ऑरोरा लाइट्स : हरी से बैंगनी तक, आसमान में फैली ये रंग-बिरंगी रोशनी क्या है?

ऑरोरा लाइट्स : हरी से बैंगनी तक, आसमान में फैली ये रंग-बिरंगी रोशनी क्या है?
ऑरोरा लाइट्स : हरी से बैंगनी तक, आसमान में फैली ये रंग-बिरंगी रोशनी क्या है?

नई दिल्ली । रात के समय आसमान में हरा, बैंगनी, गुलाबी, लाल और नीले रंगों की रोशनी को देखकर मन में जिज्ञासा होना लाजमी है। इस कमाल के जादू को ऑरोरा लाइट्स कहते हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ऑरोरा लाइट्स के बारे में विस्तार से जानकारी देती है। ऑरोरा लाइट्स को उत्तरी इलाकों में नॉर्दर्न लाइट्स या ऑरोरा बोरेलिस और दक्षिणी इलाकों में सदर्न लाइट्स या ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस कहते हैं।

यह प्रकृति का सबसे खूबसूरत नजारा है, जो चार्ज्ड पार्टिकल्स से बनता है। वैज्ञानिक इसे स्पेस वातावरण का बेहतरीन उदाहरण मानते हैं। सूरज से लगातार चार्ज्ड कणों से प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन का एक प्रवाह निकलता है, जिसे सोलर विंड कहते हैं। जब यह सोलर विंड पृथ्वी के पास आती है, तो पृथ्वी का चुंबकीय ढाल यानी मैग्नेटोस्फीयर इससे टकरा जाता है। इस टक्कर से ऊर्जा जमा होती है। जब यह ऊर्जा अचानक निकलती है, तो कण वायुमंडल में घुस जाते हैं और ऑक्सीजन, नाइट्रोजन जैसी गैसों से टकराते हैं। इन टक्करों से गैसें एक्टिव हो जाती हैं और रंगीन रोशनी छोड़ती हैं, यही ऑरोरा है।


अब सवाल उठता है कि इनके रंग अलग-अलग क्यों होते हैं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी गैस टकराई और वह कितनी ऊंचाई पर थी। हरा रंग सबसे ज्यादा दिखता है, जो 100-200 किमी ऊंचाई पर ऑक्सीजन से बनता है। लाल रंग ज्यादा ऊंचाई यानी 200 किमी से अधिक पर ऑक्सीजन से आता है। वहीं, नीला और बैंगनी नाइट्रोजन गैस से बनते हैं, खासकर 100-200 किमी ऊंचाई पर। गुलाबी या लाल-बैंगनी तब दिखता है जब नाइट्रोजन कम ऊंचाई या 100 किमी से नीचे पर उत्तेजित होता है।


कभी-कभी ये रंग मिलकर सफेद, बैंगनी या गुलाबी चमक भी बनाते हैं, जिससे आसमान में रंगों का जादू साफ दिखता है। जब सूरज बहुत सक्रिय होता है, जैसे सोलर फ्लेयर या बड़े विस्फोट से तो जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म यानी चुंबकीय तूफान आते हैं। इन तूफानों में ज्यादा ऊर्जा वायुमंडल में गिरती है, जिससे बहुत दूर के इलाकों में भी शानदार ऑरोरा दिखाई देता है।


वैज्ञानिक ऑरोरा का अध्ययन जमीन पर लगे उपकरणों से करते हैं, जो मैग्नेटोमीटर चुंबकीय बदलाव मापते हैं, रडार ऊपरी वायुमंडल को देखते हैं और स्पेशल कैमरे रीयल-टाइम तस्वीरें लेते हैं। दुनिया भर की कई एजेंसियां मिलकर इसकी रिसर्च करती हैं।

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