
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जंग सिर्फ मैदान में नहीं लड़ी जा रही थी। दुश्मन से बचने और उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ऐसी-ऐसी गुप्त योजनाएं बनाई जा रही थीं, जिनके बारे में आम लोगों को दशकों तक कोई जानकारी नहीं थी। ब्रिटेन की एक ऐसी ही योजना का राज करीब 50 साल बाद सामने आया, जिसने इतिहासकारों और खोजकर्ताओं तक को हैरान कर दिया।
यह कहानी जिब्राल्टर की विशाल चट्टान के अंदर बनाए गए एक ऐसे गुप्त कमरे की है, जहां जरूरत पड़ने पर छह सैनिकों को महीनों तक दुनिया से पूरी तरह काटकर रखा जाना था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि अगर किसी सैनिक की मौत हो जाती, तो उसकी लाश को वहीं कमरे के अंदर दफन करने की तैयारी थी।
जब ब्रिटेन को जिब्राल्टर पर कब्जे का डर सताने लगा
साल 1940 में यूरोप का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। फ्रांस पर नाजी जर्मनी का कब्जा हो चुका था और ब्रिटेन को आशंका थी कि अगला निशाना जिब्राल्टर हो सकता है। अगर जर्मन सेना यहां कब्जा कर लेती, तो भूमध्य सागर में ब्रिटिश नौसेना के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता था।
इसी आशंका के बीच ब्रिटिश नेवल इंटेलिजेंस ने एक बेहद गुप्त योजना तैयार की। इसका नाम रखा गया ऑपरेशन ट्रेसर।
योजना का मकसद सीधा था—अगर जिब्राल्टर दुश्मन के कब्जे में चला जाए, तब भी कुछ ब्रिटिश सैनिक वहीं छिपे रहकर नाजी सेना की गतिविधियों पर नजर रखते रहें और महत्वपूर्ण जानकारी ब्रिटेन तक पहुंचाते रहें।
चट्टान के अंदर बनाया गया गुप्त ठिकाना
इस मिशन के लिए छह लोगों का चयन किया गया। टीम में दो डॉक्टर, तीन सिग्नलमैन और एक टीम लीडर शामिल थे।
जिब्राल्टर की विशाल चूना-पत्थर की चट्टान के अंदर 1941 के आसपास एक खास कमरा तैयार किया गया। यह जगह करीब 45 फीट लंबी, 16 फीट चौड़ी और 8 फीट ऊंची थी।
बाहर से देखने पर इस गुप्त कमरे का कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। इसमें बेहद संकरी दो दरारें बनाई गई थीं, जिनका इस्तेमाल बाहर की गतिविधियों और समुद्र में जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए किया जाना था।
इस जगह को ‘स्टे बिहाइंड केव’ कहा गया।
एक साल तक बाहर निकलने की इजाजत नहीं
ऑपरेशन ट्रेसर का सबसे खौफनाक हिस्सा इसकी तैयारी थी। अगर जिब्राल्टर पर जर्मनी का कब्जा हो जाता, तो छह सैनिकों को इसी गुफा में छिपकर करीब एक साल तक रहना था।
कमरे के अंदर उनके लिए लंबे समय तक चलने वाला सूखा राशन, पानी का इंतजाम, शौचालय और रेडियो ट्रांसमीटर मौजूद था। रेडियो चलाने के लिए एक खास साइकिल भी रखी गई थी, ताकि सैनिक बिजली पैदा करके ब्रिटेन तक संदेश भेज सकें।
यानी बाहर दुश्मन का कब्जा हो जाने के बाद भी ये लोग चट्टान के भीतर छिपकर ब्रिटिश सेना को खुफिया जानकारी देते रहते।
लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी जिंदगी का सबसे कठिन फैसला लेना पड़ता।
मौत के बाद भी कमरे से बाहर नहीं निकलना था
मिशन की योजना इतनी कठोर थी कि किसी सैनिक की मौत होने की स्थिति के बारे में भी पहले से सोचा गया था।
अगर गुफा के अंदर किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती, तो बाकी सैनिक उसकी लाश को कमरे के अंदर ही सीमेंट से ढककर फर्श के नीचे दफन कर देते। इसका मतलब था कि मिशन में शामिल लोगों को पहले से पता था कि जरूरत पड़ने पर उन्हें उसी जगह जिंदा रहते हुए अपने साथी को दफनाना पड़ सकता है।
यह योजना सुनने में जितनी डरावनी लगती है, उस समय ब्रिटेन के लिए हालात उतने ही गंभीर थे।
किस्मत से मिशन को लागू करने की जरूरत नहीं पड़ी
हालांकि, इतिहास ने इस गुप्त मिशन को कभी वास्तव में शुरू होने का मौका नहीं दिया। जर्मनी का ध्यान बाद में सोवियत संघ की ओर चला गया और जिब्राल्टर पर उस तरह का हमला नहीं हुआ, जिसकी ब्रिटेन को आशंका थी।
नतीजा यह हुआ कि छह सैनिकों को गुफा में बंद करके रखने की नौबत ही नहीं आई।
युद्ध खत्म हुआ और ऑपरेशन ट्रेसर धीरे-धीरे रहस्य बन गया। कई वर्षों तक लोगों को यह तक यकीन नहीं था कि ऐसी कोई जगह वास्तव में मौजूद थी।
50 साल बाद खुला गुफा का रहस्य
करीब पांच दशक तक यह गुप्त ठिकाना छिपा रहा। फिर 1997 में जिब्राल्टर केविंग ग्रुप के खोजकर्ताओं ने इलाके की तलाश शुरू की।
खोज के दौरान उन्हें ईंटों से बनी एक पुरानी दीवार दिखाई दी। जब इसे तोड़ा गया तो उसके पीछे एक ऐसा कमरा मिला, जिसने दशकों पुराने ऑपरेशन की कहानी को फिर से जिंदा कर दिया।
अंदर मौजूद संरचना और इंतजामों से पता चला कि यह कोई सामान्य गुफा नहीं थी, बल्कि बेहद सोच-समझकर तैयार किया गया गुप्त सैन्य ठिकाना था।
आखिरी जीवित सदस्य खुद पहुंचे गुफा में
इस रहस्य की सबसे दिलचस्प कड़ी साल 2008 में सामने आई। उस समय ऑपरेशन से जुड़े आखिरी जीवित सदस्यों में से एक, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट डॉक्टर ब्रूस कूपर, 96 साल की उम्र में खुद उस गुफा तक पहुंचे।
उन्होंने वहां पहुंचकर पुष्टि की कि खोजकर्ताओं ने जिस जगह को खोजा है, वही ऑपरेशन ट्रेसर का गुप्त ठिकाना था।
जिस मिशन में छह सैनिकों ने जरूरत पड़ने पर अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा चट्टान के अंदर बिताने की तैयारी की थी, वह आखिरकार कभी शुरू नहीं हुआ। लेकिन दशकों बाद उस कमरे के खुलने से द्वितीय विश्व युद्ध की एक ऐसी गुप्त कहानी दुनिया के सामने आई, जिसे शायद हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन समझ लिया गया था।

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