
एक ऐसा हिंदुस्तानी, जिसे खुद उसका अपना देश लगभग भूल चुका है. लेकिन सरहद पार हमारा पड़ोसी मुल्क चीन, आज भी उसे किसी मसीहा की तरह पूजता है. वहां के बच्चों को स्कूलों में उनकी कहानी पढ़ाई जाती है. उनके चेहरे वाले डाक टिकट जारी होते हैं. उनके नाम पर मेडिकल कॉलेज चलते हैं. यकीन मानिए, अगर इस जाबांज डॉक्टर की जिंदगी को आज के सिनेमाई परदे पर उतारा जाए, तो पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेगी.
बात शुरू होती है साल 1938 की. उस वक्त जापान ने चीन पर धावा बोल दिया था. चारों तरफ तबाही थी, चीख-पुकार थी और लाखों चीनी नागरिक और सैनिक लहूलुहान पड़े थे. मगर इलाज करने वाले डॉक्टर उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं थे. ऐसे में चीन के सेनापति जनरल झू दे ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक ख़त लिखा- ‘दोस्त, हमारी मदद करो, कुछ डॉक्टर भेजो’. तब का चीन आज जैसा ताकतवर और अमीर मुल्क नहीं था. नेहरू ने इस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मशविरा किया, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे.
नेताजी ने तुरंत पहल की और भारत के लोगों से पाई-पाई जोड़कर 22,000 रुपये का फंड इकट्ठा किया. फिर क्या था, पांच जाबांज हिंदुस्तानी डॉक्टरों की एक टीम समंदर के रास्ते चीन के लिए रवाना हो गई.

पिता की मौत, लेकिन डॉक्टर का ईमान
चीन गए तो पांच डॉक्टर थे, लेकिन जब जंग खत्म हुई तो लौटे सिर्फ चार. डॉक्टर कोटनीस वहीं रुक गए. उन्होंने वहां हजारों दम तोड़ते चीनी लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला. इसी बीच भारत से खबर आई कि उनके पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया है. कोई और होता तो घर भाग आता, लेकिन कोटनीस नहीं लौटे. उन्होंने रोते हुए भी यही कहा कि इस वक्त चीन के इन बेबस मरीजों को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है और मरीजों को बीच में छोड़ना एक डॉक्टर के ईमान के खिलाफ है.

72-72 घंटे लगातार ड्यूटी
कोटनीस सीधे जंग के मैदान में कूद पड़े. पहाड़ों की कड़कड़ाती ठंड और पत्थरों की गुफाओं में, जहां बुनियादी दवाइयां तक नसीब नहीं थीं, उन्होंने एक के बाद एक कई ऑपरेशन किए. कई-कई बार तो वो लगातार 72-72 घंटे बिना पलक झपकाए मरीजों की जान बचाते रहे. इस अकेले मोर्चे पर उन्होंने करीब 800 चीनी सैनिकों की जान बचाई. चीनी लोग उन्हें आदर से ‘के दिहुआ’ (Ke Dihua) पुकारने लगे, इसके मतलब था भारत की भूमि से आया हुआ उपकारी.
लगातार बिना सोए काम करना, खराब मौसम और कम साधनों के बीच दिन-रात मरीजों की सेवा करने का असर डॉक्टर कोटनीस की सेहत पर पड़ने लगा. उनका शरीर थक चुका था. दिसंबर 1942 में, अपने बेटे के जन्म के महज तीन महीने बाद, सिर्फ 32 साल की उम्र में इस मसीहा ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. उनकी मौत की खबर से पूरा चीन सदमे में डूब गया. खुद माओ त्से तुंग ने बेहद भावुक होकर लिखा- “आज चीन ने अपना एक अनमोल दोस्त खो दिया है. हम उनके इस बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे. उनका नाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा.”

मगर यह कहानी यहां खत्म नहीं होती. चीन के सबसे बड़े नेता माओ त्से तुंग ने खुद अपने हाथों से उनके सम्मान में शोक संदेश लिखा था. उन्होंने कहा था- ‘हमारी सेना ने अपना एक मजबूत हाथ खो दिया है और हमारे देश ने अपना सबसे सच्चा दोस्त गंवा दिया है’.
आज भी चीन के शीजियाझुआंग (Shijiazhuang) शहर में उनकी एक भव्य समाधि और स्मारक है. उनके नाम पर वहां एक मेडिकल स्कूल चलाया जाता है. आज भी जब उस मेडिकल स्कूल के छात्र डॉक्टर बनकर निकलते हैं, तो वे डॉक्टर कोटनीस के नाम की शपथ लेते हैं.
साल 2009 में जब चीन में वोटिंग हुई, तो वहां की जनता ने डॉक्टर कोटनीस को सदी के ‘टॉप 10 विदेशी नायकों’ में चुना. दशकों तक तो यह परंपरा ही बन गई थी कि चीन का कोई भी बड़ा नेता जब भी भारत के दौरे पर आता, तो डॉक्टर कोटनीस के परिवार से मिलने उनके घर जरूर जाता था. डॉक्टर कोटनीस को किसी सरहद या नक्शे से प्यार नहीं था, उन्हें तो बस इंसानों की जान बचाने से सरोकार था. सचमुच, इंसानी जज्बे की ऐसी मिसालें हर सदी में पैदा होनी चाहिए.

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