
कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली डल झील इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है। जिस झील की खूबसूरती कभी बॉलीवुड फिल्मों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती थी, उसके कई हिस्सों में अब गंदगी, सीवेज और घनी खरपतवार दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर झील के पर्यावरण के साथ-साथ पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।
एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, श्रीनगर में हर दिन करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 73 फीसदी यानी करीब 147 मिलियन लीटर सीवेज का पर्याप्त उपचार नहीं हो पाता और यह डल झील या झेलम नदी जैसे जलस्रोतों तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि अब डल झील की सफाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समस्या सिर्फ झील की सतह साफ करने से दूर होगी या इसके लिए पूरी सीवेज व्यवस्था में बदलाव जरूरी है।
डल झील की हालत क्यों बिगड़ रही है?
डल झील और झेलम नदी श्रीनगर के लिए बेहद महत्वपूर्ण जलस्रोत हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों में बढ़ती आबादी, अतिक्रमण, निर्माण गतिविधियों, कचरे और सीवेज ने इन जलस्रोतों पर दबाव बढ़ाया है।
सबसे बड़ी चिंता बिना पर्याप्त उपचार के सीवेज के जलस्रोतों में पहुंचने को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, श्रीनगर में रोज पैदा होने वाले करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज में से लगभग 73 फीसदी का उपचार नहीं हो पाता। यानी हर दिन बड़ी मात्रा में गंदा पानी झील और नदी तक पहुंच रहा है।
इसके अलावा खराब ड्रेनेज व्यवस्था और पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट भी समस्या को बढ़ा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ स्थानों पर पानी के निकास के रास्तों में रुकावट के कारण झील का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है।
सिर्फ सीवेज ही जिम्मेदार नहीं
डल झील की समस्या केवल सीवेज तक सीमित नहीं है। स्थानीय निवासियों और एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, झील के आसपास बढ़ता निर्माण, अतिक्रमण, कूड़ा-कचरा और जल निकासी की खराब व्यवस्था भी इसकी स्थिति पर असर डाल रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर गंदा पानी झील में पहुंचता रहेगा तो केवल ऊपर से खरपतवार हटाने या गाद निकालने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषित पानी झील में पहुंच ही न सके।
कमल के फूलों की जगह दिखने लगी घनी खरपतवार
डल झील की बदली हुई तस्वीर स्थानीय लोगों के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। स्थानीय निवासी एजाज अहमद के मुताबिक, एक समय ऐसा था जब लोग झील के पानी का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए करते थे और शिकारे के आसपास पीले और सफेद कमल के फूल नजर आते थे।
अब झील के कई हिस्सों में अजोला की हरी परत और घनी खरपतवार दिखाई देती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कुछ हिस्सों में पानी की स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां शिकारे चलाना भी मुश्किल हो रहा है।
एक अन्य स्थानीय निवासी अब्दुल रज्जाक का कहना है कि आज की डल झील पहले जैसी नहीं रही। उनका कहना है कि झील के आसपास बढ़ती आबादी और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं ने इसकी स्थिति को काफी प्रभावित किया है।
डल झील की हालत का पर्यटन पर क्या असर पड़ेगा?
डल झील केवल एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं है, बल्कि कश्मीर के पर्यटन की पहचान भी है। शिकारे, हाउसबोट और झील का खूबसूरत नजारा यहां आने वाले पर्यटकों के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर झील की हालत लगातार खराब होती रही तो इसका असर पर्यटन पर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव उन लोगों की आय पर भी पड़ेगा, जिनका रोजगार शिकारे, हाउसबोट, पर्यटन सेवाओं और आसपास के कारोबार से जुड़ा है।
इसलिए डल झील की समस्या को केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसका संबंध स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की आजीविका से भी है।
हर साल सफाई के बावजूद क्यों बनी हुई है समस्या?
स्थानीय लोगों के मुताबिक, झील की सफाई के लिए समय-समय पर मशीनों और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि उनका कहना है कि सफाई का असर झील के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह जाता है।
कुछ इलाकों में खरपतवार और गंदगी हटाने के बाद स्थिति बेहतर दिखाई देती है, लेकिन झील के दूसरे हिस्सों में समस्या बनी रहती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रशासन और जनता दोनों को अपनी भूमिका निभानी होगी।
उनके मुताबिक, सरकार को जहां सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था मजबूत करनी होगी, वहीं लोगों को भी झील और उसके आसपास कचरा फेंकने से बचना होगा।
एक्टिविस्ट ने बताई समस्या की जड़
डल झील की सफाई से जुड़े स्थानीय एक्टिविस्ट तारिक पतलू का कहना है कि केवल सफाई अभियान चलाने से झील की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, झील में गंदा पानी पहुंचने की समस्या को सबसे पहले रोकना होगा।

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