आजकल तनाव, खराब खान-पान, पर्याप्त नींद न लेना और शारीरिक गतिविधि की कमी का असर पुरुषों की यौन सेहत पर भी पड़ सकता है। इससे सेक्स ड्राइव, ऊर्जा, स्टैमिना और परफॉर्मेंस प्रभावित हो सकती है। आयुर्वेद में ऐसी कई जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें पारंपरिक रूप से पुरुषों की ताकत और रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
हालांकि, किसी भी जड़ी-बूटी को यौन समस्या का निश्चित इलाज नहीं माना जाना चाहिए। लगातार समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
1. अश्वगंधा
अश्वगंधा को आयुर्वेद की प्रमुख औषधीय जड़ी-बूटियों में गिना जाता है। यह तनाव और थकान कम करने में मदद कर सकती है। कुछ अध्ययनों में इसके सेवन को पुरुषों के यौन स्वास्थ्य, टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म पैरामीटर्स में संभावित सुधार से जोड़ा गया है।
2. शिलाजीत
शिलाजीत का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से ऊर्जा और शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। कुछ शोधों में शुद्ध शिलाजीत के सेवन से टेस्टोस्टेरोन और पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य पर संभावित लाभ की बात सामने आई है। इसे हमेशा विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त करना चाहिए।
3. सफेद मूसली
सफेद मूसली को आयुर्वेद में बल और ऊर्जा बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी के रूप में जाना जाता है। पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल पुरुषों की कमजोरी, थकान और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में किया जाता रहा है।
4. कौंच बीज
कौंच बीज यानी कपिकच्छु का इस्तेमाल आयुर्वेद में पुरुषों के रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए किया जाता है। इसमें L-DOPA जैसे यौगिक पाए जाते हैं। हालांकि, इसका सेवन विशेषज्ञ की सलाह से करना बेहतर माना जाता है, क्योंकि यह कुछ दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकता है।
5. गोक्षुर
गोक्षुर को पारंपरिक रूप से यूरिनरी और रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे पुरुषों की ऊर्जा और यौन स्वास्थ्य से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि, टेस्टोस्टेरोन या इरेक्टाइल डिस्फंक्शन पर इसके प्रभाव को लेकर मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।
6. अकरकरा
अकरकरा का उपयोग आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से यौन इच्छा और शारीरिक ऊर्जा से संबंधित समस्याओं के लिए किया जाता रहा है। लेकिन इसकी प्रभावशीलता और सही मात्रा के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।
7. शतावरी
शतावरी को आमतौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है, लेकिन आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल पुरुषों की सामान्य ताकत और रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए भी किया जाता है। इसके प्रभावों पर अभी और वैज्ञानिक शोध की जरूरत है।
8. केसर
केसर का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा में मूड और सामान्य स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। कुछ छोटे अध्ययनों में इसके यौन कार्य और इच्छा पर संभावित सकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं। हालांकि, इसे सेक्स पावर बढ़ाने की पक्की दवा नहीं माना जा सकता।
9. विदारीकंद
विदारीकंद को आयुर्वेद में शरीर को पोषण देने और ताकत बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल कमजोरी और थकान में किया जाता रहा है। यौन स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर अधिक वैज्ञानिक प्रमाण अभी आवश्यक हैं।
10. तालमखाना
तालमखाना का इस्तेमाल पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में पुरुषों की ताकत और रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए किया जाता है। हालांकि, इसके फायदे और सही मात्रा व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर कर सकती है।
सिर्फ जड़ी-बूटियां ही नहीं, इन बातों का भी रखें ध्यान
यौन स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए केवल किसी सप्लीमेंट या जड़ी-बूटी पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है। रोजाना व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, तनाव कम करना, धूम्रपान और अत्यधिक शराब से दूरी बनाना भी महत्वपूर्ण है।
अगर इरेक्शन की समस्या, सेक्स ड्राइव में कमी, शीघ्रपतन या किसी अन्य यौन समस्या की शिकायत लगातार बनी रहती है, तो खुद से कोई आयुर्वेदिक या अन्य दवा शुरू करने के बजाय डॉक्टर या योग्य आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से सलाह लें।
ध्यान रखें: प्राकृतिक या आयुर्वेदिक होने का मतलब यह नहीं है कि हर उत्पाद हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित है। खासकर यदि आप पहले से कोई दवा लेते हैं, तो किसी भी हर्बल सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।
मोटापा आज के समय में बहुत कॉमन प्रॉब्लम है। कई लोग इस समस्या से परेशान हैं, ऐसे में लोग तेजी से वजन कम करना चाहते हैं। इसके लिए लोग शॉर्टकट भी अपनाते हैं। वहीं कुछ लोग तेजी से वजन घटाने के लिए रोजाना खूब चलते हैं। वजन घटाने के लिए लोग टारगेट तक सेट करते हैं। ज्यादातर लोगों का गोल एक हफ्ते में 5 किलो वजन घटाना होता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या एक हफ्ते में 5 किलो वजन घटाया जा सकता है और अगर घटाया जा सकता है तो इसका शरीर पर क्या असर होता है। डॉ वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ, बता रही हैं कि एक हफ्ते में 5 किलो वजन कम करना सेफ है या नहीं।
क्या कहती हैं डाइटिशियन
एक हफ्ते में 5 किलो वजन घटाने के लिए बहुत बड़ा कैलोरी डेफिसिट चाहिए, जिसे केवल पैदल चलकर एक सप्ताह में हासिल करना अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं है और ऐसा करना कमजोरी, डिहाइड्रेशन और मांसपेशियों की कमजोरी को बढ़ा सकता है। एक स्वस्थ वयस्क के लिए शुरुआत में प्रतिदिन 5–7 किलोमीटर या लगभग 7,000–10,000 कदम चलना एक लक्ष्य हो सकता है। लेकिन कैलोरी बर्न व्यक्ति के वजन, चलने की गति, उम्र, फिटनेस और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। वजन घटाने में केवल वॉकिंग नहीं, बल्कि कैलोरी-कंट्रोल, संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन, नींद और फिजिकल एक्टिविटी जरूरी है।
वेट लॉस का सही तरीका
अगर आप हेल्दी तरीके से वजन घटाना चाहते हैं तो हफ्ते में लगभग 0.5–1 किलो वजन घटाना सेफ हो सकता है। 5 किलो वजन एक महीने या कुछ हफ्तों के अंदर घटाना स्वास्थ के लिए भी सेफ होता है। अगर आप एक हफ्ते में 5 किलो वजन घटाते हैं तो इसका असर आपकी ओवरऑल हेल्थ पर भी पड़ सकता है। अगर आप वॉक करके वजन घटाना चाहते हैं तो इसके साथ आपको अपनी डाइट में चीनी, मीठे पेय, तले हुए खाद्य पदार्थ और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड कम करे तथा सब्जियां, फल, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन शामिल करे। डॉ दीक्षा सहवाग कहती हैं कि मेरी सलाह है कि किलोमीटर की संख्या के बजाय स्थिरता पर ध्यान दें। रोज 30–60 मिनट ब्रिस्क वॉक से शुरुआत करें और अपनी क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे इसे बढ़ाएं।
मानव शरीर में लिवर एक ऐसी ‘केमिकल फैक्ट्री’ की तरह काम करता है, जो भोजन को पचाने,टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकालने और ऊर्जा को स्टोर करने जैसे 500 से अधिक जरूरी काम अकेले संभालता है। लेकिन जब हमारी खराब जीवनशैली और असंतुलित खानपान के कारण इस महत्वपूर्ण अंग की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा वसा (Fat) जमा होने लगती है, तो यह ‘फैटी लिवर’ का रूप ले लेता है। शुरुआती दौर में इसके लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा होता है और इसके शुरुआती संकेत क्या हैं।
मारेंगो एशिया हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में वरिष्ठ सलाहकार एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अमित मित्तल ने बताया फैटी लिवर की बीमारी का समय पर इलाज नहीं किया जाए तो ये परेशानी बढ़कर हेपेटाइटिस या सिरोसिस की अवस्था में पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में मरीज को भूख कम लगना, कमजोरी, मांसपेशियों की कमजोरी और पोषण की कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए समय पर पहचान करना बेहद जरूरी है ताकि परेशानी से बचा जा सके। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि फैटी लिवर के लक्षण कौन-कौन से हैं और किन लोगों को इसका खतरा ज्यादा होता है और इससे बचाव कैसे करें।
फैटी लिवर के प्रमुख कारण
लिवर पर फैट चढ़ने के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे मोटापा,शारीरिक गतिविधि की कमी, खराब खानपान, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, अत्यधिक शराब सेवन, प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन, पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थ लिवर पर फैट डिपॉजिट करने के लिए जिम्मेदार है।
फैटी लिवर के लक्षण
फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। कई लोगों को इसका पता नियमित हेल्थ चेकअप या अल्ट्रासाउंड के दौरान चलता है। अगर बॉडी के संकेतों पर ध्यान दिया जाए तो फैटी लिवर की पहचान की जा सकती है। इसके लक्षणों की बात करें तो
पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन
लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना
बिना कारण वजन कम होना
भूख कम लगना
मतली या उल्टी जैसा महसूस होना
पेट में सूजन होना
ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई या भ्रम की स्थिति
स्किन और आंखों का पीला पड़ना
पैरों और टखनों में सूजन
शरीर में खुजली होना
किन लोगों में फैटी लिवर का खतरा अधिक होता है?
जिन लोगों का मोटापा ज्यादा है या पेट पर चर्बी है उन्हें फैटी लिवर का खतरा ज्यादा है।
टाइप 2 डायबिटीज मरीजों को रहता है फैटी लिवर का खतरा
हाई कोलेस्ट्रॉल या हाई ट्राइग्लिसराइड्स के मरीजों को
हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को
शारीरिक गतिविधि की कमी वाले लोगों को
अत्यधिक शराब का सेवन करने वाले लोगों को
अनहेल्दी डाइट का सेवन करने वाले लोगों को रहता है ज्यादा खतरा
फैटी लिवर से बचाव के लिए ये रहा डाइट चार्ट
समय क्या खाएं सुबह उठते ही गुनगुना पानी, ग्रीन टी या ब्लैक कॉफी नाश्ता पोहा, दलिया, बेसन चीला, दाल चीला, फल मिड-मॉर्निंग सेब, पपीता, संतरा, मौसमी, बादाम, अखरोट दोपहर का भोजन1-2 मल्टीग्रेन रोटी, दाल, हरी सब्जी, सलादशाम का नाश्ताग्रीन टी, भुने चने, स्प्राउट्स, फल रात का भोजन 1-2 रोटी, दाल, सब्जी, सलाद और दही
फैटी लिवर से बचाव के लिए इन उपायों को अपनाएं
संतुलित और फाइबर युक्त डाइट लें। रोजाना भोजन में मौसमी फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और बीन्स शामिल करें। फाइबर युक्त आहार वजन कंट्रोल रखने और लिवर की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।
हेल्दी फैट को प्राथमिकता दें। डाइट में घी, मक्खन और तले-भुने खाद्य पदार्थों की जगह सीमित मात्रा में जैतून का तेल, मेवे, बीज और एवोकाडो जैसे हेल्दी फैट्स का सेवन करें।
वजन और कैलोरी पर कंट्रोल रखें। जरूरत से ज्यादा भोजन करने से शरीर में अतिरिक्त कैलोरी फैट के रूप में जमा हो सकती है। इसलिए संतुलित मात्रा में भोजन करें और स्वस्थ वजन बनाए रखने की कोशिश करें।
रोजाना शारीरिक गतिविधि करें। हफ्ते में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली एक्सरसाइज, तेज चलना, साइकिलिंग या योग करने से लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद मिल सकती है।
प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी बनाएं। पैकेज्ड स्नैक्स, फास्ट फूड, मीठे पेय, बेकरी उत्पाद और सैचुरेटेड व ट्रांस फैट से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। ये फैटी लिवर और मोटापे का खतरा बढ़ा सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। लेख में डाइट चार्ट, फल और आयुर्वेदिक उपाय मारेंगो एशिया हॉस्पिटल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अमित मित्तल द्वारा साझा किए गए सुझावों पर आधारित हैं। डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
Pregnancy Diet: प्रेग्नेंसी में बिना अंडा और मीट के भी प्रोटीन की जरूरत पूरी की जा सकती है। जानें दाल, पनीर, टोफू, दूध, दही और नट्स समेत प्रोटीन से भरपूर वेजिटेरियन फूड्स।
Pregnancy Me Kya Khye:
प्रेग्नेंसी के दौरान मां और बच्चे दोनों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त प्रोटीन, आयरन और विटामिन्स जरूरी होते हैं। अगर आप वेजिटेरियन हैं और अंडा या मीट नहीं खाती हैं, तो भी सही डाइट प्लान के जरिए इन पोषक तत्वों की जरूरत पूरी की जा सकती है। डॉक्टरों के मुताबिक, दाल, पनीर, टोफू, डेयरी प्रोडक्ट्स, नट्स और बीज जैसे कई शाकाहारी विकल्प प्रोटीन के अच्छे स्रोत हो सकते हैं।
प्रेग्नेंसी महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान शरीर में कई बदलाव होते हैं और बच्चे के विकास के लिए पोषक तत्वों की जरूरत भी बढ़ जाती है। ऐसे में संतुलित और पौष्टिक डाइट लेना बेहद जरूरी माना जाता है।खासकर प्रोटीन बच्चे के विकास के साथ-साथ मां के शरीर के लिए भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्रोटीन की जरूरत पूरी करने के लिए नॉन-वेज खाना जरूरी नहीं है। सही प्लानिंग के साथ शाकाहारी डाइट भी प्रेग्नेंसी में पर्याप्त पोषण दे सकती है।
दाल से लेकर पनीर-टोफू तक, ये हैं प्रोटीन के वेजिटेरियन सोर्स
ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की एक्सपर्ट डॉ. पूजा मेहता के मुताबिक, प्रेग्नेंसी में बच्चे के विकास के लिए प्रोटीन जरूरी है, लेकिन इसके लिए मीट या अंडे पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है।
वेजिटेरियन डाइट में प्रोटीन के लिए इन चीजों को शामिल किया जा सकता है:
दाल
राजमा
छोले
लोबिया
पनीर
टोफू
दूध
दही
बादाम
मूंगफली
अलग-अलग तरह के बीज
प्रोटीन की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए फूड कॉम्बिनेशन भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए दाल-चावल, रोटी-दाल या हुमस के साथ मल्टीग्रेन ब्रेड जैसे कॉम्बिनेशन डाइट में शामिल किए जा सकते हैं। कोशिश करें कि दिन के हर मुख्य भोजन में प्रोटीन का कोई न कोई स्रोत जरूर हो।
प्रोटीन के साथ आयरन पर भी दें ध्यान
प्रेग्नेंसी में शरीर को सामान्य से ज्यादा आयरन की जरूरत होती है, क्योंकि इस दौरान ब्लड की मात्रा बढ़ती है। शाकाहारी भोजन से मिलने वाले आयरन का शरीर में अवशोषण कुछ मामलों में कम हो सकता है, इसलिए आयरन वाले खाद्य पदार्थों को सही तरीके से डाइट में शामिल करना जरूरी है।पालक, दालें, चुकंदर, गुड़ और आयरन-फोर्टिफाइड अनाज इसके कुछ विकल्प हो सकते हैं। इनके साथ विटामिन C से भरपूर चीजें जैसे नींबू, संतरा और टमाटर लेने से आयरन के अवशोषण में मदद मिल सकती है।
विटामिन B12 की कमी को न करें नजरअंदाज
वेजिटेरियन प्रेग्नेंट महिलाओं को विटामिन B12 पर भी खास ध्यान देना चाहिए। इसकी कमी मां में कमजोरी जैसी समस्या पैदा कर सकती है और बच्चे के न्यूरोलॉजिकल विकास पर भी असर पड़ सकता है।दूध और अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स से कुछ मात्रा में B12 मिल सकता है। हालांकि, जरूरत पड़ने पर डॉक्टर जांच के आधार पर B12 सप्लीमेंट लेने की सलाह दे सकते हैं।
प्रेग्नेंसी में डाइट कैसी होनी चाहिए?
प्रेग्नेंसी के दौरान केवल प्रोटीन ही नहीं, बल्कि आयरन, फोलेट, कैल्शियम, विटामिन B12 और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन भी महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल किसी एक फूड पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग पौष्टिक खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर है।ध्यान रखें कि हर महिला की पोषण संबंधी जरूरत अलग हो सकती है। खासकर सप्लीमेंट्स की मात्रा या किसी विशेष डाइट में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या रजिस्टर्ड डाइटीशियन से सलाह लेना बेहतर है।
1/5 Image Source : गैस की समस्या होने पर अदरक के रस को दूध में गर्म करके पी लें। आप चाहें तो तुरंत थोड़ी मात्रा में अदरक चबा लें, इससे पेट की गैस और पेट के रोगों में फायदा होता है।
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आप चाहें तो अदरक को पीसकर या कद्दूकस करके पेस्ट जैसा बना लें। अब इसे दूध के साथ खा लें। इससे पेट की गैस निकल जाएगी और तुरंत काफी राहत मिल जाएगी।
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सोंठ चूर्ण और निसूजन 2-4 ग्राम लें और इसे गोमूत्र या दूध या फिर अंगूर के रस के साथ करें। इससे पेट की गैस की समस्या ठीक होती है।
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25 ग्राम काला तिल बिना छिलका वाला और 100 ग्राम गुड़ और 50 ग्राम शुण्ठी के चूर्ण को मिला लें। 2-5 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वात दोष की वजह से होने वाली गैस में राहत मिलती है। इससे आंतों के रोग भी दूर होते हैं।
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सोंठ और एरण्ड जड़ के 25-50 मिली काढ़ा में 25 मिलीग्राम हींग और सौवर्चल नमक 1 ग्राम मिलाकर पीने से पेट का दर्द ठीक होता है।
आज के समय में हार्ट अटैक के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। न केवल बूढ़े बल्कि यंगस्टर्स और बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है खराब लाइफस्टाइल,गलत खान पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी है। लेकिन कई लोगों के मन में ये सवाल रहता है कि हार्ट को हेल्दी रखने के लिए रोजाना कितना एक्सरसाइज करना चाहिए। डॉ. , अतिरिक्त निदेशक – इंटरवेंशन कार्डियोलॉजी और हार्ट फेलियर प्रोग्राम, से जानेंगे कि हार्ट को हेल्दी रखने के लिए कितना एक्सरसाइज करना जरूरी है।
क्या कहते हैं डॉक्टर
दिल को स्वस्थ रखने के लिए नियमित फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है। सामान्य तौर पर एक स्वस्थ वयस्क को हफ्ते में कम से कम 150 मिनट की एक्सरसाइज करनी चाहिए, यानी करीब 30 मिनट रोज, सप्ताह में 5 दिन। अगर समय मिले तो इसे बढ़ाकर 300 मिनट प्रति सप्ताह तक किया जा सकता है। तेज वॉक करना, साइकिल चलाना, स्विमिंग, डांस करना या हल्की जॉगिंग जैसी फिजिकल एक्टिविटी आप कर सकते हैं। शुरुआत करने वालों के लिए रोज 20–30 मिनट तेज चलना भी एक अच्छा ऑप्शन है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर कुछ मिनट चलना भी फायदेमंद है।
इस बात का भी रखें ध्यान
सिर्फ एक्सरसाइज की अवधि ही नहीं, उसकी नियमितता भी महत्वपूर्ण है। सप्ताह में 2 दिन हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी की जा सकती है, क्योंकि इससे मांसपेशियां मजबूत रहती हैं और शरीर की ओवरऑल फिटनेस बेहतर होती है। अगर किसी व्यक्ति को पहले से हृदय रोग, सांस फूलने की समस्या, सीने में दर्द, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है, तो एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। एक्सरसाइज के दौरान सीने में दर्द, असामान्य सांस फूलना, चक्कर या कमजोरी महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हार्ट हेल्थ के लिए बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करने से ज्यादा जरूरी है नियमित रूप से एक्टिव रहना। रोज की 30 मिनट की वॉकिंग भी लंबे समय में दिल के लिए बड़ा फायदा दे सकती है।
खाना खाने के बाद गैस बनाना सामान्य बात है, लेकिन कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा गैस बनती है। ऐसे में पेट दर्द, बेचैनी, मरोड़ और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। कई बार गैस के कारण बैठना भी मुश्किल हो जाता है। अगर गैस लॉक हो जाए तो परेशानी और बढ़ जाती है। गैस की समस्या में राहत पाने के लिए कुछ घरेलू उपाय असरदार काम करते हैं, इससे तुरंत राहत मिल सकती है। आचार्य बाल कृष्ण ने बताया गैस दूर करने के आयुर्वेदिक उपचार क्या हैं?
गैस दूर करने के घरेलू उपाय
अजवाइन-
पेट में गैस होने पर अजवाइन असरदार काम करती है। जब पेट में भारीपन, गैस और आंतों में ऐंठन हो तो एक छोटा चम्मच अजवाइन और उसमें थोड़ा काला नमक डालकर खा लें। गर्म पानी के साथ अजवाइन खाने पर गैस की समस्या कम होती है। बच्चों को भी अजवाइन खिला सकते हैं।
हरड़-
गैस की समस्या दूर करने के लिए हरड़ को असरदार इलाज माना जाता है। हरड़ को शहद के साथ मिलाकर खाने से गैस, एसिडिटी और वायु की समस्या में आराम मिलता है।
काला नमक-
पेट फूलने और गैस बनने पर काला नमक भी असरदार होता है। आप इसके लिए थोड़ी अजवायन, जीरा, छोटी हरड़ और काला नमक को बराबर-बराबर ले लें और पीस लें। बड़े लोग 2-6 ग्राम चूर्ण का सेवन करें और बच्चों को थोड़ी कम मात्रा में खिलाएं। इसके बाद गुनगुना पानी पी लें।
अदरक-
पेट में गैस की समस्या हो तो अदरक खाना अच्छा माना जाता है। इसके लिए अदरक के टुकड़े पर नमक छिड़क कर दिन में 2-3 बार खाएं। इससे गैस की समस्या में छुटकारा मिल सकता है। इससे खाना खाते ही शरीर हल्का रहेगा और भूख भी खुलकर लगेगी।
काली मिर्च और सूखी अदरक-
गैस होने पर काली मिर्च और सूखी अदरक भी फायदेमंद होती है। इसके लिए 1 चम्मच काली मिर्च, 1 चम्मच सूखी अदरक और 1 चम्मच इलायची को पीसकर मिक्स कर लें। अब खाना खाने के 1 घंटे के बाद आधा चम्मच पानी के साथ ले लें।
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। ।
खाना खाने के बाद सीने में जलन होना एक ऐसी समस्या है, जिससे आज के समय में ज्यादातर लोग खाना खाने के बाद छाती में जलन को अक्सर लोग गैस या अपच समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हर बार ऐसा करना आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। डॉ , वरिष्ठ सलाहकार गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, बता रहे हैं कि खाने के बाद छाती में जलन क्यों होती है।
क्या कहते हैं डॉक्टर
कई मामलों में इसका कारण गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज यानी GERD हो सकता है। इसमें पेट की अम्लीय सामग्री वापस भोजन नली में पहुंचती है, जिससे छाती के बीचों बीच जलन, मुंह में खट्टा पानी आना या खाना वापस ऊपर आने जैसी परेशानी हो सकती है।खाने के बाद यह समस्या इसलिए बढ़ सकती है क्योंकि पेट भरने पर पेट के भीतर दबाव बढ़ता है। बहुत अधिक खाना, ऑयली फूड, कैफीन, चॉकलेट, देर रात भोजन करना और भोजन के तुरंत बाद लेटना भी रिफ्लक्स को बढ़ा सकता है।
सीने में जलन के मुख्य कारण मसालेदार और तला-भुना खाना:
अधिक तेल, मिर्च वाले भोजन पेट में एसिड का उत्पादन बढ़ा देते हैं और वॉल्व को ढीला कर देते हैं।
खाने के तुरंत बाद लेटना:
भोजन करने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाने से गुरुत्वाकर्षण एसिड को वापस ऊपर आने में मदद करता है।
ओवरईटिंग:
एक ही बार में बहुत अधिक खा लेने से पेट पर दबाव बढ़ता है, जिससे एसिड ऊपर की ओर आ जाता है।
कैफीन और सिगरेट/शराब:
चाय, कॉफी, वातित पेय, सिगरेट और शराब का सेवन LES वॉल्व को कमजोर करता है।
मोटापा और पेट का दबाव:
अत्यधिक वजन या गर्भावस्था के दौरान पेट के अंदरूनी दबाव के कारण भी एसिड रिफ्लक्स बढ़ जाता है।
क्यों नहीं करना चाहिए इग्नोर
कभी कभी होने वाली जलन हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन सप्ताह में दो या उससे अधिक बार होने वाली परेशानी को केवल गैस मानकर छोड़ना सही नहीं है। लंबे समय तक अनियंत्रित GERD भोजन नली में सूजन, घाव, संकुचन और कुछ मामलों में बैरेट्स एसोफैगस जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जो आगे चलकर कैंसर के जोखिम से जुड़ी है। भोजन और सोने के बीच कम से कम दो से तीन घंटे का अंतर रखना, जरूरत से ज्यादा भोजन से बचना और ऐसे खाद्य पदार्थों की पहचान करना जिनसे बार बार जलन होती है, लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
बार-बार चीजें भूलना, काम पर ध्यान न लगना, बात करते-करते कुछ और सोचने लगना। हर बार इसकी वजह सिर्फ थकान नहीं होती। अगर यह लंबे समय तक बना रहे, तो इसके पीछे स्वास्थ से जुड़ी समस्या भी हो सकता है। आजकल बहुत से यंगस्टर्स कहते हैं कि दिमाग सही नहीं चल रहा, फोकस नहीं हो रहा, बातें याद नहीं रहतीं। इसे आम भाषा में ब्रेन फॉग कहते हैं। यह अपने आप में कोई बीमारी या डायग्नोसिस नहीं है। यह कुछ लक्षणों का नाम है। असली सवाल यह है कि इसके पीछे क्या वजह है। डॉ. , एगिलस डायग्नोस्टिक्स बता रहे हैं डॉक्टर से कब कंसल्ट करना चाहिए।
क्यों होती है ब्रेन फॉग की समस्या
नींद पूरी न होना, काम का ज्यादा तनाव, देर रात तक स्क्रीन, समय पर खाना न खाना, शराब या बहुत ज्यादा चाय-कॉफी। इन सबका असर सीधे मेमोरी और याददाश्त पर पड़ता है। ऐसे में पहले आदतें ठीक करें। रोज एक ही समय पर सोएं और कम से कम 7 घंटे की नींद लें। समय पर खाएं, पानी पूरा पिएं, थोड़ी कसरत करें और काम के बीच छोटे ब्रेक लें। दो से चार हफ्ते ये बदलाव करके देखें। इसके बाद भी फर्क न पड़े, तो इसे नजरअंदाज न करें।
कब कराएं जांच?
लगातार ब्रेन फॉग के पीछे कुछ आम वजहें होती हैं, जो साधारण ब्लड टेस्ट से पकड़ में आ जाती हैं। जैसे आयरन की कमी या एनीमिया, विटामिन B12 की कमी, थायरॉइड की गड़बड़ी और ब्लड शुगर का ऊपर-नीचे होना। वहीं B12 पर खास ध्यान दें। शाकाहारी लोगों में इसकी कमी काफी आम है, क्योंकि B12 मुख्य रूप से नॉन-वेज, अंडे और दूध से बनी चीजों में मिलता है। लंबे समय तक एसिडिटी की दवा या डायबिटीज की दवा मेटफॉर्मिन लेने वालों में भी B12 कम हो सकता है। महिलाओं में पीरियड्स की वजह से आयरन की कमी आम है।
कुछ और वजहें भी हो सकती हैं। स्लीप एप्निया जैसी नींद की समस्या, जिसमें व्यक्ति पूरी रात सोकर भी थका हुआ उठता है। डिप्रेशन और एंग्जायटी, जो ध्यान और याददाश्त पर सीधा असर डालते हैं। कोविड जैसे किसी वायरल इंफेक्शन के बाद भी कुछ लोगों में हफ्तों तक ब्रेन फॉग रहता है। कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं। डॉक्टर आपके लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री देखकर जांच तय करते हैं। आम तौर पर शुरुआत CBC, फेरिटिन, विटामिन B12, थायरॉइड और ब्लड शुगर से होती है। हर किसी को सारे टेस्ट कराने की जरूरत नहीं है। अगर B12 बॉर्डरलाइन आए और लक्षण बने रहें, तो डॉक्टर होमोसिस्टीन जैसे टेस्ट से इसकी पुष्टि कर सकते हैं।
कब डॉक्टर से मिलें?
अगर ब्रेन फॉग की वजह से पढ़ाई, ऑफिस का काम या रोज के काम प्रभावित होने लगें, तो डॉक्टर से मिलें। साथ में लगातार थकान, बिना वजह वजन बढ़ना या घटना, चक्कर, कमजोरी, हाथ-पैर में झुनझुनी, जल्दी सांस फूलना या लगातार उदासी हो, तब भी देर न करें। कुछ हालात में बिल्कुल इंतजार न करें। अचानक बहुत ज्यादा कन्फ्यूजन, बोलने में दिक्कत, चेहरे या शरीर के एक तरफ कमजोरी, बहुत तेज सिरदर्द, दौरा या बेहोशी हो, तो तुरंत इमरजेंसी में जाएं। यह ब्रेन फॉग नहीं, किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। इसलिए हर बार ब्रेन फॉग को सिर्फ तनाव या बिजी लाइफस्टाइल कहकर न टालें। कई बार वजह एक साधारण ब्लड टेस्ट से पकड़ में आ जाती है, और उसका इलाज भी आसान होता है।