कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.

कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.
कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.

कैंची धाम: उत्तराखंड के प्रसिद्ध कैंची धाम में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और वाहनों की भारी आवाजाही भले ही पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रही हो, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की सीमित क्षमता को देखते हुए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली भी है। लगातार बढ़ता मानवीय दबाव केवल ट्रैफिक की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन, पार्किंग और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर भी इसका असर पड़ रहा है।

नीम करोली बाबा से जुड़े कैंची धाम में खास तौर पर सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके चलते आसपास की सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ जाता है और कई बार यात्रियों को लंबे समय तक जाम जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसका असर केवल धार्मिक स्थल तक आने-जाने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों की सामान्य यातायात व्यवस्था पर भी पड़ता है।

क्या होती है किसी इलाके की कैरिंग कैपेसिटी?

कैरिंग कैपेसिटी यानी वहन क्षमता का मतलब किसी क्षेत्र की उस अधिकतम क्षमता से है, जितने लोगों, वाहनों और गतिविधियों को वह अपनी प्राकृतिक और बुनियादी सुविधाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाए बिना संभाल सकता है।

पहाड़ी इलाकों में यह क्षमता मैदानी क्षेत्रों की तुलना में काफी संवेदनशील होती है। यहां पानी के स्रोत, सड़कें, पार्किंग, सीवेज व्यवस्था, कचरा निस्तारण, भूगर्भीय स्थिति और भूस्खलन जैसे जोखिमों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

यदि किसी इलाके की सुविधाएं सीमित हैं और वहां अचानक उसकी क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग पहुंचने लगें, तो पानी और कचरे से लेकर यातायात और आपदा प्रबंधन तक पूरी व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है।

नैनीताल की वहन क्षमता को लेकर रिसर्च में क्या सामने आया?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स यानी NIUA की ओर से नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों की वहन क्षमता को लेकर किए गए अध्ययन में पहाड़ी इलाकों की संवेदनशीलता पर जोर दिया गया है।

अध्ययन में अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर क्षेत्र की क्षमता का आकलन किया गया। केवल भूमि क्षेत्र को आधार मानने पर क्षमता काफी अधिक दिखाई देती है, लेकिन जब पहाड़ी भूगोल, बारिश, भूस्खलन के जोखिम और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को शामिल किया जाता है तो यह क्षमता काफी कम हो जाती है।

रिपोर्ट में बुनियादी सुविधाओं को भी एक महत्वपूर्ण पैमाना माना गया है। पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं किसी पर्यटन क्षेत्र की वास्तविक क्षमता तय करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

सुविधाओं पर बढ़ता दबाव सबसे बड़ी चिंता

पहाड़ी पर्यटन स्थलों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि पर्यटकों की संख्या बढ़ने की रफ्तार कई बार बुनियादी ढांचे की क्षमता से कहीं ज्यादा हो जाती है। बड़ी संख्या में लोग पहुंचने पर पानी की मांग बढ़ती है, कचरा बढ़ता है और सीवेज सिस्टम पर दबाव पड़ता है।

पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने पर सड़क किनारे वाहनों की संख्या बढ़ जाती है। इससे ट्रैफिक प्रभावित होने के साथ-साथ आपात स्थिति में राहत और बचाव कार्यों में भी परेशानी हो सकती है।

ज्यादा वाहनों से पहाड़ों पर बढ़ता दबाव

उत्तराखंड में बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों की संख्या भी इस बढ़ते दबाव की तस्वीर दिखाती है। परिवहन विभाग के ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन यानी ANPR कैमरों से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर की छुट्टियों के दौरान राज्य की सीमाओं और प्रमुख चेक पोस्ट पर बड़ी संख्या में बाहरी वाहन दर्ज किए गए।

2 अक्टूबर को एक लाख से ज्यादा बाहरी वाहनों की आवाजाही दर्ज हुई, जबकि अगले दो दिनों में भी यह संख्या करीब 90 हजार या उससे अधिक रही। स्थानीय वाहनों को जोड़ने पर कुल वाहन आवाजाही का आंकड़ा डेढ़ लाख से ऊपर पहुंच गया।

इस तरह की भारी आवाजाही से पहाड़ी सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ता है। साथ ही वाहनों से होने वाला प्रदूषण और पार्किंग की समस्या भी गंभीर हो सकती है।

भविष्य में पानी और पर्यावरण का संकट बढ़ सकता है

पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत सीमित होते हैं। ऐसे में पर्यटन और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ने पर पानी की मांग भी बढ़ती है। यदि उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले मांग बहुत अधिक हो जाए तो भविष्य में जल संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।

इसी तरह कचरे का सही तरीके से निस्तारण नहीं होने पर प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जंगलों, नालों और जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इसका असर स्थानीय वनस्पतियों, वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बढ़ सकता है जोखिम

पहाड़ों में अत्यधिक निर्माण और मानवीय दबाव को प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारी बारिश, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक घटनाओं के दौरान यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग और वाहन मौजूद हों, तो नुकसान और राहत-बचाव की चुनौती दोनों बढ़ सकती हैं।

इसलिए कैंची धाम जैसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों के लिए केवल ट्रैफिक व्यवस्था सुधारना ही पर्याप्त नहीं है। वहां आने वाले लोगों की संख्या, पार्किंग, पानी, कचरा प्रबंधन, सीवेज और आपदा प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाना भी जरूरी है।

कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता श्रद्धालुओं और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन पहाड़ों की प्राकृतिक सीमाओं को नजरअंदाज करके बढ़ता दबाव भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है।

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