
भारत में बच्चों की पढ़ाई को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है। छोटी उम्र से ही बच्चों पर पढ़ाई, होमवर्क और परीक्षाओं का दबाव बढ़ने लगता है। जैसे-जैसे कक्षा आगे बढ़ती है, बोर्ड परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की चिंता भी बच्चों के साथ-साथ माता-पिता पर हावी होने लगती है। लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जहां बच्चों की शिक्षा का तरीका इससे काफी अलग है।
यह देश है फिनलैंड, जिसे लंबे समय से अपनी शिक्षा व्यवस्था के लिए दुनिया के प्रमुख देशों में गिना जाता है। यहां बच्चों को कम उम्र में भारी-भरकम परीक्षाओं के दबाव में नहीं डाला जाता। पढ़ाई का मकसद सिर्फ अच्छे नंबर हासिल करना नहीं, बल्कि बच्चों में समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास विकसित करना माना जाता है।
कक्षा 1 से 9 तक नहीं होती राष्ट्रीय परीक्षा
फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि बेसिक एजुकेशन यानी कक्षा 1 से 9 तक बच्चों के लिए कोई राष्ट्रीय स्तर की स्टैंडर्डाइज्ड परीक्षा नहीं होती। उनकी प्रगति का आकलन स्कूल के शिक्षक लगातार करते हैं।
बच्चों की क्षमता को केवल परीक्षा के नंबरों से नहीं मापा जाता। क्लास में उनकी भागीदारी, प्रोजेक्ट, रोजाना के काम, सीखने की क्षमता और खुद के प्रदर्शन का आकलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
बड़ा राष्ट्रीय स्तर का परीक्षा सिस्टम ऊपरी माध्यमिक शिक्षा के अंत में आता है। मैट्रिकुलेशन एग्जाम आमतौर पर तब होता है, जब छात्र करीब 18 से 19 वर्ष की उम्र में पहुंच जाते हैं।
छोटे बच्चों के लिए करीब 4 घंटे की पढ़ाई
फिनलैंड में शुरुआती कक्षाओं के बच्चों के स्कूल का समय भी कई देशों की तुलना में कम रहता है। कक्षा 1 और 2 में सप्ताह के दौरान न्यूनतम 20 लेसन होते हैं। एक लेसन करीब 45 मिनट का होता है।
इस हिसाब से शुरुआती कक्षाओं में बच्चों का रोजाना स्कूल समय लगभग चार घंटे के आसपास रह सकता है। पढ़ाई के बीच बच्चों को पर्याप्त ब्रेक भी दिए जाते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को लगातार किताबों के सामने बैठाए रखना नहीं, बल्कि पढ़ाई के साथ उन्हें खेलने, आराम करने और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर देना है।
7 साल की उम्र से शुरू होती है औपचारिक स्कूली शिक्षा
फिनलैंड में औपचारिक स्कूली शिक्षा आमतौर पर 7 वर्ष की उम्र से शुरू होती है। इससे पहले करीब 6 साल की उम्र में बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी एजुकेशन की व्यवस्था होती है।
इस चरण में बच्चों को केवल किताबें और कठिन पाठ याद कराने पर जोर नहीं दिया जाता। खेल और गतिविधियों के जरिए उन्हें नई चीजें समझने का अवसर दिया जाता है।
यहां शिक्षा का फोकस रटने की बजाय चीजों को समझने, सवाल पूछने, अपनी सोच विकसित करने और सामाजिक कौशल सीखने पर रहता है।
होमवर्क का बोझ भी कम
फिनलैंड की शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को भारी-भरकम होमवर्क देने की परंपरा नहीं है। पढ़ाई के अलावा बच्चों के मानसिक आराम और व्यक्तिगत समय को भी महत्व दिया जाता है।
इस शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। फिनलैंड में शिक्षक बनने के लिए उच्च स्तर की शिक्षा और कठिन प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। शिक्षकों को पढ़ाने के तरीके को लेकर भी काफी स्वतंत्रता दी जाती है।
वे पाठ्यक्रम के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बच्चों की जरूरत के अनुसार अपनी शिक्षण पद्धति तैयार कर सकते हैं।
अमीर-गरीब का फर्क कम करने की कोशिश
फिनलैंड में शिक्षा को अधिक समान बनाने पर भी जोर दिया जाता है। बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ कई जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। स्कूलों में मुफ्त भोजन, किताबें और अन्य शैक्षणिक सुविधाएं भी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
अगर किसी बच्चे को पढ़ाई में परेशानी आती है या वह बाकी बच्चों से पीछे रह जाता है, तो उसे अतिरिक्त सहायता देने की कोशिश की जाती है। उद्देश्य यह होता है कि बच्चा कमजोर होने की वजह से शिक्षा की दौड़ में पीछे न छूट जाए।
सिर्फ नंबर नहीं, बच्चे की पूरी क्षमता पर ध्यान
फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि बच्चे की क्षमता को केवल परीक्षा के अंकों से तय नहीं किया जाना चाहिए।
पढ़ाई के साथ उसका मानसिक स्वास्थ्य, रचनात्मक सोच, सामाजिक व्यवहार, आत्मविश्वास और सीखने की इच्छा भी महत्वपूर्ण है।
हालांकि फिनलैंड के प्रदर्शन में हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पीआईएसए आकलन में कुछ गिरावट देखने को मिली है, फिर भी उसकी शिक्षा व्यवस्था आज भी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है।
यही वजह है कि जब बच्चों पर बढ़ते पढ़ाई और परीक्षा के दबाव की बात होती है, तो फिनलैंड का मॉडल अक्सर उदाहरण के तौर पर सामने आता है। इसका मूल विचार यही है कि बच्चे को सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए तैयार किया जाए।

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