आजकल की तेज भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोग तनाव, थकान और कमजोरी जैसी समस्याओं से परेशान रहते हैं। काम का दबाव, कम नींद और गलत खानपान धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को कमजोर बना देते हैं। ऐसे समय में आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाली एक जड़ी-बूटी का नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है — अश्वगंधा।
सदियों से आयुर्वेद में अश्वगंधा का उपयोग शरीर को ताकत देने और मानसिक तनाव कम करने के लिए किया जाता रहा है। यही वजह है कि आज भी बहुत लोग इसे अपनी डेली लाइफ में इस्तेमाल करते हैं।
अश्वगंधा क्या है?
अश्वगंधा एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है, जिसकी जड़ का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है। इसे “इंडियन जिनसेंग” भी कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे शरीर की ऊर्जा बढ़ाने और कमजोरी दूर करने वाली जड़ी-बूटी माना गया है।
तनाव और चिंता कम करने में मददगार
अगर कोई व्यक्ति ज्यादा तनाव, चिंता या मानसिक दबाव महसूस करता है, तो अश्वगंधा उसके लिए फायदेमंद हो सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि इसके सेवन से दिमाग शांत महसूस करता है और स्ट्रेस कम करने में मदद मिल सकती है।
शरीर को ताकत और ऊर्जा देने में सहायक
बार-बार थकान महसूस होना, कमजोरी लगना या शरीर में एनर्जी कम महसूस होना आजकल आम समस्या बन चुकी है। अश्वगंधा शरीर की ताकत बढ़ाने और कमजोरी कम करने में मदद कर सकता है। इसी कारण कई लोग इसे दूध के साथ लेना पसंद करते हैं।
अच्छी नींद लाने में मदद कर सकता है
जिन लोगों को रात में ठीक से नींद नहीं आती या बार-बार नींद टूटती है, उनके लिए भी अश्वगंधा फायदेमंद माना जाता है। यह शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में मदद कर सकता है।
इम्यूनिटी मजबूत करने में सहायक
अश्वगंधा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। मौसम बदलने पर बार-बार बीमार पड़ने वाले लोग भी इसका सेवन करते हैं।
पुरुषों की सेहत के लिए क्यों माना जाता है फायदेमंद?
आयुर्वेद में अश्वगंधा को पुरुषों की ताकत और स्टैमिना बढ़ाने वाली औषधि माना गया है। कई लोग इसे शरीर की कमजोरी दूर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
अश्वगंधा लेने का सही तरीका
अश्वगंधा पाउडर को गुनगुने दूध के साथ लिया जा सकता है
रात को सोने से पहले इसका सेवन करना बेहतर माना जाता है
जरूरत से ज्यादा मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए
किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है
किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?
गर्भवती महिलाएं
हाई या लो ब्लड प्रेशर वाले लोग
गंभीर बीमारी से परेशान लोग
जो लोग रोजाना दवाइयां लेते हैं
ऐसे लोगों को बिना डॉक्टर की सलाह के इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
निष्कर्ष
अश्वगंधा आयुर्वेद की एक लोकप्रिय और उपयोगी जड़ी-बूटी मानी जाती है। सही तरीके और सही मात्रा में सेवन करने पर यह तनाव कम करने, शरीर को ताकत देने और ऊर्जा बढ़ाने में मदद कर सकती है।
हालांकि, किसी भी आयुर्वेदिक चीज का सेवन करने से पहले अपनी सेहत के अनुसार सलाह लेना जरूरी होता है।
शिलाजीत ऊँचे पर्वतों पर पत्थर की दरारों में पाया जाना वाला गोंद जैसा पदार्थ है। साधारण जनता इसे केवल यौन क्षमता बढ़ाने की दवाई के नाम से जानती है जबकि यह बहुत से गंभीर रोगों की शानदार औषधि भी है। आजकल शिलाजीत के लिए बाजार में बहुत से विज्ञापन चल रहे हैं जिसमें शिलाजीत के बारे में अधूरी जानकारी दी जाती है। आज जानिये शिलाजीत के बारे सब बातें।
शिलाजीत कैसे पैदा होती है –
शिलाजीत उन पहाड़ी स्थानों पर होती है जहाँ डंडा थोर, तिपतिया, दाढ़ी घास, मोस प्रजाति के पौधे, थूजा, मर्केन्शिया , हार्न वेर्ट, रीसेल के पौधे बहुतायत में पाए जाते हैं। तेज धूप पड़ने पर इन पौधे से गोंद निकलता हैं जो पत्थर के ऊपर से बहता हुआ पहाड़ की दरारों में जाकर सूखकर जम जाता हैं। यह गोंद पत्थर के संपर्क में आकर पत्थर के अंदर मौजूद खनिज को अपने साथ ले लेती है। इसी गोंद की अशुद्ध शिला जीत कहते है। बाजार में इसे ही बेचा जाता है।
अशुद्ध शिलाजीत से शुद्ध शिलाजीत कैसे बनाते हैं?
अशुद्ध शिलाजीत में गोंद, मिटटी, पत्थर, घास, पौधे के अवशेष सहित तमाम गन्दगी रहती है। इसे त्रिफला के गर्म काढ़े में 12 से 18 घंटे तक भिगोया जाता है। जो हिस्सा पानी में घुलता है उसे बाद में पकाकर पानी समाप्त कर सूखा लिया जाता है। इसे शुद्ध शिलाजीत कहते हैं। सीस शुद्ध शिलाजीत में विभिन्न जड़ी बूटियां मिलाकर टेबलेट, सिरप, कैप्सूल, मलहम आदि बनाये जाते हैं।
शिलाजीत में क्या होता है?
शिलाजीत में पौधे के गोंद के अनुरूप विभिन्न पदार्थ होते हैं। जटिल रूप से इसके अंदर केल्सियम अधिक मात्रा में होता है। साथ ही फुलविक एसिड, हुमिक एसिड, प्राकृतिक स्टेरॉयड, चिकनाई , प्रोटीन , विटामिन, एलुमिनियम, मेगनीसियम, आयरन पाया जा सकता है। अच्छी शिलाजीत उसे कहते हैं जो ऐसे स्थान से ली गयी हो जहाँ ऊपर बताये गए पौधे अच्छी मात्रा में हो और पहाड़ पर सीधी धूप पड़ती हो।
शिलाजीत कहाँ पैदा होती है ?
शिलाजीत की सबसे अधिक प्राप्ति रूस से होती है उसके बाद पकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर, तिब्बत में होती है। बहुत थोड़ी मात्रा में लदाख, कश्मीर में मिलती है। वर्तमान में भारत में शिलाजीत पाकिस्तान से चीन के रास्ते आती है।
शिलाजीत को किन रोगों में उपयोग करते हैं?
शिलाजीत को पथरी, सूजन, डाइबिटीज, पेट और आँतों के घाव, शुक्राणु समस्या में अन्य दवाइओं के साथ मिश्रण के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त यह इम्युनिटी बढ़ाने, शरीर को पोषण देने, कमजोरी दूर करने, यौन शक्ति वर्धन, सप्लीमेंट के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए?
शिलाजीत की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, बीमारी, प्रकृति (तासीर ) के अनुसार निर्धारित की जाती है। जिसे केवल पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक ही निर्धारत कर सकता है। मोटे तौर पर 250 मिलीग्राम से लेकर 1500 मिलीग्राम प्रतिदिन के बीच में निर्धारत की जा सकती है।
शिलाजीत के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं ?
प्रत्येक औषधि या पदार्थ के अपने साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। शिलाजीत के उपयोग से पेट में जलन, दिल धड़कन का का अनियमित होना, पेट में भारीपन, बदहजमी, दस्त, छाती में दर्द, चक्कर, चेहरे के अंगों में सूजन आदि अनुभव हो सकते हैं। यदि ऐसा कोई लक्षण अनुभव हो रहा है तो औषध उपयोग को बंद कर तत्काल चिकित्सक परामर्श लिया जांचा चाहिए। इनमे से अधिकतर लक्षण ख़राब क्वालिटी की शिलाजीत या शिलाजीत के तत्वों से एलर्जी होने पर देखे गए हैं।
शिलाजीत के सेवन के समय कोई परहेज आवश्यक होता है ?
शिलाजीत के उपयोग के दौरान कुलथी दाल, शराब, अधिक मात्रा में चाय / काफी, अचार, सिरका से बने पदार्थ उपयोग नहीं किये जाने चाहिए।
शिलाजीत के सेवन से कितने समय में लाभ प्राप्त होता है ?
स्वस्थ व्यक्तियों को योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्श से इसका सेवन कम से कम छह माह तक करना चाहिए। रोगियों में सेवन अवधि केवल आयुर्वेद चिकित्सक तय कर सकते हैं।
शिलाजीत कहाँ से लेनी चाहिए ?
शिलाजीत वास्तव में एक औषधि है। साइड इफेक्ट रहित, उचित लाभ के लिए अच्छी क्वालिटी, सही शुद्धिकरण, सही मात्रा आदि का निर्धारण बहुत आवश्यक है। यह वास्तव में एक सप्लीमेंट नहीं है। इसलिए किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श के पश्चात ही उचित औषध को खरीदना एवं प्रयोग करना चाहिए।
17 साल की सारिका पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक पीजी में रहती है। उसके साथ रहने वाले लोग जानते हैं कि उसे साफ-सफाई का बेहद ध्यान रहता है। वह दिन में कई बार हाथ धोती है, बार-बार किचन में जाकर गैस सिलेंडर चेक करती है और घर का ताला दो-तीन बार खींचकर देखने के बाद ही उसे तसल्ली मिलती है। आसपास के लोग उसकी इन आदतों को ‘परफेक्शनिज्म’ (हर काम एकदम सही करना) मानते हैं। लेकिन आप जानते हैं कि इस तरह का व्यवहार और विचार कोई आदत नहीं बल्कि एक मानसिक विकार Obsessive-Compulsive Disorder (OCD) हो सकता है जो प्रभावित इंसान की पढ़ाई, नौकरी या सामाजिक रिश्तों में बाधा बनता है। इस परेशानी से ग्रसित इंसान को किसी काम को बार-बार दोहराने के बाद भी मानसिक संतुष्टि महसूस नहीं होती?
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया अक्सर लोग इसे केवल एक आदत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक विकार है, जो समय के साथ व्यक्ति के आत्म-विश्वास और कार्यक्षमता को कमजोर कर देता है। आखिर OCD क्या है, इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं, यह क्यों होता है और मेडिकल साइंस में इसका क्या इलाज है? आइए मानसिक रोग विशेषज्ञ (Psychologist) से जानते हैं इसके पीछे की पूरी सच्चाई।
OCD क्या है?
डॉ. अग्रवाल ने बताया Obsessive–compulsive disorder (OCD) यानी ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति के मन में बार-बार ऐसे अनचाहे विचार (Obsessions), तस्वीरें या आशंकाएं आती हैं, जिन्हें वह चाहकर भी रोक नहीं पाता। इन विचारों से होने वाली घबराहट और बेचैनी को कम करने के लिए वह कुछ काम बार-बार करता है, जिन्हें कम्पल्शन (Compulsions) कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर बार-बार हाथ धोना, ताला जांचना या गैस बंद है या नहीं, इसे बार-बार चेक करना।
आदत और OCD में क्या अंतर है?
हर व्यक्ति में कुछ न कुछ आदतें या परफेक्शनिस्ट व्यवहार हो सकते हैं, लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उसे OCD है। डॉक्टर के अनुसार, जब ये विचार और व्यवहार इतने बढ़ जाएं कि व्यक्ति की पढ़ाई, नौकरी, सामाजिक जीवन या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तभी इसे बीमारी माना जाता है।
क्या परफेक्शनिज्म भी OCD का हिस्सा है?
परफेक्शनिज्म OCD का एक लक्षण हो सकता है, लेकिन हर परफेक्शनिस्ट व्यक्ति OCD का मरीज नहीं होता। यदि परफेक्शनिज्म के साथ अन्य ऑब्सेसिव विचार और बार-बार किए जाने वाले व्यवहार भी मौजूद हों, तो डॉक्टर OCD की संभावना पर विचार करते हैं।
भारत में OCD कितना आम है?
डॉक्टर के अनुसार, OCD एक आम मानसिक स्वास्थ्य विकार है। मनोचिकित्सा विभागों में इसके मरीज अक्सर देखने को मिलते हैं। हालांकि, लोगों में अभी भी इसके सभी लक्षणों के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। अधिकांश लोग केवल बार-बार हाथ धोने को ही OCD समझते हैं, जबकि इसके और भी कई लक्षण हैं।
OCD के सामान्य लक्षण क्या हैं?
OCD के लक्षण व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। कुछ सामान्य लक्षण हैं
बार-बार हाथ धोना।
बार-बार ताला, गैस या बिजली का स्विच चेक करना।
चीजों को बार-बार गिनना।
पढ़ाई करते समय एक ही पैराग्राफ को बार-बार पढ़ना।
किसी काम को बार-बार दोहराना क्योंकि तसल्ली नहीं होती।
मन में लगातार अनचाहे और परेशान करने वाले विचार आना।
OCD किस उम्र के लोगों में हो सकता है?
डॉक्टर के मुताबिक, OCD के लक्षण अक्सर किशोरावस्था (Teenage) में दिखाई देने लगते हैं, जब व्यक्तित्व का विकास हो रहा होता है। हालांकि, कुछ मामलों में यह बचपन में भी शुरू हो सकता है और कुछ लोगों में वयस्क होने के बाद भी इसकी शुरुआत होती है।
OCD होने के पीछे क्या कारण हैं?
OCD के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसमें आनुवंशिक (Genetic), पारिवारिक (Hereditary) और पर्यावरणीय (Environmental) कारकों की भूमिका होती है। इसके अलावा मस्तिष्क में सेरोटोनिन (Serotonin) और नोरएपिनेफ्रीन (Norepinephrine) जैसे रसायनों का असंतुलन भी इस बीमारी से जुड़ा माना जाता है।
क्या हल्के OCD को नजरअंदाज करना चाहिए?
यदि किसी व्यक्ति में OCD के हल्के लक्षण हैं और वह अपनी दिनचर्या सामान्य रूप से संभाल पा रहा है, तब भी उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर का कहना है कि समय के साथ यह समस्या बढ़ सकती है। शुरुआती अवस्था में इलाज शुरू करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
OCD का रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है?
OCD व्यक्ति की एकाग्रता (Concentration), याददाश्त (Memory) और कार्यक्षमता (Productivity) को प्रभावित कर सकता है। मरीज का काफी समय बार-बार एक ही काम करने या एक ही विचार में उलझे रहने में निकल जाता है। गंभीर मामलों में इसका असर पारिवारिक रिश्तों, नौकरी और पढ़ाई पर भी पड़ सकता है।
क्या OCD सिर्फ साफ-सफाई तक सीमित है?
अक्सर लोगों का मानना है कि OCD सिर्फ साफ-सफाई तक ही सीमित है लेकिन ऐसा नहीं है। OCD केवल हाथ धोने या सफाई से जुड़ा नहीं है। कुछ लोगों को बार-बार यह डर सताता है कि उन्होंने कोई गलती कर दी है, किसी को नुकसान पहुंचा दिया है या कोई काम ठीक से नहीं हुआ। कुछ मरीजों में धार्मिक, नैतिक या हिंसक विचार भी बार-बार आ सकते हैं, जिन्हें वे खुद भी गलत मानते हैं।
OCD का इलाज कैसे किया जाता है?
यदि बीमारी शुरुआती या हल्की अवस्था में है, तो मनोवैज्ञानिक (Psychologist) द्वारा दी जाने वाली काउंसलिंग और साइकोथेरेपी से काफी लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि बीमारी मध्यम या गंभीर हो जाए और व्यक्ति अपने विचारों या व्यवहार पर नियंत्रण न रख पाए, तो मनोचिकित्सक (Psychiatrist) दवाइयों की सलाह देते हैं।
क्या OCD पूरी तरह ठीक हो सकता है?
डॉक्टर के अनुसार अधिकांश मरीज सही इलाज से काफी हद तक ठीक हो जाते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में OCD दवाइयों से भी नियंत्रित नहीं हो पाता, जिसे ‘रेजिस्टेंट OCD’ कहा जाता है। ऐसे मामलों में rTMS (Repetitive Transcranial Magnetic Stimulation) और Modified ECT जैसी न्यूरो मॉड्यूलेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
यदि बार-बार आने वाले विचार, डर या दोहराए जाने वाले व्यवहार आपकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो उन्हें सामान्य आदत समझकर नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से OCD को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी विशेषज्ञ से हुई बातचीत पर आधारित है और यह किसी भी प्रकार की चिकित्सा सलाह, निदान (Diagnosis) या उपचार (Treatment) का विकल्प नहीं है।
पेट की रहस्यमयी गांठें, अगर पेट में बार बार दर्द, दस्त होना, पेट खराब रहना, बार बार जुकाम -बुखार – खांसी – गले की समस्या रहती है और पेट का अल्ट्रासाउंड कराने पर mesenteric lymphedinitis (पेट में गांठे) आती हैं। आइए जानते इस बीमारी की विस्तृत जानकारी।
लिम्फ़ सिस्टम क्या होती है शरीर में जिस तरह रक्त के संचरण के लिए नसों का नेटवर्क होता है उसी तरह शरीर में लिम्फ के संचार के लिए लिम्फ सिस्टम होता है। इस सिस्टम में पूरे शरीर में जगह जगह गांठें होती हैं। जिनमें लिम्फ़ इकट्ठा रहता है। इन गांठों को lymph nodes कहते हैं।
लिम्फ़ क्या होता है यह एक सफेद गाढ़ा तरल होता है जिसमें शरीर को विभिन्न वायरस, बैक्टीरिया, फंगस से बचाती है। यह एक प्रकार से शरीर के रोग से लड़ने के तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पूरे शरीर में बहता है।
लिम्फ नोड्स क्या होते हैं? लिम्फ नोड्स शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली (immune system) का हिस्सा होते हैं। ये छोटे-छोटे, बीज के आकार की ग्रंथियाँ होती है जो शरीर मे संक्रमण से लड़ने मे सहायता करती हैं। पेट में जो लिंफ नोड्स होते हैं, उन्हें मेसेंटरिक लिम्फ नोड्स कहा जाता है।
लिम्फ़ नोड्स में सूजन lymphadinitis के कौन कौन से कारण होते हैं
घर से बाहर का खाना।
अस्वच्छ भोजन। •बहुत ठंडा पानी पीना •देर से तथा असमय भोजन करना
रात को देर तक जागना, नींद की कमी, अत्यधिक चिंता और तनाव •एलोपैथिक दवाओं का निरंतर प्रयोग करना
वायरल संक्रमण
बैक्टेरियल संक्रमण
श्वास प्रणाली में संक्रमण
टॉन्सिल या गले का संक्रमण
मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस – मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें पेट में मौजूद लिंफ नोड्स (गाँठें) सूज जाती हैं। यह समस्या अक्सर बच्चों और किशोरों में देखी जाती है, लेकिन कभी-कभी युवाओं को भी हो सकती है।
मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस के लक्षण –
पेट दर्द,
बुखार,
उल्टी, जी मचलना,
खांसी और गले में खराश होना,
दस्त या कब्ज़ का होना
क्या यह कैंसर हो सकता है? सामान्यतया यह कैंसर नहीं होता है लेकिन इलाज में लापरवाही, बिना चिकित्सक की सलाह के दवाईयां लेना, परहेज नहीं करना, इम्यून सिस्टम का अधिक कमजोर होने से यह कैंसर में बदल सकती हैं।
इसकी जांच कैसे होती है। इस रोग की जांच सामान्यतया अनुभवी चिकित्सक क्लीनिक में ही कर लेते हैं। आवश्यकता पड़ने पर रोग के निश्चितीकरण के लिए पेट का अल्ट्रासाउंड समुचित होता है। यदि चिकित्सक को किसी अन्य रोग स्थिति का संदेह होता है तो अन्य जांचों की तरफ जाना पड़ता है।
क्या इससे बचाव संभव है?
जी हाँ, बच्चों में स्वर्णप्राशन संस्कार द्वारा इससे बचाव संभव है।
व्यस्कों में खान-पान सही रखने और नियमित व्यायाम करने से इससे बचाव किया जा सकता है।
क्या यह ठीक हो सकती है? यह रोग पूरी तरह ठीक हो सकता अगर रोगी समय रहते अनुभवी और योग्य चिकित्सक से सलाह और चिकित्सा ले, चिकित्सक के निर्देशों का पालन करें।
क्या इसमें आपरेशन कराना जरूरी है? नहीं यह कोई आवश्यक नहीं कि सर्जरी से ही इस रोग का इलाज होता है लेकिन यदि गांठ का साइज एक निश्चित सीमा से अधिक बढ़ जाए तब सर्जरी एक उचित विकल्प हो सकता है।
क्या इसकी चिकित्सा संभव है?
जी हाँ,आयुर्वेद क्लिनिक के चिकित्सक इस रोग की चिकित्सा में विशेषज्ञ हैं।
समय रहते इलाज शुरू करने से रोग जड़ से समाप्त हो सकता है।
तेज मिर्च-मसाले पेट में अम्लता (Acidity) बढ़ाते हैं, जिससे गैस्ट्रिक अल्सर, एसिड रिफ्लक्स (GERD) और पेट की जलन हो सकती है।
कब्ज और अपच:
फास्ट फूड में फाइबर की कमी होती है, और आंतों की गति धीमी कर देते हैं, जिससे कब्ज और अपच हो सकता है।
आंतों की सूजन (IBD) और बवासीर (Piles):
फास्ट फूड आंतों में सूजन (Inflammatory Bowel Disease – IBD) और कब्ज बढ़ा सकते हैं, जिससे बवासीर और फिशर जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
2. लिवर और किडनी पर प्रभाव
फैटी लिवर और लिवर सिरोसिस:
फास्ट फूड में मौजूद ट्रांस फैट लिवर में फैट जमा कर देते हैं, जिससे फैटी लिवर, लिवर फाइब्रोसिस और अंततः लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) हो सकता है।
किडनी स्टोन और किडनी फेल्योर:
यूरिक एसिड बढ़ाकर किडनी स्टोन और किडनी डैमेज का खतरा बढ़ाते हैं। किडनी के फिल्टरिंग सिस्टम को कमजोर कर सकती है, जिससे किडनी फेल्योर का खतरा बढ़ जाता है।
3. हृदय और ब्लड प्रेशर पर प्रभाव
हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक:
फास्ट फूड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं, धमनियों को सख्त करते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और हार्ट अटैक/स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
दिल की धड़कन असामान्य होना (Arrhythmia):
तेज मिर्च दिल की धड़कन को असामान्य रूप से तेज (Tachycardia) या धीमा (Bradycardia) कर सकते हैं।
4. मानसिक और तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव
ब्रेन फॉग और याददाश्त कमजोर होना:
फास्ट फूड मस्तिष्क की तंत्रिकाओं (Neurons) को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे याददाश्त कमजोर हो सकती है और ब्रेन फॉग (सोचने-समझने की क्षमता में कमी) आ सकता है।
नींद की समस्या और डिप्रेशन:
मेलाटोनिन (Melatonin) हॉर्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं, जिससे अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन हो सकता है।
5. सेक्सुअल हेल्थ पर प्रभाव
फास्ट फूड टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को कम करते हैं, जिससे सेक्स ड्राइव घटती है और स्पर्म काउंट कम होता है।
पीरियड्स में अनियमितता और हार्मोनल असंतुलन (महिलाओं में):
अधिक जंक फूड एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन हार्मोन को असंतुलित कर सकते हैं, जिससे पीरियड्स अनियमित और गर्भधारण में समस्या हो सकती है।
6. कैंसर का खतरा
मुंह, गले और पेट के कैंसर का खतरा:
मसालेदार फास्ट फूड और मांस में मौजूद कार्सिनोजेनिक पदार्थ (जैसे नाइट्रेट्स और ट्रांस फैट) कैंसर कोशिकाओं को ट्रिगर कर सकते हैं।
7. इम्यूनिटी पर प्रभाव
प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कमजोर होना:
फास्ट फूड शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) को कमजोर कर देते हैं, जिससे बार-बार सर्दी-जुकाम, इन्फेक्शन और सूजन की समस्या हो सकती है।
समाधान –
यदि आप लम्बे समय से या लगातार फ़ास्ट फ़ूड का सेवन करते हैं और आप ऊपर बताये गए सभी रोगों से बचना चाहते हैं तो आप इस प्रकार अपना बचाव कर सकते हैं। 1 फास्ट फ़ूड का सेवन बहुत कम कर दें। अधिकतम महीने में एक या दो बार सेवन करने से खतरा काफी कम रहने की सम्भावना रहती है। 2 अभी तक की गयी लापरवाही से शरीर के अंदर जो दूषित तत्व इकट्ठे हो गए हैं उन्हें बाहर निकालने के लिए अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक से संपर्क करें और सात्विक भोजन एवं व्यायाम की मदद लें। 3 दूषित तत्व बाहर निकालने, कमजोर हुए अंगों को मजबूत करने, शरीर को उचित पोषण देने के लिए आयुर्वेद मल्टी स्पेशलिटी क्लिनिक के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा तैयार विशेष फार्मूला का उपयोग करना उत्तम रहेगा।
मधुमेह : भारत में करोड़ों मधुमेह रोगियों को राहत देने के लिए एक नया चिकित्सीय आविष्कार सामने आया है। डेनमार्क की अग्रणी दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारतीय बाजार में विश्व का पहला साप्ताहिक बेसल इंसुलिन इंजेक्शन ‘अविक्ली’ लॉन्च किया है। आमतौर पर, मधुमेह की गंभीरता के आधार पर, रोगियों को प्रतिदिन इंसुलिन इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। लेकिन, यह नया इंजेक्शन सप्ताह में केवल एक बार ही पर्याप्त है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि यह टाइप-1 और टाइप-2 दोनों प्रकार के मधुमेह के उपचार में चमत्कारिक रूप से कारगर है। इस नवोन्मेषी इंसुलिन के कारण, रोगियों द्वारा एक वर्ष में लिए जाने वाले इंजेक्शनों की संख्या 365 से घटकर मात्र 52 रह जाएगी। इससे रोगियों को प्रतिदिन सुई चुभने के दर्द से बड़ी राहत मिलेगी।
कीमत: 2,611 रुपये। आम आदमी के लिए दस सप्ताह की खुराक उपलब्ध है।
कंपनी ने इस इंजेक्शन की कीमत इस तरह तय की है कि यह न केवल चिकित्सकीय रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी मरीजों के लिए फायदेमंद हो। भारतीय बाजार में 1 मिलीलीटर पेन की कीमत 2,611 रुपये निर्धारित की गई है। इस एक पेन में लगभग 700 यूनिट इंसुलिन होता है। इसकी खासियत यह है कि यह 1 मिलीलीटर पेन एक सामान्य मधुमेह रोगी के लिए लगभग 10 सप्ताह (ढाई महीने) तक लगातार पर्याप्त है। इसका मतलब है कि यह प्रीमियम चिकित्सा सेवा, जिसे सप्ताह में एक बार लिया जाता है, औसतन प्रति माह एक हजार रुपये से कम की लागत पर उपलब्ध होगी। चिकित्सा सूत्रों को उम्मीद है कि यह ‘अविकली’ इंजेक्शन उन लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित होगा जो हर दिन इंसुलिन लेना भूल जाते हैं और जो बहुत यात्रा करते हैं, और इससे मधुमेह को नियंत्रित करना आसान हो जाएगा।
केले के फूल के फायदे: हमारे आसपास प्रकृति में पाए जाने वाले कई पौधों में औषधीय गुणों का भंडार छिपा है। आमतौर पर हम सभी केले और प्लांटैन खूब खाते हैं। लेकिन, बहुत से लोग यह नहीं जानते कि केले के पेड़ से निकलने वाले ‘केले के फूल’ में केले की तुलना में दस गुना अधिक पोषक तत्व और खनिज होते हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसे पकाकर या कच्चा खाया जाता है, लेकिन कई घरों में इसे बेकार समझकर फेंक दिया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा अनुसंधान के अनुसार, आहार में केले के फूल को शामिल करने से न केवल मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, बल्कि गुर्दे की पथरी को घोलने में भी मदद मिलती है। आइए जानते हैं उस अनोखे केले के फूल के 7 अद्भुत स्वास्थ्य लाभ, जो हमारे शरीर के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है।
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केले के फूल के 7 अद्भुत स्वास्थ्य लाभ
रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करना
केले के फूल में मधुमेह रोधी गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह शरीर में इंसुलिन हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाने में सहायक होता है। टाइप-2 मधुमेह के रोगियों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इसका नियमित सेवन रक्त शर्करा के स्तर को अचानक बढ़ने से रोककर नियंत्रित करने में मदद करता है।
केले के फूल के फायदे: गुर्दे की पथरी की रोकथाम
केले का फूल एक उत्कृष्ट प्राकृतिक मधुमेह निवारक के रूप में कार्य करता है। इसका अर्थ है कि यह शरीर से अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों को मूत्र के माध्यम से बाहर निकालने में मदद करता है। इसमें मौजूद विशेष यौगिक गुर्दे में कैल्शियम ऑक्सालेट क्रिस्टल के जमाव को रोकते हैं। इससे गुर्दे की पथरी का खतरा काफी कम हो जाता है।
गर्भाशय संबंधी समस्याओं की जांच करें
केले का फूल महिलाओं के मासिक धर्म के दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव और पीसीओडी (प्रोजेस्टेरोन सिंड्रोम) की समस्याओं के लिए एक शक्तिशाली औषधि है। यह शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बढ़ाता है, गर्भाशय को स्वस्थ रखने में मदद करता है और हार्मोनल असंतुलन को ठीक करता है।
पाचन क्रिया में सुधार होता है।
केले के फूल में घुलनशील और अघुलनशील फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह पेट में एसिड के स्तर को संतुलित करता है और एसिडिटी, गैस और कब्ज जैसी समस्याओं से बचाता है। यह पाचन संबंधी संक्रमणों से भी प्रभावी रूप से बचाव करता है।
एनीमिया की रोकथाम
हमारे देश में कई महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। केले के फूल में आयरन की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसे सब्जी के रूप में पकाकर खाने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर तेजी से बढ़ता है और थकान व कमजोरी दूर होती है।
हृदय स्वास्थ्य सुरक्षित है।
इसमें मौजूद पोटेशियम रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। साथ ही, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं और धमनियों में रक्त के थक्के बनने से रोकते हैं। इससे दिल के दौरे का खतरा कम होता है।
तनाव और चिंता को कम करता है
केले के फूल में प्राकृतिक मैग्नीशियम पाया जाता है। मैग्नीशियम एक प्राकृतिक अवसादरोधी है जो हमारे मूड को बेहतर बनाता है। यह नसों को शांत करता है, मानसिक तनाव और चिंता को कम करता है और रात को अच्छी नींद लाने में मदद करता है।
यदि आप सप्ताह में कम से कम एक बार केले के फूल को साफ करके प्याज और मसालों के साथ करी के रूप में पकाते हैं, तो आपको इसके अद्भुत स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होंगे।
फिट रहने और वजन घटाने की होड़ में आजकल ‘शुगर-फ्री डाइट’ या चीनी को पूरी तरह से छोड़ देने का चलन तेजी से बढ़ा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भोजन से चीनी को पूरी तरह से गायब कर देना आपकी सेहत के लिए उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना कि इसका अत्यधिक सेवन? मेडिकल एक्सपर्ट्स और न्यूट्रिशनिस्ट्स के अनुसार, शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए ग्लूकोज जो चीनी या कार्बोहाइड्रेट से मिलता है, की एक निश्चित मात्रा बॉडी के लिए आवश्यक होती है।
कुवैत के दासमन डायबिटीज इंस्टीट्यूट के रिसर्चर्स के एक ग्रुप ने 16 हफ़्तों तक चूहों को बिना सुक्रोज वाली कम फैट की डाइट और सुक्रोज वाली डाइट देकर उनकी तुलना की। रिसर्च में बताया गया कि शुगर फ्री डाइट सेहत के लिए नुकसान दायक भी होती है।शिकागो में एंडोक्राइन सोसाइटी की सालाना मीटिंग में पेश की गई इस स्टडी के मुताबिक, जिन चूहों को सुक्रोज-फ्री और कम फैट वाली डाइट दी गई, उनमें सुक्रोज वाली डाइट लेने वाले चूहों की तुलना में ब्लड शुगर कंट्रोल बेहद खराब रहा। रिसर्च में पाया गया कि शुगर फ्री डाइट का चूहों में सेवन करने से उनमें सूजन बढ़ी, गट बैक्टीरिया बिगड़े और फैटी लिवर के लक्षण भी काफी खराब हुए। अध्ययन के अनुसार, खाने से चीनी को पूरी तरह स्किप करना शरीर के मेटाबॉलिज्म और आंतों की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली बात
कुवैत स्थित दसमान डायबिटीज इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने दो समूहों के चूहों की तुलना की। एक समूह को सुक्रोज युक्त लो-फैट डाइट दी गई थी और दूसरे समूह को पूरी तरह सुक्रोज फ्री लो फैट डाइट दी गई। अध्ययन में पाया गया कि दोनों समूहों का वजन लगभग समान रहा, लेकिन शुगर-फ्री डाइट वाले चूहों में इंसुलिन रेजिस्टेंस, ग्लूकोज नियंत्रण में कमी, आंतों में सूजन और गट माइक्रोबायोम में असंतुलन जैसी समस्याएं अधिक देखी गईं।
शुगर फ्री डाइट पर एक्सपर्ट की राय
मुंबई सेंट्रल के वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स में कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव घोडी ने इन नतीजों को दिलचस्प बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इन्हें सावधानी से समझना चाहिए। डॉ. घोडी ने कहा इस स्टडी में चूहों का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि जानवरों पर की गई स्टडी से काम की जानकारी मिल सकती है, लेकिन उनके नतीजे हमेशा इंसानों पर लागू नहीं होते। यह रिसर्च बताती है कि न्यूट्रिशन का मतलब किसी एक खाद्य तत्व को पूरी तरह हटाने का नाम नहीं है, बल्कि संतुलित और गुणवत्तापूर्ण आहार अधिक महत्वपूर्ण होता है।
क्या शुगर-फ्री डाइट सेहत को बिगाड़ती है?
जब डॉ. घोडी से शुगर फ्री डाइट के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि एडेड शुगर यानी मिठाइयों, कोल्ड ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड फूड्स में मौजूद चीनी को कम करना सेहत के लिए लाभकारी है। हालांकि फलों, सब्जियों, दूध और साबुत अनाज में प्राकृतिक रूप से मौजूद शर्करा शरीर को ऊर्जा और जरूरी पोषक तत्व देती है। उनका कहना है कि सभी प्रकार की शुगर को डाइट से पूरी तरह खत्म कर देना एक अत्यधिक प्रतिबंधात्मक तरीका हो सकता है, जो हर किसी के लिए सही नहीं है।
गट हेल्थ पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों के अनुसार हमारी आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। नेचुरल शुगर वाले कई खाद्य पदार्थ फाइबर, विटामिन, मिनरल्स और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो गट माइक्रोबायोम को हेल्दी बनाए रखने में मदद करते हैं। अगर कोई व्यक्ति शुगर-फ्री डाइट के नाम पर इन पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी अपनी डाइट से बाहर कर देता है, तो इससे आंतों के बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ सकता है। हालांकि इस संबंध में इंसानों पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।
अच्छी हेल्थ और डायबिटीज को मैनेज करने के लिए क्या शुगर फ्री डाइट सही है?
हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि लोगों को चीनी से डरने या चीने से भरपूर फूड्स को डाइट से निकालने की जरूरत नहीं है। आप शुगर मैनेज करने के लिए और बॉडी को हेल्दी रखने के लिए एडेड शुगर कम करने पर ध्यान दें। इसके साथ ही डाइट में पर्याप्त मात्रा में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, लीन प्रोटीन, हेल्दी फैट और फाइबर शामिल करें। एक्सपर्ट ने बताया लम्बे समय तक हेल्दी रहने के लिए टिकाऊ और संतुलित खानपान जरूरी है ना कि प्रतिबंधित डाइट का सेवन करना।
सभी तरह की शुगर क्या नुकसान पहुंचाती है?
एक्सपर्ट का मानना है कि सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि सभी प्रकार की शुगर समान रूप से नुकसानदायक होती हैं। उदाहरण के लिए एक सेब में मौजूद नेचुरल शुगर के साथ फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई पोषक तत्व भी मिलते हैं, जबकि सॉफ्ट ड्रिंक केवल अतिरिक्त कैलोरी देती है और पोषण बहुत कम मिलता है। इसलिए अच्छी हेल्थ के लिए केवल चीनी को दोषी ठहराने की बजाय पूरे खानपान के पैटर्न पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। किसी भी प्रकार की डाइट या स्वास्थ्य संबंधी बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
खराब लाइफस्टाइल और असंतुलित खानपान के कारण आज ‘LDL कोलेस्ट्रॉल’ यानी बैड कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुका है। असल में LDL कोलेस्ट्रॉल हमारी धमनियों (Arteries) में जमा होने वाला एक गाढ़ा वसा (Fat) है, जो धीरे-धीरे रक्त के बहाव को रोकने लगता है और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है। राहत की बात यह है कि शुरुआत में ही सतर्क होकर इसे दवाइयों के बिना भी काफी हद तक संभाला जा सकता है। हाल ही में कंटेंट क्रिएटर और ब्रिटेन के सर्जन डॉ. राजन ने इंस्टाग्राम पर कुछ वैज्ञानिक शोधों पर आधारित ऐसी आदतें साझा कीं, जिन्हें नियमित रूप से अपनाने पर LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को नेचुरल तरीके से कम करने में मदद मिल सकती है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं खराब कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने के नेचुरल तरीके।
कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करेगा घुलनशील फाइबर
डॉ. राजन ने बताया अगर आपको खराब कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करना है तो आपको अपनी डाइट में घुलनशील फाइबर (Soluble Fibre) का सेवन बढ़ाना होगा। एक्सपर्ट ने बताया अगर आप रोजाना ओट्स, दाल, बीन्स जैसी चीजों से केवल 5 से 10 ग्राम घुलनशील फाइबर लेते हैं तो आप LDL कोलेस्ट्रॉल लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक कम कर सकते है। कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करना है तो हेल्दी फैट खाएं
डॉ. राजन ने सलाह दी कि अगर आप खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करना चाहते हैं तो आप संतृप्त वसा की जगह हेल्दी फैट का सेवन करें। मक्खन और फैटी प्रोसेस्ड मीट की जगह ऑलिव ऑयल, नट्स,सीड्स और ऑयली फिश का सेवन करें। एक्सपर्ट ने बताया 60 क्लीनिकल ट्रायल्स के मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि अगर संतृप्त वसा की जगह असंतृप्त (Unsaturated) वसा ली जाए तो LDL कोलेस्ट्रॉल में 17 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इसके अलावा एक्सपर्ट ने बताया आप सोया, टोफू, दालें और दूसरे प्लांट-बेस्ड प्रोटीन का सेवन करें फायदेमंद होगा, क्योंकि पौधों से मिलने वाले प्रोटीन में कोलेस्ट्रॉल बिल्कुल नहीं होता।
वजन कम करना और नियमित व्यायाम भी जरूरी
डॉ. राजन ने बताया कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के लिए वजन कंट्रोल करना और बॉडी को रेगुलर एक्टिव रखना बेहद जरूरी है। एक्सपर्ट ने बताया अगर आपका वजन अधिक है, तो शरीर के कुल वजन का सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत कम करने से LDL कोलेस्ट्रॉल में लगभग 6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। साथ ही ट्राइग्लिसराइड और HDL यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी बेहतर होता है। एक्सपर्ट ने बताया अगर आप सप्ताह में कम से कम 150 मिनट एरोबिक एक्सरसाइज करते हैं तो इससे LDL कोलेस्ट्रॉल 3 से 6 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
रेगुलर बॉडी एक्टिविटी रक्त वाहिकाओं (एंडोथेलियल फंक्शन) की कार्यक्षमता सुधारने, सूजन कम करने और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने में मदद करती है। अगर लम्बे समय तक लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव किया जाए तो आसानी से खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए स्टैटिन या PCSK9 इनहिबिटर जैसी दवाओं की जरूरत पड़ती है, तो ये लाइफस्टाइल से जुड़े बदलाव उन दवाओं को और अधिक प्रभावी बना देते हैं।
लंबे समय तक LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ा रहने पर शरीर में क्या होता है?
कार्डिया सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के संस्थापक डॉ. सी.एम. नागेश बताते हैं जब LDL कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो यह धीरे-धीरे धमनियों की अंदरूनी दीवारों पर जमा होने लगता है। इससे प्लेक (Plaque) बनता है। इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस (Atherosclerosis) कहा जाता है, जिसमें धमनियां संकरी और कठोर होती जाती हैं। एक्सपर्ट ने बताया जैसे-जैसे रक्त संचार बाधित होता है, दिल और मस्तिष्क तक ऑक्सीजन युक्त रक्त कम पहुंचता है। यदि यह प्लाक फट जाए, तो खून का थक्का (Blood Clot) बन सकता है, जो रक्त प्रवाह को अचानक रोक देता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बन सकता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह नुकसान कई वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ता रहता है।
LDL कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने के लिए डाइट में क्या बदलाव करें?
डॉ. नागेश के अनुसार अगर आप कोलेस्ट्रॉल को नेचुरल तरीके से कंट्रोल करना चाहते हैं तो आप तले हुए खाद्य पदार्थों और प्रोसेस्ड स्नैक्स से परहेज करें। आप इन फूड्स की जगह हेल्दी ऑप्शन जैसे मेवे,सीड्स, फल और फाइबर से भरपूर भोजन का सेवन करें। ये डाइट लिपिड प्रोफाइल में बेहतरीन सुधार ला सकती है। ऑलिव ऑयल जैसे हेल्दी फैट का इस्तेमाल करें, प्रोसेस्ड मीट कम खाएं और दालें, ओट्स तथा हरी सब्जियों का सेवन बढ़ाएं। चीनी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करें, क्योंकि ये फूड अप्रत्यक्ष रूप से मेटाबॉलिक हेल्थ को नुकसान पहुंचाते हैं और खराब कोलेस्ट्रॉल के पैटर्न को बढ़ावा देते हैं। डॉ. नागेश कहते हैं कि रोजाना 30 से 45 मिनट तेज चाल से पैदल चलना, नियमित व्यायाम, वजन कम करना और संतुलित आहार अपनाने से कुछ महीनों के भीतर LDL कोलेस्ट्रॉल में स्पष्ट सुधार देखा जा सकता है।
कब पड़ती है दवा की जरूरत?
एक्सपर्ट के मुताबिक अगर लाइफस्टाइल में बदलाव के बावजूद कोलेस्ट्रॉल लगातार अधिक बना रहे, या व्यक्ति को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान की आदत है, मोटापा या कम उम्र में दिल के रोगों की फैमिली हिस्ट्री है तो दवा शुरू करना जरूरी हो जाता है। ऐसे मामलों में इलाज में देरी करने से भविष्य में हृदय संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय या नई दिनचर्या शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, डेस्क जॉब, खराब डाइट, बिगड़ता लाइफस्टाइल और निष्क्रिय जीवनशैली कम उम्र में ही लोगों को डायबिटीज का शिकार बना रही है। खराब डाइट का सेवन तेजी से ब्लड में शुगर का स्तर बढ़ाता है। आमतौर पर माना जाता है कि ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए बॉडी को एक्टिव रखना, घंटों जिम में पसीना बहाना जरूरी है। वॉक को खासतौर पर शुगर कंट्रोल करने के लिए जरूरी माना जाता है। अक्सर लोग सीटिंग जॉब, वक्त की कमी और आलस की वजह से वॉक नहीं कर पाते और उनका शुगर का स्तर बढ़ने लगता है।
बोर्ड-प्रमाणित इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. पर्ल ने इंस्टाग्राम पोस्ट में डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए रिसर्च का हवाला देते हुए बताया कि अगर हर 45 मिनट में सिर्फ 3 मिनट तक ये खास एक्सरसाइज की जाए तो आसानी से ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल किया जा सकता है। इस स्टडी में अधिक वजन वाले पुरुषों पर 8.5 घंटे तक बैठे रहने की स्थिति में अलग-अलग तरह की शारीरिक गतिविधियों के असर की तुलना की गई।
डॉ. पर्ल के मुताबिक हर 45 मिनट में बॉडी-वेट स्क्वाट्स (Body weight Squats) करने वाले लोगों में ब्लड शुगर का स्तर, उन लोगों की तुलना में बेहतर रहा जो 30 मिनट तक वॉक करते थे। एक्सपर्ट ने बताया इस एक्सरसाइज का असर सिर्फ ब्लड शुगर कंट्रोल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिमाग और ओवर ऑल हेल्थ के लिए भी फायदेमंद हो सकता है।
3 मिनट की एक्सरसाइज कैसे असर करती है, रिसर्च से समझें
शोध में प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया। पहला समूह पूरे समय बैठा रहा जबकि दूसरे समूह ने एक बार 30 मिनट की वॉक की। तीसरे समूह ने हर 45 मिनट में 3 मिनट तक वॉक की। चौथे समूह ने हर 45 मिनट में लगभग 10 बॉडी-वेट स्क्वाट्स किए। डॉ. पर्ल मटर ने रिसर्च के निष्कर्ष का हवाला देते हुए बताया जिन लोगों ने हर 45 मिनट में थोड़ी-थोड़ी एक्सरसाइज, चाहे स्क्वाट्स हों या छोटी वॉक हो, की उनका ब्लड शुगर बेहतर तरीके से नॉर्मल रहा। एक्सपर्ट ने बताया साढ़े 8 घंटे बैठकर काम करने के बाद सिर्फ 30 मिनट की वॉक करने से बेहतर हर 45 मिनट में 3 मिनट की एक्सरसाइज है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि ब्लड शुगर कंट्रोल का संबंध ग्लूटियस मैक्सिमस (कूल्हों की बड़ी मांसपेशी) और क्वाड्रिसेप्स (जांघ की आगे की मांसपेशियां) के सक्रिय होने से था। इससे पता चलता है कि शरीर की ये बड़ी मांसपेशियां मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाए रखने में अहम किरदार निभाती हैं। डॉ. पर्ल मटर ने कहा हर किसी के लिए हर 45 मिनट में एक्सरसाइज करना संभव नहीं हो सकता। लेकिन इस स्टडी की खास बात यह है कि इसमें अलग-अलग तरह की छोटी-छोटी एक्सरसाइज को देखा गया। चाहे कुछ लोग स्क्वाट्स करें या थोड़ी देर टहलें, शरीर को इससे मेटाबॉलिक फायदे मिलते हैं। इसका सकारात्मक असर दिमाग की सेहत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि मेटाबॉलिज्म और ब्रेन हेल्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
बार-बार थोड़ा चलना-फिरना क्यों है जरूरी?
एलीट केयर क्लिनिक के कंसल्टेंट फिजिशियन डॉ. पल्लेटी शिवा कार्तिक रेड्डी (MBBS, MD, FAIG) ने बताया हर आधा से एक घंटे में थोड़ी देर चलना-फिरना लंबे समय तक लगातार बैठे रहने के नुकसान को कम करता है। लगातार बैठे रहने से मांसपेशियां ब्लड से ग्लूकोज कम मात्रा में ले पाती हैं। जब स्क्वाट्स, तेज चाल से चलना या सीढ़ियां चढ़ने जैसी एक्टिविटी की जाती है तो शरीर की बड़ी मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, तो वे खून में मौजूद ग्लूकोज को ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करती हैं। यह प्रक्रिया कुछ हद तक इंसुलिन पर निर्भर नहीं होती।
एक्सपर्ट ने बताया अगर कोई इंसान पूरा दिन 10 से 12 घंटे सिर्फ बैठा रहता है और फिर एक बार आधा घंटे वॉक कर लेता है तो ऐसे लोगों में ब्लड शुगर में उतार चढ़ाव बना रहता है। इसके विपरीत, दिनभर में बार-बार छोटे-छोटे मूवमेंट ब्रेक लेने से शरीर को लगातार मेटाबॉलिक फायदा मिलता है, जिससे ब्लड शुगर बेहतर तरीके से कंट्रोल रहता है और समय के साथ इंसुलिन सेंसिटिविटी भी सुधरती है।
शुगर कंट्रोल करने के लिए कौन-कौन सी एक्सरसाइज करें?
डॉ. रेड्डी के अनुसार बॉडी-वेट स्क्वाट्स इसलिए प्रभावी हैं क्योंकि ये पैरों की बड़ी मांसपेशियों को एक्टिव करती है, जो अधिक मात्रा में ग्लूकोज का उपयोग कर सकती हैं। एक्सपर्ट ने बताया हालांकि एक्सरसाइज करना सभी के लिए उपयुक्त नहीं है खासकर जिन बुजुर्गों को संतुलन बनाने में परेशानी होती है, घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित लोगों, गंभीर मोटापे से ग्रस्त लोगों या जिन्हें पहले से ही जोड़ों के दर्द की समस्या है उनके लिए एक्सरसाइज करना परेशानी का सबब बन सकता है। एक्सपर्ट ने बताया एक्सरसाइज हमेशा व्यक्ति की उम्र, फिटनेस और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।
सिटिंग जॉब करते हैं तो इस तरह रखें बॉडी को एक्टिव
फोन पर बात करते समय कुछ कदम टहलें इस तरह आपकी बॉडी एक्टिविटी बढ़ेगी और मसल्स की स्टिफनेस कम होगी और शुगर नॉर्मल रखने में भी मदद मिलेगी।
अगर आप ज्यादा मीटिंग करते हैं या सीटिंग जॉब करते हैं तो एक मीटिंग खत्म होने और दूसरी शुरू होने के बीच 2–3 मिनट चलें। इस तरह 2 से तीन मिनट की वॉक आपकी बॉडी के लिए असरदार साबित होगी।
हर 45–60 मिनट में उठकर थोड़ी देर चलें या कुछ स्क्वाट्स करें। नियमित रूप से ऐसा करने पर समय के साथ ब्लड शुगर कंट्रोल और मेटाबॉलिक हेल्थ में सुधार देखा जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों से हुई बातचीत पर आधारित है।