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  • खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    वारसॉ (पोलैंड). खूबसूरती पाने की चाहत जब एक पागलपन या मानसिक बीमारी का रूप ले ले, तो इसके नतीजे कितने खौफनाक हो सकते हैं, इसका एक जीता-जागता और डरावना उदाहरण पोलैंड से सामने आया है. यहां एक 26 साल की युवती एल्वा ने महंगे डॉक्टरों और कॉस्मेटिक क्लीनिकों की फीस से बचने के लिए इंटरनेट से नकली और बिना लाइसेंस वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदे. इसके बाद उसने किसी भी ट्रेनिंग के बिना, घर पर ही खुद से अपने चेहरे पर सिलिकॉन के इंजेक्शन लगाना शुरू कर दिया. इस जानलेवा लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि आज उसके चेहरे की हालत बद से बदतर हो चुकी है. आईने में एल्वा अब खुद को भी पहचान नहीं पा रही है.

    मूल रूप से पोलैंड के एक छोटे से शहर में लड़के के रूप में जन्मी एल्वा पिछले कई सालों से अपनी शारीरिक बनावट और लुक को लेकर मानसिक तनाव से गुजर रही थीं. अपने चेहरे को बदलने की चाहत में उसने कुछ साल पहले ब्लैक मार्केट से संदिग्ध कॉस्मेटिक उत्पाद ऑर्डर करना शुरू किया. शुरुआत में उन्होंने खुद ही चेहरे की चर्बी घटाने वाली दवाओं के इंजेक्शन सप्ताह में दो बार अपने चेहरे पर लगाने शुरू किए. इसका असर यह हुआ कि उसका चेहरा जरूरत से ज्यादा पतला और पिचक गया. इस नुकसान की भरपाई करने के लिए उसने इंटरनेट से इंजेक्टेबल लिपोलिसिस और नकली सिलिकॉन खरीदा और उसे चेहरे पर इंजेक्ट करना शुरू कर दिया.

    एल्वा ने एक पोलिश समाचार आउटलेट को बताया कि शुरुआत में वे सप्ताह में एक बार सिलिकॉन इंजेक्शन लगाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसकी ऐसी लत लगी कि वे हर दिन अपने चेहरे पर खुद ही सुई चुभाने लगीं. उस समय वे वारसॉ शहर में रह रही थीं और उनकी अधिकांश कमाई कमरे के किराए में चली जाती थी, इसलिए उनके पास किसी एक्सपर्ट डॉक्टर के पास जाने के पैसे नहीं थे. ऐसे में बिना किसी डॉक्टरी प्रशिक्षण और भारी मात्रा में नकली सिलिकॉन का इस्तेमाल करने के कारण एल्वा के पूरे चेहरे पर गंभीर सूजन आ गई. उनकी त्वचा पर गहरे निशान (Scars) पड़ गए हैं और उनकी आंखें सूजन के कारण लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी हैं.

    इस मामले पर चिंता जताते हुए एस्थेटिक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ मारेक वासिलुक ने कहा कि एल्वा ने जिन उत्पादों का इस्तेमाल किया है, वे प्रमाणित नहीं हैं और बेहद खतरनाक हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि भले ही अभी कोई गंभीर संक्रमण न दिख रहा हो, लेकिन अगले छह महीनों में यह सूजन जानलेवा इन्फेक्शन का रूप ले सकती है, जिसमें उनकी आंखों को सबसे बड़ा खतरा है. वहीं, मनोवैज्ञानिक पॉलिना मिएर्जेजेवस्का का मानना है कि एल्वा ‘बॉडी डिस्मॉर्फिया’ नाम की एक गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक रूप को नापसंद करने लगता है और जोखिमों की परवाह किए बिना काल्पनिक रूप पाने की जिद में अंधा हो जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, एल्वा को वापस सामान्य स्थिति में लाने के लिए पहले मानसिक काउंसलिंग और फिर चेहरे के नुकसान का आकलन करने के लिए एमआरआई कराना होगा.

  • युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    उस बच्चे को दिवाली के मेले के लिए मिले पैसों से मिठाई की जगह झांसी की रानी की तस्वीर की तलाश रहती थी. तस्वीर न मिलती तो मन उदास हो जाता. मिल जाती तो चेहरे पर चमक आ जाती. मां से वो बच्चा कहता कि झांसी की रानी के रास्ते चलूंगा. लाहौर में आगे की पढ़ाई के समय आर्यसमाजी ताऊ की सलाह डी.ए.वी.कॉलेज के लिए थी. उस किशोर की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था, जो राष्ट्रीय आंदोलन की नर्सरी था. यहीं सुखदेव और सरदार भगत सिंह का साथ हुआ. यह ऐसा साथ था कि फांसी के फंदे पर भी कायम रहा.

    क्रांतिकारी रास्ते से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने में यकीन रखने वाले सुखदेव और उनके साथियों के हाथों में सिर्फ पिस्तौल-बम नहीं थे. वे खूब पढ़ते थे. वैचारिक दृष्टि से समृद्ध थे. महात्मा गांधी से मतभेद थे लेकिन उनका आदर करते थे. सवाल भी करते थे. उन्होंने महात्मा गांधी को लिखा था “मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं.” सरदार भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ने वाले 23 साल के सुखदेव उन जैसे ही पढ़ाकू, तेजस्वी और साहसी थे. पढ़िए अमर शहीद सुखदेव की गाथा.

    झांसी की रानी जैसा बनूंगा

    15 मई 1907 को जन्मे सुखदेव के सिर से सिर्फ तीन साल की उम्र में पिता रामलाल थापर का साया उठ गया था. मां रल्ली देई की ममता और गांधीवादी ताऊ चिन्त राम थापर के संरक्षण के बीच वे पढ़ते और देश-समाज को समझने की कोशिश करते रहे. लेकिन उनकी मंजिल क्या होगी, इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे.

    Rani Laxmi Bai

    रानी लक्ष्मीबाई.

    दिवाली में घर के बच्चों को पैसे मिलते. वे पटाके और मिठाइयां खरीदने के लिए निकल पड़ते. लेकिन छोटे से सुखदेव को उस तस्वीर की तलाश रहती जिसमें घोड़े पर सवार झांसी की रानी पीठ पर बच्चा बंधा होता. एक हाथ में लगाम होती. दूसरे में तलवार. कभी तस्वीर मिलती. कभी नहीं. जब नहीं मिलती, तब उदासी घेर लेती. मिल जाती तो चेहरा चमक उठता. घर पहुंच मां को तस्वीर दिखाते वह यही कहता – ऐसा ही बनूँगा.

    कॉलेज में हुआ भगत सिंह का साथ

    एक सदी से अधिक पहले के उस दौर की कल्पना की जाए, जब न इतने अखबार थे और न चौबीस घंटे चलने वाले खबरिया चैनल. देश-दुनिया के हाल जानने के सीमित संचार साधनों के बीच भी जो सजग-संवेदनशील और जागरूक थे, उसे पंद्रह साल के किशोर सुखदेव के जरिए समझिए. 1922 में लायलपुर से उन्होंने हाईस्कूल पास किया. आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर गए.

    आर्यसमाजी ताऊ उन्हें डी.ए.वी.कॉलेज में दाखिल कराना चाहते थे. लेकिन सुखदेव की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था. उन्हें पता था कि यह कॉलेज उनकी राष्ट्रवादी सोच के अनुकूल है और जिस माहौल और साथ की उन्हें चाह है , वह यहीं हासिल हो सकता है. यहीं उनका साथ सरदार भगत सिंह का साथ हुआ, जो आखिरी सांस तक कायम रहा.

    सुखदेव.

    सुखदेव भी भगत सिंह जैसे पढ़ाकू

    तीन साल बाद सुखदेव के छोटे भाई मथरादास भी पढ़ाई के लिए लाहौर पहुंचे. हॉस्टल छोड़कर सुखदेव एक किराए के मकान में आ गए. इस बीच सुखदेव अपने कोर्स से ज्यादा इतिहास, राजनीति और दुनिया के कई देशों की क्रांतियों से जुड़ी किताबों में डूबे रहे. उनकी आलमारी में ये किताबें सिर्फ सजी नहीं थीं , बल्कि सुखदेव और साथियों के बीच उन पर लगातार चर्चा होती रहती थी. सुखदेव और भगत सिंह के बीच अराजकतावाद पर लंबी बहसें मथरादास ने भी खूब सुनीं. बाद में अपने भाई सुखदेव पर लिखी किताब में मथरादास ने याद किया कि उन्हीं दिनों भगत सिंह ने द्वारका दास लाइब्रेरी से प्राप्त किताब “अनारकिज्म एंड अदर एसेज” पढ़ी थी. इस किताब पर भगत सिंह और सुखदेव महीनों तक मंथन करते रहे. प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने लिखा है, “भगत सिंह और सुखदेव को छोड़कर अन्य किसी साथी ने समाजवाद पर उन जैसा पढ़ा और मनन नहीं किया था. उनका ज्ञान हमारी तुलना में कहीं अधिक था.”

    क्रांति के लिए हर रिश्ता कुर्बान

    अप्रैल 1929 के मशहूर असेंबली बम एक्शन के लिए चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को नहीं चुना था. यह पहला क्रांतिकारी एक्शन था, जिसमें बम फेंकने के बाद भागने की जगह क्रांतिकारियों को अपनी गिरफ्तारी देनी थी. पुलिस को सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह की तलाश थी. आजाद को पता था कि एक बार भगत सिंह के जेल में पहुंच जाने के बाद उनकी वापसी मुमकिन नहीं होगी. आजाद अपने बेशकीमती साथी को खोना नहीं चाहते थे. लेकिन सुखदेव का प्रस्ताव था कि इसमें भगत सिंह को जरूर शामिल किया जाए.

    साथियों की बैठक में सुखदेव सिंह ने भगत सिंह को ललकारा भी था. फिर भगत सिंह अड़ गए थे. आजाद के बहुत समझाने पर भी नहीं माने थे. बटुकेश्वर दत्त के साथ सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी थी. सुखदेव की दलील थी कि भगत सिंह अकेले व्यक्ति हैं, जो दल के उद्देश्यों को प्रभावी तरीके से जनता के सामने रख सकते हैं.

    Bhagat Singh

    भगत सिंह.

    प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने “संस्मृतियों” में लिखा, “सुखदेव में व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा भगत सिंह के लिए ममता थी. प्यार नाम की जो पूंजी उनके पास थी, वह उन्होंने भगत सिंह को ही सौंपी थी. लेकिन समय आने पर आदर्शों के लिए अपने सबसे प्यारे दोस्त को मौत के मुंह में भेजने में उन्होंने संकोच नहीं किया. क्रांति के रास्ते प्यार और दोस्ती कैसे आड़े आ सकती थी?”

    अदालत में बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं

    असेंबली बम कांड में जेल पहुंचे भगत सिंह सांडर्स हत्याकांड के भी अभियुक्त थे. सुखदेव की भी इसी मामले में गिरफ्तारी हुई. लाहौर षडयंत्र केस के नाम से चर्चित इस मामले में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने अन्य साथियों की तरह सुखदेव की भी अपने बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं थे. सरकारी खर्च पर वकील मुहैया करने की अदालत की पेशकश पर उनका जवाब था कि वे इस अदालत को ही मान्यता नहीं देते. भगत सिंह की तरह सुखदेव ने भी अदालती कार्यवाही को क्रांतिकारी आदर्शों के प्रचार का जरिया बनाया. इस दौरान या तो ब्रिटिश राज के खिलाफ नारे लगाते रहे या फिर कटघरे में ही किसी किताब में डूबे रहे. तय मानते थे कि सरकार छोड़ेगी नहीं और जिन्हें फांसी होनी है, उसमें उनका भी नाम होगा. कभी कह पड़ते थे कि न्याय का यह आडंबर कब तक चलता रहेगा ? फैसला वही हुआ. अदालत ने भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव को भी फांसी की सजा सुनाई.

    जेल से महात्मा गांधी को पत्र

    फांसी का सुखदेव और साथियों को बेसब्री से इंतजार था. इस दौरान भी वे लिख-पढ़ रहे थे. आखिरी दिनों में सुखदेव ने अपने छोटे भाई मथरादास को महात्मा गांधी के नाम लिखा एक पत्र सिपुर्द किया था. मथरादास ने काफी मुश्किलों के बीच इसे कांग्रेस के कराची अधिवेशन में महात्मा गांधी तक महादेव देसाई के जरिए पहुंचाया था. दुर्भाग्य से उसके पहले 23 मार्च 1931 को सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को फांसी हो चुकी थी. सुखदेव ने महात्मा गांधी को लिखा था कि समझौते (गांधी-इर्विन पैक्ट) के बाद क्रांतिकारियों से अपना आंदोलन बंद करने और अहिंसक उपायों के प्रयोग की आपने कई प्रकट प्रार्थनाएं की हैं.

    Mahatma Gandhi

    महात्मा गांधी.

    हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही स्पष्ट है कि क्रांतिकारियों का आदर्श समाज सत्तावादी प्रजातंत्र स्थापित करना है और जब तक ये ध्येय प्राप्त न हो और जब तक आदर्श सिद्ध न हों ,वे लड़ाई जारी रखने के लिए बंधे हुए हैं. क्रांतिकारी युद्ध जुदा जुदा मौकों पर अलग रूप धारण करता है. कभी गुप्त, कभी प्रकट और कभी जीवन मरण का भयानक संग्राम बन जाता है. ऐसी परिस्थिति में क्रांतिकारियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिकारी युद्ध में कोई महत्व नहीं होता.

    महात्मा गांधी पर नौकरशाही की मदद का आक्षेप

    सुखदेव ने महात्मा गांधी से उम्मीद जताई थी,”मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं. क्रांति के कार्य में दूसरे किसी अंग की अपेक्षा रचनात्मक पक्ष का महत्व समझते हैं लेकिन मौजूदा हालत में अपने संहारक अंग पर डटे रहने के अलावा कोई चारा नहीं है.”

    याद दिलाया कि 1915 से जेलों में पड़े गदर पार्टी के बीसियों कैदियों सजा की मियाद पूरी करने के बाद भी सड़ रहे हैं. मार्शल लॉ के बीसियों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाए पड़े हैं.यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है. देवगढ़, काकोरी, मछुआ बाजार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी भी जेलों में हैं. लाहौर, दिल्ली, चटगांव,बंबई, कलकत्ता और अन्य जगहों के आधा दर्जन से ज्यादा षड्यंत्र मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिकारी जिसमे स्त्रियां भी हैं भागते फिर रहे हैं. सचमुच आधा दर्जन से ज्यादा कैदी फांसी के इंतजार में हैं. ये सब होने के बाद भी आप उन्हें अपना आंदोलन स्थगित करने की सलाह देते हैं. ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि इस आंदोलन को कुचल देने में आप नौकरशाही की मदद कर रहे हैं और आपकी विनती का अर्थ उनके दल का द्रोह,पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.

    गांधी का जवाब लेकिन तब तक सुखदेव नहीं रहे

    30 अप्रैल 1931 के “हिंदी नवजीवन” में महात्मा गांधी ने सुखदेव के पत्र का जवाब दिया था लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे. सुखदेव ने गांधी को लिखे पत्र में स्वयं को अनेकों में एक बताया था. बापू ने लिखा कि स्वर्गीय सुखदेव का यह पत्र मुझे उनकी मृत्यु के बाद दिया गया. वे अनेकों में एक नहीं हैं. राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए फांसी को गले लगाने वाले अनेक नहीं होते. राजनीतिक खून चाहें जितने निंद्य हों, तो भी जिस देश प्रेम और साहस के कारण ऐसे भयानक काम किए जाते हैं, उनकी कद्र किए बिना नहीं रहा जा सकता. और, यह आशा रखें कि राजनीतिक खूनियों का संप्रदाय बढ़ नहीं रहा है. यदि भारत वर्ष का प्रयोग सफल हुआ, और होना ही चाहिए, तो राजनीतिक खूनियों का पेशा सदा ले लिए बंद हो जाएगा. मैं स्वयं तो इसी श्रद्धा के साथ काम कर रहा हूं. लेखक यह कहकर मेरे साथ अन्याय करते हैं कि क्रांतिकारियों से उनका आंदोलन बंद करने की भावपूर्ण प्रार्थनाएं करने के सिवा मैंने कुछ नहीं किया.उल्टे मेरा दावा तो यह है कि मैंने उनके सामने नग्न सत्य रखा है, जिसका इन स्तंभों में कई बार जिक्र किया जा चुका है और उसे फिर से दोहराया जा सकता है.

  • OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    सोशल मीडिया पर इन दिनों एक अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाला मामला तेजी से वायरल हो रहा है. एक टिकटॉक क्रिएटर ने जब अपने परिवार के इतिहास का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट कराया, तो जो सच सामने आया उसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी. जिस महिला से उसकी शादी हुई और जिससे उसके दो प्यारे बच्चे हैं, वह असल में उसकी चचेरी बहन निकली. इस चौंकाने वाले खुलासे ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है और लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

    जब अजनबी बन गए रिश्तेदार

    बोर्ड पांडा की रिपोर्ट के अनुसार, टिकटॉक पर @toothlessandruthless नाम से वीडियो शेयर करने वाले इस क्रिएटर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका पारिवारिक इतिहास ऐसा मोड़ लेगा. वह और उसकी पत्नी दोनों ही अपनी फैमिली हिस्ट्री और डीएनए का पता लगाना चाहते थे. जब दोनों की डीएनए रिपोर्ट्स आईं, तो पता चला कि वे दोनों आपस में फर्स्ट कजिन हैं. हैरानी की बात यह थी कि शादी से पहले इस बात की भनक न तो उन दोनों को थी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य को.

    बच्चों के भविष्य और तलाक की चिंता

    इस खुलासे के बाद से वह व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव में है. उसने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए लोगों से सलाह मांगी कि अब उसे क्या करना चाहिए. उसने वीडियो में कहा, जब से मुझे पता चला है कि मैंने अपनी चचेरी बहन से शादी की है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करूं. क्या हमें तलाक ले लेना चाहिए? हमारे बच्चों का क्या होगा? उनका यह वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और इसे करोड़ों लोग देख चुके हैं.

    क्यों नहीं हुई थी किसी को पहले इस रिश्ते की भनक?

    लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह था कि शादी के वक्त किसी को इस पारिवारिक संबंध के बारे में क्यों नहीं पता चला? इस पर क्रिएटर ने सफाई दी कि यह रिश्ता उनकी फैमिली ट्री की एक ऐसी भूली-बिसरी शाखा से जुड़ा था जिसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. उनकी दादी और उनकी पत्नी की दादी सगी बहनें थीं, लेकिन वक्त के साथ यह संपर्क टूट गया और दोनों परिवारों को कभी इस बात का अंदाजा ही नहीं हुआ.

    दो हिस्सों में बंटे नेटिजन्स

    इस वायरल खुलासे पर सोशल मीडिया यूजर्स की राय दो हिस्सों में बंट गई है. कुछ लोगों का कहना है कि चचेरे भाई-बहनों में शादी के बाद पैदा होने वाले बच्चों में थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी जेनेटिक बीमारियां होने का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है. इसलिए उन्हें तुरंत बच्चों की मेडिकल जांच करवानी चाहिए और कपल्स थेरेपी लेनी चाहिए. यह भी पढ़ें: डर की ऐसी की तैसी! 97 साल की ‘दादी’ ने उड़ते प्लेन पर किया ऐसा स्टंट, देख दंग रह गई दुनिया

    बात को दबाने की सलाह

    वहीं कुछ यूजर्स का मानना है कि अब बहुत देर हो चुकी है, उनके दो बच्चे हैं, इसलिए उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और इस बात को यहीं खत्म कर देना चाहिए क्योंकि इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय शांत रहकर डॉक्टर और जेनेटिक काउंसलर की मदद लेनी चाहिए.

  • पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    सोशल मीडिया पर तमाम तरह के वीडियो वायरल होते रहते हैं, जो बहुत मजेदार होते हैं. खासतौर पर बच्चों के फनी वीडियो को लोग खूब पसंद करते हैं. आजकल जैसे-जैसे सोशल मीडिया का जमाना आगे बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे अलग-अलग तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते रहते हैं. स्कूल के वीडियो भी खूब लोगों को पसंद आते हैं. ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहा है. वायरल हो रहा वीडियो एक स्कूल के क्लासरूम का है, जिसमें एक क्लास टीचर नजर आ रही है और कुछ बच्चे बेंच पर बैठे हुए नजर आ रहे हैं.

    वायरल वीडियो में मैडम बच्चों की टेस्ट कॉपी देख रही हैं. जिसमें एक कॉपी को लेकर वह बहुत हंसती हुई नजर आ रही हैं. दरअसल, टेस्ट में सवाल पूछा गया था कि जंगलों से वन्य जीव क्यों कम होते जा रहे हैं, इसका कारण क्या है? इस सवाल का जवाब एक बच्चे ने बहुत मजेदार दिया है. बच्चे ने कॉपी में प्रश्न का जवाब लिखा है कि जंगलों से वन्य जीव इसलिए गायब हो रहे हैं. क्योंकि वह किडनैप हो रहे हैं और फिर उनको जू में लाया जा रहा है.

     

     

    बच्चे ने जवाब में लिखा, ‘इतने पेड़-पौधे कट रहे हैं. और जानवर किडनैप हो रहे हैं. और जू में जा रहे हैं. इसलिए वन्यजीवों की संख्या में गिरावट आ रही है. इस वायरल वीडियो को हजारों लोगों ने लाइक्स किया है. इस तरह के वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं. क्योंकि लोग खूब पसंद करते हैं. बच्चे सवालों के जवाब बहुत मजेदार देते हैं.

  • हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    सपने आने के पीछे वैज्ञानिकों ने कई वजह बताई है.

    सपना हर कोई देखता है, लेकिन हर सपना सुबह तक याद नहीं रहता. कुछ बिल्कुल याद नहीं रहता. कुछ थोड़ा-बहुत मेमोरी में रह जाता है. अब सवाल है कि सपना देखते ही क्यों है और यह पूरी तरह से याद क्यों रहता. विज्ञान कहता है, सपने का कनेक्शन इस बात से होता है कि हमारे दिमाग की मेमोरी कैसी है. सोते समय कौन-कौन सी बातें याद हैं और वो इंसान भावनात्मक रूप से यानी इमोशनली कैसा है.

    नींद कई चरणों में बंटी होती है. इसका एक हिस्सा है REM (रैपिड आई मूवमेंट) स्लीप. सपने नींद के इसी चरण में आते हैं. इस दौरान आंखें तेजी से इधर-उधर घूमती हैं, दिल की धड़कन और सांस की रफ्तार बदलती रहती है, और दिमाग लगभग उतना ही सक्रिय हो जाता है जितना जागते समय होता है, बस शरीर सोया रहता है.

    सपने क्यों आते हैं?

    इस सवाल पर वैज्ञानिकों के बीच अभी भी पूरी सहमति नहीं है, लेकिन कुछ ठोस थ्योरी बताई गई हैं.

    1- मेमोरी प्रोसेसिंग थ्योरी

    इस थ्योरी की सबसे ज्यादा मानी जाने वाली वजह यह है कि नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है, यही वजह है कि कोई नई चीज सीखने के बाद अच्छी नींद लेने से उसे बेहतर तरीके से याद रखा जा सकता है.

    सपने इसी प्रोसेस का एक साइड-इफेक्ट माने जाते हैं. दिमाग दिनभर जमा हुई जानकारी को छांटता है, जरूरी यादों को पक्का करता है और बेकार डेटा को हटाता है.

    नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है. फोटो: Pexels

    2-दिमाग का कौन सा हिस्सा शामिल?

    ब्रेन स्कैन से पता चलता है कि सपने देखते वक्त याद्दाश्त, इमोशन और कल्पना से जुड़े दिमाग के कई हिस्से बेहद सक्रिय हो जाते हैं. हिप्पोकैम्पस दिनभर की यादों को प्रोसेस करने में मदद करता है, जबकि एमिग्डाला (जो डर और भावनाओं को संभालता है) भी उसी समय बहुत सक्रिय हो जाता है.

    यही वजह है कि कई सपनों में डर, चिंता या भावनाएं शामिल होती हैं. दिमाग असल में उन्हीं भावनाओं को प्रोसेस कर रहा होता है जो दिनभर में अनुभव हुईं या कुछ समय पहले हुई.

    3- इमोशनल रिहर्सल थ्योरी

    कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सपने एक तरह की “इमोशनल रिहर्सल” हैं. दिमाग मुश्किल या तनावपूर्ण स्थितियों को सुरक्षित माहौल में दोहराकर हमें असल जिंदगी में उनसे निपटने के लिए तैयार करता है.

    नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर मेमोरी पर पड़ता है. फोटो: Pexels

    पूरा सपना क्यों नहीं याद रहता?

    यहां दिमाग की केमिस्ट्री एक बड़ा रोल निभाती है. REM स्लीप के दौरान ‘नॉरपेनेफ्रिन’ नाम का एक केमिकल दिमाग में बेहद कम मात्रा में मौजूद होता है. यह वही केमिकल है जो हमें नई यादों को मजबूती से दर्ज करने और बाद में याद रखने में मदद करता है. चूंकि सपने देखते वक्त इसका स्तर बहुत नीचे रहता है, दिमाग उस अनुभव को स्थायी याददाश्त में ठीक से “सेव” नहीं कर पाता. इसलिए जागते ही ज्यादातर सपने धुंधले पड़ने लगते हैं और कुछ ही मिनटों में पूरी तरह गायब हो जाते हैं.

    इसके अलावा टाइमिंग का भी बड़ा असर होता है. नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर याद रहने पर पड़ता है. अगर कोई व्यक्ति REM चरण के ठीक अंत में जागता है, जब शरीर नींद के अगले चरण के लिए तैयार हो रहा होता है. तो उसे अपने सपने सबसे ज्यादा याद रहते हैं. यही वजह है कि अलार्म की आवाज से अचानक जागने पर कई बार सपना बहुत साफ याद रहता है, जबकि अपने-आप धीरे-धीरे जागने पर वही सपना कुछ ही देर में भूल जाता है.

  • 258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    कई लोग तनाव कम करने के लिए संगीत सुनते हैं, फिल्म देखते हैं या दोस्तों के साथ समय बिताते हैं. लेकिन जापान में एक महिला ने स्ट्रेस दूर करने के लिए ऐसा तरीका अपनाया, जिसे सुनकर शायद आप भी हैरान रह जाएंगे. महिला ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर एनीमे कैरेक्टर्स से जुड़े सामान देखती थी और सामान को ऑर्डर करने से उसे काफी सुकून मिलता था. हैरानी की बात यह है कि उसने करीब दो साल में 258 करोड़ रुपये से ज्यादा के सामान के ऑर्डर कर डाले, लेकिन इनमें से एक भी प्रोडक्ट उसके घर नहीं पहुंचा.

    जापान की 32 वर्षीय महिला योशिदा पर आरोप है कि वह ऑनलाइन स्टोर से सामान ऑर्डर करने के बाद अलग-अलग तरीकों से उसे कैंसिल करवा देती थी. कई बार वह डिलीवरी के लिए अपना सही पता देने के बजाय गलत या नकली पता इस्तेमाल करती थी. ऐसे में डिलीवरी एजेंट किसी दूसरे घर तक पहुंच जाता और सामान महिला तक पहुंचने से पहले ही ऑर्डर रद्द हो जाता था. कुछ मामलों में उसने पार्सल की पेमेंट के लिए कन्वीनियंस स्टोर का विकल्प चुना, लेकिन तय समय के अंदर भुगतान नहीं किया. वहीं कुछ ऑर्डर में उसने कैश ऑन डिलीवरी के समय सामान लेने से साफ इनकार कर दिया. इस तरह ऑर्डर करने और फिर उसे कैंसिल कराने का सिलसिला लगातार चलता रहा.

    दो साल में 2 हजार से ज्यादा ऑर्डर कैंसिल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिलसिला करीब दो साल तक चला और इस दौरान महिला ने 2,000 से ज्यादा ऑर्डर अलग-अलग तरीकों से कैंसिल किए. बार-बार ऑर्डर कैंसिल होने से सिर्फ ऑनलाइन स्टोर का काम ही प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि कंपनी को डिलीवरी और उससे जुड़े खर्चों का भी नुकसान उठाना पड़ा. जापानी ब्रॉडकास्टर FNN प्राइम ऑनलाइन के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में शुएशा के Jump Characters Store को करीब 75 लाख येन यानी लगभग 45 लाख रुपये का नुकसान हुआ. कंपनी के लिए परेशानी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि जिन प्रोडक्ट्स को महिला बार-बार बुक करती और फिर कैंसिल करती थी, उन्हें उस दौरान दूसरे ग्राहक खरीद नहीं पाते थे.

    महिला ने बताया, ऑर्डर करने से मिलता था सुकून
    जांच के दौरान योशिदा ने अपने इस व्यवहार की वजह भी बताई. उसके मुताबिक, उसे ऑनलाइन स्टोर पर एनीमे कैरेक्टर्स के सामान देखना काफी पसंद था. रोजमर्रा की जिंदगी में टेंशन ज्यादा होने के कारण जब भी वह किसी सामान के उपलब्ध होने से पहले उसे ऑर्डर करती थी, तो उसे एक अलग तरह की संतुष्टि महसूस होती थी. उसने यह भी कहा कि कंपनी के प्रति उसकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. वह यह सब अपने टेंशन को कम करने और खुद को अच्छा महसूस कराने के लिए करती थी. यानी उसके लिए असली खुशी सामान हासिल करने में नहीं, बल्कि उसे ऑनलाइन ऑर्डर करने में थी.

    238 अलग-अलग अकाउंट्स से करती थी शॉपिंग
    इस मामले की एक और हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि महिला ने ऑनलाइन शॉपिंग के लिए करीब 238 अलग-अलग अकाउंट्स का इस्तेमाल किया. FNN (फुजी न्यूज नेटवर्क) की रिपोर्ट के अनुसार, उसने लगभग छह साल पहले इस ऑनलाइन स्टोर से सामान खरीदना शुरू किया था. शुरुआत में वह सामान ऑर्डर करने के बाद उसकी डिलीवरी भी लेती थी. लेकिन अक्टूबर 2023 के आसपास उसका तरीका बदल गया. इसके बाद वह सामान ऑर्डर करने और फिर किसी न किसी तरीके से उसे कैंसिल कराने लगी. धीरे-धीरे यह आदत इतनी बढ़ गई कि हजारों ऑर्डर इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए.

    कंपनी ने पुलिस से की सख्त कार्रवाई की मांग
    शुएशा का कहना है कि महिला की इस हरकत का असर उन ग्राहकों पर भी पड़ा, जो वास्तव में प्रोडक्ट खरीदना चाहते थे. जब कोई सामान बार-बार बुक होकर कैंसिल होता रहा, तो दूसरे ग्राहकों को उसे खरीदने का मौका नहीं मिल पाता था. कंपनी ने इस वजह से पुलिस से मामले में कार्रवाई की मांग की. रिपोर्ट्स के मुताबिक, योशिदा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया है. अब जापानी कानून के तहत उसके खिलाफ कथित तौर पर धोखाधड़ी के जरिए कारोबार में रुकावट डालने के मामले में कार्रवाई की जा रही है. यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहां ऑनलाइन शॉपिंग का मकसद सामान खरीदना नहीं, बल्कि सिर्फ ऑर्डर करने से मिलने वाला मानसिक सुकून बताया गया है.

  • क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट बनी है.

    अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को रामसर साइट का दर्जा मिला है. यह राज्य के लिए बड़ी पर्यावरणीय उपलब्धि है. ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट बनी है. यह झील अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है. अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इसका महत्व और बढ़ गया है. यह दर्जा झील के संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के लिए बहुत अहम माना जा रहा है. ताजे फैसले के बाद अब भारत में रामसर साइट्स की संख्या बढ़कर 101 हो गई है.

    आइए, ताजे संदर्भों के बहाने समझते हैं कि आखिर क्या होती है रामसर साइट? अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को इसका दर्जा मिलन कितना महत्वपूर्ण? यह भी जानेंगे कि झील कितनी पुरानी और कितनी खास है?

    रामसर साइट के क्या हैं मायने?

    रामसर साइट ऐसी आर्द्रभूमि होती है, जिसका पर्यावरणीय महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है. आर्द्रभूमि में झील, तालाब, दलदल, नदी का क्षेत्र, मैंग्रोव, बाढ़ का मैदान और कुछ तटीय इलाके शामिल हो सकते हैं. रामसर कन्वेंशन की शुरुआत 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में हुई थी. इसी शहर के नाम पर इस समझौते को रामसर कन्वेंशन कहा गया. इसका उद्देश्य दुनिया की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों का संरक्षण करना है. किसी क्षेत्र को रामसर साइट घोषित करने से पहले उसकी पारिस्थितिक स्थिति का अध्ययन किया जाता है. देखा जाता है कि वह क्षेत्र दुर्लभ जीव-जंतुओं और पौधों के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

    यह भी देखा जाता है कि वहां पानी का प्राकृतिक चक्र, जैव विविधता और स्थानीय जीवन किस तरह जुड़ा हुआ है? रामसर साइट बनने का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी भी तरह की गतिविधि पूरी तरह बंद हो जाती है. इसका उद्देश्य उस क्षेत्र का समझदारी से और टिकाऊ तरीके से उपयोग करना है. साथ ही, विकास कार्यों और पर्यटन को इस तरह नियंत्रित करना होता है कि प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.

    ग्लॉ झील कहां स्थित है?

    ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित है. यह झील कमलांग टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में आती है. यह इलाका पूर्वी हिमालय का हिस्सा है. झील घने जंगलों और पहाड़ी जलधाराओं से घिरी हुई है. इसे बारहमासी पहाड़ी धाराओं से पानी मिलता है. इसका अर्थ है कि झील को साल भर प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी मिलता रहता है.

    ग्लॉ झील तक पहुंचना आसान नहीं है. यहां पहुंचने के लिए जंगल के बीच करीब 20 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है. इसी कारण यह झील आज भी अपेक्षाकृत शांत और प्राकृतिक रूप में बची हुई है. यहां पहुंचने वाले यात्रियों को घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, हरियाली और साफ वातावरण देखने को मिलता है.

    ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किया गया है.

    ग्लॉ झील को रामसर दर्जा कब मिला?

    केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसी महीने ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किए जाने की जानकारी दी. यह अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट है. इस घोषणा को राज्य की पर्यावरणीय विरासत के लिए महत्वपूर्ण कदम माना गया है. इससे ग्लॉ झील को देश और दुनिया में नई पहचान मिली है. राज्य के लिए यह दर्जा इसलिए भी खास है, क्योंकि अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां जंगल, नदियां, पहाड़ और आर्द्रभूमियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं.

    जैव विविधता के लिए क्यों खास है झील?

    ग्लॉ झील और इसके जल-ग्रहण क्षेत्र में पौधों और पेड़ों की 150 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं. इस क्षेत्र में ऑर्किड की करीब 49 प्रजातियां भी पाई जाती हैं. ऑर्किड हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की खास वनस्पतियों में शामिल है. इनकी मौजूदगी इस क्षेत्र की जलवायु और वन पारिस्थितिकी के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती है. झील का आसपास का जंगल कई वन्यजीवों का घर भी है. कमलांग क्षेत्र में हाथी, हिरण, जंगली सूअर, सिवेट, तेंदुआ बिल्ली, विशाल गिलहरी और उड़ने वाली गिलहरी जैसे जीव पाए जाते हैं. झील स्वयं और इसके आसपास का वन्य क्षेत्र मिलकर एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं. इसमें पानी, मिट्टी, पौधे, कीड़े, पक्षी और वन्यजीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं.

    झील जल सुरक्षा में कैसे मदद करती है?

    आर्द्रभूमियां पानी को जमा करने का काम करती हैं. यह बारिश और पहाड़ी जलधाराओं के पानी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाती हैं. इससे नीचे के क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा कम हो सकता है. ग्लॉ झील जैसी ऊंचाई वाली मीठे पानी की झीलें स्थानीय जल-चक्र के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. वे आसपास की धाराओं और नीचे बहने वाली नदियों को पानी देने में मदद करती हैं. आर्द्रभूमियां भूजल को रीचार्ज करने में भी योगदान देती हैं. वे मिट्टी में पानी के रिसाव को बढ़ाती हैं. इसके अलावा, इनके आसपास की वनस्पतियां मिट्टी के कटाव को रोकती हैं. जंगल और झील मिलकर कार्बन को भी अपने भीतर संचित करते हैं. इस कारण ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं.

    मिश्मी समुदाय की आस्था से जुड़ी है यह झील

    ग्लॉ झील स्थानीय मिश्मी समुदायों की सांस्कृतिक आस्थाओं से भी जुड़ी हुई है. स्थानीय लोगों के लिए यह केवल पानी का स्रोत नहीं है. यह उनके इतिहास, परंपरा और प्रकृति से जुड़े विश्वासों का हिस्सा है. स्थानीय मान्यताओं में झील को पवित्र माना जाता है. लोक कथाओं के अनुसार, झील में चार संरक्षक देवताओं का निवास है. इन्हें दो लड़कों और दो लड़कियों के रूप में बताया जाता है. यह भी मान्यता है कि झील में कोई डूबता नहीं है. झील से जुड़ी ऐसी कथाएं स्थानीय संस्कृति का हिस्सा हैं. इनका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. फिर भी, ये कहानियां झील को लोगों की भावनाओं से जोड़ती हैं. स्थानीय समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र के जंगल और जल-स्रोतों के साथ रहते आए हैं. उनके पारंपरिक ज्ञान और संरक्षण की आदतों ने झील की प्राकृतिक स्थिति बनाए रखने में भूमिका निभाई है.

    रामसर दर्जे से क्या लाभ होंगे?

    रामसर दर्जे के बाद ग्लॉ झील के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है. इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित निगरानी और बेहतर प्रबंधन योजना तैयार की जा सकती है. झील के पानी, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी. इससे प्रदूषण, अवैध गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों की पहचान समय पर हो सकती है. इस दर्जे से जिम्मेदार इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिल सकता है. स्थानीय लोगों के लिए गाइड, होम-स्टे, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े रोजगार के अवसर बन सकते हैं.

    ग्लॉ झील कितनी पुरानी है?

    ग्लॉ झील को बहुत पुरानी झील कहा जाता है. इसका कारण इसका प्राकृतिक और लंबे समय से सुरक्षित हिमालयी वातावरण है. लेकिन, झील की भूगर्भीय उम्र का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं मिलता है. इसकी सही उम्र जानने के लिए वैज्ञानिक भूगर्भीय अध्ययन, तलछट की जांच और जलविज्ञान से जुड़े शोध की जरूरत होगी. रामसर साइट का दर्जा झील की उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी महत्व के आधार पर मिला है.

  • सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सांकेतिक तस्वीर

    भविष्य की दुनिया कैसी होगी और आने वाले सालों में इंसानी सभ्यता में क्या बड़े बदलाव होंगे, इसे लेकर अक्सर नई-नई थ्योरीज और दावे सामने आते रहते हैं. हाल ही में खुद को साल 2033 से आया टाइम ट्रेवलर बताने वाले डैरिल डीन नाम के एक अज्ञात शख्स के सनसनीखेज दावों ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है. डैरिल डीन का दावा है कि उसके पास भविष्य में होने वाली घटनाओं की एक पूरी टाइमलाइन मौजूद है. उसके मुताबिक बहुत जल्द पृथ्वी पर एलियंस आने वाले हैं, जिसके बाद दुनिया से युद्ध हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे. पैरानॉर्मल रिसर्च से जुड़े लोकप्रिय यूट्यूब चैनल एपेक्स टीवी पर बात करते हुए इस कथित टाइम ट्रेवलर ने अपने दावों को सही ठहराने के लिए कई भविष्यवाणियों के बारे में बताया.

    डैरिल डीन का कहना है कि वह मूल रूप से साल 2033 का रहने वाला है और थोड़े समय के लिए ही वर्तमान समय में आया था. उसने कहा कि वह दुनिया के हर इंसान को यह समझाने नहीं आया है कि वह सच बोल रहा है, बल्कि वह सिर्फ उन लोगों से बात करना चाहता है जो उसकी बात को गंभीरता से सुनने के लिए तैयार हैं. कथित टाइम ट्रेवलर के अनुसार, भविष्य में कोई भी बड़ा या विनाशकारी युद्ध नहीं होगा. उसने दावा किया कि साल 2028 में एलियंस पृथ्वी पर आएंगे और वे अपने साथ शांति और समृद्धि का एक नया दौर लेकर आएंगे. एलियंस के आने के बाद इंसानों को यह अहसास होगा कि वे आपस में एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, जिससे पूरा विश्व एकजुट हो जाएगा.

    इसके अलावा डीन ने यह भी कहा कि 2033 तक दुनिया के सभी मौजूदा धर्म खत्म हो जाएंगे और पूरी मानव जाति सिर्फ एक धर्म को मानेगी. हालांकि, इस शख्स ने नए धर्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया. टाइम ट्रैवल की तकनीक को लेकर भी डैरिल डीन ने एक खुलासा किया है. उसका कहना है कि साल 2028 में इंसानों के सामने टाइम ट्रेवल तकनीक के राज से परदा उठा दिया जाएगा और इसी साल दूसरे ग्रहों के जीवों यानी एलियंस की सच्चाई भी दुनिया के सामने आ जाएगी. उसने दावा किया कि उसकी बातें कोरी भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि आने वाले समय में हर हाल में सच होकर रहेगी. डीन ने तकनीक का जिक्र करते हुए कहा कि 2019 के अंत में 5G वायरलेस नेटवर्क शुरू हुआ था, जिसने इंटरनेट स्पीड को तीन गुना बढ़ा दिया था.

    वहीं, उसने दावा किया कि आने वाले सालों में 6G इंटरनेट की तकनीक को पूरी दुनिया के लिए पूरी तरह से मुफ्त कर दिया जाएगा. इसका मतलब यह होगा कि दुनिया के हर देश और दूरदराज के इलाकों में लोगों को मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलने लगेगी. हालांकि, इस यूट्यूब वीडियो को देखने वाले ज्यादातर यूजर्स कथित टाइम ट्रेवलर के इन दावों से बिल्कुल भी सहमत नजर नहीं आ रहे हैं. कई लोगों ने वीडियो पर कमेंट करते हुए इसे पूरी तरह से फर्जी और कल्पना बताया है. कुछ यूजर्स का कहना है कि बातें बनाना आसान है, लेकिन इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है. वहीं, अन्य लोगों ने इसकी तुलना पुराने कथित टाइम ट्रेवलर नोआ से करते हुए कहा कि उसकी भविष्यवाणियां गलत साबित होने के बाद वह गायब हो गया था, और यह शख्स भी उसी की तरह झूठ बोल रहा है.

  • जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    मुगल बादशाह अकबर और बीरबल.

    मुगल बादशाह अकबर के दरबार में कई विद्वान थे. इन लोगों को बाद में अकबर के नवरत्न कहा गया. इन नवरत्नों में बीरबल का नाम सबसे अलग दिखाई देता है. बीरबल केवल एक दरबारी नहीं थे. वह अकबर के करीबी दोस्त थे. कवि थे. बुद्धिमान सलाहकार थे. हाजिर-जवाब इंसान थे. अकबर को उनकी बातें बहुत पसंद थीं. बीरबल का असली नाम महेश दास था. उनका जन्म उत्तर भारत के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्म-स्थान को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत मिलते हैं. कुछ लोग उन्हें कालपी का रहने वाला मानते हैं. कुछ स्रोत उन्हें कन्नौज या आसपास के क्षेत्र से जोड़ते हैं. महेश दास को बचपन से ही कविता और भाषा में रुचि थी. वह संस्कृत, हिंदी और फारसी का अच्छा ज्ञान रखते थे. उनकी बातों में सरलता थी. उनकी समझ बहुत तेज थी. भारत में अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में मनाने का चलन है.

    आइए, मित्रता दिवस के बहाने अकबर-बीरबल की दोस्ती की कहानियां जानते-समझते हैं? यह भी जानेंगे कि कैसे एक कवि बादशाह अकबर का न केवल दरबारी बना बल्कि नवरत्नों में शामिल हुआ और फिर दोनों गहरे दोस्त हो गए.

    पहली मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

    कहा जाता है कि महेश दास की मुलाकात अकबर से तब हुई, जब वह दरबार में अपनी कविता सुनाने पहुंचे थे. उनकी कविता से अकबर बहुत प्रभावित हुए. अकबर उस समय ऐसे लोगों की तलाश में रहते थे, जो केवल उनकी प्रशंसा न करें. वह चाहते थे कि उनके आसपास समझदार और सच बोलने वाले लोग रहें. महेश दास ने अपनी बात बहुत आत्मविश्वास से रखी. उनकी भाषा में मिठास थी. उनकी बुद्धि में गहराई थी. अकबर ने उन्हें अपने दरबार में रख लिया. कुछ समय बाद अकबर ने उन्हें कविराय की उपाधि दी. बाद में वह राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुए. माना जाता है कि बीरबल नाम अकबर ने ही उन्हें दिया था.

    बीरबल का असली नाम महेश दास था.

    दोस्ती की असली वजह क्या थी?

    अकबर और बीरबल की दोस्ती केवल मजाक और हंसी पर आधारित नहीं थी. इसके पीछे कई बड़ी वजहें थीं. बीरबल अकबर को सही सलाह देते थे. वह कठिन सवालों का आसान जवाब खोज लेते थे. वह बिना डरे बादशाह की गलतियों की ओर भी इशारा कर देते थे. अकबर को बीरबल की यही बात सबसे अच्छी लगती थी. दरबार में बहुत से लोग बादशाह की बात पर तुरंत सहमति जता देते थे. बीरबल ऐसा नहीं करते थे. वह अकबर का सम्मान करते थे. लेकिन जरूरत पड़ने पर असहमति भी जताते थे. यही वजह थी कि अकबर उन्हें केवल दरबारी नहीं, बल्कि दोस्त मानते थे.

    लाजवाब थी बीरबल की हाजिर-जवाबी

    बीरबल की सबसे बड़ी ताकत उनकी हाजिर-जवाबी थी. वह किसी भी परिस्थिति में शांत रहते थे. सामने चाहे बादशाह हों या कोई बड़ा सेनापति, वह अपनी बात समझदारी से रखते थे. एक प्रसिद्ध कथा में अकबर ने बीरबल से पूछा-दुनिया में सबसे ज्यादा कौवे कहां हैं? बीरबल ने तुरंत जवाब दिया-जहांपनाह, आपके राज्य में. अकबर ने पूछा-अगर कौवों की संख्या इससे कम निकली तो? बीरबल बोले-तो कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गए होंगे. अकबर ने फिर पूछा-अगर संख्या ज्यादा निकली तो? बीरबल ने कहा-तो दूसरे राज्यों के कौवे यहां मेहमान बनकर आए होंगे. यह लोककथा है. इसका पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन यह बीरबल की तेज बुद्धि और हास्यबोध को दिखाती है.

    बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी

    बीरबल और अकबर से जुड़ी एक और बहुत प्रसिद्ध कहानी है. इसमें एक गरीब आदमी ठंडे पानी में खड़े होकर इनाम पाने की कोशिश करता है. गरीब आदमी कहता है कि वह केवल दूर जल रहे दीपक को देखकर ठंडे पानी में खड़ा रहा. अकबर को लगता है कि दीपक की गर्मी से उसे सहारा मिला होगा. इसलिए वह उसे इनाम नहीं देते. बीरबल इस फैसले से दुखी होते हैं. अगले दिन वह दरबार में नहीं आते. अकबर उनके बारे में पूछते हैं. बीरबल संदेश भेजते हैं कि खिचड़ी पक रही है. लेकिन हांडी आग से बहुत दूर टंगी है. अकबर समझ जाते हैं कि इतनी दूर रखी हांडी में खिचड़ी नहीं पक सकती. तब बीरबल कहते हैं-अगर दूर का दीपक गरीब आदमी को गर्मी दे सकता है, तो दूर की आग खिचड़ी भी पका सकती है. अकबर को अपनी गलती समझ आती है. वह गरीब आदमी को उसका इनाम दे देते हैं. यह कहानी भी लोक प्रचलित है. इसका उद्देश्य न्याय और तर्क की बात समझाना है.

    जब बीरबल ने बादशाह को आईना दिखाया

    बीरबल अकबर की गलतियों पर सीधे हमला नहीं करते थे. वह अपनी बात कहानी या मजाक के जरिए कहते थे. एक कथा के अनुसार, अकबर ने कभी कहा कि उनके राज्य में सभी लोग बहुत समझदार हैं. बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि यह बात तभी साबित होगी, जब लोग बिना सोचे बादशाह की हर बात को सही न मानें. अकबर ने पूछा-क्या तुम मेरी बात को गलत कह रहे हो? बीरबल ने उत्तर दिया-मैं आपकी बात को गलत नहीं कह रहा. मैं केवल यह कह रहा हूं कि समझदार लोग सवाल भी पूछते हैं. अकबर को यह जवाब पसंद आया. वह जानते थे कि बीरबल उनका अपमान नहीं कर रहे. वह उन्हें बेहतर शासक बनने में मदद कर रहे हैं.

    धर्म और अकबर की समझदारी

    अकबर के शासनकाल में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते थे. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाने की कोशिश की. बीरबल भी इस माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे. बीरबल हिंदू धर्म से जुड़े थे. फिर भी वह मुगल दरबार में सम्मानित थे. अकबर उनकी धार्मिक पहचान का सम्मान करते थे. कहा जाता है कि बीरबल ने कई बार अकबर को समझाया कि किसी भी धर्म या समुदाय के बारे में फैसला करने से पहले उसके विचारों को समझना जरूरी है. अकबर के धार्मिक विचारों में समय के साथ बदलाव आया. वह अलग-अलग धर्मों के विद्वानों से चर्चा करते थे. बीरबल भी ऐसे संवादों में शामिल रहते थे.

    नवरत्नों में बीरबल का स्थान

    अकबर के दरबार में अबुल फजल, फैजी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह और अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे महान लोग थे. इन लोगों को लोकप्रिय रूप से अकबर के नवरत्न कहा जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि नवरत्न की यह सूची बाद की परंपराओं में अधिक प्रसिद्ध हुई. अकबर के समय सभी नौ लोगों की एक आधिकारिक सूची का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. फिर भी बीरबल का महत्व इसमें कम नहीं होता. वह अकबर के भरोसेमंद सलाहकार थे. वह सैनिक अभियानों में भी शामिल हुए. उन्हें ऊंचा पद मिला. उनकी पहचान एक प्रभावशाली दरबारी के रूप में बनी.

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    बीरबल की मृत्यु और अकबर का दुख

    बीरबल की मृत्यु वर्ष 1586 में हुई. वह उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में एक सैन्य अभियान पर गए थे. यह अभियान यूसुफजई कबीलों के खिलाफ था. युद्ध में बीरबल और उनके साथ बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए. यह अकबर के शासनकाल की बड़ी सैन्य त्रासदियों में से एक थी. इतिहास में यह भी मिलता है कि अकबर को बीरबल की मृत्यु से गहरा दुख हुआ. बीरबल उनके सबसे करीबी लोगों में थे. दरबार में उनकी जगह कोई आसानी से नहीं ले सका. उनकी मृत्यु के बाद अकबर के जीवन से हंसी का एक बड़ा स्रोत चला गया. बीरबल के साथ अकबर को केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि अपना सच्चा मित्र खोना पड़ा.

    क्यों लोकप्रिय हैं बीरबल की कहानियां?

    बीरबल की कहानियां बच्चों और बड़ों दोनों को पसंद आती हैं. इनमें मनोरंजन भी है और सीख भी. इन कहानियों में बीरबल कमजोर व्यक्ति की मदद करते हैं. वह लालची लोगों को सबक सिखाते हैं. झूठे लोगों का पर्दाफाश करते हैं. वह अकबर को भी तर्क के जरिए समझाते हैं. इनमें से कई कहानियां लोककथाएं हैं. उन्हें इतिहास का पक्का दस्तावेज नहीं माना जा सकता. फिर भी वे बीरबल की लोकप्रिय छवि को समझने में मदद करती हैं. बीरबल की असली महानता उनकी बुद्धि में थी. उन्होंने साबित किया कि दरबार में स्थान केवल ताकत से नहीं मिलता. ज्ञान, विनम्रता और सही समय पर सही बात कहने की क्षमता भी बहुत जरूरी होती है. अकबर और बीरबल की दोस्ती इसी विश्वास पर टिकी थी. एक बादशाह था. दूसरा उसका समझदार सलाहकार, लेकिन दोनों के बीच रिश्ता दोस्ती का था. यही वजह है कि सैकड़ों साल बाद भी बीरबल और अकबर की जोड़ी लोगों के दिलों में जिंदा है.

  • इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑफिस का काम हो, ई-मेल लिखना हो या कोई आइडिया सोचना हो, हर जगह लोग धड़ल्ले से AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से सोशल मीडिया पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया है. दरअसल, यहां एक शख्स ने अपनी लव लाइफ को ही ऑटोमेट कर दिया. जब इस बात का खुलासा हुआ, तो उसकी गर्लफ्रेंड ने फौरन ब्रेकअप कर लिया. आइए जानते हैं इस दिलचस्प कहानी के बारे में.

    क्या है पूरा मामला?

    यह अनोखी लव स्टोरी X (पहले ट्विटर) पर डेलिया लाजारेस्कु (Delia Lazarescu ) नाम की एक यूजर की पोस्ट के जरिए वायरल हुई. सैन फ्रांसिस्को की एक महिला को लंबे समय तक यह लगता रहा कि उसका बॉयफ्रेंड उससे बेपनाह मोहब्बत करता है. वह उसकी दिन भर परवाह करता है. हर पल प्यारे-प्यारे मैसेज भेजता है. लेकिन जब इसके पीछे का सच सामने आया, तो महिला के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई. असल में महिला जिससे हर दिन बातें कर रही थी, वो कोई इंसान नहीं बल्कि एक AI चैटबॉट था.

    AI चैटबॉट संभाल रहा था रिश्ते की हर जिम्मेदारी

    वायरल दावे के अनुसार, शख्स ने अपने इस रिलेशनशिप के लगभग सारे काम AI चैटबॉट को सौंप रखे थे. गुड मॉर्निंग मैसेज से लेकर दिनभर हालचाल पूछने तक, सब कुछ AI चैटबॉट ही करता था. यहां तक कि छोटी-मोटी बहस के दौरान क्या जवाब देना है, यह भी AI चैटबॉट ही तय करता था. डिनर डेट और घूमने-फिरने की प्लानिंग भी शख्स ने ऑटोमेट कर रखा था. यानी महिला जिसे सच्ची मोहब्बत समझ रही थी, असल में वह कोडिंग और एल्गोरिदम था. यह भी पढ़ें:Viral Video: तोहफा हो तो ऐसा! AI लव स्टोरी देखकर छलके दुल्हन के आंसू; देखें ये वायरल वीडियो

    इंटरनेट पर लोगों के मजेदार रिएक्शन

    इस अजब प्रेम की गजब कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई. एक यूजर ने मजाकिया लहजे में लिखा, भाई ने अपनी पूरी लव लाइफ ही आउटसोर्स कर दी और अंत में ब्रेकअप का तोहफा मिल गया. दूसरे ने कहा कि इस शख्स ने हर चीज ऑटोमेट करने के आइडिया को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया था. यह भी पढ़ें: वो मेरी जिंदगी है 72 की बुजुर्ग महिला के प्यार में पागल हुआ 22 साल का लड़का, रचा ली शादी; चर्चा में अजब प्रेम की गजब कहानी

    Disclaimer: यह खबर वायरल सोशल मीडिया पोस्ट और नेटिजन्स की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है.