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  • मजदूरी के दौरान हुआ प्यार,​​​​​ फिर बदला धर्म और नाम… प्रेमी संग हिंदू रीति-रिवाज से रचाई शादी.

    मजदूरी के दौरान हुआ प्यार,​​​​​ फिर बदला धर्म और नाम… प्रेमी संग हिंदू रीति-रिवाज से रचाई शादी.

    उत्तर प्रदेश से धर्म परिवर्तन और प्रेम विवाह से जुड़ा एक मामला सामने आया है। एक युवती ने इस्लाम धर्म छोड़कर सनातन धर्म अपनाने का दावा किया है। युवती के मुताबिक, वह बचपन से ही भगवान शिव की पूजा करती थी और हिंदू देवी-देवताओं में उसकी आस्था थी। अब उसने अपना नाम बदलकर गौरी रख लिया है और अपने प्रेमी के साथ हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया है।

    युवती का कहना है कि उसके परिवार को उसकी धार्मिक आस्था पसंद नहीं थी। परिवार की आपत्ति के बावजूद वह अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीना चाहती थी।

    मजदूरी के दौरान हुई थी युवक से मुलाकात

    बताया गया है कि युवती कुछ साल पहले राजस्थान में एक ईंट भट्ठे पर मजदूरी करने गई थी। वहीं उसकी मुलाकात बरेली के रहने वाले एक युवक से हुई।

    पहले दोनों के बीच दोस्ती हुई और धीरे-धीरे यह रिश्ता प्रेम में बदल गया। युवती के मुताबिक, दोनों करीब चार साल से एक-दूसरे को जानते हैं और साथ जीवन बिताने का फैसला कर चुके थे।

    परिवार ने दूसरी जगह तय कर दी थी शादी

    युवती का दावा है कि जब वह वापस अपने घर पहुंची तो उसे पता चला कि परिवार ने उसकी शादी रिश्तेदारी में ही तय कर दी है। शादी की तैयारियों की जानकारी मिलने के बाद उसने परिवार के फैसले का विरोध किया।

    इसके बाद वह अपने प्रेमी के पास पहुंची और दोनों ने शादी करने का फैसला लिया। युवती के मुताबिक, उसने अपनी इच्छा से सनातन धर्म अपनाया और अपना नाम गौरी रख लिया।

    भगवान शिव में आस्था का किया दावा

    युवती ने बताया कि उसे शुरू से ही भगवान शिव की पूजा में विश्वास रहा है। सावन के महीने में वह विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना करती थी।

    उसका कहना है कि इसी आस्था के चलते उसने सनातन धर्म अपनाने का फैसला किया। इसके बाद दोनों ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अग्नि के सात फेरे लेकर विवाह किया।

    परिवार से खतरे की जताई आशंका

    शादी के बाद युवती ने अपने परिवार से खतरा होने की आशंका भी जताई है। उसका कहना है कि परिवार को उसके घर से चले जाने और प्रेमी के साथ शादी करने की जानकारी मिल चुकी है।

    युवती ने प्रशासन से सुरक्षा और मदद की मांग की है। उसका दावा है कि उसे अपने परिवार के कुछ सदस्यों से खतरा है।

    आश्रम में पूरी हुई विवाह की प्रक्रिया

    बताया गया है कि दोनों ने बरेली के एक आश्रम में पहुंचकर हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार विवाह किया। वहां धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने के साथ जरूरी दस्तावेज भी जमा किए गए।

    विवाह से पहले शुद्धिकरण की प्रक्रिया कराए जाने की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, धर्म परिवर्तन और विवाह से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही होगी।

    फिलहाल यह मामला प्रेम, धार्मिक आस्था और परिवार की असहमति से जुड़ा हुआ है, जिसको लेकर युवती ने अपनी इच्छा से जीवन जीने की बात कही है।

    डिस्क्लेमर: इस खबर में धर्म परिवर्तन, परिवार से खतरे और अन्य घटनाओं से जुड़े दावे संबंधित पक्ष के बयानों पर आधारित हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

  • पत्नी के अफेयर की जासूसी​​​​​ पड़ी महंगी, कोर्ट ने भारी जुर्माना लगाकर भेजा जेल; टूथब्रश से हुआ था शक

    पत्नी के अफेयर की जासूसी​​​​​ पड़ी महंगी, कोर्ट ने भारी जुर्माना लगाकर भेजा जेल; टूथब्रश से हुआ था शक

    पत्नी के अफेयर की जासूसी​​​​​ पड़ी महंगी, कोर्ट ने भारी जुर्माना लगाकर भेजा जेल; टूथब्रश से हुआ था शक

    जरा सोचिए किसी शख्स अपनी वाइफ पर बेवफाई का शक है, और उसने इसके लिए सबूत जुटाए और अदालत में पेश किए, फैसला हस्बैंड के फेवर में आया, लेकिन पति खुद को जेल जाने से नहीं बचा पाया, तो ऐसे में कानून को लेकर सवाल उठना लाजमी है, ऐसा ही कुछ हुआ ताइवान में जहां पीड़ित खुद कथित ‘नाइंसाफी’ का शिकार हो गया.

    पति को हुआ पत्नी पर शक

    एक ताइवानी शख्स अपनी पत्नी और एक पराए मर्द के बीच एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का शक था, उसने रोबोट वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल करके इंटिमेट रिलेशन को चुपके से रिकॉर्ड किया, हस्बैंड ने वाइफ के खिलाफ केस जीत लिया, लेकिन उसे भी एक खास कानून के तहत जेल की सजा सुनाई गई.

    रोबोट वैक्यूम के जरिए रिकॉर्ड किया अफेयर

    ताइवान के शख्स ने 2021 में शादी की थी और वह अपने माता-पिता के साथ रहता था. ये कपल कभी-कभी छुट्टियां मनाने के लिए खरीदे गए एक घर में रहता था. सितंबर 2023 में मकान पर यूज्ड टूथब्रश मिलने के बाद उसकी वाइफ के बारे में उसका शक बढ़ गया. बाद में उसने पार्किंग-लॉट के सर्विलांस फुटेज की जांच की और एक अनजान मर्द को देखा जो पहले उसकी पत्नी को घर छोड़ चुका था.

    टॉप न्यूज़

    3 महीने बाद उसने स्मार्टफोन एप्लिकेशन के जरिए रोबोट वैक्यूम को दूर से ऑपरेट किया. डिवाइस में एक ऑडियो फंक्शन था, जिसका इस्तेमाल वो शुरू में अपनी पत्नी से बात करने के लिए करना चाहता था. हालांकि, इसके लाइव फीड में उसकी पत्नी को एक पराए मर्द के साथ आपत्तिजनक हालात में देखा गया.

    पति ने जीता केस

    पति ने फुटेज रिकॉर्ड किया और बाद में इसे एक सिविल केस में इस्तेमाल किया, जिसमें उसने अपनी वाइफ और उसके बॉयफ्रेंड से 2 मिलियन न्यू ताइवान डॉलर (करीब 60 लाख रुपये) के हर्जाने की मांग की. अदालत ने हर्जाना देने का आदेश दिया, लेकिन प्राइवेसी का मामला भी सामने आया. सिविल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनका रिश्ता आम दोस्ती से आगे बढ़ चुका था और दोनों को 500,000 न्यू ताइवान डॉलर (करीब 15 लाख रुपये) का हर्जाना देने का आदेश दिया.

    वाइफ ने किया प्राइवेसी का केस

    हालांकि बाद में पति को सीक्रेट रिकॉर्डिंग को लेकर अपनी वाइफ की तरफ से एक अलग कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ा. हस्बैंड ने तर्क दिया कि फुटेज को सिविल कार्यवाही में सबूत के तौर पर स्वीकार किया गया था और उसके काम कानूनी रूप से सही थे. अदालत ने उस तर्क को खारिज कर दिया और इस बात पर जोर दिया कि शादी से जुड़ी जिम्मेदारियां किसी शख्स के प्राइवेसी के अधिकार को खत्म नहीं करती हैं.

    पति को हुई 5 महीने की जेल

    अदालत को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि वाइफ को पता था कि उसे रिकॉर्ड किया जा रहा है, भले ही रोबोट वैक्यूम से आवाज या रोशनी निकली हो. आखिरकार निजी पलों को गैर-कानूनी तरीके से रिकॉर्ड करने के लिए पति को 5 महीने की जेल और 150,000 न्यू ताइवान डॉलर (करीब 4 लाख 48 हजार रुपये) का जुर्माना लगाया गया.

    राइट टू प्राइवेसी का कानून

    ताइवान के कानून के तहत किसी भी शख्स की निजी पलों को बिना इजाजत के रिकॉर्ड करने या डिस्क्लोज करने पर 3 साल तक की जेल और 300,000 न्यू ताइवान डॉलर तक का जुर्माना हो सकता है. इस अनोखे मामले ने ऑनलाइन बहस छेड़ दी है कि कानूनी दायरे में रहते हुए बेवफाई को साबित करना कितना मुश्किल है.

  • 60 नहीं, 80 के पार​​​​​ है यहां के लोगों की उम्र! 85 साल में भी रहते हैं फिट, जानिए लंबी जिंदगी का क्या है राज.

    60 नहीं, 80 के पार​​​​​ है यहां के लोगों की उम्र! 85 साल में भी रहते हैं फिट, जानिए लंबी जिंदगी का क्या है राज.

    60 नहीं, 80 के पार​​​​​ है यहां के लोगों की उम्र! 85 साल में भी रहते हैं फिट, जानिए लंबी जिंदगी का क्या है राज.

    बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में एक ऐसा इलाका है, जहां रहने वाले थारू समुदाय की जीवनशैली आज भी प्रकृति के काफी करीब है। जंगलों के आसपास बसे इस समुदाय के लोगों की उम्र और उनकी दिनचर्या को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां कई बुजुर्ग 80 से 85 साल की उम्र के बाद भी सक्रिय और स्वस्थ नजर आते हैं। गांव के बुजुर्गों की मानें तो इसके पीछे उनकी पारंपरिक जीवनशैली, प्राकृतिक खानपान और रोजाना की मेहनत बड़ी वजह हो सकती है।

    जंगलों के बीच बसा है थारू समाज

    पश्चिम चंपारण के कई प्रखंडों में थारू जनजाति की बस्तियां मौजूद हैं। इनमें से ज्यादातर बस्तियां जंगल या जंगल के आसपास स्थित हैं।

    प्रकृति के करीब रहने के कारण इन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी जंगल, खेती और स्थानीय संसाधनों से जुड़ी हुई है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद समुदाय ने अपनी पारंपरिक जीवनशैली को काफी हद तक बनाए रखा है।

    80 से 85 साल की उम्र तक सक्रिय रहने का दावा

    रामनगर प्रखंड के थारू परसौनी गांव के स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव में कई लोगों की उम्र 80 से 85 वर्ष के बीच है। यहां एक बुजुर्ग की उम्र करीब 110 वर्ष तक बताई गई थी।

    वहीं गांव के 80 और 90 साल के आसपास के कई बुजुर्ग आज भी रोजमर्रा के काम खुद करते हैं। सुबह उठकर कई किलोमीटर तक पैदल जाना और फिर वापस लौटना उनके लिए सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बताया जाता है।

    85 साल की उम्र में भी बिना सहारे चलते हैं बुजुर्ग

    गांव के हर्ष नारायण महतो भी ऐसे ही बुजुर्गों में शामिल हैं। उनकी उम्र 85 वर्ष से अधिक बताई जाती है।

    स्थानीय जानकारी के अनुसार, वह आज भी बिना किसी सहारे के सुबह घूमने निकल जाते हैं और खुद ही वापस घर लौटते हैं। उन्हें देखने और सुनने में भी उम्र के मुताबिक ज्यादा परेशानी नहीं होने की बात कही जाती है।

    हालांकि, किसी समुदाय की औसत उम्र या बीमारियों से दूरी के दावे को व्यापक वैज्ञानिक निष्कर्ष मानने से पहले स्वास्थ्य संबंधी प्रमाण और आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होती है।

    प्राकृतिक चीजों पर ज्यादा निर्भर है खानपान

    थारू समुदाय के पारंपरिक खानपान में स्थानीय और प्राकृतिक चीजों की बड़ी भूमिका है। यहां ताजे पानी की मछली, केकड़ा, घोंघा, सीप, बांस की सब्जी, कचनार के फूल और जंगली मशरूम जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है।

    इसके अलावा आम के मंजर की सब्जी, भुंजा और चावल से बने कुछ पारंपरिक व्यंजन भी इनके भोजन का हिस्सा हैं।

    जंगल और खेती पर निर्भर रहने के कारण कई खाद्य पदार्थ इन्हें स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाते हैं।

    तेल और मसालों का इस्तेमाल कम

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, मछली, केकड़े और अन्य चीजों को तैयार करते समय बहुत ज्यादा तेल और मसालों का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

    खाने को साधारण तरीके से पकाने की परंपरा आज भी कई परिवारों में जारी है। इसी तरह जंगल से मिलने वाली मौसमी सब्जियों का इस्तेमाल भी इनके भोजन में किया जाता है।

    चावल पकाने का तरीका भी है अलग

    थारू समुदाय के पारंपरिक भोजन में चावल यानी भात को खास महत्व दिया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां चावल को भाप से पकाने की परंपरा है।

    आम तौर पर चावल पकाते समय कुछ लोग उसका माड़ अलग कर देते हैं, लेकिन इस पारंपरिक तरीके में माड़ को अलग नहीं किया जाता। इससे चावल में मौजूद पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा उसी में बना रहता है।

    शाम 7 बजे तक कर लेते हैं रात का खाना

    थारू समुदाय की दिनचर्या में भोजन का समय भी खास है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यहां कई लोग रात का भोजन शाम करीब 7 बजे तक कर लेते हैं।

    सुबह के भोजन में भी चावल और पारंपरिक व्यंजनों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके साथ ही दिनभर खेत, जंगल और दूसरे कामों में शारीरिक मेहनत करना उनकी जीवनशैली का हिस्सा है।

    लंबी उम्र के पीछे क्या हो सकता है कारण?

    थारू समुदाय की जीवनशैली को देखें तो इसमें कई ऐसी बातें नजर आती हैं, जो आज की भागदौड़ वाली जिंदगी से अलग हैं। प्राकृतिक और स्थानीय भोजन, कम तेल-मसाले वाला खाना, नियमित शारीरिक मेहनत, समय पर भोजन और प्रकृति के करीब रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

    हालांकि, सिर्फ इन कारणों को ही लंबी उम्र या बीमारियों से बचाव की निश्चित वजह मानना सही नहीं होगा। फिर भी थारू समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली इस बात की दिलचस्प मिसाल है कि कैसे स्थानीय भोजन और सक्रिय दिनचर्या पीढ़ियों से उनके जीवन का हिस्सा बनी हुई है।

  • फाउंडर को पता चला कंपनी​​​​​ में चल रहा था सीक्रेट WhatsApp ग्रुप, नाम देखकर चौंके; सच्चाई सामने आई तो बदल गया नजरिया..

    फाउंडर को पता चला कंपनी​​​​​ में चल रहा था सीक्रेट WhatsApp ग्रुप, नाम देखकर चौंके; सच्चाई सामने आई तो बदल गया नजरिया..

    फाउंडर को पता चला कंपनी​​​​​ में चल रहा था सीक्रेट WhatsApp ग्रुप, नाम देखकर चौंके; सच्चाई सामने आई तो बदल गया नजरिया..

    ऑफिस में कर्मचारियों के बीच अलग-अलग WhatsApp ग्रुप होना आम बात है। कई बार इन ग्रुप्स का इस्तेमाल काम से जुड़ी जानकारी साझा करने, टीम को अपडेट रखने या किसी प्रोजेक्ट पर चर्चा करने के लिए किया जाता है। लेकिन एक कंपनी के फाउंडर को जब अपनी ही टीम के एक ऐसे WhatsApp ग्रुप के बारे में पता चला, जिसमें उन्हें शामिल नहीं किया गया था, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया कुछ और ही थी।

    यह घटना मेट्रो मीडिया हाउस के फाउंडर सक्षम गौर ने LinkedIn पर साझा की। उन्हें कंपनी के एक ऐसे WhatsApp ग्रुप के बारे में पता चला, जिसके बारे में उन्हें पहले कोई जानकारी नहीं थी। ग्रुप का नाम भी ऐसा था कि पहली नजर में उन्हें लगा कि शायद इसमें उनके बारे में ही चर्चा होती होगी।

    ग्रुप का नाम देखकर फाउंडर को हुआ शक

    सक्षम गौर के मुताबिक, उन्होंने एक पोस्ट में अपनी टीम के बारे में बताया था कि बिजनेस से जुड़े कई मामलों में उनकी टीम अब उनसे भी बेहतर प्रदर्शन करने लगी है।

    इसी दौरान उन्हें एक ऐसे WhatsApp ग्रुप के बारे में पता चला जिसका नाम ‘MMH X SAKSHAM’ था। ग्रुप में फाउंडर खुद शामिल नहीं थे।

    नाम देखकर उनके मन में स्वाभाविक तौर पर सवाल उठा कि आखिर उनकी गैरमौजूदगी में यह ग्रुप किस मकसद से बनाया गया है और इसमें किस तरह की बातें होती हैं।

    लेकिन जब उन्हें इस ग्रुप की असली वजह पता चली तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया।

    फाउंडर के खिलाफ बातें नहीं, काम मैनेज करने का था तरीका

    सक्षम गौर के मुताबिक, यह ग्रुप फाउंडर के बारे में चर्चा करने या उनसे कुछ छिपाने के लिए नहीं बनाया गया था।

    दरअसल, कर्मचारी इस ग्रुप का इस्तेमाल कंपनी के रोजमर्रा के काम को व्यवस्थित करने के लिए कर रहे थे। टीम के सदस्य पूरे हो चुके कामों का रिव्यू करते, पेंडिंग कामों की जानकारी लेते और उन मुद्दों पर चर्चा करते थे जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत होती थी।

    खास बात यह थी कि हर छोटी समस्या फाउंडर तक नहीं पहुंचाई जाती थी। केवल उन्हीं मामलों में उनकी मदद ली जाती थी, जहां वास्तव में उनकी भागीदारी जरूरी होती थी।

    तब समझ आया कि हर अपडेट की जरूरत क्यों नहीं पड़ती

    इस घटना ने फाउंडर को अपनी टीम के काम करने के तरीके को एक अलग नजरिए से देखने का मौका दिया।

    उन्होंने महसूस किया कि जब वह कभी किसी काम का अपडेट मांगते थे, तो टीम की तरफ से अक्सर जवाब मिलता था कि काम पहले ही संभाला जा चुका है। उस समय शायद उन्हें इसकी पूरी वजह समझ नहीं आती थी।

    लेकिन इस ग्रुप के बारे में पता चलने के बाद उन्हें समझ आया कि टीम कई मामलों को आपस में ही संभाल रही थी और हर छोटे ऑपरेशनल फैसले के लिए फाउंडर पर निर्भर नहीं थी।

    शुरुआत में लगा अजीब, बाद में टीम पर हुआ भरोसा

    सक्षम गौर ने अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया को एक तरह के मजाकिया धोखे जैसा बताया। लेकिन बाद में उन्होंने इसे अपनी टीम की मजबूती का संकेत माना।

    उनके मुताबिक, एक फाउंडर के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह कंपनी के हर छोटे फैसले में खुद शामिल रहे। अगर टीम का हर सदस्य छोटी-छोटी समस्याओं के लिए फाउंडर की तरफ देखेगा, तो कंपनी के बढ़ने की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।

    इसके बजाय बेहतर तरीका यह है कि ऐसे लोगों को टीम में शामिल किया जाए जो अपनी जिम्मेदारी समझें, फैसले ले सकें और रोजमर्रा की समस्याओं को खुद हल करने की क्षमता रखते हों।

    सीक्रेट ग्रुप की कहानी बनी टीम की कामयाबी का सबूत

    जिस WhatsApp ग्रुप को देखकर शुरुआत में फाउंडर को शक हुआ था, वही बाद में उनके लिए एक सकारात्मक संकेत बन गया।

    उन्हें एहसास हुआ कि टीम अब इतनी सक्षम हो चुकी है कि कई काम बिना उनकी सीधी निगरानी के भी संभाले जा सकते हैं। यानी जिस ग्रुप का हिस्सा फाउंडर नहीं थे, वह दरअसल उनकी टीम के आत्मनिर्भर होने की कहानी बता रहा था।

    यह घटना इस बात की ओर भी इशारा करती है कि किसी कंपनी में मजबूत टीम का मतलब केवल निर्देशों का पालन करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद जिम्मेदारी लेकर समस्याओं का समाधान करना भी है।

  • रोबोट ने मराठी गाने पर​​​​​ किया गजब का क्लासिकल डांस,

    रोबोट ने मराठी गाने पर​​​​​ किया गजब का क्लासिकल डांस,

    रोबोट ने मराठी गाने पर​​​​​ किया गजब का क्लासिकल डांस,

    जब तकनीक और संस्कृति का मिलन होता है, तो दुनिया हैरान रह जाती है. कुछ ऐसा ही इन दिनों इंटरनेट पर देखने को मिल रहा है, जहां ‘माया’ नाम के एक ह्यूमनॉइड रोबोट (Humanoid Robot Maya) ने मराठी के सुपरहिट गाने ‘वाजले की बारा’ पर गजब का भारतीय शास्त्रीय नृत्य पेश किया है. इस अनोखे और अद्भुत प्रदर्शन को देखकर सोशल मीडिया पर लोग कह उठे हैं- ‘माया तो छा गई.’

    यूनिट्री जी1 प्लेटफॉर्म पर तैयार हुई ‘माया’ का देसी अवतार

    इस रोबोटिक चमत्कार के पीछे भारत के ट्यूजडे लैब्स और मास्टर्स यूनियन के होनहार छात्रों की टीम है, जिसके बारे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘जिकिगाय’ के नाम से मशहूर सोहन राय ने जानकारी साझा की. उन्होंने इसे दुनिया का पहला ऐसा भारतीय शास्त्रीय नृत्य बताया है जिसे किसी मानव जैसे दिखने वाले रोबोट ने परफॉर्म किया है.

    माया को पूरी तरह से भारतीय रंग में ढालने के लिए चीनी रोबोटिक्स कंपनी यूनिट्री के ‘जी1’ (Unitree G1) ह्यूमनॉइड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया. हालांकि, रोबोट का सॉफ्टवेयर, वॉयस सिस्टम और गतिविधियां पूरी तरह कस्टमाइज्ड हैं. इसे पारंपरिक भारतीय कपड़े, विशेष जूते, गहने और 3डी-प्रिंटेड कमरबंद के साथ-साथ मानव बालों की विग पहनाकर एक परफेक्ट क्लासिकल डांसर का लुक दिया गया है.

    मोशन-कैप्चर तकनीक और रीइन्फोर्समेंट लर्निंग का कमाल

    रोबोट से क्लासिकल डांस करवाना कोई बच्चों का खेल नहीं था. इसे संभव बनाने के लिए डेवलपर्स ने सबसे पहले मोशन-कैप्चर तकनीक (Motion-Capture Technology) का इस्तेमाल करके एक असली शास्त्रीय नर्तकी के डांस मूव्स को रिकॉर्ड किया.

    इसके बाद रीइन्फोर्समेंट लर्निंग (Reinforcement Learning) के जरिए माया को बिना अपना संतुलन खोए इन कठिन कदमों को बार-बार दोहराने की ट्रेनिंग दी गई. यही वजह है कि वीडियो में माया मराठी गाने की धुन पर बेहद सहजता और सफाई के साथ थिरकती हुई नजर आती है.

    वीडियो पर छिड़ी बहस

    इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है. जहां एक तरफ लोग इस टेक्नोलॉजी की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कला प्रेमियों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है. एक यूजर ने लिखा, क्या माया है ये, वाह. दूसरे ने कमेंट किया, केवल तकनीकी क्षेत्र के लोग ही समझते हैं कि यह कोई मजाक नहीं है, बल्कि बेहद सराहनीय है.

    इसके विपरीत एक क्लासिकल डांसर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, मैं इसके पीछे की मेहनत की सराहना करती हूं, लेकिन रोबोट सिर्फ कदम उठा सकता है, उसमें वह इंसानी गरिमा और दर्शकों के साथ जुड़ाव की भावना कभी नहीं आ सकती. एक अन्य यूजर ने लिखा कि रोबोट्स को घर के काम संभालने चाहिए, कला के क्षेत्र में इंसानी रचनात्मकता का कोई विकल्प नहीं हो सकता.

     

     

     
  • पत्नी-बच्चों के साथ 10 दिन​​​​​ 5 स्टार होटल में ठहरा शख्स, आया 5.74 लाख का बिल तो बोला- ट्रैवल एजेंसी देगी पैसे..

    पत्नी-बच्चों के साथ 10 दिन​​​​​ 5 स्टार होटल में ठहरा शख्स, आया 5.74 लाख का बिल तो बोला- ट्रैवल एजेंसी देगी पैसे..

    पत्नी-बच्चों के साथ 10 दिन​​​​​ 5 स्टार होटल में ठहरा शख्स, आया 5.74 लाख का बिल तो बोला- ट्रैवल एजेंसी देगी पैसे..

    राजस्थान के उदयपुर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। दिल्ली से पत्नी और दो बच्चों के साथ घूमने पहुंचे एक पर्यटक पर 5 स्टार होटल का करीब 5.74 लाख रुपये का बिल बिना चुकाए चले जाने का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि परिवार ने होटल में करीब 10 दिन बिताए और इस दौरान कमरे के अलावा खाने-पीने समेत कई सुविधाओं का इस्तेमाल किया।

    मामला तब सामने आया जब चेकआउट के समय होटल ने पर्यटक को लाखों रुपये का बिल थमाया। आरोप है कि उसने भुगतान करने से इनकार करते हुए कहा कि होटल का बिल ट्रैवल एजेंसी चुकाएगी। हालांकि, होटल प्रबंधन के मुताबिक एजेंसी ने ऐसी किसी व्यवस्था से इनकार कर दिया।

    ट्रैवल एजेंसी ने कराई थी होटल की बुकिंग

    पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, 12 अगस्त को एक ट्रैवल एजेंसी की ओर से ई-मेल के जरिए दिल्ली निवासी अनुराग यादव के नाम से होटल में बुकिंग कराई गई थी।

    इसके बाद अनुराग यादव अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ 14 अगस्त को उदयपुर के द ओबरॉय उदयविलास होटल पहुंचे। परिवार करीब 10 दिन तक वहां ठहरा और 23 अगस्त तक होटल की सेवाओं का इस्तेमाल किया।

    होटल के कमरे में रहने के अलावा परिवार ने लंच, डिनर और दूसरी सुविधाएं भी लीं। इन सभी सेवाओं को जोड़ने के बाद होटल का कुल बिल करीब 5.74 लाख रुपये बताया गया।

    बिल आया तो भुगतान करने से कर दिया इनकार

    24 अगस्त को जब परिवार चेकआउट करने लगा तो होटल प्रबंधन ने अनुराग को 5.74 लाख रुपये का बिल दिया। आरोप है कि उसने बिल चुकाने से साफ इनकार कर दिया।

    अनुराग ने होटल कर्मचारियों से कहा कि उसकी बुकिंग ट्रैवल एजेंसी के माध्यम से हुई है और होटल का भुगतान भी वही एजेंसी करेगी।

    इसके बाद होटल प्रबंधन ने संबंधित ट्रैवल एजेंसी से संपर्क किया। शिकायत के मुताबिक, एजेंसी ने होटल को बताया कि अनुराग के ठहरने और इतने बड़े बिल का भुगतान करने को लेकर उसके साथ ऐसी कोई सहमति या व्यवस्था नहीं हुई थी।

    होटल प्रबंधन ने पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

    मामले के बाद होटल के लायजनिंग मैनेजर रविंद्र सिंह ने उदयपुर के अंबामाता थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज करके जांच शुरू कर दी है।

    शुरुआती जांच में पुलिस को शक है कि पर्यटक और ट्रैवल एजेंसी के बीच किसी तरह की मिलीभगत हो सकती है। हालांकि, पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर साफ होगी।

    बुकिंग से लेकर भुगतान तक जांच

    पुलिस के मुताबिक, अनुराग यादव दिल्ली की एक निजी कंपनी में काम करता है। अब जांच टीम होटल बुकिंग से जुड़े ई-मेल, ट्रैवल एजेंसी से हुई बातचीत, होटल में ठहरने के रिकॉर्ड और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है।

    पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर होटल की बुकिंग किस शर्त पर हुई थी और 5.74 लाख रुपये के भुगतान को लेकर पर्यटक और ट्रैवल एजेंसी के बीच वास्तव में क्या बातचीत हुई थी।

    फिलहाल मामले की जांच जारी है और आगे की कार्रवाई जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर की जाएगी।

    डिस्क्लेमर: खबर में बताए गए आरोप पुलिस में दर्ज शिकायत और उपलब्ध प्रारंभिक जानकारी पर आधारित हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • सिर टपकत है, नटई पिरात​​​​​ है, कनवा कुकुआत है’… मरीजों से अवधी में बात कर वायरल हुईं डॉ. अनीता..

    सिर टपकत है, नटई पिरात​​​​​ है, कनवा कुकुआत है’… मरीजों से अवधी में बात कर वायरल हुईं डॉ. अनीता..

    सिर टपकत है, नटई पिरात​​​​​ है, कनवा कुकुआत है’… मरीजों से अवधी में बात कर वायरल हुईं डॉ. अनीता..

    उत्तर प्रदेश के गोंडा की एक डॉक्टर इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में हैं। वजह उनका इलाज करने का अंदाज है। महिला मरीज जब अपनी परेशानी अवधी भाषा में बताती हैं तो डॉक्टर भी उसी अंदाज में उनसे बातचीत करती हैं। उनका यह देसी अंदाज मरीजों को इतना पसंद आता है कि अब डॉ. अनीता मिश्रा की चर्चा सोशल मीडिया पर भी होने लगी है।

    खास बात यह है कि डॉ. अनीता की मातृ भाषा अवधी नहीं, बल्कि कन्नड़ है। उनका जन्म कर्नाटक के मंगलूर में हुआ, लेकिन शादी के बाद वह गोंडा आ गईं और यहां रहते-रहते पहले हिंदी और फिर अवधी भाषा सीख ली।

    कर्नाटक में हुआ जन्म, गोंडा में बनाई पहचान

    डॉ. अनीता मिश्रा मूल रूप से कर्नाटक के मंगलूर की रहने वाली हैं। उनके पिता व्यवसायी थे और परिवार में कन्नड़ भाषा बोली जाती थी। पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात गोंडा निवासी और उनसे दो साल सीनियर पूर्णोदय मिश्रा से हुई।

    दोनों के बीच जान-पहचान आगे बढ़ी और साल 1997 में उन्होंने शादी कर ली। इसके बाद डॉ. अनीता का गोंडा आना हुआ और यहीं उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की नई शुरुआत की।

    गोंडा आईं तो सामने आई भाषा की चुनौती

    डॉ. अनीता ने साल 2000 में राजीव गांधी यूनिवर्सिटी से एमएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद जब वह गोंडा आईं तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भाषा की थी।

    कन्नड़ और तुलु भाषाई माहौल से आने वाली अनीता के लिए स्थानीय लोगों की हिंदी समझना शुरुआत में आसान नहीं था। उन्होंने पहले हिंदी सीखी और धीरे-धीरे उसमें सहज हो गईं।

    लेकिन डॉक्टर के सामने एक और चुनौती थी।

    मरीजों की भाषा समझने के लिए सीखी अवधी

    साल 2005 में डॉ. अनीता और उनके पति ने गोंडा में अपना निजी नर्सिंग होम शुरू किया। यहां बड़ी संख्या में महिला मरीज इलाज के लिए पहुंचने लगीं।

    कई मरीज अपनी तकलीफ अवधी में ही बताती थीं। ऐसे में उनकी बात को ठीक तरह से समझने के लिए डॉ. अनीता ने अवधी सीखने का फैसला किया।

    धीरे-धीरे उन्होंने स्थानीय भाषा को समझना और बोलना शुरू किया। कुछ ही समय में वह मरीजों से उनकी अपनी भाषा में बातचीत करने लगीं। इसका असर यह हुआ कि मरीज उनके सामने अपनी परेशानी ज्यादा सहजता से बताने लगीं।

    ‘पेटवा पिरात है, कनवा कुकुआत है…’

    डॉ. अनीता बताती हैं कि मरीज जब अपनी परेशानी अवधी में बताती हैं तो उनकी भाषा उन्हें बेहद दिलचस्प और म्यूजिकल लगती है।

    मरीज कभी कहती हैं कि ‘पेटवा पिरात है’, तो कोई ‘कनवा कुकुआत है’ या ‘गटईवा खासखसात है’ जैसी स्थानीय भाषा में अपनी समस्या बताती है।

    डॉ. अनीता के मुताबिक, मरीजों की बात को उनकी ही भाषा में समझना और जवाब देना इलाज के दौरान एक अलग तरह का जुड़ाव पैदा करता है। शायद यही वजह है कि उनके मरीज उनसे काफी सहज महसूस करते हैं।

    सोशल मीडिया पर भी रहती हैं एक्टिव

    डॉक्टर होने के साथ-साथ डॉ. अनीता मिश्रा को कथक नृत्य में भी रुचि है। वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहती हैं और समय-समय पर अपनी रील्स शेयर करती हैं।

    उनके बारे में यह भी बताया जाता है कि वह मिसेज इंडिया और मिसेज एशिया का खिताब हासिल कर चुकी हैं।

    डॉ. अनीता और उनके पति का एक बेटा भी है, जो मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। कर्नाटक से निकलकर उत्तर प्रदेश के गोंडा में अपनी पहचान बनाने वाली डॉ. अनीता की कहानी इस बात की मिसाल है कि भाषा सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों से जुड़ने का एक मजबूत जरिया भी बन सकती है।

  • न कोई हमला, न युद्ध​​​​​ का खौफ, इन देशों में शांति से गुजर रही लोगों की जिंदगी! जानिए इनकी सुरक्षा का राज

    न कोई हमला, न युद्ध​​​​​ का खौफ, इन देशों में शांति से गुजर रही लोगों की जिंदगी! जानिए इनकी सुरक्षा का राज

    न कोई हमला, न युद्ध​​​​​ का खौफ, इन देशों में शांति से गुजर रही लोगों की जिंदगी! जानिए इनकी सुरक्षा का राज

    दुनिया के कई हिस्सों में इस समय तनाव और संघर्ष का माहौल है. कहीं मिसाइलें दागी जा रही हैं तो कहीं लोग डर के साए में अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं. लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसे छोटे-छोटे देश भी हैं, जहां जिंदगी बिल्कुल अलग अंदाज में चल रही है. इन देशों की सबसे खास बात यह है कि इन्होंने लंबे समय से खुद को बड़े सैन्य संघर्षों से दूर रखा है. आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ देशों के बारे में, जहां लोगों की जिंदगी युद्ध की चिंता से काफी हद तक दूर रही है.

    रूस-यूक्रेन से लेकर मिडिल ईस्ट तक तनाव
    दुनिया में इस समय कई जगहों पर संघर्ष चल रहे हैं. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित की है. वहीं मिडिल ईस्ट में इजरायल और गाजा के बीच संघर्ष ने भी हालात को बेहद गंभीर बना दिया है. इन संघर्षों का असर सिर्फ युद्ध वाले इलाकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में सुरक्षा, कारोबार और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ जाती है.

    इसी दुनिया में है एक बेहद शांत देश
    युद्ध और तनाव के बीच यूरोप का छोटा सा देश लिकटेंस्टीन (Liechtenstein) अपनी अलग पहचान रखता है. स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया के बीच पहाड़ों में बसा यह देश आकार में छोटा है, लेकिन अपनी शांति और सुरक्षा के लिए जाना जाता है. लिकटेंस्टीन पर आधुनिक इतिहास में किसी बड़े विदेशी सैन्य हमले का सामना नहीं करना पड़ा. यही वजह है कि यहां की जिंदगी दूसरे युद्धग्रस्त इलाकों से बिल्कुल अलग नजर आती है. लिकटेंस्टीन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां स्थायी सेना भी नहीं है. साल 1868 में देश ने अपनी सेना को खत्म कर दिया था. इसके बाद से लिकटेंस्टीन ने अंतरराष्ट्रीय विवादों से दूरी बनाए रखी और अपनी तटस्थ नीति पर जोर दिया। यही कारण है कि यूरोप में कई बड़े संघर्ष होने के बावजूद यह देश लंबे समय तक उनसे दूर रहा.

    सैन मैरिनो और अंडोरा भी रहा बड़े युद्धों से दूर
    लिकटेंस्टीन के अलावा सैन मैरिनो भी यूरोप का एक छोटा और खास देश है. यह पूरी तरह इटली से घिरा हुआ है और दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में गिना जाता है. सैन मैरिनो ने अपनी कूटनीति के जरिए लंबे समय तक बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से दूरी बनाए रखी. देश का छोटा आकार और शांतिपूर्ण नीति भी इसकी सुरक्षा में अहम रही है. एक और नाम अंडोरा(Andorra) का है, जो फ्रांस और स्पेन के बीच पाइरेनीज पर्वतों में बसा हुआ है. पहाड़ों से घिरे इस छोटे से देश की अपनी अलग पहचान है. अंडोरा का इतिहास भी बड़े सैन्य संघर्षों से काफी हद तक दूर रहा है. देश ने अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखे हैं और इसी वजह से यहां लंबे समय से सुकून भरा माहौल देखने को मिलता है.

    आखिर इन देशों की जिंदगी इतनी शांत क्यों है?
    इन देशों का छोटा आकार, भौगोलिक स्थिति(Geographical location), कूटनीति(Diplomacy) और दूसरे देशों के साथ शांतिपूर्ण रिश्ते उनकी सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाते हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन देशों ने इतिहास में कभी कोई राजनीतिक या सैन्य तनाव नहीं देखा. फिर भी आज की युद्धग्रस्त दुनिया में लिकटेंस्टीन, सैन मैरिनो और अंडोरा जैसे देश इस बात के उदाहरण हैं कि कुछ देश लंबे समय तक बड़े सैन्य संघर्षों से खुद को दूर रखने में सफल रहे हैं.

  • हफ्तों से पार्किंग में खड़ी​​​​​ है कार! तो शायद अगली बार न हो स्टार्ट कर सकते हैं इन 4 परेशानियों का सामना..

    हफ्तों से पार्किंग में खड़ी​​​​​ है कार! तो शायद अगली बार न हो स्टार्ट कर सकते हैं इन 4 परेशानियों का सामना..

    हफ्तों से पार्किंग में खड़ी​​​​​ है कार! तो शायद अगली बार न हो स्टार्ट कर सकते हैं इन 4 परेशानियों का सामना..

    कई बार होता है कि आप अपनी कार कई हफ्तों के लिए पार्क कर देते हैं. इस दौरान आप उसे एक बार स्टार्ट तक नहीं करते हैं. लेकिन शायद आप नहीं जानते कि इस तरह से गाड़ी को छोड़ने से आप कितना नुकसान झेलेंगे.

    लंबे समय तक खड़ी रहने से कार के कई जरूरी हिस्सों पर असर पड़ सकता है. बैटरी डाउन हो सकती है. टायर में हवा कम हो सकती है. बारिश का मौसम है तो ब्रेक या दूसरे पुर्जों पर जंग लग सकता है और फ्यूल से जुड़ी परेशानी भी हो सकती है. इसलिए अगर आप छुट्टी या किसी दूसरे कारण से कार लंबे समय तक नहीं चलाने वाले हैं तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें.

    बैटरी को डाउन होने से बचाएं

    कार बंद होने के बाद भी बैटरी कुछ सिस्टम को बिजली देती रहती है. अलार्म, लॉक और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम धीरे-धीरे बैटरी की ताकत कम करते हैं. कई हफ्तों तक कार खड़ी रहने पर बैटरी पूरी तरह डाउन हो सकती है. ऐसे में कार स्टार्ट नहीं होगी. इसलिए बेहतर होगा कि बीच-बीच में उसे स्टार्ट करते रहें. इससे बैटरी में करंट रहेगा.

    टायर में आ सकते हैं फ्लैट स्पॉट

    एक ही जगह पर लंबे समय तक खड़ी कार का पूरा वजन टायर के एक ही हिस्से पर रहता है. इससे टायर का वह हिस्सा दब सकता है. इसे फ्लैट स्पॉट कहा जाता है. जब आप कार को दोबारा चलाते हैं तो आपको कंपन महसूस हो सकता है. सही टायर प्रेशर रखना और संभव हो तो कुछ समय बाद कार को थोड़ा आगे-पीछे करना मददगार हो सकता है.

    ब्रेक पर लग सकता है जंग

    नमी के कारण लंबे समय तक खड़ी कार के ब्रेक डिस्क पर जंग आ सकती है. हल्की जंग से जुड़ी परेशानी को दूर करने के लिए कुछ बार ब्रेक दबाने से हट सकती है. लेकिन ज्यादा समय तक कार खड़ी रहने पर परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए लंबे समय तक कार पार्क करने से पहले ब्रेक की स्थिति भी जांच लें.

    फ्यूल टैंक और इंजन ऑयल पर पड़ सकता है असर

    लंबे समय तक कार न चलाने पर फ्यूल की क्वालिटी धीरे-धीरे कम हो सकती है. फ्यूल टैंक में नमी जमा होने की समस्या भी हो सकती है. इंजन ऑयल भी लंबे समय तक बिना इस्तेमाल के पड़ा रहता है. इसलिए लंबे स्टोरेज से पहले कार की सर्विस और जरूरी फ्लूइड की जांच कराना बेहतर है.

  • न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    लखीमपुर खीरी के दुधवा क्षेत्र के सुमेर नगर गांव में एक घर से हाल ही में बचाए गए करैत सांप ने वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. इसकी सबसे खास बात इसका असामान्य रंग है. आमतौर पर करैत सांप के शरीर पर साफ छल्लेदार धारियां दिखाई देती हैं, लेकिन इस सांप के शरीर पर ऐसी धारियां बिल्कुल नहीं हैं. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सांप के इस अलग रंग और बनावट की सही वजह जानने के लिए इसकी जांच करनी होगी. इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह ‘लेसर ब्लैक करैत’ है या ‘कॉमन करैत’ का कोई दुर्लभ रूप है.

    तराई क्षेत्र में नहीं पाया जाता ऐसा सांप

    दुधवा बाघ अभयारण्य (डीटीआर) के क्षेत्र निदेशक डॉ. एच. राजमोहन ने मीडिया को बताया कि बचाया गया यह सांप दुधवा क्षेत्र में दुर्लभ है. उन्होंने आशंका जताई कि यह ‘लेसर ब्लैक करैत’ हो सकता है, जो आमतौर पर दुधवा के तराई क्षेत्र (Terai Region) में नहीं पाया जाता. डॉ. राजमोहन ने कहा कि सांप की पहचान और उसके बारे में अधिक जानकारी जुटाने के लिए जाने-माने सांपों के विशेषज्ञों से संपर्क किया जाएगा.

    16 अगस्त को घर से पकड़ा गया था करैत सांप

    यह सांप 16 अगस्त को संपूर्णानगर वन क्षेत्र के सुमेर नगर गांव में एक घर से स्थानीय सांप बचावकर्मी निशान सिंह ने पकड़ा था. दुधवा के सांप बचावकर्मी निशान ने शुरुआत में इसकी पहचान ‘कॉमन करैत’ के तौर पर की थी. हालांकि, सांप का सामान्य से काफी हल्का रंग और शरीर पर कॉमन करैत में आमतौर पर दिखाई देने वाली छल्लेदार धारियों का न होना के बाद सवाल खड़े होने लगे. इसके बाद बचावकर्मियों ने सांप का रिकॉर्ड तैयार किया और दुधवा के जीव वैज्ञानिकों तथा पशु चिकित्सा विशेषज्ञों से इस बारे में सलाह ली. दुधवा के पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर ने भी सांप की जांच की. उन्होंने इसे असामान्य खोज बताया. डॉ. दया शंकर के मुताबिक, दुधवा में यह पहली बार है जब उन्होंने इतने हल्के रंग और बिना छल्लेदार धारियों वाला करैत सांप देखा है.

    उम्र के साथ बदल सकता है करैत का रंग और पैटर्न

    वहीं, देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ जीवविज्ञानी विपुल मौर्य ने मीडिया से कहा कि दुधवा समेत पूरा तराई क्षेत्र सांपों की बहुत सारी वैरायटी के लिए जाना जाता है, इसलिए इस तरह के मामले की जांच करना महत्वपूर्ण है. विपुल मौर्य ने बताया कि करैत सांप में धारियों का हल्का पड़ना या उनका पूरी तरह गायब हो जाना उम्र बढ़ने के साथ रंग और शरीर में होने वाले बदलाव से जुड़ा हो सकता है. इस प्रक्रिया को ‘ओन्टोजेनेटिक कलर पैटर्न शिफ्ट’ कहा जाता है.

    हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में केवल बाहरी रंग-रूप के आधार पर सांप की पहचान करना सही नहीं होगा. इसकी शारीरिक बनावट की पूरी जांच करना जरूरी है. इससे पता चल सकेगा कि यह वास्तव में ‘कॉमन करैत’ है या ‘लेसर ब्लैक करैत’ और इसका असामान्य रंग कुदरती बदलाव का परिणाम है या रंग में किसी अन्य तरह का अंतर है.