफस्टाइल, तनाव, बॉडी एक्टिविटी की कमी, फाइबर का कम सेवन और पानी कम पीने की आदत ऐसी खराब आदतें हैं जो कब्ज और पेट से जुड़ी बीमारियों की अहम वजह हैं। महीने या हफ्तों में कभी-कभी कब्ज होना परेशानी की बात नहीं है लेकिन ये समस्या लगातार और रेगुलर बनी रहे तो सेहत को बिगाड़ सकती है। लम्बे समय तक रहने वाला कब्ज पेट से लेकर आंतों तक को सड़ा सकता है।  कब्ज में मल कठोर या सूखा हो जाता है और उसे डिस्चार्ज करने के लिए जोर लगाना पड़ता है जिससे पाइल्स का खतरा बढ़ सकता है।

    आयुर्वेदाचार्य दीपक कुमार ने बताया आजकल लोगों की दिनचर्या और खान-पान काफी बिगड़ गया है। देर रात तक जागना, पर्याप्त नींद न लेना, पोषक तत्वों और फाइबर की कमी वाला भोजन करना, तला-भुना खाना, मैदा और बाजार का खाना अधिक खाना कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं की वजह बन सकता है। समय पर न उठना और दिनचर्या में अनियमितता जैसी आदतें भी कब्ज और पेट से जुड़ी बीमारियों का कारण बन सकती हैं। आयुर्वेदाचार्य ने कब्ज से परेशान लोगों को राहत दिलाने के लिए 7 नेचुरल उपाय बताएं हैं जिन्हें अपनाकर कब्ज की बीमारी का समाधान किया जा सकता है। आइए जानते हैं कौन से 7 असरदार तरीके हैं जो कब्ज को दूर कर सकते हैं।

    सोने से पहले गुनगुना पानी पिएं

    आयुर्वेदाचार्य दीपक कुमार ने बताया सोने से करीब 30-60 मिनट पहले एक गिलास गुनगुना पानी पिएं। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार इससे आंतों को गर्माहट मिलती है और रात में पाचन क्रिया को सपोर्ट मिलता है। इसे कब्ज में मददगार बताया गया है। हालांकि, रात में बहुत अधिक पानी पीना कुछ लोगों में बार-बार पेशाब आने या नींद प्रभावित होने का कारण बन सकता है।

    रात में दूध या पानी के साथ घी का करें सेवन

    रात में सोने से करीब एक घंटा पहले आधे से एक चम्मच घी का सेवन करें। इसे गर्म दूध या गर्म पानी के साथ लेने से सुबह उठते ही आपका पेट साफ होगा। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार घी आंतों के सूखेपन को कम करके मल को आसानी से बाहर निकालने में मदद करेगा। इसे आयुर्वेद में ‘स्नेहपान’ से जोड़ा गया।

    त्रिफला का करें सेवन

    तीसरी सलाह त्रिफला के सेवन की है। त्रिफला हरड़, बहेड़ा और आंवला से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक आयुर्वेदिक मिश्रण है। इसका सेवन करने से कब्ज से राहत मिलेगी।  रात में आधे से एक चम्मच त्रिफला गर्म पानी या दूध के साथ लेने से सुबह उठते ही आपका पेट साफ होगा और आपको घंटों टॉयलेट में नहीं बैठना पड़ेगा। आयुर्वेदाचार्य ने इसे रेगुलेटिव हर्ब बताया है। रात में लेने पर यह मल त्याग में मदद कर सकता है। याद रखें कि इसका सीमित ही सेवन करें। ज्यादा सेवन करने से दस्त, पेट में ऐंठन या दूसरी पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है। एक्सपर्ट ने बताया जिन लोगों को त्रिफला लेने के बाद पेट में ज्यादा एसिडिटी या ढीलापन महसूस होता है, उन्हें इस हर्ब का सेवन करने से बचना चाहिए।

    मुनक्का खाएं

    डॉक्टर ने बताया कब्ज से निजात पाने के लिए आप मुनक्का का सेवन भी कर सकते हैं।  रात में 4-5 मुनक्के को पानी में भिगो दें  और सुबह उन्हें चबा-चबाकर खा लें। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार मुनक्के में मौजूद फाइबर मल त्याग को आसान बनाने में मदद कर सकता है। मुनक्का खाने के बाद भिगोया हुआ पानी पी लें कब्ज से राहत मिलेगी। मुनक्के आयरन का अच्छा स्रोत है ये बॉडी में खून की कमी को पूरा करता है और बॉडी को हेल्दी रखता है।

    हरड़ का करें इस्तेमाल

    आयुर्वेदाचार्य ने कब्ज का इलाज करने के लिए छोटी हरड़ का सेवन करने की सलाह दी है।  इसे कब्ज की महारानी कहा है। हरड़ को भिगोकर सुबह खाने या उसका चूर्ण बनाकर गर्म पानी या फिर दूध के साथ लेने से पेट और आंतों की गंदगी साफ होती है। आयुर्वेद में हरड़ को कोलन की गति को संतुलित करने वाला माना जाता है। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के मुताबिक इसका सेवन करने से पेट से अतिरिक्त गैस निकलती है और कब्ज में राहत मिलती है।

    सोने से पहले पेट की मालिश करें

    छठी सलाह रात में करीब 10 मिनट पेट की मालिश करें। पेट की मालिश क्लॉकवाइज दिशा में करने से आराम की नींद आती है और पेट की सफाई होने में भी मदद मिलती है।पेट की मालिश करने के लिए आप गाय के घी या सरसों के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं।  आयुर्वेदाचार्य के अनुसार पेट की मालिश से आंतों की गतिविधि को सक्रिय करने और मल को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    नाभि में तेल या घी लगाएं

    नाभि में दो बूंद सरसों का तेल या गाय का घी लगाने से आपके पाचन को सपोर्ट मिलेगी । इसे शरीर और स्किन की ड्राईनेस को कम करने में मददगार बताया गया।

    रात में देर से खाना न खाएं

    डॉक्टर से कब्ज से बचाव के लिए सातवी और आखिरी सलाह दी है कि रात में बहुत देर से भोजन न करें। आयुर्वेदिक डॉक्टर ने बताया रात 8-9 बजे तक भोजन पूरा कर लें और फिर वॉक करके सो जाएं। आप रात में 10-11 बजे खाना खाने से परहेज करें। रात में बहुत भारी और देर से भोजन करने से पाचन संबंधी परेशानी बढ़ सकती है, इसलिए नियमित भोजन का समय रखना उपयोगी हो सकता है।

  • गुलाबी होंठों के लिए ये स्क्रब बनाकर लगाती हैं प्रियंका चोपड़ा, स्किन एक्सपर्ट से जानें कितना असरदार है ये नुस्खा..

    गुलाबी होंठों के लिए ये स्क्रब बनाकर लगाती हैं प्रियंका चोपड़ा, स्किन एक्सपर्ट से जानें कितना असरदार है ये नुस्खा..

    Featured Image

    मुलायम, गुलाबी और हेल्दी होंठ चेहरे की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं. हालांकि धूप, डिहाइड्रेशन, धूल-मिट्टी और बार-बार लिप प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से होंठ रूखे और बेजान नजर आने लगते हैं. ऐसे में महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स की जगह, आसान घरेलू नुस्खे भी कमाल कर सकते हैं. ग्लोबल आइकन प्रियंका चोपड़ा भी अपने होंठों की देखभाल के लिए एक आसान DIY लिप स्क्रब का इस्तेमाल करती हैं, जिसे समुद्री नमक, ग्लिसरीन और गुलाब जल से तैयार किया जाता है, लेकिन क्या सच में होंठों को मुलायम और गुलाबी बनाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको बताते हैं इस DIY लिप स्क्रब के फायदे.

    प्रियंका चोपड़ा का DIY लिप स्क्रब

    इस आसान स्क्रब को बनाने के लिए समुद्री नमक, ग्लिसरीन और गुलाब जल को मिलाया जाता है. समुद्री नमक होंठों पर जमी मृत त्वचा को हटाने में मदद करता है, जबकि ग्लिसरीन नमी बनाए रखने का काम करती है. वहीं, गुलाब जल होंठों को ताजगी और हल्की ठंडक देने में मदद कर सकता है.

    स्किन एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

    स्किन एक्सपर्ट डॉ. रुचि अग्रवाल ने बताया कि मैं न तो पूरी तरह इसके पक्ष में हूं और न ही इसके खिलाफ, लेकिन इसे समझदारी से इस्तेमाल करना चाहिए. सी सॉल्ट होंठों की ऊपरी डेड स्किन को हटाता है, ग्लिसरीन नमी को बनाए रखता है और गुलाब जल होंठों को आराम और हाइड्रेशन देता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, इससे होंठ कुछ समय के लिए मुलायम और चमकदार लग सकते हैं, लेकिन लिप स्क्रब आपके होंठों का नेचुरल रंग नहीं बदलते. वे सिर्फ होंठों की ऊपरी सूखी और डेड स्किन को हटाते हैं. इसलिए अगर आपके होंठ काले हैं, तो इसकी वजह धूप में ज्यादा रहना, जेनेटिक्स या लगातार होने वाली जलन हो सकती है. स्क्रबिंग से यह ठीक नहीं होगा. असल में ज्यादा स्क्रबिंग से जलन बढ़ सकती है और पिगमेंटेशन भी और खराब हो सकता है. इसलिए अगर आप लिप स्क्रब का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो इसे हर दो हफ्ते में सिर्फ एक बार ही करें.

    इस्तेमाल करते समय किन बातों का रखें ध्यान

    • हफ्ते में 1 से 2 बार से ज्यादा स्क्रब न करें.
    • स्क्रब को हल्के हाथों से लगाएं.
    • स्क्रब के बाद लिप बाम जरूर लगाएं.
    • अगर होंठ पहले से कटे-फटे या बहुत संवेदनशील हैं, तो स्क्रब करने से बचें.