मंदिर में भगवान की परिक्रमा क्यों करते हैं? जानिए प्रदक्षिणा की परंपरा का धार्मिक महत्व और लाभ.

मंदिर में भगवान की परिक्रमा क्यों करते हैं? जानिए प्रदक्षिणा की परंपरा का धार्मिक महत्व और लाभ.
मंदिर में भगवान की परिक्रमा क्यों करते हैं? जानिए प्रदक्षिणा की परंपरा का धार्मिक महत्व और लाभ.

हिन्दू धर्म में हजारों सालों से मंदिर जाने, भगवान के समक्ष सिर झुकाने और दंडवत प्रणाम करने के साथ मूर्ति के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करने की परंपरा चली आ रही है. भगवान के पूजा-पाठ के इन नियमों में आज भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है. लेकिन क्या आपने ये कभी सोचा या गौर किया है कि मंदिर और भगवान की प्रदक्षिणा या परिक्रमा क्यों की जाती है. यदि इसे आप सिर्फ एक रस्म मानते हैं, तो आपको धर्म ग्रंथों की लॉजिक और भक्तों-श्रद्धालुओं की बात एक बार जरूर समझनी चाहिए. आइए जानते हैं, इस परंपरा का महत्व और लाभ क्या है?

किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा?

हिन्दू धर्म के ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि किस देवी और देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए. नारद पुराण के एक श्लोक के मुताबिक, देवी चंडी यानी मां दुर्गा की एक, सूर्यदेव की सात, गणेश जी की तीन, भगवान विष्णु की चार और महादेव शिव की आधी परिक्रमा करनी चाहिए. आपको बता दें कि शिवलिंग के सोमसूत्र यानी जलहरी को नहीं लांघा जाता है. प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसे संचित कर्मों को काटने की विधि बताया है.

प्रदक्षिणा का धार्मिक महत्व

हिन्दू धर्म की मान्यता है कि मंदिर, पूजा स्थल या देवालय के गर्भगृह की सकारात्मक ऊर्जा के क्षेत्र में घूमने यानी परिक्रमा करने से व्यक्ति मात्र का आभामंडल शुद्ध होता है. ग्रंथों में उल्लेख है कि हमसे जाने-अनजाने इस जन्म या पिछले जन्मों में जो भी पाप या बुरे कर्म हुए हैं, वे प्रदक्षिणा के हर कदम के साथ नष्ट हो जाते हैं.

परिक्रमा हमेशा दाईं ओर ही क्यों?

ईश्वर की परिक्रमा को संस्कृत में ‘प्रदक्षिणा’ कहते हैं. यहां ‘प्र’ का अर्थ है- प्रमुख या मुख्य या प्रधान, वहीं ‘दक्षिणा’ का अर्थ है- दक्षिण दिशा और दाहिना भाग. दाहिनी ओर से परिक्रमा करने के कारण इसे ‘प्रदक्षिणा’ कहते हैं. दाहिनी ओर से परिक्रमा क्यों करनी चाहिए, इसके बारे में ऋग्वेद में कहा गया है कि हमारी दाहिनी ओर सकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय होती हैं. शास्त्रों में यह नियम भी मिलता है कि हमारे चलते समय भगवान को हमेशा दाहिनी ओर और हमें भगवान की बायीं ओर उनसे थोड़ा पीछे ही होना चाहिए.

अश्वमेध यज्ञ जैसा फल

स्कन्द पुराण के वैष्णव खंड के एक श्लोक में प्रदक्षिणा के महत्व और उसके लाभ को काफी अच्छे ढंग से समझाया गया है. इसके अनुसार, पदे पदे यानी परिक्रमा का हर कदम से भक्त को तत्काल अश्वमेध यज्ञ जैसा फल प्राप्त होता है. यह भी उल्लेख मिलता है कि इससे समस्त पापों का क्षय हो जाता है.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है

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