इच्छाशक्ति से कुछ​​​​​​​ भी पाना संभव, भगवान भी आकर देते हैं दर्शन

इच्छाशक्ति से कुछ​​​​​​​ भी पाना संभव, भगवान भी आकर देते हैं दर्शन
इच्छाशक्ति से कुछ​​​​​​​ भी पाना संभव, भगवान भी आकर देते हैं दर्शन

यदि हम किसी भी वस्तु में राजी न होकर भगवान को पुकारने लगें, तो वे तत्काल आ जाएंगे। भगवान के साथ हमारा संबंध स्वतंत्रता से और स्वाभाविक है।

बच्चा खेलना छोड़ दे और रोने लग जाए, तो मां को अपना सब काम छोड़कर उसके पास आना पड़ता है। उसे गोद में बैठाकर दुलारना पड़ता है, परंतु यदि बच्चा खेल में लगा रहे, तो मां निश्चिंत रहती है। इसी प्रकार यदि हम भगवान के लिए व्याकुल न होकर सांसारिक वस्तुओं में ही प्रसन्न रहते हैं, तो भगवान निश्चिंत रहते हैं और हमसे मिलने नहीं आते।

यदि बच्चा लगातार रोने लग जाए और मां के बिना किसी भी वस्तु से प्रसन्न न हो, तो घर के सभी लोग बच्चे के पक्ष में हो जाते हैं और उसकी मां को कहते हैं- ‘बच्चा रो रहा है और तुम काम में लगी हो! जल्दी बच्चे को गोद में ले लो।’ उस समय मां कितना ही आवश्यक कार्य क्यों न कर रही हो, बच्चे के रोने के आगे उस कार्य का कोई मूल्य नहीं रहता।

भगवान के आने में कोई देर नहीं लगती

इसी प्रकार हम एकमात्र भगवान के लिए रोने लग जाएं, तो भगवद् धाम के सब संतजन हमारे पक्ष में हो जाएं! वे सभी कहने लग जाएं- ‘भगवन! बच्चा रो रहा है; आप मिलने में देर क्यों कर रहे हैं?’ फिर भगवान के आने में कोई देर नहीं लगती। हां, जब बच्चा खिलौनों से खेल भी रहा हो और ऊपर से ऊं…. ऊं…. भी कर रहा हो, तब उसे मां गोद में नहीं लेती। इसी प्रकार हम सांसारिक खिलौनों से भी खेलते हों और रोने का ढोंग भी करते हों, तब भगवान नहीं आते। वे हमारे आंतरिक भाव को देखते हैं, क्रिया को नहीं। मान-आदर, सुख-आराम, धन-संपत्ति, सिद्धियां आदि सब सांसारिक खिलौने हैं। जैसे मां की गोद, उसका प्यार, खिलौने आदि सब कुछ बच्चे के लिए ही होते हैं, ऐसे ही भगवान की गोद, उनका प्यार तथा उनके पास जो भी सामग्री है, सब भक्त के लिए ही होती है।

यदि हम किसी भी वस्तु में राजी न होकर भगवान को पुकारने लगें, तो वे तत्काल आ जाएंगे। मां बच्चे की योग्यता को देखकर उसके पास नहीं आती। वह यह नहीं देखती कि बच्चा सुंदर है, विद्वान है या धनवान है। बच्चे में मां को बुलाने की यही एक योग्यता है कि वह केवल मां को चाहता है और मां के सिवाय दूसरी किसी भी वस्तु से राजी नहीं होता।

भगवान के साथ हमारा संबंध स्वतंत्रता से

भगवान के साथ हमारा संबंध स्वतंत्रता से और स्वाभाविक है। सांसारिक पदार्थों के साथ हमारा संबंध स्वाभाविक नहीं है। मन, बुद्धि, इंद्रियां, शरीर आदि सब पदार्थ निरंतर बहे जा रहे हैं। उनके साथ हमारा कोई संबंध नहीं है। भगवान ही हमारे हैं। बच्चे में कोई योग्यता, विद्वता, शूरवीरता आदि नहीं होती। उसमें केवल ‘मां मेरी है’- ऐसा मां में मेरापन होता है। इस मेरापन में बड़ी भारी शक्ति है, जो भगवान को भी खींच सकती है। इसी के कारण भक्तराज प्रह्लाद ने पत्थर से भी भगवान को निकाल लिया।

संसार का हमसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। शरीर, कुटुंब, धन-संपत्ति आदि सब पदार्थ पहले नहीं थे और बाद में भी नहीं रहेंगे। दृश्यमात्र निरंतर अदर्शन को प्राप्त हो रहा है। कोई पदार्थ साठ वर्ष तक रहनेवाला हो, तो एक वर्ष बीत जाने पर वह उन्सठ वर्ष का ही रहेगा; क्योंकि वह निरंतर नाश की ओर जा रहा है। हम नहीं रहनेवाले सांसारिक पदार्थों को अपना मानते हैं और सदा रहनेवाले परमात्मा को अपना नहीं मानते, यह बड़ी भारी भूल है।

भगवान वर्तमान में हैं और हमारे हैं- इस बात पर हम दृढ़तापूर्वक डट जाएं, तो भगवान वर्तमान में ही मिल जाएंगे। केवल उत्कट अभिलाषा होने की देर है, भगवान के मिलने में देर नहीं है। अपने भाव के अनुसार चाहे आज भगवान को प्राप्त कर लो, चाहे भविष्य में- वर्षों या जन्मों के बाद!

-स्वामी रामसुखदास

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