फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.
फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

वृंदावन: संतों की परंपरा में कई साधु अपने कठोर नियमों और खान-पान की विशेष तपस्या के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं में एक नाम फलाहारी महाराज का भी सामने आता है। हाल के एक विवाद के बाद उनके नाम और जीवनशैली को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसी संत को फलाहारी क्यों कहा जाता है और क्या फलाहारी होने का मतलब सिर्फ फल खाना होता है?

हाल ही में वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के केलीकुंज आश्रम से जुड़े विवाद के बीच श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा, जिन्हें फलाहारी महाराज के नाम से जाना जाता है, की ओर से विराट कोहली से जुड़ा एक दावा सामने आया था। इस दावे में प्रेमानंद महाराज से मुलाकात को लेकर आर्थिक लेनदेन का आरोप लगाया गया था।

हालांकि, विराट कोहली के प्रवक्ता ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि विराट कोहली और अनुष्का शर्मा प्रेमानंद महाराज के प्रति श्रद्धा और आस्था के कारण उनसे मिलने जाते हैं। ऐसे में इस विवाद से अलग यह जानना भी दिलचस्प है कि ‘फलाहारी’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है।

संतों को फलाहारी क्यों कहा जाता है?

हिंदू धार्मिक परंपरा में फलाहारी शब्द ऐसे व्यक्ति या साधु के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आहार में अनाज का त्याग कर देता है और फल, दूध तथा कुछ अन्य सात्विक खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहता है।

यह किसी व्यक्ति का पारिवारिक नाम या जातिगत पहचान नहीं होती। कई बार साधु अपने धार्मिक संकल्प, तपस्या या साधना के दौरान अनाज का त्याग करते हैं। इसके बाद उनकी इसी जीवनशैली के कारण लोग उन्हें फलाहारी कहकर संबोधित करने लगते हैं।

क्या फलाहारी संत सिर्फ फल ही खाते हैं?

फलाहारी शब्द सुनकर अक्सर लोगों को लगता है कि ऐसे संत पूरे जीवन केवल फल खाकर ही रहते होंगे। लेकिन फलाहार का अर्थ हर स्थिति में केवल फल खाना नहीं होता।

कई फलाहारी साधुओं के आहार में मौसमी फल के साथ सूखे मेवे, मखाना, दूध, दही, मट्ठा, नारियल पानी और अन्य सात्विक चीजें भी शामिल हो सकती हैं। हालांकि यह हर संत के व्यक्तिगत संकल्प और नियम पर निर्भर करता है।

कुछ साधु अपने नियमों के तहत पके हुए भोजन, मसालों और अनाज से पूरी तरह दूरी बनाए रखते हैं, जबकि फलाहार की अलग-अलग परंपराओं में आहार के नियम अलग हो सकते हैं।

फलाहार को तपस्या से क्यों जोड़ा जाता है?

धार्मिक दृष्टि से भोजन पर नियंत्रण को कई साधना परंपराओं में आत्मसंयम का हिस्सा माना गया है। साधु-संत अपने संकल्प के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं और इसे अपनी आध्यात्मिक साधना से जोड़ते हैं।

इसी वजह से फलाहारी संतों की जीवनशैली आम लोगों से काफी अलग नजर आती है। उनके लिए यह केवल खान-पान का बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और संकल्प का हिस्सा हो सकता है।

क्या हर फलाहारी संत का आहार एक जैसा होता है?

ऐसा जरूरी नहीं है। फलाहारी कोई एक तय डाइट चार्ट नहीं है। अलग-अलग संत अपनी साधना और परंपरा के अनुसार अलग नियम अपना सकते हैं।

इसलिए किसी एक फलाहारी संत के भोजन के आधार पर सभी फलाहारी साधुओं की जीवनशैली के बारे में निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। किसी संत के बारे में यह जानने के लिए उनके स्वयं बताए गए नियमों और परंपरा को ही आधार माना जाना चाहिए।

फलाहारी महाराज को लेकर हालिया विवाद ने भले ही उनके नाम को चर्चा में ला दिया हो, लेकिन ‘फलाहारी’ शब्द का मूल संबंध साधु-संतों की आहार संबंधी तपस्या और अनाज त्याग की परंपरा से है।

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