इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?

इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?
इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?

नई दिल्ली: इंसानी दिमाग को दुनिया की सबसे जटिल जैविक संरचनाओं में से एक माना जाता है। हमारे दिमाग में करीब 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं और ये अरबों-खरबों कनेक्शनों के जरिए एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसके बावजूद अगर बात तेज गणितीय गणना या बड़ी मात्रा में डेटा को कुछ ही पलों में प्रोसेस करने की हो, तो आधुनिक कंप्यूटर इंसानी दिमाग से कहीं आगे निकल जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है?

कंप्यूटर की सिग्नल स्पीड बहुत ज्यादा होती है

कंप्यूटर प्रोसेसर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के जरिए काम करते हैं और आधुनिक प्रोसेसर की क्लॉक स्पीड गीगाहर्ट्ज तक पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्रोसेसर एक सेकंड में अरबों चक्र पूरे कर सकता है।

इसके मुकाबले दिमाग के न्यूरॉन्स इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नल के जरिए एक-दूसरे से संवाद करते हैं। इन सिग्नल की गति इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसर की तुलना में काफी कम होती है। कुछ तेज नर्व फाइबर में सिग्नल की गति करीब 100 से 120 मीटर प्रति सेकंड तक हो सकती है।

इसलिए केवल सिग्नल की रफ्तार के आधार पर देखें तो कंप्यूटर स्पष्ट रूप से ज्यादा तेज है। लेकिन दिमाग की ताकत सिर्फ उसकी स्पीड में नहीं है।

दिमाग एक साथ कई काम कर सकता है

इंसानी दिमाग बड़े पैमाने पर पैरेलल प्रोसेसिंग करता है। यानी एक ही समय में अलग-अलग तरह की सूचनाओं पर काम किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति सड़क पार करता है, तो उसका दिमाग एक साथ आसपास की गाड़ियों को देखता है, आवाजों को पहचानता है, दूरी और गति का अंदाजा लगाता है, शरीर का संतुलन बनाए रखता है और पिछले अनुभवों के आधार पर फैसला करता है।

ये सभी प्रक्रियाएं एक ही क्रम में नहीं होतीं, बल्कि दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं। यही वजह है कि न्यूरॉन्स की व्यक्तिगत सिग्नल स्पीड धीमी होने के बावजूद दिमाग जटिल परिस्थितियों में बेहद प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया कर सकता है।

सिर्फ न्यूरॉन्स की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं

दिमाग की क्षमता को समझने के लिए केवल 86 अरब न्यूरॉन्स की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। इन न्यूरॉन्स के बीच मौजूद कनेक्शन भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

एक न्यूरॉन कई दूसरे न्यूरॉन्स के साथ सिनेप्स के जरिए जुड़ सकता है। दिमाग में इन कनेक्शनों की संख्या बहुत विशाल है। यही नेटवर्क सीखने, याद रखने, चीजों को पहचानने और नए विचार बनाने जैसी क्षमताओं का आधार बनता है।

कंप्यूटर में जानकारी आमतौर पर तय किए गए निर्देशों और एल्गोरिदम के आधार पर प्रोसेस होती है, जबकि दिमाग अनुभव और सीखने के साथ अपने न्यूरल कनेक्शनों में बदलाव कर सकता है।

दिमाग बेहद कम ऊर्जा में काम करता है

दिमाग की एक बड़ी खासियत उसकी ऊर्जा दक्षता भी है। इंसानी दिमाग सामान्य तौर पर करीब 20 वॉट के आसपास ऊर्जा का इस्तेमाल करता है, फिर भी वह लगातार शरीर को नियंत्रित करने, इंद्रियों से मिलने वाली जानकारी को समझने और जटिल निर्णय लेने का काम करता रहता है।

इसके विपरीत बड़े हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। बड़े सुपरकंप्यूटर कई मेगावॉट तक बिजली का इस्तेमाल कर सकते हैं।

तो क्या कंप्यूटर दिमाग से ज्यादा स्मार्ट है?

ऐसा सीधे तौर पर कहना सही नहीं होगा। कंप्यूटर बेहद तेज गणना, डेटा प्रोसेसिंग और दोहराए जाने वाले कार्यों में इंसानी दिमाग से बहुत आगे हैं। लेकिन इंसानी दिमाग सीखने, संदर्भ समझने, भावनाओं को पहचानने, अनुभव से निर्णय लेने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में बेहद सक्षम है।

यानी कंप्यूटर की ताकत उसकी रफ्तार और गणना क्षमता है, जबकि दिमाग की ताकत उसकी जटिलता, समानांतर काम करने की क्षमता, सीखने की क्षमता और ऊर्जा दक्षता में छिपी है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *