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  • सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    भारतीय सैनिकों के राशन की गुणवत्ता और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने ‘भारत राइस’ योजना शुरू की है। इस पहल के तहत जवानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले चावल की आपूर्ति की जाएगी। चावल 10 और 30 किलोग्राम के पैकेट में सेना के अधिकृत सप्लाई डिपो तक पहुंचाया जाएगा। इससे खास तौर पर दूरदराज और दुर्गम इलाकों में तैनात सैनिकों तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था को आसान बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 अक्टूबर को नई दिल्ली में इस योजना की शुरुआत की। इसका उद्देश्य सैनिकों को बेहतर गुणवत्ता का चावल उपलब्ध कराने के साथ-साथ राशन की खरीद, पैकेजिंग और परिवहन की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

    क्या है सैनिकों के लिए शुरू की गई भारत राइस योजना?

    भारत राइस योजना के तहत भारतीय सेना को तय गुणवत्ता मानकों के अनुसार तैयार किया गया चावल उपलब्ध कराया जाएगा। इस व्यवस्था में चावल की प्रोसेसिंग और गुणवत्ता की जांच पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि जवानों को निर्धारित मानकों के अनुरूप अनाज मिल सके।

    रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026-27 में नेफेड (NAFED) के माध्यम से चावल की आपूर्ति की व्यवस्था की गई है। इसमें चावल की गुणवत्ता, पैकेजिंग और सेना के सप्लाई डिपो तक पहुंचाने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर जोर रहेगा।

    इस पहल का उद्देश्य केवल राशन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसकी आपूर्ति को अधिक सुविधाजनक और भरोसेमंद बनाना भी है।

    10 और 30 किलो के पैकेट में क्यों मिलेगा चावल?

    सेना के जवान कई बार ऐसे इलाकों में तैनात रहते हैं, जहां राशन पहुंचाना आसान नहीं होता। लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्र, पहाड़ी सीमाएं और पूर्वोत्तर के दूरदराज इलाके रसद पहुंचाने के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।

    ऐसे क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए भारत राइस की पैकेजिंग 10 और 30 किलोग्राम के बैग में की जाएगी। इससे राशन को अलग-अलग जरूरतों के अनुसार बांटना, संभालना और परिवहन करना आसान हो सकता है।

    छोटे पैकेट उन स्थानों पर विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं, जहां भारी मात्रा में राशन एक साथ ले जाना मुश्किल होता है। वहीं, बड़े पैकेटों के जरिए सप्लाई डिपो में राशन का भंडारण और वितरण व्यवस्थित किया जा सकेगा।

    सेना को क्या होंगे भारत राइस योजना के फायदे?

    1. चावल की गुणवत्ता पर रहेगा ध्यान

    योजना के तहत चावल को निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार करने और उसकी गुणवत्ता की जांच पर जोर दिया जाएगा। इससे सैनिकों को मिलने वाले राशन की गुणवत्ता बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    2. सप्लाई डिपो तक सीधे पहुंचेगा राशन

    रिपोर्ट के अनुसार, चावल को सेना के अधिकृत सप्लाई डिपो तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी। इससे राशन की आवाजाही को व्यवस्थित करने और आपूर्ति से जुड़े कामकाज को आसान बनाने में मदद मिल सकती है।

    3. दुर्गम इलाकों में परिवहन होगा सुविधाजनक

    10 और 30 किलो के पैकेट में चावल उपलब्ध होने से अलग-अलग स्थानों की जरूरत के हिसाब से राशन भेजना और संभालना आसान हो सकता है। इससे दूरस्थ सैन्य चौकियों तक खाद्यान्न पहुंचाने की व्यवस्था को लाभ मिलने की उम्मीद है।

    4. समय और संसाधनों की बचत

    राशन की आपूर्ति के लिए तय व्यवस्था और पैकेजिंग से परिवहन तथा वितरण की प्रक्रिया अधिक कुशल बन सकती है। इससे सेना के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।

    योजना तैयार करने में 18 महीने तक चला समन्वय

    इस पहल को लागू करने के लिए भारतीय सेना, भारतीय खाद्य निगम (FCI), नेफेड और केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के बीच समन्वय किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, योजना तैयार करने की प्रक्रिया में करीब 18 महीने तक विचार-विमर्श चला।

    यह सहयोग इसलिए अहम है, क्योंकि सेना को नियमित रूप से बड़ी मात्रा में खाद्यान्न की जरूरत होती है। ऐसे में गुणवत्ता, भंडारण, पैकेजिंग और समय पर आपूर्ति के बीच तालमेल बनाए रखना जरूरी है।

    आपात स्थिति में सेना को मिलेगी अतिरिक्त रसद सहायता

    इसी कार्यक्रम के दौरान भारतीय सेना और भारतीय खाद्य निगम के बीच पांच साल के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) किए जाने की भी जानकारी दी गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य सैन्य आपातकाल या युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेना को खाद्यान्न की आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत करना है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर एफसीआई के भंडारण संसाधनों और सामग्री संभालने से जुड़े इंतजामों का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

    किसी भी आपात स्थिति में सैनिकों तक समय पर राशन और जरूरी सामान पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए इस तरह की व्यवस्था सेना की रसद तैयारियों को मजबूत करने में उपयोगी हो सकती है।

    ‘जय जवान, जय किसान’ की भावना से जुड़ी पहल

    भारत राइस योजना को सैनिकों की जरूरतों और खाद्यान्न आपूर्ति व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल बनाने की पहल के रूप में देखा जा सकता है। सैनिकों को अच्छी गुणवत्ता का राशन उपलब्ध कराना उनकी दैनिक जरूरतों और कल्याण से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

    हालांकि, योजना का वास्तविक असर चावल की गुणवत्ता, आपूर्ति की नियमितता और दुर्गम क्षेत्रों तक वितरण की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगा। आने वाले समय में इसके क्रियान्वयन से पता चलेगा कि इस व्यवस्था से सेना की रसद प्रणाली को कितना लाभ मिलता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। योजना के क्रियान्वयन, आपूर्ति की मात्रा और इसके वास्तविक परिणामों से संबंधित विस्तृत जानकारी आधिकारिक घोषणाओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

  • नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में व्रत रखने वाले लोग फलाहार के लिए साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना वड़ा और भुने हुए मखाने जैसे विकल्प चुनते हैं। दोनों ही व्रत के दौरान काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन अगर आप अपनी सेहत, वजन और ब्लड शुगर का ध्यान रख रहे हैं, तो सवाल उठता है कि साबूदाना खाना बेहतर है या मखाना?

    पोषण के लिहाज से दोनों में अंतर है। साबूदाना मुख्य रूप से स्टार्च यानी कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है, जो शरीर को ऊर्जा देता है। वहीं, मखाने में कार्बोहाइड्रेट के साथ कुछ प्रोटीन, फाइबर और खनिज भी पाए जाते हैं। हालांकि, किसी एक खाद्य पदार्थ को हर व्यक्ति के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता। इसका असर खाने की मात्रा, बनाने के तरीके और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

    साबूदाना और मखाना में क्या है पोषण का अंतर?

    साबूदाना और मखाना दोनों व्रत के दौरान खाए जाते हैं, लेकिन इनके पोषक तत्वों की संरचना अलग-अलग होती है।

    साबूदाना: यह मुख्य रूप से कसावा (टैपिओका) के स्टार्च से बनाया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है, जबकि प्रोटीन और फाइबर बहुत कम मात्रा में होते हैं। यही वजह है कि साबूदाना शरीर को ऊर्जा तो देता है, लेकिन इसे अकेले खाने से संतुलित पोषण नहीं मिलता।

    मखाना: यह जलीय पौधे के बीजों से तैयार किया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट के साथ कुछ प्रोटीन, फाइबर और मैग्नीशियम व फॉस्फोरस जैसे खनिज मिलते हैं। इसे कम घी या तेल में भूनकर खाने से हल्का स्नैक तैयार किया जा सकता है।

    इसलिए पोषण की विविधता के लिहाज से मखाना साबूदाने से बेहतर विकल्प हो सकता है। हालांकि, मखाने में भी कार्बोहाइड्रेट होता है और इसकी मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है।

    वजन कम करने वालों के लिए क्या बेहतर है?

    अगर आप नवरात्र में वजन नियंत्रित रखना चाहते हैं, तो कम घी या तेल में भुने हुए मखाने एक सुविधाजनक स्नैक हो सकते हैं। इनमें कुछ प्रोटीन और फाइबर भी मिलता है, जबकि साबूदाने में मुख्य रूप से स्टार्च होता है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि साबूदाना खाने से वजन जरूर बढ़ेगा या मखाना खाने से वजन घट जाएगा। वजन में बदलाव पूरे दिन की कुल कैलोरी, शारीरिक गतिविधि और खानपान की आदतों पर निर्भर करता है।

    साबूदाना खिचड़ी बनाते समय ज्यादा घी, तेल और आलू डालने से उसकी कुल कैलोरी बढ़ सकती है। इसी तरह मखाने में अधिक घी, चीनी या दूसरे कैलोरी वाले फ्लेवर मिलाने से यह भी ज्यादा कैलोरी वाला स्नैक बन सकता है।

    वजन नियंत्रित रखने के लिए दोनों को सीमित मात्रा में खाएं और दिनभर के भोजन में पोषण का संतुलन बनाए रखें।

    डायबिटीज के मरीजों के लिए कौन-सा विकल्प बेहतर है?

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों को व्रत के दौरान खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साबूदाने में कार्बोहाइड्रेट अधिक और फाइबर बहुत कम होता है। इसलिए इसे ज्यादा मात्रा में खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है।

    मखाने में भी कार्बोहाइड्रेट होता है, इसलिए इसे ब्लड शुगर के लिए पूरी तरह सुरक्षित मानना सही नहीं है। इसकी मात्रा, साथ में खाए जाने वाले दूसरे खाद्य पदार्थ और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति भी मायने रखती है।

    अगर आपको डायबिटीज है और आप नवरात्र का व्रत रखना चाहते हैं, तो पहले डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। खासकर इंसुलिन या ब्लड शुगर कम करने वाली दवाएं लेने वाले लोगों को लंबे समय तक भूखे रहने से हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर बहुत कम होने का खतरा हो सकता है।

    क्या ज्यादा मखाना खाने से कब्ज हो सकती है?

    मखाने को अक्सर हेल्दी स्नैक मानकर लोग बार-बार खाते रहते हैं। हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसे भी जरूरत से ज्यादा खाना उचित नहीं है।

    मखाने में कुछ फाइबर होता है, लेकिन यह फाइबर का बहुत समृद्ध स्रोत नहीं है। कब्ज की समस्या में केवल मखाने की मात्रा ही नहीं, बल्कि पूरे दिन में पानी, फाइबर और शारीरिक गतिविधि का स्तर भी महत्वपूर्ण होता है।

    अगर आपको पहले से कब्ज या पाचन संबंधी परेशानी है, तो मखाना खाने के बाद अपने शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें। पर्याप्त पानी पिएं और फल, सब्जियों तथा अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को अपनी नियमित डाइट में शामिल करें। लगातार कब्ज रहने पर डॉक्टर से सलाह लें।

    नवरात्र में साबूदाना खाने का सही तरीका

    व्रत में साबूदाना खाना पसंद करते हैं, तो इसे कुछ बातों का ध्यान रखकर अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।

    • साबूदाना खिचड़ी बनाते समय घी और तेल की मात्रा सीमित रखें।
    • एक बार में बहुत ज्यादा खाने के बजाय अपनी जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा लें।
    • मूंगफली मिलाने से स्वाद और प्रोटीन की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन इससे कैलोरी भी बढ़ती है।
    • साबूदाने की खीर या मीठे व्यंजन बनाते समय चीनी की मात्रा का ध्यान रखें।
    • डायबिटीज होने पर इसकी मात्रा और सेवन की आवृत्ति डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह के अनुसार तय करें।

    साबूदाने को केवल सात्विक या व्रत का भोजन समझकर पौष्टिकता के लिहाज से संतुलित भोजन का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

    मखाना खाने का बेहतर तरीका क्या है?

    नवरात्र में मखाना खाना चाहते हैं, तो इसे कम घी या तेल में हल्का भूनकर खा सकते हैं। बिना तेल के भूनना भी एक विकल्प है।

    • स्वाद के लिए सीमित मात्रा में काली मिर्च या दूसरे पसंदीदा मसालों का इस्तेमाल करें।
    • बहुत ज्यादा नमक, घी या चीनी डालने से बचें।
    • इसे हेल्दी स्नैक समझकर बार-बार या बहुत अधिक मात्रा में न खाएं।
    • यदि खाने के बाद पेट फूलने या दूसरी पाचन संबंधी परेशानी का अनुभव हो, तो मात्रा कम करें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लें।

    मखाने को हेल्दी बनाने का सबसे आसान तरीका है कि इसे कम तेल और सीमित मसालों के साथ तैयार किया जाए।

    तो नवरात्र में साबूदाना खाएं या मखाना?

    अगर आपका उद्देश्य बेहतर पोषण वाला स्नैक चुनना है, तो कम घी या तेल में भुना मखाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, क्योंकि इसमें साबूदाने की तुलना में कुछ प्रोटीन, फाइबर और खनिज भी मिलते हैं। वहीं, साबूदाना ऊर्जा देने वाला खाद्य पदार्थ है, लेकिन इसमें मुख्य रूप से स्टार्च होता है।

    वजन घटाने या ब्लड शुगर नियंत्रित रखने के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहना सही नहीं है। खाने की मात्रा, पकाने का तरीका, पूरे दिन की डाइट और आपकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। साबूदाना और मखाना खाने का असर उनकी मात्रा, बनाने के तरीके और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। डायबिटीज, कब्ज या पाचन संबंधी समस्या से जूझ रहे लोग अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।

  • विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    वाराणसी: काशी को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां हजारों मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं। इन्हीं में एक है काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर, जिसे बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल शिखर है, जिसकी ऊंचाई दिल्ली के प्रसिद्ध कुतुब मीनार से भी अधिक बताई जाती है।

    मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके निर्माण की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इसकी आधारशिला रखने के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिमालय में रहने वाले संत स्वामी कृष्णाश्रम को आमंत्रित किया था। बताया जाता है कि संत को काशी आने के लिए राजी करने में करीब चार साल लग गए थे।

    252 फीट ऊंचा है मंदिर का शिखर

    BHU के श्री विश्वनाथ मंदिर के शिखर की ऊंचाई लगभग 252 फीट बताई जाती है। वहीं, दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई करीब 239.5 फीट है। इस तरह मंदिर का शिखर कुतुब मीनार से लगभग 12.5 फीट ऊंचा है।

    अपनी ऊंचाई और भव्य बनावट के कारण यह मंदिर विश्वविद्यालय परिसर की प्रमुख पहचान बन चुका है। दूर से दिखाई देने वाला इसका शिखर श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है।

    हालांकि, देश के सबसे ऊंचे मंदिर की चर्चा करते समय कुल संरचना और शिखर की ऊंचाई में अंतर समझना जरूरी है। मध्य प्रदेश के ओरछा स्थित चतुर्भुज मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 344 फीट बताई जाती है, जबकि BHU के विश्वनाथ मंदिर का शिखर अपनी ऊंचाई के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

    महामना मालवीय ने क्यों बनवाया था यह मंदिर?

    काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय चाहते थे कि विश्वविद्यालय परिसर में भगवान शिव का एक भव्य मंदिर बनाया जाए। उनकी सोच थी कि शिक्षा के इस प्रमुख केंद्र में विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी मिले।

    मालवीय जी चाहते थे कि मंदिर का शिलान्यास किसी तपस्वी और सिद्ध संत के हाथों हो। इसी दौरान उन्हें हिमालय में रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने संत को मंदिर की आधारशिला रखने के लिए काशी आने का निमंत्रण देने का निर्णय लिया।

    चार साल की मनुहार के बाद संत ने रखी आधारशिला

    मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्वामी कृष्णाश्रम शुरुआत में काशी आने के लिए तैयार नहीं थे। महामना मालवीय ने उन्हें मनाने के लिए स्वामी गणेश दास से भी सहायता मांगी।

    काफी प्रयासों के बाद स्वामी कृष्णाश्रम काशी आने के लिए राजी हुए। आखिरकार 11 मार्च 1931 को उन्होंने मंदिर की आधारशिला रखी। इस तरह BHU परिसर में भगवान शिव के भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत हुई।

    यह घटना महामना मालवीय की दृढ़ इच्छाशक्ति और संतों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती है। मंदिर का इतिहास काशी की धार्मिक परंपरा और विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

    कई चरणों में पूरा हुआ मंदिर का निर्माण

    मंदिर का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया के तहत हुआ। इस दौरान आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ी तो उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने निर्माण कार्य में सहयोग दिया। उनके सहयोग से मंदिर का काम आगे बढ़ा।

    उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, 1954 तक मंदिर का अधिकांश निर्माण पूरा हो चुका था, हालांकि शिखर का काम बाकी था। 17 फरवरी 1958 को मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद शिखर का निर्माण भी जारी रहा और आगे चलकर मंदिर की भव्य संरचना पूरी हुई।

    मंदिर के निर्माण और शिखर के पूरा होने की तारीख को लेकर अलग-अलग विवरणों में कुछ अंतर मिलता है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि मंदिर को वर्तमान स्वरूप देने में कई दशक लगे।

    मंदिर में शिव के साथ कई देवी-देवताओं के दर्शन

    श्री विश्वनाथ मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। यहां शिवलिंग के दर्शन के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर में गणेश जी, मां दुर्गा, लक्ष्मी-विष्णु, पंचमुखी महादेव, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी, मां सरस्वती, नटराज और नंदी सहित कई स्वरूपों के दर्शन किए जा सकते हैं।

    विश्वविद्यालय परिसर में स्थित होने के कारण यहां विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्थानीय लोगों और दूसरे शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। मंदिर का शांत वातावरण लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

    सावन में शिवभक्तों के लिए खास है मंदिर

    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। BHU स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर भी काशी के प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है।

    मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ऊंचा शिखर और महामना मालवीय से जुड़ी कहानी इसे खास बनाती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और BHU के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    डिस्क्लेमर: मंदिर की ऊंचाई और निर्माण से संबंधित विवरण उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों पर आधारित हैं। अलग-अलग स्रोतों में कुछ आंकड़ों और तारीखों में अंतर हो सकता है। धार्मिक संदर्भों का उल्लेख परंपरागत मान्यताओं के आधार पर किया गया है।

  • वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: बिहार के लालगंज थाना क्षेत्र के एक गांव में घर में घुसकर महिला के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार और लूटपाट करने का गंभीर मामला सामने आया है। महिला की शिकायत के अनुसार, कुछ लोग लाठी-डंडे और लोहे की रॉड लेकर उसके घर पहुंचे थे। आरोप है कि एक व्यक्ति ने घर के अंदर घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की और विरोध करने पर मारपीट करते हुए उसके कपड़े फाड़ दिए। महिला ने घर की अलमारी से सात लाख रुपये ले जाने का आरोप भी लगाया है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    बच्चे को दवा खिला रही थी महिला, तभी दरवाजे पर पहुंचे आरोपी

    यह घटना 11 अक्टूबर 2026 की शाम करीब सात बजे की बताई गई है। महिला ने पुलिस को दिए आवेदन में बताया कि वह घर के अंदर अपने बच्चे को दवा खिला रही थी। इसी दौरान कुछ लोग लाठी-डंडे और लोहे की रॉड लेकर उसके दरवाजे पर पहुंचे और गाली-गलौज करने लगे।

    महिला के मुताबिक, जब वह दरवाजे पर पहुंची तो एक व्यक्ति ने कथित तौर पर उसे मारने के लिए दौड़ाया। अपनी जान बचाने के लिए वह घर के अंदर भागी, लेकिन आरोप है कि उक्त व्यक्ति उसके पीछे घर में घुस आया।

    विरोध करने पर मारपीट और कपड़े फाड़ने का आरोप

    महिला ने आरोप लगाया कि घर के अंदर घुसे व्यक्ति ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। उसने विरोध किया तो आरोपी ने उसका ब्लाउज खींचकर फाड़ दिया और उसके साथ मारपीट की।

    शिकायत में कुछ अन्य लोगों पर भी घटना में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। महिला के अनुसार, इस दौरान घर में रखे सामान को नुकसान पहुंचाने और परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की गई।

    हालांकि, घटना के संबंध में सामने आए ये आरोप शिकायत पर आधारित हैं। इनकी पुष्टि पुलिस जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी बाकी है।

    अलमारी से सात लाख रुपये निकालने की शिकायत

    महिला ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दौरान एक अन्य व्यक्ति ने घर की अलमारी में रखे सात लाख रुपये निकाल लिए। उसके मुताबिक, यह रकम हाल ही में जमीन बेचने से मिली थी।

    महिला का कहना है कि परिवार के लिए यह रकम महत्वपूर्ण थी। घटना के दौरान जब उसके ससुर उसे बचाने के लिए आगे आए, तो आरोपियों ने उनके साथ भी मारपीट की।

    शिकायत के अनुसार, लोहे की रॉड से सिर पर हमला किए जाने के कारण उसके ससुर गंभीर रूप से घायल हो गए। महिला ने अपने और अपने दोनों बच्चों के साथ भी मारपीट किए जाने का आरोप लगाया है।

    डायल 112 पर सूचना, घायलों को अस्पताल पहुंचाया

    घटना के बाद पुलिस को डायल 112 के माध्यम से सूचना दी गई। महिला के अनुसार, पुलिस के आने की जानकारी मिलने पर आरोपी जान से मारने की धमकी देते हुए वहां से भाग निकले।

    आसपास के लोगों की मदद से घायलों को सदर अस्पताल, हाजीपुर पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज कराया गया। महिला ने पुलिस को बताया कि उसके पति पुणे में रहते हैं और उनके घर पर मौजूद नहीं होने के दौरान यह घटना हुई।

    पुलिस ने दर्ज किया मामला

    लालगंज के थानाध्यक्ष सुभाष प्रसाद के अनुसार, महिला के आवेदन के आधार पर मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। पुलिस शिकायत में लगाए गए मारपीट, जबरदस्ती की कोशिश, रुपये ले जाने और धमकी देने जैसे आरोपों की जांच कर रही है।

    फिलहाल मामले में पुलिस की जांच महत्वपूर्ण है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के समय क्या हुआ था और शिकायत में नामजद लोगों की इसमें क्या भूमिका थी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध समाचार रिपोर्ट और शिकायत में दर्ज आरोपों के आधार पर तैयार की गई है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

  • मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    फाजिल्का: पंजाब के फाजिल्का जिले के चक्क पक्खी गांव में मोमोज की रेहड़ी पर पैसों को लेकर शुरू हुआ विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया। रविवार देर रात हुई कहासुनी के दौरान 26 वर्षीय जगमीत सिंह पर कथित तौर पर धारदार हथियार से हमला कर दिया गया। पेट और छाती पर गंभीर चोटें लगने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। घटना पास में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ हत्या का केस दर्ज किया है।

    मोमोज की रेहड़ी पर शुरू हुआ विवाद

    पुलिस के अनुसार, चक्क पक्खी गांव का रहने वाला जगमीत सिंह अपने दोस्त बेअंत सिंह के साथ गांव में मोमोज की रेहड़ी पर गया था। वहां पैसों के लेन-देन को लेकर रेहड़ी संचालकों के साथ विवाद हो गया। शुरुआत में हुई कहासुनी धीरे-धीरे बढ़ती चली गई और मामला मारपीट तक पहुंच गया।

    आरोप है कि इसी दौरान जगमीत सिंह पर धारदार हथियार से हमला कर दिया गया। हमले में उसके पेट और छाती पर गंभीर चोटें आईं। घटना की सूचना मिलने पर उसके पिता भी मौके पर पहुंचे। घायल जगमीत को उपचार के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।

    सीसीटीवी फुटेज में कैद हुई घटना

    इस घटना का एक अहम पहलू यह है कि घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी कैमरे में पूरी वारदात कैद हो गई। पुलिस ने फुटेज को जांच का हिस्सा बनाया है, ताकि विवाद की शुरुआत से लेकर हमले तक के घटनाक्रम को समझा जा सके।

    पुलिस यह भी पता लगा रही है कि हमले में किस धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया था। हथियार की बरामदगी के लिए भी कार्रवाई की जा रही है।

    दो आरोपी गिरफ्तार, हत्या का मामला दर्ज

    जलालाबाद के डीएसपी लवदीप सिंह गिल के अनुसार, पुलिस ने इस मामले में गुरचरण सिंह और बिट्टू सिंह, दोनों निवासी चिमने वाला, के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।

    जांच के दौरान पुलिस घटना से जुड़े साक्ष्यों, सीसीटीवी फुटेज और कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए हथियार के बारे में जानकारी जुटा रही है। मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।

    परिवार का इकलौता बेटा था जगमीत

    26 वर्षीय जगमीत सिंह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। वह पुराने मोटरसाइकिल खरीदने और बेचने का कारोबार करता था। उसकी अचानक हुई मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

    जगमीत अपने पीछे पत्नी और दो छोटी बेटियां छोड़ गया है। जिस परिवार के लिए वह मेहनत कर रहा था, उसी परिवार को अब उसके बिना जीवन बिताना पड़ेगा। मामूली पैसों को लेकर शुरू हुए विवाद में एक परिवार ने अपना सहारा खो दिया।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के प्रारंभिक विवरण पर आधारित है। मामले की जांच जारी है और आरोपों से जुड़े तथ्यों का अंतिम निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।

  • दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    नौकरी के लिए आवेदन करते समय अक्सर कंपनियां उम्मीदवारों से उनकी मौजूदा सैलरी और अपेक्षित पैकेज पूछती हैं। कई बार इसी आधार पर नई नौकरी का ऑफर तय किया जाता है। लेकिन दिल्ली के एक एंटरप्रेन्योर ने इस परंपरा से हटकर फैसला लिया। उन्होंने एक ऐसे Gen Z उम्मीदवार को नौकरी दी, जिसने आवेदन फॉर्म में अपनी सैलरी का कॉलम खाली छोड़ दिया था। उम्मीदवार को उसकी पिछली कमाई के बजाय उसके काम और काबिलियत के आधार पर ऑफर दिया गया। दावा है कि उसे 120 प्रतिशत से भी ज्यादा का सैलरी हाइक मिला।

    उम्मीदवार ने सैलरी बताने से क्यों किया इनकार?

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर अभिषेक अग्रवाल ने लिंक्डइन पर इस भर्ती से जुड़ा अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, नौकरी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास ऑपरेशन्स के क्षेत्र में चार साल का अनुभव था। इंटरव्यू के दौरान उसने पूछे गए सवालों के अच्छे जवाब दिए और अपनी क्षमता से प्रभावित भी किया।

    हालांकि, जब उम्मीदवार को आवेदन फॉर्म दिया गया, तो उसने अपनी मौजूदा सैलरी और अपेक्षित वेतन से जुड़े कॉलम खाली छोड़ दिए। शुरुआत में यह बात अलग लगी, लेकिन जब उससे इसकी वजह पूछी गई, तो उसने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

    उम्मीदवार का कहना था कि कंपनियां अक्सर उसकी वर्तमान सैलरी में कुछ प्रतिशत जोड़कर नया पैकेज तय करती हैं। इस प्रक्रिया में यह नहीं देखा जाता कि कर्मचारी वास्तव में कितना काम कर सकता है और उसके कौशल की बाजार में कितनी कीमत है। इसलिए वह चाहता था कि उसकी सैलरी का फैसला पिछली कमाई के बजाय उसकी योग्यता के आधार पर किया जाए।

    4.5 लाख रुपये सालाना कमाता था उम्मीदवार

    अभिषेक अग्रवाल के मुताबिक, बातचीत के दौरान उम्मीदवार ने बताया कि उसकी मौजूदा सालाना सैलरी 4.5 लाख रुपये यानी 4.5 LPA थी। उसका मानना था कि वह अपनी जिम्मेदारियों और काम के अनुभव के हिसाब से इससे ज्यादा वेतन पाने का हकदार है।

    उम्मीदवार की बात सुनने के बाद एंटरप्रेन्योर ने एचआर से आवेदन फॉर्म में सैलरी वाला कॉलम खाली रहने देने को कहा। इसके बाद उन्होंने उम्मीदवार के काम, अनुभव और अब तक हासिल किए गए परिणामों पर ध्यान दिया।

    पुराने काम ने दिलाया बड़ा ऑफर

    इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवार ने अपने काम का एक अहम उदाहरण बताया। उसने अपनी पिछली कंपनी में वेंडर पेमेंट की प्रक्रिया को नए सिरे से व्यवस्थित किया था। इस बदलाव के बाद भुगतान में होने वाली देरी को 18 दिन से घटाकर छह दिन तक लाने में मदद मिली।

    इतना महत्वपूर्ण सुधार करने के बावजूद, उसके मुताबिक पिछली कंपनी ने उसे केवल तीन प्रतिशत की वेतन वृद्धि दी थी। इस उदाहरण से एंटरप्रेन्योर को लगा कि उम्मीदवार ने अपने काम से वास्तविक फायदा पहुंचाया था, लेकिन उसकी सैलरी में उस योगदान के अनुरूप बढ़ोतरी नहीं हुई।

    अभिषेक अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में कहा कि उम्मीदवार की पिछली सैलरी को ही उसकी नई सैलरी तय करने का आधार बनाना सही तरीका नहीं है। किसी कर्मचारी ने पहले कितना कमाया, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि वह नई कंपनी के लिए कितना उपयोगी साबित हो सकता है।

    4.5 लाख से सीधे 10 लाख रुपये सालाना का ऑफर

    अभिषेक अग्रवाल के अनुसार, उन्होंने उम्मीदवार को सालाना 10 लाख रुपये यानी 10 LPA का ऑफर दिया। उसकी पुरानी सैलरी 4.5 लाख रुपये थी। इस हिसाब से नई पेशकश में सालाना 5.5 लाख रुपये की बढ़ोतरी हुई, जो लगभग 122 प्रतिशत का इजाफा है।

    इस तरह उम्मीदवार को उसकी पुरानी कमाई से दोगुने से भी अधिक का पैकेज देने की पेशकश की गई। एंटरप्रेन्योर ने इसे अपनी साल की सबसे अच्छी नियुक्तियों में से एक बताया और कहा कि उम्मीदवार ने अपने काम से उनके फैसले को सही साबित किया।

    हालांकि, यह अनुभव अभिषेक अग्रवाल की ओर से साझा किया गया व्यक्तिगत मामला है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर उम्मीदवार को पुरानी सैलरी बताने से इनकार करने पर इतना ही बड़ा हाइक मिल जाएगा।

    कंपनियों में पुरानी सैलरी के आधार पर पैकेज तय करने पर सवाल

    इस घटना ने भर्ती प्रक्रिया में मौजूदा सैलरी को आधार बनाने की परंपरा पर चर्चा छेड़ दी है। कई बार उम्मीदवार का नया वेतन उसकी पिछली कमाई में कुछ प्रतिशत जोड़कर तय किया जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर किसी कर्मचारी को पिछली कंपनी में उसकी योग्यता के मुकाबले कम वेतन मिला हो, तो नई नौकरी में भी उसका पैकेज अपेक्षाकृत कम रह सकता है।

    इसके उलट, उम्मीदवार के अनुभव, कौशल, जिम्मेदारियों और काम से मिलने वाले परिणामों को ध्यान में रखकर वेतन तय करने से उसकी वास्तविक क्षमता का बेहतर आकलन किया जा सकता है।

    अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में अमेरिका के कुछ राज्यों और क्षेत्रों में नौकरी के दौरान उम्मीदवार की वेतन संबंधी जानकारी पूछने पर लागू प्रतिबंधों का भी जिक्र किया। हालांकि, वहां के नियम स्थान के अनुसार अलग-अलग हैं और हर जगह एक जैसे नहीं हैं।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

    इस पोस्ट पर सोशल मीडिया यूजर्स ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ लोगों ने एंटरप्रेन्योर के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि भर्ती के दौरान उम्मीदवार की काबिलियत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि केवल उसकी पुरानी सैलरी को।

    वहीं, कुछ यूजर्स ने अपने अनुभव साझा किए। एक यूजर ने बताया कि आवेदन फॉर्म में मौजूदा और अपेक्षित सैलरी का विवरण नहीं भरने पर उसे नौकरी के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। एक अन्य यूजर ने सवाल उठाया कि उम्मीदवार ने पहले सैलरी बताने से इनकार किया, लेकिन बातचीत के दौरान खुद ही अपनी कमाई का आंकड़ा साझा कर दिया।

    इस पूरे मामले से एक बात साफ होती है कि नौकरी बदलते समय केवल पुराने पैकेज को आधार मानना उम्मीदवार की क्षमता का पूरा आकलन नहीं करता। अनुभव, कौशल, जिम्मेदारियों और काम से मिलने वाले नतीजों को महत्व देना भी जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट और एंटरप्रेन्योर की ओर से साझा किए गए दावों पर आधारित है। सैलरी और नियुक्ति से जुड़ी जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।

  • विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: डिप्रेशन सिर्फ उदासी नहीं, गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है; जानिए लक्षण, कारण और इलाज.

    विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: डिप्रेशन सिर्फ उदासी नहीं, गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है; जानिए लक्षण, कारण और इलाज.

    विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: डिप्रेशन सिर्फ उदासी नहीं, गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है; जानिए लक्षण, कारण और इलाज.

    डिप्रेशन को आज भी कई लोग मन की कमजोरी, तनाव या महज उदासी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो व्यक्ति की सोच, भावनाओं, व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है। समय रहते इसके लक्षणों को पहचानना और सही उपचार लेना बेहद जरूरी है।

    विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर डिप्रेशन के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इससे जुड़ी गलत धारणाओं को दूर करना महत्वपूर्ण है। यह समस्या किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। इससे जूझ रहे लोगों को दोष देने या उनकी परेशानी को मामूली समझने के बजाय उन्हें समझने और सही मदद दिलाने की जरूरत होती है।

    डिप्रेशन रोजमर्रा की जिंदगी को कैसे प्रभावित करता है?

    डिप्रेशन सामान्य उदासी या कुछ समय के लिए खराब मूड होने से अलग है। इसमें व्यक्ति लंबे समय तक उदास, निराश, खालीपन से भरा या चिड़चिड़ा महसूस कर सकता है। कई बार उन गतिविधियों में भी उसकी रुचि खत्म होने लगती है, जिन्हें वह पहले पसंद करता था।

    इसका असर पढ़ाई, नौकरी, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक जीवन और रोजमर्रा के कामों पर पड़ सकता है। व्यक्ति को ध्यान लगाने, फैसले लेने और सामान्य गतिविधियां पूरी करने में परेशानी हो सकती है। कुछ लोगों में इसके लक्षण हल्के होते हैं, जबकि दूसरों में ये गंभीर रूप ले सकते हैं।

    अगर उदासी या रुचि में कमी जैसे लक्षण लगभग हर दिन बने रहें और कम से कम दो सप्ताह तक जारी रहें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि, केवल लक्षणों की अवधि के आधार पर खुद से डिप्रेशन का निदान नहीं करना चाहिए।

    दुनिया में कितने लोग डिप्रेशन से प्रभावित हैं?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, डिप्रेशन दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य चुनौती है। उपलब्ध अनुमानों में महिलाओं में डिप्रेशन की दर पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई है। गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद भी कुछ महिलाओं को डिप्रेशन का सामना करना पड़ सकता है।

    डिप्रेशन का असर केवल प्रभावित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवार, दोस्तों और कामकाजी जीवन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। गंभीर मामलों में व्यक्ति को खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या के विचार भी आ सकते हैं। ऐसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय पर मदद लेनी चाहिए।

    सामान्य उदासी और डिप्रेशन में क्या अंतर है?

    जीवन में किसी नुकसान, निराशा या तनावपूर्ण घटना के कारण उदास महसूस करना सामान्य बात है। अक्सर समय के साथ और परिस्थितियों में सुधार होने पर यह भावना कम हो जाती है।

    डिप्रेशन में उदासी या खालीपन लंबे समय तक बना रह सकता है। व्यक्ति की उन कामों में रुचि कम हो सकती है, जिनसे पहले उसे खुशी मिलती थी। इसके साथ नींद, भूख, ऊर्जा, एकाग्रता और आत्मविश्वास में भी बदलाव हो सकता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति में डिप्रेशन के लक्षण एक जैसे नहीं होते। कुछ लोगों में उदासी के बजाय चिड़चिड़ापन, थकान या काम करने की इच्छा में कमी अधिक दिखाई दे सकती है।

    डिप्रेशन के प्रमुख लक्षण क्या हैं?

    WHO के अनुसार, डिप्रेशन में कई तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:

    • लंबे समय तक उदास, खाली या निराश महसूस करना।
    • पहले पसंद आने वाले कामों और गतिविधियों में रुचि या खुशी कम होना।
    • ध्यान लगाने और फैसले लेने में परेशानी होना।
    • खुद को बेकार समझना या अत्यधिक अपराधबोध महसूस करना।
    • भविष्य को लेकर निराशावादी विचार आना।
    • नींद कम होना या जरूरत से ज्यादा सोना।
    • भूख और वजन में बदलाव होना।
    • लगातार थकान महसूस होना या ऊर्जा की कमी रहना।
    • बेचैनी, चिड़चिड़ापन या सामान्य काम करने में कठिनाई होना।
    • मौत या आत्महत्या से जुड़े विचार आना।

    इनमें से कुछ लक्षण दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से डिप्रेशन है। सही आकलन के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श जरूरी है।

    किन परिस्थितियों में बढ़ सकता है डिप्रेशन का जोखिम?

    डिप्रेशन का कोई एक कारण नहीं होता। इसके पीछे जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों की भूमिका हो सकती है। कुछ परिस्थितियां इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं, जैसे:

    तनावपूर्ण घटनाएं: किसी करीबी की मृत्यु, रिश्ते में टूटन, नौकरी छूटना या आर्थिक परेशानी व्यक्ति की मानसिक सेहत पर असर डाल सकती है।

    दुर्व्यवहार और सदमा: लंबे समय तक दुर्व्यवहार, हिंसा या किसी दर्दनाक अनुभव का सामना करने वाले लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम हो सकता है।

    सामाजिक अकेलापन: परिवार और दोस्तों से दूरी, सहयोग की कमी और अकेलापन मानसिक परेशानी को बढ़ा सकते हैं।

    शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां: लंबे समय तक चलने वाली कुछ शारीरिक बीमारियां और मानसिक तनाव एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं।

    जीवनशैली से जुड़े कारक: शारीरिक गतिविधि की कमी और शराब का हानिकारक सेवन मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

    इनमें से किसी एक परिस्थिति का सामना करने वाला हर व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार नहीं होता। इसके कारण अलग-अलग लोगों में अलग हो सकते हैं।

    डिप्रेशन से बचाव और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखने के उपाय

    डिप्रेशन को हर स्थिति में रोक पाना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतें मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।

    • नियमित शारीरिक गतिविधि करें: रोज पैदल चलने या अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करने के लिए समय निकालें।
    • नींद का ध्यान रखें: सोने और जागने का समय नियमित रखने की कोशिश करें।
    • परिवार और दोस्तों से जुड़े रहें: अपनी भावनाएं किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ साझा करना मददगार हो सकता है।
    • पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालें: संगीत सुनना, पढ़ना, बागवानी करना या कोई रचनात्मक काम करना सुकून दे सकता है।
    • तनाव को संभालने की कोशिश करें: आराम, सांस से जुड़े अभ्यास और नियमित दिनचर्या उपयोगी हो सकते हैं।
    • शराब के हानिकारक सेवन से बचें: शराब मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को बढ़ा सकती है।
    • जरूरत पड़ने पर मदद लें:
  • इस अनोखे शिव मंदिर: में दवाओं का लगता है भोग, नई आयुर्वेदिक औषधि पहले चढ़ाई जाती है महादेव को

    इस अनोखे शिव मंदिर: में दवाओं का लगता है भोग, नई आयुर्वेदिक औषधि पहले चढ़ाई जाती है महादेव को

    इस अनोखे शिव मंदिर: में दवाओं का लगता है भोग, नई आयुर्वेदिक औषधि पहले चढ़ाई जाती है महादेव को

    वाराणसी: भगवान शिव की नगरी काशी में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां फूल-माला और मिठाइयों के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियां भी भगवान को अर्पित की जाती हैं। यह मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में स्थित रसेश्वर महादेव मंदिर है। यहां की पूजा परंपरा इसे दूसरे शिवालयों से अलग बनाती है। मान्यता और विभागीय परंपरा के अनुसार, आयुर्वेद के रसशास्त्र विभाग में तैयार की जाने वाली नई औषधियों और भस्म को उपचार में इस्तेमाल करने से पहले भगवान शिव और भगवान धन्वंतरि को अर्पित किया जाता है।

    यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि आयुर्वेद, शोध और भारतीय चिकित्सा परंपरा के आपसी संबंध का भी प्रतीक माना जाता है। यहां पढ़ाई और शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह स्थान शांत वातावरण में अध्ययन करने का माध्यम भी बनता है।

    BHU के परिसर में कहां है रसेश्वर महादेव मंदिर?

    रसेश्वर महादेव मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के रसशास्त्र विभाग परिसर में स्थित है। यह विभाग आयुर्वेद में औषधियों के निर्माण, उनके गुणों और रसशास्त्र से संबंधित विषयों पर अध्ययन एवं शोध करता है।

    मंदिर की स्थापना की पहल वर्ष 2012 में की गई थी, जबकि इसके निर्माण की प्रक्रिया वर्ष 2015 में शुरू हुई थी। इस पहल में प्रोफेसर आनंद चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

    मंदिर के निर्माण की कहानी भी खास है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इसके लिए भिक्षाटन के माध्यम से सहयोग जुटाया गया था। यह परंपरा BHU के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय की सादगी और समाज के सहयोग से संस्थान निर्माण की विचारधारा से प्रेरित बताई जाती है।

    नई दवा और भस्म सबसे पहले भगवान को क्यों चढ़ाई जाती है?

    रसेश्वर महादेव मंदिर की सबसे खास परंपरा यहां की पूजा पद्धति है। रसशास्त्र विभाग में जब कोई नई औषधि या भस्म तैयार की जाती है, तो विभागीय परंपरा के अनुसार उसे पहले भगवान शिव और भगवान धन्वंतरि को अर्पित किया जाता है।

    आयुर्वेद में भगवान धन्वंतरि को चिकित्सा और स्वास्थ्य का आराध्य देव माना जाता है। वहीं, भगवान शिव की पूजा रसशास्त्र की धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है।

    इस परंपरा के माध्यम से शोधकर्ता अपनी मेहनत और ज्ञान को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं। हालांकि, किसी औषधि का उपचार में इस्तेमाल उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा और उपयुक्तता के मूल्यांकन पर निर्भर करता है। केवल भगवान को अर्पित करने से किसी दवा की प्रभावशीलता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हो जाती।

    आयुर्वेद और आधुनिक शोध का संगम

    BHU का आयुर्वेद संकाय भारतीय चिकित्सा शिक्षा और शोध की परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रसशास्त्र आयुर्वेद की एक शाखा है, जिसमें औषधियों के निर्माण और प्रसंस्करण से जुड़े विषयों का अध्ययन किया जाता है।

    रसेश्वर महादेव मंदिर इस शैक्षणिक वातावरण में धार्मिक आस्था को भी स्थान देता है। यहां प्राचीन परंपराओं और आधुनिक शैक्षणिक गतिविधियों का साथ दिखाई देता है।

    आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में निर्धारित प्रक्रियाओं, गुणवत्ता और सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी होता है। विशेष रूप से धातु या खनिज आधारित औषधियों के मामले में उचित परीक्षण और विशेषज्ञों की देखरेख महत्वपूर्ण है।

    विद्यार्थियों के लिए भी खास है मंदिर का परिसर

    रसेश्वर महादेव मंदिर के आसपास का शांत वातावरण विद्यार्थियों को आकर्षित करता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, कुछ विद्यार्थी यहां बैठकर पढ़ाई करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करते हैं।

    विश्वविद्यालय का परिसर लंबे समय से शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। ऐसे में मंदिर का धार्मिक वातावरण विद्यार्थियों को एक शांत जगह उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है।

    हालांकि, यहां 24 घंटे अध्ययन करने की सुविधा या परिसर में प्रवेश के नियमों की जानकारी के लिए विश्वविद्यालय के मौजूदा दिशा-निर्देशों की पुष्टि करना जरूरी है।

    क्यों अलग पहचान रखता है रसेश्वर महादेव मंदिर?

    आमतौर पर शिव मंदिरों में भक्त जलाभिषेक, बेलपत्र, फूल और प्रसाद अर्पित करते हैं। लेकिन BHU का रसेश्वर महादेव मंदिर अपनी औषधि अर्पण की परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है।

    यहां आस्था के साथ आयुर्वेदिक अध्ययन और शोध का वातावरण जुड़ा हुआ है। मंदिर की परंपरा यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान, चिकित्सा और आध्यात्मिकता को लंबे समय से महत्व दिया जाता रहा है।

    काशी आने वाले श्रद्धालुओं और आयुर्वेद में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह मंदिर एक विशिष्ट धार्मिक एवं शैक्षणिक स्थल है। हालांकि, दर्शन या परिसर में प्रवेश से पहले विश्वविद्यालय के मौजूदा नियमों की जानकारी लेना उचित रहेगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध विवरणों और धार्मिक परंपराओं पर आधारित है। औषधियों की प्रभावशीलता और सुरक्षा वैज्ञानिक परीक्षणों तथा चिकित्सा विशेषज्ञों के आकलन पर निर्भर करती है।

  • कोचिंग संचालिका से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की कोशिश का आरोप.

    कोचिंग संचालिका से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की कोशिश का आरोप.

    कोचिंग संचालिका से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की कोशिश का आरोप.

    बिहार: एक तरफ महिला कोचिंग संचालिका ने पूर्व छात्र पर मारपीट, कपड़े फाड़ने और दुष्कर्म की कोशिश का आरोप लगाया, तो दूसरी तरफ डायन होने के आरोप में एक महिला की पिटाई के बाद मौत का मामला सामने आया। दोनों घटनाओं के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। एक मामले में पीड़िता की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जबकि दूसरे मामले में परिजनों ने पड़ोस के लोगों पर हमला करने का आरोप लगाया।

    बच्चों को छोड़ने निकली थी कोचिंग संचालिका, तभी हुआ विवाद

    पटना के पास बाढ़ अनुमंडल के भदौर थाना क्षेत्र के एक गांव में 23 वर्षीय कोचिंग संचालिका के साथ कथित मारपीट और दुष्कर्म के प्रयास का मामला सामने आया। महिला ने अपने पूर्व छात्र पर गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

    पीड़िता के मुताबिक, करीब एक साल पहले आरोपी की बहन उसके कोचिंग सेंटर में पढ़ने आती थी। महिला का आरोप है कि उस दौरान आरोपी अन्य छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार करने लगा था। छात्राओं की शिकायत मिलने पर उसे चेतावनी दी गई, लेकिन कथित तौर पर व्यवहार में सुधार नहीं होने पर उसे कोचिंग से हटा दिया गया।

    महिला का कहना है कि इस बात से नाराज होकर आरोपी ने कोचिंग बंद कराने की धमकी दी थी।

    विरोध करने पर कपड़े फाड़ने और दुष्कर्म की कोशिश का आरोप

    शिकायत के अनुसार, शुक्रवार को जब बच्चे पढ़ाई के बाद घर लौट रहे थे, तब कोचिंग संचालिका उन्हें छोड़ने के लिए गली में गई थी। इसी दौरान आरोपी वहां पहुंचा और कथित तौर पर उसके साथ अभद्रता करने लगा।

    महिला ने आरोप लगाया कि विरोध करने पर आरोपी ने उसके साथ मारपीट की, कपड़े फाड़ दिए और दुष्कर्म करने की कोशिश की। इसी बीच उसकी बहन मौके पर पहुंची और विरोध किया। इसके बाद आरोपी धमकी देकर वहां से भाग गया।

    पीड़िता ने भदौर थाने में पूर्व छात्र के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। पुलिस शिकायत के आधार पर घटना की जांच कर रही है। आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

    मुजफ्फरपुर में डायन बताकर महिला की पिटाई का आरोप

    दूसरी घटना मुजफ्फरपुर जिले के कच्ची-पक्की ओपी क्षेत्र के एक गांव की है। यहां करीब 50 वर्षीय महिला की कथित तौर पर डायन होने का आरोप लगाकर पिटाई की गई। गंभीर रूप से घायल महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई।

    मृतका के पति ने पुलिस को बताया कि शनिवार रात करीब नौ बजे पड़ोस के कुछ लोग उनके घर पहुंचे और उनकी पत्नी पर डायन होने का आरोप लगाते हुए हमला कर दिया। उनके मुताबिक, महिला को इतनी गंभीर चोटें आईं कि परिजन उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर गए।

    पहले उसे सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां से बेहतर इलाज के लिए मेडिकल अस्पताल रेफर किए जाने की बात सामने आई। बाद में परिजन उसे एक निजी अस्पताल में ले गए। वहां इलाज के दौरान महिला ने दम तोड़ दिया।

    शव आरोपियों के घर के सामने रखकर जताया विरोध

    महिला की मौत के बाद रविवार को जब शव गांव पहुंचा, तो ग्रामीणों में आक्रोश फैल गया। रिपोर्ट के मुताबिक, नाराज लोगों ने शव को आरोपियों के घर के दरवाजे पर रखकर विरोध जताया और कार्रवाई की मांग की।

    सूचना मिलने पर कच्ची-पक्की ओपी प्रभारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचीं। घटनास्थल पर फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम को भी बुलाया गया, ताकि जरूरी साक्ष्य जुटाए जा सकें।

    मृतका के पति ने पड़ोस के तीन लोगों समेत छह से सात अज्ञात व्यक्तियों पर आरोप लगाए हैं। पुलिस मामले की जांच कर रही है और इलाके में तनाव को देखते हुए स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

    दोनों मामलों में जांच के बाद सामने आएगी सच्चाई

    बाढ़ में कोचिंग संचालिका ने जहां एक पूर्व छात्र पर गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं मुजफ्फरपुर में महिला की मौत के मामले में परिजनों ने पड़ोसियों को जिम्मेदार ठहराया है। पुलिस के सामने दोनों घटनाओं से जुड़े आरोपों की जांच करना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करना अहम है।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। दोनों मामलों में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है; अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

  • होटल में प्रेमिका की गला दबाकर हत्या का आरोप, रूस में हुई थी दोनों की मुलाकात; शादी से इनकार के बाद बढ़ा विवाद.

    होटल में प्रेमिका की गला दबाकर हत्या का आरोप, रूस में हुई थी दोनों की मुलाकात; शादी से इनकार के बाद बढ़ा विवाद.

    होटल में प्रेमिका की गला दबाकर हत्या का आरोप, रूस में हुई थी दोनों की मुलाकात; शादी से इनकार के बाद बढ़ा विवाद.

    अमृतसर: पंजाब के अमृतसर में मोहकमपुरा थाना क्षेत्र के एक होटल में युवती की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला सामने आया है। आरोप है कि हरियाणा के करनाल जिले के निवासी युवक रितिक ने अपनी प्रेमिका वंशिका उर्फ तरुणप्रीत कौर की गला दबाकर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि दोनों की मुलाकात रूस में हुई थी, जहां युवती पढ़ाई के लिए गई थी। युवती के पिता ने आरोप लगाया है कि युवक उस पर शादी करने का दबाव बना रहा था और इसी विवाद के चलते वारदात को अंजाम दिया गया। पुलिस ने शिकायत के आधार पर हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    रूस में पढ़ाई के दौरान हुई थी दोनों की मुलाकात

    युवती के पिता सुखजिंदर सिंह के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2025 में अपनी बेटी वंशिका को स्टडी वीजा पर पढ़ाई के लिए रूस भेजा था। वहीं उसकी मुलाकात हरियाणा के करनाल जिले के नीलोखेड़ी गांव के निवासी रितिक से हुई। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे, लेकिन उनके रिश्ते को लेकर दोनों की सोच अलग थी।

    पिता का आरोप है कि रितिक वंशिका से शादी करना चाहता था, जबकि उनकी बेटी इस रिश्ते को दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती थी। इसी बात को लेकर दोनों के बीच रूस में भी विवाद होने लगे थे।

    पासपोर्ट फाड़ने और धमकी देने का भी आरोप

    सुखजिंदर सिंह ने पुलिस को बताया कि एक बार विवाद के दौरान रितिक ने कथित तौर पर उनकी बेटी का पासपोर्ट फाड़ दिया था और उसे जान से मारने की धमकी भी दी थी। पिता के अनुसार, बाद में बेटी के लिए नया पासपोर्ट बनवाने की व्यवस्था की गई और उसे भारत वापस बुला लिया गया।

    परिवार का आरोप है कि भारत लौटने के बाद भी रितिक युवती को लगातार परेशान कर रहा था और उस पर शादी करने का दबाव बना रहा था। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी।

    पढ़ाई की बात कहकर घर से निकली थी युवती

    परिजनों के अनुसार, शनिवार सुबह वंशिका पढ़ाई के सिलसिले में घर से अपनी एक्टिवा लेकर निकली थी। इसके बाद उसका फोन बंद हो गया और परिवार को उसकी कोई जानकारी नहीं मिली।

    शाम को परिजनों को पता चला कि मोहकमपुरा थाना क्षेत्र के कौजी नामक होटल में युवती का शव मिला है। पिता ने आरोप लगाया कि रितिक ने होटल में कमरा लिया था और वंशिका को वहां बुलाया था। शिकायत के मुताबिक, इसी होटल में उसकी गला दबाकर हत्या कर दी गई।

    घटना की जानकारी मिलने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे परिजनों को सौंप दिया।

    हत्या का मामला दर्ज, आरोपी की भूमिका की जांच

    मोहकमपुरा थाना पुलिस ने युवती के पिता की शिकायत पर रितिक के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। रिपोर्ट के अनुसार, घटना के बाद आरोपी फरार हो गया था। पुलिस मामले की जांच कर रही है और घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को जुटाया जा रहा है।

    पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि युवती होटल कैसे पहुंची, घटना से पहले दोनों के बीच क्या हुआ और मौत किन परिस्थितियों में हुई। पिता की ओर से लगाए गए आरोपों के साथ अन्य साक्ष्यों की भी जांच की जाएगी।

    रिश्ते में दबाव और धमकियों के आरोपों ने बढ़ाई चिंता

    इस घटना ने एक बार फिर रिश्ते में जबरदस्ती, शादी के दबाव और कथित धमकियों जैसे गंभीर मुद्दों को सामने ला दिया है। किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध रिश्ता या शादी स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस मामले में हत्या की वजह और आरोपी की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और परिजनों की शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है और आरोपों की अंतिम पुष्टि कानूनी प्रक्रिया के तहत होगी।