Blog

  • दालचीनी खरीदते समय न करें सिर्फ रंग पर भरोसा, इन चीजों को देखकर तुरंत पहचानें असली मसाला

    दालचीनी खरीदते समय न करें सिर्फ रंग पर भरोसा, इन चीजों को देखकर तुरंत पहचानें असली मसाला

    दालचीनी खरीदते समय न करें सिर्फ रंग पर भरोसा, इन चीजों को देखकर तुरंत पहचानें असली मसाला

    बाजार में दालचीनी जैसी दिखने वाली कैसिया भी बिकती है, जिसे पहली नजर में पहचानना आसान नहीं होता. दोनों का रंग और आकार काफी मिलता-जुलता है, खासकर जब मसाला पाउडर के रूप में हो.

    रसोई में रखी दालचीनी को देखकर क्या आप पक्के तौर पर कह सकते हैं कि यह असली दालचीनी ही है? अगर आपका जवाब हां है, तो जरा रुकिए. बाजार में दालचीनी जैसी दिखने वाली कैसिया भी बिकती है, जिसे पहली नजर में पहचानना आसान नहीं होता. दोनों का रंग और आकार काफी मिलता-जुलता है, खासकर जब मसाला पाउडर के रूप में हो. हालांकि, साबुत दालचीनी खरीदते समय उसकी मोटाई, परतों, बनावट और खुशबू पर ध्यान देकर आप काफी हद तक दोनों में फर्क कर सकते हैं.

    अगली बार बाजार से दालचीनी खरीदने जाएं, तो इन आसान तरीकों को जरूर याद रखें.मोटाई से करें पहचान असली दालचीनी की छाल आमतौर पर काफी पतली और नाजुक होती है. इसमें छाल की कई पतली परतें एक-दूसरे के ऊपर लिपटी हुई दिखाई देती हैं. वहीं कैसिया की छाल मोटी और सख्त होती है. अगर कोई स्टिक बहुत मोटी, भारी और कड़ी महसूस हो रही है, तो उसे खरीदने से पहले ध्यान से देखें.परतों पर दें ध्यान दालचीनी और कैसिया में अंतर पता करने का एक आसान तरीका इसकी परतें देखना है. असली दालचीनी में कई पतली परतें होती हैं, जो स्टिक को करीब से देखने पर साफ नजर आ सकती हैं.

    दूसरी तरफ कैसिया में आमतौर पर एक मोटी छाल को रोल करके स्टिक का आकार दिया जाता है. इसलिए ज्यादा बारीक परतें दिखाई दें तो वह दालचीनी होने की संभावना ज्यादा है.छाल की बनावट भी बताएगी फर्क कैसिया की छाल आमतौर पर ज्यादा खुरदरी, मोटी और सख्त होती है. वहीं दालचीनी पतली और नाजुक होती है. इसलिए खरीदते समय सिर्फ उसका भूरा रंग देखकर फैसला न करें. स्टिक को देखकर उसकी मोटाई और बनावट पर भी ध्यान दें.खुशबू से भी मिल सकता है संकेत अच्छी दालचीनी में मीठी, गर्म और मसालेदार खुशबू होती है.

    अगर खुशबू बेहद हल्की है या दालचीनी जैसी खास सुगंध महसूस नहीं हो रही, तो थोड़ा सावधान रहें. हालांकि, सिर्फ खुशबू के आधार पर दालचीनी और कैसिया की पक्की पहचान नहीं की जा सकती.पाउडर की जगह साबुत दालचीनी खरीदें अगर आप दालचीनी की गुणवत्ता खुद जांचना चाहते हैं, तो पाउडर की बजाय साबुत स्टिक खरीदना बेहतर है. पाउडर में यह पता लगाना मुश्किल होता है कि उसमें सिर्फ दालचीनी है, कैसिया है या दोनों का मिश्रण. पैकेट खरीदते समय लेबल, इंग्रीडिएंट्स और प्रोडक्ट की जानकारी जरूर पढ़ें. केवल सस्ता देखकर मसाला खरीदने से बचें.’

  • जब सम्राट विक्रमादित्य नहीं ले जा सके प्रतिमा तो जमीन से प्रकट हुए गणेश, जानें 2000 साल पुराने मंदिर की कथा..

    जब सम्राट विक्रमादित्य नहीं ले जा सके प्रतिमा तो जमीन से प्रकट हुए गणेश, जानें 2000 साल पुराने मंदिर की कथा..

    जब सम्राट विक्रमादित्य नहीं ले जा सके प्रतिमा तो जमीन से प्रकट हुए गणेश, जानें 2000 साल पुराने मंदिर की कथा..

    मध्य प्रदेश के सीहोर में स्थित प्राचीन चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर अपनी पुरानी परंपराओं और भक्तों की गहरी आस्था के लिए जाना जाता है. मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास करीब दो हजार वर्ष पुराना है. गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां देशभर से श्रद्धालु भगवान गणेश के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर की सबसे खास बात यहां विराजित गणेश प्रतिमा है, जिसका आधा हिस्सा आज भी जमीन के अंदर है.

    सीवन नदी से कमल पुष्प के रूप में प्रकट हुए गणेश मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल पुष्प के रूप में प्रकट हुए भगवान गणेश को रथ में लेकर जा रहे थे. रास्ते में सुबह होने पर उनका रथ इसी स्थान पर जमीन में धंस गया. रथ में रखा कमल पुष्प धीरे-धीरे गणेश प्रतिमा में बदलने लगा और प्रतिमा भी जमीन के अंदर धंसती चली गई. इसके बाद इसी जगह पर मंदिर का निर्माण कराया गया. आज भी गणेश जी की प्रतिमा का आधा हिस्सा जमीन में धंसा हुआ है और भक्त इसी स्वरूप के दर्शन करते हैं.

    गणेश चतुर्थी पर लगता है 10 दिन का मेला चिंतामन गणेश मंदिर में हर साल गणेश चतुर्थी के दौरान दस दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. इस दौरान प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान गणेश के दर्शन करते हैं. दूर-दराज से आने वाले भक्त बप्पा के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं. गणेशोत्सव के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना भी होती है.

    मन्नत मांगने के लिए बनाते हैं उल्टा स्वास्तिक इस मंदिर से जुड़ी एक खास परंपरा भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध है. मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं. मन्नत पूरी होने के बाद वे दोबारा मंदिर पहुंचकर सीधा स्वास्तिक बनाकर भगवान गणेश के प्रति आभार जताते हैं. इसी वजह से मंदिर की दीवारों पर बड़ी संख्या में स्वास्तिक के निशान दिखाई देते हैं.

    रोज बदलता है बप्पा का श्रृंगार गणेशोत्सव के दिनों में यहां भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है. भक्तों के लिए हर दिन बप्पा का नया श्रृंगार और नया रूप देखने को मिलता है. इसी खास श्रृंगार के दर्शन के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. मंदिर के पुजारी पंडित दुबे के अनुसार, सच्चे मन से भगवान गणेश से मांगी गई मन्नत पूरी होने की भक्तों में मान्यता है.

    देश में चार स्थानों पर चिंतामन सिद्ध गणेश पंडित जे. दुबे के अनुसार, देशभर में चिंतामन सिद्ध गणेश की चार स्वयंभू प्रतिमाएं मानी जाती हैं. इनमें राजस्थान के रणथंभौर, मध्य प्रदेश के उज्जैन, गुजरात के सिद्धपुर और मध्य प्रदेश के सीहोर का चिंतामन गणेश मंदिर शामिल है. सीहोर के इस मंदिर में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि गणेश चतुर्थी के दौरान यहां भक्तों की संख्या और भी बढ़ जाती है.

  • सर्दी के मौसम में सेहत के लिए लाभकारी होते हैं, मिलते हैं ये गजब के फायदे.

    सर्दी के मौसम में सेहत के लिए लाभकारी होते हैं, मिलते हैं ये गजब के फायदे.

    सर्दी के मौसम में सेहत के लिए लाभकारी होते हैं, मिलते हैं ये गजब के फायदे.

    इंटरनेट डेस्क। तिल सर्दी के मौसम में हमारी सेहत के लिए बहुत ही लाभकारी होते हैं। इनका इस मौसम में कई प्रकार से सेवन कर सकते हैं। इनमें कई प्रकार के पोषक तत्व मिलते हैं। आज हम आपको तिल का सेवन करने से सेहत को मिलने वाले फायदों के बारे में जानकारी देेने जा रहे हैं।

    सर्दियों में तिल शरीर को गर्माहट देने के साथ पौष्टिकता भी देते हैं। तिल में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मिलता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में उपयोगी। तिल में आयरन, पोटेशियम, प्रोटीन, फाइबर और जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं। तिल रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में बहुत ही उपयोगी है।

    तिल का सेवन करने से ब्रेन हेल्थ में सुधार होने के साथ ही पाचन शक्ति भी सुधार होता है। आपको आज ही अपनी डाइट में तिल को शामिल कर देना चाहिए। तिल त्वचा के लिए भी बहुत ही उपयोगी होते हैं।

  • मैथ्स के डर ने बनाया जीनियस! जानिए कैसे सबसे कम उम्र का प्रोग्रामर बना 8 साल का यह बच्चा..

    मैथ्स के डर ने बनाया जीनियस! जानिए कैसे सबसे कम उम्र का प्रोग्रामर बना 8 साल का यह बच्चा..

    मैथ्स के डर ने बनाया जीनियस! जानिए कैसे सबसे कम उम्र का प्रोग्रामर बना 8 साल का यह बच्चा..

    क्या आपने कभी सोचा है कि जिस उम्र में बच्चे कार्टून देखने या पार्क में खेलने की जिद करते हैं, उस उम्र में कोई बच्चा कोडिंग सीखकर दुनिया का सबसे कम उम्र का प्रोफेशनल प्रोग्रामर बन जाए? जी हां, ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में रहने वाले 8 साल के नोआ विलियम्स (Noah Williams) ने कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है. उनकी यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जहां एक छोटी सी परेशानी ने एक बच्चे को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Records) तक पहुंचा दिया.

    होमवर्क से बचने के लिए सीखी C++ जैसी खतरनाक कोडिंग

    कहानी शुरू होती है जब नोआ सिर्फ 6 साल के थे. बाकी बच्चों की तरह नोआ को भी मैथ्स के लंबे-लंबे कैलकुलेशन और होमवर्क से चिढ़ थी. उन्हें मैथ्स के पैटर्न समझने में दिक्कत होती थी. लेकिन नोआ ने हार मानने के बजाय एक गजब का जुगाड़ निकाला. उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा प्रोग्राम बनाया जाए जो उनका सारा मैथ्स का होमवर्क झटपट सॉल्व कर दे.

    इस सोच के साथ उन्होंने दुनिया की सबसे टफ प्रोग्रामिंग लैंग्वेजों में से एक C++ को सीखना शुरू कर दिया. बड़े-बड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियर जिस लैंग्वेज को सीखने में पसीना बहाते हैं, उसे इस नन्हे बच्चे ने खेल-खेल में सीख लिया.

    सिर्फ 7 साल की उम्र में Mensa IQ टेस्ट में गाड़े झंडे

    गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, नोआ का दिमाग आम बच्चों से अलग और बेहद तेज है. जब वे महज 7 साल के थे, तब उन्होंने दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली IQ सोसाइटी मेंसा (Mensa) का टेस्ट दिया. नोआ ने इस टेस्ट में 99.9th परसेंटाइल स्कोर करके सबको हैरान कर दिया. उनकी इस जीनियस प्रतिभा ने यह साबित कर दिया था कि वह आने वाले समय में टेक वर्ल्ड में बड़ा धमाका करने वाले हैं.

    गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

    कोडिंग के बाद अब रोबोटिक्स और ड्रोन्स पर कब्जा!

    नोआ सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन तक ही सीमित नहीं रहे. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, अब वे रोबोटिक्स और ड्रोन्स की दुनिया में भी नए-नए कारनामे कर रहे हैं. वर्चुअल कोडिंग से निकलकर वे फिजिकल वर्ल्ड की टेक्नोलॉजी को भी तेजी से सीख रहे हैं

  • एक ही शरीर पर Tattoo की 40 लेयर! 90% बॉडी पर बनी स्याही की परतें, इस शख्स के नाम Guinness World Record.

    एक ही शरीर पर Tattoo की 40 लेयर! 90% बॉडी पर बनी स्याही की परतें, इस शख्स के नाम Guinness World Record.

    एक ही शरीर पर Tattoo की 40 लेयर! 90% बॉडी पर बनी स्याही की परतें, इस शख्स के नाम Guinness World Record.

    टैटू बनवाना आज के दौर में युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। लोग अपनी पसंद के डिजाइन, नाम या किसी खास याद को शरीर पर टैटू के रूप में बनवाते हैं। लेकिन कनाडा के जेरेमी ‘रेमी’ स्कोफील्ड का टैटू के प्रति जुनून सामान्य शौक से कहीं आगे निकल चुका है। उनके शरीर का ज्यादातर हिस्सा टैटू से ढका हुआ है और इसी वजह से उनका नाम Guinness World Records में दर्ज हो चुका है।

    शरीर पर टैटू की करीब 40 परतें

    जेरेमी सोशल मीडिया पर ‘@Ephemeral Remy’ के नाम से जाने जाते हैं। Guinness World Records ने उन्हें ‘Most Tattooed Person Living (Multiple Layers) – Male’ रिकॉर्ड से सम्मानित किया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, उनके शरीर की करीब 90 फीसदी त्वचा टैटू से ढकी हुई है। खास बात यह है कि उनके शरीर के कई हिस्सों पर एक टैटू के ऊपर दोबारा और फिर उसके ऊपर भी टैटू बनवाया गया है। कुछ जगहों पर स्याही की करीब 40 परतें तक बताई जाती हैं। वहीं, शरीर के कुछ हिस्सों पर 100 से ज्यादा बार टैटू किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

    बेटे के नाम से शुरू हुआ था सफर

    रेमी ने कभी नहीं सोचा था कि टैटू बनवाने का उनका शौक एक दिन उन्हें वर्ल्ड रिकॉर्ड तक पहुंचा देगा। उनके टैटू सफर की शुरुआत साल 2005 में हुई थी। उस समय उन्होंने अपने बाएं हाथ के अंदरूनी हिस्से पर अपने बेटे का नाम टैटू के रूप में बनवाया था।

    इसके बाद धीरे-धीरे उनका यह शौक बढ़ता गया। उन्होंने शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर टैटू बनवाने शुरू किए और समय के साथ यह उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया।

    1000 घंटे से ज्यादा टैटू चेयर पर बैठे

    रेमी पहले शेफ के तौर पर काम कर चुके हैं। अब वह टैटू शॉप्स और सोशल मीडिया से जुड़े काम संभालते हैं। वह बॉडी मॉडिफिकेशन के भी शौकीन हैं और उनके शरीर पर 100 से ज्यादा पियर्सिंग होने की बात कही जाती है।

    टैटू बनवाने के इस लंबे सफर में रेमी ने 1000 घंटे से ज्यादा समय टैटू चेयर पर बिताया है। उनके शरीर पर अलग-अलग टैटू बनाने में 40 से ज्यादा कलाकारों ने भी योगदान दिया है।

    रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं बनवाए थे टैटू

    रेमी के मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के इरादे से टैटू बनवाना शुरू नहीं किया था। उनके मुताबिक, उन्हें टैटू और बॉडी आर्ट का शौक था और वह इसी जुनून के चलते लगातार आगे बढ़ते गए।

    बाद में जब लोगों ने उनके टैटू की संख्या और शरीर पर बनी कई परतों के बारे में सवाल करना शुरू किया, तब उन्हें पता चला कि उनका नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए दर्ज किया जा सकता है। अब उनका नाम Guinness World Records में शामिल है।

     

     

     

  • भारत से 4,483 किलोमीटर दूर, यहां है ओडिशा में मिले बेबी Orangutans का घर, वाइल्डलाइफ टूरिज्म के शौकीन करें विजिट

    भारत से 4,483 किलोमीटर दूर, यहां है ओडिशा में मिले बेबी Orangutans का घर, वाइल्डलाइफ टूरिज्म के शौकीन करें विजिट

    ओडिशा में पांच बेबी ओरंगुटान मिलने की खबर ने सबका ध्यान खींचा है, लेकिन इनका असली घर भारत से हजारों किलोमीटर दूर है। अगर कभी इंडोनेशिया जाएं, तो सुमात्रा और बोर्नियो में ओरंगुटान देखने का अनुभव जरूर लें।

    Orangutan, Wildlife Tourism: ओडिशा के बालासोर में जंगल के बीच पांच नन्हे ओरंगुटान मिलने की खबर ने हर किसी को चौंका दिया। आखिर ये जानवर भारत के जंगलों में तो मिलते नहीं हैं! ओरंगुटान का असली घर दक्षिण-पूर्व एशिया के घने रेन फॉरेस्ट हैं, खासकर इंडोनेशिया के सुमात्रा और बोर्नियो द्वीप। इसलिए बालासोर की यह घटना एक दिलचस्प ट्रैवल कनेक्शन भी सामने लाती है।

    अगर कभी आपकी विदेश यात्रा की सूची में इंडोनेशिया शामिल हो, तो सिर्फ समुद्र तट, द्वीप और खूबसूरत झरनों तक खुद को सीमित मत रखिए। यहां जंगल के बीच इन लाल-भूरे बालों वाले जानवरों को उनके प्राकृतिक माहौल में देखने का अलग ही रोमांच है। सुमात्रा में आप जंगल ट्रेक के दौरान ओरंगुटान की तलाश कर सकते हैं, जबकि बोर्नियो में नदी की नाव से जंगल घूमते हुए इन्हें देखने का मौका मिलता है। यानी जिस जानवर ने ओडिशा में अचानक सबको हैरान कर दिया, उसे देखने के लिए आप उसके असली घर तक पहुंच सकते हैं।

    ओरंगुटान का असली घर कहां है?

    ओरंगुटान दुनिया में बहुत सीमित जगहों पर पाए जाते हैं। इनके प्राकृतिक घर सुमात्रा और बोर्नियो के रेन फॉरेस्ट हैं। सुमात्रा इंडोनेशिया का हिस्सा है, जबकि बोर्नियो द्वीप इंडोनेशिया, मलेशिया और ब्रुनेई में बंटा हुआ है।

    यही वजह है कि बालासोर में इनका मिलना सामान्य वन्यजीव घटना नहीं है। हाल की रिपोर्टों में ओडिशा में मिले पांच बेबी ओरंगुटान को लेकर वन्यजीव तस्करी की आशंका की जांच की जा रही है। लेकिन अगर आपका सवाल है कि ओरंगुटान को देखने के लिए घूमने कहां जाएं, तो कहानी यहीं से दिलचस्प होती है।

    सुमात्रा का Bukit Lawang है जंगल प्रेमियों की पसंद

    इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर स्थित Bukit Lawang ओरंगुटान देखने के लिए मशहूर जगह है। यह मेडन शहर से करीब 90 किलोमीटर दूर है और Gunung Leuser National Park के किनारे स्थित है।

    यहां का अनुभव किसी सामान्य चिड़ियाघर जैसा नहीं है। जंगल की पगडंडियों पर ट्रेक करते हुए पेड़ों के बीच नजर दौड़ानी पड़ती है। अचानक ऊपर किसी डाल पर हलचल दिखे और लाल-भूरे बालों वाला ओरंगुटान नजर आ जाए, तो समझिए पूरी ट्रिप का सबसे खास पल मिल गया। Bukit Lawang में ओरंगुटान के साथ-साथ सुमात्रा के दूसरे वन्यजीव और घने रेन फॉरेस्ट भी इस यात्रा को खास बनाते हैं।

    Tanjung Puting में नाव से जंगल की सैर

    अगर आपको पैदल जंगल ट्रेक से ज्यादा नदी की यात्रा पसंद है, तो Tanjung Puting National Park आपके लिए ज्यादा दिलचस्प हो सकता है। इंडोनेशिया के बोर्नियो वाले हिस्से में स्थित यह राष्ट्रीय उद्यान ओरंगुटान के लिए प्रसिद्ध है। यहां जंगल के बीच नाव से सफर करना खुद में एक अनुभव है। पानी के दोनों तरफ घना जंगल और पेड़ों के बीच वन्यजीवों की तलाश—यही इस ट्रिप का मजा है।

    सुमात्रा और बोर्नियो की खासियत सिर्फ ओरंगुटान नहीं है। ये दोनों द्वीप दुनिया के बेहद समृद्ध वर्षावन क्षेत्रों में गिने जाते हैं। सुमात्रा में एक ही क्षेत्र में ओरंगुटान के साथ बाघ, हाथी और गैंडे जैसे दुर्लभ जानवरों का प्राकृतिक आवास भी मिलता है।

  • डायबिटीज मरीज सुबह खाली पेट भीगे बादाम खाएं तो शरीर में क्या होता है? डायबिटीज एजुकेटर से जानिए.

    डायबिटीज मरीज सुबह खाली पेट भीगे बादाम खाएं तो शरीर में क्या होता है? डायबिटीज एजुकेटर से जानिए.

    डायबिटीज मरीज सुबह खाली पेट भीगे बादाम खाएं तो शरीर में क्या होता है? डायबिटीज एजुकेटर से जानिए.

    डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए दवा के साथ-साथ सही खानपान भी अहम भूमिका निभाता है। अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि क्या सुबह खाली पेट भीगे बादाम खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद मिलती है? कई लोग मानते हैं कि भीगे बादाम खाने से शरीर को ज्यादा पोषक तत्व मिलते हैं और डायबिटीज पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ता है।

    इसी विषय पर हमने कंसल्टेंट डाइटिशियन और डायबिटीज एजुकेटर कनिका मल्होत्रा से बात की। उनका कहना है कि प्री-डायबिटीज या टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित लोगों में रोजाना भीगे या कच्चे बादाम खाने से, चाहे उन्हें खाली पेट ही क्यों न खाया जाए, फास्टिंग ब्लड शुगर या HbA1c में कोई खास कमी नहीं देखी गई है। हालांकि, यदि बादाम को कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन के साथ या उससे पहले खाया जाए तो भोजन के बाद ब्लड शुगर के तेजी से बढ़ने (पोस्टप्रांडियल ग्लूकोज स्पाइक) को कम करने में मदद मिल सकती है।

    Also Read

    कनिका मल्होत्रा बताती हैं कि नाश्ते में बादाम खाने से सेकंड मील इफेक्ट देखने को मिल सकता है। यानी अगला भोजन करने के बाद ब्लड शुगर का स्तर अपेक्षाकृत कम रह सकता है और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है। हालांकि, लंबे समय से डायबिटीज से जूझ रहे लोगों में यह असर भी सीमित ही दिखता है।

    Also Read

    बादाम में मौजूद पोषक तत्व कैसे करते हैं मदद?

    बादाम को पोषक तत्वों का खजाना माना जाता है। इनमें हेल्दी फैट, प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, विटामिन ई और कई जरूरी मिनरल्स मौजूद होते हैं। मैग्नीशियम इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद करता है, फाइबर कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण की गति को धीमा करता है, जबकि हेल्दी फैट लंबे समय तक पेट भरा रखने और दिल की सेहत को दुरुस्त करने में असरदार होता है।  यही कारण है कि सीमित मात्रा में बादाम को संतुलित आहार का हिस्सा बनाने की सलाह दी जाती है।

    बादाम मैग्नीशियम, फाइबर और हेल्दी अनसैचुरेटेड फैट का अच्छा स्रोत हैं। ये सभी पोषक तत्व इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाने और ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। कनिका मल्होत्रा के अनुसार बादाम में मौजूद मैग्नीशियम शरीर की कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज के उपयोग में मदद करता है। इसकी कमी डायबिटीज को और गंभीर बना सकती है। वहीं फाइबर कार्बोहाइड्रेट के पाचन और अवशोषण की गति को धीमा करता है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता। बादाम में मौजूद मोनोअनसैचुरेटेड फैट लंबे समय तक पेट भरा रखने के साथ-साथ इंसुलिन सेंसिटिविटी और दिल की सेहत को बेहतर बनाने में मदद करता हैं।

    डायबिटीज मरीज़ों के लिए रोज़ाना भीगे हुए बादाम खाना सुरक्षित है?

    बादाम में कैलोरी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। एक्सपर्ट के मुताबिक रोजाना लगभग 30–40 ग्राम यानी 5 से 10 भीगे बादाम का सेवन पर्याप्त हैं। एक्सपर्ट ने बताया जरूरत से ज्यादा बादाम का सेवन करने से कुल कैलोरी सेवन बढ़ सकता है, जिससे वजन बढ़ने का खतरा हो सकता है। बादाम का सेवन संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर ही करें तो बेहतर है। एक्सपर्ट ने बताया शुगर कंट्रोल करने वाली दवाओं के साथ बादाम का सेवन करने पर किसी तरह का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। जिन लोगों को नट्स से एलर्जी है, उन्हें बादाम खाने से बचना चाहिए।

    एक्सपर्ट ने बताया हर किसी के लिए रोजाना बादाम का सेवन करना सुरक्षित है इससे डाइट की क्वालिटी में सुधार होता है। लेकिन ये मानना कि सिर्फ बादाम खाने से डायबिटीज कंट्रोल होती है, ये पूरी तरह गलत है। डायबिटीज को अगर आप कंट्रोल करना चाहते हैं तो आप रोजाना बैलेंस डाइट का सेवन करें, रेगुलर एक्सरसाइज करें, पर्याप्त 7-8 घंटों की नींद लें और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का सेवन करें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञ की राय पर आधारित है। किसी भी नई डाइट या स्वास्थ्य संबंधी दिनचर्या को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • आंखें बंद, हाथों में रंग और सामने गणपति… 30 सेकंड में तस्वीर बनाकर हैरान करते हैं काशी के विजय..

    आंखें बंद, हाथों में रंग और सामने गणपति… 30 सेकंड में तस्वीर बनाकर हैरान करते हैं काशी के विजय..

    आंखें बंद, हाथों में रंग और सामने गणपति… 30 सेकंड में तस्वीर बनाकर हैरान करते हैं काशी के विजय..

    भगवान शिव की नगरी काशी में भगवान गणेश की लगातार 35 वर्षों से साधना करने वाले मूर्तिकार विजय की चर्चा हो रही है. विजय आंखों में पट्टी बांधकर महज 30 – 40 सेकंड में गणपति की आकृति उकेर देते हैं. कई बार एक चित्र तैयार करने में उन्हें एक मिनट का समय लग जाता है. विजय इसे 20 – 25 सेकेंड के अंदर करना चाहते है.

    आंखों पर काली पट्टी बंधी है. सामने सफेद कैनवास रखा है और हाथों में रंग हैं. देखने वाले यही सोचते रह जाते हैं कि आखिर बिना देखे कोई तस्वीर कैसे बना सकता है. लेकिन कुछ ही सेकेंड में कैनवास पर भगवान गणेश की खूबसूरत आकृति उभर आती है. यह अनोखी कला है काशी के मूर्तिकार और चित्रकार विजय कुमार की. पिछले करीब 35 साल से कला की साधना कर रहे विजय आंखों पर पट्टी बांधकर महज 30 से 40 सेकेंड में गणपति की तस्वीर बना देते हैं. उनकी इस कला को देखने के लिए लोग खास तौर पर पहुंच रहे हैं. विजय कुमार के लिए यह सिर्फ चित्रकारी नहीं, बल्कि भगवान गणेश की साधना है. वह बताते हैं कि जब आंखों पर पट्टी बंधी होती है, तब उनका पूरा ध्यान अपने आराध्य गणपति पर रहता है.

    उनके मन में गणेश की तस्वीर इतनी स्पष्ट होती है कि हाथ अपने आप कैनवास पर आकृति बनाने लगते हैं. कई बार विजय को एक तस्वीर बनाने में करीब एक मिनट का समय लगता है, लेकिन अब उनका लक्ष्य इसे 20 से 25 सेकेंड में पूरा करना है. बचपन से ही भगवान गणेश की पूजा करने वाले विजय रोज अपनी दुकान पर पहुंचने के बाद सबसे पहले गणपति की साधना और चित्र बनाने का अभ्यास करते हैं.भतीजे की चुनौती ने दिखाई नई राह विजय कुमार का परिवार कई पीढ़ियों से मूर्ति निर्माण के काम से जुड़ा रहा है. बचपन से ही उन्हें पत्थरों को तराशने और चित्र बनाने का शौक था. करीब 35 साल पहले उन्होंने कला को अपनी साधना बना लिया. आंखों पर पट्टी बांधकर चित्र बनाने की शुरुआत भी एक दिलचस्प घटना से हुई. विजय के भतीजे ने एक दिन मजाक में उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर तस्वीर बनाने की चुनौती दी.

    विजय ने चुनौती स्वीकार की और धीरे-धीरे बिना देखे सही आकृति बनाने में माहिर हो गए. अब वह आंखें खोलकर और बंद करके, दोनों तरह से गणपति की तस्वीर बना लेते हैं.काशी के 56 विनायकों को भी कैनवास पर उतारा विजय कुमार की कला को देशभर में पहचान मिल चुकी है. उन्होंने काशी के प्रसिद्ध मंदिरों में चित्रकारी करने के साथ काशी के 56 विनायकों की तस्वीरें भी कैनवास पर उतारी हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लग चुकी हैं. कला के क्षेत्र में उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं और उन्हें ‘काशी रत्न’ सम्मान से भी नवाजा गया है.

    महाराष्ट्र के सिद्धिविनायक मंदिर में विजय ने 51 और 56 घंटे तक लगातार तस्वीर बनाने का रिकॉर्ड भी बनाया है. उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज होने की बात भी सामने आती है.बप्पा की इच्छा तक जारी रहेगी साधना विजय कहते हैं कि उन्होंने अपना जीवन कला को समर्पित कर दिया है. जब तक बप्पा की इच्छा होगी, उनकी यह साधना जारी रहेगी. वह तेजपत्ता, रुद्राक्ष जैसी छोटी-छोटी चीजों पर भी भगवान गणेश की आकृति उकेर चुके हैं. उनके लिए रंग और रेखाएं सिर्फ चित्रकारी के साधन नहीं, बल्कि गणपति के चरणों में अर्पित की जाने वाली कला-अंजलि हैं.

  • प्रमोशन सुनते ही लोग कहते हैं हां, इस महिला ने 3 बार ठुकराया ऑफर; वजह जान आप भी कहेंगे- बात तो सही है.!

    प्रमोशन सुनते ही लोग कहते हैं हां, इस महिला ने 3 बार ठुकराया ऑफर; वजह जान आप भी कहेंगे- बात तो सही है.!

    प्रमोशन सुनते ही लोग कहते हैं हां, इस महिला ने 3 बार ठुकराया ऑफर; वजह जान आप भी कहेंगे- बात तो सही है.!

    क्या आपने कभी सोचा है कि कोई कर्मचारी प्रमोशन ठुकरा सकता है? आमतौर पर कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ऊंची कुर्सी और बड़ा पद पाना ही हर किसी के करियर का अल्टीमेट गोल माना जाता है. लेकिन आज की जनरेशन इस पुरानी धारणा को पूरी तरह बदल रही है. चीन से लेकर पूरी दुनिया तक युवा अब यह सोचने लगे हैं कि क्या थोड़ी सी एक्स्ट्रा सैलरी और ढेरों जिम्मेदारियां सचमुच उस मानसिक तनाव के लायक हैं? सोशल मीडिया पर आजकल एक महिला की कहानी वायरल हो रही है, जिसने अपने 10 साल के करियर में एक या दो नहीं बल्कि पूरे 3 बार प्रमोशन ठुकरा दिया. आइए जानते हैं इसके पीछे की असली वजह.

    प्रमोशन क्यों ठुकराया जा रहा है?

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों लोग प्रमोशन को विनम्रता से अस्वीकार करने के तरीके शेयर कर रहे हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि नई जिम्मेदारियों के साथ मिलने वाला वेतन बहुत मामूली होता है, जबकि काम का बोझ और मानसिक दबाव कई गुना बढ़ जाता है.

    जून नाम की एक महिला कर्मचारी ने अपने 10 साल के करियर में तीन बार प्रमोशन को ना कहा. उसने बताया कि एक बार जब उसे अंतरिम टीम लीडर बनाया गया, तो सैलरी में केवल नाममात्र की बढ़ोतरी हुई, लेकिन जरा सी गलती पर गाज उसी पर गिरती थी. युवाओं का मानना है कि मिडिल मैनेजमेंट की नौकरी में इंसान ऊपर के अधिकारियों और नीचे के कर्मचारियों के बीच पिसकर रह जाता है.

    कॉन्शस अनबॉसिंग’…एक नया ग्लोबल ट्रेंड

    कंपनी कल्चर पर खड़े होते सवाल

    विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं का यह रुख कंपनियों के लिए चेतावनी है. अगर कॉर्पोरेट सेक्टर अपने कर्मचारियों को बेहतर इंसेंटिव, काम की आजादी और सही तरीके से उनके काम का सम्मान नहीं देगा, तो आने वाले समय में लीडरशिप के लिए लोग मि

  • लोहे की रेलिंग में फंसा गाय का सिर, CISF जवान ने सूझबूझ से बचाई जान

    लोहे की रेलिंग में फंसा गाय का सिर, CISF जवान ने सूझबूझ से बचाई जान

    सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में एक गाय मुसीबत में फंसी नजर आ रही है। गाय का सिर लोहे की रेलिंग के बीच अटक गया था और वह खुद को बाहर निकालने के लिए लगातार कोशिश कर रही थी। काफी प्रयास के बावजूद जब गाय बाहर नहीं निकल पाई, तो मौके पर मौजूद CISF जवान ने उसकी मदद करने का फैसला किया।

    बताया जा रहा है कि गाय ने किसी वजह से अपना सिर लोहे के गेट की सलाखों के बीच डाल दिया था। बाहर निकलने की कोशिश में उसका सिर वहीं फंस गया। परेशानी बढ़ने पर गाय घबराने लगी और बार-बार खुद को छुड़ाने का प्रयास करने लगी।

    CISF जवान ने स्थिति को समझते हुए बिना जल्दबाजी किए गाय को बाहर निकालने की कोशिश शुरू की। उसने गाय को जोर से खींचने के बजाय उसके सिर और सींगों को सावधानी से संभाला, ताकि उसे किसी तरह की चोट न पहुंचे।

    धैर्य और सूझबूझ से गाय को कराया आजाद

    पोस्ट में दिखाई दे रहा है कि जवान जमीन पर बैठकर बेहद सावधानी से गाय के सिर को सही दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह लगातार धैर्य बनाए रखता है और धीरे-धीरे गाय के सिर को सलाखों के बीच से बाहर निकाल देता है।

    कुछ देर की मेहनत के बाद गाय पूरी तरह आजाद हो जाती है और वहां से आगे बढ़ जाती है। जवान ने इस दौरान खास ध्यान रखा कि घबराई हुई गाय को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।

    CISF जवान की इस संवेदनशीलता की सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ हो रही है। लोगों का कहना है कि ड्यूटी निभाने के साथ-साथ बेजुबान जानवर की मदद करना इंसानियत और जिम्मेदारी की मिसाल है।

    इस घटना से यह भी सीख मिलती है कि मुसीबत में फंसे जानवर को बचाते समय जल्दबाजी के बजाय धैर्य और सावधानी से काम लेना चाहिए। CISF जवान की सूझबूझ से गाय सुरक्षित बाहर निकल सकी।