
वाराणसी: काशी को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां हजारों मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं। इन्हीं में एक है काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर, जिसे बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल शिखर है, जिसकी ऊंचाई दिल्ली के प्रसिद्ध कुतुब मीनार से भी अधिक बताई जाती है।
मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके निर्माण की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इसकी आधारशिला रखने के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिमालय में रहने वाले संत स्वामी कृष्णाश्रम को आमंत्रित किया था। बताया जाता है कि संत को काशी आने के लिए राजी करने में करीब चार साल लग गए थे।
252 फीट ऊंचा है मंदिर का शिखर
BHU के श्री विश्वनाथ मंदिर के शिखर की ऊंचाई लगभग 252 फीट बताई जाती है। वहीं, दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई करीब 239.5 फीट है। इस तरह मंदिर का शिखर कुतुब मीनार से लगभग 12.5 फीट ऊंचा है।
अपनी ऊंचाई और भव्य बनावट के कारण यह मंदिर विश्वविद्यालय परिसर की प्रमुख पहचान बन चुका है। दूर से दिखाई देने वाला इसका शिखर श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है।
हालांकि, देश के सबसे ऊंचे मंदिर की चर्चा करते समय कुल संरचना और शिखर की ऊंचाई में अंतर समझना जरूरी है। मध्य प्रदेश के ओरछा स्थित चतुर्भुज मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 344 फीट बताई जाती है, जबकि BHU के विश्वनाथ मंदिर का शिखर अपनी ऊंचाई के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
महामना मालवीय ने क्यों बनवाया था यह मंदिर?
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय चाहते थे कि विश्वविद्यालय परिसर में भगवान शिव का एक भव्य मंदिर बनाया जाए। उनकी सोच थी कि शिक्षा के इस प्रमुख केंद्र में विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी मिले।
मालवीय जी चाहते थे कि मंदिर का शिलान्यास किसी तपस्वी और सिद्ध संत के हाथों हो। इसी दौरान उन्हें हिमालय में रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने संत को मंदिर की आधारशिला रखने के लिए काशी आने का निमंत्रण देने का निर्णय लिया।
चार साल की मनुहार के बाद संत ने रखी आधारशिला
मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्वामी कृष्णाश्रम शुरुआत में काशी आने के लिए तैयार नहीं थे। महामना मालवीय ने उन्हें मनाने के लिए स्वामी गणेश दास से भी सहायता मांगी।
काफी प्रयासों के बाद स्वामी कृष्णाश्रम काशी आने के लिए राजी हुए। आखिरकार 11 मार्च 1931 को उन्होंने मंदिर की आधारशिला रखी। इस तरह BHU परिसर में भगवान शिव के भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत हुई।
यह घटना महामना मालवीय की दृढ़ इच्छाशक्ति और संतों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती है। मंदिर का इतिहास काशी की धार्मिक परंपरा और विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
कई चरणों में पूरा हुआ मंदिर का निर्माण
मंदिर का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया के तहत हुआ। इस दौरान आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ी तो उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने निर्माण कार्य में सहयोग दिया। उनके सहयोग से मंदिर का काम आगे बढ़ा।
उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, 1954 तक मंदिर का अधिकांश निर्माण पूरा हो चुका था, हालांकि शिखर का काम बाकी था। 17 फरवरी 1958 को मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद शिखर का निर्माण भी जारी रहा और आगे चलकर मंदिर की भव्य संरचना पूरी हुई।
मंदिर के निर्माण और शिखर के पूरा होने की तारीख को लेकर अलग-अलग विवरणों में कुछ अंतर मिलता है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि मंदिर को वर्तमान स्वरूप देने में कई दशक लगे।
मंदिर में शिव के साथ कई देवी-देवताओं के दर्शन
श्री विश्वनाथ मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। यहां शिवलिंग के दर्शन के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर में गणेश जी, मां दुर्गा, लक्ष्मी-विष्णु, पंचमुखी महादेव, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी, मां सरस्वती, नटराज और नंदी सहित कई स्वरूपों के दर्शन किए जा सकते हैं।
विश्वविद्यालय परिसर में स्थित होने के कारण यहां विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्थानीय लोगों और दूसरे शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। मंदिर का शांत वातावरण लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।
सावन में शिवभक्तों के लिए खास है मंदिर
हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। BHU स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर भी काशी के प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ऊंचा शिखर और महामना मालवीय से जुड़ी कहानी इसे खास बनाती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और BHU के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
डिस्क्लेमर: मंदिर की ऊंचाई और निर्माण से संबंधित विवरण उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों पर आधारित हैं। अलग-अलग स्रोतों में कुछ आंकड़ों और तारीखों में अंतर हो सकता है। धार्मिक संदर्भों का उल्लेख परंपरागत मान्यताओं के आधार पर किया गया है।

Leave a Reply