
हर देवी-देवता की पूजा के अलग नियम हैं. महादेव की पूजा के भी नियम शिव पुराण समेत कई अन्य धर्म-शास्त्रों में बताए गए हैं. इन नियमों का पालन लोग भगवान शिव की पूजा करते समय करते हैं. हालांकि इनके पीछे की वजह बहुत कम लोग जानते हैं. जैसे- भगवान शिव को उल्टा बेलपत्र (चिकनी सतह शिवलिंग की ओर) क्यों चढ़ाते हैं, या फिर शिव पूजा में शंख क्यों नहीं बजाया जाता?
इन दोनों परंपराओं के पीछे धार्मिक मान्यताएं है और पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं. आइए आज जानते हैं इनके पीछे की वजह.
बेलपत्र उल्टा क्यों चढ़ाते हैं?
बेलपत्र उल्टा चढ़ाने से मतलब है कि आमतौर पर बेलपत्र की जो चिकनी सतह होती है उसे बेलपत्र का ऊपरी भाग या सीधा हिस्सा माना जाता है. वहीं खुरदुरी/उभरी हुई नसों वाले भाग को पीछे की सतह माना जाता है. जब शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते हैं तो बेलपत्र के चिकने हिस्से को नीचे की ओर रखा जाता है ताकि वह सीधे शिवलिंग के संपर्क में आए.
धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र की चिकनी सतह ऊर्जा और सकारात्मक स्पंदन को सबसे ज्यादा अवशोषित करती है, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है. इसलिए कई पूजा परंपराओं में बेलपत्र उल्टा चढ़ाया जाता है.
बेलपत्र से जुड़े ये नियम भी जरूरी
भगवान शिव को बेहद प्रिय बेलपत्र के तीन पत्तों को त्रिदेव/त्रिगुण/भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों से जोड़कर देखा जाता है. बेलपत्र चढ़ाते समय उसे उल्टा या सीधा रखने के अलावा भी कुछ अन्य नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है.
– शिव जी को केवल अखंड बेलपत्र ही अर्पित करें यानी कि बेलपत्र टूटा या फटा न हो. साथ ही बेलपत्र हमेशा धोकर ही अर्पित करें. ताकि बेलपत्र साफ हो.
– बेलपत्र की डंडी को अपनी ओर या मध्य भाग से पकड़कर भगवान शिव को समर्पित करना शुभ माना जाता है.
– कुछ पूजा परंपराओं में भगवान शिव की पूजा में चक्र और वज्र के निशान वाले बेलपत्र का उपयोग भी वर्जित माना गया है. वज्र बेलपत्र के अंत में मोटा सख्त हिस्सा जो गांठ की तरह होता है, उसे कहा जाता है. हमेशा वज्र को तोड़कर ही बेलपत्र अर्पित करने की मान्यता है.
– बेलपत्र की पत्तियों पर यदि सफेद रंग के टेढ़े-मेढ़े या गोल निशान, धारी हों तो उन्हें चक्र कहते हैं. ऐसे बेलपत्र को भी कीड़ों द्वारा दूषित किया गया और अशुद्ध माना जाता है. इसलिए इन्हें भी शिवलिंग पर चढ़ाने की मनाही की जाती है.
शिव पूजा में शंख क्यों नहीं बजाते?
शिव पूजा में आमतौर पर शंख नहीं बजाया जाता है. इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था. माना जाता है कि शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख की उत्पत्ति हुई है इसलिए शिव पूजा में शंख नहीं बजाया जाता, न ही शंख से जल चढ़ाया जाता है. इसके अलावा यह भी मान्यता है कि शिव जी हमेशा ध्यान में लीन रहते हैं, लिहाजा शंख की ध्वनि ध्यान में बाधा न डाले इसलिए शंख नहीं बजाते हैं.
हालांकि, कुछ अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले रत्नों में शंख भी शामिल है. जिसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का बेहद प्रिय माना गया है. इस कारण विष्णु जी और लक्ष्मी जी की पूजा में शंख का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है.
Disclaimer- इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पूजा परंपराओं पर आधारित है.

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