एक ही नाम और पहचान से 6 जिलों में नौकरी का दावा, स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड ने खोला चौंकाने वाला राज..

एक ही नाम और पहचान से 6 जिलों में नौकरी का दावा, स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड ने खोला चौंकाने वाला राज..

उत्तर प्रदेश के कुछ समय पहले स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आया था। विभागीय रिकॉर्ड की जांच के दौरान एक ही नाम, पिता का नाम और जन्मतिथि वाले छह कर्मचारियों का अलग-अलग जिलों में तैनात होने का मामला सामने आया। इसके बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

बताया गया था कि मामला एक्स-रे टेक्नीशियन के पद पर हुई नियुक्तियों से जुड़ा था। वर्ष 2016 में स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। इसी सूची में एक व्यक्ति का नाम भी शामिल था, जिसे एक जिले में तैनाती मिली थी।

बाद में जब कर्मचारियों का विवरण मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज किया गया तो रिकॉर्ड में एक जैसी जानकारियां देखकर अधिकारी भी हैरान रह गए। अलग-अलग जिलों में तैनात छह कर्मचारियों के नाम एक जैसे बताए गए थे। उनके पिता के नाम और जन्मतिथि भी समान थी। इनमें से कुछ कर्मचारियों का स्थायी पता भी एक जैसा दर्ज होने की बात सामने आई थी।

रिकॉर्ड में इन कर्मचारियों की तैनाती फर्रुखाबाद, बांदा, बलरामपुर, बदायूं, रामपुर और शामली समेत अलग-अलग जिलों में बताई गई थी। ऐसे में सवाल उठने लगा कि क्या ये वास्तव में अलग-अलग व्यक्ति हैं या एक ही पहचान का इस्तेमाल करके कई जगह नौकरी हासिल की गई।

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब वेतन से जुड़े आंकड़ों की पड़ताल की गई। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित पद पर तैनात कर्मचारी को हर महीने करीब 69 हजार रुपये वेतन मिलता था। इसी आधार पर अलग-अलग जिलों में सरकारी खजाने से बड़ी रकम के भुगतान का अनुमान सामने आया।

हालांकि, यह रकम वास्तव में फर्जीवाड़े के जरिए निकाली गई या रिकॉर्ड में किसी तकनीकी अथवा दस्तावेजी गड़बड़ी की वजह से ऐसा हुआ, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होना था। केवल एक जैसे नाम और विवरण सामने आने से किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना भी उचित नहीं था।

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच के लिए अधिकारियों की एक टीम गठित की थी। अधिकारियों ने रिकॉर्ड की जांच कर पूरे मामले की वास्तविक स्थिति पता लगाने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने की बात कही थी।

अब जांच में यह स्पष्ट होना था कि छह जिलों में एक जैसी पहचान वाले कर्मचारियों का रिकॉर्ड कैसे तैयार हुआ और वर्षों तक विभागीय स्तर पर इसकी जानकारी क्यों नहीं हो सकी। मामला सामने आने के बाद सरकारी नियुक्तियों और रिकॉर्ड सत्यापन की व्यवस्था पर भी सवाल उठे थे।

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