क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.

क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.
क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.

मंगल ग्रह: मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने की दिशा में वैज्ञानिक लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक वहां रहने के लिए सुरक्षित और मजबूत ढांचे तैयार करना है। पृथ्वी से बड़ी मात्रा में सीमेंट, ईंट और निर्माण मशीनरी मंगल तक पहुंचाना बेहद मुश्किल और महंगा होगा। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसी निर्माण सामग्री विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे स्थानीय संसाधनों की मदद से तैयार किया जा सके।

इसी दिशा में हांगकांग के शोधकर्ताओं ने एक तरह की ‘लिविंग बिल्डिंग मटेरियल’ पर काम किया है, जिसे आम भाषा में ‘जिंदा ईंट’ कहा जा रहा है। इस तकनीक में जैविक सामग्री और स्थानीय संसाधनों को मिलाकर ऐसा मिश्रण तैयार करने की कोशिश की जाती है, जिसे भविष्य में 3D प्रिंटिंग के जरिए निर्माण में इस्तेमाल किया जा सके।

मंगल पर घर बनाना इतनी बड़ी चुनौती क्यों है?

मंगल की परिस्थितियां पृथ्वी से काफी अलग हैं। वहां वायुमंडलीय दबाव बहुत कम है और तापमान भी बेहद ठंडा हो सकता है। इसके अलावा मंगल की सतह पर मौजूद धूल और रेगोलिथ को सीधे पारंपरिक निर्माण सामग्री की तरह इस्तेमाल करना आसान नहीं है।

पारंपरिक ईंटें बनाने के लिए गर्म करने और बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है। मंगल पर भट्ठियां, भारी मशीनरी और निर्माण सामग्री पहुंचाना किसी भी अंतरिक्ष मिशन का वजन और लागत काफी बढ़ा सकता है।

इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर दे रहे हैं जिसमें मंगल पर उपलब्ध सामग्री का अधिकतम इस्तेमाल हो और पृथ्वी से केवल जरूरी जैविक घटक ही ले जाने पड़ें।

क्या होती है ‘जिंदा ईंट’?

‘जिंदा ईंट’ नाम सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईंट किसी जीव की तरह चलती या बढ़ती है। इसे लिविंग बिल्डिंग मटेरियल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी संरचना में जैविक घटकों का इस्तेमाल किया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की सामग्री में रेत जैसे कणों के साथ जिलेटिन आधारित हाइड्रोजेल और विशेष रूप से तैयार यीस्ट का इस्तेमाल किया जाता है। यीस्ट की सतह पर ऐसा जैविक प्रोटीन इस्तेमाल किया गया है, जो चिपकने वाले पदार्थ की तरह काम कर सकता है।

यह प्रोटीन आसपास के कणों को एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है और मिश्रण को मजबूत संरचना में बदलने की क्षमता रखता है।

मंगल पर कैसे बन सकता है घर?

भविष्य में अगर इस तकनीक को मंगल के लिए सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है, तो निर्माण प्रक्रिया कुछ इस तरह हो सकती है।

सबसे पहले मंगल की सतह पर उपलब्ध रेगोलिथ या अन्य उपयुक्त स्थानीय सामग्री को एक जैविक मिश्रण के साथ मिलाया जाएगा। इसमें जरूरी मात्रा में हाइड्रोजेल और जैविक घटक शामिल किए जा सकते हैं।

इसके बाद इस मिश्रण को रोबोटिक 3D प्रिंटर में डाला जा सकता है। कंप्यूटर में तैयार डिजाइन के मुताबिक प्रिंटर सामग्री की परत-दर-परत संरचना बनाकर दीवारें और दूसरे हिस्से तैयार करेगा।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि निर्माण के लिए हर ईंट को पृथ्वी से मंगल तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्या यह सामान्य ईंट जितनी मजबूत होगी?

प्रयोगशाला में इस तरह की जैविक निर्माण सामग्री की मजबूती को लेकर परीक्षण किए गए हैं। रिपोर्ट में करीब 12 मेगापास्कल तक की कम्प्रेसिव स्ट्रेंथ का उल्लेख किया गया है। हालांकि प्रयोगशाला में प्राप्त मजबूती और वास्तविक मंगल परिस्थितियों में किसी भवन के प्रदर्शन को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

मंगल पर लंबे समय तक विकिरण, अत्यधिक ठंड, कम वायुदाब और धूल जैसी परिस्थितियों का सामना करना होगा। इसलिए किसी वास्तविक मानव आवास के लिए इस्तेमाल से पहले इस तकनीक के कई और परीक्षण जरूरी होंगे।

क्या मंगल की मिट्टी से ही बन जाएगा पूरा घर?

यह तकनीक अभी भविष्य के मंगल अभियानों के लिए एक संभावित विकल्प के तौर पर देखी जा रही है। मंगल की मिट्टी को सीधे पृथ्वी की ईंटों जैसा मान लेना सही नहीं होगा। वहां उपलब्ध रेगोलिथ के गुणों, मिश्रण की स्थिरता और तैयार संरचना की मजबूती का विस्तृत परीक्षण जरूरी होगा।

फिर भी इस तरह की तकनीक अंतरिक्ष निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण विचार पेश करती है—पृथ्वी से भारी निर्माण सामग्री ले जाने के बजाय मंगल पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करना।

अगर भविष्य के परीक्षण सफल रहते हैं, तो जैविक सामग्री और रोबोटिक 3D प्रिंटिंग का संयोजन मंगल पर बेस, दीवारें और अन्य संरचनाएं तैयार करने में मदद कर सकता है। फिलहाल यह तकनीक प्रयोगात्मक चरण में है, लेकिन मंगल पर इंसानी बस्ती बसाने की लंबी दौड़ में ऐसे कम वजन और कम ऊर्जा वाले निर्माण विकल्प बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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