Viral Video: सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो तेजी से चर्चा में है, जिसे देखकर लोग हैरान भी हैं और बच्ची की सुरक्षा को लेकर चिंतित भी। वायरल क्लिप में एक छोटी बच्ची एक विशालकाय अजगर के बेहद करीब नजर आ रही है। बच्ची सांप के साथ इस तरह खेलती दिखाई देती है, जैसे वह किसी खिलौने के साथ खेल रही हो।
वीडियो में बच्ची घर के लिविंग रूम में सोफे पर बैठी दिखाई देती है। उसके सामने करीब 15 फुट लंबा अजगर नजर आता है। बच्ची कभी उसके शरीर पर लेटती है तो कभी उसके आसपास लिपटती हुई दिखाई देती है। एक जगह वह अजगर के सिर और मुंह के पास जाती हुई भी नजर आती है।
विशाल अजगर के साथ बच्ची का खतरनाक खेल
अजगर जहरीला सांप नहीं होता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। अजगर अपने मजबूत शरीर और मांसपेशियों की मदद से शिकार को जकड़ सकता है।
ऐसे में इतनी छोटी बच्ची का बिना किसी स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था के इतने बड़े सांप के बेहद करीब जाना जोखिम भरा हो सकता है। वीडियो में भले ही अजगर शांत दिखाई दे रहा हो, लेकिन जंगली या बड़े जानवरों के व्यवहार का अनुमान हमेशा पहले से नहीं लगाया जा सकता।
किसने शेयर किया वीडियो?
बताया जा रहा है कि इस वीडियो को अमेरिकी इन्फ्लुएंसर माइक होल्स्टन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया है। माइक होल्स्टन वन्यजीवों और खतरनाक जानवरों से जुड़े कंटेंट के लिए जाने जाते हैं।
वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर होते ही तेजी से वायरल हो गया और इसे देखने के बाद लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
बच्ची की सुरक्षा को लेकर चिंतित हुए लोग
वीडियो देखने वाले कई यूजर्स ने बच्ची की सुरक्षा पर सवाल उठाए। लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया पर व्यूज और मनोरंजन के लिए बच्चों को खतरनाक जानवरों के इतने करीब ले जाना उचित नहीं है।
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि सांप शांत दिखाई दे रहा हो, तब भी उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आ सकता है। इसलिए बच्चों को बड़े या संभावित रूप से खतरनाक जानवरों से हमेशा सुरक्षित दूरी पर रखना जरूरी है।
यह वीडियो भले ही सोशल मीडिया पर मनोरंजन या हैरानी का विषय बना हुआ है, लेकिन इसे देखकर ऐसे खतरनाक स्टंट को दोहराना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
भारत के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल अमृतसर का Golden Temple अपनी खूबसूरती और आध्यात्मिक महत्व के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. इसे श्री हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है. हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं. मंदिर की सुनहरी चमक देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या पूरा Golden Temple असली सोने से बना है? चलिए आपको बताते हैं इसका सही जवाब…महाराजा रणजीत सिंह ने कराई थी सोने की सजावट Golden Temple के स्वर्णीकरण में सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह की अहम भूमिका मानी जाती है. साल 1830 के आसपास उन्होंने मंदिर के प्रमुख हिस्सों को सोने से सजाने की पहल की थी. उस समय करीब 150 से 162 किलोग्राम 24 कैरेट सोने का इस्तेमाल किया गया था. उस दौर में इस सोने की कीमत करीब 65 लाख रुपये बताई जाती है. खास बात यह है कि उस समय इस्तेमाल किया गया सोना 24 कैरेट था, जो सामान्य गहने में इस्तेमाल होने वाले 22 कैरेट सोने से ज्यादा शुद्ध होता है.
बाद में फिर चढ़ाया गया सैकड़ों किलो सोना समय के साथ मंदिर की मरम्मत और सजावट का काम भी किया गया. साल 1995 से 1999 के बीच Golden Temple के नवीनीकरण के दौरान करीब 500 किलोग्राम अतिरिक्त 24 कैरेट सोने की परत चढ़ाई गई. यह सोना मंदिर के गुंबद, दरवाजों, दीवारों और अंदर की छत जैसे कई हिस्सों पर लगाया गया.पूरा मंदिर सोने का है? Golden Temple की पूरी इमारत सोने से नहीं बनी है. इसमें संगमरमर और तांबे का भी इस्तेमाल हुआ है.
सोने की परत इसकी सुंदरता और भव्यता को बढ़ाती है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार मंदिर में कुल मिलाकर करीब 662 से 750 किलोग्राम तक 24 कैरेट सोने के इस्तेमाल का अनुमान लगाया जाता है. आज के समय में इसकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये हो सकती है. यही सुनहरी आभा Golden Temple को दुनिया के सबसे आकर्षक और आध्यात्मिक धार्मिक स्थलों में खास पहचान देती है.
छत्तीसगढ़ के मां बगदाई वनदेवी मंदिर में फल-फूल नहीं, बल्कि 5 पत्थर अर्पित कर मन्नत मांगी जाती है. सदियों पुरानी यह अनोखी परंपरा आज भी लोगों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र है. आइए जानते हैं, यह परंपरा कैसे शुरू हुई, कथा और इतिहास क्या है?
लोग मंदिर में क्या-क्या नहीं चढ़ाते हैं, सोने-चांदी के आभूषण, छत्र, छप्पन भोग, लेकिन क्या आपने ये देखा और सुना है केवल 5 पत्थर अर्पित करने से लोगों की मुराद पूरी हो जाती है. जी हां, छत्तीसगढ़ में के ऐसा मंदिर है, जहां ऐसी ही अनोखी परंपरा निभाई जाती है, भक्ति विधान के लिए अलबेला है. आइए जानते हैं, छत्तीसगढ़ में में यह मंदिर कहां है, किस देवी को समर्पित है और सदियों पुरानी इस परंपरा के पीछे कहानी और इतिहास क्या है, जो आज भी आस्था का एक सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है?
मां बगदाई वनदेवी मंदिर
छत्तीसगढ़ का यह मंदिर खमतराई के घने जंगलों में है, जो बिलासपुर जिले में स्थित है. जहां देश के बाकी मंदिरों और पूजा स्थलों पर फूल, पान, मिठाई, फल, नारियल और आभूषण आदि चढ़ाएं जाते हैं, वहीं मां बगदाई वनदेवी को समर्पित इस मंदिर में 5 पत्थर चढ़ाने की अनूठी परंपरा है, जिसे लोग वहां ‘गोटा’ और ‘कंकड़’ कहते हैं.
साधारण नहीं हैं ‘गोटा पत्थर’
मां बगदाई वनदेवी के मंदिर में चढ़ाए जाने वाले ये पत्थर साधारण नहीं हैं. ये पत्थर खेतों में मिलते हैं, जिसे भक्तों को विशेष ध्यान से खोजना पड़ता है. ये चिकने और गोल होते हैं, जिसे ‘गोटा’ या ‘गोल कंकड़’ कहा जाता है. मान्यता है कि वनदेवी मां बगदाई को चुने हुए ये बेहद प्रिय हैं.
मन्नत पूरी होने पर भी चढ़ाते हैं 5 पत्थर
मां बगदाई वनदेवी के इस मंदिर में श्रद्धालुओं के मन्नत पूरी करने की प्रक्रिया 2 चरणों में होती है. पहला यह कि पहली बार मन्नत मांगते समय भक्त मन में अपनी मनोकामना दोहराते हु 5 पत्थर और एक फूल चढ़ाते हैं. दूसरी बार, मन्नत पूरी होने पर भी श्रद्धालु आभार व्यक्त करते हुए मंदिर में माता को 5 गोटा पत्थर चढ़ाते हैं.
कैसे शुरू हुई यह परंपरा?
कहते हैं, प्राचीन काल में लोग जब खमतराई के घने जंगलों से गुजरते थे तो वे हिंसक वन्य पशुओं और डाकुओं से रक्षा के लिए वे वनदेवी मां की प्रार्थना करते थे. कुछ पास न होने पर वे माता को 5 पत्थर ही चढ़ा देते थे. एक दूसरी कथा एक चरवाहे की है. कहते हैं, एक चरवाहे को जंगल वनदेवी की मूर्ति मिली थी. उसके पास भोग लगाने को कुछ नहीं था. तब देवी मां ने उसे दर्शन देकर कहा कि वह कीमती वस्तुओं की नहीं सच्ची श्रद्धा और प्रेम भूखी है, वह बस 5 पत्थर ही अर्पित कर दें. कहते हैं, तभी से ये परंपरा बदस्तूर चली आ राय रही है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है
मुंह से आने वाली बदबू यानी बैड ब्रीदिंग ऐसी समस्या है, जो कई बार लोगों के बीच असहज महसूस करा सकती है. इससे बचने के लिए लोग च्युइंग गम, माउथ फ्रेशनर और माउथवॉश का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनका असर अक्सर कुछ समय तक ही रहता है. तो चलिए आपको बताते हैं कि मुंह से गंदी बदबू आने से कैसे बच सकते हैं और इसका कारण क्या है.मुंह से बदबू क्यों आती है?
मुंह में मौजूद बैक्टीरिया बदबू की एक बड़ी वजह हो सकते हैं. दांतों के बीच फंसा खाना और जीभ पर जमा गंदगी बैक्टीरिया को बढ़ने का मौका देती है. इसके अलावा मुंह में सूखापन भी बदबू की समस्या को बढ़ा सकता है.लौंग और दालचीनी का पानी कैसे बनाएं? इसके लिए करीब 250 मिलीलीटर पानी लें और इसमें 4 से 5 लौंग को हल्का कूटकर डालें. अब इसमें करीब 1 इंच दालचीनी का टुकड़ा डालकर पानी को लगभग 5 मिनट तक मध्यम आंच पर उबालें. इसके बाद गैस बंद करके बर्तन को ढक दें.
पानी गुनगुना होने पर इसे छान लें.इस पानी से कैसे करें कुल्ला? गुनगुने पानी का एक घूंट मुंह में लें और इसे करीब 30 से 40 सेकंड तक पूरे मुंह में अच्छी तरह घुमाएं. इसके बाद पानी को थोड़ा गले की तरफ ले जाकर करीब 20 सेकंड तक गरारे करें और फिर थूक दें.क्यों फायदेमंद हो सकते हैं लौंग और दालचीनी? लौंग में यूजीनोल नाम का यौगिक पाया जाता है, जिसमें बैक्टीरिया के खिलाफ काम करने वाले गुण होते हैं.
वहीं, दालचीनी में सिनेमल्डिहाइड पाया जाता है, जो भी कुछ बैक्टीरिया के खिलाफ असर दिखा सकता है. हालांकि, इसे मुंह की बदबू का स्थायी इलाज नहीं माना जाना चाहिए.इन बातों का भी रखें ध्यान मुंह की बदबू से बचने के लिए रोज जीभ की अच्छी तरह सफाई करें. दिनभर पर्याप्त पानी पीते रहें, क्योंकि मुंह का सूखापन बदबू बढ़ा सकता है. दांतों के बीच फंसे खाने को साफ करने के लिए फ्लॉस का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. अगर नियमित सफाई के बावजूद बदबू लंबे समय तक बनी रहती है, तो डेंटिस्ट से सलाह लेना बेहतर है.
अगर कोई आपसे कहे कि एक AI चैटबॉट की मदद से कोर्ट में केस जीता जा सकता है, तो शायद पहला रिएक्शन यही होगा कि ये बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है, लेकिन ब्रिटेन में रहने वाले एक फायरफाइटर की कहानी इस सोच को चुनौती देती है. यहां बंदे ने महंगे वकीलों की जगह ChatGPT की मदद ली, खुद कोर्ट में अपनी पैरवी की और आखिरकार अपने लाखों रुपये वापस हासिल कर लिए. ये हैरान करने वाला मामला ब्रिटेन के रहने वाले 40 वर्षीय क्रेग टिटचेनर का है, जो हीथ्रो एयरपोर्ट पर फायरफाइटर के तौर पर काम करते हैं. कुछ साल पहले उनकी किस्मत ने ऐसा साथ दिया कि उन्होंने एक स्क्रैचकार्ड लॉटरी में करीब 2.58 करोड़ रुपये का जैकपॉट जीत लिया.
अचानक मिली इस बड़ी रकम ने उनकी जिंदगी बदल दी, लेकिन आगे चलकर यही पैसा उनके लिए एक लंबे कानूनी विवाद की वजह भी बन गया. साल 2022 में क्रेग ने अपनी गर्लफ्रेंड हीदर डगलस को करीब 52 लाख रुपये दिए. हीदर पेशे से साइकियाट्रिक नर्स हैं और उन्हें निवेश और वित्तीय मामलों की अच्छी जानकारी थी. दोनों के बीच ये समझौता हुआ था कि इस रकम से प्रीमियम बांड खरीदे जाएंगे और फ्यूचर में होने वाले फायदे को दोनों बराबर बांटेंगे. उस समय दोनों के रिश्ते अच्छे थे, इसलिए क्रेग को इस फैसले पर कोई शक नहीं था, लेकिन समय के साथ दोनों का रिश्ता टूट गया.
AI ने ऐसे की बंदे की मदद?
ब्रेकअप के बाद जब क्रेग ने अपनी दी हुई रकम वापस मांगी, तो मामला पूरी तरह बदल गया. हीदर ने पैसे लौटाने से साफ इनकार कर दिया. उनका कहना था कि ये रकम उन्हें गिफ्ट के तौर पर दी गई थी, इसलिए उसे वापस करने का कोई सवाल ही नहीं उठता. क्रेग के लिए ये सिचुएशन बेहद मुश्किल थी. उन्होंने कानूनी सलाह लेने की कोशिश की और कई वकीलों से कॉन्टैक्ट किया, लेकिन जब उन्हें पता चला कि केस लड़ने की फीस ही इतनी ज्यादा होगी कि वह उनके लिए भारी पड़ जाएगी, तो उनका हौसला टूटने लगा. एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने सोचा कि शायद पैसे वापस मिलना अब संभव नहीं है. इसी दौरान उनके मन में ChatGPT का इस्तेमाल करने का विचार आया. उन्होंने AI टूल से अपनी पूरी स्थिति शेयर की और कानूनी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की.
इसके बाद ChatGPT ने उन्हें आसान भाषा में समझाया कि कोर्ट की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है, कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे, किन फॉर्म्स को भरना होगा और बिना वकील के अदालत में अपनी बात किस तरह रखी जा सकती है. हालांकि उन्होंने ये भी माना कि AI ने उन्हें कानूनी Representative की तरह सलाह नहीं दी, बल्कि मेरे लिए चीजें आसान कर दी.
इसी जानकारी के आधार पर उन्होंने खुद अदालत में अपनी पैरवी करने का फैसला किया. ये कदम आसान नहीं था, क्योंकि अदालत में बिना वकील के अपना पक्ष रखना जोखिम भरा माना जाता है. फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. क्रेग ने बाद में कहा कि उनके पास खोने के लिए बहुत कम बचा था. अगर वे कोशिश भी नहीं करते, तो पैसे वापस मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी. इसलिए उन्होंने पूरी तैयारी के साथ कोर्ट में अपना पक्ष रखा.
मामले की सुनवाई सेंट्रल लंदन काउंटी कोर्ट में हुई. कोर्ट में हीदर डगलस ने दावा किया कि क्रेग ने उन्हें यह रकम खुशी-खुशी गिफ्ट के रूप में दी थी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रिश्ते के दौरान क्रेग का व्यवहार कंट्रोल करने वाला था और वे उन्हें परेशान करते थे, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने इन दावों की गहराई से जांच की. डिस्ट्रिक्ट जज शेर्लोट हार्ट ने पाया कि हीदर अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकीं.
वो ये साबित नहीं कर पाईं कि ये पैसे सच में गिफ्ट था. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने बैंक स्टेटमेंट जैसे अहम दस्तावेज भी अदालत में जमा नहीं किए. सभी तथ्यों और सबूतों पर विचार करने के बाद अदालत ने फैसला क्रेग के पक्ष में सुनाया और हीदर को आदेश दिया कि वह 52 लाख रुपये वापस करें. इस फैसले के बाद क्रेग ने राहत की सांस ली. उनका कहना है कि अगर उन्होंने हार मान ली होती या एआई की मदद से प्रक्रिया को समझने की कोशिश नहीं की होती, तो शायद यह मुकदमा कभी नहीं जीत पाते.
आज के दौर में जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं और नौकरी-रोजगार के चलते लोग अलग-अलग शहरों में बस रहे हैं, वहीं आंध्र प्रदेश का एक परिवार आज भी संयुक्त परिवार की पुरानी परंपरा को मजबूती से निभा रहा है. जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. अनंतपुर जिले के कुरलापल्ली गांव का नागप्पा परिवार अपने आप में खास है. इस परिवार में 83 सदस्य और छह पीढ़ियां एक साथ रहती हैं. परिवार में छह सास, 14 बहुएं और 20 बच्चे भी हैं.
परिवार के सदस्य चार आस-पास बने घरों में रहते हैं, लेकिन इनके बीच घरों की दीवारें रिश्तों के बीच दूरी नहीं बनातीं. रोजमर्रा की जिंदगी में परिवार खुद को एक ही इकाई मानता है. खाना एक साथ बनता है, घर का खर्च भी आपस में बांटा जाता है और घरेलू काम से लेकर खेती-बाड़ी तक की जिम्मेदारियां मिल-जुलकर संभाली जाती हैं. परिवार के बड़े सदस्य कई अहम फैसले सामूहिक रूप से लेते हैं.
सुबह की बैठक में तय होता है दिनभर का काम
इतने बड़े परिवार को संभालने के लिए यहां काम का बंटवारा भी व्यवस्थित तरीके से किया जाता है. परिवार के मुखिया हनुमंतरायडु ने बताया कि बुजुर्ग सदस्य हर सुबह चाय-कॉफी के दौरान बैठते हैं. इसी दौरान दिनभर के काम, खाने के मेन्यू और खेती से जुड़े कार्यों की योजना बनाई जाती है.
टॉप न्यूज़
परिवार के कुछ सदस्य खेतों में काम करने निकल जाते हैं, जबकि कुछ लोग घर पर रहकर खाना बनाने और दूसरे घरेलू कामों की जिम्मेदारी संभालते हैं. घर की जरूरत का सामान खरीदने की जिम्मेदारी भी परिवार के बड़े सदस्यों के पास होती है.
एक ही रसोई में तैयार होता है खाना
नागप्पा परिवार की सबसे खास बात इसकी साझा रसोई है. चार अलग-अलग मकानों में रहने के बावजूद परिवार के लिए भोजन एक साथ तैयार किया जाता है. परिवार की बहुएं मिलकर खाना बनाती हैं, जबकि बुजुर्ग सदस्य राशन और दूसरी जरूरी चीजों की व्यवस्था देखते हैं. परिवार की आमदनी भी साझा व्यवस्था का हिस्सा है. खेती के अलावा परिवार के पास चार बसें भी हैं, जो कल्याणदुर्गम और कर्नाटक के कुछ इलाकों के बीच चलती हैं. खेती और परिवहन से होने वाली आय को परिवार मिलकर संभालता है.
बात बढ़े तो उसी दिन कर लेते हैं सुलह
83 लोगों के इतने बड़े परिवार में विचारों का टकराव होना कोई असामान्य बात नहीं है. परिवार के बुजुर्ग भी मानते हैं कि कभी-कभी सदस्यों के बीच मतभेद हो जाते हैं, लेकिन कोशिश रहती है कि नाराजगी को ज्यादा देर तक न रखा जाए. दिन खत्म होने से पहले परिवार के लोग साथ बैठकर बातचीत करते हैं और आपसी विवाद को सुलझाने की कोशिश करते हैं. उनका मानना है कि सम्मान, सहयोग और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना ही परिवार को जोड़े रखने की सबसे बड़ी ताकत है. यही पारिवारिक समझ छह पीढ़ियों को आज भी एक साथ रहने की वजह बनी हुई है.
चौथी पीढ़ी संभालती है परिवार की जिम्मेदारी
नागप्पा परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य महेश पर अब पूरे परिवार की कई अहम जिम्मेदारियां हैं. उनके मुताबिक, परिवार में एक साथ रहने की परंपरा नागप्पा के समय से चली आ रही है और अब यह छह पीढ़ियों तक पहुंच गई है. बुजुर्गों ने बाहरी कामकाज की जिम्मेदारी काफी हद तक महेश को सौंप दी है.
महेश बताते हैं कि परिवार के लिए रोजमर्रा का राशन जुटाने से लेकर किसी सदस्य के इलाज, बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्च और किताबों की व्यवस्था तक का काम उन्हें देखना होता है. इसके अलावा वाहनों की देखरेख और बैंक से जुड़े काम भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल हैं. उनका कहना है कि इतने बड़े परिवार की जरूरतों को संभालना चुनौती जरूर है, लेकिन इसे लेकर उन्हें गर्व महसूस होता है. परिवार में उम्र और जिम्मेदारियों के स्तर पर अंतर हो सकता है, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनापन आज भी बना हुआ है.
खेती से लेकर बसों के कारोबार तक, आय के कई साधन
नागप्पा परिवार की आर्थिक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर टिका है. करीब 120 एकड़ जमीन पर परिवार खेती करता है, जिसमें मूंगफली, टमाटर, बैंगन, तरबूज, पपीता और मिर्च जैसी फसलें उगाई जाती हैं. इसके अलावा परिवार मिलकर ‘श्री कृष्णा हनुमान ट्रेवल्स’ की पांच बसों का संचालन भी करता है.
परिवार के पास पशुधन और खेती से जुड़े संसाधनों की भी अच्छी व्यवस्था है. इनके पास करीब 1000 भेड़ें, 70 भैंसें, तीन ट्रैक्टर, एक बोलेरो और एक आयशर ट्रक हैं. यानी परिवार की आजीविका केवल एक ही काम पर निर्भर नहीं है.
चूल्हे पर बनता है खाना
बड़े परिवार की रसोई में आज भी आधुनिक साधनों के साथ पारंपरिक खान-पान की झलक देखने को मिलती है. यहां मिट्टी और लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाने की परंपरा आज भी चली आ रही है. सुबह और शाम रागी संगटी और ज्वार की रोटियां तैयार की जाती हैं, जो परिवार के नियमित भोजन का हिस्सा हैं.
त्योहारों और खास मौकों पर परिवार की रसोई का काम और भी बढ़ जाता है. ऐसे अवसरों पर जब पूरा परिवार एक जगह जुटता है, तो बड़ी मात्रा में खाना तैयार किया जाता है. परिवार के सदस्यों के मुताबिक, एक ही भोजन के लिए कई किलो चिकन और करीब तीन बकरे तक पकाए जाते हैं.
जिम करने वाले लोगों की सबसे बड़ी समस्या होती है कि ऑफिस जाते वक्त क्या खाकर जाएं, जिसमें प्रोटीन भी बहुत हो और टेस्टी भी. अगर आप जिम जाते हैं या दिन की शुरुआत प्रोटीन वाले नाश्ते से करना चाहते हैं, तो हर दिन कुछ अलग और आसान रेसिपी घर पर ट्राई कर सकते हैं. ऐसी रेसिपी के लिए घंटों किचन में खड़े रहने की जरूरत नहीं है. बल्कि कुछ देर में ये बनकर तैयार हो जाएगी. यहां चार झटपट बनने वाले नाश्ते हैं, जिन्हें आप अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं.
1. मूंग दाल चीला बनाने का सामान:- भिगोई हुई मूंग दाल, प्याज, हरी मिर्च, धनिया, नमक और थोड़ा तेल.
बनाने का तरीका: मूंग दाल को पीसकर बैटर तैयार कर लें. इसमें प्याज, हरी मिर्च, धनिया और नमक मिला दें. गर्म तवे पर थोड़ा तेल लगाकर बैटर फैलाएं और दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंक लें. इसे दही के साथ खा सकते हैं.
2. पनीर एग भुर्जी टोस्ट बनाने का सामान:- पनीर, अंडे, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, नमक और दो ब्रेड स्लाइस.
बनाने का तरीका: पैन में थोड़ा तेल डालकर प्याज और टमाटर भूनें. अब अंडे फोड़कर डालें और अच्छी तरह चलाएं. इसमें क्रम्बल किया हुआ पनीर और नमक डालकर कुछ मिनट पकाएं. तैयार भुर्जी को ब्रेड पर रखकर गर्मागर्म खाएं.
3. बेसन पनीर चीला बनाने का सामान:- बेसन, पनीर, प्याज, टमाटर, धनिया, हरी मिर्च और नमक.
बनाने का तरीका: बेसन में पानी डालकर घोल तैयार करें. इसमें कटी हुई सब्जियां और नमक मिला दें. तवे पर बैटर फैलाएं और ऊपर से पनीर डालें. दोनों तरफ से सेंकने के बाद चीला तैयार है.
4. दही ओट्स बाउल बनाने का सामान:- ओट्स, गाढ़ा दही, भुने चने, मूंगफली, केला या सेब और थोड़े बीज.
बनाने का तरीका: एक बाउल में ओट्स और दही डालकर मिला लें. ऊपर से भुने चने, मूंगफली, फल और बीज डालें. इसे कुछ मिनट रखने के बाद खा सकते हैं. सुबह जल्दी हो तो यह सबसे आसान विकल्पों में से एक है.
दुनिया में ऐसी कई जगहें हैं जो अपनी खूबसूरती के साथ-साथ रहस्यों के लिए भी मशहूर हैं. इन्हीं में से एक है हेवन लेक, जिसे चीन में तियांची कहा जाता है. यह झील चीन और उत्तर कोरिया की सीमा पर स्थित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ वैज्ञानिकों और पर्यटकों, दोनों को अट्रैक्ट करती है. खास बात यह है कि यह कोई साधारण झील नहीं, बल्कि एक विशाल ज्वालामुखी के मुहाने पर बनी क्रेटर लेक है. हेवन लेक माउंट चांगबाईशान की चोटी पर करीब 7,200 फीट की ऊंचाई पर मौजूद है. यह ज्वालामुखी लाखों साल पहले हुए कई बड़े विस्फोटों के बाद बना था. यूनेस्को के अनुसार, यह उत्तर-पूर्व एशिया की सबसे ऊंची और सबसे बड़ी क्रेटर लेक मानी जाती है. हाल ही में मार्च में प्रकाशित एक साइंटिफिक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यह चीन की सबसे गहरी झील है. इसकी अधिकतम गहराई करीब 1,224 फीट दर्ज की गई है, जबकि इसका टोटल एरिया लगभग 9.2 वर्ग किलोमीटर है.
इस झील की सबसे खास बात इसका प्राकृतिक नजारा है. चारों ओर फैली 16 पहाड़ियां इसे एक प्राकृतिक कटोरे जैसा रूप देती हैं. साल के अलग-अलग मौसमों में इसका रंग और आसपास का सीन बदलता रहता है. सर्दियों में यह इलाका बर्फ की सफेद चादर से ढक जाता है, जबकि गर्मियों में यहां हरियाली और साफ नीला पानी देखने वालों का मन मोह लेता है. हेवन लेक जिस जगह पर बनी है, वह एक काल्डेरा है. काल्डेरा उस बड़े गड्ढे को कहा जाता है जो किसी ज्वालामुखी के भीषण विस्फोट के बाद बनता है. माना जाता है कि माउंट चांगबाईशान में सबसे विनाशकारी विस्फोट वर्ष 946 ईस्वी में हुआ था. इस घटना को “मिलेनियम इरप्शन” के नाम से जाना जाता है और इसे आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ज्वालामुखीय विस्फोटों में गिना जाता है. इस विस्फोट ने पूरे इलाके की geographical बनावट बदल दी थी.
प्राकृतिक बनावट सिर्फ नहीं है कारण
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भी पहले, करीब 70 हजार से 40 हजार साल पहले हुए एक प्राचीन विस्फोट के बाद इस पर्वत की चोटी पर पानी जमा होना शुरू हुआ था. धीरे-धीरे यहां एक विशाल झील का निर्माण हुआ. समय के साथ कई बार इसका जलस्तर घटा और बढ़ा. बारिश, बर्फ के पिघलने और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं ने इस झील को लगातार नया रूप दिया. इस क्षेत्र के नीचे आज भी एक एक्टिव जियोथर्मल सिस्टम मौजूद है. यानी धरती के भीतर गर्मी और दबाव लगातार काम कर रहे हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार, फॉल्ट लाइनों के जरिए भूमिगत पानी ऊपर की ओर आता रहता है, जिससे झील के जलस्तर पर भी असर पड़ता है. यही वजह है कि यह इलाका भूवैज्ञानिकों के लिए शोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है.
हेवन लेक सिर्फ अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी रहस्यमयी कहानियों के कारण भी चर्चा में रहती है. साल 2000 के शुरुआती वर्षों में इस झील को लेकर कई चौंकाने वाले दावे सामने आए थे. कई लोगों ने दावा किया कि उन्होंने झील के भीतर एक विशाल और अजीब जीव देखा है. कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि उस जीव का सिर घोड़े जैसा दिखाई देता था और उसका शरीर पानी में तेजी से तैरता था. इन दावों ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा और झील को रहस्यमयी जगहों की सूची में शामिल कर दिया.
हालांकि वैज्ञानिक इन दावों से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इतनी ऊंचाई पर स्थित और बेहद ठंडे पानी वाली झील में किसी बड़े जीव का लंबे समय तक जीवित रह पाना लगभग असंभव है. अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो इन रहस्यमयी जीवों की मौजूदगी की पुष्टि करता हो. इसलिए ज्यादातर विशेषज्ञ इन्हें लोककथाओं या लोगों की कल्पना का हिस्सा मानते हैं. यूनेस्को का कहना है कि माउंट चांगबाईशान दुनिया के सबसे अच्छी तरह सुरक्षित स्ट्रैटोवोल्केनो में से एक है. यहां ज्वालामुखी के विकास और उसके अलग-अलग विस्फोटों के स्पष्ट प्रमाण आज भी मौजूद हैं. इसी वजह से इसे कई बार “ओपन एयर क्लासरूम” भी कहा जाता है. यहां आने वाले वैज्ञानिक धरती के इतिहास और ज्वालामुखीय गतिविधियों को समझने के लिए लगातार स्टडी करते रहते हैं.
इस पर्वत का महत्व सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं है. उत्तर कोरिया में इसे माउंट पेक्टू कहा जाता है, जिसका अर्थ है “सफेद चोटी वाला पहाड़”. वहीं चीन में इसे चांगबाईशान कहा जाता है, जिसका मतलब है “हमेशा सफेद रहने वाला पहाड़”. दोनों देशों की संस्कृति और इतिहास में इस पर्वत का खास स्थान है. यही वजह है कि अतीत में इस इलाके को लेकर चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच कई बार मतभेद भी सामने आए.
Amazing Facts: इंसानों ने समय के साथ ऐसी कई विशाल और अत्याधुनिक चीजें बनाई हैं, जिनकी कीमत सुनकर किसी को भी हैरानी हो सकती है। इनमें से एक है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS), जिसे अंतरिक्ष में इंसानों की सबसे बड़ी और महंगी परियोजनाओं में गिना जाता है।
इसे कई देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर तैयार किया था। पृथ्वी की कक्षा में स्थापित यह स्टेशन कई वर्षों तक अंतरिक्ष में वैज्ञानिक शोध और प्रयोगों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
कितना महंगा है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को तैयार करने में अमेरिका की NASA के साथ रूस, यूरोप, जापान और कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसियों का भी योगदान रहा। अलग-अलग रिपोर्टों में इसकी कुल लागत का अनुमान अलग-अलग बताया गया है, लेकिन इसे आमतौर पर करीब 150 अरब डॉलर की लागत वाली इंसानों की सबसे महंगी परियोजनाओं में शामिल किया जाता है।
इस विशाल स्टेशन को एक साथ अंतरिक्ष में नहीं भेजा गया था। इसके अलग-अलग हिस्सों को कई मिशनों के जरिए पृथ्वी से अंतरिक्ष तक पहुंचाया गया और फिर कक्षा में जोड़कर ISS का निर्माण किया गया।
अंतरिक्ष में बना था इंसानों का घर
ISS पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित एक तरह की अंतरिक्ष प्रयोगशाला और रहने की जगह थी। यहां अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक रहकर अलग-अलग वैज्ञानिक प्रयोग करते रहे।
माइक्रोग्रैविटी यानी बेहद कम गुरुत्वाकर्षण वाले वातावरण में किए गए प्रयोगों से विज्ञान, चिकित्सा, जीव विज्ञान और अंतरिक्ष तकनीक से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल करने में मदद मिली।
क्या अब ISS पृथ्वी पर नहीं है?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अभी भी अंतरिक्ष में मौजूद है, इसलिए इसे “आज पृथ्वी पर मौजूद नहीं है” कहना थोड़ा भ्रामक है। यह पृथ्वी की कक्षा में घूम रहा है और पृथ्वी की सतह पर मौजूद नहीं है।
ISS को भविष्य में रिटायर करने और नियंत्रित तरीके से कक्षा से हटाने की योजना बनाई गई है। इसके बाद इसका बड़ा हिस्सा पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय नष्ट हो जाएगा, जबकि बचा हुआ मलबा समुद्र के एक निर्धारित क्षेत्र में गिराने की योजना है।
क्यों खास है ISS?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन केवल एक अंतरिक्ष स्टेशन नहीं है, बल्कि कई देशों के सहयोग का बड़ा उदाहरण भी है। अलग-अलग देशों के वैज्ञानिक और अंतरिक्ष यात्री यहां मिलकर शोध करते रहे हैं।
इसकी विशाल लागत, जटिल निर्माण प्रक्रिया और अंतरिक्ष में लंबे समय तक संचालन की वजह से ISS को मानव इतिहास की सबसे महंगी और महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक परियोजनाओं में गिना जाता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी उपलब्ध वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की लागत के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग हो सकते हैं।
Skin Care Tips: सोशल मीडिया पर इन दिनों Colgate और Eno को मिलाकर चेहरे पर लगाने का एक अजीबोगरीब ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस मिश्रण से चेहरे की डलनेस, पिंपल्स और ब्लैकहेड्स कम हो जाते हैं और स्किन पर तुरंत ग्लो आने लगता है। कुछ पोस्ट में इसे चेहरे के पोर्स को छोटा या बंद करने वाला नुस्खा भी बताया जा रहा है।
लेकिन सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की त्वचा में तुरंत बदलाव दिखाई देना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह तरीका सुरक्षित या असरदार है। चेहरे की त्वचा पर किसी भी घरेलू या वायरल नुस्खे को आजमाने से पहले उसके संभावित नुकसान को समझना जरूरी है।
Colgate दांतों के लिए है, चेहरे के लिए नहीं
टूथपेस्ट का इस्तेमाल दांतों की सफाई और ओरल हाइजीन के लिए किया जाता है। इसमें ऐसे पदार्थ हो सकते हैं जो दांतों से प्लाक और दाग हटाने में मदद करते हैं। इनमें एब्रेसिव, डिटर्जेंट और फ्लेवरिंग एजेंट जैसे तत्व शामिल हो सकते हैं।
यही वजह है कि टूथपेस्ट को चेहरे की त्वचा के लिए तैयार नहीं किया जाता। इसे चेहरे पर लगाने से कुछ लोगों को जलन, लालिमा, खुजली या त्वचा में इरिटेशन की समस्या हो सकती है।
टूथपेस्ट लगाने के बाद चेहरा कुछ समय के लिए साफ या चमकदार नजर आ सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि टूथपेस्ट स्किन के लिए फायदेमंद है।
Eno भी स्किन केयर प्रोडक्ट नहीं है
Eno का इस्तेमाल आमतौर पर एसिडिटी, सीने में जलन और अपच जैसी समस्याओं में राहत के लिए किया जाता है। इसमें सोडियम बाइकार्बोनेट जैसे तत्व होते हैं, जो पेट के अतिरिक्त एसिड को न्यूट्रलाइज करने में मदद करते हैं।
लेकिन पेट की एसिडिटी के लिए बनाया गया प्रोडक्ट चेहरे पर लगाने के लिए नहीं होता। इसे त्वचा पर इस्तेमाल करने से स्किन में जलन या रूखापन जैसी परेशानी हो सकती है। इसके अलावा त्वचा का प्राकृतिक pH बैलेंस भी प्रभावित हो सकता है।
क्या Colgate और Eno से Open Pores हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे?
चेहरे के पोर्स त्वचा की सामान्य संरचना का हिस्सा हैं। उन्हें हमेशा के लिए पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। पोर्स ज्यादा दिखाई देने के पीछे जेनेटिक्स, उम्र, त्वचा में अधिक तेल का उत्पादन, धूप से होने वाला नुकसान और स्किन केयर रूटीन जैसे कई कारण हो सकते हैं।
ऑयली स्किन वाले लोगों में पोर्स अक्सर अधिक नजर आ सकते हैं। सही स्किन केयर रूटीन से उनकी appearance को कम किया जा सकता है, लेकिन किसी घरेलू नुस्खे से उन्हें हमेशा के लिए गायब करना संभव नहीं है।
वायरल पोस्ट देखकर चेहरे पर न करें ऐसे एक्सपेरिमेंट
सोशल मीडिया पर वायरल किसी पोस्ट को देखकर सीधे अपने चेहरे पर प्रयोग करना नुकसानदायक हो सकता है। Colgate और Eno को मिलाकर लगाने से पोर्स बंद होते हैं या चेहरे पर लंबे समय तक ग्लो आता है, इसका कोई भरोसेमंद वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
उल्टा, ऐसे प्रयोग से कुछ लोगों की त्वचा पर लालिमा, जलन, खुजली, रूखापन या संवेदनशीलता बढ़ सकती है। खासकर संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को ऐसे वायरल नुस्खों से बचना चाहिए।
चेहरे की समस्या के लिए अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार बनाए गए स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना बेहतर है। अगर पिंपल्स, ब्लैकहेड्स, जलन या अन्य त्वचा संबंधी समस्या लगातार बनी हुई है, तो त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। त्वचा पर किसी भी नए प्रोडक्ट या घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है। किसी वायरल पोस्ट में दिखने वाला परिणाम हर व्यक्ति की त्वचा पर समान नहीं हो सकता।