Author: contact.satyareport@gmail.com

  • कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

    कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

    कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब

    कृष्ण जन्माष्टमी की रात कान्हा के जन्म के साथ ही मानो गोकुल की गलियों में उत्सव उतर आता है. मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में भजन गूंजते हैं और महिलाएं पारंपरिक बधाई गीत गाकर खुशी मनाती हैं. इन्हीं लोकगीतों में एक गीत है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया’. इसकी खासियत यह है कि गीत केवल कृष्ण जन्म की खुशी नहीं बताता, बल्कि उस पूरे लोक संसार की तस्वीर खींच देता है, जहां बच्चे के जन्म पर घर-आंगन से लेकर गलियों तक उत्सव मनाया जाता है.

    कृष्ण की छठी के अवसर पर भी कई क्षेत्रों में ऐसे लोकगीत गाने की परंपरा रही है. हालांकि अलग-अलग इलाकों में गीत के बोल और धुन थोड़े बदल सकते हैं. कहीं इसे बधाई के रूप में गाया जाता है तो कहीं छठी या नामकरण के अवसर पर. गीत की पंक्तियों में गोकुल की खुशियां, रोशनी, ढोल और बधाई देने वालों का उत्साह साफ नजर आता है.

    ‘जन्म लियो दोनों भैया’ में छिपी है गोकुल की खुशी

    गीत की शुरुआत ही उत्सव के माहौल से होती है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया.’ यहां ‘बधैया’ यानी बधाई या खुशी के गीतों की ओर संकेत है. लोकभाषा में ऐसी पंक्तियां किसी शुभ अवसर की सामूहिक खुशी को व्यक्त करती हैं. कृष्ण जन्म की कथा में गोकुल और नंद भवन का विशेष महत्व है. इसलिए इस तरह के लोकगीतों में गोकुल केवल एक स्थान नहीं रहता, बल्कि खुशियों से भरे पूरे संसार का प्रतीक बन जाता है. कल्पना कीजिए, किसी गांव में घर में बच्चे का जन्म हुआ हो और आसपास की महिलाएं एक साथ गीत गाने लगें. यही सामूहिक खुशी इस गीत में भी महसूस होती है.

    दीपों से जगमगाता है पूरा गोकुल

    गीत में आगे ‘जगमग दिए जलत हैं’ और ‘द्वारे-द्वारे दीप जलत हैं’ जैसी भावनाएं आती हैं. इन पंक्तियों के जरिए जन्मोत्सव की रोशनी को सामने रखा गया है. दीप जलाना भारतीय परंपरा में शुभता और मंगल का संकेत माना जाता है. इसलिए कृष्ण जन्म के संदर्भ में दीपों की यह तस्वीर बेहद स्वाभाविक लगती है. गीत सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे गोकुल की गलियां और घरों के दरवाजे दीपों से रोशन हैं और हर ओर कान्हा के जन्म की चर्चा हो रही है.

    गलियों में धूम और ढोल की आवाज

    गीत का एक और आकर्षक हिस्सा है, जिसमें ‘गलियों-गलियों धूम मची है’ और ढोल बजने की बात आती है. लोकगीतों की खूबी यही होती है कि वे बड़े धार्मिक प्रसंग को आम जिंदगी की तस्वीरों से जोड़ देते हैं. कृष्ण के जन्म की खुशी सिर्फ नंद भवन तक सीमित नहीं रहती. गीत में पूरा गोकुल नाचता-गाता नजर आता है. ढोल बज रहे हैं, लोग बधाई दे रहे हैं और हर तरफ उत्सव जैसा माहौल है. यही वजह है कि ऐसे गीत सुनते ही श्रोता कहानी पढ़ने के बजाय उसे महसूस करने लगता है.

    ‘कौन लुटाए हीरे-मोती’ का क्या अर्थ है?

    गीत में ‘कौन लुटाए हीरे मोती’ और ‘कौन लुटाए रुपैया’ जैसी पंक्तियां भी आती हैं. लोकगीतों में इस तरह की भाषा अक्सर खुशी और उदारता दिखाने के लिए इस्तेमाल होती है. यहां हीरे-मोती और रुपयों की बात को केवल धन के अर्थ में देखना जरूरी नहीं है. भाव यह है कि खुशी इतनी बड़ी है कि लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार और बधाई लुटा रहे हैं. आगे राजा के हीरे-मोती लुटाने और मैया के रुपैया लुटाने की कल्पना इसी उत्सव को और रंगीन बना देती है.

    कन्हैया के नाम से जुड़ी है खास खुशी

    गीत में ‘नाम धरो है कन्हैया’ का भाव भी आता है. कृष्ण के बाल रूप को लोक परंपरा में कन्हैया, कान्हा, नंदलाला जैसे स्नेहभरे नामों से पुकारा जाता है. इसलिए नामकरण का संदर्भ गीत को बच्चे के जन्म से आगे एक नए पारिवारिक संस्कार से जोड़ देता है. यही इस गीत की सबसे खूबसूरत बात है. इसमें भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप होने के साथ-साथ एक नवजात बच्चे के घर में आने वाली सामान्य खुशी भी दिखाई देती है. मां का लाड़, परिवार की उमंग और पड़ोसियों की बधाई- सब कुछ लोकभाषा में सहज ढंग से सामने आता है.

  • दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दूर से देखने पर एयर होस्टेस की जिंदगी बेहद चमक-धमक और रोमांच से भरी लगती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों फीट की ऊंचाई पर बादलों के बीच काम करने वाली इन लड़कियों की असल जिंदगी कैसी होती है? यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस की पूर्व फ्लाइट अटेंडेंट ने इस ग्लैमरस नौकरी का वह सच बयान किया है, जिसे जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी.

    हर दिन अजनबियों के साथ काम करने का चैलेंज

    यात्री अक्सर फ्लाइट में क्रू मेंबर्स को आपस में हंसते-बोलते देखकर सोचते हैं कि ये सभी पुराने दोस्त हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट होती है. बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस में लगभग 10 साल काम कर चुकी एक पूर्व एयर होस्टेस ने बताया कि प्लेन में कदम रखने के बाद पता चलता है कि पायलट से लेकर बाकी सभी क्रू मेंबर बिल्कुल नए हैं, जिन्हें वो पहले कभी जानती तक नहीं थीं. शुरुआत में यह बात काफी परेशान करती थी, लेकिन धीरे-धीरे 35,000 फीट की ऊंचाई पर कुछ ही मिनटों में इन अजनबियों को एक परफेक्ट टीम में बदलना उनकी सुपरपावर बन गया.

    पार्टी नहीं, जेट लैग और थकान से होता है मुकाबला

    आम लोगों को लगता है कि फ्लाइट अटेंडेंट विदेशी शहरों में घूमती हैं और रोज पार्टियां करती हैं. असलियत यह है कि वे लगातार भयानक जेट लैग और थकान से जूझती रहती हैं. कई बार लंबी फ्लाइट के बाद होटल पहुंचते ही उनके पास सिर्फ खाना खाने, नहाने और थोड़ा सा सोने का ही वक्त होता है, ताकि वे अगली उड़ान के लिए तैयार हो सकें.

    सख्त ब्यूटी स्टैंडर्ड्स का मानसिक तनाव अलग

    हर उड़ान से पहले एक अघोषित ग्रूमिंग और लुक टेस्ट होता है, जिसमें एयरलाइन के सख्त नियमों के मुताबिक बाल, मेकअप और ड्रेस की जांच की जाती है. परफेक्ट स्किन, मैनीक्योर किए हुए नाखून और एक ही स्टाइल का जूड़ा रखना हर समय मानसिक दबाव पैदा करता है. इस स्ट्रेस से तंग आकर ही इस पूर्व एयर होस्टेस ने अपने लंबे बालों को बॉब कट में कटवा लिया था, ताकि उन्हें बार-बार स्टाइल न करना पड़े.

  • चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब कुत्ता-बिल्ली सिर्फ जानवर नहीं, परिवार बन चुके हैं. और जब परिवार का कोई सदस्य जाता है तो उसे कचरे की तरह तो नहीं फेंका जा सकता. इसी सोच ने वहां एक नया बिजनेस खड़ा कर दिया है – पालतू जानवरों का अंतिम संस्कार. ये इंडस्ट्री इस वक्त चीन में बहुत तेजी से भाग रही है, लेकिन दिक्कत ये है कि इस पर सरकार का कोई पक्का नियम-कानून अभी तक बना ही नहीं है.

    रिपोर्ट के अनुसार, मई के महीने में डालियान शहर में एक कपल अपनी बिल्ली को आखिरी बार अलविदा कहने आया. वो बिल्ली 8 साल से उनके साथ थी. दिल की बीमारी से उसकी मौत हो गई. दोनों पति-पत्नी आखिरी बार उसके बाल संवार रहे थे, उसे सहला रहे थे, आंखों में आंसू थे. उनके लिए वो सिर्फ बिल्ली नहीं, घर का हिस्सा थी. इसके बाद उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया और ये कहानी अब अकेली नहीं है. चीन के बड़े शहरों में ऐसी तस्वीरें आम होती जा रही हैं.

    इमोशनल कनेक्शन के कारण बड़ा हुआ बिजनेस

    पहले होता ये था कि जानवर मरा और उसे कहीं दफना दिया. अब सीन बिल्कुल बदल गया है. कंपनियां सिर्फ जलाने की सर्विस नहीं दे रही हैं. पूरा का पूरा सेटअप मिलता है. फूलों से सजी जगह, आखिरी बार अपने पेट को देखने के लिए अलग सा प्राइवेट रूम, उसकी फोटो, उसके पंजे का निशान याद के तौर पर फ्रेम करके देना… और तो और कुछ जगह तो लोग अपने पेट के लिए छोटी सी प्रार्थना सभा भी रखते हैं और इसके लिए लोग पैसा भी दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं. कुछ कंपनियों के हाई-एंड पैकेज की कीमत लगभग 1500 डॉलर है, मतलब इंडिया के करीब 1.25 लाख रुपये.

    इस पैकेज में लिमोजिन गाड़ी में शव को ले जाना और चार यूनिफॉर्म पहने लोगों का उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होना जैसी चीजें भी शामिल हैं. सबसे बड़ी वजह है इमोशनल कनेक्शन. शहरों में अकेले रहने वाले बहुत से लोगों के लिए उनका कुत्ता या बिल्ली ही उनका सबसे करीबी साथी है.

    2026 में आई एक रिसर्च में 504 शहरी पेट-ओनर्स पर स्टडी की गई. उसमें साफ निकला कि जिसका अपने जानवर से जितना ज्यादा लगाव है, वो उसकी आखिरी विदाई को उतना ही खास बनाना चाहता है. लोगों के लिए अब ये सिर्फ बॉडी को ठिकाने लगाने का काम नहीं है, ये इज्जत देने का तरीका है. जहां इमोशन है, वहां पैसे का खेल भी है और यहीं पर सबसे बड़ी गड़बड़ है. इस इंडस्ट्री के लिए कोई एक जैसा सरकारी नियम नहीं है. हर शहर में लाइसेंस के, कचरा निपटाने के, पर्यावरण के नियम अलग-अलग हैं.

    इस वजह से ग्राहक के मन में डर बना रहता है. कंपनी बोल तो रही है कि आपके पेट का अलग से अंतिम संस्कार करेंगे, पर क्या सच में वही कर रही है? जो राख लौटाई जा रही है, क्या वो उसी के पेट की है? जो भट्टी इस्तेमाल हो रही है, क्या वो पर्यावरण के हिसाब से सेफ है? कई रिपोर्ट्स में तो ये भी सामने आया है कि बहुत सी दुकानें बिना किसी लाइसेंस के ही चल रही हैं. रेट का कोई हिसाब नहीं है, जो मुंह में आया मांग लिया और पर्यावरण का तो कोई ध्यान ही नहीं रख रहा…देखा जाए तो ये बिजनेस इस बात का प्रूफ है कि समाज बदल रहा है, लोग जानवरों को ज्यादा प्यार और इज्जत दे रहे हैं. ये अच्छी बात है.

  • दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    उज्बेकिस्तान आजकल सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. लोग इसे दुनिया का सबसे सस्ता देश बता रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि अगर कोई भारतीय अपनी जेब में सिर्फ एक हजार रुपये लेकर उज्बेकिस्तान पहुंच जाए, तो वह वहां सीधे लखपति बन जाता है. यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन मनी एक्सचेंज रेट और वहां की जीवनशैली को समझने के बाद यह दावा काफी हद तक सही साबित होता है.

    उज्बेकिस्तान मध्य एशिया का एक खूबसूरत देश है. ताशकंद, समरकंद, बुखारा और खीवा जैसे शहरों में ऐतिहासिक इमारतें, मस्जिदें, मदरसे और बाजार पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. लेकिन सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, यहां की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी भी भारतीय पर्यटकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है.

    एक्सचेंज रेट है जबरदस्त
    उज्बेकिस्तानी मुद्रा को सोम कहा जाता है. भारतीय रुपये और सोम के बीच विनिमय दर ऐसी है कि एक हजार रुपये से काफी बड़ी रकम सोम में मिल जाती है. जब पर्यटक स्थानीय बाजार में जाते हैं तो खाने-पीने, रहने और घूमने का खर्च बहुत कम पड़ता है. होटल, टैक्सी, स्थानीय खाना और स्मृति चिन्ह इतने सस्ते होते हैं कि भारतीय पर्यटक को लगता है जैसे उसकी क्रय शक्ति कई गुना बढ़ गई हो. इसी वजह से सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि हजार रुपये वाला भारतीय यहां लखपति जैसा महसूस करता है. जीवनशैली की बात करें तो उज्बेकिस्तान में रोजमर्रा की वस्तुएं भारतीय शहरों की तुलना में काफी सस्ती है. सब्जियां, फल, मांस, ब्रेड और स्थानीय व्यंजन बहुत कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं. सार्वजनिक परिवहन भी सस्ता है. टैक्सी किराया और मेट्रो दोनों ही किफायती है. पर्यटक अगर बजट होटल या गेस्ट हाउस में रुकें तो एक रात का खर्च बहुत कम आता है.

    सोने का है भंडार
    उज्बेकिस्तान सिर्फ सस्ता देश ही नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक संसाधन भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है. देश की जमीन में सोने का विशाल भंडार छिपा हुआ है. उज्बेकिस्तान दुनिया के प्रमुख सोना उत्पादक देशों में शामिल है. मुरांटाऊ सोने की खदान दुनिया की सबसे बड़ी खुली खदानों में से एक मानी जाती है. इसके अलावा कई अन्य खदानें भी सक्रिय हैं जहां से सोना निकाला जाता है. यह प्राकृतिक संपदा देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है. पर्यटन की दृष्टि से उज्बेकिस्तान एक आकर्षक डेस्टिनेशन है समरकंद का रेगिस्तान, बुखारा का पुराना शहर, ताशकंद के आधुनिक और ऐतिहासिक स्थल पर्यटकों को लुभाते हैं. सिल्क रोड के ऐतिहासिक मार्ग पर स्थित ये शहर दुनिया भर के यात्रियों को आकर्षित करते हैं. भारतीय पर्यटकों के लिए यहां वीजा प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत आसान है और उड़ानें भी उपलब्ध हैं. यही वजह है कि धीरे-धीरे ये देश भारतीयों की लिस्ट में ऊपर आता जा रहा है.

  • कहीं नुकसान तो नहीं पहुंचा रही आपकी आई ड्रॉप? खुलने के बाद कितने दिनों तक इस्तेमाल करना सुरक्षित है?

    कहीं नुकसान तो नहीं पहुंचा रही आपकी आई ड्रॉप? खुलने के बाद कितने दिनों तक इस्तेमाल करना सुरक्षित है?

    कहीं नुकसान तो नहीं पहुंचा रही आपकी आई ड्रॉप? खुलने के बाद कितने दिनों तक इस्तेमाल करना सुरक्षित है?

    आंखों में जलन, सूखापन या इंफेक्शन होने पर आई ड्रॉप का इस्तेमाल करना बेहद आम है। अक्सर लोग एक बार आई ड्रॉप की शीशी खोलने के बाद महीनों तक उसका इस्तेमाल करते रहते हैं, जो आंखों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। क्या आप जानते हैं कि एक बार सील खुलने के बाद ज्यादातर आई ड्रॉप्स केवल 4 हफ्ते तक ही इस्तेमाल के लिए सुरक्षित माने जाते हैं? इस समय अवधि के बाद ड्रॉपर में बैक्टीरिया पनपने और दवा के खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे आंखों में गंभीर इंफेक्शन हो सकता है।

    क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि बोतल पर लिखी एक्सपायरी डेट कई महीने बाद की होती है, फिर भी उसे खोलने के कुछ समय बाद इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं माना जाता? दरअसल आई ड्रॉप की बोतल खोलने के बाद बार-बार इस्तेमाल करने से उसमें बाहर के वातावरण से सूक्ष्मजीव पहुंच सकते हैं। इससे आई ड्रॉप दूषित होने और आंखों में संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। नेत्र रोग विशेषज्ञों (Ophthalmologists) से जानिए कि आई ड्रॉप खोलने के बाद उसे कितने समय तक इस्तेमाल करना चाहिए, इसे स्टोर करने का सही तरीका क्या है और किन गलतियों से बचना जरूरी है।

    क्या हर आई ड्रॉप के लिए एक महीने का नियम लागू होता है?

    रतन ज्योति नेत्रालय, ग्वालियर में फाउंडर एवं डायरेक्टर डॉ. पुरेंद्र भसीन के मुताबिक कई मल्टी-डोज आई ड्रॉप्स को खोलने के बाद 28-30 दिनों के अंदर इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। किसी आई ड्रॉप को खोलने के बाद कितने समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है, यह उसके प्रोडक्ट, प्रिजर्वेटिव सिस्टम और निर्माता द्वारा दिए गए निर्देशों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल बोतल पर लिखी एक्सपायरी डेट देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि बोतल खोलने के बाद भी उसी तारीख तक आई ड्रॉप सुरक्षित रहेगी।

    प्रिजर्वेटिव-फ्री आई ड्रॉप में क्या सावधानी रखें?

    सभी आई ड्रॉप एक जैसी पैकेजिंग में नहीं आतीं। कुछ प्रिजर्वेटिव-फ्री आई ड्रॉप्स सिंगल-यूज वायल में आती हैं। इसे खोलकर इस्तेमाल करने के बाद आमतौर पर दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता और फेंक दिया जाता है। वहीं, कुछ आई ड्रॉप खास तरह की बोतलों में आती हैं, जिनकी पैकेजिंग उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन की गई हो सकती है। इसलिए किसी भी आई ड्रॉप के मामले में लेबल और पैकेज इंसर्ट पर दिए गए निर्देशों को देखना सबसे जरूरी है।

    आई ड्रॉप को लंबे समय तक इस्तेमाल करने से क्या हो सकता है?

    बोतल को बार-बार खोलने और इस्तेमाल करने के दौरान उसमें सूक्ष्मजीव पहुंच सकते हैं। खासतौर पर अगर ड्रॉपर का सिरा आंख, पलकों, उंगलियों या किसी दूसरी सतह को छू जाए तो आई ड्रॉप के दूषित होने की संभावना बढ़ सकती है। दूषित आई ड्रॉप का इस्तेमाल करने से आंखों में कंजंक्टिवाइटिस, कॉर्नियल इंफेक्शन या सूजन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर संक्रमण कॉर्निया तक पहुंच जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है और कुछ मामलों में आंखों की रोशनी भी प्रभावित होने का खतरा रहता है।

    आई ड्रॉप इस्तेमाल करने के बाद इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

    अगर आई ड्रॉप इस्तेमाल करने के बाद या आंखों में पहले से ही ये लक्षण मौजूद हैं, तो पुरानी आई ड्रॉप डालते रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लें। आंखों में कुछ लक्षण जैसे

    • आंखों में ज्यादा रेडनेस
    • आंखों में दर्द होना
    • आंखों से डिस्चार्ज या पानी आना
    • आंखों के आसपास सूजन होना
    • रोशनी देखने में परेशानी या फोटोफोबिया
    • धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।  इन लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं, इसलिए केवल पुरानी आई ड्रॉप से इलाज करने की कोशिश करना सही नहीं है।

    आई ड्रॉप इस्तेमाल करते समय लोग कौन-सी गलतियां करते हैं?

    डॉक्टर के मुताबिक, आई ड्रॉप इस्तेमाल करते समय कुछ सामान्य गलतियां संक्रमण का खतरा बढ़ा सकती हैं। इनमें ड्रॉपर की टिप को आंख या त्वचा से छुआना, किसी दूसरे व्यक्ति की आई ड्रॉप इस्तेमाल करना, इस्तेमाल के बाद बोतल का ढक्कन ठीक से बंद न करना, बोतल को बहुत ज्यादा गर्मी या धूप में रखना और निर्धारित समय से काफी ज्यादा समय तक बोतल का इस्तेमाल करना शामिल हैं।

    आई ड्रॉप को सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करने के 6 तरीके

    • आई ड्रॉप डालने से पहले हाथों को अच्छी तरह साफ करें इससे आंखों में संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
    • ड्रॉपर का सिरा आंख, पलकों, स्किन या उंगलियों को नहीं छूना चाहिए।
    • आई ड्रॉप डालने के तुरंत बाद बोतल का कैप लगा दें।
    • बोतल को निर्माता के निर्देश के अनुसार रखें और जरूरत होने पर अत्यधिक गर्मी या सीधी धूप से बचाएं।
    • अपनी आई ड्रॉप किसी दूसरे व्यक्ति के साथ साझा न करें।
    • बोतल खोलने की तारीख उस पर लिख दें। इससे यह याद रखने में आसानी होगी कि इसे कब डिस्कार्ड करना है।

    एक्सपायरी डेट और ओपनिंग डेट में क्या अंतर है?

    एक्सपायरी डेट और बोतल खोलने के बाद इस्तेमाल करने की अवधि अलग-अलग चीजें हैं। बोतल पर दी गई एक्सपायरी डेट आमतौर पर बंद प्रोडक्ट की वैधता से संबंधित होती है। बोतल खोलने के बाद इस्तेमाल की सुरक्षित अवधि के लिए निर्माता के निर्देशों को देखना चाहिए। इसलिए किसी आई ड्रॉप की बोतल पर एक्सपायरी डेट दूर होने का मतलब यह नहीं है कि उसे खोलने के बाद अनिश्चित समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। आई ड्रॉप का इस्तेमाल या उसे दोबारा शुरू करने से पहले डॉक्टर या नेत्र विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। किसी भी दवा को बिना चिकित्सीय सलाह के लंबे समय तक इस्तेमाल न करें।

  • इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    Ration Vastu: घर में रखा राशन केवल दैनिक जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं होता, बल्कि वास्तु शास्त्र में इसे समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से भी जोड़ा गया है। इससे घर का वातावरण संतुलित बना रहता है, जबकि गलत स्थान पर रखा राशन रखना कई तरह की परेशानियों का कारण बन सकता है। तो आइए जानते हैं कि आटा, चावल, दाल और अन्य खाद्य सामग्री रखने के लिए कौन-सी दिशा सही मानी जाती है।

    राशन का वास्तु महत्व

    वास्तु शास्त्र में घर के हर हिस्से और वस्तु के लिए एक विशेष ऊर्जा दिशा बताई गई है। अनाज और खाद्य पदार्थों को भी इसी सिद्धांत से जोड़ा गया है। मान्यता है कि सही स्थान पर रखा राशन घर में बरकत बनाए रखता है। ऐसे में घर में अनाज, दाल, आटा और अन्य राशन सामग्री रखते समय दिशा का ध्यान रखना फायदेमंद माना जाता है।

    दक्षिण-पूर्व दिशा है सबसे शुभ

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) राशन के भंडारण के लिए सबसे उपयुक्त है। यह दिशा अग्नि तत्व से संबंधित होती है, इसलिए यहां रखे गए सूखे खाद्य पदार्थ ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। अगर घर में अलग स्टोर रूम उपलब्ध न हो, तो रसोई के दक्षिण या दक्षिण-पूर्व हिस्से में राशन रखने की सलाह दी जाती है।

    ईशान कोण में न रखें राशन

    उत्तर-पूर्व दिशा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए शुभ मानी जाती है। हालांकि, वास्तु के अनुसार इस दिशा में अनाज या अन्य खाद्य सामग्री रखने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इससे घर में आर्थिक असंतुलन और स्थिरता से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

    इन दिशाओं में भी रखें सावधानी

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम दिशा में लंबे समय तक खाद्य पदार्थ रखने से उनमें नमी, कीड़े या खराब होने की समस्या हो सकती है। विशेषकर मौसम में बदलाव के दौरान यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इसलिए राशन को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां वातावरण सूखा और अनुकूल बना रहे।

    ये दिशा भी नहीं मानी जाती अनुकूल

    वास्तु के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा में भी खाद्य पदार्थों का भंडारण अधिक शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि यहां ऊर्जा का संतुलन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है, जिससे राशन की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इसलिए इस दिशा से बचना बेहतर माना जाता है।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    आजकल कंपनियों में काम का दबाव इस हद तक बढ़ गया है कि इंसान की जान और उसकी गरिमा की कोई कीमत ही नहीं बची है. चीन के हांगझोऊ शहर से एक बेहद डरावनी खबर सामने आई है, जो यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या कॉर्पोरेट दफ्तर अब काम की जगह हैं या टॉर्चर कैंप?

    पहली नौकरी और उम्मीदें

    यांग नाम की एक लड़की ने जून में हांगझोऊ की एक कंपनी में टेली-सेल्स का काम शुरू किया था. नई नौकरी को लेकर वह बहुत खुश और उत्साहित थी, लेकिन उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह नौकरी उसकी जिंदगी का सबसे बुरा सपना बन जाएगी.

    200 स्क्वैट्स या जुर्माना!

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अपना डेली टारगेट पूरा नहीं कर पाई. इसके बाद उसके मैनेजर ने उसे एक ऐसा फरमान सुनाया, जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल उठे. मैनेजर ने कहा कि टारगेट पूरा न होने पर या तो 50 युआन का जुर्माना भरो या फिर 200 उठक-बैठक करो. यांग आर्थिक रूप से कमजोर थी और उसके पास जुर्माना भरने के पैसे नहीं थे. मजबूरी में उसने ऑफिस में ही रोते-बिलखते हुए 200 स्क्वैट्स किए और सबूत के तौर पर मैनेजर को वीडियो भेजा.

    जानलेवा बीमारी की चपेट में

    इतनी भारी कसरत के बाद यांग के पैरों की हालत खराब हो गई और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. उसने 5 दिन तक चुपचाप दर्द सहा, लेकिन जब उसके पेशाब का रंग काला-भूरा होने लगा, तो वह डरकर अस्पताल भागी.

    डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि वह रैबडोमायोलिसिस (Rhabdomyolysis) नाम की खतरनाक बीमारी की शिकार हो चुकी है. ज्यादा दबाव की वजह से उसकी मांसपेशियां अंदर से टूटने लगी थीं और उनका जहरीला कचरा खून में मिल गया था. गनीमत रही कि समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच गई, वरना उसकी किडनी फेल भी हो सकती थी.

    कंपनी की बेशर्मी

    तबीयत बिगड़ने के बाद यांग ने 30 जुलाई को नौकरी छोड़ दी. इलाज का खर्च और मुआवजे के तौर पर जब उसने कंपनी से 15,000 युआन मांगे, तो मैनेजर ने पैसे देने से साफ इनकार कर दिया और उल्टा कोर्ट जाने की धमकी दी. अब यांग ने हिम्मत जुटाकर श्रम विभाग और मीडिया का दरवाजा खटखटाया है. चीन के कानून के मुताबिक कर्मचारियों को शारीरिक सजा देना गैर-कानूनी है

  • घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    Vastu Shastra For Mirror: घर की सजावट में शीशे का इस्तेमाल आम बात है। शीशा कमरे को बड़ा और रोशन दिखाने में मदद करता है। लेकिन वास्तु शास्त्र में शीशे की दिशा और उसकी स्थिति को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, सही जगह पर लगा शीशा सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक हो सकता है, जबकि गलत दिशा या गलत स्थान पर लगाया गया शीशा घर के माहौल की सकारात्मकता को खत्म कर सकता है।

    खास तौर पर बेडरूम, मुख्य द्वार और दक्षिण-पश्चिम दिशा में शीशा लगाते समय सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। आइए जानते हैं घर में शीशा लगाने के 5 जरूरी वास्तु नियम, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए।

    1. उत्तर या पूर्व दिशा में लगाएं शीशा

    वास्तु के अनुसार घर में शीशा लगाने के लिए उत्तर और पूर्व दिशा को सामान्यतः शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को धन और समृद्धि से तथा पूर्व दिशा को सूर्य के प्रकाश और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। इसलिए इन दिशाओं की दीवार पर शीशा लगाना बेहतर माना जाता है।

    2. मुख्य दरवाजे के ठीक सामने न लगाएं

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, घर के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने शीशा लगाने से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि दरवाजे से घर में आने वाली सकारात्मक ऊर्जा शीशे से वापस बाहर की ओर परावर्तित हो सकती है। इसलिए मुख्य द्वार के सामने शीशा लगाने के बजाय इसे किसी साइड की दीवार पर लगाना बेहतर माना जाता है।

    3. बेड के सामने शीशा लगाने से बचें

    बेडरूम में शीशे की स्थिति को लेकर वास्तु में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। बेड का प्रतिबिंब शीशे में दिखाई देना वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि इससे बेचैनी और नींद में परेशानी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। यदि कमरे में ड्रेसिंग मिरर है, तो उसे इस तरह रखें कि उसमें बेड दिखाई न दे।

    4. टूटा या चटका हुआ शीशा घर में न रखें

    वास्तु मान्यताओं में टूटे, चटके शीशे को घर में रखना अशुभ माना जाता है। इसलिए अगर शीशा टूट गया है या उसमें दरार आ गई है, तो उसे जल्द बदल देना बेहतर है।

    5. दक्षिण-पश्चिम दिशा में शीशा लगाने से बचें

    वास्तु के अनुसार, शीशे के लिए दक्षिण और खासकर दक्षिण-पश्चिम दिशा को अच्छा नहीं माना जाता। इसके बजाय उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है।

    शीशा लगाते समय इन बातों का भी रखें ध्यान

    शीशा हमेशा साफ और अच्छी स्थिति में रखें। वास्तु मान्यताओं के अनुसार शीशे में जो चीज दिखती है, उसका प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए कोशिश करें कि शीशे में कूड़ा, अव्यवस्था, टूटी-फूटी वस्तुएं या अस्त-व्यस्त जगह शीशे में नहीं दिखाई दें। इसके बजाय साफ-सुथरा और रोशन स्थान प्रतिबिंबित होना बेहतर माना जाता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026

  •  ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

     ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

     ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

    भारत में तो दो-चार चक्कर गाड़ी आगे-पीछे करके आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस (Driving Licence) मिल जाता है, लेकिन विदेश में यह किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है. नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय शख्स विनोद को वहां लाइसेंस पाने के लिए पूरे दो साल तक पापड़ बेलने पड़े और जेब से करीब 6 लाख रुपए (आज के समय में जिसकी वैल्यू 10 लाख से ज्यादा है) खर्च करने पड़ गए. सोशल मीडिया पर उनका यह किस्सा वायरल हो रहा है, जिस पर लोग तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं.

    बर्फ और पहाड़ों के बीच ड्राइविंग की कड़ी चुनौती

    साल 2011 में नॉर्वे शिफ्ट हुए विनोद को जल्द ही समझ आ गया कि वहां की कड़ाके की ठंड, बर्फबारी और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर जिंदा रहना है तो ड्राइविंग आनी ही चाहिए. उन्होंने गाड़ी चलाना सीख भी लिया, लेकिन नॉर्वे का सिस्टम इतना आसान नहीं है. वहां लाइसेंस के लिए केवल गाड़ी चलाना आना काफी नहीं होता, बल्कि कई अनिवार्य कोर्स, थ्योरी टेस्ट, कड़ा सुरक्षा प्रशिक्षण और बर्फीली सड़कों व सुरंगों में लंबा अभ्यास करना पड़ता है.

    पहली बार फेल, फिर दो महीने की एक्सट्रा मेहनत

    वहां के ड्राइविंग स्कूल एक-एक घंटे की ट्रेनिंग का मोटा पैसा वसूलते हैं, जिससे खर्च काफी बढ़ जाता है. कड़ी ट्रेनिंग लेने के बाद भी जब विनोद फाइनल टेस्ट में बैठे, तो वे पहली बार फेल हो गए. लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने दो महीने और पसीना बहाया और तब जाकर दूसरी कोशिश में उन्हें कामयाबी हासिल हुई. इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें दो साल लग गए.

    सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

    विनोद की यह आपबीती अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रही है. लोग भारत और नॉर्वे के नियमों की तुलना कर रहे हैं. भारत में बिना किसी खास ट्रेनिंग के आसानी से मिलने वाले लाइसेंस और देश में लगातार बढ़ते सड़क हादसों को लेकर इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई है. नॉर्वे की इस सख्त व्यवस्था का मुख्य मकसद सिर्फ आपकी ड्राइविंग स्किल परखना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आप सड़क पर चलने वाले बाकी लोगों की जान के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार हैं या नहीं.

  • मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    बलिया. यूपी के बलिया जिले के शिवपुर दियरी नंबरी गांव में चौंकाने वाला मामला सामने आया है. जिस बुजुर्ग व्यक्ति को परिजनों ने मृत मान लिया था, वही अस्पताल ले जाने पर जिंदा निकले. 65 वर्षीय विश्वनाथ पाल बेहोशी के हाथ-पैर बिल्कुल काम नहीं कर रहे थे. शरीर में हरकत ना होने पर परिजनों ने उनको तुलसी-गंगाजल भी दे दिया. परिजनों ने सोचा कि उनकी सांसें थम चुकी हैं. तुलसी-गंगाजल देने की खबर पूरे गांव में फैल गई. ग्रामीण रविंद्र बागड़ ने पूरे मामले की जानकारी दी.

    ग्रामीणों की भीड़ लग गई. इसी बीच कुछ लोगों ने बुजुर्ग विश्वनाथ पाल को एक बार अस्पताल ले जाने की सलाह दी. जैसे ही परिजन विश्वनाथ को अस्पताल लेकर पहुंचे, डॉक्टर ने जो कहा उसे सुनकर परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. डॉक्टर ने कहा कि ‘बाबा तो अभी जिंदा हैं.’ जिस घर में मातम की तैयारी हो रही थी, वहां अचानक खुशी लौट आई. बेटा भी लगभग उम्मीद छोड़ चुका था लेकिन पिता की सांसें चलती देख उसकी आंखों से खुशी के आंसू आ गए. अब बेटा जिला अस्पताल में अपने पिता का इलाज करा रहा है.

    ‘इलाज के दौरान पिता जिंदा निकले’

    विश्वनाथ पाल के बेटे दयाशंकर पाल ने बताया, ‘मैं घर से बाहर था. अचानक सूचना मिली कि पिताजी का बोलचाल बंद हो गया था. हाथ-पैर भी काम करना बंद कर दिए हैं. घर आकर देखा कि भीड़ लगी है. परिजन रो रहे थे. यह सब देखकर मन दुखित हो गया. धीरे-धीरे विश्वास हो गया था कि उनके पिताजी इस दुनिया को छोड़कर चले गए हैं. फिर सोचा गया कि हॉस्पिटल चला जाए. प्राथमिक इलाज के दौरान पिता जिंदा निकले तो खुशी की लहर दौड़ गई.’

    ‘मुंह से शब्द नहीं निकले’

    दयाशंकर ने कहा, ‘हॉस्पिटल आने के बाद जो खुशी मिली है, उसे शब्दों में बयां नहीं जा सकता है. केवल अनुभव किया जा सकता है. जब डॉक्टर ने अचानक बोला कि यह तो अभी जिंदा है. उस समय कुछ देर तक मेरे मुंह से शब्द नहीं निकले. केवल आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे.’