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  • गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास ‘इंटेलिसीट’, ऐसे बचाएगी जान..?

    गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास ‘इंटेलिसीट’, ऐसे बचाएगी जान..?

    गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास 'इंटेलिसीट', ऐसे बचाएगी जान!

    हाईवे पर देर रात एक छोटी सी झपकी के कारण बहुत लोगों की जान चली जाती है. इस तरह के हादसों को रोकने के लिए IIT मद्रास ने कमाल की इंटेलिसीट विकसित की है.

    भारत की सड़कें दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कों में से एक हैं और ज्यादातर हादसों की वजह गाड़ियों की खराबी नहीं, बल्कि इंसानी गलतियां होती हैं. रात के सन्नाटे में अक्सर नींद के कारण आंखें भारी होने लगती हैं और फिर कुछ ही सेकंड की लापरवाही के कारण बड़ा हादसा हो जाता है. भारत के हाईवे पर होने वाले जानलेवा हादसों में एक बड़ी वजह ड्राइवर्स की नींद होती है. इसी समस्या को दूर करने के लिए एक इनोवेटिव और स्वदेशी समान खोज निकाला है IIT मद्रास के वैज्ञानिकों ने.

    IIT मद्रास के रिहैबिलिटेशन बायोइंजीनियरिंग ग्रुप ने एक ऐसी स्मार्ट सीट तैयार कर ली है, जो ड्राइवर के सोने से ठीक पहले ही उसकी थकान को भांप लेती है और जोरदार अलर्ट देकर एक्सीडेंट होने से बचा लेती है. सबसे कमाल की बात है कि यह बिना कैमरे और तार के काम करती है. तो आइए जानते हैं आखिर क्या है यह इंटेलिसीट टेक्नोलॉजी और यह किस तरह बिना किसी कैमरे या तार के काम करती है.

    आईआईटी मद्रास के रिहैबिलिटेशन बायोइंजीनियरिंग ग्रुप ने सीटिंग कंपनी हरिता के साथ मिलकर इस सीट को तैयार किया है, इसका नाम इंटेलिसीट दिया गया है. यह स्मार्ट सीट ड्राइवर के सोने से ठीक पहले ही उसकी थकान को पहचान लेती है और किसी हादसे होने से पहले ही अलर्ट कर देती है. देखने में यह एक नार्मल कार सीट की तरह दिखाई देती है, लेकिन इसके अंदर एडवांस सेंसर लगाए गए हैं.

    बिना कैमरा और तार के करेगी काम

    मार्केट में मौजूद दूसरी इस तरह की सीटे ड्राइवर पर नजर रखने के लिए कैमरे, सिर पर पट्टी या शरीर पर इलेक्ट्रोड यानी तार का इस्तेमाल करती हैं. वहीं इंटेलिसीट पूरी तरह से नॉन-इंट्रूसिव है. यानी ड्राइवर को शरीर पर कुछ भी पहनने की जरूरत नहीं है.

    तो कैसे करती है पहचान

    अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि जब कैमरा, सिर पर पट्टी और तार भी नहीं है, तो सीट कैसे ड्राइवर के सोने का पहचान कैसे करती है. इसका जवाब है कि सीट के बैकरेस्ट और बेस में लगे सेंसर, जो ड्राइवर के बैठने के तरीके, उसकी स्थिति और थकान के कारण शरीर में होने वाली हल्की हलचलों को महसूस करते हैं.

    सर्फेस इलेक्ट्रोमायोग्राफी मांसपेशियों की थकान मापने के लिए यह सीट शरीर से निकलने वाले हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को समझने का प्रयास करती है. इससे पता चलता है कि पीठ और कंधों की मांसपेशियां कब थकान महसूस कर रही है.

    खतरे के हिसाब से 3 लेवल पर अलर्ट

    यह सीट ड्राइवर की थकान को तीन चरणों में भांपकर एक्शन में आती है-

    हल्की थकान डैशबोर्ड पर एक छोटी सी लाइट जलती है, जो सिर्फ ड्राइवर को सावधान करती है.

    थकान लाइट के साथ-साथ एक बीप यानी अलर्ट मिलता है.

    ज्यादा थकाम जब स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है, तो सीट खुद कांपने लगती है. इसके साथ ही गाड़ी के मालिक को मोबाइल ऐप पर तुरंत नोटिफिकेशन पहुंच जाता है.

    पुरानी गाड़ियों में भी आसानी से होगी फिट

    इस सीट की यह खास बात है कि इसे पुरानी गाड़ियों में भी आसानी से फिट किया जा सकता है. इंटेलिसीट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे किसी भी मौजूदा ट्रक, बस या कार में आसानी से फिट किया जा सकता है. इसके लिए गाड़ी में ज्यादा टेक्निकल बदलाव करने की भी जरूरत नहीं पड़ती है. फिट करने के बाद चाबी ऑन करते ही यह काम करना शुरू कर देती है और मोबाइल ऐप के जरिए रियर-टाइम डेटा भेजती रहती है.

    भारत में सड़क हादसों और थके हुए ड्राइवरों की वजह से जाने वाली जानों को बचाने में यह स्वदेशी इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) टेक्नोलॉजी एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है.

  • अब ज्यादा SIM रखने वालों पर लगाम कसेगी DoT, आपकी ये 1 गलती कनेक्शन कर सकती है सस्पेंड.

    अब ज्यादा SIM रखने वालों पर लगाम कसेगी DoT, आपकी ये 1 गलती कनेक्शन कर सकती है सस्पेंड.

    क्या आपके पास 1 से ज्यादा सिम है? क्या आप जानते हैं कि एक व्यक्ति अपने पास कितनी सिम रख सकता है? अगर नहीं, तो इस बारे में जरूर जान लें. दरअसल, दूरसंचार विभाग (DoT) ने साइबर फ्रॉड, डिजिटल धोखाधड़ी और फर्जी मोबाइल कनेक्शन पर लगाम कसने के लिए सिम कार्ड नियमों के सख्त पालन की दिशा में बड़ा कदम उठाया है.

    विभाग की ओर से टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि निर्धारिक सीमा पूरी कर चुके ग्राहकों को नया मोबाइल कनेक्शन जारी न किया जाए. इसके लिए डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (DIP) का इस्तेमाल किया जाएगा, जहां सीमा तक पहुंच चुके ग्राहकों की पहचान और फोटो उपलब्ध रहेगी.

    क्या है DoT का नया नियम?

    हमारे देश में मोबाइल कनेक्शनों की अधिकतम सीमा पहले से ही तय है. सामान्य राज्यों में एक व्यक्ति अपने नाम पर अधिकतम 9 मोबाइल कनेक्शन रख सकता है. वहीं, असम, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में ये सीमा 6 तय की गई है. अब DoT ने इस नियम को सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए नया मॉनिटरिंग मैकेनिज्म लागू करने का फैसला किया है.

    कैसे काम करेगा नया सिस्टम?

    दूरसंचार विभाग के डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (DIP) में विभिन्न टेलीकॉम कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए गए ग्राहक डेटा का विश्लेषण किया जाता है. इससे पता चलता है कि किसी व्यक्ति के नाम पर कुल कितने मोबाइल नंबर सक्रिय हैं. अब इस प्लेटफॉर्म पर उन ग्राहकों की प्रतिनिधि तस्वीर भी उपलब्ध कराई जाएगी, जो तय सीमा तक पहुंच चुके हैं. इससे नया सिम जारी करने से पहले ग्राहक की पहचान आसान हो जाएगी.

    लिमिट से ज्यादा सिम होने पर क्या होगा?

    DoT ने इस बारे में स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी व्यक्ति का लिमिट से ज्यादा सिम है और कोई नया कनेक्शन एक्टिव हो गया है, तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाए. ये कनेक्शन तब तक बंद रहेगा, जब तक अतिरिक्त सिम से जुड़े मामले का समाधान नहीं हो जाता.

    30 नवंबर तक पूरा होगा इंटीग्रेशन

    सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे 30 नवंबर 2026 तक इस व्यवस्था को अपने सब्सक्राइबर एनरोलमेंट और सिम एक्टिवेशन सिस्टम के साथ पूरी तरह जोड़ दें. इसके बाद नया सिम जारी करने की प्रक्रिया में रियल टाइम जांच की जा सकेगी.

    क्यों उठाया जा रहा है ये कदम

    पिछले कुछ सालों में फर्जी सिम कार्ड के जरिए बैंकिंग फ्रॉड, साइबर ठगी, फर्जी कॉल और ऑनलाइन क्रिमिनल तेजी से बढ़े हैं. कई मामलों में एक ही व्यक्ति के नाम पर बड़ी संख्या में मोबाइल कनेक्शन लेकर उनका गलत इस्तेमाल किया गया. सरकार का मानना है कि मोबाइल कनेक्शनों पर बेहतर निगरानी से ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी.

  • Aadhaar Bometric Lock: कर लें इस सेटिंग को ऑन… नहीं कर पाएगा कोई आधार का गलत इस्तेमाल, बायोमेट्रिक रहेंगे पूरी तरह सेफ

    Aadhaar Bometric Lock: कर लें इस सेटिंग को ऑन… नहीं कर पाएगा कोई आधार का गलत इस्तेमाल, बायोमेट्रिक रहेंगे पूरी तरह सेफ

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    आधार कार्ड आज बैंक, सरकारी स्कीम, सिम कार्ड खरीदने और कई जरूरी कामों में इस्तेमाल होता है. ऐसे में अगर आपके आधार का गलत इस्तेमाल हो जाए तो बड़ी परेशानी हो सकती है. इसी खतरे को कम करने के लिए नए Aadhaar App में एक खास फीचर दिया गया है. अब यूजर अपने फिंगरप्रिंट और आइरिस (आंखों की पहचान) को जब चाहें लॉक और जरूरत पड़ने पर अनलॉक कर सकते हैं. इससे आपकी बायोमेट्रिक जानकारी ज्यादा सेफ रहती है.

    बायोमेट्रिक लॉक क्यों जरूरी है?

    आधार से जुड़ी बायोमेट्रिक जानकारी में आपके फिंगरप्रिंट और आइरिस की जानकारी होती है. अगर यह जानकारी लॉक रहती है, तो कोई भी व्यक्ति आपकी पर्मिशन के बिना बायोमेट्रिक से आधार का इस्तेमाल नहीं कर सकता. इससे धोखाधड़ी की आशंका काफी कम हो जाती है.

    नए Aadhaar App से कैसे करें लॉक?

    अगर आप अपने फिंगरप्रिंट और आइरिस को लॉक करना चाहते हैं, तो सबसे पहले नया Aadhaar App खोलें. इसके बाद अपने आधार खाते में लॉग इन करें. ऐप के होम पेज पर आपको Biometric Lock का ऑप्शन दिखाई देगा. इस पर टैप करें और स्क्रीन पर दी गई जानकारी को पूरा करें. प्रोसेस पूरा होते ही आपका बायोमेट्रिक डेटा लॉक हो जाएगा. इसके बाद किसी भी बायोमेट्रिक जांच के लिए पहले इसे अनलॉक करना जरूरी होगा.

    जरूरत पड़ने पर ऐसे करें अनलॉक

    जब आपको बैंक, आधार सेवा केंद्र या किसी अन्य जगह फिंगरप्रिंट या आइरिस से पहचान करानी हो, तब Aadhaar App खोलें. फिर Biometric Unlock ऑप्शन चुनें और पहचान की प्रोसेस पूरी करें. आपका बायोमेट्रिक कुछ समय के लिए अनलॉक हो जाएगा. काम पूरा होने के बाद आप इसे दोबारा लॉक भी कर सकते हैं.

    किनके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद?

    अगर आपका आधार कई सेवाओं से जुड़ा है, आप अक्सर बैंक या सरकारी काम करते हैं या आपको आधार के गलत इस्तेमाल की चिंता रहती है, तो यह सुविधा आपके लिए काफी फायदेमंद है. जरूरत न होने पर बायोमेट्रिक लॉक रखने से सेफ्टी बढ़ जाती है और आपकी निजी जानकारी सेफ रहती है. नए Aadhaar App में यह सुविधा अब पहले से ज्यादा आसान और तेज तरीके से होती है.

  • क्रूड ऑयल छोड़िए, जानिए बायोफ्यूल का बादशाह कौन? जिस पर दुनिया की नजरें.?

    क्रूड ऑयल छोड़िए, जानिए बायोफ्यूल का बादशाह कौन? जिस पर दुनिया की नजरें.?

    क्रूड ऑयल छोड़िए, जानिए बायोफ्यूल का बादशाह कौन? जिस पर दुनिया की नजरें.?

    ब्राजील को बायोफ्यूल की दुनिया का सबसे सफल उदाहरण कहा जाता है.

    क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन में बाधा आने की वजह से बायोफ्यूल की चर्चा तेज हो चली है. भारत में ई-20 पेट्रोल अनिवार्य कर दिया गया है. दुनिया लंबे समय से क्रूड ऑयल पर निर्भर रही है. पेट्रोल, डीजल, गैस और विमान ईंधन के लिए कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है. लेकिन अब ऊर्जा का यह मॉडल तेजी से बदल रहा है. महंगा तेल, बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं. ऐसे समय में बायोफ्यूल एक मजबूत विकल्प बनकर सामने आया है. बायोफ्यूल पौधों, अनाज, गन्ने, मक्का, वनस्पति तेल, जैविक कचरे और पशु अवशेषों से बनाया जाता है. वर्ल्ड बायोफ्यूल डे के मौके पर जानिए, बायोफ्यूल का बादशाह देश कौन है? इससे कैसे दे रहा अर्थव्यवस्था को रफ्तार? क्यों दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही?

    बायोफ्यूल का बादशाह कौन सा देश है? इसका उत्तर एक शब्द या एक लाइन में देना आसान नहीं है. यूं कुल बायोफ्यूल उत्पादन में अमेरिका नंबर एक है. वहीं, गन्ने से एथनॉल बनाने और उसे रोजमर्रा की परिवहन व्यवस्था का सफल हिस्सा बनाने में ब्राजील को दुनिया का सबसे प्रभावशाली मॉडल माना जाता है. इंडोनेशिया, चीन भी इस मामले में आगे आए हैं. भारत भी ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से इस ओर कदम बढ़ा चुका है. इसलिए इस एक सवाल को बड़े कैनवस पर देखना होगा.

    प्रोडक्शन के मामले अमेरिका नंबर एक

    साल 2024 के उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बायोफ्यूल उत्पादक देश है. उसका कुल उत्पादन करीब 856 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. तेल समतुल्य बैरल का मतलब है कि अलग-अलग ईंधनों की ऊर्जा क्षमता को एक सामान्य पैमाने पर मापा गया है.

    अमेरिका में बायोफ्यूल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार मक्का है. मक्का से एथनॉल तैयार किया जाता है. यह एथनॉल पेट्रोल में मिलाया जाता है. इससे पेट्रोल की खपत कम होती है. अमेरिका में एथनॉल के साथ बायोडीजल और रिन्यूएबल डीजल का भी उत्पादन होता है. रिन्यूएबल डीजल को सामान्य डीजल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यही कारण है कि अमेरिका केवल एथनॉल में नहीं, बल्कि कुल तरल बायोफ्यूल उत्पादन में भी आगे है.

    ब्राजील क्यों कहलाता है एथेनॉल का किंग?

    ब्राजील कुल उत्पादन में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 510 हजार बैरल तेल-समतुल्य प्रतिदिन रहा. इसके बावजूद ब्राजील को बायोफ्यूल की दुनिया का सबसे सफल उदाहरण कहा जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह गन्ना एथनॉल है. ब्राजील ने 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान एथेनॉल को गंभीरता से अपनाना शुरू किया था. तब से देश ने गन्ने से बनने वाले ईंधन को अपनी परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा बना लिया. ब्राजील में बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन चलते हैं.

    ये वाहन पेट्रोल, एथनॉल या दोनों के मिश्रण से चलते हैं. इससे वाहन मालिक को ईंधन चुनने की सुविधा मिलती है. ब्राजील में गन्ने से केवल चीनी नहीं बनती. गन्ने के रस और शीरे से एथनॉल तैयार होता है. चीनी निकालने के बाद बचने वाले रेशेदार अवशेष को बगास कहा जाता है. इस बगास से बिजली भी बनाई जाती है. यानी एक ही फसल से चीनी, ईंधन और बिजली मिलती है. यही ब्राजील के मॉडल की बड़ी ताकत है. इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि अमेरिका कुल उत्पादन का नंबर एक देश है, जबकि ब्राजील गन्ना एथनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल का वैश्विक नेता है.

    इंडोनेशिया: बायोडीजल की बड़ी शक्ति

    बायोफ्यूल उत्पादन में इंडोनेशिया तीसरे स्थान पर है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 205 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. इंडोनेशिया की ताकत पाम ऑयल से बनने वाला बायोडीजल है. देश में डीजल में बायोडीजल मिलाने की नीति लागू है. इसे बी-35 नीति के नाम से जाना जाता है. इसका मतलब है कि डीजल में 35 प्रतिशत तक बायोडीजल शामिल किया जा सकता है. इंडोनेशिया पाम ऑयल का बड़ा उत्पादक है.

    इसलिए उसके पास बायोडीजल के लिए जरूरी कच्चा माल बड़ी मात्रा में उपलब्ध है. इससे उसे डीजल आयात कम करने और घरेलू उद्योग बढ़ाने में मदद मिलती है. हालांकि, पाम ऑयल आधारित बायोडीजल के साथ पर्यावरण की चिंता भी जुड़ी है. यदि जंगलों को काटकर पाम की खेती बढ़ाई जाए, तो पर्यावरण को नुकसान हो सकता है. इसलिए टिकाऊ खेती और जंगलों की सुरक्षा जरूरी है.

    चीन: तेजी से बढ़ती बायोफ्यूल क्षमता

    चीन इस सूची में चौथे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 106 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. चीन एथनॉल, बायोडीजल और कचरे से बनने वाले जैव ईंधन के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. चीन के सामने ऊर्जा सुरक्षा और वायु प्रदूषण बड़ी चुनौतियां हैं. विशाल वाहन बाजार भी उसकी ईंधन जरूरत बढ़ाता है. ऐसे में बायोफ्यूल उसके लिए एक उपयोगी विकल्प है. चीन कृषि और शहरी जैविक कचरे के बेहतर इस्तेमाल पर भी काम कर रहा है. भविष्य में वहां कचरे और गैर-खाद्य स्रोतों से बनने वाले बायोफ्यूल का महत्व बढ़ सकता है.

    भारत: उभरती हुई बायोफ्यूल शक्ति

    भारत दुनिया के टॉप पांच बायोफ्यूल उत्पादक देशों में शामिल है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 70 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. भारत का जोर मुख्य रूप से एथनॉल मिश्रण पर है. भारत पेट्रोल में एथनॉल मिलाकर पेट्रोलियम आयात घटाने की दिशा में काम कर रहा है. एथनॉल के लिए गन्ने के अलावा मक्का, टूटे चावल और अन्य अनुमत कृषि स्रोतों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

    भारत के लिए बायोफ्यूल का महत्व केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है. यह किसानों की आय से भी जुड़ा है. एथनॉल उत्पादन के लिए फसलों की मांग बढ़ने से कृषि क्षेत्र को नया बाजार मिल सकता है. इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल से बायोडीजल बनाने की संभावना भी बढ़ रही है. कृषि अवशेषों, गोबर और जैविक कचरे से बायोगैस तथा कंप्रेस्ड बायोगैस भी तैयार की जा सकती है. इससे पराली जलाने जैसी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है.

    बायोफ्यूल से अर्थव्यवस्था को कैसे मिलती है रफ्तार?

    बायोफ्यूल उद्योग का पहला लाभ किसानों को होता है. गन्ना, मक्का, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती है. इससे किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार बनता है. दूसरा लाभ रोजगार के रूप में मिलता है. बायोफ्यूल संयंत्रों में उत्पादन, परिवहन, भंडारण, मशीनरी और तकनीकी सेवाओं से रोजगार पैदा होते हैं. ग्रामीण इलाकों में इसका प्रभाव अधिक दिखता है. तीसरा लाभ तेल आयात बिल में कमी का है. जो देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करते हैं, वे घरेलू बायोफ्यूल उत्पादन बढ़ाकर विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं. चौथा लाभ ऊर्जा सुरक्षा है. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत अचानक बढ़ जाए, तो बायोफ्यूल घरेलू विकल्प के रूप में कुछ राहत दे सकता है.

    दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही है?

    दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है. पेट्रोल और डीजल जलने से कार्बन डाइऑक्साइड समेत कई प्रदूषक निकलते हैं. बायोफ्यूल को जीवाश्म ईंधन की तुलना में कम कार्बन वाला विकल्प माना जाता है. यह लाभ हर स्थिति में समान नहीं होता. उत्पादन की पूरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण है. फसल उगाने में कितना पानी लगा, कितनी खाद और ऊर्जा लगी, परिवहन कितना हुआ और क्या जंगलों को नुकसान पहुंचा, इन सभी बातों का असर पड़ता है. फिर भी, सही तरीके से तैयार किया गया बायोफ्यूल प्रदूषण घटाने में मदद कर सकता है. खासकर विमानन, भारी ट्रक और समुद्री परिवहन जैसे क्षेत्रों में इसका महत्व बढ़ रहा है, जहां केवल बैटरी से काम चलाना अभी कठिन है.

    क्या है बायोफ्यूल का भविष्य?

    भविष्य में बायोफ्यूल का ध्यान केवल गन्ने और मक्का तक सीमित नहीं रहेगा. कृषि कचरा, पराली, लकड़ी के अवशेष, शैवाल, नगरों का जैविक कचरा और इस्तेमाल किया गया खाद्य तेल महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं. इसे दूसरी और तीसरी पीढ़ी का बायोफ्यूल कहा जाता है. इसका लाभ यह है कि इससे खाद्य फसलों पर दबाव कम हो सकता है. बायोफ्यूल, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. आने वाले समय में ये सभी ऊर्जा विकल्प अलग-अलग जरूरतों के लिए साथ काम करेंगे.

  • हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    Image Credit: AI Generated Image

    अगर आप अक्सर ट्रैवल करते हैं और होटल या एयरपोर्ट पर फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. माइक्रोसॉफ्ट की थ्रेट इंटेलिजेंस टीम ने एक खतरनाक साइबर अटैक अभियान ‘CaptiveCrunch’ को लेकर दुनिया भर के यात्रियों को अलर्ट जारी किया है. रूसी हैकर्स का एक ग्रुप होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के वाई-फाई नेटवर्क को निशाना बना रहा है. यह हैकिंग हमला इतना खतरनाक है कि हैकर्स आपके लैपटॉप या फोन का पासवर्ड चुराने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं.

    क्या है ‘CaptiveCrunch’ और यह कैसे काम करता है?

    माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इस हैकिंग अभियान को Storm-2945 नाम का ग्रुप चला रहा है, जो रूस के कुख्यात हैकर ग्रुप ‘माइडनाइट ब्लिजार्ड’ (APT29 या Cozy Bear) से जुड़ा हुआ है. यह हमला मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ट्रैवलर्स को निशाना बनाकर किया जा रहा है.

    • नेटवर्क हैक करना:
      हैकर्स सबसे पहले होटल के राउटर या उस सिस्टम को हैक करते हैं जिससे वाई-फाई का लॉगिन पेज (Captive Portal) खुलता है.
    • नकली लॉगिन पेज:
      जब कोई यूजर वाई-फाई से कनेक्ट करता है, तो उसके सामने गूगल या माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसा दिखने वाला फर्जी लॉगिन पेज आ जाता है.
    • पासवर्ड चोरी:
      यूजर जैसे ही अपना पासवर्ड डालता है, उसकी ईमेल, वनड्राइव फाइल्स और कंपनी के डेटा का एक्सेस सीधे हैकर्स के पास चला जाता है.

    फर्जी अपडेट के नाम पर मालवेयर का जाल

    • इस हमले की सबसे खतरनाक बात यह है कि हैकर्स यूजर्स को धोखा देने के लिए कई तरह के फर्जी पॉप-अप और यूटिलिटीज का सहारा लेते हैं.
    • यूजर के स्क्रीन पर ‘ब्राउजर अपडेट’, ‘विंडोज सिक्योरिटी चेक’ या ‘डायरेक्टएक्स/विजुअल सी++ इंस्टॉल’ करने के मैसेज आते हैं.
    • ये मैसेज बिल्कुल असली विंडोज या गूगल सर्विस की तरह दिखाई देते हैं.
    • जैसे ही यूजर इन फर्जी अपडेट्स पर क्लिक करता है, उसके डिवाइस में खतरनाक मालवेयर (Malware) डाउनलोड हो जाता है.

    हैकर्स आपके डिवाइस में क्या-क्या कर सकते हैं?

    माइक्रोसॉफ्ट ने चेतावनी दी है कि इस मालवेयर के जरिए हैकर्स आपके कंप्यूटर पर लगभग पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं.

    • ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग:
      हैकर्स आपके वेबकैम और माइक को चालू करके आपकी बातें और वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.
    • पासवर्ड और कुकीज चोरी:
      ब्राउजर में सेव किए गए सभी पासवर्ड और बैंकिंग कुकीज चुरा सकते हैं.
    • स्क्रीनशॉट और की-स्ट्रोक्स:
      आप कीबोर्ड पर क्या टाइप कर रहे हैं (Keylogging), हैकर्स उसे ट्रैक कर सकते हैं और आपकी स्क्रीन के स्क्रीनशॉट ले सकते हैं.

    होटल वाई-फाई अटैक से कैसे बचें?

    माइक्रोसॉफ्ट ने यात्रियों और कंपनियों के लिए कुछ बेहद जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं:

    • पब्लिक वाई-फाई से बचें:
      जब भी संभव हो, होटल या एयरपोर्ट के वाई-फाई के बजाय अपने फोन का पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट इस्तेमाल करें.
    • कोई अपडेट न डाउनलोड करें:
      वाई-फाई कनेक्ट करते ही अगर कोई ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का मैसेज आए, तो उस पर भूलकर भी क्लिक न करें.
    • ऑफिशियल वेबसाइट का इस्तेमाल करें:
      किसी भी अपडेट के लिए हमेशा सॉफ्टवेयर की आधिकारिक वेबसाइट या सिस्टम सेटिंग्स का ही उपयोग करें.
    • एन्क्रिप्टेड प्राइवेट कनेक्शन (VPN):
      अगर पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी हो, तो हमेशा एक सुरक्षित और भरोसेमंद VPN का उपयोग करें.

  • बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    मानसून का मौसम जहां एक ओर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाता है, तो वहीं दूसरी तरफ कई बार यह आपके इंटरनेट और WiFi नेटवर्क की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा देता है. बारिश के मौसम में कई बार जब तेज बरसात होती है, तो स्मार्टफोन से लेकर ब्रॉडबैंड की इंटरनेट स्पीड अचानक कम हो जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बादलों के बरसते ही आपका इंटरनेट अचानक सुस्त क्यों हो जाता है?

    टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस समस्या को रेन फेड कहते हैं. आइए जानते हैं इस समस्या के पीछे क्या कारण होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.

    बारिश में इंटरनेट स्लो होने के कारण

    रेन फेड
    वाई-फाई, सैटेलाइट और मोबाइल नेटवर्क रेडियो तरंगों के जरिए काम करते हैं. जब हवा में बारिश की बूंदें होती हैं, तो वे इन तरंगों के रास्ते में बाधा बनती हैं. पानी की बूंदें सिग्नल को सोख लेती हैं और उन्हें फैला देती हैं, जिससे सिग्नल कमजोर होने लगता है.

    वहीं 5G और वाई-फाई सिग्नल काफी हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं. ये सिग्नल बहुत तेज स्पीड तो देते हैं, लेकिन बारिश और नमी के संपर्क में आते ही सबसे जल्दी प्रभावित होते हैं.

    भारी बारिश के कारण अंडरग्राउंड या बाहरी केबलों में पानी घुसने का भी खतरा बना रहता है. तारों में नमी आने से न सिर्फ स्पीड स्लो होती है, बल्कि नेटवर्क में बार-बार रुकावट भी आने लगती है.

    तेज आंधी-तूफान और बारिश के कारण इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बाहरी डिवाइसों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे पूरे इलाके का नेटवर्क प्रभावित हो जाता है.

    कौन-सा कनेक्शन है बारिश में बेस्ट?

    फाइबर ऑप्टिक
    बारिश के मौसम में फाइबर इंटरनेट सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इसमें डेटा रेडियो वेव की जगह लाइट सिग्नल के जरिए केबल से यात्रा करता है, जिस पर बारिश या हवा का कोई असर नहीं पड़ता.

    5G और 4G मोबाइल डेटा
    बारिश के दिनों में मोबाइल डेटा की स्पीड में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. 5G की फ्रीक्वेंसी ज्यादा होने के कारण यह बारिश से जल्दी प्रभावित होता है.

    सैटेलाइट इंटरनेट
    खराब मौसम में सैटेलाइट कनेक्शन सबसे ज्यादा कमजोर साबित होते हैं, क्योंकि बादलों और बारिश के बीच से सिग्नल आने-जाने में भारी रुकावट होती है.

    बारिश के मौसम में स्लो इंटरनेट की समस्या को कैसे ठीक करें?

    अगर बारिश के दौरान आपका वाई-फाई ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप कुछ आसान टिप्स की मदद से इंटरनेट स्पीड को तेज कर सकते हैं-

    5GHz बैंड पर स्विच करें
    अगर आपका राउटर डुअल-बैंड है, तो अपने डिवाइस को 2.4GHz की जगह 5GHz बैंड से कनेक्ट करें. यह कम भीड़भाड़ वाला बैंड है और बेहतर स्पीड देता है.

    राउटर को रीस्टार्ट करें
    किसी भी तकनीकी गिल्च या अस्थाई सिग्नल समस्या को दूर करने के लिए अपने मोडेम और राउटर को कुछ सेकेंड के लिए बंद करके फिर से ऑन करें.

    राउटर की जगह बदलें
    राउटर को किसी ऊंची जगह पर रखें. इसे मोटी दीवारों, धातु की चीजों और बंद कोनों से दूर रखें जिससे सिग्नल घर में सही तरीके से फैल सके.

    गैर-जरूरी डिवाइसेज को हटाएं
    नेटवर्क पर लोड कम करने के लिए उन फोन, टीवी या गैजेट्स का वाई-फाई बंद कर दें जिनका आप उस समय इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.

    वाई-फाई एक्सटेंडर
    अगर घर के किसी हिस्से में सिग्नल कमजोर आ रहा है, तो सिग्नल रेंज बढ़ाने के लिए एक्सटेंडर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

  • रोबोटिक्स की जंग में अमेरिका को पछाड़ेगा चीन? क्या ड्रैगन बनेगा सिकंदर, जानिए भारत की स्थिति..

    रोबोटिक्स की जंग में अमेरिका को पछाड़ेगा चीन? क्या ड्रैगन बनेगा सिकंदर, जानिए भारत की स्थिति..

    रोबोटिक्स की जंग में अमेरिका को पछाड़ेगा चीन? क्या ड्रैगन बनेगा सिकंदर, जानिए भारत की स्थिति..

    चीन अपनी टेक ताकत और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग के दम पर ह्यूमनॉइड रोबोट्स यानी इंसानों जैसे दिखने और काम करने वाले रोबोट्स के ग्लोबल हब बनने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका है. फैक्ट्रियों की असेंबली लाइन से लेकर बड़े-बड़े वेयरहाउस तक चीन इन मशीनी इंसानों को असल दुनिया के कामों में उतार रहा है. इसी बूम के बीच चीन की दिग्गज रोबोटिक्स कंपनी Unitree अब IPO की रेस में है. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल आ रहा है कि आखिर चीन रोबोट्स पर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है? क्या वो अमेरिका की टेस्ला जैसी कंपनियों को पछाड़कर रोबोटिक्स का दुनिया में किंग बनने की कोशिश कर रहा है? और क्या ये रोबोट्स सच में हमारी फैक्ट्रियों और आम जिंदगी में एंट्री करने के बहुत ही करीब आ चुके हैं?

    चीन की रोबोटिक्स कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स ह्यूमनॉइड रोबोट की रेस में एक बड़ा नाम बनकर उभर रही है. भले ही चीन से बाहर लोग इस कंपनी का नाम ज्यादा न जानते हों, लेकिन इसके रोबोट्स के वीडियो इंटरनेट पर छाए हुए हैं. सुपरह्यूमन जैसे स्टंट और बैकफ्लिप करते यूनिट्री के रोबोट्स को करोड़ों लोग देख चुके हैं. अब यूनिट्री रोबोटिक्स एक बड़ा फाइनेंसियल कदम उठाने जा रही है. अब ये कंपनी शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में अपना IPO लाने की तैयारी में है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, गुरुवार को यूनिट्री ने अपने शेयरों की कीमत लगभग 22 डॉलर प्रति शेयर तय की है, जिससे वह करीब 900 मिलियन डॉलर जुटाने की योजना बना रही है.

    9 अरब डॉलर की वैल्यूएशन

    इस डील के साथ ही यूनिट्री रोबोटिक्स की वैल्यूएशन करीब 9 अरब डॉलर पहुंच जाएगी. हालांकि, टेक जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह टेक्नोलॉजी सच में एक बड़े बिजनेस में बदल सकती है? भले ही यूनिट्री के रोबोट तेजी से बेहतर हो रहे हैं, लेकिन क्या आने वाले समय में आम लोग और कंपनियां लाखों की संख्या में ये रोबोट खरीदेंगी, यह अभी साफ नहीं है.

    रिसर्च फर्म Omdia के एक्सपर्ट्स लियान जी सू के मुताबिक, यूनिट्री का यह स्टॉक सेल पूरे रोबोटिक्स सेक्टर के लिए एक बड़ा टेस्ट साबित होगा. इससे यह समझ आएगा कि शेयर मार्केट ह्यूमनॉइड रोबोट्स जैसे उभरते और शुरुआती टेक सेक्टर को किस नजरिए से देखता है.

    फिजिकल AI का बढ़ता मार्केट

    रोबोट्स को इंसानों, सामानों, कमरों और डेली के कामों को समझने के लिए असल दुनिया में सीखना पड़ता है. इस टेक्नोलॉजी को एम्बॉडीड एआई या फिजिकल एआई कहा जाता है.

    इन्वेस्टमेंट रिसर्च फर्म CLSA की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट साल 2030 तक 69 अरब डॉलर का हो सकता है, जो इस साल मात्र 2 अरब डॉलर के करीब है.

    बढ़ती टक्कर और घटता मुनाफा

    2026 के पहले क्वाटर में कड़ी टक्कर और कम मांग के कारण यूनिट्री की ग्रोथ थोड़ी धीमी रही. बढ़ती टक्कर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर ज्यादा खर्च करने की वजह से पहली तिमाही में कंपनी का मुनाफा 55% तक कम हो गया.

    चीन बनाम अमेरिका: रोबोटिक्स की जंग

    यूनिट्री की यह लिस्टिंग इसलिए खास है क्योंकि यह चीन के मेनलैंड स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी है.

    चीन रोबोट्स के मास प्रोडक्शन में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है:

    Omdia के अनुमान के अनुसार, चीनी निर्माताओं ने इस साल की पहली छमाही में करीब 18,500 ह्यूमनॉइड रोबोट बेचे.

    वहीं इस पीरियड में अमेरिकी कंपनियों ने सिर्फ 4,000 रोबोट शिप किए.

    अगर चीन इसी रफ्तार से कम लागत में रोबोट बनाता रहा, तो वह अमेरिकी कंपनियों के मास प्रोडक्शन में पहुंचने से पहले ही एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर लेगा. लेकिन, अमेरिका की टेस्ला, Figure AI, एजिलिटी रोबोटिक्स जैसी कंपनियां बड़ा निवेश कर रही हैं. वहीं Nvidia फिजिकल एआई के लिए जरूरी चिप्स और एआई सिस्टम का नेतृत्व कर रही है.

    चीन ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स में इतना भारी निवेश क्यों कर रहा है?

    चीन रोबोटिक्स सेक्टर में दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनना चाहता है. ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट 2026 में करीब 2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2030 तक 69 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जैसा पहले बताया गया है. चीन चाहता है कि अमेरिका के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने से पहले पहले वह कम लागत और तेज स्पीड में रोबोट बनाकर दुनिया के बाजार पर बढ़त बना ले.

    यूनिट्री दूसरे चीनी रोबोटिक्स कंपनियों से अलग क्यों है?

    यूनिट्री चीन के शेयर मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी रेस में है. इसके रोबोट्स के वायरल स्टंट्स इंटरनेट पर काफी चर्चा का विषय बने हैं. इसके साथ ही बीते साल 2025 में यूनिट्री ने दुनिया में सबसे ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोट्स बेचे, इसका रेवेन्यू 4 गुना बढ़कर 250 मिलियन डॉलर पहुंचा और यह एक प्रॉफिटेबल यानी लाभ कमाने वाली कंपनी बन गई है.

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    फैक्ट्रियों और दूसरे बिजनेस में ह्यूमनॉइड रोबोट्स बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने के कितने करीब हैं?

    रोबोट्स का हुनर और AI तेजी से सुधर रहा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल होने में अभी समय लग सकता है. हालांकि चीन ने 2026 की पहली छमाही में 18,500 रोबोट्स की डिलीवरी की है, लेकिन कंपनियां और दूसरे कस्टमर्स इन्हें महंगे दामों में खरीदने और रोजाना के काम में इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं या नहीं, यह टेस्ट होना बाकी है.

    क्या चीनी कंपनियां अमेरिकी फर्मों को पीछे कर सकती हैं?

    चीन के पास प्रोडक्शन की तेजी और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग जैसी शक्ति है. इसका उदाहरण है कि साल 2026 के पहले 6 महीनों में चीन ने 18,500 रोबोट बनाए, वहीं अमेरिका ने सिर्फ 4,000. लेकिन अमेरिका के पास बेहतर AI और एडवांस्ड चिप्स की ताकत है. अगर चीन इसी रफ्तार से प्रोडक्शन बढ़ाता रहा, तो वह मैन्युफैक्चरिंग में अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है, लेकिन एआई और सॉफ्टवेयर में अमेरिका अभी भी कड़ी टक्कर दे रहा है.

    ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की दौड़ में भारत कहां खड़ा है?

    ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की रेस में भारत फिलहाल उभरते हुए फेस में है. अमेरिका और चीन जैसे देश एडवांस फिजिकल AI, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग और बड़े पैमाने पर फंडिंग के कारण इस सेक्टर में आगे हैं.  हालांकि, भारत सॉफ्टवेयर टैलेंट, स्पेस टेक्नोलॉजी और सर्विस रोबोटिक्स में तेजी से कदम बढ़ा रहा है.  
    इस सेक्टर में भारत ने ISRO के गगनयान मिशन के लिए AI-संचालित हाफ-ह्यूमनॉइड रोबोट व्योममित्र तैयार किया है, जो गगनयान के अनक्रू टेस्ट मिशनों में हिस्सा लेगा. भारत के पास विश्वस्तरीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और AI रिसर्चर्स का नेटवर्क है, जो Embodied AI तैयार करने में मदद करेगा.

    भारत का लक्ष्य तुरंत पश्चिमी या चीनी कंपनियों से सीधे एडवांस दो पैरों वाले इंडस्ट्रियल ह्यूमनॉइड्स में टक्कर लेने के जगत पर अपने स्पेशल तकनीक वाले रोबोट तैयार करना है. IndiaAI मिशन, PLI योजनाओं और IITs में R&D हब्स के विस्तार के साथ भारत इस अंतर को तेजी से छोटा कर रहा है.

  • बिना बैंक डिटेल चुराए भी कैसे आपको कंगाल बना सकते हैं हैकर्स? Framework डेटा लीक का पूरा एक्सप्लेनर..

    बिना बैंक डिटेल चुराए भी कैसे आपको कंगाल बना सकते हैं हैकर्स? Framework डेटा लीक का पूरा एक्सप्लेनर..

    बिना बैंक डिटेल चुराए भी कैसे आपको कंगाल बना सकते हैं हैकर्स? Framework डेटा लीक का पूरा एक्सप्लेनर..

    मॉड्युलर और आसानी से रिपेयर होने वाले लैपटॉप बनाने के लिए दुनियाभर में मशहूर कंपनी Framework के ग्राहकों के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है. अगस्त की शुरुआत में कंपनी ने अपने सभी पंजीकृत यूजर्स को एक ईमेल भेजकर जानकारी दी कि उनके डेटाबेस में एक बड़ी सुरक्षा सेंधमारी (Data Breach) हुई है. अगर आपने कभी भी Framework से कोई प्रोडक्ट या एसेसरीज खरीदी है, तो आपकी निजी और संवेदनशील जानकारी अब हैकर्स के हाथ लग चुकी हो सकती है.

    पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि जब बैंक अकाउंट या पासवर्ड चोरी नहीं हुए, तो खतरा कैसा? लेकिन साइबर अपराध की दुनिया में केवल आपकी पहचान से जुड़ी जानकारी भी आपको आर्थिक रूप से कंगाल बनाने के लिए काफी होती है. आइए आसान और विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है, हैकिंग कैसे हुई, और बिना बैंक डेटा के भी आपके ऊपर क्या खतरे मंडरा रहे हैं.

    हैकर्स के हाथ क्या लगा और क्या बच गया?

    कंपनी द्वारा जारी आधिकारिक बयान और ईमेल के अनुसार, इस साइबर हमले में हैकर्स ग्राहकों के एक बड़े डेटाबेस को एक्सेस करने में कामयाब रहे हैं.

    चुराई गई जानकारियां:

    ग्राहकों का पूरा नाम (Full Name)
    ईमेल एड्रेस (Email Address)
    फोन नंबर (Phone Number)
    डिलीवरी और बिलिंग एड्रेस (Address)
    लॉगिन IP एड्रेस (Login IP Address)

    सुरक्षित रही जानकारियां: राहत की बात केवल इतनी है कि हैकर्स ग्राहकों के क्रेडिट/डेबिट कार्ड डिटेल्स, बैंक अकाउंट की जानकारी, यूपीआई आईडी या पासवर्ड तक नहीं पहुंच पाए हैं. यानी सीधे तौर पर हैकर्स आपके बैंक खाते से पैसे गायब नहीं कर सकते. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप पूरी तरह सुरक्षित हैं.

    हैकिंग कहां हुई: क्या Framework का खुद का सिस्टम कमजोर था?

    इस पूरी घटना का सबसे अहम और तकनीकी पहलू यह है कि यह सेंधमारी सीधे Framework कंपनी के अपने प्राइमरी सर्वर पर नहीं हुई. Framework अपने बिजनेस डेटा एनालिसिस और रिपोर्टिंग के लिए ‘Metabase’ नाम की एक पॉपुलर थर्ड-पार्टी बिजनेस इंटेलिजेंस (Business Intelligence) कंपनी की सेवाओं का इस्तेमाल करता है. 3 अगस्त को Metabase के सिस्टम में एक बहुत ही गंभीर खामी का पता चला, जिसका फायदा उठाकर हैकर्स ने Metabase के क्लाउड पर मौजूद Framework के डेटाबेस में सेंध लगा दी. टेक और साइबर सिक्योरिटी की दुनिया में इस तरह के अटैक को ‘सप्लाई चेन अटैक’ (Supply Chain Attack) कहा जाता है. इसमें हैकर्स मुख्य कंपनी के मजबूत सिक्योरिटी वॉल को तोड़ने के बजाय, उससे जुड़े छोटे वेंडर्स, थर्ड-पार्टी ऐप्स या सर्विस प्रोवाइडर्स को निशाना बनाते हैं, जिनके पास मुख्य कंपनी का डेटा मौजूद होता है.

    जीरो-डे (Zero-Day Vulnerability) क्या होता है?

    Metabase के सिस्टम में जिस खामी के जरिए हैकर्स घुसे, उसे साइबर सुरक्षा में ‘जीरो-डे’ (Zero-Day) कहा जाता है. आसान शब्दों में समझें तो ‘जीरो-डे’ सॉफ्टवेयर या कोड में मौजूद एक ऐसी अज्ञात सुरक्षा खामी (Bug) होती है, जिसके बारे में खुद उस सॉफ्टवेयर को बनाने वाली कंपनी या उसकी सिक्योरिटी टीम को कोई जानकारी नहीं होती.

    क्योंकि डेवलपर को इस कमी का पता ही नहीं होता, इसलिए इसके लिए कोई सुरक्षा पैच या अपडेट उपलब्ध नहीं होता. जब तक कंपनी को इस खामी की भनक लगती है और वे इसे ठीक करने का काम शुरू करते हैं, तब तक हैकर्स इसका फायदा उठाकर सिस्टम से डेटा चोरी कर चुके होते हैं. Metabase के वर्शन 1.58 और उससे ऊपर के सिस्टम इसी जीरो-डे की चपेट में आए थे.

    बिना बैंक डिटेल चुराए भी आपको कंगाल कैसे बना सकते हैं हैकर्स?

    कई लोगों को लगता है कि जब तक कार्ड नंबर या सीवीवी (CVV) लीक न हो, तब तक घबराने की जरूरत नहीं है. लेकिन हैकर्स के लिए नाम, पता, फोन नंबर और खरीदारी का इतिहास (Purchase History) सोने की खदान की तरह होता है.

    चुराए गए डेटा के जरिए हैकर्स आपको इन तरीकों से नुकसान पहुंचा सकते हैं:

    1. टारगेटेड फिशिंग अटैक (Targeted Phishing/Spear Phishing)
    अब हैकर्स को पता है कि आपने Framework से लैपटॉप खरीदा है. वे आपको Framework की आधिकारिक दिखने वाली ईमेल आईडी से एक फर्जी ईमेल भेजेंगे. ईमेल में लिखा हो सकता है: “आपके लैपटॉप के मदरबोर्ड/बैटरी में खराबी पाई गई है, इसे मुफ्त में बदलने के लिए तुरंत अपनी डिटेल्स अपडेट करें.” इस तरह के ईमेल पर असली नाम और सही पते की वजह से कोई भी आसानी से विश्वास कर लेता है.

    2. फेक डिलीवरी या कस्टम्स स्कैम
    चूंकि हैकर्स के पास आपका डिलीवरी एड्रेस और फोन नंबर है, वे कूरियर कंपनी या कस्टम्स अधिकारी बनकर आपको एसएमएस या कॉल कर सकते हैं. वे दावा करेंगे कि आपका एक पार्सल अटका हुआ है और इसे री-रिलीज करने के लिए ₹50 या ₹100 की छोटी सी फीस देनी होगी. जैसे ही आप उस लिंक पर क्लिक करके पेमेंट करेंगे, आपकी बैंकिंग डिटेल्स उनके फर्जी पेमेंट पेज पर कैप्चर हो जाएंगी.

    3. सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering)
    हैकर्स आपके नाम, फोन नंबर और ईमेल का इस्तेमाल करके किसी टेलीकॉम कंपनी या बैंक के कस्टमर केयर को कॉल कर सकते हैं और आपकी पहचान बताकर आपका सिम कार्ड (SIM Swap) ब्लॉक या नया जारी कराने की कोशिश कर सकते हैं.

    4. कस्टमाइज्ड मेलवेयर और फर्जी अपडेट
    हैकर्स आपको Framework सपोर्ट टीम बताकर लैपटॉप का कोई “अति-आवश्यक सुरक्षा अपडेट” डाउनलोड करने के लिए कह सकते हैं. उस लिंक में छुपा मेलवेयर आपके लैपटॉप में इंस्टॉल होकर आपके पूरे कीबोर्ड (Keylogger) को ट्रैक कर सकता है, जिससे आपके सारे असली पासवर्ड और बैंकिंग पिन हैकर्स तक पहुँच जाएंगे.

    अब आपको क्या करना चाहिए? (बचाव के जरूरी कदम)

    अगर आपका अकाउंट भी इस डेटा लीक से प्रभावित हुआ है या आप Framework के यूजर हैं, तो तुरंत ये सावधानियां बरतें:

    – संदिग्ध ईमेल से सावधान रहें: Framework के नाम से आने वाले किसी भी ऐसे ईमेल पर भरोसा न करें जिसमें आपसे पासवर्ड, पर्सनल जानकारी या किसी लिंक पर क्लिक करने को कहा गया हो.

    – सेंडर की ईमेल आईडी जांचें: केवल Framework की आधिकारिक वेबसाइट या डोमेन से आए ईमेल ही सही होते हैं. किसी भी स्पेलिंग मिस्टेक वाले डोमेन से सतर्क रहें.

    वसुरक्षा के लिहाज से अपने Framework अकाउंट का पासवर्ड तुरंत बदल दें और अगर आप वही पासवर्ड किसी दूसरी जगह इस्तेमाल करते हैं, तो उसे भी बदलें.

    – टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) ऑन करें: अपने सभी महत्वपूर्ण अकाउंट्स (जीमेल, बैंक ऐप्स आदि) पर 2FA चालू रखें.

    – अज्ञात कॉल/एसएमएस पर प्रतिक्रिया न दें: कूरियर, डिलीवरी या सपोर्ट के नाम से आने वाले किसी भी संदिग्ध फोन कॉल पर कोई व्यक्तिगत जानकारी या ओटीपी शेयर न करें.

  • मरने के बाद भी आपसे बातें करेगा आपका अपना! जानिए AI की इस खौफनाक टेक्नोलॉजी के पीछे का पूरा सच..?

    मरने के बाद भी आपसे बातें करेगा आपका अपना! जानिए AI की इस खौफनाक टेक्नोलॉजी के पीछे का पूरा सच..?

    मरने के बाद भी आपसे बातें करेगा आपका अपना! जानिए AI की इस खौफनाक टेक्नोलॉजी के पीछे का पूरा सच..?

    सोचिए अगर किसी अपने के गुजर जाने के बाद भी आपके मोबाइल की स्क्रीन पर उनका वीडियो कॉल आने लगे. वे स्क्रीन पर बिल्कुल उसी तरह मुस्कुराएं, उसी जानी-पहचानी आवाज में बात करें, आपकी पुरानी यादों को ताजा करें और आपके नए सवालों का जवाब भी दें. सुनने में यह किसी हॉलीवुड या साइंस फिक्शन फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन आज की आधुनिक दुनिया में यह एक ठोस हकीकत बन चुका है.

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब उन लोगों के भी डिजिटल रूप या ‘AI Avatars’ बनाए जा रहे हैं, जो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं. इस पूरी तकनीक और बिजनेस को दुनिया भर में ‘Grief Tech’ (दुख से उबरने वाली तकनीक) या ‘Deadbots’ कहा जा रहा है. यह तकनीक जहां एक तरफ गहरे सदमे में डूबे परिजनों को सुकून और सहारा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ इंसान की प्राइवेसी, कानूनी अधिकारों, नैतिकता और मानसिक सेहत पर बेहद गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है. आइए इस पूरे विषय को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं….

    Grief Tech

    AI कंपनियां मृत लोगों के डिजिटल अवतार कैसे तैयार करती हैं?

    आज के डिजिटल दौर में जब भी कोई व्यक्ति जीवित रहता है, तो वह जाने-अनजाने में इंटरनेट की दुनिया में अपना एक बहुत बड़ा ‘डिजिटल नक्शा’ छोड़ जाता है. इसे तकनीकी भाषा में डिजिटल फुटप्रिंट (Digital Footprint) कहते हैं. इसमें उस व्यक्ति की तस्वीरें, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो, वॉट्सएप चैट्स, ईमेल, वॉयस नोट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स शामिल होते हैं. AI कंपनियां इसी पूरे डेटा को जमा करके मृत व्यक्ति का एक रोबोटिक या वर्चुअल रूप तैयार करती हैं. यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन बड़े स्टेप्स में काम करती है:

    स्टेप 1: डेटा कलेक्शन (Data Collection)

    सबसे पहले परिजन या टेक कंपनियां उस व्यक्ति का हर संभव डेटा जुटाती हैं. इसमें उसके बोलने के ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, पुराने वीडियो क्लिप्स, लिखे हुए मैसेज और हाई-क्वालिटी तस्वीरें शामिल होती हैं. जितना ज्यादा डेटा मिलेगा, AI अवतार उतना ही असली और सटीक बनेगा.

    स्टेप 2: वॉयस क्लोनिंग और जनरेटिव AI (Voice Cloning & LLM)

    डेटा मिलने के बाद एडवांस्ड AI सॉफ्टवेयर उस इंसान की आवाज के पैटर्न को गहराई से समझता है. वह यह देखता है कि व्यक्ति बोलते समय कहां रुकता था, उसकी आवाज का उतार-चढ़ाव कैसा था और वह किन शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करता था. इसके बाद ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को व्यक्ति की पुरानी चैट्स से ट्रेन किया जाता है ताकि AI जब भी कोई जवाब लिखे, तो उसकी भाषा और सोचने का तरीका बिल्कुल उसी व्यक्ति जैसा लगे.

    स्टेप 3: 3D अवतार क्रिएशन (3D Avatar Creation)

    आखिरी स्टेप में तस्वीरों और वीडियो की मदद से 3D डिजिटल मॉडल तैयार किया जाता है. यह मॉडल स्क्रीन पर दिखने में बिल्कुल असली इंसान जैसा लगता है. जब AI बोलता है, तो इस डिजिटल मॉडल के होंठ और चेहरे के एक्सप्रेशन उसी के हिसाब से हिलते हैं.

    सबसे हैरान करने वाली बात: यह AI अवतार सिर्फ पुरानी रिकॉर्ड की गई बातें ही नहीं दोहराता, बल्कि अगर आप उससे कोई बिल्कुल नया सवाल पूछेंगे, तो वह उस मृत इंसान की सोच और स्वभाव के हिसाब से सोचकर नया जवाब भी दे सकता है.

    Grief Tech

    ‘Grief Tech’ क्या है और यह इंडस्ट्री कितनी तेजी से बढ़ रही है?

    जब किसी इंसान के किसी बेहद करीबी (जैसे माता-पिता, बच्चा या दोस्त) की मृत्यु हो जाती है, तो वह इंसान बेहद गहरे शोक और डिप्रेशन से गुजरता है. इस दुख (Grief) को कम करने और लोगों को भावनात्मक सहारा देने के नाम पर जो मार्केट खड़ा हुआ है, उसे ही ‘Grief Tech’ कहा जाता है.

    आज दुनिया भर में कई ऐसे स्टार्टअप्स और टेक प्लेटफॉर्म्स आ चुके हैं जो यह सर्विस दे रहे हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच रहा है:

    • StoryFile:
      यह एक बहुत ही अनोखा प्लेटफॉर्म है. यह लोगों के जीवित रहते ही उनके जीवन के अनुभव, यादें और जवाब वीडियो फॉर्मेट में रिकॉर्ड कर लेता है. व्यक्ति के जाने के बाद परिवार वाले स्क्रीन पर उससे कोई भी सवाल पूछ सकते हैं. AI उनके रिकॉर्डेड वीडियो में से सबसे सही जवाब निकालकर स्क्रीन पर प्ले कर देता है.
    • HereAfter AI:
      यह एक वॉयस-बेस्ड ऐप है. इसमें इंसान जीवित रहते अपनी आवाज में अपनी जीवन कहानी रिकॉर्ड करता है. उसके जाने के बाद बच्चे या पोते-पोतियाँ एक ऐप के जरिए उससे बातचीत कर सकते हैं और किस्से सुन सकते हैं.
    • Somnium Space:
      यह मेटावर्स की दुनिया का एक प्लेटफॉर्म है जो ‘Live Forever’ (हमेशा जीवित रहें) नाम के फीचर पर काम कर रहा है. इसमें इंसान के चलने-फिरने, हाथ हिलाने और बोलने के तरीके का पूरा 3D अवतार बना दिया जाता है, जिससे आप वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट पहनकर मिल सकते हैं.

    लोग अपने खोए हुए प्रियजनों की कमी को पूरा करने के लिए भावनात्मक रूप से कुछ भी खर्च करने को तैयार हो जाते हैं, इसी वजह से यह इंडस्ट्री दुनिया भर में बहुत तेजी से पैर पसार रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्लोबल लेवल पर ‘ग्रीफ टेक’ (Grief Tech) और मृत्यु के बाद डिजिटल पहचान सुरक्षित रखने वाला ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ मार्केट तेजी से बढ़ रहा है. इस पूरे बाजार का कुल वैल्यूएशन लगभग 123 अरब डॉलर से 126 अरब डॉलर (यानी 1,17,36,30,94,50,000 रुपये से ज्यादा) का हो चुका है. इसमें बड़ा हिस्सा डेथ-टेक और डिजिटल लेगेसी बनाने वाली इंडस्ट्री का है. वहीं दूसरी तरफ, तकनीक की मदद से दी जाने वाली पारंपरिक शोक परामर्श (Grief Counseling) सर्विसेज का बाजार करीब 4.03 अरब डॉलर (लगभग 3,84,53,11,14,500 करोड़ रुपये) का है.

    Grief Tech

    मौत के बाद आपकी आवाज, फोटो और डेटा का असली मालिक कौन है?

    यह इस पूरी बहस का सबसे उलझा हुआ, संवेदनशील और कानूनी रूप से पेचीदा हिस्सा है. जब तक हम जीवित रहते हैं, तब तक हमारी फोटो, आवाज और पर्सनल डेटा पर हमारा अपना मालिकाना हक होता है. लेकिन इंसान की मृत्यु के बाद उस डेटा का क्या होगा, इस पर दुनिया के ज्यादातर देशों में कोई साफ कानून नहीं है.

    डिजिटल लेगेसी (Digital Legacy) का न होना
    जैसे लोग अपनी जमीन, मकान या बैंक बैलेंस के लिए वसीयत (Will) बनाते हैं, वैसे डिजिटल जायदाद के लिए अभी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. ज्यादातर देशों के कानूनों में यह साफ नहीं है कि मौत के बाद किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट्स, पर्सनल चैट्स और फोटोज का लीगल मालिक कौन बनेगा.

    टेक कंपनियों की अपनी शर्तें
    गूगल, मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों की नीतियां अलग हैं. वे आमतौर पर मृत व्यक्ति के पासवर्ड या डेटा को उनके परिवार वालों को भी नहीं देतीं. वे सुरक्षा कारणों से उस अकाउंट को बंद कर देती हैं या उसे ‘मेमोरियलाइज्ड’ (यादगार) पेज में बदल देती हैं.

    सबसे बड़ा सवाल: सहमति (Consent) का मुद्दा
    सोचिए कि अगर कोई व्यक्ति जीते-जी यह बिल्कुल नहीं चाहता था कि उसकी मौत के बाद उसका कोई AI रोबोट बनाया जाए, लेकिन उसके जाने के बाद उसके परिवार वाले या दोस्त उसका AI अवतार बनवा लेते हैं – तो क्या यह सही है? किसी की मर्जी के बिना उसकी आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके AI अवतार बनाना उसकी प्राइवेसी और सम्मान का सीधा हनन माना जा रहा है.

    Grief Tech

    AI अवतार से बात करना: दुख में राहत या दिमागी सेहत के लिए खतरा?

    मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर बहुत तीखी बहस छिड़ी हुई है कि क्या मृत प्रियजनों से AI के जरिए बात करना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह.

    राहत देने वाले पहलू

    • अधूरेपन का अहसास खत्म होना:
      कई बार हादसों या अचानक हुई मौतों में लोग अपने प्रियजनों से आखिरी बार बात भी नहीं कर पाते. ऐसे में AI अवतार से बात करके वे अपनी भावनाएं जाहिर कर पाते हैं, जिससे उन्हें मन का बोझ हल्का महसूस होता है.
    • यादों को संजोकर रखना:
      छोटे बच्चों के लिए, जिन्होंने बहुत कम उम्र में अपने माता-पिता या दादा-दादी को खो दिया है, यह तकनीक उनके पूर्वजों को जानने और उनकी आवाज सुनने का एक माध्यम बन सकती है.

    खतरे और मानसिक नुकस

    • सच को स्वीकार न कर पाना:
      मनोविज्ञान के नियम कहते हैं कि इंसान के मानसिक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह ‘मौत’ के कड़वे सच को स्वीकार करे और अपनी जिंदगी में आगे बढ़े. लेकिन अगर सामने फोन पर वही इंसान रोज बात कर रहा हो, तो दिमाग इस सच को कभी स्वीकार ही नहीं कर पाएगा.
    • डिजिटल लत और आभासी दुनिया में खो जाना:
      लोग असली दुनिया के अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से कट सकते हैं और दिन-रात उस AI अवतार से बात करने के आदी हो सकते हैं. इससे वे बहुत गहरे अवसाद (Depression) और मानसिक भ्रम (Hallucinations) का शिकार हो सकते हैं.
    • गलत बातें बोलने का खतरा:
      AI आखिरकार एक सॉफ्टवेयर है. अगर बातचीत के दौरान वह अवतार कोई अजीब, डरावनी या गलत बात बोल दे, तो इससे परिजनों को ऐसा दिमागी सदमा लग सकता है जिससे उबरना नामुमकिन हो जाए.

    इस टेक्नोलॉजी की भविष्य की चुनौतियां

    ‘Grief Tech’ सिर्फ एक भावुक सर्विस नहीं है, इसके पीछे कई बड़े नैतिक और सामाजिक खतरे छिपे हुए हैं:

    • Commercial Exploitation:
      कई AI कंपनियां लोगों के दुख और लाचारी का फायदा उठाकर उनसे भारी-भरकम सब्सक्रिप्शन फीस वसूल सकती हैं. सोचिए कितना अजीब और दर्दनाक होगा अगर कोई AI अवतार आपसे बात करते-करते बीच में किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन (Advt) करने लगे.
    • Deepfake & Cyber Fraud:
      अगर किसी मृत व्यक्ति की आवाज और चेहरे का डेटा गलत हाथों में चला जाए, तो साइबर अपराधी उसका गलत वीडियो बनाकर रिश्तेदारों से पैसे ठग सकते हैं या कोई बड़ा अपराध अंजाम दे सकते हैं.
    • Digital Immortality का डर:
      क्या इंसान को हमेशा के लिए एक रोबोट के रूप में जीवित रखना सही है? कई दार्शनिकों और विचारकों का मानना है कि जीवन और मृत्यु प्रकृति का एक स्वाभाविक चक्र है. तकनीक के जरिए ‘डिजिटल आत्माएं’ बनाना प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करने जैसा है.

  • इथेनॉल मिला पेट्रोल आपकी बाइक और कार की परफॉर्मेंस पर क्या असर डालता है? एक्सपर्ट क्या कहते हैं.

    इथेनॉल मिला पेट्रोल आपकी बाइक और कार की परफॉर्मेंस पर क्या असर डालता है? एक्सपर्ट क्या कहते हैं.

    इथेनॉल मिला पेट्रोल आपकी बाइक और कार की परफॉर्मेंस पर क्या असर डालता है? एक्सपर्ट क्या कहते हैं.

    आजकल कई कार और बाइक मालिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि पेट्रोल में बढ़ते इथेनॉल मिश्रण की वजह से उनकी गाड़ी का माइलेज कम हो रहा है

    सरकार ने E20 पेट्रोल को बढ़ावा दिया है और भविष्य के लिए E22 E25 E27 और E30 जैसे अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के मानक भी जारी किए हैं

    हाल ही में फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के लिए E85 फ्यूल भी पेश किया गया है जिसमें 85 प्रतिशत तक इथेनॉल मिला होता है

    लेकिन क्या सच में इथेनॉल की वजह से माइलेज 30 प्रतिशत तक घट जाता है

    वास्तविकता इससे अलग है

    इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल की तुलना में कम होती है इसलिए माइलेज पर कुछ असर जरूर पड़ता है

    लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में E10 पेट्रोल पर माइलेज लगभग 2 से 3 प्रतिशत तक और E20 पेट्रोल पर लगभग 5 से 6 प्रतिशत तक कम हो सकता है

    सोशल मीडिया पर किए जा रहे 30 प्रतिशत तक माइलेज घटने के दावे सामान्य परिस्थितियों में सही नहीं माने जाते

    यदि आपकी गाड़ी का माइलेज बहुत ज्यादा कम हो गया है तो इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं

    भीषण गर्मी में लगातार एयर कंडीशनर चलाने से माइलेज 10 से 15 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकता है

    पुरानी गाड़ियों में इथेनॉल मिश्रित ईंधन के साथ फ्यूल सिस्टम को तालमेल बैठाने में परेशानी हो सकती है

    इथेनॉल में सफाई के गुण होते हैं जिससे पुरानी गंदगी ढीली होकर फ्यूल इंजेक्टर या फिल्टर को प्रभावित कर सकती है

    नई गाड़ियों के लिए क्या स्थिति है

    वर्ष 2023 और 2024 के बाद बनी कई नई गाड़ियों को इथेनॉल मिश्रित ईंधन के अनुरूप डिजाइन और ट्यून किया गया है

    ऐसी गाड़ियों में E20 ईंधन का उपयोग सामान्य रूप से सुरक्षित माना जाता है यदि निर्माता ने इसकी अनुमति दी हो

    गाड़ी का माइलेज और प्रदर्शन बेहतर बनाए रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें

    समय समय पर फ्यूल फिल्टर और स्पार्क प्लग की जांच कराएं

    टायर में सही हवा का दबाव बनाए रखें

    बार बार तेज एक्सेलरेशन और अनावश्यक रेविंग से बचें

    वाहन निर्माता द्वारा सुझाए गए सर्विस शेड्यूल का पालन करें

    यदि आपके पास पुरानी गाड़ी है तो इथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग शुरू करने से पहले अधिकृत सर्विस सेंटर या डीलर से सलाह लें

    फ्लेक्स फ्यूल वाहन भी बाजार में आ चुके हैं

    भारत में अब कई कंपनियां फ्लेक्स फ्यूल वाहन पेश कर रही हैं जो E85 जैसे अधिक इथेनॉल मिश्रित ईंधन पर भी चल सकते हैं

    इन वाहनों को विशेष रूप से ऐसे ईंधन के अनुसार तैयार किया गया है इसलिए इनमें उच्च इथेनॉल मिश्रण का उपयोग सुरक्षित रहता है

    निष्कर्ष

    इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से माइलेज में कुछ कमी आ सकती है लेकिन सामान्य परिस्थितियों में यह कमी सीमित होती है

    यदि माइलेज में बहुत अधिक गिरावट दिखाई दे रही है तो केवल इथेनॉल को जिम्मेदार मानने के बजाय वाहन की सर्विसिंग ड्राइविंग आदतों मौसम और इंजन की स्थिति की भी जांच करानी चाहिए