
भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई क्षेत्र को लेकर जारी पाबंदियों का असर अब भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान का एयरस्पेस भारतीय विमानों के लिए बंद होने के कारण यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कई उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
इसी समस्या का विकल्प तलाशते हुए भारत अब चीन के शिनजियांग क्षेत्र में स्थित होटन के ऊपर से संभावित एयर कॉरिडोर को लेकर बातचीत कर रहा है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने सितंबर 2026 में बताया कि दोनों देशों के बीच इस रूट को लेकर चर्चा चल रही है और विदेश मंत्रालय इस मामले में चीन के साथ संपर्क में है। अभी इस रूट को लेकर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।
अगर भविष्य में इस कॉरिडोर को मंजूरी मिलती है, तो कुछ पश्चिमी देशों के लिए जाने वाली भारतीय उड़ानों को मौजूदा लंबे दक्षिणी रास्ते की तुलना में छोटा विकल्प मिल सकता है।
पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने से क्या बदला?
अप्रैल 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने भारतीय पंजीकृत और भारतीय एयरलाइंस द्वारा संचालित विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था। इस प्रतिबंध को कई बार बढ़ाया गया है और मौजूदा NOTAM के अनुसार यह 24 अक्टूबर 2026 तक लागू है।
इसके कारण दिल्ली, मुंबई और उत्तर-पश्चिम भारत से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानों को पाकिस्तान के ऊपर से गुजरने के बजाय वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
कई उड़ानों को अरब सागर और ओमान की दिशा में लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। रूट के आधार पर उड़ान का समय करीब 45 मिनट से लेकर 2 घंटे तक बढ़ सकता है।
लंबा रास्ता यानी ज्यादा ईंधन और ज्यादा खर्च
विमान जितनी देर तक हवा में रहेगा, उतना ही ज्यादा ईंधन खर्च होगा। लंबी उड़ान का असर सिर्फ ईंधन पर नहीं पड़ता, बल्कि विमान के इस्तेमाल का समय, चालक दल की ड्यूटी और परिचालन लागत भी बढ़ सकती है।
लंबे रूट का एक और असर यह है कि एक विमान को अपनी यात्रा पूरी करने में ज्यादा समय लगता है। इससे उसी विमान को अगली उड़ान के लिए उपलब्ध कराने में भी अधिक समय लग सकता है।
यानी एयरस्पेस बंद होने का असर सिर्फ एक उड़ान के अतिरिक्त किलोमीटर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी एयरलाइन के ऑपरेशन पर पड़ सकता है।
एयर इंडिया को कितना नुकसान हुआ?
पाकिस्तानी एयरस्पेस बंद होने का आर्थिक असर एयर इंडिया पर विशेष रूप से पड़ा है, क्योंकि कंपनी दिल्ली और मुंबई से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के लिए बड़ी संख्या में लंबी दूरी की उड़ानें संचालित करती है।
एयर इंडिया के पूर्व सीईओ कैंपबेल विल्सन ने 2025 में अनुमान लगाया था कि पाकिस्तान के एयरस्पेस प्रतिबंध के कारण एयरलाइन को एक साल में करीब 4,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। यह आंकड़ा उस समय का अनुमान था, इसलिए इसे मौजूदा साल का निश्चित नुकसान नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है चीन के होटन एयर रूट का प्रस्ताव?
भारत जिस विकल्प पर बातचीत कर रहा है, उसमें दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों से पश्चिम की ओर जाने वाली कुछ उड़ानों को उत्तर दिशा में ले जाकर लद्दाख के आसपास से चीन के शिनजियांग क्षेत्र में प्रवेश कराने की संभावना है।
प्रस्तावित रूट में विमान होटन के आसपास के चीनी हवाई क्षेत्र से गुजरकर किर्गिस्तान और मध्य एशिया की ओर बढ़ सकते हैं। इसके बाद वे यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका जाने वाले मौजूदा अंतरराष्ट्रीय एयर रूट से जुड़ सकते हैं।
इसका फायदा यह हो सकता है कि कुछ उड़ानों को अरब सागर और ओमान की तरफ लंबा दक्षिणी चक्कर न लगाना पड़े।
भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?
अगर चीन इस एयर कॉरिडोर को मंजूरी देता है और सभी तकनीकी व्यवस्थाएं तैयार हो जाती हैं, तो संभावित फायदे कई स्तर पर हो सकते हैं।
पहला फायदा—समय की बचत। कुछ पश्चिमी गंतव्यों के लिए उड़ान का रास्ता छोटा हो सकता है।
दूसरा—ईंधन की बचत। कम दूरी का मतलब कुछ मार्गों पर कम ईंधन खपत हो सकती है।
तीसरा—परिचालन लागत में कमी। कम उड़ान समय से विमान और चालक दल के इस्तेमाल की लागत पर असर पड़ सकता है।
चौथा—विमान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना। अगर लंबी दूरी और उड़ान समय कम होता है, तो एयरलाइन अपने विमान को अधिक कुशलता से शेड्यूल कर सकती है।
होटन रूट से जॉर्जिया, बाकू, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप जैसे कुछ गंतव्यों के लिए विशेष रूप से समय और लागत में बचत की संभावना बताई गई है।
लेकिन चीन का रास्ता इतना आसान भी नहीं
होटन एयर कॉरिडोर को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह अभी सिर्फ बातचीत और संभावित विकल्प के स्तर पर है। चीन की अनुमति के बिना भारतीय विमान उसके हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
इसके अलावा शिनजियांग का भौगोलिक क्षेत्र भी चुनौतीपूर्ण है। आसपास ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र हैं और आपात स्थिति में विमानों को सुरक्षित रूप से नीचे उतरने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक रास्तों तथा हवाई अड्डों की जरूरत होती है।
इसलिए किसी भी नए कॉरिडोर को शुरू करने से पहले एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा, आपातकालीन डायवर्जन और चीन के नागरिक एवं अन्य संबंधित हवाई प्राधिकरणों के साथ समन्वय जैसे मुद्दों पर विस्तृत व्यवस्था करनी होगी।
क्या यह पाकिस्तान वाले रास्ते की पूरी भरपाई कर देगा?
जरूरी नहीं। होटन कॉरिडोर अगर शुरू भी होता है तो उसका फायदा हर अंतरराष्ट्रीय रूट को समान रूप से नहीं मिलेगा। अलग-अलग गंतव्यों के लिए दूरी, मौसम, हवाई क्षेत्र की अनुमति और उपलब्ध एयर रूट अलग हो सकते हैं।
फिर भी भारत के लिए यह एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है। अभी पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने के कारण जिन उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, उनके लिए कोई छोटा वैकल्पिक कॉरिडोर परिचालन लागत और उड़ान समय को कम करने में मदद कर सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारत और चीन के बीच होटन रूट को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इस रास्ते को खोलने की कोई अंतिम तारीख या समझौता घोषित नहीं हुआ है।
अगर सहमति बनती है, तो यह भारत की यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कुछ उड़ानों के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने के बीच एक नया विकल्प बन सकता है।

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