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  • खाना खाते ही फूलने लगता: है पेट? गैस और ब्लोटिंग से राहत पाने के लिए अपनाएं ये 4 आसान तरीके.

    खाना खाते ही फूलने लगता: है पेट? गैस और ब्लोटिंग से राहत पाने के लिए अपनाएं ये 4 आसान तरीके.

    खाना खाते ही फूलने लगता: है पेट? गैस और ब्लोटिंग से राहत पाने के लिए अपनाएं ये 4 आसान तरीके.

    खाना खाने के तुरंत बाद पेट फूलना, भारीपन महसूस होना या गैस बनने की समस्या कई लोगों को परेशान करती है। खासकर जब आप जरूरत से ज्यादा खाना खा लेते हैं या भोजन में तली-भुनी और ज्यादा वसा वाली चीजें शामिल होती हैं, तो पेट में असहजता महसूस हो सकती है। कभी-कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर पेट फूलने की समस्या बार-बार होने लगे और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    बेंगलुरु के साइटकेयर हॉस्पिटल्स में जीआई एवं एचपीबी सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. आदित्य वी. नरगुंड के अनुसार, जरूरत से ज्यादा भोजन करने पर पेट फैल सकता है और भोजन को पाचन तंत्र से आगे बढ़ने में अधिक समय लग सकता है। इससे पेट में भारीपन, दबाव और असहजता महसूस हो सकती है। इसके अलावा, पाचन के दौरान आंतों में बनने वाली गैस भी ब्लोटिंग की परेशानी बढ़ा सकती है।

    आखिर खाना खाने के बाद पेट क्यों फूलता है?

    पेट फूलने यानी ब्लोटिंग के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें एक बार में ज्यादा खाना, जल्दी-जल्दी भोजन करना, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पीना और कुछ खाद्य पदार्थों को ठीक से पचा न पाना शामिल हैं।

    ज्यादा वसा वाला भोजन पेट से खाना आगे बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। वहीं, जल्दी खाने के दौरान हवा निगलने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे डकार और पेट में गैस की परेशानी हो सकती है।

    कुछ लोगों को दूध या दूध से बने उत्पादों, दालों, कुछ सब्जियों और दूसरे विशेष खाद्य पदार्थों से भी गैस बन सकती है। इसके अलावा कब्ज, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) और पाचन से जुड़ी अन्य समस्याएं भी लगातार ब्लोटिंग का कारण हो सकती हैं।

    हालांकि, हर बार पेट फूलने का मतलब यह नहीं है कि पाचन तंत्र में कोई गंभीर बीमारी है। समस्या कितनी बार होती है और उसके साथ कौन-से लक्षण दिखाई देते हैं, इस पर ध्यान देना जरूरी है।

    पेट फूलने और गैस से बचने के लिए अपनाएं ये 4 तरीके

    1. भोजन से पहले फाइबर युक्त चीजें सीमित मात्रा में खाएं

    अगर आप भारी भोजन करने वाले हैं, तो उससे पहले थोड़ी मात्रा में सब्जियां, सलाद या हल्का सूप लेना मददगार हो सकता है। इससे भोजन में विविधता आती है और कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा खाने से बचने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि, फाइबर हर व्यक्ति के पाचन पर एक जैसा असर नहीं डालता। कुछ लोगों को कच्ची सब्जियों या अचानक बहुत ज्यादा फाइबर खाने से गैस और पेट फूलने की परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए अपनी सहनशीलता के अनुसार फाइबर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाएं।

    2. धीरे-धीरे खाएं और भोजन अच्छी तरह चबाएं

    जल्दी-जल्दी खाना खाने से आप जरूरत से ज्यादा भोजन कर सकते हैं और खाते समय अधिक हवा भी निगल सकते हैं। इससे डकार और पेट में असहजता बढ़ सकती है।

    इससे बचने के लिए भोजन आराम से खाएं, हर निवाले को अच्छी तरह चबाएं और खाने के बीच थोड़ा समय लें। पेट भरने का एहसास होने पर खाना रोक दें। इससे एक बार में बहुत ज्यादा खाने की आदत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    3. खाने के साथ सोडा और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स लेने से बचें

    सोडा, स्पार्कलिंग ड्रिंक्स और दूसरे कार्बोनेटेड पेय पदार्थों में घुली गैस पेट में पहुंचकर डकार और पेट फूलने की परेशानी बढ़ा सकती है। अगर आपको खाना खाने के बाद अक्सर ब्लोटिंग होती है, तो इन पेय पदार्थों का सेवन कम करके देखें।

    भोजन के दौरान अपनी प्यास के अनुसार पानी पिएं। सामान्य रूप से पानी पीने से बचने की जरूरत नहीं है। अगर एक बार में बहुत ज्यादा पानी पीने से आपको भारीपन महसूस होता है, तो थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी पी सकते हैं।

    4. खाना खाने के बाद 10 से 15 मिनट हल्की सैर करें

    भारी भोजन के बाद तुरंत लेटने के बजाय थोड़ी देर हल्की सैर करना उपयोगी हो सकता है। भोजन के बाद 10 से 15 मिनट आरामदायक गति से चलने से पाचन तंत्र की सामान्य गतिविधियों को सहारा मिल सकता है।

    इसके लिए तेज व्यायाम करने या खुद को थकाने की जरूरत नहीं है। हल्की सैर को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और भोजन के तुरंत बाद लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से बचें।

    किन खाद्य पदार्थों से बढ़ सकती है ब्लोटिंग की समस्या?

    कुछ लोगों में विशेष खाद्य पदार्थ पेट फूलने की परेशानी बढ़ा सकते हैं। इनमें शामिल हैं:

    • तली-भुनी और अधिक वसा वाली चीजें।
    • सोडा और दूसरे कार्बोनेटेड पेय।
    • दूध या दूध से बने उत्पाद, खासकर लैक्टोज असहिष्णुता होने पर।
    • कुछ दालें, बीन्स और गैस बनाने वाली सब्जियां।
    • बहुत ज्यादा मात्रा में एक साथ खाया गया भोजन।
    • कुछ लोगों में चीनी के विकल्प वाले उत्पाद, जैसे सोर्बिटोल युक्त खाद्य पदार्थ।

    हर व्यक्ति के लिए समस्या पैदा करने वाले खाद्य पदार्थ अलग हो सकते हैं। इसलिए बिना कारण सभी खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट से हटाने के बजाय यह ध्यान दें कि किस चीज को खाने के बाद परेशानी बढ़ती है।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है?

    अगर पेट फूलने की समस्या बार-बार हो रही है, लंबे समय तक बनी रहती है या खानपान में बदलाव के बावजूद ठीक नहीं होती, तो डॉक्टर से सलाह लें। इसके पीछे कब्ज, खाद्य असहिष्णुता या पाचन तंत्र से जुड़ी दूसरी समस्या हो सकती है।

    पेट में तेज या लगातार दर्द, बार-बार उल्टी, मल में खून, बिना कोशिश वजन कम होना या लगातार भूख कम लगने जैसे लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच कराएं। अगर पेट बहुत ज्यादा फूल रहा हो और साथ में मल या गैस बिल्कुल नहीं निकल रही हो, खासकर दर्द या उल्टी के साथ, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और उपलब्ध विशेषज्ञ सलाह पर आधारित है। पेट फूलने के कारण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर से परामर्श लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।

  • वाराणसी: दो भागों में बंटा है गौरी केदारेश्वर मंदिर का शिवलिंग, मान्यता है कि भोलेनाथ स्वयं ग्रहण करते हैं भोग.

    वाराणसी: दो भागों में बंटा है गौरी केदारेश्वर मंदिर का शिवलिंग, मान्यता है कि भोलेनाथ स्वयं ग्रहण करते हैं भोग.

    वाराणसी: दो भागों में बंटा है गौरी केदारेश्वर मंदिर का शिवलिंग, मान्यता है कि भोलेनाथ स्वयं ग्रहण करते हैं भोग.

    वाराणसी: काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। यहां के प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी बनावट, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में एक है केदार घाट के पास स्थित गौरी केदारेश्वर मंदिर। यहां स्थापित शिवलिंग का स्वरूप दूसरे शिव मंदिरों से अलग बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव-माता पार्वती के साथ भगवान विष्णु-माता लक्ष्मी के स्वरूप की भी प्रतीकात्मक उपस्थिति मानी जाती है।

    इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता भक्तों का ध्यान खींचती है। कहा जाता है कि भगवान शिव यहां अर्पित किया गया भोग स्वयं ग्रहण करने आते हैं। यही वजह है कि काशी आने वाले अनेक श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन और पूजा करने पहुंचते हैं।

    दो भागों में दिखाई देता है शिवलिंग का स्वरूप

    गौरी केदारेश्वर मंदिर का शिवलिंग अपने विशेष आकार के लिए जाना जाता है। धार्मिक मान्यता में इसके एक भाग को भगवान शिव और माता पार्वती से, जबकि दूसरे भाग को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। इसी कारण इसे हरि और हर यानी भगवान विष्णु तथा भगवान शिव के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक भी माना जाता है।

    मंदिर की परंपरा में देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों की एकता का भाव दिखाई देता है। भक्त मानते हैं कि यहां दर्शन करने से भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ये धार्मिक मान्यताएं श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हैं।

    काशी विश्वनाथ मंदिर से भी प्राचीन माना जाता है

    केदार घाट के निकट स्थित इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यह काशी विश्वनाथ मंदिर से भी प्राचीन है। मंदिर की प्राचीनता से जुड़ी परंपराएं इसे काशी के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में स्थान देती हैं।

    कहा जाता है कि काशी की यात्रा के दौरान इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी यहां दर्शन किए थे और मंदिर की व्यवस्था को बेहतर बनाने में योगदान दिया था। अहिल्याबाई होल्कर ने देश के कई प्रमुख तीर्थस्थलों और मंदिरों के संरक्षण तथा निर्माण कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    ऋषि मांधाता की तपस्या से जुड़ी है पौराणिक कथा

    गौरी केदारेश्वर मंदिर के बारे में प्रचलित पौराणिक कथा ऋषि मांधाता की तपस्या से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, ऋषि मांधाता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इसी स्थान पर अपने स्वरूप में विराजमान होने की बात कही।

    कथा के अनुसार, भगवान शिव ने यह भी बताया था कि अलग-अलग युगों में इस शिवलिंग का स्वरूप अलग होगा। सतयुग में इसे नवरत्नों से बना, त्रेतायुग में स्वर्णमय, द्वापरयुग में रजतमय और कलियुग में पत्थर के स्वरूप में माना गया। धार्मिक परंपरा में इस शिवलिंग को भक्तों की शुभ मनोकामनाएं पूरी करने वाला बताया जाता है।

    शिवलिंग में मां अन्नपूर्णा के निवास की मान्यता

    मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता मां अन्नपूर्णा से संबंधित है। कहा जाता है कि शिवलिंग का संबंध अन्न और अन्नपूर्णा की कृपा से भी है। मान्यता के अनुसार, यहां श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करने वाले भक्तों के घर में अन्न की कमी नहीं रहती और परिवार पर मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।

    काशी में मां अन्नपूर्णा को भोजन और पोषण की देवी माना जाता है। इस वजह से मंदिर की परंपरा में अन्न और भोग का विशेष महत्व बताया जाता है।

    यहां चार पहर की आरती और खिचड़ी के भोग की परंपरा

    गौरी केदारेश्वर मंदिर की पूजा-विधि भी इसकी खास पहचान मानी जाती है। प्रचलित जानकारी के अनुसार, यहां पुजारी बिना सिले हुए वस्त्र पहनकर चार पहर की आरती करते हैं। भगवान को बेलपत्र, दूध और गंगाजल अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही खिचड़ी का भोग लगाने की परंपरा भी बताई जाती है।

    भक्तों की मान्यता है कि भगवान शिव इस मंदिर में भोग ग्रहण करने स्वयं आते हैं। यह विश्वास मंदिर की स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व होने के कारण इस तरह के प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं की आस्था और बढ़ जाती है।

    सावन में क्यों खास है गौरी केदारेश्वर मंदिर?

    सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करके सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। काशी के गौरी केदारेश्वर मंदिर में भी भक्त विशेष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।

    मंदिर का अनोखा शिवलिंग, ऋषि मांधाता से जुड़ी कथा और अन्नपूर्णा की कृपा से संबंधित मान्यताएं इसे काशी के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं। यहां की परंपराएं इस बात को दर्शाती हैं कि काशी में मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था और संस्कृति के केंद्र भी हैं।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में वर्णित पौराणिक कथाएं और भोग ग्रहण करने से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं एवं स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।

  • नानी के साथ एक ही कमरे: में सोया था नाती, आधी रात को उठा और चाकू से किए ताबड़तोड़ वार; हत्या की वजह बनी पहेली.

    नानी के साथ एक ही कमरे: में सोया था नाती, आधी रात को उठा और चाकू से किए ताबड़तोड़ वार; हत्या की वजह बनी पहेली.

    नानी के साथ एक ही कमरे: में सोया था नाती, आधी रात को उठा और चाकू से किए ताबड़तोड़ वार; हत्या की वजह बनी पहेली.

    बिहार के गोपालगंज में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने परिवार और आसपास के लोगों को स्तब्ध कर दिया। जिस बुजुर्ग महिला ने अपने नाती को परिवार का हिस्सा मानकर अपने पास जगह दी थी, उसी पर उसकी हत्या करने का आरोप लगा। रात में सभी लोग एक ही कमरे में सो रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद घर में चीख-पुकार मच जाएगी और एक परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी।

    घटना कटेया थाना क्षेत्र के बनरहां गांव की बताई गई है। मृतका की पहचान 85 वर्षीय कोईलासी खातून के रूप में हुई। हत्या का आरोप उनके 21 वर्षीय नाती साहेब हुसैन पर लगा। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, इतनी गंभीर वारदात के पीछे की असली वजह का तत्काल खुलासा नहीं हो सका था।

    तबीयत खराब होने पर मामा के घर आया था युवक

    पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, आरोपी मूल रूप से भोरे थाना क्षेत्र के ईमिलिया गांव का रहने वाला था। वह बचपन से ही अपने मामा के घर बनरहां गांव में रहता आया था। हालांकि, पिछले कुछ दिनों से वह अपने गांव में रह रहा था।

    बताया गया कि इसी दौरान उसकी तबीयत खराब हो गई। इसके बाद वह शुक्रवार को दोबारा मामा के घर पहुंचा। परिवार को शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि वहां बिताई जा रही रात इतनी दर्दनाक घटना की गवाह बन जाएगी।

    खाना खाकर सोया परिवार, रात करीब दो बजे मची अफरातफरी

    रविवार की रात परिवार ने सामान्य तरीके से खाना खाया। इसके बाद आरोपी अपनी नानी और ममेरे भाई के साथ एक ही कमरे में सो गया। रात करीब दो बजे अचानक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरे घर को दहला दिया।

    रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी अचानक उठा और चाकू से अपनी नानी पर लगातार हमला कर दिया। महिला के सिर पर भी कई वार किए जाने की बात सामने आई। बताया गया कि उन पर करीब 24 बार चाकू से वार किया गया था। गंभीर चोटों के कारण बुजुर्ग महिला की मौके पर ही मौत हो गई।

    कमरे में मौजूद ममेरे भाई ने जब यह सब देखा तो वह घबरा गया। वह शोर मचाते हुए कमरे से बाहर भागा और आसपास के लोगों को जगाया। आवाज सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक महिला की जान जा चुकी थी।

    गांव में जुटे लोग, पुलिस ने आरोपी को पकड़ा

    घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची। वारदात की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू की और काफी मशक्कत के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

    महिला के शव को पोस्टमार्टम के लिए गोपालगंज सदर अस्पताल भेजा गया। सोमवार को फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और जरूरी साक्ष्य जुटाए। पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल किए गए चाकू समेत अन्य सामान बरामद किए जाने की जानकारी दी।

    आखिर नानी की हत्या क्यों की? पुलिस तलाश रही जवाब

    इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यही था कि युवक ने अपनी 85 वर्षीय नानी पर हमला क्यों किया। उपलब्ध रिपोर्ट में हत्या की स्पष्ट वजह सामने नहीं आई थी। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही थी और घटना से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही थी।

    फिलहाल, परिवार के भीतर हुई इस वारदात ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बुजुर्ग महिला की जान चली गई और घटना का प्रत्यक्षदर्शी रहा परिवार का सदस्य भी गहरे सदमे में पहुंच गया। हत्या के पीछे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

    डिस्क्लेमर: यह कहानी उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में दी गई जानकारी के आधार पर लिखी गई है। हत्या के पीछे की वजह की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

  • हिसार: रात में पति-पत्नी के बीच हुआ झगड़ा, 42 वर्षीय महेश की गला दबाने से मौत; पत्नी सीमा गिरफ्तार

    हिसार: रात में पति-पत्नी के बीच हुआ झगड़ा, 42 वर्षीय महेश की गला दबाने से मौत; पत्नी सीमा गिरफ्तार

    हिसार: रात में पति-पत्नी के बीच हुआ झगड़ा, 42 वर्षीय महेश की गला दबाने से मौत; पत्नी सीमा गिरफ्तार

    हिसार: हरियाणा के हिसार जिले के सातरोड खास गांव में 42 वर्षीय महेश की मौत के मामले में पुलिस ने उसकी पत्नी सीमा को गिरफ्तार किया है। मृतक के भाई ने आरोप लगाया था कि पति-पत्नी के बीच रात में विवाद हुआ था और इसी दौरान महेश को चोटें पहुंचाने के बाद उसका गला दबाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला दबाना बताया गया है। पुलिस अब आरोपी महिला से पूछताछ कर मामले की परिस्थितियों और घटनाक्रम का पता लगाने में जुटी है।

    पति-पत्नी के बीच अक्सर होता था विवाद

    पुलिस के अनुसार, महेश अपनी पत्नी सीमा और बच्चों के साथ सातरोड खास गांव में किराये के मकान में रहता था। मृतक के भाई सुरेश ने पुलिस को बताया कि दोनों के बीच अक्सर घरेलू मामलों को लेकर झगड़े होते रहते थे।

    सुरेश के मुताबिक, महेश की मौत की सूचना मिलने पर वह मौके पर पहुंचा तो उसका भाई फोल्डिंग पर मृत अवस्था में पड़ा हुआ था। इसके बाद उसने पुलिस को शिकायत दी और संदेह जताया कि रात में पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि इसी दौरान सीमा ने महेश को चोटें पहुंचाईं और गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।

    पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले में कार्रवाई करते हुए सीमा को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, घटना के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों और आरोपी की भूमिका से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    पोस्टमार्टम में गला दबाने से मौत की पुष्टि

    महेश के शव को पोस्टमार्टम के लिए हिसार के नागरिक अस्पताल ले जाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, रविवार शाम शव अस्पताल पहुंचने के बाद पोस्टमार्टम नहीं हो सका। सोमवार दोपहर तक प्रक्रिया शुरू नहीं होने पर परिजनों ने अस्पताल के प्रधान चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) से शिकायत की।

    परिजनों को बताया गया कि संबंधित डॉक्टर किसी मामले के सिलसिले में अदालत गए हुए थे। इसके बाद डॉक्टर से संपर्क किया गया और शव को दूसरे स्थान पर भेजने की बात भी सामने आई। पुलिसकर्मियों ने भी चिकित्सा अधिकारियों से बातचीत की। अंततः सोमवार दोपहर करीब एक बजे डॉक्टरों के बोर्ड ने पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू की।

    पोस्टमार्टम में महेश की मौत का कारण गला दबाना सामने आया। उसकी गर्दन पर नाखूनों जैसे निशान भी मिले। इसके अलावा शरीर के अन्य हिस्सों पर चोटों के निशान होने की जानकारी दी गई है।

    पुलिस रिमांड पर लेकर करेगी पूछताछ

    पुलिस ने सुरेश के बयान के आधार पर मामला दर्ज कर सीमा को गिरफ्तार किया है। अब उससे पूछताछ कर यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि घटना से पहले पति-पत्नी के बीच क्या हुआ था और महेश को लगी चोटों की परिस्थितियां क्या थीं।

    पुलिस मामले से जुड़े साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच कर रही है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के अनुसार आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है। आरोपी की दोषसिद्धि का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

  • सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    सैनिकों को अब सीधे सप्लाई: डिपो में मिलेगा भारत राइस, 10 और 30 किलो के पैकेट में होगी सप्लाई; जानिए सेना को क्या होगा फायदा

    भारतीय सैनिकों के राशन की गुणवत्ता और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने ‘भारत राइस’ योजना शुरू की है। इस पहल के तहत जवानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले चावल की आपूर्ति की जाएगी। चावल 10 और 30 किलोग्राम के पैकेट में सेना के अधिकृत सप्लाई डिपो तक पहुंचाया जाएगा। इससे खास तौर पर दूरदराज और दुर्गम इलाकों में तैनात सैनिकों तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था को आसान बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 अक्टूबर को नई दिल्ली में इस योजना की शुरुआत की। इसका उद्देश्य सैनिकों को बेहतर गुणवत्ता का चावल उपलब्ध कराने के साथ-साथ राशन की खरीद, पैकेजिंग और परिवहन की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

    क्या है सैनिकों के लिए शुरू की गई भारत राइस योजना?

    भारत राइस योजना के तहत भारतीय सेना को तय गुणवत्ता मानकों के अनुसार तैयार किया गया चावल उपलब्ध कराया जाएगा। इस व्यवस्था में चावल की प्रोसेसिंग और गुणवत्ता की जांच पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि जवानों को निर्धारित मानकों के अनुरूप अनाज मिल सके।

    रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026-27 में नेफेड (NAFED) के माध्यम से चावल की आपूर्ति की व्यवस्था की गई है। इसमें चावल की गुणवत्ता, पैकेजिंग और सेना के सप्लाई डिपो तक पहुंचाने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर जोर रहेगा।

    इस पहल का उद्देश्य केवल राशन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसकी आपूर्ति को अधिक सुविधाजनक और भरोसेमंद बनाना भी है।

    10 और 30 किलो के पैकेट में क्यों मिलेगा चावल?

    सेना के जवान कई बार ऐसे इलाकों में तैनात रहते हैं, जहां राशन पहुंचाना आसान नहीं होता। लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्र, पहाड़ी सीमाएं और पूर्वोत्तर के दूरदराज इलाके रसद पहुंचाने के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।

    ऐसे क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए भारत राइस की पैकेजिंग 10 और 30 किलोग्राम के बैग में की जाएगी। इससे राशन को अलग-अलग जरूरतों के अनुसार बांटना, संभालना और परिवहन करना आसान हो सकता है।

    छोटे पैकेट उन स्थानों पर विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं, जहां भारी मात्रा में राशन एक साथ ले जाना मुश्किल होता है। वहीं, बड़े पैकेटों के जरिए सप्लाई डिपो में राशन का भंडारण और वितरण व्यवस्थित किया जा सकेगा।

    सेना को क्या होंगे भारत राइस योजना के फायदे?

    1. चावल की गुणवत्ता पर रहेगा ध्यान

    योजना के तहत चावल को निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार करने और उसकी गुणवत्ता की जांच पर जोर दिया जाएगा। इससे सैनिकों को मिलने वाले राशन की गुणवत्ता बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    2. सप्लाई डिपो तक सीधे पहुंचेगा राशन

    रिपोर्ट के अनुसार, चावल को सेना के अधिकृत सप्लाई डिपो तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी। इससे राशन की आवाजाही को व्यवस्थित करने और आपूर्ति से जुड़े कामकाज को आसान बनाने में मदद मिल सकती है।

    3. दुर्गम इलाकों में परिवहन होगा सुविधाजनक

    10 और 30 किलो के पैकेट में चावल उपलब्ध होने से अलग-अलग स्थानों की जरूरत के हिसाब से राशन भेजना और संभालना आसान हो सकता है। इससे दूरस्थ सैन्य चौकियों तक खाद्यान्न पहुंचाने की व्यवस्था को लाभ मिलने की उम्मीद है।

    4. समय और संसाधनों की बचत

    राशन की आपूर्ति के लिए तय व्यवस्था और पैकेजिंग से परिवहन तथा वितरण की प्रक्रिया अधिक कुशल बन सकती है। इससे सेना के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।

    योजना तैयार करने में 18 महीने तक चला समन्वय

    इस पहल को लागू करने के लिए भारतीय सेना, भारतीय खाद्य निगम (FCI), नेफेड और केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के बीच समन्वय किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, योजना तैयार करने की प्रक्रिया में करीब 18 महीने तक विचार-विमर्श चला।

    यह सहयोग इसलिए अहम है, क्योंकि सेना को नियमित रूप से बड़ी मात्रा में खाद्यान्न की जरूरत होती है। ऐसे में गुणवत्ता, भंडारण, पैकेजिंग और समय पर आपूर्ति के बीच तालमेल बनाए रखना जरूरी है।

    आपात स्थिति में सेना को मिलेगी अतिरिक्त रसद सहायता

    इसी कार्यक्रम के दौरान भारतीय सेना और भारतीय खाद्य निगम के बीच पांच साल के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) किए जाने की भी जानकारी दी गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य सैन्य आपातकाल या युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेना को खाद्यान्न की आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत करना है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर एफसीआई के भंडारण संसाधनों और सामग्री संभालने से जुड़े इंतजामों का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

    किसी भी आपात स्थिति में सैनिकों तक समय पर राशन और जरूरी सामान पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए इस तरह की व्यवस्था सेना की रसद तैयारियों को मजबूत करने में उपयोगी हो सकती है।

    ‘जय जवान, जय किसान’ की भावना से जुड़ी पहल

    भारत राइस योजना को सैनिकों की जरूरतों और खाद्यान्न आपूर्ति व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल बनाने की पहल के रूप में देखा जा सकता है। सैनिकों को अच्छी गुणवत्ता का राशन उपलब्ध कराना उनकी दैनिक जरूरतों और कल्याण से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

    हालांकि, योजना का वास्तविक असर चावल की गुणवत्ता, आपूर्ति की नियमितता और दुर्गम क्षेत्रों तक वितरण की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगा। आने वाले समय में इसके क्रियान्वयन से पता चलेगा कि इस व्यवस्था से सेना की रसद प्रणाली को कितना लाभ मिलता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। योजना के क्रियान्वयन, आपूर्ति की मात्रा और इसके वास्तविक परिणामों से संबंधित विस्तृत जानकारी आधिकारिक घोषणाओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

  • नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में साबूदाना या मखाना, कौन-सा है ज्यादा हेल्दी? वजन घटाने और ब्लड शुगर के मरीजों के लिए जानें सही विकल्प.

    नवरात्र में व्रत रखने वाले लोग फलाहार के लिए साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना वड़ा और भुने हुए मखाने जैसे विकल्प चुनते हैं। दोनों ही व्रत के दौरान काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन अगर आप अपनी सेहत, वजन और ब्लड शुगर का ध्यान रख रहे हैं, तो सवाल उठता है कि साबूदाना खाना बेहतर है या मखाना?

    पोषण के लिहाज से दोनों में अंतर है। साबूदाना मुख्य रूप से स्टार्च यानी कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है, जो शरीर को ऊर्जा देता है। वहीं, मखाने में कार्बोहाइड्रेट के साथ कुछ प्रोटीन, फाइबर और खनिज भी पाए जाते हैं। हालांकि, किसी एक खाद्य पदार्थ को हर व्यक्ति के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता। इसका असर खाने की मात्रा, बनाने के तरीके और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

    साबूदाना और मखाना में क्या है पोषण का अंतर?

    साबूदाना और मखाना दोनों व्रत के दौरान खाए जाते हैं, लेकिन इनके पोषक तत्वों की संरचना अलग-अलग होती है।

    साबूदाना: यह मुख्य रूप से कसावा (टैपिओका) के स्टार्च से बनाया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है, जबकि प्रोटीन और फाइबर बहुत कम मात्रा में होते हैं। यही वजह है कि साबूदाना शरीर को ऊर्जा तो देता है, लेकिन इसे अकेले खाने से संतुलित पोषण नहीं मिलता।

    मखाना: यह जलीय पौधे के बीजों से तैयार किया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट के साथ कुछ प्रोटीन, फाइबर और मैग्नीशियम व फॉस्फोरस जैसे खनिज मिलते हैं। इसे कम घी या तेल में भूनकर खाने से हल्का स्नैक तैयार किया जा सकता है।

    इसलिए पोषण की विविधता के लिहाज से मखाना साबूदाने से बेहतर विकल्प हो सकता है। हालांकि, मखाने में भी कार्बोहाइड्रेट होता है और इसकी मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है।

    वजन कम करने वालों के लिए क्या बेहतर है?

    अगर आप नवरात्र में वजन नियंत्रित रखना चाहते हैं, तो कम घी या तेल में भुने हुए मखाने एक सुविधाजनक स्नैक हो सकते हैं। इनमें कुछ प्रोटीन और फाइबर भी मिलता है, जबकि साबूदाने में मुख्य रूप से स्टार्च होता है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि साबूदाना खाने से वजन जरूर बढ़ेगा या मखाना खाने से वजन घट जाएगा। वजन में बदलाव पूरे दिन की कुल कैलोरी, शारीरिक गतिविधि और खानपान की आदतों पर निर्भर करता है।

    साबूदाना खिचड़ी बनाते समय ज्यादा घी, तेल और आलू डालने से उसकी कुल कैलोरी बढ़ सकती है। इसी तरह मखाने में अधिक घी, चीनी या दूसरे कैलोरी वाले फ्लेवर मिलाने से यह भी ज्यादा कैलोरी वाला स्नैक बन सकता है।

    वजन नियंत्रित रखने के लिए दोनों को सीमित मात्रा में खाएं और दिनभर के भोजन में पोषण का संतुलन बनाए रखें।

    डायबिटीज के मरीजों के लिए कौन-सा विकल्प बेहतर है?

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों को व्रत के दौरान खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साबूदाने में कार्बोहाइड्रेट अधिक और फाइबर बहुत कम होता है। इसलिए इसे ज्यादा मात्रा में खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है।

    मखाने में भी कार्बोहाइड्रेट होता है, इसलिए इसे ब्लड शुगर के लिए पूरी तरह सुरक्षित मानना सही नहीं है। इसकी मात्रा, साथ में खाए जाने वाले दूसरे खाद्य पदार्थ और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति भी मायने रखती है।

    अगर आपको डायबिटीज है और आप नवरात्र का व्रत रखना चाहते हैं, तो पहले डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। खासकर इंसुलिन या ब्लड शुगर कम करने वाली दवाएं लेने वाले लोगों को लंबे समय तक भूखे रहने से हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर बहुत कम होने का खतरा हो सकता है।

    क्या ज्यादा मखाना खाने से कब्ज हो सकती है?

    मखाने को अक्सर हेल्दी स्नैक मानकर लोग बार-बार खाते रहते हैं। हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसे भी जरूरत से ज्यादा खाना उचित नहीं है।

    मखाने में कुछ फाइबर होता है, लेकिन यह फाइबर का बहुत समृद्ध स्रोत नहीं है। कब्ज की समस्या में केवल मखाने की मात्रा ही नहीं, बल्कि पूरे दिन में पानी, फाइबर और शारीरिक गतिविधि का स्तर भी महत्वपूर्ण होता है।

    अगर आपको पहले से कब्ज या पाचन संबंधी परेशानी है, तो मखाना खाने के बाद अपने शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें। पर्याप्त पानी पिएं और फल, सब्जियों तथा अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को अपनी नियमित डाइट में शामिल करें। लगातार कब्ज रहने पर डॉक्टर से सलाह लें।

    नवरात्र में साबूदाना खाने का सही तरीका

    व्रत में साबूदाना खाना पसंद करते हैं, तो इसे कुछ बातों का ध्यान रखकर अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।

    • साबूदाना खिचड़ी बनाते समय घी और तेल की मात्रा सीमित रखें।
    • एक बार में बहुत ज्यादा खाने के बजाय अपनी जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा लें।
    • मूंगफली मिलाने से स्वाद और प्रोटीन की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन इससे कैलोरी भी बढ़ती है।
    • साबूदाने की खीर या मीठे व्यंजन बनाते समय चीनी की मात्रा का ध्यान रखें।
    • डायबिटीज होने पर इसकी मात्रा और सेवन की आवृत्ति डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह के अनुसार तय करें।

    साबूदाने को केवल सात्विक या व्रत का भोजन समझकर पौष्टिकता के लिहाज से संतुलित भोजन का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

    मखाना खाने का बेहतर तरीका क्या है?

    नवरात्र में मखाना खाना चाहते हैं, तो इसे कम घी या तेल में हल्का भूनकर खा सकते हैं। बिना तेल के भूनना भी एक विकल्प है।

    • स्वाद के लिए सीमित मात्रा में काली मिर्च या दूसरे पसंदीदा मसालों का इस्तेमाल करें।
    • बहुत ज्यादा नमक, घी या चीनी डालने से बचें।
    • इसे हेल्दी स्नैक समझकर बार-बार या बहुत अधिक मात्रा में न खाएं।
    • यदि खाने के बाद पेट फूलने या दूसरी पाचन संबंधी परेशानी का अनुभव हो, तो मात्रा कम करें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लें।

    मखाने को हेल्दी बनाने का सबसे आसान तरीका है कि इसे कम तेल और सीमित मसालों के साथ तैयार किया जाए।

    तो नवरात्र में साबूदाना खाएं या मखाना?

    अगर आपका उद्देश्य बेहतर पोषण वाला स्नैक चुनना है, तो कम घी या तेल में भुना मखाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, क्योंकि इसमें साबूदाने की तुलना में कुछ प्रोटीन, फाइबर और खनिज भी मिलते हैं। वहीं, साबूदाना ऊर्जा देने वाला खाद्य पदार्थ है, लेकिन इसमें मुख्य रूप से स्टार्च होता है।

    वजन घटाने या ब्लड शुगर नियंत्रित रखने के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहना सही नहीं है। खाने की मात्रा, पकाने का तरीका, पूरे दिन की डाइट और आपकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। साबूदाना और मखाना खाने का असर उनकी मात्रा, बनाने के तरीके और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। डायबिटीज, कब्ज या पाचन संबंधी समस्या से जूझ रहे लोग अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।

  • विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    विश्वनाथ मंदिर कुतुब मीनार से भी ऊंचा, हिमालय के संत ने चार साल की मनुहार के बाद किया था शिलान्यास:

    वाराणसी: काशी को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां हजारों मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं। इन्हीं में एक है काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर, जिसे बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल शिखर है, जिसकी ऊंचाई दिल्ली के प्रसिद्ध कुतुब मीनार से भी अधिक बताई जाती है।

    मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके निर्माण की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इसकी आधारशिला रखने के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिमालय में रहने वाले संत स्वामी कृष्णाश्रम को आमंत्रित किया था। बताया जाता है कि संत को काशी आने के लिए राजी करने में करीब चार साल लग गए थे।

    252 फीट ऊंचा है मंदिर का शिखर

    BHU के श्री विश्वनाथ मंदिर के शिखर की ऊंचाई लगभग 252 फीट बताई जाती है। वहीं, दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई करीब 239.5 फीट है। इस तरह मंदिर का शिखर कुतुब मीनार से लगभग 12.5 फीट ऊंचा है।

    अपनी ऊंचाई और भव्य बनावट के कारण यह मंदिर विश्वविद्यालय परिसर की प्रमुख पहचान बन चुका है। दूर से दिखाई देने वाला इसका शिखर श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है।

    हालांकि, देश के सबसे ऊंचे मंदिर की चर्चा करते समय कुल संरचना और शिखर की ऊंचाई में अंतर समझना जरूरी है। मध्य प्रदेश के ओरछा स्थित चतुर्भुज मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 344 फीट बताई जाती है, जबकि BHU के विश्वनाथ मंदिर का शिखर अपनी ऊंचाई के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

    महामना मालवीय ने क्यों बनवाया था यह मंदिर?

    काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय चाहते थे कि विश्वविद्यालय परिसर में भगवान शिव का एक भव्य मंदिर बनाया जाए। उनकी सोच थी कि शिक्षा के इस प्रमुख केंद्र में विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी मिले।

    मालवीय जी चाहते थे कि मंदिर का शिलान्यास किसी तपस्वी और सिद्ध संत के हाथों हो। इसी दौरान उन्हें हिमालय में रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने संत को मंदिर की आधारशिला रखने के लिए काशी आने का निमंत्रण देने का निर्णय लिया।

    चार साल की मनुहार के बाद संत ने रखी आधारशिला

    मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्वामी कृष्णाश्रम शुरुआत में काशी आने के लिए तैयार नहीं थे। महामना मालवीय ने उन्हें मनाने के लिए स्वामी गणेश दास से भी सहायता मांगी।

    काफी प्रयासों के बाद स्वामी कृष्णाश्रम काशी आने के लिए राजी हुए। आखिरकार 11 मार्च 1931 को उन्होंने मंदिर की आधारशिला रखी। इस तरह BHU परिसर में भगवान शिव के भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत हुई।

    यह घटना महामना मालवीय की दृढ़ इच्छाशक्ति और संतों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती है। मंदिर का इतिहास काशी की धार्मिक परंपरा और विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

    कई चरणों में पूरा हुआ मंदिर का निर्माण

    मंदिर का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया के तहत हुआ। इस दौरान आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ी तो उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने निर्माण कार्य में सहयोग दिया। उनके सहयोग से मंदिर का काम आगे बढ़ा।

    उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, 1954 तक मंदिर का अधिकांश निर्माण पूरा हो चुका था, हालांकि शिखर का काम बाकी था। 17 फरवरी 1958 को मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद शिखर का निर्माण भी जारी रहा और आगे चलकर मंदिर की भव्य संरचना पूरी हुई।

    मंदिर के निर्माण और शिखर के पूरा होने की तारीख को लेकर अलग-अलग विवरणों में कुछ अंतर मिलता है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि मंदिर को वर्तमान स्वरूप देने में कई दशक लगे।

    मंदिर में शिव के साथ कई देवी-देवताओं के दर्शन

    श्री विश्वनाथ मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। यहां शिवलिंग के दर्शन के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर में गणेश जी, मां दुर्गा, लक्ष्मी-विष्णु, पंचमुखी महादेव, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी, मां सरस्वती, नटराज और नंदी सहित कई स्वरूपों के दर्शन किए जा सकते हैं।

    विश्वविद्यालय परिसर में स्थित होने के कारण यहां विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्थानीय लोगों और दूसरे शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। मंदिर का शांत वातावरण लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

    सावन में शिवभक्तों के लिए खास है मंदिर

    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। BHU स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर भी काशी के प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है।

    मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ऊंचा शिखर और महामना मालवीय से जुड़ी कहानी इसे खास बनाती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और BHU के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    डिस्क्लेमर: मंदिर की ऊंचाई और निर्माण से संबंधित विवरण उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों पर आधारित हैं। अलग-अलग स्रोतों में कुछ आंकड़ों और तारीखों में अंतर हो सकता है। धार्मिक संदर्भों का उल्लेख परंपरागत मान्यताओं के आधार पर किया गया है।

  • वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: घर में घुसकर महिला: से जबरदस्ती की कोशिश का आरोप, ब्लाउज फाड़ने और 7 लाख रुपये ले जाने की शिकायत.

    वैशाली: बिहार के लालगंज थाना क्षेत्र के एक गांव में घर में घुसकर महिला के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार और लूटपाट करने का गंभीर मामला सामने आया है। महिला की शिकायत के अनुसार, कुछ लोग लाठी-डंडे और लोहे की रॉड लेकर उसके घर पहुंचे थे। आरोप है कि एक व्यक्ति ने घर के अंदर घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की और विरोध करने पर मारपीट करते हुए उसके कपड़े फाड़ दिए। महिला ने घर की अलमारी से सात लाख रुपये ले जाने का आरोप भी लगाया है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    बच्चे को दवा खिला रही थी महिला, तभी दरवाजे पर पहुंचे आरोपी

    यह घटना 11 अक्टूबर 2026 की शाम करीब सात बजे की बताई गई है। महिला ने पुलिस को दिए आवेदन में बताया कि वह घर के अंदर अपने बच्चे को दवा खिला रही थी। इसी दौरान कुछ लोग लाठी-डंडे और लोहे की रॉड लेकर उसके दरवाजे पर पहुंचे और गाली-गलौज करने लगे।

    महिला के मुताबिक, जब वह दरवाजे पर पहुंची तो एक व्यक्ति ने कथित तौर पर उसे मारने के लिए दौड़ाया। अपनी जान बचाने के लिए वह घर के अंदर भागी, लेकिन आरोप है कि उक्त व्यक्ति उसके पीछे घर में घुस आया।

    विरोध करने पर मारपीट और कपड़े फाड़ने का आरोप

    महिला ने आरोप लगाया कि घर के अंदर घुसे व्यक्ति ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। उसने विरोध किया तो आरोपी ने उसका ब्लाउज खींचकर फाड़ दिया और उसके साथ मारपीट की।

    शिकायत में कुछ अन्य लोगों पर भी घटना में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। महिला के अनुसार, इस दौरान घर में रखे सामान को नुकसान पहुंचाने और परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की गई।

    हालांकि, घटना के संबंध में सामने आए ये आरोप शिकायत पर आधारित हैं। इनकी पुष्टि पुलिस जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी बाकी है।

    अलमारी से सात लाख रुपये निकालने की शिकायत

    महिला ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दौरान एक अन्य व्यक्ति ने घर की अलमारी में रखे सात लाख रुपये निकाल लिए। उसके मुताबिक, यह रकम हाल ही में जमीन बेचने से मिली थी।

    महिला का कहना है कि परिवार के लिए यह रकम महत्वपूर्ण थी। घटना के दौरान जब उसके ससुर उसे बचाने के लिए आगे आए, तो आरोपियों ने उनके साथ भी मारपीट की।

    शिकायत के अनुसार, लोहे की रॉड से सिर पर हमला किए जाने के कारण उसके ससुर गंभीर रूप से घायल हो गए। महिला ने अपने और अपने दोनों बच्चों के साथ भी मारपीट किए जाने का आरोप लगाया है।

    डायल 112 पर सूचना, घायलों को अस्पताल पहुंचाया

    घटना के बाद पुलिस को डायल 112 के माध्यम से सूचना दी गई। महिला के अनुसार, पुलिस के आने की जानकारी मिलने पर आरोपी जान से मारने की धमकी देते हुए वहां से भाग निकले।

    आसपास के लोगों की मदद से घायलों को सदर अस्पताल, हाजीपुर पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज कराया गया। महिला ने पुलिस को बताया कि उसके पति पुणे में रहते हैं और उनके घर पर मौजूद नहीं होने के दौरान यह घटना हुई।

    पुलिस ने दर्ज किया मामला

    लालगंज के थानाध्यक्ष सुभाष प्रसाद के अनुसार, महिला के आवेदन के आधार पर मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। पुलिस शिकायत में लगाए गए मारपीट, जबरदस्ती की कोशिश, रुपये ले जाने और धमकी देने जैसे आरोपों की जांच कर रही है।

    फिलहाल मामले में पुलिस की जांच महत्वपूर्ण है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के समय क्या हुआ था और शिकायत में नामजद लोगों की इसमें क्या भूमिका थी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध समाचार रिपोर्ट और शिकायत में दर्ज आरोपों के आधार पर तैयार की गई है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

  • मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    मोमोज के पैसों को लेकर विवाद में 26 वर्षीय जगमीत सिंह की हत्या, धारदार हथियार से हमला; CCTV में कैद हुई वारदात.

    फाजिल्का: पंजाब के फाजिल्का जिले के चक्क पक्खी गांव में मोमोज की रेहड़ी पर पैसों को लेकर शुरू हुआ विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया। रविवार देर रात हुई कहासुनी के दौरान 26 वर्षीय जगमीत सिंह पर कथित तौर पर धारदार हथियार से हमला कर दिया गया। पेट और छाती पर गंभीर चोटें लगने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। घटना पास में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ हत्या का केस दर्ज किया है।

    मोमोज की रेहड़ी पर शुरू हुआ विवाद

    पुलिस के अनुसार, चक्क पक्खी गांव का रहने वाला जगमीत सिंह अपने दोस्त बेअंत सिंह के साथ गांव में मोमोज की रेहड़ी पर गया था। वहां पैसों के लेन-देन को लेकर रेहड़ी संचालकों के साथ विवाद हो गया। शुरुआत में हुई कहासुनी धीरे-धीरे बढ़ती चली गई और मामला मारपीट तक पहुंच गया।

    आरोप है कि इसी दौरान जगमीत सिंह पर धारदार हथियार से हमला कर दिया गया। हमले में उसके पेट और छाती पर गंभीर चोटें आईं। घटना की सूचना मिलने पर उसके पिता भी मौके पर पहुंचे। घायल जगमीत को उपचार के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।

    सीसीटीवी फुटेज में कैद हुई घटना

    इस घटना का एक अहम पहलू यह है कि घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी कैमरे में पूरी वारदात कैद हो गई। पुलिस ने फुटेज को जांच का हिस्सा बनाया है, ताकि विवाद की शुरुआत से लेकर हमले तक के घटनाक्रम को समझा जा सके।

    पुलिस यह भी पता लगा रही है कि हमले में किस धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया था। हथियार की बरामदगी के लिए भी कार्रवाई की जा रही है।

    दो आरोपी गिरफ्तार, हत्या का मामला दर्ज

    जलालाबाद के डीएसपी लवदीप सिंह गिल के अनुसार, पुलिस ने इस मामले में गुरचरण सिंह और बिट्टू सिंह, दोनों निवासी चिमने वाला, के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।

    जांच के दौरान पुलिस घटना से जुड़े साक्ष्यों, सीसीटीवी फुटेज और कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए हथियार के बारे में जानकारी जुटा रही है। मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।

    परिवार का इकलौता बेटा था जगमीत

    26 वर्षीय जगमीत सिंह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। वह पुराने मोटरसाइकिल खरीदने और बेचने का कारोबार करता था। उसकी अचानक हुई मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

    जगमीत अपने पीछे पत्नी और दो छोटी बेटियां छोड़ गया है। जिस परिवार के लिए वह मेहनत कर रहा था, उसी परिवार को अब उसके बिना जीवन बिताना पड़ेगा। मामूली पैसों को लेकर शुरू हुए विवाद में एक परिवार ने अपना सहारा खो दिया।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के प्रारंभिक विवरण पर आधारित है। मामले की जांच जारी है और आरोपों से जुड़े तथ्यों का अंतिम निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।

  • दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर ने Gen Z कैंडिडेट को दिया 120% सैलरी हाइक, पुरानी सैलरी बताने से किया था इनकार.

    नौकरी के लिए आवेदन करते समय अक्सर कंपनियां उम्मीदवारों से उनकी मौजूदा सैलरी और अपेक्षित पैकेज पूछती हैं। कई बार इसी आधार पर नई नौकरी का ऑफर तय किया जाता है। लेकिन दिल्ली के एक एंटरप्रेन्योर ने इस परंपरा से हटकर फैसला लिया। उन्होंने एक ऐसे Gen Z उम्मीदवार को नौकरी दी, जिसने आवेदन फॉर्म में अपनी सैलरी का कॉलम खाली छोड़ दिया था। उम्मीदवार को उसकी पिछली कमाई के बजाय उसके काम और काबिलियत के आधार पर ऑफर दिया गया। दावा है कि उसे 120 प्रतिशत से भी ज्यादा का सैलरी हाइक मिला।

    उम्मीदवार ने सैलरी बताने से क्यों किया इनकार?

    दिल्ली के एंटरप्रेन्योर अभिषेक अग्रवाल ने लिंक्डइन पर इस भर्ती से जुड़ा अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, नौकरी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास ऑपरेशन्स के क्षेत्र में चार साल का अनुभव था। इंटरव्यू के दौरान उसने पूछे गए सवालों के अच्छे जवाब दिए और अपनी क्षमता से प्रभावित भी किया।

    हालांकि, जब उम्मीदवार को आवेदन फॉर्म दिया गया, तो उसने अपनी मौजूदा सैलरी और अपेक्षित वेतन से जुड़े कॉलम खाली छोड़ दिए। शुरुआत में यह बात अलग लगी, लेकिन जब उससे इसकी वजह पूछी गई, तो उसने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

    उम्मीदवार का कहना था कि कंपनियां अक्सर उसकी वर्तमान सैलरी में कुछ प्रतिशत जोड़कर नया पैकेज तय करती हैं। इस प्रक्रिया में यह नहीं देखा जाता कि कर्मचारी वास्तव में कितना काम कर सकता है और उसके कौशल की बाजार में कितनी कीमत है। इसलिए वह चाहता था कि उसकी सैलरी का फैसला पिछली कमाई के बजाय उसकी योग्यता के आधार पर किया जाए।

    4.5 लाख रुपये सालाना कमाता था उम्मीदवार

    अभिषेक अग्रवाल के मुताबिक, बातचीत के दौरान उम्मीदवार ने बताया कि उसकी मौजूदा सालाना सैलरी 4.5 लाख रुपये यानी 4.5 LPA थी। उसका मानना था कि वह अपनी जिम्मेदारियों और काम के अनुभव के हिसाब से इससे ज्यादा वेतन पाने का हकदार है।

    उम्मीदवार की बात सुनने के बाद एंटरप्रेन्योर ने एचआर से आवेदन फॉर्म में सैलरी वाला कॉलम खाली रहने देने को कहा। इसके बाद उन्होंने उम्मीदवार के काम, अनुभव और अब तक हासिल किए गए परिणामों पर ध्यान दिया।

    पुराने काम ने दिलाया बड़ा ऑफर

    इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवार ने अपने काम का एक अहम उदाहरण बताया। उसने अपनी पिछली कंपनी में वेंडर पेमेंट की प्रक्रिया को नए सिरे से व्यवस्थित किया था। इस बदलाव के बाद भुगतान में होने वाली देरी को 18 दिन से घटाकर छह दिन तक लाने में मदद मिली।

    इतना महत्वपूर्ण सुधार करने के बावजूद, उसके मुताबिक पिछली कंपनी ने उसे केवल तीन प्रतिशत की वेतन वृद्धि दी थी। इस उदाहरण से एंटरप्रेन्योर को लगा कि उम्मीदवार ने अपने काम से वास्तविक फायदा पहुंचाया था, लेकिन उसकी सैलरी में उस योगदान के अनुरूप बढ़ोतरी नहीं हुई।

    अभिषेक अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में कहा कि उम्मीदवार की पिछली सैलरी को ही उसकी नई सैलरी तय करने का आधार बनाना सही तरीका नहीं है। किसी कर्मचारी ने पहले कितना कमाया, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि वह नई कंपनी के लिए कितना उपयोगी साबित हो सकता है।

    4.5 लाख से सीधे 10 लाख रुपये सालाना का ऑफर

    अभिषेक अग्रवाल के अनुसार, उन्होंने उम्मीदवार को सालाना 10 लाख रुपये यानी 10 LPA का ऑफर दिया। उसकी पुरानी सैलरी 4.5 लाख रुपये थी। इस हिसाब से नई पेशकश में सालाना 5.5 लाख रुपये की बढ़ोतरी हुई, जो लगभग 122 प्रतिशत का इजाफा है।

    इस तरह उम्मीदवार को उसकी पुरानी कमाई से दोगुने से भी अधिक का पैकेज देने की पेशकश की गई। एंटरप्रेन्योर ने इसे अपनी साल की सबसे अच्छी नियुक्तियों में से एक बताया और कहा कि उम्मीदवार ने अपने काम से उनके फैसले को सही साबित किया।

    हालांकि, यह अनुभव अभिषेक अग्रवाल की ओर से साझा किया गया व्यक्तिगत मामला है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर उम्मीदवार को पुरानी सैलरी बताने से इनकार करने पर इतना ही बड़ा हाइक मिल जाएगा।

    कंपनियों में पुरानी सैलरी के आधार पर पैकेज तय करने पर सवाल

    इस घटना ने भर्ती प्रक्रिया में मौजूदा सैलरी को आधार बनाने की परंपरा पर चर्चा छेड़ दी है। कई बार उम्मीदवार का नया वेतन उसकी पिछली कमाई में कुछ प्रतिशत जोड़कर तय किया जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर किसी कर्मचारी को पिछली कंपनी में उसकी योग्यता के मुकाबले कम वेतन मिला हो, तो नई नौकरी में भी उसका पैकेज अपेक्षाकृत कम रह सकता है।

    इसके उलट, उम्मीदवार के अनुभव, कौशल, जिम्मेदारियों और काम से मिलने वाले परिणामों को ध्यान में रखकर वेतन तय करने से उसकी वास्तविक क्षमता का बेहतर आकलन किया जा सकता है।

    अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में अमेरिका के कुछ राज्यों और क्षेत्रों में नौकरी के दौरान उम्मीदवार की वेतन संबंधी जानकारी पूछने पर लागू प्रतिबंधों का भी जिक्र किया। हालांकि, वहां के नियम स्थान के अनुसार अलग-अलग हैं और हर जगह एक जैसे नहीं हैं।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

    इस पोस्ट पर सोशल मीडिया यूजर्स ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ लोगों ने एंटरप्रेन्योर के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि भर्ती के दौरान उम्मीदवार की काबिलियत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि केवल उसकी पुरानी सैलरी को।

    वहीं, कुछ यूजर्स ने अपने अनुभव साझा किए। एक यूजर ने बताया कि आवेदन फॉर्म में मौजूदा और अपेक्षित सैलरी का विवरण नहीं भरने पर उसे नौकरी के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। एक अन्य यूजर ने सवाल उठाया कि उम्मीदवार ने पहले सैलरी बताने से इनकार किया, लेकिन बातचीत के दौरान खुद ही अपनी कमाई का आंकड़ा साझा कर दिया।

    इस पूरे मामले से एक बात साफ होती है कि नौकरी बदलते समय केवल पुराने पैकेज को आधार मानना उम्मीदवार की क्षमता का पूरा आकलन नहीं करता। अनुभव, कौशल, जिम्मेदारियों और काम से मिलने वाले नतीजों को महत्व देना भी जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट और एंटरप्रेन्योर की ओर से साझा किए गए दावों पर आधारित है। सैलरी और नियुक्ति से जुड़ी जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।