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  • किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    जब बॉडी को हेल्दी रखने के लिए हेल्दी डाइट का जिक्र आता है तो फलों को सबसे बेहतरीन और हेल्दी विकल्प माना जाता है। लेकिन आप जानते हैं कि इन हेल्दी फलों का सेवन भी तब तक हेल्दी है जबतक आपकी बॉडी में कोई मेडिकल कंडीशन नहीं है। जी हां, अगर किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज बॉडी को हेल्दी रखने के लिए लगातार फलों का सेवन करते हैं तो उनकी बॉडी को फायदे की जगह नुकसान पहुंच सकता है। किडनी मरीजों के लिए पोटैशियम रिच फूड्स का सेवन उनकी मुश्किलें बढ़ा सकता है, क्योंकि खराब किडनी अतिरिक्त पोटैशियम को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती। इससे खून में पोटैशियम बढ़ने का खतरा रहता है, जो दिल और मांसपेशियों पर गंभीर असर डाल सकता है।

    कर्मा आयुर्वेदा के फाउंडर, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट डॉक्टर पुनीत धवन ने बताया फल बेहतरीन फूड हैं लेकिन किडनी की परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए ये नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। पोटैशियम रिच फूड्स का सेवन करने से खून में पोटैशियम का स्तर बढ़ सकता है, जिसे हाइपरकलेमिया (Hyperkalemia) कहा जाता है। यह स्थिति दिल की धड़कन और मांसपेशियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि पोटैशियम का शरीर में क्या रोल है और किडनी के मरीजों को पोटैशियम से भरपूर कौन-कौन से फलों से परहेज करने की जरूरत है।

    किडनी के मरीजों के लिए पोटैशियम क्यों है अहम?

    डॉ. बताते हैं कि पोटैशियम शरीर के लिए एक जरूरी मिनरल है जो मांसपेशियों के संकुचन, नसों के कार्य, दिल की धड़कन को सामान्य रखने और शरीर में फ्लूइड बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो अतिरिक्त पोटैशियम शरीर से बाहर नहीं निकल पाता और खून में इसकी मात्रा बढ़ने लगती है। ज्यादा पोटैशियम होने पर दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है और मांसपेशियों में कमजोरी या दूसरी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। डॉ. धवन ने बताया हर किडनी मरीज को पोटैशियम पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती। कुछ स्टेज में जैसे

    1. CKD स्टेज 1 और स्टेज 2 के मरीजों को आमतौर पर पोटैशियम पर बहुत सख्त नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती।
    2. CKD स्टेज 3, स्टेज 4, स्टेज 5 या डायलिसिस कराने वाले मरीजों को पोटैशियम का सेवन डॉक्टर की सलाह के अनुसार सीमित रखना चाहिए।

    किन फलों में ज्यादा है पोटैशियम?

    डॉ. धवन के मुताबिक कुछ फलों में पोटैशियम ज्यादा होता है इसलिए किडनी के मरीजों को इन फलों का सेवन सीमित करना चाहिए या डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। कुछ फल जैसे
    केला, संतरा, आम, कीवी, खरबूजा, स्ट्रॉबेरी, बादाम,किशमिश और अंजीर का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। इन खाद्य पदार्थों में पोटैशियम अधिक होता है, जिससे शरीर में इसका स्तर तेजी से बढ़ सकता है।

    किडनी के मरीज कौन से फलों का कर सकते हैं सेवन

    किडनी के मरीजों के लिए कम पोटैशियम वाले फल फायदेमंद होते हैं। इन फलों में सेब, लाल अंगूर,नाशपाती,पपीता, जामुन और तरबूज शामिल है। बात करें सेब की तो

    1. 100 ग्राम सेब में लगभग 107 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह फाइबर से भरपूर होता है, पाचन बेहतर बनाता है और ब्लड शुगर नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसे छीलकर खाना बेहतर माना जाता है।
    2. लाल अंगूर:
      एक कप (करीब 151 ग्राम) लाल अंगूर में लगभग 110 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो सूजन कम करने और दिल की सेहत बनाए रखने में मदद करते हैं।
    3. नाशपाती:
      100 ग्राम नाशपाती में लगभग 116 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन सुधारने और वजन कंट्रोल रखने में मदद करता है।
    4. पपीता:
      100 ग्राम पपीते में लगभग 182 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह पाचन और इम्यूनिटी के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन किडनी मरीजों को इसे सीमित मात्रा में और डॉक्टर की सलाह पर ही खाना चाहिए।
    5. जामुन:
      100 ग्राम जामुन में लगभग 55 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह खासकर डायबिटीज से पीड़ित किडनी मरीजों के लिए फायदेमंद माना जाता है क्योंकि यह ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद कर सकता है।
    6. तरबूज:
      एक कप तरबूज में लगभग 170 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें पानी की मात्रा भी अधिक होती है, इसलिए किडनी मरीजों को इसे सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। यदि मरीज डायलिसिस पर है या पेशाब कम बन रहा है तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    किडनी मरीजों के लिए फल खाने का तरीका

    • डॉ. धवन ने बताया कि किडनी के मरीज फलों का सेवन बहुत सावधानी से करें। फल हमेशा अच्छी तरह धोकर खाएं और संभव हो तो छीलकर खाएं।
    • फलों के जूस की बजाय साबुत फल खाएं।
    • हफ्ते में 2-3 बार ही फल खाएं या डॉक्टर की सलाह के अनुसार सेवन करें।
    • समय-समय पर ब्लड टेस्ट करवाकर पोटैशियम की जांच कराएं।
    • कुछ फलों को उबालने से उनमें मौजूद पोटैशियम की मात्रा कुछ हद तक कम की जा सकती है।

    किडनी मरीजों के लिए जरूरी सलाह

    डॉ. का कहना है कि किडनी रोगियों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) करवाते रहना चाहिए और अपनी डाइट किसी सर्टिफाइड डाइटिशियन से बनवानी चाहिए। इसके अलावा वजन, पानी की मात्रा और भोजन पर भी नजर रखना जरूरी है। एक्सपर्ट ने बताया किडनी की बीमारी में फलों को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं होती। सही फल, सही मात्रा और डॉक्टर की सलाह का पालन करके मरीज संतुलित आहार ले सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख डॉक्टर द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है। किडनी की बीमारी, डायलिसिस या पोटैशियम से जुड़ी किसी भी डाइट में बदलाव करने से पहले अपने नेफ्रोलॉजिस्ट या सर्टिफाइड डाइटिशियन से सलाह जरूर लें।

  • उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    मसालेदार खाना, चाय-कॉफी की अधिकता और बिगड़ती लाइफस्टाइल के कारण आज एसिडिटी, सीने में जलन और अपच (Indigestion) जैसी समस्याएं बेहद आम हो चुकी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर इन समस्याओं को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो यह क्रॉनिक अपच (Chronic Indigestion), पोषक तत्वों के खराब अवशोषण (Poor Nutrient Absorption) और बार-बार पेट में असहजता जैसी दिक्कतों का कारण बन सकती हैं।  इन तकलीफों से तुरंत राहत पाने के लिए अक्सर लोग दवाइयों का रुख करते हैं, लेकिन हमारे भारतीय किचन में ही कई ऐसे नेचुरल उपाय मौजूद हैं जो इस समस्या को शांत कर सकते हैं। पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद में धनिए के बीजों को पेट के लिए बेहद गुणकारी और ठंडा माना गया है। लेकिन क्या सच में धनिया का पानी पीने से पाचन से जुड़ी परेशानियां दूर हो सकती है, क्या ये पानी एसिडिटी को हमेशा के लिए शांत कर सकता है?

    आयुर्वेद विशेषज्ञ भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र (Hansa Yogendra) के मुताबिक पेट की समस्याओं में धनिया का पानी अमृत की तरह असर करता है। आयुर्वेद में धनिया के बीज (Coriander Seeds) का इस्तेमाल लंबे समय से शरीर की अतिरिक्त गर्मी कम करने, पाचन बेहतर बनाने और एसिडिटी को शांत करने के लिए किया जाता रहा है। एक्सपर्ट के मुताबिक, सही तरीके से तैयार किया गया धनिया का पानी गर्मी और उमस के मौसम में पेट को राहत पहुंचाने में मददगार हो सकता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि धनिया का पानी कैसे उमस भरी गर्मी में पेट को राहत देता है।

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    धनिया के बीज क्यों माने जाते हैं फायदेमंद?

    विशेषज्ञों के अनुसार, धनिया के बीजों में प्राकृतिक कूलिंग (Cooling) गुण पाए जाते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी तत्व शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने और फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने बताया गर्मी में धनिया के बीज का पानी बनाकर पीने से शरीर की अतिरिक्त गर्मी कंट्रोल रहती है। इसका सेवन करने से एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स से राहत मिलती है। पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में ये पानी असरदार साबित होता है। इसका सेवन कई तरह की मेडिकल कंडीशन में भी असरदार साबित होता है। ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में ये पानी बेहद मददगार साबित होता है। इसका सेवन करने से बॉडी से टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और इम्यूनिटी मजबूत होती है।

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    धनिया का पानी कैसे तैयार करें

    गर्मी में साबुत धनिया का पानी बनाने के लिए आप एक बड़ा चम्मच साबुत धनिया और एक गिलास नॉर्मल पानी लें। अब धनिया के बीजों को हल्का कूट लें और उन्हें पानी में रात भर भिगो दें। सुबह पानी छानकर खाली पेट पी लें। यह धनिया का पानी पीने का सबसे आसान और पारंपरिक तरीका माना जाता है।

    धनिया का पानी का काढ़ा बनाएं

    अगर गर्मी और उमस ज्यादा हो तो धनिया का पानी उबालकर भी तैयार किया जा सकता है। एक बड़ा चम्मच धनिया लें और दो कप पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए तो गैस बंद कर दें। इसे सामान्य तापमान तक ठंडा होने दें और छानकर गुनगुना पिएं। एक्सपर्ट ने बताया इस पानी को आप गुनगुना ही पिएं, इसमें बर्फ या ठंडा करके नहीं पिएं। आप चाहें तो इस पानी में ताजे पुदीने के पत्ते, भीगी हुई सौंफ और नींबू के रस की कुछ बूंदें मिलाकर पी सकते हैं। यह मिश्रण गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक पहुंचाने और पाचन को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है।

    पाचन की इन समस्याओं से मिलेगी राहत

    गर्मी में 7 दिनों तक अगर इस ड्रिंक का सेवन किया जाए तो बार-बार एसिडिटी से राहत मिलेगी। इसका सेवन करने से पेट या छाती में जलन कंट्रोल रहती है। जिन लोगों को खाना खाने के बाद ब्लोटिंग होती है उनके लिए ये पानी बेहद उपयोगी है।  गर्मी और उमस में सिरदर्द या भारीपन से राहत दिलाने में ये पानी उपयोगी है। विशेषज्ञ के अनुसार, इसे लगातार लगभग 7 दिन तक सुबह खाली पेट पीने से कुछ लोगों में पाचन संबंधी परेशानियों में सुधार महसूस हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख आयुर्वेदिक विशेषज्ञ द्वारा साझा की गई जानकारी और पारंपरिक उपयोगों पर आधारित है। धनिया का पानी किसी बीमारी का इलाज नहीं है। यदि आपको लगातार एसिडिटी, सीने में तेज जलन, पेट दर्द या अन्य गंभीर लक्षण हैं, तो स्वयं उपचार करने के बजाय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

  • 40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं, जिनमें से एक है हड्डियों का कमजोर होना। खासकर 40 की उम्र पार करने के बाद शरीर में कैल्शियम का अवशोषण (Absorption) कम हो जाता है, जिससे जोड़ों में दर्द, कट-कट की आवाज आना और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। अक्सर लोग इसके लिए कैल्शियम की गोलियां खाना शुरू कर देते हैं, लेकिन हमारी रसोई में ही कुछ ऐसी देसी चीजें मौजूद हैं जो नेचुरल तरीके से कैल्शियम की कमी को पूरा कर सकती हैं। एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ बिमल छाजेड़ ने उम्र बढ़ने पर बॉडी में कैल्शियम की भरपाई करने के लिए एक खास देसी ड्रिंक का सेवन करने की सलाह दी है। ये ड्रिंक हड्डियों को पोषण देने में बेहद मददगार साबित हो सकता है।

    रागी को क्यों माना जाता है कैल्शियम का अच्छा स्रोत?

    कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल छाजेड़ का कहना है कि कैल्शियम से भरपूर पारंपरिक अनाज रागी (Finger Millet) को डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। रागी प्राकृतिक रूप से कैल्शियम से भरपूर अनाज है। उनका कहना है कि 100 ग्राम रागी में लगभग 340–350 मिलीग्राम कैल्शियम पाया जाता है, जबकि 100 ग्राम दूध में करीब 120 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। इसके अलावा रागी में फाइबर, आयरन, कई आवश्यक खनिज और जटिल कार्बोहाइड्रेट भी मौजूद होता हैं, जो इसे एक पौष्टिक खाद्य पदार्थ बनाता हैं। जिन लोगों को दूध पचता नहीं या दूध से एलर्जी है वो लोग इस खास कैल्शियम रिच ड्रिंक का सेवन कर सकते हैं। हालांकि दूध भी प्रोटीन और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है। संतुलित आहार में रागी और दूध दोनों का अपना-अपना महत्व है।

    अंकुरित रागी कैसे सेहत के लिए उपयोगी है?

    विशेषज्ञ के मुताबिक, रागी को अंकुरित (Sprouted) करके खाने से उसमें मौजूद कुछ एंटी-न्यूट्रिएंट्स कम हो सकते हैं, जिससे शरीर कुछ पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। अंकुरण के दौरान सक्रिय होने वाले एंजाइम इसकी पाचन क्षमता को भी बेहतर बना सकते हैं।

    रागी ड्रिंक बनाने का आसान तरीका

    रागी ड्रिंक तैयार करने के लिए सबसे पहले रागी को रातभर पानी में भिगो दें। अगले दिन पानी निकालकर साफ कपड़े में बांध दें और 24–36 घंटे तक अंकुरित होने दें। इसके बाद अंकुरित रागी को थोड़ा पानी डालकर पीस लें। चाहें तो इसमें थोड़ा नारियल पानी भी मिला सकते हैं। तैयार मिश्रण को छानकर धीमी आंच पर पकाएं। स्वाद के लिए इसमें इलायची, अदरक पाउडर और थोड़ी मात्रा में गुड़ मिलाया जा सकता है।

    रागी ड्रिंक पीने का सही समय क्या है?

    डॉ. ने बताया अगर आप कैल्शियम रिच रागी ड्रिंक का सेवन करना चाहते हैं तो आप सुबह खाली पेट लें या फिर दो भोजन के बीच लें। शुरुआत कम मात्रा से करें और अगर शरीर इसे अच्छी तरह स्वीकार करे तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

    क्या सिर्फ रागी खाने से कैल्शियम की कमी दूर हो जाएगी?

    एक्सपर्ट के मुताबिक मजबूत हड्डियों के लिए केवल कैल्शियम लेना ही पर्याप्त नहीं है। शरीर में कैल्शियम के बेहतर अवशोषण के लिए विटामिन D भी जरूरी है। इसके लिए नियमित धूप, वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज, योग और संतुलित आहार भी जरूरी हैं। रागी में जटिल कार्बोहाइड्रेट और फाइबर पाया जाता है, जो सामान्य अनाज की तुलना में धीरे-धीरे पचता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी एक विशेषज्ञ के सार्वजनिक वीडियो और उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित है। रागी या किसी भी खाद्य पदार्थ को उपचार का विकल्प न मानें। यदि आपको कैल्शियम की कमी, ऑस्टियोपोरोसिस, किडनी की बीमारी या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है, तो आहार में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या पंजीकृत डाइटिशियन से सलाह अवश्य लें।

  • जाना शॉर्ट वीडियो देखने वाले बच्चों पर मंडरा रहा खतरा, रिसर्च में सामने आए अहम संकेत..

    जाना शॉर्ट वीडियो देखने वाले बच्चों पर मंडरा रहा खतरा, रिसर्च में सामने आए अहम संकेत..

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    इंस्टाग्राम आज के समय में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में से एक बन चुका है, जहां लोग घंटों तक रील्स देखने, स्टोरी लगाने और चैटिंग में व्यस्त रहते हैं। खासकर रील्स का क्रेज बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोगों में देखा जा रहा है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिसर्च में यह चिंता जताई गई है कि लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की यह आदत मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकती है।

    लगातार रील्स देखने से बढ़ सकता है तनाव

    जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ बायरॉथ के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक स्टडी के अनुसार, लंबे समय तक शॉर्ट वीडियो देखने से बच्चों और युवाओं में तनाव बढ़ने की संभावना रहती है। इसके साथ ही उनका ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी कमजोर हो सकती है। यह अध्ययन जून में European Child & Adolescent Psychiatry जर्नल में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं का कहना है कि आज की युवा पीढ़ी काफी समय शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर बिता रही है, जिसका असर उनके व्यवहार और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है।

    रील्स की आदत बढ़ाने वाले मुख्य कारण

    स्टडी में तीन प्रमुख वजहें सामने आईं, जो लोगों को लगातार रील्स देखने के लिए मजबूर करती हैं। पहला, हर समय नया कंटेंट मिलते रहना, जिससे उपयोगकर्ता ऐप छोड़ नहीं पाते। दूसरा, अनलिमिटेड स्क्रॉलिंग फीचर, जो कभी खत्म नहीं होता और लोगों को लंबे समय तक व्यस्त रखता है। तीसरा, पर्सनलाइज्ड एल्गोरिदम, जो यूज़र की पसंद के अनुसार ही वीडियो दिखाता है, जिससे उनका जुड़ाव और बढ़ जाता है।

    बड़े स्तर पर किया गया विश्लेषण

    इस शोध में लगभग 42 अलग-अलग रिसर्च ग्रुप्स के डेटा का विश्लेषण किया गया और करीब 47,000 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र लगभग 16 वर्ष थी। अध्ययन में यह पाया गया कि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि लोग उनसे जल्दी अलग नहीं हो पाते। लगातार नए वीडियो आने से उपयोगकर्ता लंबे समय तक स्क्रॉल करते रहते हैं।

    बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है

    विशेषज्ञों का सुझाव है कि माता-पिता अगर बच्चों के लिए एक संतुलित डिजिटल रूटीन बनाएं और मोबाइल इस्तेमाल का समय सीमित करें, तो इसका असर कम किया जा सकता है। बच्चों को बाहर खेलने, खेलकूद और अन्य शारीरिक गतिविधियों में शामिल करना भी जरूरी है। साथ ही परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने से बच्चों की सोशल मीडिया पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सकती है।

  • ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    बिगड़ते लाइफस्टाइल, जंक फूड का अधिक सेवन और निष्क्रिय लाइफस्टाइल के कारण फैटी लिवर (Fatty Liver) की समस्या तेजी से पैर पसार रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फैटी लिवर का सीधा संबंध आपके खून में मौजूद एक खास तरह के फैट यानी ‘ट्राइग्लिसराइड्स’ (Triglycerides) के बढ़ने से भी है? जब शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अनकंट्रोल हो जाता है, तो यह लिवर की कोशिकाओं में जमा होने लगता है, जिससे लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। शुरुआती चरणों में फैटी लिवर को बिना दवाओं के, सिर्फ सही आदतों से पूरी तरह रिवर्स किया जा सकता है।

    जनरल डायटीशियन और डायबिटोलॉजिस्ट डॉक्टर कोमल कुलकर्णी ने ट्राइग्लिसराइड्स को कंट्रोल करने और फैटी लिवर से मुक्ति पाने के लिए लाइफस्टाइल में  7 जरूरी बदलाव (Lifestyle Changes) करने की सलाह दी है। एक्सपर्ट ने बताया खराब खानपान, मीठे पेय, शारीरिक गतिविधि की कमी और बढ़ता मोटापा आज फैटी लिवर और हाई ट्राइग्लिसराइड्स की बड़ी वजह बन चुके हैं। अगर समय रहते डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव किए जाएं तो ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर कम करने और फैटी लिवर की स्थिति में सुधार लाने में मदद मिल सकती है। आइए जानते हैं कि फैटी लिवर से छुटकारा पाने के लिए लाइफस्टाइल में कौन-कौन से बदलाव करना जरूरी है।

    सबसे पहले मीठे ड्रिंक्स का सेवन नहीं करें

    डॉक्टर ने सलाह दी है कि अगर ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ा हुआ हैं तो सबसे पहले शुगर वाली ड्रिंक्स को डाइट से हटाएं। कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, मीठी चाय-कॉफी और अन्य शुगर युक्त पेय पदार्थ शरीर में अतिरिक्त शुगर पहुंचाते हैं, जो ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ाने और लिवर में फैट जमा होने का कारण बन सकते हैं। इसकी जगह सादा पानी, बिना चीनी वाली ग्रीन टी या नींबू पानी बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

    शरीर का 10% वजन कम करने का लक्ष्य रखें

    अगर आपका वजन सामान्य से अधिक है तो कुल वजन का लगभग 10 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखें। वजन घटाना लिवर की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। धीरे-धीरे वजन घटाने से ट्राइग्लिसराइड्स कम करने, इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने और फैटी लिवर की गंभीरता कम करने में मदद मिल सकती है।

    नियमित एक्सरसाइज करें

    डॉक्टर के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 से 180 मिनट तेज चाल से चलें। बॉडी को एक्टिव रखने के लिए जॉगिंग या एरोबिक एक्सरसाइज करें। इसके अलावा सप्ताह में 2 से 3 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी शामिल करें। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर में जमा अतिरिक्त फैट कम करने और मेटाबॉलिज्म बेहतर बनाने में मदद करती है।

    हर मील में प्रोटीन शामिल करें

    हर भोजन में अच्छी गुणवत्ता वाला प्रोटीन शामिल करें। इसके लिए अंडा, चिकन, मछली, पनीर, टोफू और दालें अच्छे विकल्प हो सकते हैं। पर्याप्त प्रोटीन लेने से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, मांसपेशियां मजबूत रहती हैं और वजन घटाने में भी मदद मिलती है।

    रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करें

    मैदा से बने बिस्कुट, बेकरी प्रोडक्ट्स, सफेद ब्रेड और नमकीन जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करें। इनकी जगह साबुत अनाज और हाई-फाइबर विकल्प चुनें। रिफाइंड कार्ब्स का अधिक सेवन ट्राइग्लिसराइड्स और पेट की चर्बी बढ़ाने से जुड़ा माना जाता है।

    फाइबर से भरपूर भोजन खाएं

    डाइट में फल, हरी सब्जियां, ओट्स और अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। फाइबर पाचन को बेहतर बनाने, ब्लड शुगर को संतुलित रखने और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है। साथ ही यह लंबे समय तक पेट भरा रखने में भी सहायक होता है।

    रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लें

    अच्छी नींद भी फैटी लिवर और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए जरूरी है। रोजाना 7 से 8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेने से हार्मोन संतुलित रहते हैं, भूख कंट्रोल रहती है और वजन घटाने में मदद मिलती है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी डॉक्टर के सुझावों पर आधारित है। फैटी लिवर या हाई ट्राइग्लिसराइड्स की स्थिति में डाइट, एक्सरसाइज या दवा में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें।

  • तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    घर के आंगन में पूजी जाने वाली ‘तुलसी’ न केवल धार्मिक रूप से पूजनीय है, बल्कि आयुर्वेद में इसे औषधियों की रानी (Queen of Herbs) भी कहा गया है। बदलते मौसम में सर्दी-खांसी से राहत दिलाने वाली तुलसी को लेकर अब आधुनिक मेडिकल साइंस भी कई बड़े दावे कर रहा है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि तुलसी की पत्तियां इतनी ज्यादा असरदार हैं कि ये डायबिटीज को भी कंट्रोल कर सकती हैं।  Journal of Ethnopharmacology और Phytomedicine में प्रकाशित क्लिनिकल रिसर्च के मुताबिक जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन को पहचानना बंद कर देती हैं, तो टाइप-2 डायबिटीज होती है। रिसर्च के अनुसार, तुलसी के पत्तों का अर्क पैंक्रियाज की बीटा-कोशिकाओं (Beta Cells) को सीधे उत्तेजित करता है। यह इंसुलिन के स्राव को बढ़ाता है और कोशिकाओं में इंसुलिन रिसेप्टर्स की संवेदनशीलता को सक्रिय करता है, जिससे खून में तैर रहा ग्लूकोज आसानी से एनर्जी में बदल जाता है।

    आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के एक्सपर्ट डॉक्टर सलीम जैदी के मुताबिक डायबिटीज मरीज अगर ब्लड शुगर कंट्रोल करना चाहते हैं तो तुलसी के पत्तों का सेवन करें। तुलसी में एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी फंगल, एंटी फ्लू, एंटी बैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं जो बॉडी का बीमारियों से बचाव करते हैं और बॉडी को हेल्दी रखते हैं। आइए रिसर्च से भी जान लेते हैं कि तुलसी की पत्तियां कैसे डायबिटीज कंट्रोल करती हैं।

    फास्टिंग और पोस्ट-प्रांडियल शुगर कम करती हैं तुलसी की पत्तियां

    Indian Journal of Clinical Biochemistry में टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों पर किया गया रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल में मरीजों को एक निश्चित समय तक रोज सुबह खाली पेट तुलसी के पत्तों का पाउडर दिया गया। जिन लोगों ने रोज तुलसी के पाउडर का सेवन किया उनकी फास्टिंग ब्लड शुगर (खाली पेट) में 17.6% और पोस्ट-प्रांडियल शुगर यानी भोजन के बाद की शुगर में 7.3% तक की कमी दर्ज की गई। तुलसी भोजन के बाद कार्बोहाइड्रेट के टूटने की रफ्तार को धीमा करती है, जिससे अचानक शुगर स्पाइक नहीं होता।

    एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है तुलसी

    Journal of Clinical and Biochemical Nutrition के मुताबिक हाई ब्लड शुगर के कारण शरीर में फ्री रेडिकल्स बढ़ते हैं, जो आंखों (Retinopathy) और किडनी (Nephropathy) को डैमेज करते हैं। रिसर्च साबित करती है कि तुलसी में प्रचुर मात्रा में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स इन फ्री रेडिकल्स को नष्ट करते हैं। इससे भविष्य में डायबिटीज के कारण होने वाली किडनी, आंखों, नसों और दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा कम हो सकता है।

    इम्यूनिटी मजबूत बनाती हैं ये पत्तियां

    तुलसी में विटामिन C, यूजेनॉल (Eugenol) और कई एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो इम्यूनिटी को मजबूत बनाने में मदद कर सकती हैं। यही वजह है कि सर्दी-जुकाम और मौसमी संक्रमण के दौरान भी इसका उपयोग किया जाता है।

    तनाव कम करने में सहायक

    तुलसी को एक एडाप्टोजेन (Adaptogen) माना जाता है। इसका मतलब है कि यह शरीर को मानसिक और शारीरिक तनाव से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं। कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि तुलसी तनाव हार्मोन कोर्टिसोल (Cortisol) के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकती है। Evidence-Based Complementary and Alternative Medicine की न्यूरोलॉजिकल रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक तनाव होने पर एड्रीनलीन ग्रंथियां ‘कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज करती हैं, जो लिवर से अतिरिक्त ग्लूकोज निकालकर शुगर लेवल को अचानक बढ़ा देता है। तुलसी को विज्ञान में एक बेहतरीन ‘एडाप्टोजेन माना गया है। क्लिनिकल स्टडी के अनुसार, तुलसी का सेवन मस्तिष्क को शांत कर कोर्टिसोल के स्तर को 30% तक कम कर देता है, जिससे तनाव के कारण बढ़ने वाली शुगर खुद कंट्रोल हो जाती है।

    पाचन तंत्र को बेहतर बना सकती है

    तुलसी पाचन एंजाइमों के स्राव को बढ़ाने, गैस, पेट फूलने और अपच जैसी समस्याओं को कम करने में सहायक मानी जाती है। इसके एंटीमाइक्रोबियल गुण आंतों के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में योगदान दे सकते हैं। International Journal of Food Sciences and Nutrition के मुताबिक तुलसी पेट के गैस्ट्रिक जूस और पाचक एंजाइम्स के स्राव को संतुलित करती है। यह लिवर और आंतों के मेटाबॉलिज्म (चयापचय) में सुधार करती है, जिससे भोजन का अवशोषण सही तरीके से होता है। पाचन तंत्र दुरुस्त रखने से शरीर में ग्लूकोज का स्तर और वजन दोनों ही कंट्रोल में रहते हैं।

    दिल की सेहत को मिल सकता है फायदा

    तुलसी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार यह कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी सहायक हो सकती है, जिससे हृदय स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है। हालांकि इस पर और वैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

    तुलसी का सेवन करते समय रखें इन बातों का ध्यान

    हालांकि तुलसी को सामान्य रूप से सुरक्षित माना जाता है, लेकिन यदि आप डायबिटीज की दवाएं, खून पतला करने वाली दवाएं (Blood Thinners) या अन्य गंभीर बीमारियों की दवा ले रहे हैं, तो नियमित रूप से तुलसी का अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी हर्बल उपाय का नियमित सेवन नहीं करना चाहिए। डायबिटीज के मरीज डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद न करें और तुलसी को केवल सहायक उपाय के रूप में ही अपनाएं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। तुलसी कई औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है, लेकिन यह किसी भी बीमारी का इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा का विकल्प नहीं है। यदि आपको डायबिटीज या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, या आप नियमित रूप से दवाएं ले रहे हैं, तो तुलसी का नियमित या अधिक मात्रा में सेवन शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें। किसी भी उपचार या दवा में बदलाव बिना चिकित्सीय सलाह के न करें।

  • हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    क्या आप प्लांट-बेस्ड डाइट पर रहकर भी मजबूत मसल्स बनाना चाहते हैं? डॉ. अनूप मिश्रा के मुताबिक, सिर्फ प्रोटीन ही काफी नहीं है, बल्कि ‘ल्यूसीन’ नाम के एक खास अमीनो एसिड की जरूरत होती है। जानिए कैसे सही चुनाव और फूड कॉम्बिनेशन से आप बिना किसी सप्लीमेंट के अपनी फिटनेस गोल को हासिल कर सकते हैं।

    हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    (Image: AI Generated)

    शाकाहारी लोगों की अक्सर शिकायत रहती है उनके पास प्रोटीन सोर्स की कमी रहती है इसलिए उनके मसल्स जल्दी नहीं बन पाते लेकिन एक डॉक्टर ने इसका तरीका भी बताया है. डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है, मसल्स बनाने के लिए सिर्फ प्रोटीन की मात्रा देखना काफी नहीं है बल्कि उसके साथ ल्यूसीन (Leucine) नाम के एक जरूरी अमीनो एसिड का सही लेवल होना बहुत जरूरी है. ल्यूसीन मसल्स के लिए एक ट्रिगर की तरह काम करता है, जो मसल्स प्रोटीन सिंथेसिस को एक्टिवेट करता है.  

    क्यों जरूरी है ल्यूसीन?

    ल्यूसीन एक ऐसा अमीनो एसिड है जो हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता इसलिए इसे डाइट से लेना जरूरी होता है. यह मसल्स को संकेत देता है कि उन्हें प्रोटीन का उपयोग करके बढ़ना और रिकवर होना है. जब आप स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या वजन उठाने वाली एक्सरसाइज करते हैं तो ल्यूसीन का सही सेवन मसल्स को तेजी से रिकवर करने और मजबूती देने में मदद करता है.

    कई रिसर्च बताती हैं कि सही मात्रा में ल्यूसीन मिलने पर प्लांट-बेस्ड प्रोटीन भी मसल्स बिल्डिंग में उतने ही कारगर हो सकते हैं जितने कि एनिमल प्रोटीन.  

    क्या है सही चुनाव?

    डॉ. मिश्रा के अनुसार, बेसन जैसे ऑप्शंस में प्रोटीन की अच्छी मात्रा होती है. 100 ग्राम बेसन में करीब 20 ग्राम प्रोटीन मिल सकता है जो कि गेहूं या अन्य अनाजों के मुकाबले काफी बेहतर है. इसके अलावा, सोयाबीन प्लांट-बेस्ड प्रोटीन के सबसे बेहतरीन सोर्सेज में से एक है. सोया न केवल हाई-प्रोटीन है, बल्कि इसमें ल्यूसीन भी भरपूर होता है, जिससे यह मसल्स बिल्डिंग के लिए एक स्मार्ट और सुलभ विकल्प बन जाता है.  

    डाइट में करें ये छोटा सा बदलाव 

    डॉ. का सुझाव है कि हर मील में प्रोटीन और ल्यूसीन के सही बैलेंस पर ध्यान दें. यदि आप अपनी मील में बेसन या अन्य प्रोटीन सोर्सेज को मिक्स करते हैं तो इससे आपकी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ेगी और कार्बोहाइड्रेट का असर कम हो जाएगा. यह न केवल आपकी मसल्स बनाने में मदद करेगा बल्कि ब्लड शुगर लेवल को भी कंट्रोल में रखने में मददगार हो सकता है. कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स का चुनाव करने और खाने के तरीके को सही रखने से बिना किसी महंगी दवा के आपकी सेहत में बड़ा सुधार आ सकता है. 

  • सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    भारतीय घरों में खाने के बाद माउथ फ्रेशनर के रूप में इस्तेमाल होने वाली सौंफ सिर्फ मुंह की दुर्गंध ही दूर नहीं करती, बल्कि यह औषधीय गुणों का खजाना है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक न्यूट्रिशन साइंस तक में सौंफ को सेहत के लिए बेहद गुणकारी माना गया है। खासकर सुबह खाली पेट ‘सौंफ का पानी’ पीना आज के समय में एक लोकप्रिय हेल्थ ट्रेंड बन चुका है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि यह न केवल आपके पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, बल्कि खून को साफ करके स्किन में भी नेचुरल निखार लाता है।

    डॉक्टर के मुताबिक सौंफ के पानी का सेवन करने से पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है। ये पानी गैस, एसिडिटी, ब्लोटिंग, पेट में भारीपन और कब्ज जैसी समस्याओं का इलाज करने में काफी असरदार साबित होता है। सौंफ में मौजूद प्राकृतिक तत्व एनेथॉल (Anethole), फैंचोन (Fenchone) और एस्ट्रा गोल (Estragole) आंतों की मांसपेशियों को आराम पहुंचाने में मदद करते हैं। इससे पेट की ऐंठन कम होती है और भोजन आसानी से आगे बढ़ता है।

    एक्सपर्ट के मुताबिक सौंफ पाचन एंजाइमों के स्राव को भी बढ़ावा देती है, जिससे भोजन अच्छी तरह पचता है, पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है और पेट हल्का महसूस होता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि सौंफ के पानी का सेवन करने से सेहत को कौन कौन सा फायदा होता है।

    बॉडी रहती है एनर्जेटिक

    एक्सपर्ट ने बताया जब पाचन सही रहता है तो शरीर को भोजन से पर्याप्त पोषण मिलता है। इससे ऊर्जा का स्तर बेहतर रहता है और व्यक्ति अधिक सक्रिय महसूस करता है। सौंफ के पानी का सेवन आप रोज सुबह खाली पेट करें आपको फायदा होगा।

    स्किन की रंगत में होता है सुधार

    हंसा जी योगेंद्र के अनुसार स्किन की अधिकांश समस्याओं की शुरुआत शरीर के अंदर से होती है। अगर पाचन सही नहीं रहता तो शरीर में टॉक्सिन जमा होने लगते हैं, जिसका असर चेहरे पर भी दिखाई देता है। इन टॉक्सिन के जमा होने से चेहरे पर मुंहासे, स्किन की चमक कम होना, चेहरे पर सूजन होना, थकी हुई स्किन और समय से पहले झुर्रियां आने लगती हैं। सौंफ में विटामिन E और क्वेरसेटिन (Quercetin) जैसे एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो शरीर में फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं, जिससे स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।

    बॉडी को ठंडा रखता है सौंफ का पानी

    हंसा जी योगेंद्र का कहना है कि सौंफ का पानी शरीर की अतिरिक्त गर्मी यानी पित्त को शांत करने में मदद करता है। उनके अनुसार इससे शरीर अंदर से संतुलित रहता है। सौंफ का पानी लीवर को हेल्दी रखने और खून को साफ रखने में मदद करता है। उनका कहना है कि जब शरीर अंदर से साफ रहता है तो इसका असर स्किन पर भी दिखाई देता है।

    सौंफ का पानी बनाने का पहला तरीका

    हंसा जी योगेंद्र के अनुसार सौंफ का पानी बनाने के लिए एक चम्मच सौंफ लें और उसे हल्का-सा कूट लें। एक गिलास पानी में रातभर भिगो दें और सुबह पानी छानकर खाली पेट पी लें। गर्मी में इस पानी का सेवन शरीर को ठंडक पहुंचाएगा। एसिडिटी की समस्या में राहत देगा।

    सौंफ के पानी के नुकसान और सावधानियां (Side Effects & Precautions)

    1. यूं तो सौंफ का पानी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है लेकिन कुछ हेल्थ कंडीशन में सौंफ के पानी का अत्याधिक सेवन नुकसान भी पहुंचा सकता है जैसे गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं इसका ज्यादा सेवन करने से बचें। सौंफ में एनेथॉल होता है जो एस्ट्रोजन हार्मोन की तरह काम कर सकता हैं, इसलिए प्रेग्नेंसी में और ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाएं इसका सेवन करने से परहेज करें।
    2. जिन लोगों को एलर्जी की समस्या है वो सौंफ का सेवन करने से परहेज करें। इससे स्किन पर रैशेज, खुजली या सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।
    3. लो ब्लड शुगर (Hypoglycemia) के मरीजों को सौंफ का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। सौंफ का पानी ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है। ऐसे में जो लोग पहले से ही डायबिटीज की दवाएं ले रहे हैं वो डॉक्टर की सलाह से सौंफ के पानी का सेवन करें।
    4. सौंफ पाचन को दुरुस्त करती है, लेकिन इसका ज्यादा सेवन पेट में मरोड़ या Loose motions का कारण भी बन सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख हंसा जी योगेंद्र द्वारा साझा की गई जानकारी और उपलब्ध सामान्य स्वास्थ्य तथ्यों पर आधारित है। सौंफ का पानी एक प्राकृतिक घरेलू उपाय है, लेकिन यह किसी भी बीमारी का इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा का विकल्प नहीं है। यदि आपको लगातार गैस, एसिडिटी, पाचन संबंधी समस्या हैं, तो सौंफ का पानी नियमित रूप से पीने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा या उपचार में बदलाव न करें।

  • चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    अगर आप बिना महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स के चेहरे पर नेचुरल ग्लो चाहते हैं, तो दूध की मलाई और आलू के रस से बना ये होममेड फेस पैक आपके काम आ सकता है. आज हम आपको दादी-नानी के इस नुस्खों को बनाने का सही तरीका, फायदे, इस्तेमाल का तरीका बताने वाले हैं.

    Glowing Skin Home Remedy: शायद ही कोई हो जो अपनी स्किन को साफ, मुलायम और ग्लोइंग ना रखना चाहता हो. सभी सुंदर दिखने के साथ ही चाहते हैं कि उनका चेहरा साफ, मुलायम और चमकदार दिखे. इसके लिए लोग खूब महंगी-महंगी फेस क्रीम से लेकर सीरम और स्किन केयर प्रोडक्ट्स खरीदते हैं. ये सब खरीदने के लिए पैसे खर्च करने में भी कतराते नहीं हैं. लेकिन लोग ये नहीं जानते हैं कि कई बार जिस चीज की तलाश वो बाजार में करते हैं, वो घर की रसोई में ही मौजूद होती है.

    दादी-नानी के बताए कुछ घरेलू नुस्खे आज भी काफी मशहूर हैं, जिनकी मदद से स्किन को साफ-सुथरा रखने के साथ ही ग्लोइंग बनाने में भी मदद मिलती है. ऐसा ही एक आसान उपाय है ताजे दूध की मलाई में एक खास चीज मिलाकर चेहरे पर लगाना. अगर ये आपकी स्किन को सूट करे, तो इससे स्किन को नेचुरल ग्लो और नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है. चलिए जानते हैं स्किन को ग्लोइंग बनाने का ये देसी और सस्ता तरीका क्या है.

    स्किन के लिए क्यों फायदेमंद है मलाई?
    पिछले कई दशकों से दूध की ताजी मलाई को लंबे समय से स्किन केयर में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसमें लैक्टिक एसिड होता है, जो स्किन की ऊपरी लेयर पर जमा डेड स्किन सेल्स को धीरे-धीरे हटाने में मदद करता है. इसके साथ ही मलाई में मौजूद नेचुरल फैट स्किन को अच्छी तरह मॉइश्चराइज करता है, जिससे चेहरा मुलायम और हाइड्रेटेड महसूस होता है.

    मलाई में मिलाएं आलू का रस
    अगर आप मलाई के साथ आलू का रस मिलाते हैं, तो ये एक होममेड फेस पैक बन जाता है. इसके लिए 1-2 चम्मच ताजी मलाई में थोड़ा सा ताजा आलू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिक्स कर लें. अगर आपकी स्किन पर आलू का रस सूट नहीं करता, तो उसकी जगह चावल का पानी भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

    आलू का रस क्यों माना जाता है असरदार?
    स्किन पर मलाई के साथ आलू का रस मिलाकर लगाना बहुत फायदेमंद माना जाता है. आलू के रस में विटामिन सी और कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो स्किन को फ्रेश दिखाने में मदद कर सकते हैं. इसे अक्सर दाग-धब्बों, हल्की टैनिंग और पिगमेंटेशन हटाने के लिए घरेलू नुस्खों में इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, ये किस व्यक्ति की स्किन पर कैसा और कितना असर करती है वो अलग-अलग हो सकता है. 

    फेस पैक लगाने का सही तरीका
    इस फेस पैक को हफ्ते में 2 से 3 बार लगाया जा सकता है.

  • किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, सेहत से जुड़े जोखिम भी बदलते रहते हैं, इसलिए उम्र के हिसाब से हेल्थ चेक-अप करवाना बचाव के लिए जरूरी हो जाता है। जवानी से लेकर बुढ़ापे तक अलग-अलग तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है, जिसके लिए खास तरह की प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग और रेगुलर मेडिकल टेस्ट की ज़रूरत होती है। यह जानना कि जिंदगी के किस पड़ाव पर कौन से टेस्ट ज़रूरी हैं, सेहत से जुड़ी समस्याओं का जल्दी पता लगाने और उन्हें सही ढंग से संभालने में मदद करता है। यह गाइड अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए ज़रूरी स्क्रीनिंग के बारे में बताती है, ताकि आप अपनी सेहत और भलाई को लेकर पहले से ही सतर्क रह सकें।

    उम्र के हिसाब से हेल्थ चेक-अप क्यों ज़रूरी हैं

    समय के साथ इंसानी शरीर बदलता है और सेहत से जुड़े संभावित जोखिम भी बदलते हैं। जवानी के शुरुआती दौर में ध्यान बीमारियों से बचाव और सेहत के बेसलाइन (शुरुआती स्तर) को ट्रैक करने पर होता है, जबकि बाद के चरणों में पुरानी या गंभीर बीमारियों की निगरानी जरूरी हो जाती है। नियमित प्रिवेंटिव केयर (बचाव वाली देखभाल) से लक्षणों के दिखने से पहले ही छिपी हुई बीमारियों का पता लगाने में मदद मिलती है। इससे समय पर इलाज हो पाता है, बेहतर नतीजे मिलते हैं और लंबे समय तक रहने वाली जटिलताओं का खतरा कम होता है।


    जवानी के शुरुआती दौर में हेल्थ चेक-अप (उम्र 20–29)

    इस दौर को अक्सर सबसे सेहतमंद माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक सेहतमंद रहने के लिए मज़बूत नींव बनाना ज़रूरी है। जवानी के शुरुआती दौर में सुझाए गए हेल्थ टेस्ट:

    -ब्लड प्रेशर की जांच (हर 1–2 साल में)
    -बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और वजन की निगरानी
    -बेसिक ब्लड टेस्ट (CBC, अगर जोखिम के कारण हों तो ब्लड शुगर)
    -लिपिड प्रोफ़ाइल (अगर परिवार में बीमारी का इतिहास हो या जीवनशैली से जुड़ा जोखिम हो)
    -यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच
    मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन (तनाव, एंग्जायटी, नींद के पैटर्न)

    ये रूटीन हेल्थ टेस्ट जीवनशैली से जुड़े शुरुआती जोखिमों की पहचान करने और सेहत का बेसलाइन तय करने में मदद करते हैं।

    युवावस्था में हेल्थ चेक-अप (उम्र 30–39)

    जैसे-जैसे मेटाबॉलिज़्म बदलने लगता है, इस दौर में ज़्यादा व्यवस्थित प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग की ज़रूरत होती है। उम्र (30–39) के हिसाब से सुझाए गए मेडिकल टेस्ट:

    -हर साल ब्लड प्रेशर की निगरानी
    -फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c
    -लिपिड प्रोफ़ाइल (कोलेस्ट्रॉल का स्तर)
    -थायरॉइड फंक्शन टेस्ट
    -लिवर और किडनी फंक्शन टेस्ट
    -सर्वाइकल स्क्रीनिंग (महिलाओं के लिए पैप स्मीयर)
    -तनाव, नींद और जीवनशैली का आकलन

    ये स्क्रीनिंग डायबिटीज़ या हार्मोनल असंतुलन जैसी बीमारियों के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने में मदद करती हैं।


    मध्य-आयु में हेल्थ चेक-अप (उम्र 40–49)

    यह एक अहम दौर है जब कई छिपी हुई बीमारियां सामने आने लगती हैं। 40 साल की उम्र के बाद ज़रूरी टेस्ट:

    -डायबिटीज की जांच (फास्टिंग ग्लूकोज, HbA1c)
    -दिल की सेहत की जांच (ECG, लिपिड प्रोफाइल)
    -ब्लड प्रेशर की नियमित जांच
    -मैमोग्राम (महिलाओं के लिए, जोखिम के आधार पर)
    -प्रोस्टेट हेल्थ स्क्रीनिंग (पुरुषों के लिए, अगर सलाह दी जाए)
    -आंखों की जांच (दृष्टि और ग्लूकोमा की जांच)
    -विटामिन D और हड्डियों की सेहत की जांच

    इस उम्र में, नियमित प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग से गंभीर समस्याओं का जोखिम काफी कम हो सकता है।


    बाद की उम्र में हेल्थ चेक-अप (50 साल और उससे ज़्यादा उम्र)

    उम्र बढ़ने के साथ पुरानी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है, इसलिए नियमित चेक-अप ज़रूरी हो जाते हैं। बाद की उम्र में सुझाई गई हेल्थ स्क्रीनिंग:

    -कैंसर की जांच (कोलन, ब्रेस्ट, प्रोस्टेट)
    -बोन डेंसिटी टेस्ट (ऑस्टियोपोरोसिस की जांच)
    -कार्डियोवैस्कुलर स्क्रीनिंग (ECG, ज़रूरत पड़ने पर स्ट्रेस टेस्ट)
    -ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी
    -सुनने और देखने की क्षमता की जांच
    -किडनी और लिवर के कामकाज की जांच

    नोट: किसी भी मेडिकल कंडीशन का खुद से इलाज करने की बजाय अपने डॉक्टर की सलाह लें।