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  • मौत के 10 घंटे बाद​​​​​ भी जिंदा रहती हैं आंखें? वैज्ञानिकों का हैरान करने वाला दावा!

    मौत के 10 घंटे बाद​​​​​ भी जिंदा रहती हैं आंखें? वैज्ञानिकों का हैरान करने वाला दावा!

    मौत के 10 घंटे बाद​​​​​ भी जिंदा रहती हैं आंखें? वैज्ञानिकों का हैरान करने वाला दावा!

    क्या कोई इंसान मरने के बाद भी देख सकता है या उसकी आंखें मौत के कई घंटों बाद भी रोशनी को महसूस कर सकती हैं? सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने एक ऐसा हैरान करने वाला दावा किया है जिसने मेडिकल साइंस की दुनिया में हलचल मचा दी है. एक नए रिसर्च में सामने आया है कि इंसान की मौत के 10 घंटे बाद तक भी उसकी आंखें रोशनी के प्रति प्रतिक्रिया दे सकती हैं. आइए जानते हैं कि वैज्ञानिकों ने यह करिश्मा कैसे किया और इससे अंधापन दूर करने में कैसे मदद मिलेगी.

    मरने के बाद आंखों में कैसे लौटी जान?

    हमारी आंख के पिछले हिस्से में रेटिना (Retina) नाम की एक परत होती है. इसका काम रोशनी को पकड़ना और उसे बिजली के सिग्नलों में बदलकर हमारे दिमाग तक पहुंचाना है, जिससे हम देख पाते हैं. आमतौर पर मौत होते ही शरीर में खून का बहाव रुक जाता है, जिससे रेटिना को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और वो तुरंत काम करना बंद कर देती है.

    लेकिन सेंटर फॉर जीनोमिक रेगुलेशन (CRG) के वैज्ञानिकों ने एक कमाल की तरकीब निकाली. उन्होंने लैब में एक ऐसा सिस्टम तैयार किया जो बिल्कुल हमारे शरीर के ब्लड सर्कुलेशन की तरह काम करता है. इस सिस्टम के जरिए उन्होंने डोनेट की गई आंखों के रेटिना तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचाए. नतीजा यह हुआ कि मौत के 10 घंटे बाद भी रेटिना ने रोशनी की चमक पर रिस्पॉन्स देना शुरू कर दिया.

    तो क्या मरने के बाद इंसान देख सकता है?

    इस खोज का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि इंसान मरने के बाद दोबारा देखने लगेगा या उसकी आंखों की रोशनी वापस आ जाएगी. वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह रेटिना शरीर से बाहर एक मशीन के सहारे काम कर रही थी. चूंकि यह आंख दिमाग से जुड़ी नहीं थी, इसलिए कोई भी इंसान सचेत होकर कुछ देख नहीं सकता. यह सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जहां कोशिकाएं जिंदा रहीं.

    अंधापन दूर करने में मिलेगी बड़ी मदद

    भले ही इससे मरे हुए इंसान को रोशनी न मिले, लेकिन यह खोज उन लाखों लोगों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है जो आंखों की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं.

    24 घंटे तक सुरक्षित रहेगी रेटिना

    वैज्ञानिकों ने पाया कि इस तकनीक से रेटिना की बनावट को 24 घंटे तक सुरक्षित रखा जा सकता है. इससे डॉक्टरों को प्रयोगशाला में इंसानी रेटिना पर रिसर्च करने का लंबा समय मिल जाएगा.

    नई दवाओं का टेस्ट आसान

    अब तक वैज्ञानिक आंखों की दवाओं का टेस्ट जानवरों पर करते थे, लेकिन अब वे सीधे इंसानी रेटिना पर नई दवाओं और इलाजों का असर देख सकेंगे.

    गंभीर बीमारियों का इलाज

    इससे बढ़ती उम्र में धुंधला दिखने (Macular Degeneration) और डायबिटीज के कारण आंखें खराब होने जैसी लाइलाज बीमारियों का तोड़ खोजने में मदद मिलेगी.

    क्या मुमकिन है आंखों का ट्रांसप्लांट?

    वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में विजन रीस्टोरेशन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है. हालांकि, आंखों को पूरी तरह से ट्रांसप्लांट करना और उसे दिमाग की नसों से जोड़ना अभी भी एक बहुत बड़ी चुनौती है. फिर भी इस रिसर्च ने दुनिया भर के डॉक्टरों और आंखों की रोशनी खो चुके करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगा दी है.

  • धरती की सबसे सुनसान जगह,​​​​​ जहां इंसानों का पहुंचना बेहद मुश्किल; ‘सैटेलाइट्स का कब्रिस्तान’ भी है ये जगह.

    धरती की सबसे सुनसान जगह,​​​​​ जहां इंसानों का पहुंचना बेहद मुश्किल; ‘सैटेलाइट्स का कब्रिस्तान’ भी है ये जगह.

    धरती की सबसे सुनसान जगह,​​​​​ जहां इंसानों का पहुंचना बेहद मुश्किल; ‘सैटेलाइट्स का कब्रिस्तान’ भी है ये जगह.

    Amazing Facts: धरती पर कई ऐसी जगहें हैं, जहां पहुंचना इंसानों के लिए बेहद मुश्किल है। इन्हीं में से एक है प्वाइंट निमो (Point Nemo), जिसे समुद्र में मौजूद सबसे दूरस्थ स्थानों में गिना जाता है। यह जगह इतनी सुनसान है कि इसके आसपास सैकड़ों-हजारों किलोमीटर तक कोई बड़ा आबादी वाला इलाका नहीं मिलता।

    प्वाइंट निमो दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है और इसे Oceanic Pole of Inaccessibility यानी समुद्र का वह स्थान माना जाता है, जो किसी भी जमीन से सबसे अधिक दूरी पर है।

    जमीन से 2,000 किलोमीटर से ज्यादा दूर

    प्वाइंट निमो के आसपास सबसे नजदीकी जमीन भी करीब 2,688 किलोमीटर दूर है। यानी इस जगह के आसपास समुद्र के विशाल क्षेत्र में कोई महाद्वीप या बड़ा द्वीप नहीं है।

    इसकी बेहद अलग भौगोलिक स्थिति की वजह से इसे धरती की सबसे सुनसान जगहों में गिना जाता है। यहां सामान्य परिस्थितियों में इंसानों की मौजूदगी भी बेहद कम होती है।

    अंतरिक्ष से जुड़ा है खास कनेक्शन

    प्वाइंट निमो की एक और खास बात इसे बेहद दिलचस्प बनाती है। यह क्षेत्र अंतरिक्ष में घूमने वाली कुछ वस्तुओं के लिए एक तरह का नियंत्रित ‘स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान’ बन चुका है।

    जब कुछ पुराने अंतरिक्ष यान या सैटेलाइट दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं रहते, तो उन्हें नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाया जाता है। ऐसे अंतरिक्ष यानों के बचे हुए हिस्सों को समुद्र के बेहद दूरस्थ क्षेत्र में गिराने की योजना बनाई जाती है।

    इसी वजह से प्वाइंट निमो के आसपास का क्षेत्र आम बोलचाल में ‘स्पेसक्राफ्ट ग्रेवयार्ड’ यानी अंतरिक्ष यानों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है।

    कभी-कभी इंसान यहां से भी ज्यादा करीब होते हैं अंतरिक्ष में

    प्वाइंट निमो की सबसे रोचक बात यह है कि कुछ परिस्थितियों में पृथ्वी की सतह पर मौजूद किसी इंसान की तुलना में अंतरिक्ष में मौजूद अंतरिक्ष यात्री इस जगह के ज्यादा करीब हो सकते हैं।

    जब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरता है, तो वहां मौजूद अंतरिक्ष यात्री प्वाइंट निमो से जमीन पर मौजूद किसी व्यक्ति की तुलना में कम दूरी पर हो सकते हैं। यही वजह है कि यह जगह विज्ञान और अंतरिक्ष की दुनिया में खास दिलचस्पी रखती है।

    यहां पहुंचना इतना मुश्किल क्यों है?

    प्वाइंट निमो किसी शहर या पर्यटन स्थल की तरह कोई स्थायी आबादी वाला स्थान नहीं है। यह खुले समुद्र में स्थित एक भौगोलिक बिंदु है। चारों ओर विशाल समुद्र और आसपास जमीन का बेहद दूर होना इसे दुनिया के सबसे अलग-थलग स्थानों में शामिल करता है।

    यही कारण है कि प्वाइंट निमो को पृथ्वी के सबसे रहस्यमयी और सुनसान स्थानों में गिना जाता है। यह जगह दिखाती है कि हमारी धरती पर आज भी ऐसे विशाल क्षेत्र मौजूद हैं, जहां इंसानों की पहुंच बेहद सीमित है।

  • शोरूम में घुसा चोर, 4​​​​​ घंटे तक नहाया-कॉफी पी और डांस किया; जाते-जाते 4.71 लाख की KTM बाइक ले उड़ा.

    शोरूम में घुसा चोर, 4​​​​​ घंटे तक नहाया-कॉफी पी और डांस किया; जाते-जाते 4.71 लाख की KTM बाइक ले उड़ा.

    शोरूम में घुसा चोर, 4​​​​​ घंटे तक नहाया-कॉफी पी और डांस किया; जाते-जाते 4.71 लाख की KTM बाइक ले उड़ा.

    Viral Crime Story: उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चोरी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। यहां एक चोर बाइक शोरूम में चोरी करने के इरादे से दाखिल हुआ, लेकिन चोरी करने से पहले उसने करीब साढ़े चार घंटे तक शोरूम के अंदर आराम से वक्त बिताया।

    इस दौरान उसने कॉफी बनाई और पी, शोरूम में ही नहाया, अपने कपड़े धोकर सुखाए और गाने पर डांस भी किया। इसके बाद वह शोरूम से करीब 4.71 लाख रुपये कीमत की KTM बाइक लेकर फरार हो गया।

    शटर काटकर शोरूम में घुसा था चोर

    जानकारी के मुताबिक, यह मामला वाराणसी के मंडुआडीह थाना क्षेत्र का है। बताया जा रहा है कि आरोपी ने शोरूम का शटर काटकर अंदर प्रवेश किया था। शोरूम में दाखिल होने के बाद उसने जल्दबाजी में चोरी करने के बजाय काफी समय वहीं बिताया।

    सीसीटीवी फुटेज में उसकी कई गतिविधियां कैद हुई हैं। बताया जा रहा है कि उसने शोरूम के अंदर कॉफी बनाई और आराम से पी। इसके बाद उसने नहाया और अपने कपड़े सुखाए।

    ‘लुंगी डांस’ पर करने लगा डांस

    चोर की हरकतें यहीं नहीं रुकीं। शोरूम के अंदर वह बॉलीवुड के मशहूर गाने ‘लुंगी डांस’ पर डांस करता हुआ भी नजर आया। करीब साढ़े चार घंटे तक शोरूम में रहने के बाद उसने आखिरकार वहां से बाइक ले जाने का फैसला किया।

    आरोपी शोरूम के मैनेजर की करीब 4.71 लाख रुपये कीमत वाली KTM बाइक लेकर वहां से फरार हो गया। घटना सामने आने के बाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी है।

    पुलिस ने दर्ज की FIR

    घटना को लेकर वाराणसी पुलिस ने भी जानकारी दी है। पुलिस के मुताबिक, मंडुआडीह थाना क्षेत्र में संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज कर ली गई है और मामले की जांच की जा रही है।

    पुलिस आरोपी की पहचान करने और उसे पकड़ने के लिए उपलब्ध सुरागों की जांच कर रही है। चोरी की इस घटना में आरोपी का शोरूम के अंदर इतने लंबे समय तक रहना और चोरी से पहले इस तरह की गतिविधियां करना लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध रिपोर्ट और पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मामले की जांच जारी है और पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ही घटना से जुड़े सभी तथ्यों की पुष्टि हो सकेगी।

  • चाणक्य नीति से ढूंढे गए​​​​​ सक्सेस के ये 5 फॉर्मूले, केवल स्टूडेंट नहीं आएंगे आपके भी काम

    चाणक्य नीति से ढूंढे गए​​​​​ सक्सेस के ये 5 फॉर्मूले, केवल स्टूडेंट नहीं आएंगे आपके भी काम

    चाणक्य नीति से ढूंढे गए​​​​​ सक्सेस के ये 5 फॉर्मूले, केवल स्टूडेंट नहीं आएंगे आपके भी काम

    दिन-रात कर पूरी मेहनत झोंक देने के बाद कुछ लोग सफलता की दहलीज पर रुक जाते हैं. यदि आप भी उन लोगों में हैं, तो आपको आचार्य चाणक्य की नीतियों में से ढूंढे गए ये 5 खास बातें जरूर समझनी चाहिए, जो स्टूडेंट के साथ-साथ सबके लिए उपयोगी है. आपको बता दें कि आचार्य चाणक्य भारतीय इतिहास की वो शख्सियत हैं, जिसने लगभग 2300 साल पहले अपनी बुद्धि के बल पर एक शक्तिशाली साम्राज्य का तख्तापलट दिया और एक आम बालक को अखंड भारतवर्ष का सम्राट बना दिया. कहते हैं, उन्होंने सफलता के उन गूढ़ रहस्यों को डिकोड कर लिया था, जो के मॉडर्न एज में उतने ही कारगर हैं। आइए जानते हैं, क्या हैं सफलता के ये सूत्र?

    योजनाओं को गुप्त रखें

    आचार्य चाणक्य के अनुसार, आप अगला कदम क्या लेने जा रहे हैं, इस प्रकार की महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा किसी के सामने न करें. जब तक उद्देश्य की प्राप्ति न हो जाए, लक्ष्य न मिल जाए यानी काम बन जानें तक अपनी योजनाओं का खुलासा न करें, क्योंकि कई बार लोग आपकी सफलता से अधिक विफलता पर नजर रखते हैं.

    दूसरों की गलतियों से सीखें

    यह जीवन बहुत लंबा और बड़ा नहीं है. खुद एक्सपेरिमेंट करके के गलती करने पर और उसमें सीखने में बहुत टाइम बर्बाद होता है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बुद्धिमान और समझदार वही है, जो दूसरों नाकामियों और गलतियों से सीख और सबक लेकर काम करता है और खुद वैसी गलतियां नहीं करता है.

    काम के रिजल्ट पर फोकस

    व्यावहारिक दुनिया में, चाहे वह पढ़ाई हो या कॉरपोरेट लाइफ, यहां कोरी बातों और वादों से काम नहीं होता है, इससे पहचान नहीं बनती है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि इंसान की असली पहचान उसके असल काम और उसके प्रत्यक्ष रिजल्ट यानी परिणाम से बनती है। इसलिए हमेशा काम के रिजल्ट पर फोकस रखें.

    सीखना बंद न करें

    आचार्य चाणक्य कहते है कि ज्ञान और अनुभव का कोई विकल्प नहीं है. यह सबसे बड़ी पूंजी और ताकत है। किसी दूसरे का ज्ञान हमेशा आपके काम आए ये जरूरी नहीं है. वे कहते हैं, कि किसी भी विद्यार्थी (स्टूडेंट) और मनुष्य को सीखना बंद नहीं करना चाहिए. यह देखा गया है कि जो व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, उसकी ग्रोथ वहीं रुक जाती है.

    डिसिप्लिन और समय की कीमत

    डिसिप्लिन एक मौलिक गुण है, लेकिन यह साधा जाता है, जो एक कठिन काम है. वहीं, समय के अवसर की तरह है, जो एक बार आता है, तो दुबारा कब आएगा पता नहीं. इस लिए समय का सम्मान करना जरूरी है, वरना सफलता नहीं मिलती है. चाणक्य नीति के अनुसार, हर काम को उसके तय समय पर पूरा करना चाहिए, क्योंकि आज के काम को कल पर टालना असफलता की पहली सीढी है.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है

  • दुनिया का अनोखा द्वीप, जहां​​​​​ हर 6 महीने में बदलता है देश का प्रशासन; जानिए क्या है इसकी पूरी कहानी

    दुनिया का अनोखा द्वीप, जहां​​​​​ हर 6 महीने में बदलता है देश का प्रशासन; जानिए क्या है इसकी पूरी कहानी

    दुनिया का अनोखा द्वीप, जहां​​​​​ हर 6 महीने में बदलता है देश का प्रशासन; जानिए क्या है इसकी पूरी कहानी

    दुनिया में सीमा विवाद को लेकर कई देशों के बीच तनाव और संघर्ष की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं. भारत-पाकिस्तान समेत कई देशों के बीच जमीन और सीमाओं को लेकर लंबे समय से विवाद चले आ रहे हैं. लेकिन दुनिया में एक ऐसा छोटा सा द्वीप भी है, जिसे लेकर दो देशों के बीच कोई झगड़ा नहीं है. उल्टा, दोनों देश तय व्यवस्था के तहत हर छह महीने में बारी-बारी से इसका नियंत्रण एक-दूसरे को सौंपते हैं. यह अनोखा द्वीप फीजंट आइलैंड (Pheasant Island) है, जो फ्रांस और स्पेन के बीच स्थित है. साल के छह महीने यह फ्रांस के प्रशासन में रहता है और अगले छह महीने स्पेन इसकी जिम्मेदारी संभालता है. दोनों देशों के बीच इस व्यवस्था को लेकर किसी तरह का विवाद नहीं है. इस अनोखी व्यवस्था के कारण फीजंट आइलैंड दुनिया के सबसे दिलचस्प इलाकों में गिना जाता है.

    यह छोटा सा द्वीप बिदासोआ नदी के बीच स्थित है. यही नदी फ्रांस और स्पेन के बीच प्राकृतिक सीमा का काम करती है और आगे जाकर अटलांटिक महासागर में मिल जाती है. नदी के एक तरफ फ्रांस का हेंदाए शहर है, जबकि दूसरी ओर स्पेन का इरुन क्षेत्र पड़ता है. करीब 200 मीटर लंबा यह छोटा-सा भूभाग स्थायी रूप से किसी एक देश का हिस्सा नहीं है. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इसे कंडोमिनियम कहा जाता है, यानी दो देशों के बीच साझा संप्रभुता वाला क्षेत्र.

    1659 की संधि से जुड़ा है इतिहास

    फीजंट आइलैंड का इतिहास भी काफी दिलचस्प है. साल 1659 में फ्रांस और स्पेन के प्रतिनिधि इसी द्वीप पर मिले थे. यहां दोनों देशों के बीच ट्रीटी ऑफ द पाइरेनीज नाम की महत्वपूर्ण संधि हुई थी. इस समझौते के साथ दोनों देशों के बीच करीब 30 साल से चला आ रहा युद्ध खत्म हुआ था.

    संधि में सीमा तय करने के लिए बिदासोआ नदी के बीच को आधार माना गया. ऐसे में नियम के हिसाब से द्वीप को भी दो हिस्सों में बांटा जा सकता था, क्योंकि इसका क्षेत्रफल करीब 1.6 एकड़ ही है. एक हिस्सा फ्रांस और दूसरा स्पेन के पास जा सकता था. लेकिन दोनों देशों ने ऐसा करने के बजाय एक अलग और शांतिपूर्ण व्यवस्था बनाई. उन्होंने पूरे द्वीप को ‘कंडोमिनियम’ घोषित कर दिया. इसका मतलब है कि इस इलाके पर दोनों देशों का साझा अधिकार रहेगा.

    छह महीने बाद बदल जाता है नियंत्रण

    इस द्वीप का प्रशासन हर साल दो बार बदलता है. 1 फरवरी से 31 जुलाई तक स्पेन इसकी जिम्मेदारी संभालता है, जबकि 1 अगस्त से 31 जनवरी तक नियंत्रण फ्रांस के पास रहता है. यानी अगस्त की शुरुआत में फ्रांस को प्रशासन मिलता है और फरवरी में यह जिम्मेदारी फिर स्पेन को सौंप दी जाती है.

    नियंत्रण बदलने की प्रक्रिया भी सामान्य प्रशासनिक बदलाव जैसी नहीं है. दोनों देशों के अधिकारी औपचारिक रूप से एक-दूसरे को जिम्मेदारी सौंपते हैं. यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रतीक मानी जाती है.

    आम लोगों के लिए नहीं खुलता

    इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद फीजेंट आइलैंड में आज के समय में लोग नहीं रहते हैं. यहां आम लोगों की आवाजाही भी सामान्य रूप से नहीं होती है. द्वीप की देखरेख और रखरखाव की जिम्मेदारी दोनों देशों के संबंधित अधिकारी संभालते हैं.

    दिलचस्प बात यह है कि नाम भले ही ‘फीजेंट आइलैंड’ यानी तीतर के द्वीप का हो, लेकिन यहां तीतर नहीं पाए जाते. यही वजह है कि यह छोटा-सा द्वीप अपने आकार से कहीं ज्यादा अपने इतिहास और अनोखी राजनीतिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है. फ्रांस और स्पेन के बीच इसका छह-छह महीने का प्रशासन आज भी दुनिया में साझा संप्रभुता का एक दुर्लभ उदाहरण है.

  • बार-बार धुंधला दिखता है चश्मा?​​​​​ लेंस साफ करते समय न करें ये गलतियां… सही तरीका जानें और खरोंच से भी बचाएं.

    बार-बार धुंधला दिखता है चश्मा?​​​​​ लेंस साफ करते समय न करें ये गलतियां… सही तरीका जानें और खरोंच से भी बचाएं.

    बार-बार धुंधला दिखता है चश्मा?​​​​​ लेंस साफ करते समय न करें ये गलतियां… सही तरीका जानें और खरोंच से भी बचाएं.

    चश्मे के लेंस पर धूल, तेल और उंगलियों के निशान जमने से दिखाई देने में परेशानी हो सकती है. जानिए चश्मे को साफ करने का सही तरीका, माइक्रोफाइबर कपड़े का इस्तेमाल कैसे करें और किन चीजों से लेंस को साफ करने से बचना चाहिए.

    चश्मा रोज इस्तेमाल करने वालों के लिए उसके लेंस की सफाई बेहद जरूरी है. लेंस पर धूल, तेल और उंगलियों के निशान जमा होने से साफ दिखाई देना मुश्किल हो सकता है. कई लोग जल्दी में चश्मे को शर्ट, रुमाल या टिशू से पोंछ देते हैं. ऐसा करने से लेंस पर छोटी-छोटी खरोंच आ सकती हैं. इसलिए चश्मे की सफाई सही तरीके से करना जरूरी है.

    सबसे पहले पानी से लेंस साफ करें

    चश्मा साफ करने से पहले अपने हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धो लें. इसके बाद लेंस को सामान्य या हल्के गुनगुने पानी से धोएं. इससे लेंस पर जमा धूल और छोटे कण हट जाएंगे. सूखे लेंस को सीधे कपड़े से रगड़ने से बचें, क्योंकि धूल के कण लेंस पर खरोंच डाल सकते हैं.

    माइक्रोफाइबर कपड़े का करें इस्तेमाल

    लेंस साफ करने के लिए हमेशा साफ माइक्रोफाइबर कपड़े का इस्तेमाल करें. यह कपड़ा लेंस पर मौजूद गंदगी और निशान को आसानी से साफ करने में मदद करता है. चश्मे को शर्ट, तौलिया या सामान्य रुमाल से साफ करने की आदत छोड़ दें. सफर के दौरान भी माइक्रोफाइबर कपड़ा अपने बैग में रखें.

    लेंस क्लीनिंग स्प्रे से हटाएं तेल और निशान

    अगर लेंस पर तेल या उंगलियों के निशान हैं, तो चश्मे के लिए बनाए गए लेंस क्लीनिंग स्प्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है. क्लीनर लगाने के बाद माइक्रोफाइबर कपड़े से लेंस को हल्के हाथों से साफ करें. अगर आपके चश्मे पर खास कोटिंग है, तो उसी के लिए सही क्लीनर चुनना बेहतर है.

    ज्यादा गंदे चश्मे को ऐसे करें साफ

    अगर चश्मा बहुत गंदा है, तो पहले पानी से लेंस धोएं. इसके बाद हल्के डिशवॉशिंग लिक्विड की सिर्फ एक छोटी बूंद लगाकर धीरे से साफ कर सकते हैं. फिर साफ पानी से अच्छी तरह धोकर माइक्रोफाइबर कपड़े से सुखाएं.

    इन चीजों से लेंस को रखें दूर

    चश्मे के लेंस पर घरेलू ग्लास क्लीनर, थिनर, नेल पॉलिश रिमूवर या थूक का इस्तेमाल न करें. इन चीजों से लेंस की खास परत खराब हो सकती है. साथ ही धूल लगे लेंस को जोर से रगड़ने से बचें. ऑफिस या सफर में चश्मे के लिए बने लेंस वाइप्स भी रख सकते हैं.

  • पहले अनजान शख्स ने कार​​​​​ में बैठाया, फिर सिक्योरिटी गार्ड की बदली नीयत, इटली में दो बार खतरे में फंसी ऑस्ट्रेलियाई महिला.

    पहले अनजान शख्स ने कार​​​​​ में बैठाया, फिर सिक्योरिटी गार्ड की बदली नीयत, इटली में दो बार खतरे में फंसी ऑस्ट्रेलियाई महिला.

    पहले अनजान शख्स ने कार​​​​​ में बैठाया, फिर सिक्योरिटी गार्ड की बदली नीयत, इटली में दो बार खतरे में फंसी ऑस्ट्रेलियाई महिला.

    विदेश घूमने का सपना लगभग हर किसी का होता है. नई जगहें देखना, अलग कल्चर को करीब से जानना और यादगार एक्सपीरियंस जुटाना हर ट्रैवलर की इच्छा होती है. लेकिन कभी-कभी एक छोटी-सी लापरवाही पूरी यात्रा को डरावने अनुभव में बदल सकती है. ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली एक महिला के साथ इटली में कुछ ऐसा ही हुआ. पहले उसने एक अनजान व्यक्ति की कार में लिफ्ट ली और बाद में जिस शख्स ने मदद का भरोसा दिलाया, उसकी नीयत भी ठीक नहीं निकली. दो बार खतरे से बचने के बाद उसने किसी तरह अपनी जान बचाई और अब उसने अपना यह अनुभव लोगों के साथ साझा किया है ताकि दूसरे लोग ऐसी गलती न करें.

    मेलबर्न की रहने वाली 36 वर्षीय स्टेफनी पिछले साल अक्टूबर में अपने दोस्तों के साथ यूरोप घूमने गई थीं. छुट्टियां खत्म होने के बाद उनके दोस्त वापस ऑस्ट्रेलिया लौट गए, लेकिन स्टेफनी ने कुछ समय और इटली में रुकने का फैसला किया. उनका सपना था कि वह इटली की मशहूर 1 यूरो हाउस स्कीम के तहत एक पुराना घर खरीदें और उसे अपने हिसाब से तैयार करें. इसके अलावा वह सिसिली के लो स्टैग्नोने इलाके में काइटबोर्डिंग का भी आनंद लेना चाहती थीं. इसी दौरान वह काइटबोर्डिंग करने वाले एक ग्रुप के साथ थीं. कार्यक्रम खत्म होने के बाद सभी लोग दूसरी जगह जाने की तैयारी कर रहे थे. तभी वहां मौजूद एक यूरोपीय मूल के व्यक्ति ने स्टेफनी से कहा कि वह उन्हें कार से छोड़ सकता है. स्टेफनी को लगा कि वह भी बाकी लोगों के साथ उसी दिशा में जा रहा है, इसलिए उन्होंने बिना ज्यादा सोचे उसकी कार में बैठना ठीक समझा.

    दो बार मुश्किल से बची जान

    शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन कुछ ही मिनटों में उन्हें महसूस होने लगा कि कार बाकी लोगों के रास्ते से अलग दिशा में जा रही है. इसी बीच ड्राइवर ने मुस्कुराते हुए कहा कि चलो देखते हैं कि यह कार 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकती है या नहीं. इसके बाद उसने तेज स्पीड में गाड़ी दौड़ानी शुरू कर दी. स्टेफनी घबरा गईं. उन्होंने कई बार उससे कार रोकने और उन्हें उतारने की बात कही, लेकिन ड्राइवर ने उनकी एक नहीं सुनी. उल्टा वह और तेज रफ्तार से गाड़ी चलाने लगा. माहौल देखकर उन्हें समझ आ गया कि कुछ ठीक नहीं है. उन्होंने बिना समय गंवाए अपने काइटबोर्डिंग इंस्ट्रक्टर को अपनी लाइव लोकेशन भेज दी, ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी लोकेशन किसी के पास मौजूद रहे.

    रास्ते में कार की आगे वाली सीट पर बैठा एक दूसरा व्यक्ति ड्राइवर से पूछता है कि क्या बाकी लोग भी उसके घर आने वाले हैं. इस पर ड्राइवर जवाब देता है कि नहीं, कोई और नहीं आ रहा. यह जवाब सुनते ही स्टेफनी को यकीन हो गया कि मामला बेहद गंभीर है. उन्हें ऐसा भी लगा कि शायद ड्राइवर के साथ बैठा दूसरा व्यक्ति उसकी असली योजना से पूरी तरह वाकिफ नहीं था. करीब 12 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद कार एक बड़े गेट वाले मकान के अंदर पहुंची. जैसे ही गाड़ी रुकी, स्टेफनी ने देखा कि कार का दरवाजा लॉक नहीं था. उन्होंने एक पल भी बर्बाद नहीं किया. तुरंत दरवाजा खोला और पूरी ताकत से वहां से भाग निकलीं. वह लगातार दौड़ती रहीं और तब जाकर रुकीं, जब उन्हें यकीन हो गया कि कोई उनका पीछा नहीं कर रहा.

    काफी देर तक पैदल चलने के बाद वह एक छोटे से कस्बे में पहुंचीं. वहां उनकी मुलाकात एक सिक्योरिटी गार्ड से हुई. भाषा की समस्या होने के कारण उन्होंने मोबाइल के ट्रांसलेशन ऐप की मदद से पूरी घटना उसे समझाई. गार्ड ने भरोसा दिलाया कि वह उन्हें सुरक्षित उनके होटल तक छोड़ देगा. स्टेफनी को लगा कि अब उन्हें राहत मिल गई है और आखिरकार कोई उनकी मदद करने वाला मिल गया, लेकिन उनकी मुश्किल अभी खत्म नहीं हुई थी. कुछ दूर चलने के बाद सिक्योरिटी गार्ड ने अपनी कार एक सुनसान जगह पर रोक दी. फिर उसने स्टेफनी का मोबाइल लिया और उसमें ट्रांसलेशन ऐप के जरिए एक मैसेज टाइप किया. उसमें लिखा था कि मैं तुम्हें होटल छोड़ रहा हूं, इसके बदले तुम मेरे लिए क्या करोगी?

    यह मैसेज पढ़ते ही स्टेफनी के होश उड़ गए. उन्हें समझ आ गया कि जिस इंसान पर उन्होंने भरोसा किया था, उसकी नीयत भी ठीक नहीं है. इस बार भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. जैसे ही मौका मिला, उन्होंने कार का दरवाजा खोला और वहां से भाग निकलीं. अपनी जान बचाने के लिए वह पास के एक वाइनयार्ड में जाकर छिप गईं. कुछ देर वहां रुकने के बाद उन्होंने पैदल ही होटल की तरफ चलना शुरू किया. रास्ते भर वह बेहद डरी हुई थीं. जब भी उन्हें कोई कार आती दिखाई देती, वह खुद को छिपा लेतीं ताकि कोई उन्हें देख न सके. उन्होंने रास्ते में एक वेंडिंग मशीन से ड्रिंक भी खरीदी. उनका कहना था कि अगर भविष्य में जरूरत पड़े तो उस खरीदारी का रिकॉर्ड यह साबित कर सकता है कि वह उस समय वहां मौजूद थीं.

    कई घंटे की परेशानी और डर के बाद स्टेफनी आखिरकार सुरक्षित अपने होटल पहुंच गईं. इस पूरी घटना ने उनकी सोच बदल दी. उन्होंने बताया कि इटली में घर खरीदने और वहां लंबे समय तक रहकर काम करने का जो सपना उन्होंने देखा था, फिलहाल उसे टाल दिया है. अब अगर वह भविष्य में इटली जाएंगी भी, तो अकेले नहीं बल्कि किसी भरोसेमंद साथी के साथ ही जाएंगी.

  • बाल काटकर बांट रहे बराबरी​​​​​ और मुस्कान, कोटा का ये कपल 116 सरकारी स्कूलों में 15,500 बच्चों को दे चुका मुफ्त हेयरकट..

    बाल काटकर बांट रहे बराबरी​​​​​ और मुस्कान, कोटा का ये कपल 116 सरकारी स्कूलों में 15,500 बच्चों को दे चुका मुफ्त हेयरकट..

    बाल काटकर बांट रहे बराबरी​​​​​ और मुस्कान, कोटा का ये कपल 116 सरकारी स्कूलों में 15,500 बच्चों को दे चुका मुफ्त हेयरकट..

    समाजसेवा के लिए जरूरी नहीं कि कोई बड़ा मंच हो, बड़ा बजट हो या बड़े आयोजन किए जाएं. अगर हुनर और सेवा का भाव हो तो रोजमर्रा का काम भी बदलाव की वजह बन सकता है. कोटा में ऐसा ही उदाहरण पेश कर रहा है बालिता क्षेत्र में रहने वाला एक दंपती, जिसने कैंची और कंघी को ही समाजसेवा का जरिया बना लिया है. बृजेश कुमार सेन और उनकी पत्नी ममता सेन सरकारी स्कूलों में पहुंचकर बच्चों की निःशुल्क हेयर कटिंग कर रहे हैं.

    आमतौर पर सरकारी स्कूलों में समाजसेवी संस्थाओं की ओर से किताबें, बैग, यूनिफॉर्म, फर्नीचर या अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन बृजेश और ममता ने बच्चों की जरूरत को एक अलग नजरिए से समझा. उनका मानना है कि साफ-सुथरा रहना, आत्मविश्वास के साथ स्कूल आना और किसी बच्चे को उसके आर्थिक हालात की वजह से अलग महसूस न होने देना भी समाजसेवा का हिस्सा है.

    11 जुलाई 2024 से शुरू हुआ सफर बृजेश कुमार सेन का अपना हेयर सैलून है और उनकी पत्नी ममता सेन ब्यूटी पार्लर चलाती हैं. दोनों ने अपने इसी हुनर को समाज के जरूरतमंद बच्चों के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया. 11 जुलाई 2024 को इस अभियान की शुरुआत हुई. इसके बाद से यह सेवा किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही. बृजेश अपनी टीम के साथ सप्ताह में चार दिन अलग-अलग सरकारी स्कूलों में कैंप लगाते हैं. स्कूल प्रबंधन और प्रधानाचार्य की अनुमति के बाद टीम स्कूल पहुंचती है और बच्चों की मुफ्त हेयर कटिंग करती है.

    116 स्कूल, आश्रम और करीब 15,500 बच्चों की कटिंग इस अभियान का दायरा अब काफी बढ़ चुका है. बृजेश और उनकी टीम अब तक करीब 116 सरकारी स्कूलों और आश्रमों में लगभग 15,500 बच्चों की निःशुल्क हेयर कटिंग कर चुकी है. उनकी टीम में सैलून पर काम करने वाले छह लोग भी शामिल हैं. एक दिन में करीब 300 से 350 बच्चों की कटिंग की जाती है. लड़कों की हेयर कटिंग टीम के सदस्य करते हैं, जबकि छात्राओं की हेयर कटिंग की जिम्मेदारी ममता सेन संभालती हैं.

    मकसद सिर्फ बाल काटना नहीं, बच्चों में बराबरी का भाव पैदा करना इस पहल की सबसे खास बात यह है कि इसके पीछे सिर्फ मुफ्त हेयरकट देना मकसद नहीं है. बृजेश ने देखा कि सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे पढ़ते हैं, जिनके परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं. कई बार आर्थिक परिस्थितियों के कारण बच्चे समय पर हेयर कटिंग नहीं करवा पाते. वहीं कुछ बच्चे अलग-अलग तरह की स्टाइलिश हेयर कटिंग करवाकर स्कूल पहुंचते हैं. ऐसे में बृजेश ने बच्चों के बीच एक जैसी और स्कूल के अनुरूप हेयर कटिंग की पहल शुरू की, ताकि किसी बच्चे को उसकी आर्थिक स्थिति या पहनावे-रूप के आधार पर अलग महसूस न हो.

    हेयर कट के साथ स्वच्छता का पाठ स्कूल में कैंप के दौरान बच्चों की हेयर कटिंग करने के साथ उन्हें व्यक्तिगत स्वच्छता के बारे में भी समझाया जाता है. साफ-सुथरे कपड़े पहनने, नियमित रूप से बालों की देखभाल करने और स्वच्छ रहने के फायदे बताए जाते हैं. बृजेश का कहना है कि जब बच्चा साफ-सुथरा और आत्मविश्वास से भरा महसूस करता है तो उसका मन पढ़ाई और स्कूल की गतिविधियों में लगाने में भी मदद मिलती है. इस तरह उनका छोटा-सा प्रयास स्वच्छता, अनुशासन और आत्मविश्वास से भी जुड़ गया है.

    छात्राओं ने कहा- हमारे भी बाल काटिए शुरुआत में यह अभियान सिर्फ लड़कों की हेयर कटिंग से शुरू हुआ था. लेकिन कुछ समय बाद स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं ने भी बृजेश से मुफ्त हेयर कटिंग की मांग शुरू कर दी. बच्चियों का कहना था कि महिलाओं की हेयर कटिंग के लिए बाहर काफी पैसे खर्च होते हैं. बच्चों की इस बात को बृजेश और उनकी पत्नी ममता ने गंभीरता से लिया. इसके बाद ममता सेन इस अभियान में सक्रिय रूप से जुड़ीं और छात्राओं की मुफ्त हेयर कटिंग की जिम्मेदारी संभाल ली. अब पति-पत्नी दोनों मिलकर इस सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं.

    हर सप्ताह चार दिन, बिना किसी प्रचार के सेवा बृजेश और ममता के लिए यह कोई एक-दो दिन का अभियान नहीं है. सप्ताह में चार दिन वे अलग-अलग स्कूलों में पहुंचते हैं और लगातार बच्चों की हेयर कटिंग करते हैं. खास बात यह है कि इस सेवा के पीछे किसी तरह के बड़े प्रचार या दिखावे की इच्छा नहीं है. दोनों अपने पेशे के जरिए जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच रहे हैं और अपनी कमाई के हुनर का एक हिस्सा समाज को वापस दे रहे हैं.

    कैंची से सिर्फ बाल नहीं कट रहे, सोच भी बदल रही है कोटा के इस दंपती की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यहां समाजसेवा किसी अलग संसाधन से नहीं, बल्कि अपने हुनर से की जा रही है. बृजेश और ममता ने यह साबित किया है कि समाज के लिए कुछ करने के लिए जरूरी नहीं कि आपके पास बहुत पैसा हो. आपके पास जो हुनर है, उसी को किसी जरूरतमंद के काम में लगाया जा सकता है. आज उनकी टीम जब सरकारी स्कूल में पहुंचती है तो बच्चों के चेहरों पर उत्साह नजर आता है. कुछ देर के लिए स्कूल का माहौल भी बदल जाता है. बच्चे अपनी बारी का इंतजार करते हैं और हेयर कटिंग के बाद खुद को नए अंदाज में देखकर खुश होते हैं. लेकिन इस मुस्कान के पीछे सिर्फ नया हेयरकट नहीं है. इसके पीछे यह संदेश भी है कि सुविधाएं भले अलग हों, लेकिन सम्मान और बराबरी का हक हर बच्चे का है.

  • दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    हर देश में बच्चों की पढ़ाई शुरू करने की उम्र एक जैसी नहीं होती। कहीं बच्चे 5 साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू कर देते हैं, तो कुछ देशों में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत 7 साल की उम्र के आसपास होती है।

    वर्ल्ड ऑफ स्टैटिक्स के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बच्चे औसतन 6 साल की उम्र में औपचारिक स्कूल जाना शुरू करते हैं। वहीं अमेरिका में यह उम्र करीब 5 साल बताई गई है। अलग-अलग देशों की शिक्षा व्यवस्था और नियमों के कारण बच्चों के स्कूल शुरू करने की उम्र में अंतर देखने को मिलता है।

    भारत में 6 साल की उम्र से स्कूल

    आंकड़ों के मुताबिक भारत में बच्चे औसतन 6 साल की उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करते हैं। भारत के अलावा अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, मिस्र, जर्मनी और आइसलैंड जैसे कई देशों में भी स्कूल शुरू करने की औसत उम्र 6 साल बताई गई है।

    हालांकि, इन देशों में प्री-स्कूल या शुरुआती शिक्षा के लिए बच्चे इससे कम उम्र में भी शैक्षणिक संस्थानों में जाना शुरू कर सकते हैं।

    अमेरिका में 5 साल की उम्र में शुरुआत

    अमेरिका में बच्चों के औपचारिक स्कूल शुरू करने की औसत उम्र करीब 5 साल बताई गई है। यहां भी बच्चों की शुरुआती शिक्षा और प्री-स्कूल की व्यवस्था अलग-अलग राज्यों और स्थानीय शिक्षा प्रणालियों के अनुसार बदल सकती है।

    यानी अमेरिका और भारत की तुलना करें तो औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करने की औसत उम्र में करीब एक साल का अंतर नजर आता है।

    पाकिस्तान में कितनी उम्र में स्कूल जाते हैं बच्चे?

    वर्ल्ड ऑफ स्टैटिक्स के अनुसार, पाकिस्तान में बच्चे औसतन 5 साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू करते हैं।

    हालांकि, वहां प्री-स्कूल या अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन के लिए बच्चे करीब 3 साल की उम्र से भी शैक्षणिक संस्थानों में जाना शुरू कर सकते हैं।

    पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक स्तर की पढ़ाई आम तौर पर कक्षा 1 से 5 तक होती है। इसके बाद शिक्षा के अलग-अलग चरण आगे बढ़ते हैं।

    इन देशों में 7 साल में शुरू होती है पढ़ाई

    दुनिया के कुछ देशों में बच्चों की औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करने की औसत उम्र भारत और अमेरिका से अधिक है।

    आंकड़ों के मुताबिक फिनलैंड, हंगरी, पोलैंड, रूस और बुल्गारिया जैसे देशों में बच्चे आमतौर पर करीब 7 साल की उम्र में प्राथमिक स्कूल की शुरुआत करते हैं।

    इसका मतलब यह है कि दुनिया भर में बच्चों की स्कूली शिक्षा शुरू करने की कोई एक तय उम्र नहीं है। अलग-अलग देशों की शिक्षा नीति, बच्चों की शुरुआती शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था के आधार पर इसमें अंतर देखने को मिलता है।

    हर देश की अपनी शिक्षा व्यवस्था

    स्कूल शुरू करने की उम्र भले ही अलग-अलग हो, लेकिन लगभग हर देश में बच्चों के शुरुआती विकास और शिक्षा के लिए अलग-अलग स्तर बनाए गए हैं। कहीं प्री-स्कूल पर ज्यादा जोर दिया जाता है तो कहीं बच्चे सीधे प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत करते हैं।

    इसी वजह से किसी देश में 5 साल तो किसी दूसरे देश में 6 या 7 साल की उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू होना सामान्य बात है।

  • 10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    पुरानी और दुर्लभ चीजों की दुनिया में कभी-कभी कोई छोटी सी वस्तु भी इतनी कीमती हो जाती है कि उसकी कीमत सुनकर हर कोई हैरान रह जाए। अमेरिका में हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां महज 10 सेंट का एक पुराना सिक्का करीब 11.81 करोड़ रुपये में नीलाम हुआ।

    यह कोई सामान्य सिक्का नहीं था। इसे 1894-S डाइम या बारबर डाइम के नाम से जाना जाता है। इसकी दुर्लभता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1894 में इसके सिर्फ 24 सिक्के बनाए गए थे और आज पूरी दुनिया में इनमें से केवल 9 सिक्के बचे होने की जानकारी है।

    10 सेंट का सिक्का पहुंचा करोड़ों की कीमत तक

    एक सितंबर को स्टैक्स बोवर्स गैलरीज की नीलामी में इस दुर्लभ सिक्के को पेश किया गया। नीलामी शुरू होते ही कलेक्टर्स के बीच इसे खरीदने की होड़ लग गई।

    आखिरकार यह सिक्का 1.25 मिलियन डॉलर, यानी करीब 11.81 करोड़ रुपये में बिका। बताया गया कि यह सिक्का चौथी बार किसी नीलामी में पेश किया गया था।

    1894 में बनाए गए थे सिर्फ 24 सिक्के

    इस सिक्के को अमेरिका के तत्कालीन चीफ एन्ग्रेवर चार्ल्स ई. बारबर ने डिजाइन किया था। उनके नाम पर ही इसे बारबर डाइम कहा जाता है।

    साल 1894 में ऐसे सिर्फ 24 डाइम बनाए गए थे। समय के साथ इनमें से ज्यादातर सिक्के गायब हो गए और अब केवल 9 सिक्कों के मौजूद होने की जानकारी है।

    यही दुर्लभता इसे दुनिया के बड़े कॉइन कलेक्टर्स के लिए बेहद खास बनाती है। अमेरिका के 100 महानतम सिक्कों की एक गाइड में भी इसे चौथे स्थान पर रखा गया है।

    आखिर इतने कम सिक्के क्यों बनाए गए?

    इस सिक्के के निर्माण को लेकर इतिहास में अलग-अलग बातें सामने आती रही हैं। इसकी कहानी को 1893 के आर्थिक संकट से भी जोड़ा जाता है, जिसके दौरान अमेरिका में सिक्कों की ढलाई पर असर पड़ा था।

    एक मान्यता के अनुसार, सैन फ्रांसिस्को मिंट में बची हुई चांदी का इस्तेमाल करने के लिए इन सिक्कों को बनाया गया था।

    वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सैन फ्रांसिस्को मिंट के सुपरिंटेंडेंट ने अपनी बेटी और कुछ बैंक अधिकारियों को उपहार देने के लिए इन सिक्कों को बनवाया था। हालांकि, इन सिक्कों के बनाए जाने की सटीक वजह को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत मिलते हैं।

    19 साल के लड़के ने खरीदा था यह सिक्का

    इस दुर्लभ सिक्के के इतिहास में एक दिलचस्प अध्याय डेव बोवर्स से जुड़ा है। साल 1957 में 19 साल की उम्र में डेव बोवर्स ने यह सिक्का 4,750 डॉलर में खरीदा था।

    उस समय इतनी कम उम्र में एक सिक्के के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना अपने आप में खास बात थी। लेकिन इस खरीद ने उनके कॉइन कलेक्शन के सफर को एक नई दिशा दे दी।

    कुछ साल बाद, 1960 में उन्होंने यही सिक्का 6,000 डॉलर में बेच दिया। इसके बाद यह सिक्का कई बड़े कलेक्टर्स के पास पहुंचा।

    दिलचस्प बात यह है कि जिस स्टैक्स बोवर्स गैलरीज ने अब इस सिक्के को करोड़ों रुपये में नीलाम किया, उसका नाम भी डेव बोवर्स से जुड़ा हुआ है।

    सिक्के पर बनी है लेडी लिबर्टी की तस्वीर

    आज अमेरिका में इस्तेमाल होने वाले 10 सेंट के सिक्के पर पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की तस्वीर होती है। लेकिन 1894-S बारबर डाइम का डिजाइन इससे बिल्कुल अलग है।

    सिक्के के आगे वाले हिस्से पर लेडी लिबर्टी की तस्वीर बनी है, जबकि पीछे की तरफ फूलों की माला के बीच “ONE DIME” लिखा हुआ है।

    इसका ऐतिहासिक डिजाइन, सीमित संख्या में निर्माण और बेहद कम बचे हुए सिक्कों की वजह से इसकी कीमत लगातार बढ़ती गई।

    छोटी चीज, लेकिन करोड़ों की कीमत

    जिस सिक्के की शुरुआती कीमत कभी सिर्फ 10 सेंट थी, वही आज कॉइन कलेक्टर्स के लिए करोड़ों का खजाना बन चुका है। इसकी कहानी बताती है कि पुरानी चीजों की कीमत सिर्फ उनके धातु या मौद्रिक मूल्य से तय नहीं होती।

    किसी वस्तु की दुर्लभता, इतिहास, डिजाइन और उसके बचे हुए नमूनों की संख्या उसे बेहद मूल्यवान बना सकती है। 1894-S बारबर डाइम इसका एक शानदार उदाहरण है।