
Pitru Paksha 2026: पितरों को श्रद्धांजलि देने और उन्हें याद करने का समय है पितृ पक्ष, जो 27 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा है. पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को लेकर समय का विशेष महत्व बताया गया है.
आमतौर पर देवी-देवताओं की पूजा सुबह के समय की जाती है लेकिन पितरों के निमित्त किया जाने वाला श्राद्ध अपराह्न काल में करने का विधान है. आखिर क्यों श्राद्ध दोपहर के समय ही किया जाता है आइए जानते हैं.
सुबह श्राद्ध क्यों नहीं किया जाता?
श्राद्ध का उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और अर्पण करना है. वीरमित्रोदय में स्पष्ट रूप से कहा गया है. पूर्वाह्णे दैविकं कार्यमपराह्णे तु पैतृकम् अर्थात पूर्वाह्न में देवकार्य और अपराह्न में पितृ कार्य को प्रमुख माना गया है.
चूंकि सुबह का समय देवों का होता है, क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त को देवताओं का समय माना गया है. सुबह सूर्योदय के समय सभी दैवीय शक्तियां जागृत हो जाती हैं. भगवान की भक्ति के लिए जरूरी है कि मन एकाग्र रहे ताकि प्रभु में पूरा ध्यान लगाया जा सके. जागने के बाद हमारा मन शांत और स्थिर रहता है, इसलिए सुबह के समय देव पूजन को महत्व दिया है न कि पितृ पूजन.
श्राद्ध के लिए दोपहर का समय ही क्यों श्रेष्ठ
धर्मशास्त्रीय परंपरा में दिन के जिस हिस्से को पितृ कर्म के लिए उपयुक्त माना गया है, उसमें कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल प्रमुख हैं. दरअसल इस समय सूर्य की स्थिति और किरणों का प्रभाव ऐसा होता है कि पितरों तक भोजन और तर्पण का अंश ठीक से पहुंचता है इसलिए दोपहर का समय पितृ पूजन के लिए श्रेष्ठ है. पितृ पक्ष में सुबह स्नान, संकल्प और श्राद्ध की तैयारी की जा सकती है लेकिन श्राद्ध अपराह्न में किया जाता है.
क्या है कुतुप मुहूर्त?
दिन को 15 मुहूर्तों में विभाजित करने पर आठवां मुहूर्त कुतुप कहलाता है. शास्त्रीय ग्रंथों में इसे पितृकर्म के लिए विशेष महत्व प्राप्त है.
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीमवति भास्करःस कालः कुतपो ज्ञेयः पितॄणामन्नमक्षयम्॥” अर्थात दिन के आठवें भाग में सूर्य की स्थिति वाला समय कुतुप कहलाता है और इसे पितरों के लिए अन्न अर्पण के संदर्भ में विशेष माना गया है.
रौहिण मुहूर्त क्या है?
कुतुप के बाद आने वाला नौवां मुहूर्त रौहिण कहलाता है. स्कंद पुराण के श्राद्धविधि प्रसंग में भी कहा गया है—
अष्टमो यो मुहूर्तश्च कुतपः स निगद्यते.नवमो रौहिणः प्रोक्त इति श्राद्धविदो विदुः॥ अर्थात आठवां मुहूर्त कुतुप और नौवां रौहिण कहलाता है.
अपराह्न काल क्यों है खास?
अपराह्न दिन का वह भाग है जो मध्याह्न के बाद आता है. श्राद्ध के लिए इसे व्यापक समय माना जाता है. कुतुप और रौहिण इसी आसपास के विशेष मुहूर्त हैं. यदि किसी कारण से कुतुप में श्राद्ध आरंभ न हो पाए तो परंपरा में अपराह्न काल के भीतर श्राद्ध करने का विधान मिलता है.

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