
नौकरी जाना आमतौर पर लोगों के लिए आर्थिक चिंता की वजह बनता है। लेकिन क्या हो अगर किसी के पास कई साल तक बिना कमाए आराम से जिंदगी चलाने जितनी बचत हो और फिर भी बेरोजगारी उसे परेशान करने लगे?
अमेरिका के एक 29 वर्षीय कॉरपोरेट कर्मचारी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। अप्रैल में उसकी नौकरी चली गई थी। कंपनी ने उसे करीब 9 महीने का सेवरेंस पैकेज दिया था और उसके पास इतनी बचत भी थी कि वह लगभग 5 साल तक अपने खर्च आसानी से चला सकता था। यानी तत्काल पैसों की कोई बड़ी परेशानी नहीं थी।
इसके बावजूद नौकरी जाने के बाद उसकी जिंदगी अचानक बदल गई।
200 से ज्यादा आवेदन, 15 से ज्यादा इंटरव्यू
नौकरी छूटने के बाद उसने दोबारा काम तलाशने में कोई कमी नहीं छोड़ी। उसने 200 से अधिक कंपनियों में आवेदन किया और 15 से ज्यादा इंटरव्यू दिए। लेकिन लगातार कोशिशों के बावजूद उसे कोई पक्की नौकरी नहीं मिली।
धीरे-धीरे इसका असर उसके आत्मविश्वास पर पड़ने लगा।
उसने अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा करते हुए बताया कि बेरोजगारी के दौरान सबसे मुश्किल चीज पैसों की कमी नहीं थी, बल्कि जिंदगी से रूटीन का गायब हो जाना था। सुबह उठने के बाद कोई तय काम नहीं होता था और दिन कब शुरू हुआ और कब खत्म, इसका एहसास तक नहीं रहता था।
उसे लगने लगा कि वह खुद को बेकार समझने लगा है।
जिस नौकरी से खुश नहीं था, उसी को पाने की बेचैनी
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस तरह की कॉरपोरेट नौकरी में वह पहले काम करता था, उससे वह पूरी तरह खुश नहीं था। इसके बावजूद बेरोजगार होने के बाद उसका ध्यान बार-बार उसी नौकरी की तरफ जाने लगा।
उसे सिर्फ सैलरी की तलाश नहीं थी। वह उस रूटीन को वापस चाहता था जिसमें सुबह उठने के बाद पता हो कि दिन में क्या करना है, लोगों से बातचीत हो और कुछ घंटे किसी काम में व्यस्त रहने का मौका मिले।
यानी नौकरी उसके लिए कमाई से ज्यादा एक उद्देश्य और पहचान का हिस्सा बन चुकी थी।
फिर लिया ऐसा फैसला, जिसने सबको चौंका दिया
जब लंबे समय तक नौकरी नहीं मिली तो उसने कुछ अलग करने का फैसला किया। उसने पार्ट-टाइम डिशवॉशर यानी बर्तन धोने का काम शुरू करने का फैसला किया।
इस काम के लिए उसे करीब 11 डॉलर यानी लगभग 1049 रुपये प्रति घंटे मिलने वाले थे।
हालांकि, उसने साफ किया कि वह यह काम पैसों की जरूरत के कारण नहीं कर रहा है। उसके पास पर्याप्त इमरजेंसी फंड मौजूद है। उसका असली मकसद अपने दिन को एक रूटीन देना और खुद को किसी उपयोगी काम में व्यस्त रखना है।
उसके लिए कुछ घंटे बर्तन धोना भी उस खालीपन से बेहतर था, जिसमें पूरा दिन बिना किसी उद्देश्य के गुजर रहा था।
क्या रिटायरमेंट के बाद भी इंसान खालीपन महसूस करता है?
इस अनुभव ने उसे अपने भविष्य के बारे में सोचने पर भी मजबूर कर दिया।
उसने सवाल उठाया कि अगर भविष्य में उसके पास इतना पैसा हो जाए कि काम करने की जरूरत ही न पड़े, तब क्या वह खुश रहेगा? अगर आर्थिक चिंता न हो, शौक पूरे करने के लिए पर्याप्त पैसे हों और फिर भी दिन का बड़ा हिस्सा खाली बचा रहे, तो क्या वह उसी तरह बेचैनी महसूस करेगा?
उसने अपने पिता का उदाहरण भी दिया। उसके पिता करीब 30 साल तक कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुके हैं और कुछ समय बाद रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उसे चिंता है कि रिटायरमेंट के बाद उनके सामने भी यही सवाल खड़ा हो सकता है कि रोजमर्रा की जिंदगी को किस तरह व्यवस्थित रखा जाए।
लोगों ने कहा- इंसान सिर्फ अपनी नौकरी नहीं होता
सोशल मीडिया पर उसकी कहानी सामने आने के बाद कई लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए।
कुछ यूजर्स ने बताया कि नौकरी जाने के बाद उन्होंने छोटे-मोटे काम किए और इससे उन्हें मानसिक तौर पर काफी मदद मिली। एक व्यक्ति ने बताया कि अच्छी सैलरी वाली टेक कंपनी की नौकरी जाने के बाद वह लंबे समय तक बेरोजगार रहा और उसे ऐसे दौर से गुजरना पड़ा जब मुफ्त भोजन के लिए भी लाइन में खड़ा होना पड़ा।
एक अन्य यूजर ने बताया कि उसने भी कॉरपोरेट नौकरी छोड़ने के बाद बिल्कुल अलग तरह के छोटे काम किए। उसके मुताबिक, काम की प्रतिष्ठा से ज्यादा जरूरी यह था कि वह खुद को सक्रिय रखे।
एक बात कई लोगों की प्रतिक्रियाओं में बार-बार सामने आई—इंसान की पूरी पहचान उसकी नौकरी नहीं होती, लेकिन नौकरी से बनी दिनचर्या और उद्देश्य की भावना को अचानक खो देना बेहद मुश्किल हो सकता है।
इस 29 वर्षीय शख्स का बर्तन धोने का फैसला भी इसी बात की ओर इशारा करता है। कभी-कभी अच्छी जिंदगी के लिए सिर्फ पैसा पर्याप्त नहीं होता। इंसान को अपने दिन में किसी काम, जिम्मेदारी और उद्देश्य का एहसास भी चाहिए होता है।

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