Category: Dharam

  • व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    Sendha Namak in Vrat: व्रत से जुड़े अनेक नियम है जिनका ध्यान रखने से व्रत का संकल्प पूरा होता है और पूरा फल प्राप्त होता है. कुछ व्रत में केवल फलाहार किया जाता है तो कुछ व्रत में एक बार भोजन किया जाता है, कुछ व्रत ऐसे होते हैं जिसमें तय समय तक न तो कुछ खाया जाता है और न ही कुछ पीया जाता है. इसी तरह से व्रत के भोजन को लेकर नियम है की सफेद नमक का सेवन व्रत में नहीं करना चाहिए. वहीं, सेंधा नमक का सेवन वर्जित नहीं होता है.

    व्रत उपवास में साधारण नमक के बजाए केवल सेंधा नमक का सेवन किया जाता है. ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सेंधा नमक का उपायोग करने का बड़ा महत्व हैं. आइए यहां जानें सेंधा नमक का किस ग्रह से संबंध है.

    व्रत में सेंधा नमक का ज्योतिषीय महत्व

    मान्यता है कि सेंधा नमक जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इस नमक के उपयोग से ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर करता है. पूजा के समय सात्विक ऊर्जा को बनाए रखने में भी सेधा नमक मदद करता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्रत हों से मिलने वाली ऊर्जा को संतुलित करता है और यह पृथ्वी तत्व से जुड़ा होता है.

    सेंधा नमक का किस ग्रह से है संबंध

    ज्योतिष अनुसार सेंधा नमक का संबंध चंद्रमा और शुक्र ग्रह से है . चंद्रमा मन का कारक है और शुक्र सुख व समृद्धि का कारक है. व्रत के दौरान सेंधा नमक का सेवन करने से कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है और मानसिक तनाव दूर होता है. बेचैनी या निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है. शुक्र ग्रह मजबूत होता है और धन वृद्धि होता है.

    व्रत में सेंधा नमक का धार्मिक महत्व

    वहीं धार्मिक मान्यता है कि इसके अलावा सकारात्मकता बनाए रखने में सेंधा नमक मदद करता है. साधारण नमक को कई प्रक्रिया से तैयार किया जाता है. जिससे इस नमक उतना शुद्ध नहीं माना जाजा है. यही कारण है कि व्रत और पूजा में सेंधा नमक के उपयोग को मान्यता दी जाती है. इसके सेवन से मन शांत रहता है और भक्ति भाव करने में ध्यान लगता है. सेंधा नमक सात्विक आहार का भाग होता है.

    व्रत में सेंधा नमक से जुड़ी धार्मिक मान्यता

    पुराणों और धार्मिक परंपराओं में बताया जाता है कि व्रत का भोजन सरल और प्राकृतिक होना चाहिए. यह पुण्य प्राप्ति का रास्ता हो सकता है. सेंधा नमक प्राकृतिक रूप से चट्टानों से आते हैं. इसी कारण इसे शुद्ध माना जाता है. एकादशी, नवरात्रि, महाशिवरात्रि, सोमवार से लेकर अन्य कई व्रतों में सेंधा नमक का उपयोग किया जाता रहा है.

    (डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)

  • Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    जुलाई 2026 में शनि की वक्री चाल और गुरु का अस्त होना कई राशियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. जिससे जातकों को धन और करियर के मामले में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

    Shani-Guru Gochar 2026: द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार 30 जुलाई 2026, गुरुवार से सावन की शुरुआत होने वाली है. ज्योतिषियों की मानें तो, इस वर्ष सावन बहुत ही विशेष माना जा रहा है. दरअसल, सावन में गुरु अस्त और शनि वक्री यानी उल्टी चाल चलेंगे. जो कई राशियों के लिए अद्भुत और कुछ के लिए खतरनाक मानी जा रही है. द्रिक पंचांग के अनुसार, शनि 26 जुलाई से वक्री हो जाएंगे. शनि की उल्टी चाल का असर कई राशियों के जीवन में उतार-चढ़ाव ला सकता है. इस समय लोगों को अपने कामों में सावधानी बरतने की जरूरत होगी.

    वहीं, गुरु 15 जुलाई को अस्त हो जाएंगे. गुरु को ज्ञान, धन और संतान का कारक माना जाता है. इनके अस्त होने से शुभ कार्यों, खासकर विवाह जैसे मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. इस दौरान शादी-विवाह जैसे आयोजन नहीं किए जाते हैं. राहु और केतु की स्थिति इस महीने स्थिर रहेगी, इनमें कोई बदलाव नहीं होगा. तो आइए पंडित अरुणेश कुमार शर्मा जी से जानते हैं कि सावन में शनि और गुरु की बदली चाल कौन सी राशियों पर बुरा प्रभाव डालेगी. 

    वृषभ राशि

    वृषभ राशि वालों के लिए यह समय खर्चों से भरा रह सकता है. अचानक आने वाले खर्च आपको परेशान कर सकते हैं. हालांकि, कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिलेंगे, जिससे धीरे-धीरे स्थिति संभलने लगेगी और आप राहत महसूस करेंगे.

    सिंह राशि

    सिंह राशि के जातकों को नौकरी और करियर में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. संभव है कि आप नौकरी बदलने का विचार करें. इस समय अपने काम में पारदर्शिता रखना बहुत जरूरी होगा. खर्चों को नियंत्रित करने की कोशिश करें और कोई भी बड़ा फैसला सोच-समझकर लें.

    कुंभ राशि

    कुंभ राशि वालों के लिए यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है. आपकी योजनाएं उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं देंगी. ऐसे में धैर्य रखना बेहद जरूरी है. जल्दबाजी करने से बचें और अपने काम को धीरे-धीरे आगे बढ़ाएं. पैसों के मामले में सावधानी रखें और किसी को उधार देने से बचें.

  • धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    वास्तु शास्त्र में घर की उत्तर दिशा को धन और समृद्धि से जोड़ा जाता है. इसे कुबेर कॉर्नर भी कहा जाता है. यदि इस स्थान को सही तरीके से व्यवस्थित रखा जाए और कुछ सरल उपाय अपनाएं तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बेहतर माना जाता है.

    धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    धन से जुड़े दस्तावेज, तिजोरी या लॉकर को घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखकर उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है. (Photo: ITG)

    घर की उत्तर दिशा को कुबेर कॉर्नर कहा जाता है. यह स्थान धन के देवता भगवान कुबेर का माना जाता है. मान्यता है कि यदि इस दिशा को साफ-सुथरा, हल्का और व्यवस्थित रखा जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बेहतर बना रहता है. साथ ही, धन की आवक भी अच्छी रहती है. इसलिए इस हिस्से की देखभाल को विशेष महत्व दिया जाता है. आइए आपको इस दिशा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हैं.

    साफ-सफाई
    वास्तु के अनुसार, उत्तर दिशा में अनावश्यक सामान, कबाड़ या भारी वस्तुएं जमा नहीं करनी चाहिए. इस स्थान पर अव्यवस्था रहने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है. यदि यह हिस्सा खुला, स्वच्छ और व्यवस्थित रहेगा तो वातावरण अधिक संतुलित और सुखद महसूस हो सकता है.

    तिजोरी और कुबेर यंत्र
    धन से जुड़े दस्तावेज, तिजोरी या लॉकर को घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखकर उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है. वहीं, उत्तर दिशा में कुबेर यंत्र स्थापित करने की भी सलाह दी जाती है. मान्यता है कि इससे समृद्धि और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा को बल मिलता है.

    ये चीजें रखने से भी होगा लाभ
    वास्तु के अनुसार, उत्तर दिशा में छोटे फव्वारे, एक्वेरियम, दर्पण  (आईना) या नीले, हरे और बैंगनी रंग की सजावटी चीजें (डेकॉर आइटम) रखना भी शुभ माना जाता है. इनका उद्देश्य घर के वातावरण में संतुलन और ताजगी बनाए रखना होता है. हालांकि, इनका उपयोग साफ-सफाई और उचित स्थान के साथ ही करना चाहिए.

    इस दिशा में न करें ये गलतियां
    यदि घर की उत्तर दिशा में बाथरूम बना है तो इसे वास्तु के अनुसार आदर्श स्थिति नहीं माना जाता है. ऐसे में छोटे दर्पण या इनडोर प्लांट जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा, इस हिस्से में भारी स्टोरेज, बेकार सामान या लंबे समय से अनुपयोगी वस्तुएं रखने से बचना चाहिए, ताकि यह स्थान सक्रिय और व्यवस्थित बना रहे.

  • श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    जब एक उग्र हाथी भी हरिनाम सुनकर भगवान का भक्त बन गया

    प्रमाणिक आधार: यह कथा रसिक-मंगल, भक्ति-रत्नाकर तथा गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्राचीन जीवन-चरित्रों में वर्णित है।

    जन्म और बाल्यकाल

    श्री रसिकानंद प्रभु का जन्म सन् 1590 के आसपास उड़ीसा के रोहिणी क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित वैष्णव परिवार में हुआ। उनका बाल्यकाल का नाम रसिक मुरारी था।

    बचपन से ही उनका मन खेल-कूद में कम और भगवान श्रीकृष्ण के नाम, भजन और संतों की सेवा में अधिक लगता था। वे घंटों श्रीमद्भागवत सुनते और हरिनाम का कीर्तन करते थे।

    उनके माता-पिता समझ गए कि यह बालक साधारण नहीं है, बल्कि भगवान की विशेष कृपा का पात्र है।


    गुरु की खोज

    युवावस्था में उनके हृदय में एक ही इच्छा थी—

    “मुझे ऐसा गुरु मिले जो मुझे श्रीराधा-कृष्ण की निष्कपट भक्ति का मार्ग दिखाए।”

    उसी समय उन्हें ज्ञात हुआ कि श्री श्यामानंद प्रभु उड़ीसा में श्रीकृष्ण-भक्ति का प्रचार कर रहे हैं।

    रसिक मुरारी उनके दर्शन के लिए पहुँचे।

    जैसे ही उन्होंने श्यामानंद प्रभु को देखा, उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे।

    उन्होंने गुरु के चरणों में गिरकर कहा—

    “गुरुदेव! मेरा जीवन श्रीकृष्ण की सेवा के बिना व्यर्थ है। कृपया मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”

    श्यामानंद प्रभु ने उनके विनम्र स्वभाव और गहरी भक्ति को देखकर उन्हें दीक्षा दी।

    दीक्षा के बाद उनका नाम श्री रसिकानंद रखा गया।


    श्रीनाम का प्रचार

    गुरु की आज्ञा से रसिकानंद प्रभु ने उड़ीसा, बंगाल और झारखंड के अनेक गाँवों में श्रीनाम-संकीर्तन का प्रचार आरंभ किया।

    वे जहाँ भी जाते, वहाँ हरिनाम-संकीर्तन, भागवत कथा और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का संदेश देते।

    उनकी मधुर वाणी और प्रेमपूर्ण व्यवहार से हजारों लोग वैष्णव धर्म की ओर आकर्षित हुए।


    उग्र हाथी का चमत्कार

    उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणिक घटना एक उग्र हाथी से जुड़ी है।

    उस समय एक राजा के पास अत्यंत क्रूर और हिंसक हाथी था।

    वह हाथी इतना उग्र था कि अनेक लोगों को घायल कर चुका था। कोई भी उसके पास जाने का साहस नहीं करता था।

    राजा ने जब रसिकानंद प्रभु की महिमा सुनी, तो कुछ लोगों ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया।

    उन्होंने उस क्रोधित हाथी को रसिकानंद प्रभु की ओर छोड़ दिया।

    जब विशाल हाथी गर्जना करता हुआ उनकी ओर दौड़ा, तब वहाँ उपस्थित लोग भय से भागने लगे।

    लेकिन रसिकानंद प्रभु शांत खड़े रहे।

    उन्होंने अपने हाथ में तुलसी की माला लेकर प्रेमपूर्वक कहा—

    “हे कृष्ण के जीव! तुम भी भगवान के हो। श्रीकृष्ण का नाम लो।”

    फिर उन्होंने हरिनाम का कीर्तन आरंभ किया—

    “हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे।”

    वैष्णव ग्रंथों में वर्णित है कि जैसे ही हाथी ने हरिनाम सुना, उसका क्रोध शांत हो गया।

    वह धीरे-धीरे रसिकानंद प्रभु के पास आया, उनके चरणों में सूंड रखकर बैठ गया और शांत हो गया।

    रसिकानंद प्रभु ने उसके मस्तक पर हाथ रखा और उसे भगवान का प्रसाद दिया।

    यह दृश्य देखकर राजा और उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।

    अनेक लोगों ने उसी दिन श्रीकृष्ण-भक्ति को स्वीकार किया।


    अंतिम जीवन

    रसिकानंद प्रभु ने अपने जीवनभर हजारों लोगों को हरिनाम, गुरु-भक्ति और श्रीराधा-कृष्ण की प्रेम-भक्ति का उपदेश दिया।

    उन्होंने अनेक मंदिरों की स्थापना की, वैष्णवों की सेवा की और गुरु श्री श्यामानंद प्रभु की शिक्षाओं का प्रचार किया।

    आज भी उड़ीसा और बंगाल में उनके अनेक मंदिर और स्मृति-स्थल विद्यमान हैं, जहाँ भक्त बड़ी श्रद्धा से उनके चरणों का स्मरण करते हैं।


    कथा से शिक्षा

    • हरिनाम में इतनी शक्ति है कि वह हिंसक हृदय को भी शांत कर सकता है।
    • गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला भक्त भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करता है।
    • प्रेम और करुणा से संसार का सबसे कठोर मन भी बदल सकता है।
    • श्रीकृष्ण का नाम केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, समस्त जीवों के कल्याण का साधन है।

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे
    🙏

  • सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    गरुड़ पुराण – भाग 1

    गरुड़ पुराण के पूर्व खंड में भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं गरुड़ जी को सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य बताते हैं। यह वर्णन केवल संसार की रचना का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भी समझाता है कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और इस जीवन का उद्देश्य क्या है।

    1. सृष्टि से पहले क्या था?

    भगवान विष्णु कहते हैं कि एक समय ऐसा था जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा, न दिन था और न रात। न देवता थे, न मनुष्य, न पर्वत, न समुद्र। चारों ओर केवल अनंत जल और परमब्रह्म भगवान नारायण का अस्तित्व था।

    उन्हीं की इच्छा से सृष्टि की रचना का संकल्प हुआ। भगवान की योगमाया सक्रिय हुई और सृष्टि का आरंभ प्रारंभ हुआ।

    शास्त्रीय प्रमाण

    “नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।
    अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी॥”

    भावार्थ: भगवान नारायण अव्यक्त प्रकृति से भी परे हैं। उन्हीं से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई और उसी ब्रह्मांड में सभी लोक तथा पृथ्वी की रचना हुई।


    2. ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई?

    भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल पर चतुर्मुख ब्रह्माजी का जन्म हुआ। प्रारंभ में ब्रह्माजी अपने जन्म का कारण नहीं समझ सके। उन्होंने कमल की डंडी के मूल तक पहुँचने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुए।

    तब उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की। भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देकर सृष्टि की रचना का ज्ञान प्रदान किया। उनके आदेश से ब्रह्माजी ने चौदह लोकों, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और समस्त चराचर जगत की रचना की।


    3. पंचमहाभूतों की उत्पत्ति

    गरुड़ पुराण के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि पाँच मूल तत्वों से बनी है, जिन्हें पंचमहाभूत कहा जाता है।

    आकाश – सबसे पहले आकाश की उत्पत्ति हुई, जिससे ध्वनि प्रकट हुई।

    वायु – आकाश से वायु उत्पन्न हुई, जिससे स्पर्श का अनुभव संभव हुआ।

    अग्नि – वायु से अग्नि प्रकट हुई, जिससे प्रकाश और रूप की उत्पत्ति हुई।

    जल – अग्नि से जल उत्पन्न हुआ, जिससे रस और जीवन का आधार बना।

    पृथ्वी – जल से पृथ्वी प्रकट हुई, जिसमें गंध का गुण समाहित हुआ और समस्त जीवों के रहने योग्य संसार बना।

    हमारा शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित है। मृत्यु के बाद यही शरीर पुनः इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा सनातन है।


    4. भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव की भूमिका

    गरुड़ पुराण में त्रिदेवों की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से बताई गई हैं।

    भगवान विष्णु – सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और समस्त ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी इच्छा से ही सृष्टि का आरंभ होता है।

    ब्रह्माजी – भगवान विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना करते हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, लेकिन सर्वोच्च परमात्मा नहीं।

    भगवान शिव – जब सृष्टि का एक चक्र पूर्ण हो जाता है, तब भगवान शिव संहार की लीला करते हैं, जिससे नई सृष्टि के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। उनका संहार विनाश नहीं, बल्कि पुनः सृजन की तैयारी है।

    इस प्रकार सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार तीनों कार्य ईश्वर की दिव्य व्यवस्था के अंतर्गत चलते हैं।


    5. समय चक्र और कल्पों का वर्णन

    गरुड़ पुराण बताता है कि समय कभी रुकता नहीं। ब्रह्मांड एक निश्चित चक्र में चलता है।

    चार युग होते हैं—

    • सतयुग
    • त्रेतायुग
    • द्वापरयुग
    • कलियुग

    इन चारों युगों का एक चक्र महायुग कहलाता है। ऐसे एक हजार महायुग मिलकर ब्रह्माजी का एक दिन अर्थात एक कल्प बनाते हैं। जब ब्रह्माजी का दिन समाप्त होता है, तब आंशिक प्रलय होती है। पुनः उनके दिन के आरंभ में नई सृष्टि का विस्तार होता है।

    ब्रह्माजी के सौ वर्ष पूर्ण होने पर महाप्रलय होती है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान में लीन हो जाता है। समय के इस अनंत चक्र में सृष्टि बार-बार उत्पन्न होती है और पुनः विलीन हो जाती है।


    इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    • भगवान ही सम्पूर्ण सृष्टि के आदि और अंतिम कारण हैं।
    • हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है और एक दिन इन्हीं में मिल जाएगा।
    • केवल आत्मा ही शाश्वत है, इसलिए शरीर के बजाय आत्मा के कल्याण पर ध्यान देना चाहिए।
    • धन, पद और अहंकार सब यहीं रह जाते हैं; केवल कर्म ही आत्मा के साथ जाते हैं।
    • इसलिए मनुष्य को धर्म, सत्य, सेवा और भगवान के नाम-स्मरण में जीवन बिताना चाहिए।

    अगले भाग में:
    भगवान विष्णु की महिमा – क्यों उन्हें जगत का पालनकर्ता और परम पुरुष कहा गया है?

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे

  • इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    हमारे शास्त्रों और पुराणों में भोजन को लेकर कई जरूरी नियम बताए गए हैं. सनातन धर्म में माना जाता है कि जैसा अन्न होता है, वैसा ही हमारा मन बनता है. गरुड़ पुराण में विशेष तौर पर बताया गया है कि हमें हर किसी के घर का खाना नहीं खाना चाहिए.

    कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके घर का भोजन करने से आपके पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं. इतना ही नहीं, इससे आपकी उम्र भी कम हो सकती है और आपको पाप का भागी बनना पड़ता है. आइए जानते हैं कि गरुड़ पुराण के अनुसार वे कौन से 4 तरह के लोग हैं जिनके घर भूलकर भी खाना नहीं खाना चाहिए.

    ब्याजखोर या सूदखोर का खाना

    इस सूची में पहला नाम उन लोगों का आता है जो गलत तरीके से ब्याज का धंधा करते हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाकर भारी ब्याज वसूलता है, उसका धन अशुद्ध होता है.

    ऐसे सूदखोर का मुख्य मकसद दूसरों को परेशान करके पैसा कमाना होता है. जब आप ऐसे किसी इंसान के घर का खाना खाते हैं, तो उनकी नकारात्मक ऊर्जा आपके भीतर चली जाती है.

    इससे आपके विचार भी दूषित होने लगते हैं और आपके संचित पुण्य धीरे-धीरे घटने लगते हैं. इसलिए मेहनत की कमाई का ही भोजन स्वीकार करना चाहिए.

    चोर या बेईमान के घर का भोजन

    दूसरा नियम चोर, डाकू या बेईमानी से पैसा कमाने वाले लोगों के लिए है. जो व्यक्ति दूसरों का हक मारकर या चोरी करके अपना घर चलाता है, उसके घर में कभी भी सकारात्मकता नहीं हो सकती.

    ऐसे लोगों के घर में बनने वाले भोजन में रोने-धोने और बेबसी की बददुआएं शामिल होती हैं. यदि आप जानते हुए भी किसी चोर या अपराधी के घर का खाना खाते हैं, तो शास्त्रों के अनुसार आप भी उनके पाप में हिस्सेदार बन जाते हैं.

    ये अन्न आपके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है और आपकी आयु को कम करता है.

    गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति

    तीसरी स्थिति किसी ऐसे व्यक्ति की है जो लंबे समय से किसी गंभीर या संक्रामक बीमारी से पीड़ित हो. गरुड़ पुराण में व्यावहारिक कारणों से भी ऐसे घर में भोजन करने से मना किया गया है.

    जो व्यक्ति बहुत बीमार है, उसके आसपास का वातावरण और हवा कीटाणुओं से भरी हो सकती है. पुराने समय में चिकित्सा व्यवस्था आज जैसी नहीं थी, इसलिए संक्रमण से बचने के लिए ये नियम बनाया गया था.

    बीमार व्यक्ति के घर का खाना खाने से आप भी उस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं, जिससे आपकी सेहत बिगड़ सकती है और उम्र घट सकती है.

    किन्नरों के हाथ का भोजन

    चौथा और बेहद महत्वपूर्ण नियम किन्नरों के घर भोजन करने से जुड़ा हुआ है. शास्त्रों में बताया गया है कि किन्नरों को दान देना सबसे उत्तम और पुण्यदायी कार्य माना जाता है.

    उन्हें कपड़े, पैसे और अनाज दान करने से घर में बरकत आती है. लेकिन गरुड़ पुराण के अनुसार, किन्नरों के घर पर जाकर भोजन करने की मनाही है. इसके पीछे कारण ये है कि किन्नरों को समाज में कई तरह के अच्छे-बुरे लोग दान देते हैं.

    उनके पास आने वाले धन में हर तरह के लोगों की ऊर्जा शामिल होती है, इसलिए उनके येां भोजन करने से बचना चाहिए.

  • यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    मौत एक ऐसा सच है जिससे कोई भी बच नहीं सकता. गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद की स्थितियों के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है. आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी इंसान का अंत समय आता है, तो यमराज के दूत यानी यमदूत उसे लेने आते हैं.

    गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूतों का रूप बहुत भयानक होता है और वे पापियों को बेरहमी से घसीटते हुए ले जाते हैं. लेकिन इसी पुराण में एक बेहद गुप्त और खास नियम का भी जिक्र मिलता है.

    शास्त्रों के अनुसार 3 तरह के लोग ऐसे होते हैं जिनके पास आने की हिम्मत यमराज के दूत भी नहीं कर पाते. यमदूत इन खास लोगों को कभी हाथ तक नहीं लगाते, बल्कि इनके प्राण लेने के लिए खुद भगवान के दिव्य पार्षद आते हैं. आइए जानते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार कौन से हैं वे खुशकिस्मत लोग.

    प्रभु भक्ति में लीन रहने वाले सच्चे भक्त

    इस सूची में पहला नाम उन लोगों का आता है जो अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति और सिमरन में बिता देते हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार जो व्यक्ति हर समय भगवान का नाम लेता है, उसका अंत समय बहुत शांति से कटता है.

    ऐसे लोगों के मन में मृत्यु का कोई डर नहीं होता. जब उनकी सांसें खत्म होने वाली होती हैं, तो यमराज के भयानक दूत उनके आसपास भी नहीं फटकते. प्रभु का नाम जपने वाले इन लोगों के प्राण हरने के लिए सीधे वैकुंठ धाम से विष्णुदूत आते हैं. वे बहुत सुंदर और शांत रूप में प्रकट होते हैं. वे इन भक्तों की आत्मा को बहुत आदर के साथ अपने दिव्य विमान में बैठाकर ले जाते हैं.

    निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने वाले

    दूसरा नियम उन लोगों के लिए है जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं. शास्त्रों में बताया गया है कि भूखों को खाना खिलाना, बीमारों की सेवा करना और बेसहारा लोगों को आश्रय देना सबसे बड़ा धर्म है.

    जो इंसान बिना किसी लालच के समाज की भलाई करता है, उसके खाते में अपार पुण्य जमा हो जाते हैं. ऐसे दयालु लोगों के पास जाने से यमदूत खुद कतराते हैं.

    यमराज के दूतों को केवल उन लोगों को ले जाने का अधिकार है जिन्होंने जीवन भर दूसरों को सताया हो. दूसरों के आंसू पोंछने वाले परोपकारी लोगों का स्वागत करने के लिए स्वर्ग के देवता खुद आते हैं.

    सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले इंसान

    तीसरी स्थिति उन लोगों की है जो जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएं, कभी झूठ और बेईमानी का रास्ता नहीं चुनते. गरुड़ पुराण के अनुसार सत्य बोलना और अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना भी एक बहुत बड़ी तपस्या है.

    जो लोग माता पिता की सेवा करते हैं, किसी का दिल नहीं दुखाते और धर्म के नियमों का पालन करते हैं, उन्हें यमराज का भय नहीं सताता. यमदूत ऐसे ईमानदार और साफ दिल वाले लोगों को दूर से ही प्रणाम करते हैं.

    इनके प्राण निकलते समय इन्हें बिल्कुल भी दर्द नहीं होता. इनकी आत्मा को सीधे मोक्ष या उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है.

    अच्छे कर्मों का मिलता है ये दिव्य फल

    इस तरह गरुड़ पुराण की यह बातें हमें जीवन को सही दिशा में जीने का संदेश देती हैं. मृत्यु से डरने की बजाय हमें अपने आज के कर्मों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. जो इंसान लालच, नफरत और धोखेबाजी से दूर रहता है, उसका अंत समय अपने आप सुधर जाता है.

    यमदूतों का खौफ सिर्फ उन्हीं के लिए है जो बुरे कामों में डूबे रहते हैं. अगर हमारा मन साफ है और हम भगवान पर भरोसा रखते हैं, तो यमराज के दूत हमारे लिए कोई मायने नहीं रखते. अच्छे कर्म करने वालों को अंत में यमदूतों की यातनाएं नहीं बल्कि ईश्वर की शरण मिलती है.

  • जीवन के अंतिम 24 घंटे कैसे होते हैं? गरुड़ पुराण की मान्यताओं में छिपा है जवाब..

    जीवन के अंतिम 24 घंटे कैसे होते हैं? गरुड़ पुराण की मान्यताओं में छिपा है जवाब..

    जीवन के अंतिम 24 घंटे कैसे होते हैं? गरुड़ पुराण की मान्यताओं में छिपा है जवाब..

    गरुड़ पुराण में इंसान की मौत और उसके बाद के सफर के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है. इस ग्रंथ के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मौत का समय करीब आता है, तो उसके शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं.

    आत्मा के शरीर छोड़ने से ठीक एक दिन यानी 24 घंटे पहले इंसान का शरीर अपने आप कुछ संकेत देने लगता है. सबसे बड़ा बदलाव ये होता है कि व्यक्ति की सभी ज्ञानेंद्रियां धीरे धीरे काम करना बंद कर देती हैं. उसकी आंखें, कान, नाक, जीभ और त्वचा की शक्ति खत्म होने लगती है.

    आंखों की रोशनी

    मौत के ठीक एक दिन पहले इंसान की आंखों की रोशनी सबसे पहले धुंधली होने लगती है. उसे अपने आस पास बैठे लोग और चीजें साफ़ दिखाई नहीं देती हैं. गरुड़ पुराण के मुताबिक ऐसे समय में इंसान को अपने पास खड़े लोग भी नजर नहीं आते हैं.

    उसे हर तरफ सिर्फ अंधेरा या फिर कुछ अजीब सी परछाइयां दिखने लगती हैं. इसके साथ ही उसकी बोलने की क्षमता भी खत्म हो जाती है. वह कुछ कहना भी चाहे तो उसकी आवाज गले में ही अटक कर रह जाती है और मुंह से सिर्फ थरथराहट निकलती है.

    आंखों के सामने तैरने लगते हैं कर्म

    दूसरा बड़ा रहस्य यह है कि मरते हुए व्यक्ति को अपने जीवन के अच्छे और बुरे काम एक फिल्म की तरह दिखने लगते हैं. अंतिम समय में इंसान की याददाश्त बहुत तेज हो जाती है. उसने बचपन से लेकर बुढ़ापे तक जो भी कर्म किए होते हैं, वे सब उसकी आंखों के सामने तैरने लगते हैं.

    इस दौरान उसने किसे दुख पहुंचाया और कहां पुण्य कमाया, यह सब उसे याद आता है. अपने बुरे कर्मों को देखकर आत्मा अंदर ही अंदर छटपटाने लगती है और उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर साफ देखा जा सकता है.

    शरीर से आती है महक

    शारीरिक बदलावों की बात करें तो मौत से 24 घंटे पहले इंसान के शरीर से एक खास तरह की महक आने लगती है. इसे वैज्ञानिक भाषा में शरीर के अंगों का काम बंद करना कहते हैं, लेकिन गरुड़ पुराण इसे यम के दूतों के आने का संकेत मानता है.

    इस समय इंसान की सांसें बहुत भारी हो जाती हैं. उसकी जीभ धीरे धीरे उलटने लगती है और तालू से चिपकने का प्रयास करती है. इंसान पानी की एक एक बूंद के लिए तरसने लगता है क्योंकि उसका पूरा गला और मुंह अंदर से सूख जाता है.

    शरीर पड़ जाता है ठंडा

    आखिरी समय में इंसान की भूख और प्यास पूरी तरह से खत्म हो जाती है. उसका शरीर धीरे धीरे ठंडा पड़ने लगता है. सबसे पहले पैर के पंजे और हाथ ठंडे होते हैं और फिर यह ठंडक दिल तक पहुंचती है.

    यमराज के दूत आते हैं नजर

    गरुड़ पुराण कहता है कि जब आत्मा शरीर छोड़ने के बिल्कुल करीब होती है, तो उसे यमराज के दूत नजर आने लगते हैं. उन्हें देखकर इंसान बहुत ज्यादा डर जाता है और उसकी आंखें ऊपर की तरफ खिंच जाती हैं. इसके ठीक बाद आत्मा पूरी तरह से शरीर को छोड़कर अपने नए सफर पर निकल जाती है.

  • कर्मों का हिसाब तय करता है अगला जन्म! जानें किसे मिलता है मनुष्य और किसे पशु-पक्षी का शरीर..

    कर्मों का हिसाब तय करता है अगला जन्म! जानें किसे मिलता है मनुष्य और किसे पशु-पक्षी का शरीर..

    कर्मों का हिसाब तय करता है अगला जन्म! जानें किसे मिलता है मनुष्य और किसे पशु-पक्षी का शरीर..

    गरुड़ पुराण में हमारे आज के जीवन और मौत के बाद मिलने वाले अगले जन्म को लेकर बहुत ही चौंकाने वाली बातें बताई गई हैं. इस महाग्रंथ के अनुसार, हमारा अगला जन्म कैसा होगा, यह कोई लॉटरी का खेल नहीं है बल्कि यह हमारे आज के कर्मों से तय होता है.

    हम अपने इस जीवन में जो भी अच्छे या बुरे काम करते हैं, उनका पूरा हिसाब किताब रखा जाता है. गरुड़ पुराण साफ कहता है कि इंसान जीते जी ही अपने अगले जन्म की तैयारी कर लेता है. आपके कर्म ही ये फैसला करते हैं कि आप मरने के बाद दोबारा इंसान बनेंगे, या फिर किसी पशु पक्षी की योनि में भटकेंगे.

    धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोग

    ग्रंथ के अनुसार, जो लोग अपने जीवन में हमेशा दूसरों की मदद करते हैं, धर्म के रास्ते पर चलते हैं और कभी किसी का दिल नहीं दुखाते, उन्हें दोबारा मनुष्य का जीवन मिलता है. ऐसे पुण्य आत्माओं को अगले जन्म में एक अच्छे परिवार में जन्म लेने का मौका मिलता है, जहां उन्हें सुख सुविधाएं और मान सम्मान प्राप्त होता है.

    लेकिन इसके उलट, जो लोग जीवन भर सिर्फ लालच, धोखाधड़ी, चोरी और दूसरों को सताने में लगे रहते हैं, उनका अगला जन्म बहुत कष्टकारी होता है. ऐसे लोगों को इंसानी चोला छोड़कर पशु या पक्षी के रूप में धरती पर आना पड़ता है.

    अन्न या धन की चोरी करने वाले लोग

    गरुड़ पुराण में कर्मों के हिसाब से कुछ खास सजाएं और जन्म भी बताए गए हैं. जैसे, जो इंसान हमेशा दूसरों के अन्न या धन की चोरी करता है, वह अगले जन्म में चूहा या नेवला बनता है.

    वहीं, जो लोग अपने माता पिता, गुरु या बुजुर्गों का अनादर करते हैं, उन्हें अगले जन्म में कौआ या कोई दूसरा ऐसा पक्षी बनना पड़ता है जिसे लोग देखना पसंद नहीं करते.

    इसके अलावा, जो पुरुष हमेशा पराई महिलाओं पर बुरी नजर रखते हैं या किसी के साथ विश्वासघात करते हैं, गरुड़ पुराण के मुताबिक वे अगले जन्म में भयानक अजगर या रेंगने वाले जीव बनते हैं.

    दूसरों की कमाई पर ऐश करने वाले लोग

    इसी तरह, जो लोग बहुत ज्यादा आलसी होते हैं, बिना मेहनत किए दूसरों की कमाई पर ऐश करते हैं, वे अगले जन्म में गधा या बैल बनते हैं ताकि वे कड़ी मेहनत का मतलब समझ सकें.

    जो लोग अपने पद और ताकत का घमंड दिखाकर कमजोरों पर जुल्म करते हैं, उन्हें अगले जन्म में हिंसक पशु जैसे शेर या भेड़िया बनना पड़ता है, जहां उन्हें खुद सर्वाइवल के लिए दर दर भटकना पड़ता है.

    हिंसक स्वाभाव के लोग

    गरुड़ पुराण यह समझाता है कि प्रकृति हर इंसान को उसके स्वभाव के हिसाब से ही अगला शरीर देती है. अगर आपका स्वभाव हिंसक है, तो आपको जानवर का शरीर मिलेगा और अगर आप शांत और परोपकारी हैं, तो आप फिर से इंसान बनेंगे.

    यह पूरी व्यवस्था हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सुधारने के लिए बताई गई है. गरुड़ पुराण का असली संदेश यही है कि इंसान का शरीर बहुत मुश्किल से मिलता है और हमें इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए.

    हम आज जो भी कर रहे हैं, वह हमारे आने वाले कल की नींव रख रहा है. इसलिए, अगर हम चाहते हैं कि हमारा अगला जन्म भी सुखद और बेहतर हो, तो हमें आज ही से अपने कर्मों को सुधारना होगा.

    लोभ, मोह और नफरत को छोड़कर प्रेम और दया का रास्ता अपनाना होगा, क्योंकि अंत में सिर्फ हमारे कर्म ही हमारे साथ जाते हैं.

  • शाम को झाड़ू लगाना शुभ है या अशुभ? जानिए गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं का दृष्टिकोण…

    शाम को झाड़ू लगाना शुभ है या अशुभ? जानिए गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं का दृष्टिकोण…

    शाम को झाड़ू लगाना शुभ है या अशुभ? जानिए गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं का दृष्टिकोण…

    हमारे घरों में बड़े बुजुर्ग अक्सर कुछ छोटी छोटी बातों पर टोक देते हैं. जैसे ही शाम होती है, दादी या मम्मी कहती हैं कि अब घर में झाड़ू मत लगाओ. बचपन में हमें ये बात सिर्फ एक नॉर्मल नियम लगती थी.

    लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा धार्मिक रहस्य छिपा है. शास्त्रों में शाम के बाद झाड़ू लगाने को बहुत ही अशुभ माना गया है. ये एक ऐसी गलती है जो अच्छे खासे अमीर इंसान को भी पल भर में कंगाल बना सकती है.

    क्यों नहीं लगाना चाहिए झाड़ू?

    सनातन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ गरुड़ पुराण में इस बात का खुलकर जिक्र मिलता है. गरुड़ पुराण के अनुसार, सूर्यास्त यानी सूरज डूबने के बाद घर का माहौल बदलने लगता है. दिनभर की भागदौड़ के बाद घर में एक सकारात्मक ऊर्जा यानी पॉजिटिविटी इकट्ठा होती है.

    जब हम रात के समय या अंधेरा होने के बाद घर में झाड़ू लगाते हैं, तो वह अच्छी ऊर्जा घर से बाहर निकल जाती है. घर की सुख शांति को बनाए रखने के लिए इस पॉजिटिव एनर्जी का घर में रहना बहुत जरूरी होता है.

    माता लक्ष्मी के घर में प्रवेश करने का समय

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शाम का समय माता लक्ष्मी के घर में प्रवेश करने का होता है. इस समय को बहुत पवित्र माना जाता है. जब मां लक्ष्मी आपके घर में सुख समृद्धि देने आ रही हों, और आप उसी समय झाड़ू लगाकर गंदगी बाहर फेंक रहे हों, तो मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं.

    रूठी हुई लक्ष्मी कभी भी उस घर में नहीं ठहरतीं. धन की देवी के नाराज होकर चले जाने से घर में पैसों की भारी तंगी शुरू हो जाती है. आपकी जमा पूंजी भी धीरे धीरे खत्म होने लगती है.

    दरिद्रता का वास

    गरुड़ पुराण कहता है कि रात में झाड़ू लगाने से घर में दरिद्रता का वास होने लगता है. दरिद्रता यानी दुखों, बीमारियों और कंगाली का घर में आना. कई बार लोग अनजाने में रात को सफाई करते हैं और सारा कूड़ा घर से बाहर फेंक देते हैं.

    ऐसा करने से घर का सौभाग्य भी कूड़े के साथ बाहर चला जाता है. इसके बाद घर के सदस्यों के बीच झगड़े बढ़ने लगते हैं. बेवजह के खर्चे सामने आने लगते हैं. इंसान पाई पाई के लिए मोहताज होने लगता है.

    इसलिए भाई, अगर आप भी अपनी लाइफ में खुशहाली और बरकत चाहते हैं, तो इस बात का ध्यान जरूर रखें. शाम होने से पहले ही घर की साफ सफाई का सारा काम निपटा लें. अगर किसी मजबूरी के कारण रात में झाड़ू लगाना ही पड़ जाए, तो कूड़े को रात में घर से बाहर बिल्कुल न फेंकें.

    उसे घर के ही किसी कोने में इकट्ठा करके रख दें और सुबह होने पर बाहर डालें. इस छोटे से नियम को मानकर आप अपने घर की लक्ष्मी और खुशियों को हमेशा के लिए संभाल कर रख सकते हैं.