आधार कार्ड आज बैंक, सरकारी स्कीम, सिम कार्ड खरीदने और कई जरूरी कामों में इस्तेमाल होता है. ऐसे में अगर आपके आधार का गलत इस्तेमाल हो जाए तो बड़ी परेशानी हो सकती है. इसी खतरे को कम करने के लिए नए Aadhaar App में एक खास फीचर दिया गया है. अब यूजर अपने फिंगरप्रिंट और आइरिस (आंखों की पहचान) को जब चाहें लॉक और जरूरत पड़ने पर अनलॉक कर सकते हैं. इससे आपकी बायोमेट्रिक जानकारी ज्यादा सेफ रहती है.
बायोमेट्रिक लॉक क्यों जरूरी है?
आधार से जुड़ी बायोमेट्रिक जानकारी में आपके फिंगरप्रिंट और आइरिस की जानकारी होती है. अगर यह जानकारी लॉक रहती है, तो कोई भी व्यक्ति आपकी पर्मिशन के बिना बायोमेट्रिक से आधार का इस्तेमाल नहीं कर सकता. इससे धोखाधड़ी की आशंका काफी कम हो जाती है.
नए Aadhaar App से कैसे करें लॉक?
अगर आप अपने फिंगरप्रिंट और आइरिस को लॉक करना चाहते हैं, तो सबसे पहले नया Aadhaar App खोलें. इसके बाद अपने आधार खाते में लॉग इन करें. ऐप के होम पेज पर आपको Biometric Lock का ऑप्शन दिखाई देगा. इस पर टैप करें और स्क्रीन पर दी गई जानकारी को पूरा करें. प्रोसेस पूरा होते ही आपका बायोमेट्रिक डेटा लॉक हो जाएगा. इसके बाद किसी भी बायोमेट्रिक जांच के लिए पहले इसे अनलॉक करना जरूरी होगा.
जरूरत पड़ने पर ऐसे करें अनलॉक
जब आपको बैंक, आधार सेवा केंद्र या किसी अन्य जगह फिंगरप्रिंट या आइरिस से पहचान करानी हो, तब Aadhaar App खोलें. फिर Biometric Unlock ऑप्शन चुनें और पहचान की प्रोसेस पूरी करें. आपका बायोमेट्रिक कुछ समय के लिए अनलॉक हो जाएगा. काम पूरा होने के बाद आप इसे दोबारा लॉक भी कर सकते हैं.
किनके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद?
अगर आपका आधार कई सेवाओं से जुड़ा है, आप अक्सर बैंक या सरकारी काम करते हैं या आपको आधार के गलत इस्तेमाल की चिंता रहती है, तो यह सुविधा आपके लिए काफी फायदेमंद है. जरूरत न होने पर बायोमेट्रिक लॉक रखने से सेफ्टी बढ़ जाती है और आपकी निजी जानकारी सेफ रहती है. नए Aadhaar App में यह सुविधा अब पहले से ज्यादा आसान और तेज तरीके से होती है.
अगर आप अक्सर ट्रैवल करते हैं और होटल या एयरपोर्ट पर फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. माइक्रोसॉफ्ट की थ्रेट इंटेलिजेंस टीम ने एक खतरनाक साइबर अटैक अभियान ‘CaptiveCrunch’ को लेकर दुनिया भर के यात्रियों को अलर्ट जारी किया है. रूसी हैकर्स का एक ग्रुप होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के वाई-फाई नेटवर्क को निशाना बना रहा है. यह हैकिंग हमला इतना खतरनाक है कि हैकर्स आपके लैपटॉप या फोन का पासवर्ड चुराने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं.
क्या है ‘CaptiveCrunch’ और यह कैसे काम करता है?
माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इस हैकिंग अभियान को Storm-2945 नाम का ग्रुप चला रहा है, जो रूस के कुख्यात हैकर ग्रुप ‘माइडनाइट ब्लिजार्ड’ (APT29 या Cozy Bear) से जुड़ा हुआ है. यह हमला मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ट्रैवलर्स को निशाना बनाकर किया जा रहा है.
नेटवर्क हैक करना: हैकर्स सबसे पहले होटल के राउटर या उस सिस्टम को हैक करते हैं जिससे वाई-फाई का लॉगिन पेज (Captive Portal) खुलता है.
नकली लॉगिन पेज: जब कोई यूजर वाई-फाई से कनेक्ट करता है, तो उसके सामने गूगल या माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसा दिखने वाला फर्जी लॉगिन पेज आ जाता है.
पासवर्ड चोरी: यूजर जैसे ही अपना पासवर्ड डालता है, उसकी ईमेल, वनड्राइव फाइल्स और कंपनी के डेटा का एक्सेस सीधे हैकर्स के पास चला जाता है.
फर्जी अपडेट के नाम पर मालवेयर का जाल
इस हमले की सबसे खतरनाक बात यह है कि हैकर्स यूजर्स को धोखा देने के लिए कई तरह के फर्जी पॉप-अप और यूटिलिटीज का सहारा लेते हैं.
यूजर के स्क्रीन पर ‘ब्राउजर अपडेट’, ‘विंडोज सिक्योरिटी चेक’ या ‘डायरेक्टएक्स/विजुअल सी++ इंस्टॉल’ करने के मैसेज आते हैं.
ये मैसेज बिल्कुल असली विंडोज या गूगल सर्विस की तरह दिखाई देते हैं.
जैसे ही यूजर इन फर्जी अपडेट्स पर क्लिक करता है, उसके डिवाइस में खतरनाक मालवेयर (Malware) डाउनलोड हो जाता है.
हैकर्स आपके डिवाइस में क्या-क्या कर सकते हैं?
माइक्रोसॉफ्ट ने चेतावनी दी है कि इस मालवेयर के जरिए हैकर्स आपके कंप्यूटर पर लगभग पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं.
ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग: हैकर्स आपके वेबकैम और माइक को चालू करके आपकी बातें और वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.
पासवर्ड और कुकीज चोरी: ब्राउजर में सेव किए गए सभी पासवर्ड और बैंकिंग कुकीज चुरा सकते हैं.
स्क्रीनशॉट और की-स्ट्रोक्स: आप कीबोर्ड पर क्या टाइप कर रहे हैं (Keylogging), हैकर्स उसे ट्रैक कर सकते हैं और आपकी स्क्रीन के स्क्रीनशॉट ले सकते हैं.
होटल वाई-फाई अटैक से कैसे बचें?
माइक्रोसॉफ्ट ने यात्रियों और कंपनियों के लिए कुछ बेहद जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं:
पब्लिक वाई-फाई से बचें: जब भी संभव हो, होटल या एयरपोर्ट के वाई-फाई के बजाय अपने फोन का पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट इस्तेमाल करें.
कोई अपडेट न डाउनलोड करें: वाई-फाई कनेक्ट करते ही अगर कोई ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का मैसेज आए, तो उस पर भूलकर भी क्लिक न करें.
ऑफिशियल वेबसाइट का इस्तेमाल करें: किसी भी अपडेट के लिए हमेशा सॉफ्टवेयर की आधिकारिक वेबसाइट या सिस्टम सेटिंग्स का ही उपयोग करें.
एन्क्रिप्टेड प्राइवेट कनेक्शन (VPN): अगर पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी हो, तो हमेशा एक सुरक्षित और भरोसेमंद VPN का उपयोग करें.
मानसून का मौसम जहां एक ओर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाता है, तो वहीं दूसरी तरफ कई बार यह आपके इंटरनेट और WiFi नेटवर्क की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा देता है. बारिश के मौसम में कई बार जब तेज बरसात होती है, तो स्मार्टफोन से लेकर ब्रॉडबैंड की इंटरनेट स्पीड अचानक कम हो जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बादलों के बरसते ही आपका इंटरनेट अचानक सुस्त क्यों हो जाता है?
टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस समस्या को रेन फेड कहते हैं. आइए जानते हैं इस समस्या के पीछे क्या कारण होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.
बारिश में इंटरनेट स्लो होने के कारण
रेन फेड
वाई-फाई, सैटेलाइट और मोबाइल नेटवर्क रेडियो तरंगों के जरिए काम करते हैं. जब हवा में बारिश की बूंदें होती हैं, तो वे इन तरंगों के रास्ते में बाधा बनती हैं. पानी की बूंदें सिग्नल को सोख लेती हैं और उन्हें फैला देती हैं, जिससे सिग्नल कमजोर होने लगता है.
वहीं 5G और वाई-फाई सिग्नल काफी हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं. ये सिग्नल बहुत तेज स्पीड तो देते हैं, लेकिन बारिश और नमी के संपर्क में आते ही सबसे जल्दी प्रभावित होते हैं.
भारी बारिश के कारण अंडरग्राउंड या बाहरी केबलों में पानी घुसने का भी खतरा बना रहता है. तारों में नमी आने से न सिर्फ स्पीड स्लो होती है, बल्कि नेटवर्क में बार-बार रुकावट भी आने लगती है.
तेज आंधी-तूफान और बारिश के कारण इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बाहरी डिवाइसों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे पूरे इलाके का नेटवर्क प्रभावित हो जाता है.
कौन-सा कनेक्शन है बारिश में बेस्ट?
फाइबर ऑप्टिक
बारिश के मौसम में फाइबर इंटरनेट सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इसमें डेटा रेडियो वेव की जगह लाइट सिग्नल के जरिए केबल से यात्रा करता है, जिस पर बारिश या हवा का कोई असर नहीं पड़ता.
5G और 4G मोबाइल डेटा
बारिश के दिनों में मोबाइल डेटा की स्पीड में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. 5G की फ्रीक्वेंसी ज्यादा होने के कारण यह बारिश से जल्दी प्रभावित होता है.
सैटेलाइट इंटरनेट
खराब मौसम में सैटेलाइट कनेक्शन सबसे ज्यादा कमजोर साबित होते हैं, क्योंकि बादलों और बारिश के बीच से सिग्नल आने-जाने में भारी रुकावट होती है.
बारिश के मौसम में स्लो इंटरनेट की समस्या को कैसे ठीक करें?
अगर बारिश के दौरान आपका वाई-फाई ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप कुछ आसान टिप्स की मदद से इंटरनेट स्पीड को तेज कर सकते हैं-
5GHz बैंड पर स्विच करें
अगर आपका राउटर डुअल-बैंड है, तो अपने डिवाइस को 2.4GHz की जगह 5GHz बैंड से कनेक्ट करें. यह कम भीड़भाड़ वाला बैंड है और बेहतर स्पीड देता है.
राउटर को रीस्टार्ट करें
किसी भी तकनीकी गिल्च या अस्थाई सिग्नल समस्या को दूर करने के लिए अपने मोडेम और राउटर को कुछ सेकेंड के लिए बंद करके फिर से ऑन करें.
राउटर की जगह बदलें
राउटर को किसी ऊंची जगह पर रखें. इसे मोटी दीवारों, धातु की चीजों और बंद कोनों से दूर रखें जिससे सिग्नल घर में सही तरीके से फैल सके.
गैर-जरूरी डिवाइसेज को हटाएं
नेटवर्क पर लोड कम करने के लिए उन फोन, टीवी या गैजेट्स का वाई-फाई बंद कर दें जिनका आप उस समय इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.
वाई-फाई एक्सटेंडर
अगर घर के किसी हिस्से में सिग्नल कमजोर आ रहा है, तो सिग्नल रेंज बढ़ाने के लिए एक्सटेंडर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
चीन अपनी टेक ताकत और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग के दम पर ह्यूमनॉइड रोबोट्स यानी इंसानों जैसे दिखने और काम करने वाले रोबोट्स के ग्लोबल हब बनने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका है. फैक्ट्रियों की असेंबली लाइन से लेकर बड़े-बड़े वेयरहाउस तक चीन इन मशीनी इंसानों को असल दुनिया के कामों में उतार रहा है. इसी बूम के बीच चीन की दिग्गज रोबोटिक्स कंपनी Unitree अब IPO की रेस में है. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल आ रहा है कि आखिर चीन रोबोट्स पर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है? क्या वो अमेरिका की टेस्ला जैसी कंपनियों को पछाड़कर रोबोटिक्स का दुनिया में किंग बनने की कोशिश कर रहा है? और क्या ये रोबोट्स सच में हमारी फैक्ट्रियों और आम जिंदगी में एंट्री करने के बहुत ही करीब आ चुके हैं?
चीन की रोबोटिक्स कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स ह्यूमनॉइड रोबोट की रेस में एक बड़ा नाम बनकर उभर रही है. भले ही चीन से बाहर लोग इस कंपनी का नाम ज्यादा न जानते हों, लेकिन इसके रोबोट्स के वीडियो इंटरनेट पर छाए हुए हैं. सुपरह्यूमन जैसे स्टंट और बैकफ्लिप करते यूनिट्री के रोबोट्स को करोड़ों लोग देख चुके हैं. अब यूनिट्री रोबोटिक्स एक बड़ा फाइनेंसियल कदम उठाने जा रही है. अब ये कंपनी शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में अपना IPO लाने की तैयारी में है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, गुरुवार को यूनिट्री ने अपने शेयरों की कीमत लगभग 22 डॉलर प्रति शेयर तय की है, जिससे वह करीब 900 मिलियन डॉलर जुटाने की योजना बना रही है.
9 अरब डॉलर की वैल्यूएशन
इस डील के साथ ही यूनिट्री रोबोटिक्स की वैल्यूएशन करीब 9 अरब डॉलर पहुंच जाएगी. हालांकि, टेक जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह टेक्नोलॉजी सच में एक बड़े बिजनेस में बदल सकती है? भले ही यूनिट्री के रोबोट तेजी से बेहतर हो रहे हैं, लेकिन क्या आने वाले समय में आम लोग और कंपनियां लाखों की संख्या में ये रोबोट खरीदेंगी, यह अभी साफ नहीं है.
रिसर्च फर्म Omdia के एक्सपर्ट्स लियान जी सू के मुताबिक, यूनिट्री का यह स्टॉक सेल पूरे रोबोटिक्स सेक्टर के लिए एक बड़ा टेस्ट साबित होगा. इससे यह समझ आएगा कि शेयर मार्केट ह्यूमनॉइड रोबोट्स जैसे उभरते और शुरुआती टेक सेक्टर को किस नजरिए से देखता है.
फिजिकल AI का बढ़ता मार्केट
रोबोट्स को इंसानों, सामानों, कमरों और डेली के कामों को समझने के लिए असल दुनिया में सीखना पड़ता है. इस टेक्नोलॉजी को एम्बॉडीड एआई या फिजिकल एआई कहा जाता है.
इन्वेस्टमेंट रिसर्च फर्म CLSA की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट साल 2030 तक 69 अरब डॉलर का हो सकता है, जो इस साल मात्र 2 अरब डॉलर के करीब है.
बढ़ती टक्कर और घटता मुनाफा
2026 के पहले क्वाटर में कड़ी टक्कर और कम मांग के कारण यूनिट्री की ग्रोथ थोड़ी धीमी रही. बढ़ती टक्कर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर ज्यादा खर्च करने की वजह से पहली तिमाही में कंपनी का मुनाफा 55% तक कम हो गया.
चीन बनाम अमेरिका: रोबोटिक्स की जंग
यूनिट्री की यह लिस्टिंग इसलिए खास है क्योंकि यह चीन के मेनलैंड स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी है.
चीन रोबोट्स के मास प्रोडक्शन में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है:
Omdia के अनुमान के अनुसार, चीनी निर्माताओं ने इस साल की पहली छमाही में करीब 18,500 ह्यूमनॉइड रोबोट बेचे.
वहीं इस पीरियड में अमेरिकी कंपनियों ने सिर्फ 4,000 रोबोट शिप किए.
अगर चीन इसी रफ्तार से कम लागत में रोबोट बनाता रहा, तो वह अमेरिकी कंपनियों के मास प्रोडक्शन में पहुंचने से पहले ही एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर लेगा. लेकिन, अमेरिका की टेस्ला, Figure AI, एजिलिटी रोबोटिक्स जैसी कंपनियां बड़ा निवेश कर रही हैं. वहीं Nvidia फिजिकल एआई के लिए जरूरी चिप्स और एआई सिस्टम का नेतृत्व कर रही है.
चीन ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स में इतना भारी निवेश क्यों कर रहा है?
चीन रोबोटिक्स सेक्टर में दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनना चाहता है. ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट 2026 में करीब 2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2030 तक 69 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जैसा पहले बताया गया है. चीन चाहता है कि अमेरिका के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने से पहले पहले वह कम लागत और तेज स्पीड में रोबोट बनाकर दुनिया के बाजार पर बढ़त बना ले.
यूनिट्री दूसरे चीनी रोबोटिक्स कंपनियों से अलग क्यों है?
यूनिट्री चीन के शेयर मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी रेस में है. इसके रोबोट्स के वायरल स्टंट्स इंटरनेट पर काफी चर्चा का विषय बने हैं. इसके साथ ही बीते साल 2025 में यूनिट्री ने दुनिया में सबसे ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोट्स बेचे, इसका रेवेन्यू 4 गुना बढ़कर 250 मिलियन डॉलर पहुंचा और यह एक प्रॉफिटेबल यानी लाभ कमाने वाली कंपनी बन गई है.
फैक्ट्रियों और दूसरे बिजनेस में ह्यूमनॉइड रोबोट्स बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने के कितने करीब हैं?
रोबोट्स का हुनर और AI तेजी से सुधर रहा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल होने में अभी समय लग सकता है. हालांकि चीन ने 2026 की पहली छमाही में 18,500 रोबोट्स की डिलीवरी की है, लेकिन कंपनियां और दूसरे कस्टमर्स इन्हें महंगे दामों में खरीदने और रोजाना के काम में इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं या नहीं, यह टेस्ट होना बाकी है.
क्या चीनी कंपनियां अमेरिकी फर्मों को पीछे कर सकती हैं?
चीन के पास प्रोडक्शन की तेजी और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग जैसी शक्ति है. इसका उदाहरण है कि साल 2026 के पहले 6 महीनों में चीन ने 18,500 रोबोट बनाए, वहीं अमेरिका ने सिर्फ 4,000. लेकिन अमेरिका के पास बेहतर AI और एडवांस्ड चिप्स की ताकत है. अगर चीन इसी रफ्तार से प्रोडक्शन बढ़ाता रहा, तो वह मैन्युफैक्चरिंग में अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है, लेकिन एआई और सॉफ्टवेयर में अमेरिका अभी भी कड़ी टक्कर दे रहा है.
ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की दौड़ में भारत कहां खड़ा है?
ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की रेस में भारत फिलहाल उभरते हुए फेस में है. अमेरिका और चीन जैसे देश एडवांस फिजिकल AI, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग और बड़े पैमाने पर फंडिंग के कारण इस सेक्टर में आगे हैं. हालांकि, भारत सॉफ्टवेयर टैलेंट, स्पेस टेक्नोलॉजी और सर्विस रोबोटिक्स में तेजी से कदम बढ़ा रहा है.
इस सेक्टर में भारत ने ISRO के गगनयान मिशन के लिए AI-संचालित हाफ-ह्यूमनॉइड रोबोट व्योममित्र तैयार किया है, जो गगनयान के अनक्रू टेस्ट मिशनों में हिस्सा लेगा. भारत के पास विश्वस्तरीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और AI रिसर्चर्स का नेटवर्क है, जो Embodied AI तैयार करने में मदद करेगा.
भारत का लक्ष्य तुरंत पश्चिमी या चीनी कंपनियों से सीधे एडवांस दो पैरों वाले इंडस्ट्रियल ह्यूमनॉइड्स में टक्कर लेने के जगत पर अपने स्पेशल तकनीक वाले रोबोट तैयार करना है. IndiaAI मिशन, PLI योजनाओं और IITs में R&D हब्स के विस्तार के साथ भारत इस अंतर को तेजी से छोटा कर रहा है.
सूरत: गुजरात के सूरत में तीन मैकेनिकल इंजीनियरिंग छात्रों ने अपनी तकनीकी प्रतिभा से एक अनोखा प्रोटोटाइप तैयार किया है। भगवती महावीर यूनिवर्सिटी के छात्रों शिवम मौर्य, गुरप्रीत अरोड़ा और गणेश पाटिल ने कबाड़ के पुर्जों और खुद तैयार किए गए उपकरणों की मदद से ‘गरुड़’ नाम की एआई आधारित बाइक बनाई है। इस परियोजना की खास बात यह है कि बाइक में वॉयस कमांड, सामने आने वाली बाधाओं को पहचानने की तकनीक और टचस्क्रीन जैसे फीचर शामिल किए गए हैं।
छात्रों के मुताबिक, इस प्रोटोटाइप को बनाने में करीब 1.8 लाख रुपये खर्च हुए। बाइक के लगभग आधे हिस्से में पुराने या कबाड़ के पुर्जों का इस्तेमाल किया गया, जबकि बाकी हिस्सों को जरूरत के मुताबिक तैयार किया गया।
टेस्ला से मिली प्रेरणा, बाइक को स्मार्ट बनाने की कोशिश
छात्रों को टेस्ला और बिना ड्राइवर चलने वाले वाहनों की तकनीक ने प्रेरित किया। इसी से उन्हें ऐसी बाइक बनाने का विचार आया, जो राइडर के निर्देशों को समझ सके और आसपास की बाधाओं के प्रति प्रतिक्रिया दे सके।
बाइक में रास्पबेरी पाई कंप्यूटर का इस्तेमाल किया गया है, जिसे इसका दिमाग कहा जा रहा है। दी गई जानकारी के अनुसार, यह सिस्टम वाई-फाई के माध्यम से भेजे गए निर्देशों को समझने और उन पर कार्रवाई करने में मदद करता है। छात्रों का लक्ष्य भविष्य में इस तकनीक को और विकसित करके बाइक को अधिक स्वचालित बनाना है।
हालांकि, फिलहाल इसे पूरी तरह बिना राइडर चलने वाली बाइक मानना सही नहीं होगा। यह एक प्रोटोटाइप है और इसकी क्षमताओं को वास्तविक सड़क परिस्थितियों में व्यापक परीक्षण की जरूरत होगी।
बाधा सामने आते ही धीमी हो सकती है बाइक
गरुड़ की सबसे खास विशेषताओं में बाधाओं को पहचानने वाला सिस्टम शामिल है। छात्रों के दावे के मुताबिक, इसमें लगे सेंसर आसपास की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। यदि कोई वाहन या दूसरी बाधा निर्धारित दूरी के भीतर आती है, तो बाइक की गति कम करने की व्यवस्था सक्रिय हो सकती है।
बताया गया है कि लगभग 12 फीट की दूरी पर किसी वाहन का पता चलने पर बाइक धीमी होने लगती है, जबकि करीब 3 फीट की दूरी पर रुकने की क्षमता भी विकसित की गई है। कुछ निर्देश आवाज के जरिए भी दिए जा सकते हैं, जैसे आगे तीन फीट की दूरी पर रुकना।
यह सुविधा सड़क सुरक्षा के लिहाज से उपयोगी हो सकती है। लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में सेंसर की सटीकता, प्रतिक्रिया का समय और अचानक सामने आने वाली बाधाओं से निपटने की क्षमता का परीक्षण बेहद जरूरी है।
टचस्क्रीन, जीपीएस और कैमरे भी हैं शामिल
छात्रों ने बाइक को केवल चलने वाले वाहन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसमें कई स्मार्ट फीचर भी जोड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें टचस्क्रीन के जरिए जीपीएस नेविगेशन, संगीत और कॉल से जुड़े फीचर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
बाइक के आगे और पीछे कैमरे लगाए गए हैं, जिनसे आसपास के ट्रैफिक को देखने में मदद मिलती है। इसके अलावा मोबाइल फोन के लिए वायरलेस चार्जिंग की सुविधा भी शामिल की गई है।
इन फीचर्स का उद्देश्य बाइक को तकनीकी रूप से अधिक सुविधाजनक बनाना है। हालांकि, इनका वास्तविक प्रदर्शन और सड़क पर इस्तेमाल की व्यावहारिकता आगे के परीक्षणों पर निर्भर करेगी।
एक बार चार्ज करने पर 220 किलोमीटर चलने का दावा
गरुड़ की बैटरी और रेंज को लेकर भी दिलचस्प दावे किए गए हैं। छात्रों के मुताबिक, बाइक इको मोड में एक बार चार्ज करने पर 220 किलोमीटर तक चल सकती है, जबकि स्पोर्ट मोड में इसकी रेंज करीब 160 किलोमीटर बताई गई है।
इसमें लिथियम-आयन बैटरी का इस्तेमाल किया गया है और दावा है कि इसे पूरी तरह चार्ज होने में लगभग दो घंटे लगते हैं। हालांकि, ये आंकड़े प्रोटोटाइप से जुड़ी बताई गई क्षमताएं हैं। वास्तविक रेंज सड़क की स्थिति, गति, वजन, बैटरी की क्षमता और अन्य परिस्थितियों के कारण अलग हो सकती है।
एक साल की मेहनत से तैयार हुई बाइक
इस परियोजना को पूरा करने में छात्रों को करीब एक साल लगा। डिजाइन तैयार करने, पुर्जे जुटाने, सिस्टम को जोड़ने और अलग-अलग सुविधाओं को विकसित करने में काफी मेहनत करनी पड़ी।
छात्रों का कहना है कि उनकी कोशिश ऐसी तकनीक विकसित करने की है, जो सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में मदद कर सके। उनके अनुसार, बाइक में आवाज से निर्देश देने और बाधाओं के प्रति प्रतिक्रिया करने की सुविधा इसी उद्देश्य से जोड़ी गई है।
‘गरुड़’ नाम के पीछे भी है खास वजह
इस बाइक का नाम भारतीय पौराणिक परंपरा से प्रेरित है। हिंदू मान्यताओं में गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन माना जाता है। छात्रों ने इसी नाम को अपनी तकनीकी परियोजना के लिए चुना, जो शक्ति, दृष्टि और गति का प्रतीक माना जाता है।
इस परियोजना की एक और खास बात इसका ‘वेस्ट टू बेस्ट’ विचार है। पुराने पुर्जों का दोबारा इस्तेमाल करके छात्रों ने दिखाने की कोशिश की है कि सीमित बजट में भी रचनात्मक सोच और इंजीनियरिंग के जरिए नए प्रयोग किए जा सकते हैं।
क्या भविष्य में ऐसी बाइकें बिना राइडर चल सकेंगी?
गरुड़ जैसे प्रोटोटाइप यह दिखाते हैं कि दोपहिया वाहनों में सेंसर, कंप्यूटर और स्वचालित नियंत्रण तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ रही हैं। फिर भी, पूरी तरह स्वचालित बाइक बनाना एक जटिल चुनौती है। इसके लिए अलग-अलग मौसम, खराब सड़क, अचानक सामने आने वाले वाहन, पैदल यात्रियों और अन्य जोखिमों के बीच सिस्टम की विश्वसनीयता साबित करनी होगी।
सूरत के इन तीन छात्रों का प्रयास युवाओं की तकनीकी प्रतिभा और नए प्रयोग करने की क्षमता को सामने लाता है। अब इस तरह की परियोजनाओं के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम विस्तृत परीक्षण, सुरक्षा मानकों का पालन और वास्तविक परिस्थितियों में प्रदर्शन की पुष्टि करना होगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट में दी गई जानकारी और छात्रों की परियोजना से जुड़े दावों पर आधारित है। बाइक की रेंज, चार्जिंग समय और सुरक्षा सुविधाओं की स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसे प्रमाणित व्यावसायिक वाहन या पूरी तरह स्वचालित बाइक के रूप में न समझें।
मॉड्युलर और आसानी से रिपेयर होने वाले लैपटॉप बनाने के लिए दुनियाभर में मशहूर कंपनी Framework के ग्राहकों के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है. अगस्त की शुरुआत में कंपनी ने अपने सभी पंजीकृत यूजर्स को एक ईमेल भेजकर जानकारी दी कि उनके डेटाबेस में एक बड़ी सुरक्षा सेंधमारी (Data Breach) हुई है. अगर आपने कभी भी Framework से कोई प्रोडक्ट या एसेसरीज खरीदी है, तो आपकी निजी और संवेदनशील जानकारी अब हैकर्स के हाथ लग चुकी हो सकती है.
पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि जब बैंक अकाउंट या पासवर्ड चोरी नहीं हुए, तो खतरा कैसा? लेकिन साइबर अपराध की दुनिया में केवल आपकी पहचान से जुड़ी जानकारी भी आपको आर्थिक रूप से कंगाल बनाने के लिए काफी होती है. आइए आसान और विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है, हैकिंग कैसे हुई, और बिना बैंक डेटा के भी आपके ऊपर क्या खतरे मंडरा रहे हैं.
हैकर्स के हाथ क्या लगा और क्या बच गया?
कंपनी द्वारा जारी आधिकारिक बयान और ईमेल के अनुसार, इस साइबर हमले में हैकर्स ग्राहकों के एक बड़े डेटाबेस को एक्सेस करने में कामयाब रहे हैं.
चुराई गई जानकारियां:
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ग्राहकों का पूरा नाम (Full Name) –
ईमेल एड्रेस (Email Address) –
फोन नंबर (Phone Number) –
डिलीवरी और बिलिंग एड्रेस (Address) –
लॉगिन IP एड्रेस (Login IP Address)
सुरक्षित रही जानकारियां:
राहत की बात केवल इतनी है कि हैकर्स ग्राहकों के क्रेडिट/डेबिट कार्ड डिटेल्स, बैंक अकाउंट की जानकारी, यूपीआई आईडी या पासवर्ड तक नहीं पहुंच पाए हैं. यानी सीधे तौर पर हैकर्स आपके बैंक खाते से पैसे गायब नहीं कर सकते. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप पूरी तरह सुरक्षित हैं.
हैकिंग कहां हुई: क्या Framework का खुद का सिस्टम कमजोर था?
इस पूरी घटना का सबसे अहम और तकनीकी पहलू यह है कि यह सेंधमारी सीधे Framework कंपनी के अपने प्राइमरी सर्वर पर नहीं हुई. Framework अपने बिजनेस डेटा एनालिसिस और रिपोर्टिंग के लिए ‘Metabase’ नाम की एक पॉपुलर थर्ड-पार्टी बिजनेस इंटेलिजेंस (Business Intelligence) कंपनी की सेवाओं का इस्तेमाल करता है. 3 अगस्त को Metabase के सिस्टम में एक बहुत ही गंभीर खामी का पता चला, जिसका फायदा उठाकर हैकर्स ने Metabase के क्लाउड पर मौजूद Framework के डेटाबेस में सेंध लगा दी. टेक और साइबर सिक्योरिटी की दुनिया में इस तरह के अटैक को ‘सप्लाई चेन अटैक’ (Supply Chain Attack) कहा जाता है. इसमें हैकर्स मुख्य कंपनी के मजबूत सिक्योरिटी वॉल को तोड़ने के बजाय, उससे जुड़े छोटे वेंडर्स, थर्ड-पार्टी ऐप्स या सर्विस प्रोवाइडर्स को निशाना बनाते हैं, जिनके पास मुख्य कंपनी का डेटा मौजूद होता है.
जीरो-डे (Zero-Day Vulnerability) क्या होता है?
Metabase के सिस्टम में जिस खामी के जरिए हैकर्स घुसे, उसे साइबर सुरक्षा में ‘जीरो-डे’ (Zero-Day) कहा जाता है. आसान शब्दों में समझें तो ‘जीरो-डे’ सॉफ्टवेयर या कोड में मौजूद एक ऐसी अज्ञात सुरक्षा खामी (Bug) होती है, जिसके बारे में खुद उस सॉफ्टवेयर को बनाने वाली कंपनी या उसकी सिक्योरिटी टीम को कोई जानकारी नहीं होती.
क्योंकि डेवलपर को इस कमी का पता ही नहीं होता, इसलिए इसके लिए कोई सुरक्षा पैच या अपडेट उपलब्ध नहीं होता. जब तक कंपनी को इस खामी की भनक लगती है और वे इसे ठीक करने का काम शुरू करते हैं, तब तक हैकर्स इसका फायदा उठाकर सिस्टम से डेटा चोरी कर चुके होते हैं. Metabase के वर्शन 1.58 और उससे ऊपर के सिस्टम इसी जीरो-डे की चपेट में आए थे.
बिना बैंक डिटेल चुराए भी आपको कंगाल कैसे बना सकते हैं हैकर्स?
कई लोगों को लगता है कि जब तक कार्ड नंबर या सीवीवी (CVV) लीक न हो, तब तक घबराने की जरूरत नहीं है. लेकिन हैकर्स के लिए नाम, पता, फोन नंबर और खरीदारी का इतिहास (Purchase History) सोने की खदान की तरह होता है.
चुराए गए डेटा के जरिए हैकर्स आपको इन तरीकों से नुकसान पहुंचा सकते हैं:
1. टारगेटेड फिशिंग अटैक (Targeted Phishing/Spear Phishing)
अब हैकर्स को पता है कि आपने Framework से लैपटॉप खरीदा है. वे आपको Framework की आधिकारिक दिखने वाली ईमेल आईडी से एक फर्जी ईमेल भेजेंगे. ईमेल में लिखा हो सकता है: “आपके लैपटॉप के मदरबोर्ड/बैटरी में खराबी पाई गई है, इसे मुफ्त में बदलने के लिए तुरंत अपनी डिटेल्स अपडेट करें.” इस तरह के ईमेल पर असली नाम और सही पते की वजह से कोई भी आसानी से विश्वास कर लेता है.
2. फेक डिलीवरी या कस्टम्स स्कैम
चूंकि हैकर्स के पास आपका डिलीवरी एड्रेस और फोन नंबर है, वे कूरियर कंपनी या कस्टम्स अधिकारी बनकर आपको एसएमएस या कॉल कर सकते हैं. वे दावा करेंगे कि आपका एक पार्सल अटका हुआ है और इसे री-रिलीज करने के लिए ₹50 या ₹100 की छोटी सी फीस देनी होगी. जैसे ही आप उस लिंक पर क्लिक करके पेमेंट करेंगे, आपकी बैंकिंग डिटेल्स उनके फर्जी पेमेंट पेज पर कैप्चर हो जाएंगी.
3. सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering)
हैकर्स आपके नाम, फोन नंबर और ईमेल का इस्तेमाल करके किसी टेलीकॉम कंपनी या बैंक के कस्टमर केयर को कॉल कर सकते हैं और आपकी पहचान बताकर आपका सिम कार्ड (SIM Swap) ब्लॉक या नया जारी कराने की कोशिश कर सकते हैं.
4. कस्टमाइज्ड मेलवेयर और फर्जी अपडेट
हैकर्स आपको Framework सपोर्ट टीम बताकर लैपटॉप का कोई “अति-आवश्यक सुरक्षा अपडेट” डाउनलोड करने के लिए कह सकते हैं. उस लिंक में छुपा मेलवेयर आपके लैपटॉप में इंस्टॉल होकर आपके पूरे कीबोर्ड (Keylogger) को ट्रैक कर सकता है, जिससे आपके सारे असली पासवर्ड और बैंकिंग पिन हैकर्स तक पहुँच जाएंगे.
अब आपको क्या करना चाहिए? (बचाव के जरूरी कदम)
अगर आपका अकाउंट भी इस डेटा लीक से प्रभावित हुआ है या आप Framework के यूजर हैं, तो तुरंत ये सावधानियां बरतें:
– संदिग्ध ईमेल से सावधान रहें:
Framework के नाम से आने वाले किसी भी ऐसे ईमेल पर भरोसा न करें जिसमें आपसे पासवर्ड, पर्सनल जानकारी या किसी लिंक पर क्लिक करने को कहा गया हो.
– सेंडर की ईमेल आईडी जांचें:
केवल Framework की आधिकारिक वेबसाइट या डोमेन से आए ईमेल ही सही होते हैं. किसी भी स्पेलिंग मिस्टेक वाले डोमेन से सतर्क रहें.
वसुरक्षा के लिहाज से अपने Framework अकाउंट का पासवर्ड तुरंत बदल दें और अगर आप वही पासवर्ड किसी दूसरी जगह इस्तेमाल करते हैं, तो उसे भी बदलें.
– टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) ऑन करें:
अपने सभी महत्वपूर्ण अकाउंट्स (जीमेल, बैंक ऐप्स आदि) पर 2FA चालू रखें.
– अज्ञात कॉल/एसएमएस पर प्रतिक्रिया न दें:
कूरियर, डिलीवरी या सपोर्ट के नाम से आने वाले किसी भी संदिग्ध फोन कॉल पर कोई व्यक्तिगत जानकारी या ओटीपी शेयर न करें.
सोचिए अगर किसी अपने के गुजर जाने के बाद भी आपके मोबाइल की स्क्रीन पर उनका वीडियो कॉल आने लगे. वे स्क्रीन पर बिल्कुल उसी तरह मुस्कुराएं, उसी जानी-पहचानी आवाज में बात करें, आपकी पुरानी यादों को ताजा करें और आपके नए सवालों का जवाब भी दें. सुनने में यह किसी हॉलीवुड या साइंस फिक्शन फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन आज की आधुनिक दुनिया में यह एक ठोस हकीकत बन चुका है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब उन लोगों के भी डिजिटल रूप या ‘AI Avatars’ बनाए जा रहे हैं, जो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं. इस पूरी तकनीक और बिजनेस को दुनिया भर में ‘Grief Tech’ (दुख से उबरने वाली तकनीक) या ‘Deadbots’ कहा जा रहा है. यह तकनीक जहां एक तरफ गहरे सदमे में डूबे परिजनों को सुकून और सहारा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ इंसान की प्राइवेसी, कानूनी अधिकारों, नैतिकता और मानसिक सेहत पर बेहद गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है. आइए इस पूरे विषय को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं….
AI कंपनियां मृत लोगों के डिजिटल अवतार कैसे तैयार करती हैं?
आज के डिजिटल दौर में जब भी कोई व्यक्ति जीवित रहता है, तो वह जाने-अनजाने में इंटरनेट की दुनिया में अपना एक बहुत बड़ा ‘डिजिटल नक्शा’ छोड़ जाता है. इसे तकनीकी भाषा में डिजिटल फुटप्रिंट (Digital Footprint) कहते हैं. इसमें उस व्यक्ति की तस्वीरें, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो, वॉट्सएप चैट्स, ईमेल, वॉयस नोट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स शामिल होते हैं. AI कंपनियां इसी पूरे डेटा को जमा करके मृत व्यक्ति का एक रोबोटिक या वर्चुअल रूप तैयार करती हैं. यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन बड़े स्टेप्स में काम करती है:
स्टेप 1: डेटा कलेक्शन (Data Collection)
सबसे पहले परिजन या टेक कंपनियां उस व्यक्ति का हर संभव डेटा जुटाती हैं. इसमें उसके बोलने के ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, पुराने वीडियो क्लिप्स, लिखे हुए मैसेज और हाई-क्वालिटी तस्वीरें शामिल होती हैं. जितना ज्यादा डेटा मिलेगा, AI अवतार उतना ही असली और सटीक बनेगा.
स्टेप 2: वॉयस क्लोनिंग और जनरेटिव AI (Voice Cloning & LLM)
डेटा मिलने के बाद एडवांस्ड AI सॉफ्टवेयर उस इंसान की आवाज के पैटर्न को गहराई से समझता है. वह यह देखता है कि व्यक्ति बोलते समय कहां रुकता था, उसकी आवाज का उतार-चढ़ाव कैसा था और वह किन शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करता था. इसके बाद ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को व्यक्ति की पुरानी चैट्स से ट्रेन किया जाता है ताकि AI जब भी कोई जवाब लिखे, तो उसकी भाषा और सोचने का तरीका बिल्कुल उसी व्यक्ति जैसा लगे.
स्टेप 3: 3D अवतार क्रिएशन (3D Avatar Creation)
आखिरी स्टेप में तस्वीरों और वीडियो की मदद से 3D डिजिटल मॉडल तैयार किया जाता है. यह मॉडल स्क्रीन पर दिखने में बिल्कुल असली इंसान जैसा लगता है. जब AI बोलता है, तो इस डिजिटल मॉडल के होंठ और चेहरे के एक्सप्रेशन उसी के हिसाब से हिलते हैं.
सबसे हैरान करने वाली बात: यह AI अवतार सिर्फ पुरानी रिकॉर्ड की गई बातें ही नहीं दोहराता, बल्कि अगर आप उससे कोई बिल्कुल नया सवाल पूछेंगे, तो वह उस मृत इंसान की सोच और स्वभाव के हिसाब से सोचकर नया जवाब भी दे सकता है.
‘Grief Tech’ क्या है और यह इंडस्ट्री कितनी तेजी से बढ़ रही है?
जब किसी इंसान के किसी बेहद करीबी (जैसे माता-पिता, बच्चा या दोस्त) की मृत्यु हो जाती है, तो वह इंसान बेहद गहरे शोक और डिप्रेशन से गुजरता है. इस दुख (Grief) को कम करने और लोगों को भावनात्मक सहारा देने के नाम पर जो मार्केट खड़ा हुआ है, उसे ही ‘Grief Tech’ कहा जाता है.
आज दुनिया भर में कई ऐसे स्टार्टअप्स और टेक प्लेटफॉर्म्स आ चुके हैं जो यह सर्विस दे रहे हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच रहा है:
StoryFile: यह एक बहुत ही अनोखा प्लेटफॉर्म है. यह लोगों के जीवित रहते ही उनके जीवन के अनुभव, यादें और जवाब वीडियो फॉर्मेट में रिकॉर्ड कर लेता है. व्यक्ति के जाने के बाद परिवार वाले स्क्रीन पर उससे कोई भी सवाल पूछ सकते हैं. AI उनके रिकॉर्डेड वीडियो में से सबसे सही जवाब निकालकर स्क्रीन पर प्ले कर देता है.
HereAfter AI: यह एक वॉयस-बेस्ड ऐप है. इसमें इंसान जीवित रहते अपनी आवाज में अपनी जीवन कहानी रिकॉर्ड करता है. उसके जाने के बाद बच्चे या पोते-पोतियाँ एक ऐप के जरिए उससे बातचीत कर सकते हैं और किस्से सुन सकते हैं.
Somnium Space: यह मेटावर्स की दुनिया का एक प्लेटफॉर्म है जो ‘Live Forever’ (हमेशा जीवित रहें) नाम के फीचर पर काम कर रहा है. इसमें इंसान के चलने-फिरने, हाथ हिलाने और बोलने के तरीके का पूरा 3D अवतार बना दिया जाता है, जिससे आप वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट पहनकर मिल सकते हैं.
लोग अपने खोए हुए प्रियजनों की कमी को पूरा करने के लिए भावनात्मक रूप से कुछ भी खर्च करने को तैयार हो जाते हैं, इसी वजह से यह इंडस्ट्री दुनिया भर में बहुत तेजी से पैर पसार रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्लोबल लेवल पर ‘ग्रीफ टेक’ (Grief Tech) और मृत्यु के बाद डिजिटल पहचान सुरक्षित रखने वाला ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ मार्केट तेजी से बढ़ रहा है. इस पूरे बाजार का कुल वैल्यूएशन लगभग 123 अरब डॉलर से 126 अरब डॉलर (यानी 1,17,36,30,94,50,000 रुपये से ज्यादा) का हो चुका है. इसमें बड़ा हिस्सा डेथ-टेक और डिजिटल लेगेसी बनाने वाली इंडस्ट्री का है. वहीं दूसरी तरफ, तकनीक की मदद से दी जाने वाली पारंपरिक शोक परामर्श (Grief Counseling) सर्विसेज का बाजार करीब 4.03 अरब डॉलर (लगभग 3,84,53,11,14,500 करोड़ रुपये) का है.
मौत के बाद आपकी आवाज, फोटो और डेटा का असली मालिक कौन है?
यह इस पूरी बहस का सबसे उलझा हुआ, संवेदनशील और कानूनी रूप से पेचीदा हिस्सा है. जब तक हम जीवित रहते हैं, तब तक हमारी फोटो, आवाज और पर्सनल डेटा पर हमारा अपना मालिकाना हक होता है. लेकिन इंसान की मृत्यु के बाद उस डेटा का क्या होगा, इस पर दुनिया के ज्यादातर देशों में कोई साफ कानून नहीं है.
डिजिटल लेगेसी (Digital Legacy) का न होना
जैसे लोग अपनी जमीन, मकान या बैंक बैलेंस के लिए वसीयत (Will) बनाते हैं, वैसे डिजिटल जायदाद के लिए अभी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. ज्यादातर देशों के कानूनों में यह साफ नहीं है कि मौत के बाद किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट्स, पर्सनल चैट्स और फोटोज का लीगल मालिक कौन बनेगा.
टेक कंपनियों की अपनी शर्तें
गूगल, मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों की नीतियां अलग हैं. वे आमतौर पर मृत व्यक्ति के पासवर्ड या डेटा को उनके परिवार वालों को भी नहीं देतीं. वे सुरक्षा कारणों से उस अकाउंट को बंद कर देती हैं या उसे ‘मेमोरियलाइज्ड’ (यादगार) पेज में बदल देती हैं.
सबसे बड़ा सवाल: सहमति (Consent) का मुद्दा
सोचिए कि अगर कोई व्यक्ति जीते-जी यह बिल्कुल नहीं चाहता था कि उसकी मौत के बाद उसका कोई AI रोबोट बनाया जाए, लेकिन उसके जाने के बाद उसके परिवार वाले या दोस्त उसका AI अवतार बनवा लेते हैं – तो क्या यह सही है? किसी की मर्जी के बिना उसकी आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके AI अवतार बनाना उसकी प्राइवेसी और सम्मान का सीधा हनन माना जा रहा है.
AI अवतार से बात करना: दुख में राहत या दिमागी सेहत के लिए खतरा?
मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर बहुत तीखी बहस छिड़ी हुई है कि क्या मृत प्रियजनों से AI के जरिए बात करना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह.
राहत देने वाले पहलू
अधूरेपन का अहसास खत्म होना: कई बार हादसों या अचानक हुई मौतों में लोग अपने प्रियजनों से आखिरी बार बात भी नहीं कर पाते. ऐसे में AI अवतार से बात करके वे अपनी भावनाएं जाहिर कर पाते हैं, जिससे उन्हें मन का बोझ हल्का महसूस होता है.
यादों को संजोकर रखना: छोटे बच्चों के लिए, जिन्होंने बहुत कम उम्र में अपने माता-पिता या दादा-दादी को खो दिया है, यह तकनीक उनके पूर्वजों को जानने और उनकी आवाज सुनने का एक माध्यम बन सकती है.
खतरे और मानसिक नुकस
सच को स्वीकार न कर पाना: मनोविज्ञान के नियम कहते हैं कि इंसान के मानसिक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह ‘मौत’ के कड़वे सच को स्वीकार करे और अपनी जिंदगी में आगे बढ़े. लेकिन अगर सामने फोन पर वही इंसान रोज बात कर रहा हो, तो दिमाग इस सच को कभी स्वीकार ही नहीं कर पाएगा.
डिजिटल लत और आभासी दुनिया में खो जाना: लोग असली दुनिया के अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से कट सकते हैं और दिन-रात उस AI अवतार से बात करने के आदी हो सकते हैं. इससे वे बहुत गहरे अवसाद (Depression) और मानसिक भ्रम (Hallucinations) का शिकार हो सकते हैं.
गलत बातें बोलने का खतरा: AI आखिरकार एक सॉफ्टवेयर है. अगर बातचीत के दौरान वह अवतार कोई अजीब, डरावनी या गलत बात बोल दे, तो इससे परिजनों को ऐसा दिमागी सदमा लग सकता है जिससे उबरना नामुमकिन हो जाए.
इस टेक्नोलॉजी की भविष्य की चुनौतियां
‘Grief Tech’ सिर्फ एक भावुक सर्विस नहीं है, इसके पीछे कई बड़े नैतिक और सामाजिक खतरे छिपे हुए हैं:
Commercial Exploitation: कई AI कंपनियां लोगों के दुख और लाचारी का फायदा उठाकर उनसे भारी-भरकम सब्सक्रिप्शन फीस वसूल सकती हैं. सोचिए कितना अजीब और दर्दनाक होगा अगर कोई AI अवतार आपसे बात करते-करते बीच में किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन (Advt) करने लगे.
Deepfake & Cyber Fraud: अगर किसी मृत व्यक्ति की आवाज और चेहरे का डेटा गलत हाथों में चला जाए, तो साइबर अपराधी उसका गलत वीडियो बनाकर रिश्तेदारों से पैसे ठग सकते हैं या कोई बड़ा अपराध अंजाम दे सकते हैं.
Digital Immortality का डर: क्या इंसान को हमेशा के लिए एक रोबोट के रूप में जीवित रखना सही है? कई दार्शनिकों और विचारकों का मानना है कि जीवन और मृत्यु प्रकृति का एक स्वाभाविक चक्र है. तकनीक के जरिए ‘डिजिटल आत्माएं’ बनाना प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करने जैसा है.
भीषण गर्मी बढ़ता तापमान और उमस के कारण लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है
कई बार एयर कंडीशनर चलाने के बाद भी पूरी राहत नहीं मिलती और इसी बीच Humidifier नाम का एक गैजेट तेजी से चर्चा में है
हालांकि बहुत से लोग इसे AC का विकल्प मान रहे हैं लेकिन वास्तव में इसका काम अलग होता है
Humidifier क्या होता है
Humidifier एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो कमरे की हवा में नमी बढ़ाने का काम करता है
जब वातावरण बहुत ज्यादा सूखा हो जाता है तब यह हवा में नमी मिलाकर उसे अधिक आरामदायक बनाने में मदद करता है
इसका उपयोग सूखी त्वचा गले में सूखापन फटे होंठ नाक की जलन और कुछ लोगों में साइनस से जुड़ी असहजता को कम करने के लिए किया जाता है
Humidifier कितने प्रकार के होते हैं
बाजार में कई तरह के Humidifier उपलब्ध हैं
सेंट्रल Humidifier पूरे घर के एयर कंडीशनिंग सिस्टम से जुड़े होते हैं
इवैपोरेटिव Humidifier
स्टीम वेपोराइजर
अल्ट्रासोनिक Humidifier
अल्ट्रासोनिक Humidifier सबसे लोकप्रिय मॉडलों में से एक माना जाता है क्योंकि यह कम आवाज करता है और सामान्य घरेलू उपयोग के लिए सुविधाजनक होता है
Humidifier का उपयोग कब किया जाता है
इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सूखे वातावरण में किया जाता है
यदि एयर कंडीशनर की वजह से कमरे की हवा बहुत सूखी हो जाती है तो Humidifier नमी बढ़ाने में मदद कर सकता है
कुछ लोगों को इससे सूखी खांसी गले में खराश नाक के सूखेपन और त्वचा की ड्राइनेस जैसी समस्याओं में राहत महसूस हो सकती है
यह ध्यान रखना जरूरी है कि Humidifier कमरे का तापमान कम नहीं करता इसलिए इसे एयर कंडीशनर या कूलर का विकल्प नहीं माना जा सकता
Humidifier की कीमत कितनी होती है
छोटे पोर्टेबल Humidifier की कीमत आमतौर पर लगभग 800 रुपये से 2500 रुपये के बीच होती है
बड़े और अधिक फीचर वाले मॉडल लगभग 5000 रुपये से 15000 रुपये या उससे अधिक कीमत में उपलब्ध हो सकते हैं
कीमत ब्रांड क्षमता और फीचर्स के अनुसार अलग अलग हो सकती है
इस्तेमाल करते समय किन बातों का ध्यान रखें
Humidifier का जरूरत से ज्यादा उपयोग न करें क्योंकि कमरे में अत्यधिक नमी होने पर बैक्टीरिया और फंगस बढ़ने का खतरा हो सकता है
मशीन की नियमित सफाई करना जरूरी है ताकि उसमें फफूंदी या बैक्टीरिया न पनपें
यदि संभव हो तो साफ या निर्माता द्वारा सुझाए गए प्रकार का पानी इस्तेमाल करें
स्टीम वाले मॉडल बच्चों की पहुंच से दूर रखें क्योंकि उनसे जलने का खतरा हो सकता है
निष्कर्ष
Humidifier हवा में नमी बढ़ाने वाला उपकरण है जो सूखे वातावरण में आराम देने में मदद कर सकता है लेकिन यह कमरे को ठंडा नहीं करता और एयर कंडीशनर का विकल्प नहीं है
यदि आपके कमरे की हवा बहुत सूखी रहती है तो सही तरीके से और नियमित सफाई के साथ इसका उपयोग लाभदायक हो सकता है
स्पेन में पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान एक ऐसी खोज मिली है, जिसने प्राचीन इतिहास की कई परतें खोल दी हैं। शोधकर्ताओं को 2,000 वर्ष से अधिक पुरानी घास से बनी चप्पलें एक प्राचीन खदान के पास राख और कचरे के ढेर में मिली हैं। आश्चर्य की बात यह है कि सदियों तक राख में दबे रहने के बावजूद ये चप्पलें काफी हद तक सुरक्षित मिलीं।
यह खोज स्पेन के उरियम (Urium) क्षेत्र में हुई, जो सेविल से करीब 55 मील दूर स्थित एक प्राचीन खनन स्थल है। पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान आठ चप्पलों के अवशेष मिले, जिन्हें एस्पार्टो (Esparto) घास से तैयार किया गया था। माना जाता है कि इनका इस्तेमाल रोमन साम्राज्य के आने से पहले आयरन एज के मजदूर किया करते थे।
इस खोज पर आधारित अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका Pyrenae में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, चप्पलें पहली शताब्दी ईसा पूर्व (BCE) की एक धातु कार्यशाला के पास स्थित राख के ढेर में मिलीं। उसी क्षेत्र में कई भट्टियां, कार्यस्थल और अन्य संरचनाएं भी मिली हैं, जिससे संकेत मिलता है कि यह स्थान उस समय औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।
शोध में सामने आया कि ये चप्पलें कार्यशाला के अंदर नहीं, बल्कि पास के उस स्थान पर मिलीं जहां भट्टियों की राख और अन्य बेकार सामग्री फेंकी जाती थी। चप्पलों पर अधिक इस्तेमाल के स्पष्ट निशान मिले हैं, जिससे माना जा रहा है कि टूट-फूट जाने के बाद इन्हें कचरे के साथ फेंक दिया गया था।
रेडियोकार्बन डेटिंग से चप्पलों की अलग-अलग आयु का भी पता चला। एक चप्पल का समय 28 से 124 ईस्वी (CE) के बीच का पाया गया, जबकि दूसरी 360 से 205 ईसा पूर्व (BCE) और तीसरी 175 से 56 ईसा पूर्व (BCE) की बताई गई। इससे संकेत मिलता है कि इस खनन क्षेत्र में कई सदियों तक लगातार काम होता रहा।
पुरातत्वविदों का मानना है कि यह खोज आयरन एज के लोगों के दैनिक जीवन, उनके पहनावे, कार्य संस्कृति और उस समय इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक सामग्रियों को समझने में महत्वपूर्ण साबित होगी। राख की परतों ने इन जैविक वस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा, जिससे शोधकर्ताओं को प्राचीन मानव जीवन का एक दुर्लभ प्रमाण मिला है।
Love Gill in Bigg Boss 20 : विवादित रियलिटी शो “बिग बॉस 20” का यह पहला ही दिन है और ड्रामा शुरू हो चुका है। कंटेस्टेंट लव गिल ने अपने साथी कंटेस्टेंट अमन गांधी को अपनी जिंदगी के बारे में बताया और बॉडी-शेमिंग का सामना करने के अपने अनुभव को साझा किया।
Love Gill in Bigg Boss 20 : विवादित रियलिटी शो “बिग बॉस 20” का यह पहला ही दिन है और ड्रामा शुरू हो चुका है। कंटेस्टेंट लव गिल ने अपने साथी कंटेस्टेंट अमन गांधी को अपनी जिंदगी के बारे में बताया और बॉडी-शेमिंग का सामना करने के अपने अनुभव को साझा किया।
अमन के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए, उन्होंने बताया कि बड़े होने के दौरान अपने शरीर को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों का सामना करना कितना मुश्किल था। अमन ने भी बताया कि बहुत ज़्यादा दुबले होने के कारण उन्हें भी बॉडी-शेमिंग का सामना करना पड़ा था।
शो में लव को यह कहते हुए सुना जाएगा: “जब मेरा वज़न थोड़ा ज़्यादा था, तो लोग मेरे शरीर पर कमेंट करते थे। फिर मैंने वजन कम किया, लेकिन उसके बाद भी लोगों के पास कहने के लिए कुछ न कुछ होता था।” “वे मुझसे कहते थे कि मैं बहुत दुबली दिखती हूं या पूछते थे कि क्या मैं कुछ खाती भी हूं। ऐसा लगता था कि मैं चाहे कुछ भी करूं, लोग मेरे लुक के बारे में अपनी राय रखते ही थे। लव एक पंजाबी एक्ट्रेस और मॉडल हैं, जिन्होंने म्यूजिक वीडियो, टेलीविजन और फिल्मों में काम किया है। वह 2019 में पंजाबी सिंगर करण औजला के एक लोकप्रिय म्यूज़िक वीडियो में नजर आई थीं। इसके बाद उन्होंने टीवी में भी हाथ आजमाया। वह पंजाबी शो ‘तू पतंग मैं डोर’ में नजर आईं, जिसमें उन्होंने ज़रीना का किरदार निभाया था।
उन्होंने 2021 में कुरियां जवान बापू परेशान के साथ पंजाब में सिनेमा की दुनिया में कदम रखा और फिर ‘हेटर्स’, ‘कुलचे छोले’, ‘गदर 1947: इक्क विछोड़ा’ और ‘वेखी जा छेड़ी ना’ जैसी फिल्मों में नजर आईं।
4 दिन से गायब थे पंजाबी सिंगर Baljit Singh, अब घर के बेड पर पड़ा मिला सड़ा हुआ शव…ऐसी हालत देख…
बिग बॉस की बात करें तो यह भारत में बिग बॉस फ़्रैंचाइज़ी का एक भारतीय हिंदी-भाषा का रियलिटी टेलीविज़न शो है जो कलर्स टीवी पर प्रसारित होता है। यह ‘बिग ब्रदर’ के डच फ़ॉर्मेट पर आधारित है। 20वां संस्करण 6 सितंबर को शुरू हुआ। इसमें 16 सेलिब्रिटी प्रतियोगियों की एक विविध लाइनअप है, जिसमें एमसी मैरी कॉम, कनिका मान, माही विज, कुशल तंवर, अमन गांधी, ईशा रिखी, अरिश्फा खान, काजी तौकीर, आसिफ खान, आम्रपाली दुबे, रीति तिवारी, उदिति सिंह, तन्मय सिंह उर्फ स्काउटओपी, रोहेद खान, युंग डीएसए और लव गिल जैसे नाम शामिल हैं। यह शो JioHotstar और Colors TV पर प्रसारित होता है।