अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.

अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.
अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.

नई दिल्ली: भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर दुनिया के सबसे बड़े दवा बाजारों में अपनी मजबूत मौजूदगी रखता है। खास तौर पर अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है। भारत हर साल अरबों डॉलर की दवाएं अमेरिका को निर्यात करता है और वहां जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में भारतीय कंपनियों की बड़ी भूमिका है।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत से अमेरिका को हर साल करीब 8.7 अरब डॉलर से 10 अरब डॉलर मूल्य की दवाओं का निर्यात होता है। भारत का कुल फार्मा निर्यात लगभग 25.8 अरब डॉलर बताया जाता है। इस लिहाज से अमेरिकी बाजार भारतीय दवा निर्यात के लिए बेहद अहम है।

अमेरिकी जेनेरिक दवा बाजार में भारत की बड़ी भूमिका

अमेरिका के जेनेरिक दवा बाजार में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी काफी मजबूत है। अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों से आती है। कई रिपोर्टों में यह हिस्सा करीब 40 से 47 फीसदी तक बताया गया है।

जेनेरिक दवाएं पेटेंट अवधि समाप्त होने के बाद तैयार की जाने वाली ऐसी दवाएं होती हैं, जिनमें मूल दवा के समान सक्रिय घटक होते हैं और आमतौर पर उनकी कीमत कम होती है। इसी वजह से अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था में इनकी मांग काफी अधिक है।

अमेरिका में भारतीय दवाओं की इतनी मांग क्यों है?

भारतीय फार्मा कंपनियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी उत्पादन क्षमता और अपेक्षाकृत कम लागत में दवाएं तैयार करने की क्षमता है। भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का निर्माण करती हैं।

इनमें टैबलेट, कैप्सूल, सिरप, एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक और कई तरह की अन्य दवाएं शामिल हैं। यही वजह है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय फार्मा कंपनियों की मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है।

भारत में बड़ी संख्या में US FDA मानकों वाले प्लांट

भारतीय फार्मा उद्योग की एक महत्वपूर्ण खासियत यह भी है कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे दवा निर्माण संयंत्र हैं, जो अमेरिकी नियामकीय मानकों के अनुरूप उत्पादन करते हैं। भारत के पास अमेरिका के बाहर दुनिया में सबसे बड़ी संख्या में US FDA-निरीक्षित या स्वीकृत दवा निर्माण सुविधाओं में से एक है।

यह बुनियादी ढांचा भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में दवाओं की सप्लाई करने में मदद करता है। हालांकि किसी प्लांट की US FDA स्थिति को उसकी स्वीकृति, पंजीकरण या निरीक्षण की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग समझना जरूरी है।

अमेरिका के दवा आयात में भारत की हिस्सेदारी

अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े फार्मास्युटिकल बाजारों में शामिल है और बड़ी मात्रा में दवाओं का आयात भी करता है। भारतीय कंपनियां इस आयात श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, सिप्ला, जायडस लाइफसाइंसेज और अरबिंदो फार्मा जैसी भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी है। कई कंपनियों ने अमेरिका में अपनी मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और वितरण गतिविधियां भी स्थापित कर रखी हैं।

भारत को क्यों कहा जाता है ‘दुनिया का दवाखाना’?

भारत को लंबे समय से ‘दुनिया का दवाखाना’ कहा जाता है। इसकी वजह देश की विशाल दवा निर्माण क्षमता, जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादन और अपेक्षाकृत कम लागत है।

अमेरिका भारत का एक प्रमुख फार्मा बाजार है, लेकिन भारतीय दवाओं की पहुंच केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, ब्राजील और एशिया के कई देशों में भी भारतीय दवा कंपनियां अपने उत्पाद निर्यात करती हैं।

भारतीय फार्मा उद्योग की सबसे बड़ी ताकत

भारतीय दवा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक ताकत मुख्य रूप से कम उत्पादन लागत, बड़े पैमाने पर निर्माण क्षमता और जेनेरिक दवाओं के अनुभव पर आधारित है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर किफायती दवाओं की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।

अमेरिकी बाजार के लिए भी भारतीय कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं की लागत को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है। यही कारण है कि भारत और अमेरिका के बीच फार्मास्युटिकल कारोबार दोनों देशों के लिए आर्थिक और स्वास्थ्य क्षेत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है।

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