आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
यानी AI हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑफिस का काम हो, ई-मेल लिखना हो या कोई आइडिया सोचना हो, हर जगह लोग धड़ल्ले से AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से सोशल मीडिया पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया है. दरअसल, यहां एक शख्स ने अपनी लव लाइफ को ही ऑटोमेट कर दिया. जब इस बात का खुलासा हुआ, तो उसकी गर्लफ्रेंड ने फौरन ब्रेकअप कर लिया. आइए जानते हैं इस दिलचस्प कहानी के बारे में.
क्या है पूरा मामला?
यह अनोखी लव स्टोरी X (पहले ट्विटर) पर डेलिया लाजारेस्कु (Delia Lazarescu
) नाम की एक यूजर की पोस्ट के जरिए वायरल हुई. सैन फ्रांसिस्को की एक महिला को लंबे समय तक यह लगता रहा कि उसका बॉयफ्रेंड उससे बेपनाह मोहब्बत करता है. वह उसकी दिन भर परवाह करता है. हर पल प्यारे-प्यारे मैसेज भेजता है. लेकिन जब इसके पीछे का सच सामने आया, तो महिला के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई. असल में महिला जिससे हर दिन बातें कर रही थी, वो कोई इंसान नहीं बल्कि एक AI चैटबॉट था.
AI चैटबॉट संभाल रहा था रिश्ते की हर जिम्मेदारी
वायरल दावे के अनुसार, शख्स ने अपने इस रिलेशनशिप के लगभग सारे काम AI चैटबॉट को सौंप रखे थे. गुड मॉर्निंग मैसेज से लेकर दिनभर हालचाल पूछने तक, सब कुछ AI चैटबॉट ही करता था. यहां तक कि छोटी-मोटी बहस के दौरान क्या जवाब देना है, यह भी AI चैटबॉट ही तय करता था. डिनर डेट और घूमने-फिरने की प्लानिंग भी शख्स ने ऑटोमेट कर रखा था. यानी महिला जिसे सच्ची मोहब्बत समझ रही थी, असल में वह कोडिंग और एल्गोरिदम था. यह भी पढ़ें:Viral Video: तोहफा हो तो ऐसा! AI लव स्टोरी देखकर छलके दुल्हन के आंसू; देखें ये वायरल वीडियो
इंटरनेट पर लोगों के मजेदार रिएक्शन
इस अजब प्रेम की गजब कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई. एक यूजर ने मजाकिया लहजे में लिखा, भाई ने अपनी पूरी लव लाइफ ही आउटसोर्स कर दी और अंत में ब्रेकअप का तोहफा मिल गया. दूसरे ने कहा कि इस शख्स ने हर चीज ऑटोमेट करने के आइडिया को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया था. यह भी पढ़ें: वो मेरी जिंदगी है 72 की बुजुर्ग महिला के प्यार में पागल हुआ 22 साल का लड़का, रचा ली शादी; चर्चा में अजब प्रेम की गजब कहानी
Disclaimer: यह खबर वायरल सोशल मीडिया पोस्ट और नेटिजन्स की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है.
बालाघाट.
प्रकृति में कई ऐसे सवाल है, जिसका जवाब मिलना मुश्किल ही हो जाता है. ऐसे में हम उसे चमत्कार कहते हैं. एक ऐसा ही चमत्कार बालाघाट जिले के गढ़दा गांव की पहाड़ी पर देखने को मिलता है, जहां पर करीब चार किलोमीटर की चढ़ाई करने के बाद मां अन्नपूर्णा का धाम आता है. वहीं पर मां अन्नपूर्णा चट्टानों के बीज विराजित है. उसी विशाल चट्टान पर एक पेड़ है, जो काफी बड़ा है. ऐसे में उस पेड़ को देख लोग हैरान हो जाते हैं. वहीं, उस पेड़ की प्रजाति का है इसकी जानकारी बहुत नहीं थी. अब इस पेड़ को लेकर कई दावे किए जाते हैं.
अब से कुछ साल पहले तक इस पेड़ की पहचान नहीं हो सकी थी. लेकिन काशी से कुछ लोग आए थे. ऐसे में उन्होंने बताया कि यह पेड़ की पहचान कल्पवृक्ष के रूप में किए थे. हालांकि, मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. यह वृक्ष भी काफी विशाल है.
दुर्लभ प्रजाति का है ये पेड़
बालाघाट जिला एक वना आधारित जिला है. यहां पर कई प्रकार और कई प्रजाति की वनस्पति है. ऐसे में ज्यादातर पेड़ों या वृक्षों की पहचान हो चुकी है. लेकिन कई ऐसे पेड़ है, जिसे स्थानीय लोग भी नहीं पहचान पाते हैं. ऐसे में इसे दुर्लभ माना जाता है. यह वृक्ष इतना विशाल है कि इसका अंदाजा लगाना कठिन है कि वह कितना बड़ा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस वृक्ष का क्षेत्रफल करीब 100 वर्ग फीट से भी ज्यादा है.
जड़ नहीं दिखती पत्तियों में स्वाद नहीं
मां अन्नापूर्णा धाम के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ को देख हैरानी होती है. दरअसल, यह विशाल वृक्ष सिर्फ चट्टान तक ही दिखता है. इसकी जड़ें भूमि में मिलती हुई प्रतीत नहीं होती है. ऐसे में यह एक रहस्य है, जहां कि दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को पोषण कैसे मिलता है. जहां एक ओर जंगल के सारे पेड़ हमेशा से गर्मी में सुख जाते हैं. लेकिन यह वृक्ष साल भर हरा भरा रहता है. ऐसे में इस बात से भी लोग हैरान हो जाते हैं.
इच्छा पूरी करने वाला है पेड़!
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह वृक्ष मनोकामनाएं पूरी करने वाला है. मां अन्नपूर्णा के गढ़दा धाम में प्रकट दिवस, नवरात्रि (शारदेय और चैत्र) में भक्तों की भारी भीड़ रहती है. ऐसे में आने वाले भक्त हमेशा अपनी मन्नत पूरी करने के लिए इस पेड़ मन्नत बांधते हैं. वहीं, मन्नत पूरी होने पर वह चुनरी भी छोड़ देते हैं. ऐसे में यहां नौकरी लगने से लेकर संतान प्राप्ति का कामना लेकर कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं और इस इच्छा पूरी करने वाले कल्प वृक्ष की अर्चना भी करते हैं.
सेहत के लिए भी है फायदेमंद
गढ़दा मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सहदेव अड़मे बताते हैं कि इसकी पत्तियों की सेवन से गैस की समस्या से राहत मिलती है. वहीं, मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि इस वृक्ष की पत्तियों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी से राहत मिलती है. वहीं, इसकी पत्तियों के सेवन से ब्लड पेशर, गैस और पेट की बीमारियों से राहत मिल सकती है. लेकिन, लोकल 18 इन दावों की पुष्टि नहीं करता है.
हालांकि, यह वृक्ष काफी विशाल है और दुर्लभ प्रजाति का जरूर है. ऐसे में चट्टान के ऊपर होना और जड़ का नजर न आना प्रकृति प्रेमियों में रोमांच उत्पन्न करता है.
मुगलों के हरम में सख़्त पाबंदियां थीं. आमतौर पर इन पर किन्नरों का पहरा था. फिर भी भीतर की कहानियां बाहर निकलती थीं. शहजादियों के प्रेम -प्रसंग खुसर-पुसुर और लुका-छिपी के बीच एक कान से दूसरे कान के बीच से गुजरते दूर तक उड़ान भर लेते थे. दरबारी इतिहासकारों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे इसे दर्ज करेंगे. लेकिन उस दौर में दरबार के नजदीक पहुंचे यूरोपीय यात्रियों और इतिहासकारों ने इसे कलमबंद किया. पकड़े जाने पर प्रेमियों को अपनी जान गंवानी पड़ी.
शहजादियों पर पहरा और कड़ा हुआ या कैद में डाली गईं. लेकिन अनेक शाहजादियां अविवाहित क्यों रहीं? असलियत में उनकी शादियों पर पाबंदी का चलन अकबर के समय शुरू हुआ, जिसकी सोच थी कि शाही परिवार में शादियां तख़्त के नए दावेदार खड़े कर समस्याएं बढ़ाएंगी. पढ़िए मुग़ल शहजादियों से जुड़े कुछ रोचक किस्से.
तख़्त के दावेदारों से बचने के लिए शहजादियां रखीं गईं कुंवारी
बाबर और हुमायूं के समय कुछ शहजादियों की शादियां मुगल दरबार के ऊंचे ओहदेदारों के साथ हुईं. लेकिन अकबर के समय से यह सिलसिला लगभग थम गया. इस रोक का मकसद सियासी माना जाता है. सोच थी कि मुगल खानदान से जुड़ने वाले दूसरे कुल के लोग शाही उत्तराधिकार के नए दावेदार के तौर पर न खड़े हो जाएं. दिलचस्प है कि इन शहजादियों को खूब धन-दौलत और नियमित आमदनी के लिए जागीरें सौंपी गईं.
हरम की महिलाओं का बाग, दरगाह, या रिश्तेदारों के घर तक ही जाना होता था.
ऊंचे खिताब दिए गए. उनकी बाहरी दुनिया चमक-दमक से रोशन थी लेकिन निजी जिंदगी अंधेरों से भरी और बेड़ियों से जकड़ी हुई थी. असलियत में शाही हरम के ठाठ-बाट बीच एक अलग दुनिया भी थी, जिसमें अनुशासन के नाम पर मन से रहने-जीने की गुंजाइश नहीं थी. अपनी मर्जी से शादी न करने का फैसला अलग मसला होता है. लेकिन जब यह पाबंदी पिता और परिवार की ओर से होती हैं , तो खतरों के बीच भी प्यार-मुहब्बत के अंकुर फूटते हैं.
कई शहजादियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. बात अलग है कि इश्क-मुश्क छिपाये नहीं छिपता. वहां के खतरों का क्या कहना जहां यह बादशाह की बेटियों के साथ हो. भांडा जब भी फूटा तो आमतौर पर आशिकों ने जान देकर कीमत चुकाई. उधर शहजादियों पर बंदिशें और बढ़ीं. लेकिन तमाम रोक-टोक बीच यह सिलसिला चलता रहा.
जहांआरा से मोहब्बत की सजा मौत
मुगल इतिहास की शहजादियों में शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम का ऊंचा मुकाम है. मुमताज़ महल की मौत के बाद वही “पादशाह बेगम” बनी और पूरा हरम उसी के जिम्मे था. औरंगज़ेब द्वारा शाहजहां को बंदी बनाए जाने और फिर उसकी मौत तक जहांआरा पिता की खिदमत में रही. बाद में औरंगज़ेब ने भी उसे दरबार में ऊंचा दर्जा दिया. लेकिन शादी उसकी किस्मत में नहीं थी. बेहद जहीन जहांआरा खूब पढ़ती और लिखती थी. माना जाता है कि एक अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली ईरानी अमीर नज़र ख़ां से उसका प्रेम प्रसंग चल रहा था. इसकी जानकारी मिलने पर शाहजहां कुपित हुआ.
नज़र ख़ां को विष देकर मरवा दिया गया. फ्रांसीसी यात्री फ़्रांस्वा बर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनुच्ची दोनों ही ने इसका उल्लेख किया है.अंग्रेज चिकित्सक गैब्रियल बॉटन से जुड़ा जहाँआरा का दूसरा प्रेम प्रसंग भी काफी चर्चित रहा है. हालांकि फारसी इतिहासकारों के ब्यौरों में उल्लेख न होने के कारण आधुनिक इतिहासकार इसकी प्रमाणिकता पर सवाल करते हैं.
रोशनारा के इश्क का सिलसिला
तख़्त की जंग में अगर जहांआरा बड़े भाई दारा के साथ थी तो उसकी बहन रोशन आरा छोटे भाई औरंगज़ेब के साथ. बादशाह बनने पर औरंगज़ेब ने रोशन आरा को मल्लिका-ए-जहां बनाया. इस हैसियत में रोशन आरा के खिलाफ तमाम शिकायतें थीं लेकिन औरंगज़ेब के सब्र का प्याला तब छलक गया, जब हरम में रोशन आरा के इश्क में गिरफ्तार मर्दों की आमद की जानकारी उस तक पहुंचीं. औरंगजेब ने खुद ही असलियत जानने का फैसला किया.
शाही फ़ौज की एक टुकड़ी ने हरम से किसी के बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं छोड़ी. औरंगजेब हरम में पहुंचा और रोशनारा को अपने ईरानी आशिक के साथ पकड़ लिया. मल्लिका की बदनामी हरम से निकल दूर तक फैली. ईरानी को मौत की सजा हुई. असलियत में रोशन आरा का यह इश्क वालिद शाहजहां के वक्त से चल रहा था. वह आशिक नाना आसफजहां का दूर का रिश्तेदार था. शाहजहां को जब इसकी जानकारी हुई तो उसने रियायत की और सजा के तौर पर ईरानी को काबुल रवाना कर दिया था.
औरंगज़ेब की बादशाहत के दौरान मजबूत होने पर रोशन आरा ने उस अमीर को वापस बुला लिया था. वालिद के वक्त में ही कम उम्र मे रोशन आरा दरबार के एक ऊंचे ओहदेदार अधिक उम्र के राजपूत अमीर पर फिदा हो गई थी. यह राजपूत मंसबदार शाहजहां की एक राजपूत बेगम के घराने का था. जागीर में वापस भेजकर शाहजहां ने उसे रोशनारा से दूर किया था.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
बहन के बाद भतीजी की निगरानी में रोशन आरा
वालिद के दौर में दोनों बहनों जहांआरा और रोशन आरा में दूरियां काफी बढ़ गई थीं. बड़ी बहन के अख्तियार से वह रोशन आरा को डांटती और टोकती रहती थी. उसकी हरकतों पर निगाह के लिए कई लड़कियां लगा दी थीं. औरंगजेब के यहां रोशन आरा के रास्ते में बहन का कांटा तो नहीं था लेकिन ईरानी आशिक के साथ पकड़े जाने के बाद
औरंगजेब चौकन्ना था. उसने रोशन आरा की जासूसी की जिम्मेदारी अपनी बेटी जेबुन्निसा को सौंपी. उसने जो जानकारी जुटाई , उसके मुताबिक फूफी रोशनारा के एक-दो नहीं पूरे नौ आशिक हैं. वे समय-समय पर उससे मिलते रहते हैं. औरंगजेब ने रोशन आरा से सफाई मांगी. पलटवार में उसने जेबुन्निसा को ही कसूरवार ठहराया और अपने एक आशिक के जेबुन्निसा से नाजायज रिश्ते बताए. फिर ये आशिक पकड़े गए. काजी के सामने पेश किया गया.
इन नौ में पांच जिनका गुनाह साबित हो गया था, उन्हें हनफ़ी कानून के तहत मौत की सजा दे दी गई. भारी फजीहत और बदनामी के चलते रोशन आरा ने जहर पीकर जान देने की नाकाम कोशिश की. उसके सारे शरीर में सूजन आ गई. हकीम, वैद्य और फिरंगी डॉक्टरों ने इस सूजन को धीमे जहर का असर बताया. जहाँआरा को शक था कि रोशन आरा ने जहर खुद नहीं पिया बल्कि यह औरंगज़ेब की करतूत थी.
ज़ेबुन्निसा को मिली जेल
औरंगज़ेब की बेहद खास बेटी ज़ेबुन्निसा फ़ारसी की शायरा थीं और “मख़्फ़ी” उपनाम शायरी करती थी. चर्चा थी कि उसका इश्क लाहौर के सूबेदार अक़ील ख़ां रज़ी से हुआ. दोनों के बीच शायरी का आदान-प्रदान भी होता था. रोशन आरा के दरबार से हटाए जाने के बाद एक बार फिर मल्लिका-ए-जहां बनी जहांआरा भी भतीजी के इस प्रेम प्रसंग से अनजान नहीं थी, पर उसने इस मसले पर चुप रहना बेहतर समझा. बात फिर भी औरंगज़ेब तक पहुंची और खूब गुस्सा हुआ.
ज़ेबुन्निसा को उसने लंबे समय तक क़ैद में रखा. गुलबदन बेगम, सलीमा सुल्तान बेगम, ज़ीनत-उन-निसा आदि की प्रेम कथाएं भी चर्चा में रहीं. ऐसे प्रेम प्रसंगों का भांडा फूटने पर आशिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. किसी को जहर दिया गया तो किसी का गला घोंटा गया. कोई हाथी से कुचला गया तो कोई ऐसा गायब हुआ कि फिर कभी पता नहीं चला. खुशनसीब वे थे , जिनकी जान बची और सजा के तौर पर सिर्फ मुग़ल सल्तनत से दूर कहीं और भेज दिए गए.
वाशिंगटन.
जीवन में जब इंसान को एक बार भी कैंसर जैसी घातक और खौफनाक बीमारी का सामना करना पड़ता है, तो उसकी पूरी दुनिया हिल जाती है. लेकिन अमेरिका के कंसास राज्य स्थित ओवरलैंड पार्क की रहने वाली 53 वर्षीय लिज बैंडिट की कहानी इंसान की अटूट इच्छाशक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे सुनकर पूरी दुनिया हैरान है. लिज ने अपने जीवन में एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे छह बार कैंसर जैसे जानलेवा दुश्मन को पटकनी दी है. जब डॉक्टरों ने उनके पास महज एक साल का समय बचने की आशंका जताई थी, तब दो छोटे बच्चों की मां लिज ने हार मानने के बजाय हर बार मौत के मुंह से वापसी की और आज वे पूरी तरह स्वस्थ होकर हाफ मैराथन दौड़ रही हैं. लिज की यह खौफनाक यात्रा साल 2009 में शुरू हुई थी, जब वे 36 साल की थीं और दो छोटे बच्चों (3 साल की बेटी ईव और 1 साल के बेटे एलेक्स) की मां थीं.
स्विमिंग पूल के पास टहलते समय उनकी मां की नजर लिज के पैर पर मौजूद एक अजीब तिल पर पड़ी. मां के बार-बार ज़िद करने पर जब लिज ने डर्मेटोलॉजिस्ट को दिखाया, तो रिपोर्ट में स्किन कैंसर यानी मेलानोमा की पुष्टि हुई. डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अगर यह कैंसर शरीर में फैल गया, तो उनके पास जीने के लिए एक साल से भी कम वक्त बचा है. दो मासूम बच्चों के सिर से मां का साया उठने का डर लिज के दिल में बैठ गया था, लेकिन पहली सर्जरी के जरिए उनका मेलानोमा ट्यूमर निकाल दिया गया. हालांकि, यह तो 15 साल लंबे दर्दनाक सिलसिले की महज शुरुआत थी. साल 2010 में लिज को थायरॉयड कैंसर हो गया, जिसके लिए उनकी सर्जरी कर थायरॉयड ग्रंथि हटानी पड़ी. इसके बाद 2015 में उनकी नाक पर बैसल सेल कार्सिनोमा का पता चला, जिससे उनकी चेहरे की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी करनी पड़ी.
दुख का पहाड़ तब और टूट पड़ा जब 2017 में उनके बाएं ब्रेस्ट में कैंसर पाया गया, जिसके लिए 35 बार रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी झेलनी पड़ी. हद तो तब हो गई जब 2023 में उनके दाहिने ब्रेस्ट में भी कैंसर की पुष्टि हुई और 2024 में एक बार फिर उनके पैर में मेलानोमा लौट आया. इतनी भयावह और बार-बार टूटने वाली परिस्थितियों के बावजूद लिज ने हिम्मत नहीं हारी. वे लगातार इलाज कराती रहीं और आखिरकार 2025 में डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह कैंसर-मुक्त घोषित कर दिया. छह बार मौत को चकमा देने के बाद लिज ने अपनी इस जीत का जश्न हाफ मैराथन दौड़कर मनाया. अपने दर्दनाक अनुभवों का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करते हुए लिज ने 2020 में द बाम बॉक्स नाम से एक कंपनी शुरू की, जो कैंसर मरीजों को उनके इलाज के हिसाब से जरूरी राहत सामग्री के केयर पैकेज बनाकर देती है. आज 53 साल की उम्र में लिज बेहद फिट हैं, हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ दौड़ती हैं और हर पल को खुशी-खुशी जी रही हैं.
चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन भील समुदाय के बीच बीता जो तीरंदाजी में माहिर थे.
23 जुलाई 1906 को जन्मे और महज 24-25 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए. वे आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया. अंग्रेज उनसे थर-थर कांपते थे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे. वे साहसी थे. तेज़ निर्णय लेते थे. अपने साथियों की सुरक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनकी एक खास पहचान उनका सटीक निशाना भी था. ऐसे ही थे भारतीयों के रग-रग में बसे चंद्रशेखर आजाद.
आइए, उनकी जन्म जयंती के बहाने जानते हैं कि वे निशानेबाजी में महारथ हासिल करने में कैसे कामयाब हुए? किस उम्र में पिस्टल-गोलियों से खेलने लगे?
कम उम्र में ही पक्के निशानेबाज हो गए थे
आज़ाद की निशानेबाजी केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं थी. इसके पीछे बचपन का अभ्यास, मजबूत शरीर, धैर्य, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी. क्रांतिकारी जीवन में पिस्तौल उनके लिए शौक की वस्तु नहीं थी. वह आत्मरक्षा, साथी-सुरक्षा और संगठन की जिम्मेदारी का साधन थी.
चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन मध्य भारत के भाबरा क्षेत्र में बीता. यह क्षेत्र वन, पहाड़ और आदिवासी जीवन से जुड़ा था. वहां भील समुदाय के लोग रहते थे. भील समुदाय को तीर-कमान चलाने की पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है. आज़ाद ने बचपन में भील बच्चों के साथ तीर चलाने का अभ्यास किया. यह अभ्यास उनके लिए बहुत उपयोगी बना. तीरंदाजी में आंख, हाथ और लक्ष्य के बीच सही तालमेल चाहिए होता है. निशाना लगाते समय सांस, शरीर और ध्यान को नियंत्रित रखना पड़ता है. यही गुण आगे चलकर पिस्तौल चलाने में भी उनके काम आए. तीर-कमान से मिला अभ्यास उनके हाथों की स्थिरता और नजर की एकाग्रता का आधार बना.
क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद.
इसलिए रखते थे पिस्तौल और गोलियां
जब आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तब परिस्थितियां बदल गईं. अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष बहुत कठिन था. पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की तलाश में रहते थे. ऐसी स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी पड़ती थी. साथियों को सुरक्षित निकालना भी जरूरी होता था, इसलिए आज़ाद ने तीर-कमान के स्थान पर पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया. लेकिन इसे केवल हथियार रखने की कहानी नहीं मानना चाहिए. आज़ाद के लिए पिस्तौल जिम्मेदारी का प्रतीक थी. उन्हें कई बार संगठन के वरिष्ठ साथियों की रक्षा करनी होती थी. वे खतरे के समय पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका उद्देश्य अंधाधुंध गोली चलाना नहीं था. वे परिस्थितियों को समझकर फैसला लेते थे. यही बात उन्हें सामान्य हथियारबंद व्यक्ति से अलग बनाती है.
नियमित शारीरिक अभ्यास उनकी पहचान
आज़ाद का शरीर बहुत मजबूत था. वे नियमित रूप से दंड-बैठक करते थे. उनका शरीर गठा हुआ था. उनकी मांसपेशियां मजबूत थीं. वे पेड़ों पर चढ़ने में भी कुशल थे. शारीरिक फिटनेस का निशानेबाजी से गहरा संबंध है. मजबूत शरीर का मतलब केवल ताकत नहीं होता. इसका अर्थ है बेहतर संतुलन. निशाना लगाते समय हाथ कांपना नहीं चाहिए. शरीर का नियंत्रण जरूरी है. तनाव में भी शरीर को स्थिर रखना पड़ता है. आज़ाद कठिन जीवन जीते थे. वे कम साधनों में रहते थे. कई बार जमीन पर अखबार बिछाकर सो जाते थे. फिर भी उनका अनुशासन नहीं टूटता था. यह अनुशासन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता को मजबूत करता था.
अपने मन पर जबरदस्त काबू रखते थे आजाद
अच्छा निशानेबाज केवल अच्छी आंख वाला व्यक्ति नहीं होता. उसे डर और दबाव में भी शांत रहना पड़ता है. आज़ाद इस गुण के लिए प्रसिद्ध थे. वे लंबे समय तक अंग्रेज पुलिस से बचते रहे. वे लगातार अपना भेष बदलते. कभी व्यापारी तो कभी कुली बनते. कभी साधु का रूप धारण करते थे तो कभी अंग्रेज़ी पहनावे में दिखाई देते थे. इस जीवन में हर समय पकड़े जाने का खतरा था. ऐसी स्थिति में घबराहट स्वाभाविक थी, लेकिन आज़ाद में मानसिक संतुलन था. वे खतरे के बीच भी स्थिति को पढ़ते थे. वे समझते थे कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब अपने साथी को बचाना है. यह मानसिक स्थिरता उनके निशाने को मजबूत बनाती थी.
साथियों की सुरक्षा पहली जिम्मेदारी समझते थे आजाद
चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साथियों की सुरक्षा था. वे अक्सर अपने साथियों को बचाने के लिए पीछे रहते थे. उनका काम केवल हमला करना नहीं था. उनका पीछा कर रहे लोगों को रोकना भी था. लाहौर में सांडर्स की हत्या के बाद ऐसा ही एक प्रसंग सामने आता है. योजना में भगत सिंह और राजगुरु मुख्य भूमिका में थे. आज़ाद को पीछे से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिली थी. घटना के बाद भगत सिंह और राजगुरु वहां से निकल रहे थे. हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह उनका पीछा कर रहा था. आज़ाद ने उसे रुकने की चेतावनी दी. जब उसने पीछा जारी रखा, तो आज़ाद ने गोली चलाई. यह घटना बताती है कि आज़ाद केवल निशाना लगाने में कुशल नहीं थे. वे संकट में अपने साथियों की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे. उनके लिए संगठन और साथियों की जान बहुत महत्वपूर्ण थी.
अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई अंतिम लड़ाई
चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी की चर्चा उनकी अंतिम लड़ाई के कारण भी होती है. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. आज यह पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से ही जाना जाता है. उस समय वे अकेले नहीं थे. उनके साथ सुखदेव भी थे. आज़ाद ने पहले अपने साथी को सुरक्षित निकलने का अवसर दिया. उसके बाद वे पुलिस का सामना करते रहे.
बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस के हवाले से आज़ाद के निशाने की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है. हॉलिंस ने लिखा कि आज़ाद की पहली गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह को भी गंभीर चोट लगी थी. हॉलिंस के अनुसार आज़ाद की गोलियां पेड़ पर इंसान की औसत ऊंचाई के आसपास लगी थीं. दूसरी ओर पुलिस की कई गोलियां काफी ऊपर लगी थीं. इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि घिर जाने और घायल होने के बाद भी आज़ाद का नियंत्रण खुद पर बना हुआ था. यह उनके धैर्य और अभ्यास की बड़ी मिसाल है.
आजाद के लिए पिस्तौल का अर्थ क्या था?
आज़ाद के जीवन में पिस्तौल का अर्थ हिंसा का प्रदर्शन नहीं था. वह औपनिवेशिक दमन के दौर में आत्मरक्षा और प्रतिरोध का साधन थी. उस समय अनेक क्रांतिकारियों का मानना था कि अंग्रेज़ी शासन के सामने केवल अपील से आज़ादी नहीं मिलेगी. हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं थीं. महात्मा गांधी अहिंसा और जन-आंदोलन के पक्षधर थे. दूसरी ओर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी प्रतिरोध का रास्ता चुन रहे थे. दोनों धाराओं का लक्ष्य भारत की आज़ादी था, लेकिन तरीके अलग थे. आज़ाद की पिस्तौल उनके चुने हुए रास्ते का हिस्सा थी. फिर भी उनका व्यक्तिगत जीवन अनुशासन, सादगी और साथियों के प्रति समर्पण से भरा था.
कम शब्दों में कहें तो चंद्रशेखर आज़ाद निशानेबाजी में इसलिए पक्के थे क्योंकि उन्होंने बचपन से लक्ष्य साधने का अभ्यास किया था. भील बच्चों के साथ तीरंदाजी ने उनकी नजर और हाथों को प्रशिक्षित किया. क्रांतिकारी जीवन ने उन्हें पिस्तौल का कुशल उपयोग सिखाया. उनकी शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन और अनुशासन ने इस कौशल को और मजबूत बनाया. वे निशानेबाज जरूर थे, लेकिन उनकी पहचान केवल इसी तक सीमित नहीं थी. उनका जीवन यह बताता है कि किसी भी कौशल के पीछे अभ्यास, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य का बड़ा महत्व है.
बरसात के दिनों में बिलों में पानी भर जाने पर अक्सर कई जीव-जंतु बाहर निकलकर लोगों के घरों में घुसने लगते हैं. ऐसा ही एक जीव छछूंदर है, जो बरसात के सीजन में बहुत परेशान करता है. उसकी गंदी स्मेल और अजीब लोग हर किसी को परेशान करता है. जब वह अजीब आवाज निकालता हुआ घरों में घुसता है तो बच्चे उससे डर जाते हैं. वह ऐसा जीव है, जो आसानी से पिंजरे में भी नहीं घुसता. ऐसे में लोग इस बात से परेशान हो जाते हैं कि उसे बिना मारे घर से कैसे दूर भगाया जाए. आइए, आज हम आपको ऐसा ही एक घरेलू नुस्खा बताने जा रहे हैं. जिसे आजमाकर आप छछूंदर की समस्या से हमेशा के लिए निजात पा सकते हैं.
घर से छछूंदरों को भगाने का उपाय
छछूंदर भगाने के लिए आप घर में ही देसी उपाय (Chuchundar Bhagane Ke Upay) कर सकते हैं. इसके लिए आप पुदीने की पत्तियों या उसकी डंडियों का इस्तेमाल करें. असल में पुदीने की खास गंध छछूंदरों को बिल्कुल रास नहीं आती है. वे इसकी गंध महसूस करते ही दूर भाग खड़े होते हैं. ऐसे में आप अपने घर के अंदर, बाहर, खिड़की, रसोई और प्रमुख जगहों पर पुदीने को रख दें. ऐसा करने से छछूंदर आपके घर में घुसने की कभी सोचेंगे भी नहीं.
पुदीने की पत्तियों का करें इस्तेमाल
इस ट्रिक को इस्तेमाल करने के लिए आप पुदीने की ताजा पत्तियां लें. इसके बाद उन्हें घर के हर कोने पर एक-एक पत्ता रख दें. आप चाहें तो पुदीने की पत्तियों को सुखाकर उसका पाउडर भी घर की प्रमुख जगहों पर रख सकते हैं. इन दो तरीकों के अलावा तीसरा तरीका स्प्रे बनाने का है. आप पुदीने की पत्तियों और डंडियों को उबालकर उसके गर्म पानी को स्प्रे बोतल में भर लें.
स्प्रे से दूर भागते हैं छछूंदर
इसके बाद आप घर के तमाम एंट्री पॉइंट्स पर समय-समय पर इस स्प्रे को छिड़कते रहें. खासकर उन जगहों पर जरूर छिड़कें, जहां से चूहों और छछूंदरों के आने का अंदेशा हो. इस ट्रिक की वजह से उनके आवागमन के सारे रास्ते ब्लॉक हो जाएंगे और वे आपके घर की ओर झांकेंगे भी नहीं. इस उपाय से आपको छछूंदरों के साथ ही चूहों से भी निजात मिल जाएगी.
घर में पनपने न दें गंदगी
इसके साथ ही आप छछूंदरों से निजात पाने के लिए कुछ ओर भी उपाय कर सकते हैं. सबसे पहले तो आप दरवाजों और खिड़कियों के आसपास जाली लगवा लें. दरवाजे के नीचे इतनी जगह न छोड़ें कि वहां से चूहे या छछूंदर अंदर घुस सकें. घर में कूड़ा इकट्ठा न होने दें. कूड़े की गंध चूहों और छछूंदरों को बहुत आकर्षित करती है. अगर गंदगी नहीं होगी तो उनका आना भी काफी हद तक रुक जाएगा.
अगर आप अक्सर ट्रैवल करते हैं और होटल या एयरपोर्ट पर फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. माइक्रोसॉफ्ट की थ्रेट इंटेलिजेंस टीम ने एक खतरनाक साइबर अटैक अभियान ‘CaptiveCrunch’ को लेकर दुनिया भर के यात्रियों को अलर्ट जारी किया है. रूसी हैकर्स का एक ग्रुप होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के वाई-फाई नेटवर्क को निशाना बना रहा है. यह हैकिंग हमला इतना खतरनाक है कि हैकर्स आपके लैपटॉप या फोन का पासवर्ड चुराने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं.
क्या है ‘CaptiveCrunch’ और यह कैसे काम करता है?
माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इस हैकिंग अभियान को Storm-2945 नाम का ग्रुप चला रहा है, जो रूस के कुख्यात हैकर ग्रुप ‘माइडनाइट ब्लिजार्ड’ (APT29 या Cozy Bear) से जुड़ा हुआ है. यह हमला मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ट्रैवलर्स को निशाना बनाकर किया जा रहा है.
नेटवर्क हैक करना: हैकर्स सबसे पहले होटल के राउटर या उस सिस्टम को हैक करते हैं जिससे वाई-फाई का लॉगिन पेज (Captive Portal) खुलता है.
नकली लॉगिन पेज: जब कोई यूजर वाई-फाई से कनेक्ट करता है, तो उसके सामने गूगल या माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसा दिखने वाला फर्जी लॉगिन पेज आ जाता है.
पासवर्ड चोरी: यूजर जैसे ही अपना पासवर्ड डालता है, उसकी ईमेल, वनड्राइव फाइल्स और कंपनी के डेटा का एक्सेस सीधे हैकर्स के पास चला जाता है.
फर्जी अपडेट के नाम पर मालवेयर का जाल
इस हमले की सबसे खतरनाक बात यह है कि हैकर्स यूजर्स को धोखा देने के लिए कई तरह के फर्जी पॉप-अप और यूटिलिटीज का सहारा लेते हैं.
यूजर के स्क्रीन पर ‘ब्राउजर अपडेट’, ‘विंडोज सिक्योरिटी चेक’ या ‘डायरेक्टएक्स/विजुअल सी++ इंस्टॉल’ करने के मैसेज आते हैं.
ये मैसेज बिल्कुल असली विंडोज या गूगल सर्विस की तरह दिखाई देते हैं.
जैसे ही यूजर इन फर्जी अपडेट्स पर क्लिक करता है, उसके डिवाइस में खतरनाक मालवेयर (Malware) डाउनलोड हो जाता है.
हैकर्स आपके डिवाइस में क्या-क्या कर सकते हैं?
माइक्रोसॉफ्ट ने चेतावनी दी है कि इस मालवेयर के जरिए हैकर्स आपके कंप्यूटर पर लगभग पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं.
ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग: हैकर्स आपके वेबकैम और माइक को चालू करके आपकी बातें और वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.
पासवर्ड और कुकीज चोरी: ब्राउजर में सेव किए गए सभी पासवर्ड और बैंकिंग कुकीज चुरा सकते हैं.
स्क्रीनशॉट और की-स्ट्रोक्स: आप कीबोर्ड पर क्या टाइप कर रहे हैं (Keylogging), हैकर्स उसे ट्रैक कर सकते हैं और आपकी स्क्रीन के स्क्रीनशॉट ले सकते हैं.
होटल वाई-फाई अटैक से कैसे बचें?
माइक्रोसॉफ्ट ने यात्रियों और कंपनियों के लिए कुछ बेहद जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं:
पब्लिक वाई-फाई से बचें: जब भी संभव हो, होटल या एयरपोर्ट के वाई-फाई के बजाय अपने फोन का पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट इस्तेमाल करें.
कोई अपडेट न डाउनलोड करें: वाई-फाई कनेक्ट करते ही अगर कोई ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का मैसेज आए, तो उस पर भूलकर भी क्लिक न करें.
ऑफिशियल वेबसाइट का इस्तेमाल करें: किसी भी अपडेट के लिए हमेशा सॉफ्टवेयर की आधिकारिक वेबसाइट या सिस्टम सेटिंग्स का ही उपयोग करें.
एन्क्रिप्टेड प्राइवेट कनेक्शन (VPN): अगर पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी हो, तो हमेशा एक सुरक्षित और भरोसेमंद VPN का उपयोग करें.
मानसून का मौसम जहां एक ओर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाता है, तो वहीं दूसरी तरफ कई बार यह आपके इंटरनेट और WiFi नेटवर्क की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा देता है. बारिश के मौसम में कई बार जब तेज बरसात होती है, तो स्मार्टफोन से लेकर ब्रॉडबैंड की इंटरनेट स्पीड अचानक कम हो जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बादलों के बरसते ही आपका इंटरनेट अचानक सुस्त क्यों हो जाता है?
टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस समस्या को रेन फेड कहते हैं. आइए जानते हैं इस समस्या के पीछे क्या कारण होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.
बारिश में इंटरनेट स्लो होने के कारण
रेन फेड
वाई-फाई, सैटेलाइट और मोबाइल नेटवर्क रेडियो तरंगों के जरिए काम करते हैं. जब हवा में बारिश की बूंदें होती हैं, तो वे इन तरंगों के रास्ते में बाधा बनती हैं. पानी की बूंदें सिग्नल को सोख लेती हैं और उन्हें फैला देती हैं, जिससे सिग्नल कमजोर होने लगता है.
वहीं 5G और वाई-फाई सिग्नल काफी हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं. ये सिग्नल बहुत तेज स्पीड तो देते हैं, लेकिन बारिश और नमी के संपर्क में आते ही सबसे जल्दी प्रभावित होते हैं.
भारी बारिश के कारण अंडरग्राउंड या बाहरी केबलों में पानी घुसने का भी खतरा बना रहता है. तारों में नमी आने से न सिर्फ स्पीड स्लो होती है, बल्कि नेटवर्क में बार-बार रुकावट भी आने लगती है.
तेज आंधी-तूफान और बारिश के कारण इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बाहरी डिवाइसों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे पूरे इलाके का नेटवर्क प्रभावित हो जाता है.
कौन-सा कनेक्शन है बारिश में बेस्ट?
फाइबर ऑप्टिक
बारिश के मौसम में फाइबर इंटरनेट सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इसमें डेटा रेडियो वेव की जगह लाइट सिग्नल के जरिए केबल से यात्रा करता है, जिस पर बारिश या हवा का कोई असर नहीं पड़ता.
5G और 4G मोबाइल डेटा
बारिश के दिनों में मोबाइल डेटा की स्पीड में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. 5G की फ्रीक्वेंसी ज्यादा होने के कारण यह बारिश से जल्दी प्रभावित होता है.
सैटेलाइट इंटरनेट
खराब मौसम में सैटेलाइट कनेक्शन सबसे ज्यादा कमजोर साबित होते हैं, क्योंकि बादलों और बारिश के बीच से सिग्नल आने-जाने में भारी रुकावट होती है.
बारिश के मौसम में स्लो इंटरनेट की समस्या को कैसे ठीक करें?
अगर बारिश के दौरान आपका वाई-फाई ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप कुछ आसान टिप्स की मदद से इंटरनेट स्पीड को तेज कर सकते हैं-
5GHz बैंड पर स्विच करें
अगर आपका राउटर डुअल-बैंड है, तो अपने डिवाइस को 2.4GHz की जगह 5GHz बैंड से कनेक्ट करें. यह कम भीड़भाड़ वाला बैंड है और बेहतर स्पीड देता है.
राउटर को रीस्टार्ट करें
किसी भी तकनीकी गिल्च या अस्थाई सिग्नल समस्या को दूर करने के लिए अपने मोडेम और राउटर को कुछ सेकेंड के लिए बंद करके फिर से ऑन करें.
राउटर की जगह बदलें
राउटर को किसी ऊंची जगह पर रखें. इसे मोटी दीवारों, धातु की चीजों और बंद कोनों से दूर रखें जिससे सिग्नल घर में सही तरीके से फैल सके.
गैर-जरूरी डिवाइसेज को हटाएं
नेटवर्क पर लोड कम करने के लिए उन फोन, टीवी या गैजेट्स का वाई-फाई बंद कर दें जिनका आप उस समय इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.
वाई-फाई एक्सटेंडर
अगर घर के किसी हिस्से में सिग्नल कमजोर आ रहा है, तो सिग्नल रेंज बढ़ाने के लिए एक्सटेंडर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
बॉलीवुड फिल्मों में आपने कई बार सुना होगा कि जालसाजों ने ताजमहल, लाल किला तक बेच दिया. ऐसी बातें पर्दे पर मजेदार लगती हैं, लेकिन प्रयागराज में ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हकीकत और फिल्मों के बीच की दूरी कम कर दी. यहां भू-माफियाओं ने राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी ‘पहाड़’ के नाम दर्ज करोड़ों रुपये की जमीन को पहले अपने नाम कराया और फिर उसे बेच भी दिया. मामला सामने आने के बाद प्रशासन और पुलिस दोनों हरकत में आ गए हैं.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला प्रयागराज की बारा तहसील के गोल्हैया गांव का है. यहां आराजी संख्या-1 की करीब 83 बीघा 19 बिस्वा (लगभग 19.16 हेक्टेयर) जमीन राजस्व रिकॉर्ड में ‘पहाड़’ यानी सार्वजनिक सरकारी भूमि के रूप में दर्ज थी. आरोप है कि कुछ लोगों ने फर्जी दस्तावेज और राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी कर इस सरकारी जमीन को अपने नाम दर्ज करा लिया. इसके बाद जमीन की खरीद-फरोख्त भी शुरू कर दी गई.
सरकारी रिकॉर्ड में कैसे हुई हेराफेरी?
जमीन किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि सरकारी खाते में दर्ज थी. लेकिन आरोपियों ने कथित तौर पर राजस्व अभिलेखों में बदलाव कर खुद को जमीन का मालिक दिखा दिया. जब रिकॉर्ड में नाम दर्ज हो गए, तो उसी आधार पर जमीन की रजिस्ट्री और बिक्री भी होती रही. यानी कागजों पर सरकारी पहाड़ निजी संपत्ति बन गया.
मामला सामने कैसे आया?
प्रशासन को जमीन में गड़बड़ी की जानकारी मिलने के बाद जांच शुरू हुई. जांच में पाया गया कि जमीन को गलत तरीके से निजी खातों में दर्ज कराया गया था.इसके बाद प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए सभी फर्जी नाम निरस्त कर दिए और जमीन को दोबारा सरकारी खाते में दर्ज कर दिया.
कितने लोगों पर केस दर्ज हुआ?
लेखपाल प्राची सिंह परिहार की शिकायत पर लालापुर थाने में 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. इनमें पूर्व खाताधारक, जमीन खरीदने वाले लोग और एके ड्रीम सिटी प्राइवेट लिमिटेड नाम की निजी कंपनी के निदेशक भी शामिल हैं. पुलिस ने सभी के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी संपत्ति से जुड़े गंभीर आरोपों में मामला दर्ज किया है.
‘पहाड़’ की जमीन इतनी खास क्यों होती है?
राजस्व रिकॉर्ड में ‘पहाड़’ के रूप में दर्ज जमीन सार्वजनिक संपत्ति मानी जाती है. इसका इस्तेमाल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सार्वजनिक हित के लिए होता है. ऐसी जमीन को कोई व्यक्ति अपने नाम नहीं करा सकता और न ही उसकी खरीद-बिक्री की जा सकती है. इसलिए इस तरह की हेराफेरी को गंभीर अपराध माना जाता है.
अब आगे क्या होगा?
पुलिस का कहना है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद पूरे मामले की विस्तृत जांच की जा रही है. जांच में राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण (म्यूटेशन), रजिस्ट्री, जमीन के हस्तांतरण और सभी दस्तावेजों की बारीकी से जांच होगी. यदि किसी सरकारी कर्मचारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है.
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
देश के अलग-अलग राज्यों में पहले भी सरकारी जमीन, तालाब, चारागाह और ग्राम समाज की जमीन पर फर्जी तरीके से कब्जा करने या रिकॉर्ड बदलने के मामले सामने आते रहे हैं. हालांकि किसी ‘पहाड़’ को ही कागजों में निजी संपत्ति बनाकर बेचने का मामला बेहद दुर्लभ माना जा रहा है. यही वजह है कि प्रयागराज का यह मामला चर्चा में है.
चीन अपनी टेक ताकत और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग के दम पर ह्यूमनॉइड रोबोट्स यानी इंसानों जैसे दिखने और काम करने वाले रोबोट्स के ग्लोबल हब बनने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका है. फैक्ट्रियों की असेंबली लाइन से लेकर बड़े-बड़े वेयरहाउस तक चीन इन मशीनी इंसानों को असल दुनिया के कामों में उतार रहा है. इसी बूम के बीच चीन की दिग्गज रोबोटिक्स कंपनी Unitree अब IPO की रेस में है. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल आ रहा है कि आखिर चीन रोबोट्स पर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है? क्या वो अमेरिका की टेस्ला जैसी कंपनियों को पछाड़कर रोबोटिक्स का दुनिया में किंग बनने की कोशिश कर रहा है? और क्या ये रोबोट्स सच में हमारी फैक्ट्रियों और आम जिंदगी में एंट्री करने के बहुत ही करीब आ चुके हैं?
चीन की रोबोटिक्स कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स ह्यूमनॉइड रोबोट की रेस में एक बड़ा नाम बनकर उभर रही है. भले ही चीन से बाहर लोग इस कंपनी का नाम ज्यादा न जानते हों, लेकिन इसके रोबोट्स के वीडियो इंटरनेट पर छाए हुए हैं. सुपरह्यूमन जैसे स्टंट और बैकफ्लिप करते यूनिट्री के रोबोट्स को करोड़ों लोग देख चुके हैं. अब यूनिट्री रोबोटिक्स एक बड़ा फाइनेंसियल कदम उठाने जा रही है. अब ये कंपनी शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में अपना IPO लाने की तैयारी में है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, गुरुवार को यूनिट्री ने अपने शेयरों की कीमत लगभग 22 डॉलर प्रति शेयर तय की है, जिससे वह करीब 900 मिलियन डॉलर जुटाने की योजना बना रही है.
9 अरब डॉलर की वैल्यूएशन
इस डील के साथ ही यूनिट्री रोबोटिक्स की वैल्यूएशन करीब 9 अरब डॉलर पहुंच जाएगी. हालांकि, टेक जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह टेक्नोलॉजी सच में एक बड़े बिजनेस में बदल सकती है? भले ही यूनिट्री के रोबोट तेजी से बेहतर हो रहे हैं, लेकिन क्या आने वाले समय में आम लोग और कंपनियां लाखों की संख्या में ये रोबोट खरीदेंगी, यह अभी साफ नहीं है.
रिसर्च फर्म Omdia के एक्सपर्ट्स लियान जी सू के मुताबिक, यूनिट्री का यह स्टॉक सेल पूरे रोबोटिक्स सेक्टर के लिए एक बड़ा टेस्ट साबित होगा. इससे यह समझ आएगा कि शेयर मार्केट ह्यूमनॉइड रोबोट्स जैसे उभरते और शुरुआती टेक सेक्टर को किस नजरिए से देखता है.
फिजिकल AI का बढ़ता मार्केट
रोबोट्स को इंसानों, सामानों, कमरों और डेली के कामों को समझने के लिए असल दुनिया में सीखना पड़ता है. इस टेक्नोलॉजी को एम्बॉडीड एआई या फिजिकल एआई कहा जाता है.
इन्वेस्टमेंट रिसर्च फर्म CLSA की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट साल 2030 तक 69 अरब डॉलर का हो सकता है, जो इस साल मात्र 2 अरब डॉलर के करीब है.
बढ़ती टक्कर और घटता मुनाफा
2026 के पहले क्वाटर में कड़ी टक्कर और कम मांग के कारण यूनिट्री की ग्रोथ थोड़ी धीमी रही. बढ़ती टक्कर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर ज्यादा खर्च करने की वजह से पहली तिमाही में कंपनी का मुनाफा 55% तक कम हो गया.
चीन बनाम अमेरिका: रोबोटिक्स की जंग
यूनिट्री की यह लिस्टिंग इसलिए खास है क्योंकि यह चीन के मेनलैंड स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी है.
चीन रोबोट्स के मास प्रोडक्शन में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है:
Omdia के अनुमान के अनुसार, चीनी निर्माताओं ने इस साल की पहली छमाही में करीब 18,500 ह्यूमनॉइड रोबोट बेचे.
वहीं इस पीरियड में अमेरिकी कंपनियों ने सिर्फ 4,000 रोबोट शिप किए.
अगर चीन इसी रफ्तार से कम लागत में रोबोट बनाता रहा, तो वह अमेरिकी कंपनियों के मास प्रोडक्शन में पहुंचने से पहले ही एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर लेगा. लेकिन, अमेरिका की टेस्ला, Figure AI, एजिलिटी रोबोटिक्स जैसी कंपनियां बड़ा निवेश कर रही हैं. वहीं Nvidia फिजिकल एआई के लिए जरूरी चिप्स और एआई सिस्टम का नेतृत्व कर रही है.
चीन ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स में इतना भारी निवेश क्यों कर रहा है?
चीन रोबोटिक्स सेक्टर में दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनना चाहता है. ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोट मार्केट 2026 में करीब 2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2030 तक 69 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जैसा पहले बताया गया है. चीन चाहता है कि अमेरिका के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू करने से पहले पहले वह कम लागत और तेज स्पीड में रोबोट बनाकर दुनिया के बाजार पर बढ़त बना ले.
यूनिट्री दूसरे चीनी रोबोटिक्स कंपनियों से अलग क्यों है?
यूनिट्री चीन के शेयर मार्केट में लिस्ट होने वाली पहली ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स कंपनी रेस में है. इसके रोबोट्स के वायरल स्टंट्स इंटरनेट पर काफी चर्चा का विषय बने हैं. इसके साथ ही बीते साल 2025 में यूनिट्री ने दुनिया में सबसे ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोट्स बेचे, इसका रेवेन्यू 4 गुना बढ़कर 250 मिलियन डॉलर पहुंचा और यह एक प्रॉफिटेबल यानी लाभ कमाने वाली कंपनी बन गई है.
फैक्ट्रियों और दूसरे बिजनेस में ह्यूमनॉइड रोबोट्स बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने के कितने करीब हैं?
रोबोट्स का हुनर और AI तेजी से सुधर रहा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल होने में अभी समय लग सकता है. हालांकि चीन ने 2026 की पहली छमाही में 18,500 रोबोट्स की डिलीवरी की है, लेकिन कंपनियां और दूसरे कस्टमर्स इन्हें महंगे दामों में खरीदने और रोजाना के काम में इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं या नहीं, यह टेस्ट होना बाकी है.
क्या चीनी कंपनियां अमेरिकी फर्मों को पीछे कर सकती हैं?
चीन के पास प्रोडक्शन की तेजी और सस्ती मैन्युफैक्चरिंग जैसी शक्ति है. इसका उदाहरण है कि साल 2026 के पहले 6 महीनों में चीन ने 18,500 रोबोट बनाए, वहीं अमेरिका ने सिर्फ 4,000. लेकिन अमेरिका के पास बेहतर AI और एडवांस्ड चिप्स की ताकत है. अगर चीन इसी रफ्तार से प्रोडक्शन बढ़ाता रहा, तो वह मैन्युफैक्चरिंग में अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है, लेकिन एआई और सॉफ्टवेयर में अमेरिका अभी भी कड़ी टक्कर दे रहा है.
ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की दौड़ में भारत कहां खड़ा है?
ग्लोबल ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स की रेस में भारत फिलहाल उभरते हुए फेस में है. अमेरिका और चीन जैसे देश एडवांस फिजिकल AI, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग और बड़े पैमाने पर फंडिंग के कारण इस सेक्टर में आगे हैं. हालांकि, भारत सॉफ्टवेयर टैलेंट, स्पेस टेक्नोलॉजी और सर्विस रोबोटिक्स में तेजी से कदम बढ़ा रहा है.
इस सेक्टर में भारत ने ISRO के गगनयान मिशन के लिए AI-संचालित हाफ-ह्यूमनॉइड रोबोट व्योममित्र तैयार किया है, जो गगनयान के अनक्रू टेस्ट मिशनों में हिस्सा लेगा. भारत के पास विश्वस्तरीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और AI रिसर्चर्स का नेटवर्क है, जो Embodied AI तैयार करने में मदद करेगा.
भारत का लक्ष्य तुरंत पश्चिमी या चीनी कंपनियों से सीधे एडवांस दो पैरों वाले इंडस्ट्रियल ह्यूमनॉइड्स में टक्कर लेने के जगत पर अपने स्पेशल तकनीक वाले रोबोट तैयार करना है. IndiaAI मिशन, PLI योजनाओं और IITs में R&D हब्स के विस्तार के साथ भारत इस अंतर को तेजी से छोटा कर रहा है.