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  • बॉक्सर से नशे के खिलाफ मुहिम चलाने वाले परविंदर झोटा तक का सफर, कभी खुद जूझे थे लत से; विरोध के दौरान दर्ज हुए कई मामले.

    बॉक्सर से नशे के खिलाफ मुहिम चलाने वाले परविंदर झोटा तक का सफर, कभी खुद जूझे थे लत से; विरोध के दौरान दर्ज हुए कई मामले.

    बॉक्सर से नशे के खिलाफ मुहिम चलाने वाले परविंदर झोटा तक का सफर, कभी खुद जूझे थे लत से; विरोध के दौरान दर्ज हुए कई मामले.

    मानसा: पंजाब के मानसा में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने इलाके में सनसनी फैला दी है। करीब 39 वर्षीय परविंदर कभी पेशेवर बॉक्सर थे। बताया जाता है कि वह खुद भी नशे की लत से जूझ चुके थे, लेकिन इससे बाहर निकलने के बाद उन्होंने नशे के कारोबार के खिलाफ अभियान शुरू किया। अप्रैल 2023 में शुरू हुई उनकी मुहिम का नारा था—‘नशा रोको, रोजगार दो’। हालांकि, नशे के खिलाफ उनकी इस लड़ाई के दौरान कई विवाद हुए और उनके खिलाफ अलग-अलग आपराधिक मामले भी दर्ज किए गए।

    नशे की लत से बाहर निकलकर शुरू की मुहिम

    परविंदर सिंह झोटा का सफर एक पेशेवर बॉक्सर के रूप में शुरू हुआ था। समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, वह करीब आठ साल तक नशे से दूर रहे। पंजाब में नशे की समस्या को लेकर चिंता बढ़ने पर उन्होंने मानसा में नशे के खिलाफ लोगों को एकजुट करने का फैसला किया।

    अप्रैल 2023 में उन्होंने किसान संगठनों से समर्थन और मार्गदर्शन लेकर अपनी मुहिम शुरू की। इसका नाम रखा गया—‘नशा रोको, रोजगार दो’। अभियान के जरिए उनका जोर नशे की बिक्री रोकने और युवाओं को नशे से दूर रखने पर था।

    धीरे-धीरे उनकी मुहिम मानसा और बठिंडा के आसपास के गांवों तक पहुंचने लगी। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ गांवों में स्थानीय लोगों ने नशे के खिलाफ समितियां भी बनाईं। परविंदर लोगों को नशे से दूर रहने की सलाह देते थे और नशीले पदार्थों की कथित बिक्री के खिलाफ आवाज उठाते थे।

    मेडिकल स्टोरों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर हुए विवाद

    मुहिम के दौरान परविंदर ने कुछ मेडिकल स्टोरों और नशे की बिक्री में कथित रूप से शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश की। रिपोर्ट में बताया गया है कि वह कुछ दुकानों और घरों तक भी पहुंचे, जहां नशीली गोलियां बेचे जाने का संदेह था।

    इसी दौरान उनके खिलाफ पुलिस में शिकायतें दर्ज होने लगीं। वर्ष 2023 में एक मेडिकल स्टोर से जुड़ी घटना में परविंदर ने कथित तौर पर एक बच्चे को 400 रुपये की गोलियां लेकर निकलते देखा। उन्होंने बच्चे को रोककर दुकानदार से पैसे वापस दिलवाए। इसके बाद उनके खिलाफ 400 रुपये की वसूली से संबंधित शिकायत दर्ज हुई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, मामला बढ़ने के बाद शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत वापस ले ली और परविंदर को उस मामले में राहत मिली। इसके अलावा भी अभियान के दौरान कुछ अन्य घटनाओं को लेकर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई।

    हत्या की कोशिश समेत अन्य आरोप भी लगे

    नशे के खिलाफ अभियान के दौरान परविंदर पर एक व्यक्ति की हत्या की कोशिश सहित अन्य आरोप भी लगाए गए थे। समाचार रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में पुलिस ने उन्हें गलत तरीके से नामजद किए जाने की बात कहते हुए आरोपों से मुक्त किया था।

    इन घटनाओं से साफ है कि उनकी मुहिम के दौरान नशे के कारोबार के खिलाफ विरोध के साथ-साथ कानूनी विवाद भी सामने आए। हालांकि, प्रत्येक मामले की वास्तविक स्थिति और उसका अंतिम परिणाम संबंधित पुलिस रिकॉर्ड तथा न्यायिक दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकता है।

    केमिस्ट अश्विनी कुमार से हुआ था विवाद

    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में नशे के खिलाफ अभियान के दौरान परविंदर का सामना मानसा के केमिस्ट अश्विनी कुमार से हुआ था। उस समय अश्विनी कुमार की दुकान से कथित तौर पर 39 नशीली गोलियां बरामद होने की बात कही गई थी।

    बताया जाता है कि उस घटना के बाद परविंदर और अश्विनी कुमार के बीच कई बार विवाद हुआ। एक घटना में परविंदर ने अश्विनी कुमार के गले में जूतों की माला डालकर उसे गलियों में घुमाया था। इस पुराने विवाद ने दोनों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया था।

    हालांकि, किसी भी पुराने विवाद को हत्या का कारण मानने से पहले पुलिस जांच के निष्कर्षों का इंतजार करना जरूरी है।

    लाइव प्रसारण के दौरान गोली मारने का आरोप

    समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, घटना वाले दिन परविंदर नशे के कथित कारोबार को लेकर अश्विनी कुमार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठा रहे थे। इसी दौरान आरोप है कि अश्विनी कुमार ने पिस्तौल निकालकर परविंदर पर तीन गोलियां चला दीं।

    गोली लगने के बाद परविंदर को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। घटना के बाद इलाके में तनाव और आक्रोश का माहौल बन गया। पुलिस मामले की जांच कर रही है और हत्या से जुड़े तथ्यों तथा घटनाक्रम की पड़ताल की जा रही है।

    नशे के खिलाफ अभियान छोड़ गया बड़ा सवाल

    परविंदर झोटा की कहानी नशे की लत से बाहर निकलने और उसके खिलाफ लोगों को जागरूक करने की कोशिश से शुरू हुई थी। उनके अभियान ने कुछ स्थानीय लोगों को एकजुट किया, लेकिन इसके साथ कई विवाद और कानूनी मामले भी जुड़े रहे।

    उनकी हत्या ने पंजाब में नशे की समस्या, इसकी कथित अवैध बिक्री के खिलाफ स्थानीय स्तर पर होने वाले विरोध और ऐसे मामलों में कानून के तहत कार्रवाई की जरूरत पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। नशे के खिलाफ अभियान चलाने वालों की सुरक्षा और संदिग्ध गतिविधियों की शिकायतों पर निष्पक्ष जांच भी इस मामले से जुड़े अहम मुद्दे हैं।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी पर आधारित है। पुराने विवादों, दर्ज मामलों और हत्या से जुड़े आरोपों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तथा जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जानी चाहिए।

  • 24 कोच वाली वंदे भारत में मिलेगा लंबी दूरी का सफर? पैंट्री कार से लेकर यात्री सुविधाओं तक, जानिए क्या-क्या बदल सकता है.

    24 कोच वाली वंदे भारत में मिलेगा लंबी दूरी का सफर? पैंट्री कार से लेकर यात्री सुविधाओं तक, जानिए क्या-क्या बदल सकता है.

    24 कोच वाली वंदे भारत में मिलेगा लंबी दूरी का सफर? पैंट्री कार से लेकर यात्री सुविधाओं तक, जानिए क्या-क्या बदल सकता है.

    भारतीय रेलवे में वंदे भारत एक्सप्रेस को आधुनिक और तेज रफ्तार रेल सेवाओं के रूप में देखा जाता है। अब 24 कोच वाली वंदे भारत और इसमें संभावित बदलावों को लेकर चर्चा हो रही है। अधिक कोच, बेहतर खानपान व्यवस्था और लंबी दूरी के यात्रियों की जरूरतों के मुताबिक सुविधाओं में बदलाव की संभावना ने यात्रियों का ध्यान खींचा है। हालांकि, नए रैक के संचालन और पैंट्री कार की सुविधा को लेकर अभी आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।

    24 कोच होने से बढ़ सकती है यात्रियों की क्षमता

    वंदे भारत एक्सप्रेस में कोच की संख्या बढ़ने से एक फेरे में अधिक यात्रियों को सफर कराने की संभावना बन सकती है। जिन मार्गों पर यात्रियों की संख्या अधिक रहती है, वहां अतिरिक्त सीटें मिलने से टिकटों की मांग का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि, 24 कोच वाले रैक में कुल कितनी सीटें होंगी और इसे किन रेल मार्गों पर चलाया जाएगा, यह ट्रेन के डिजाइन और रेलवे की संचालन योजना पर निर्भर करेगा। फिलहाल, इन विवरणों की आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।

    पैंट्री कार से खानपान व्यवस्था में हो सकता है बदलाव

    लंबी दूरी की यात्रा के दौरान भोजन और पेय पदार्थों की उपलब्धता यात्रियों के लिए अहम होती है। ऐसे में नए रैक में पैंट्री कार शामिल किए जाने की चर्चा महत्वपूर्ण है। यदि इस तरह की सुविधा दी जाती है, तो यात्रा के दौरान खानपान की व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि, वंदे भारत की अलग-अलग सेवाओं में खानपान की व्यवस्था अलग हो सकती है। इसलिए 24 कोच वाले रैक में पैंट्री कार होगी या नहीं, इसकी पुष्टि रेलवे की आधिकारिक घोषणा से ही हो सकेगी।

    आधुनिक सुविधाओं और सुरक्षा पर रहेगा ध्यान

    वंदे भारत एक्सप्रेस अपनी आधुनिक यात्री सुविधाओं, स्वचालित दरवाजों और तकनीकी प्रणालियों के लिए जानी जाती है। नए रैक में बदलाव किए जाने पर यात्रियों की सुविधा के साथ सुरक्षा, साफ-सफाई, बिजली व्यवस्था और ट्रेन के समय पर संचालन जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।

    कोच की संख्या बढ़ाना केवल यात्रियों की क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए संबंधित रेल मार्ग की तकनीकी अनुकूलता और संचालन संबंधी जरूरतों का आकलन भी आवश्यक होता है।

    राजधानी एक्सप्रेस से तुलना क्यों हो रही है?

    राजधानी एक्सप्रेस लंबी दूरी की प्रमुख प्रीमियम रेल सेवाओं में शामिल है, जबकि वंदे भारत आधुनिक तकनीक और तेज यात्रा के लिए जानी जाती है। दोनों ट्रेनों की तुलना करते समय उनके रूट, किराये, यात्रा समय, खानपान और उपलब्ध सुविधाओं को देखना जरूरी है।

    24 कोच वाली वंदे भारत की संभावित व्यवस्था को लेकर चर्चा जरूर है, लेकिन आधिकारिक जानकारी के बिना इसे राजधानी एक्सप्रेस का सीधा विकल्प मानना उचित नहीं होगा।

    कब शुरू होगी 24 कोच वाली वंदे भारत?

    इस ट्रेन के संचालन की तारीख, संभावित रूट, टिकट किराये, कुल सीटों और पैंट्री कार जैसी सुविधाओं को लेकर अभी स्पष्ट आधिकारिक जानकारी जरूरी है। जब तक रेलवे इन विवरणों की पुष्टि नहीं करता, तब तक किसी निश्चित तारीख या रूट का दावा नहीं किया जा सकता।

    कुल मिलाकर, 24 कोच वाली वंदे भारत का संभावित विस्तार रेल यात्रियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। अधिक सीटें और बेहतर खानपान व्यवस्था लागू होने पर लंबी दूरी के यात्रियों को फायदा मिल सकता है। फिलहाल, यात्रियों को रेलवे की आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट में दी गई जानकारी पर आधारित है। 24 कोच वाले रैक, पैंट्री कार और संचालन योजना से जुड़ी सुविधाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अंतिम जानकारी रेलवे की घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • कैंसर से जुड़े खतरनाक: माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, लैब स्टडी में मिले चौंकाने वाले नतीजे

    कैंसर से जुड़े खतरनाक: माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, लैब स्टडी में मिले चौंकाने वाले नतीजे

    कैंसर से जुड़े खतरनाक: माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, लैब स्टडी में मिले चौंकाने वाले नतीजे

    क्या च्युइंग गम चबाने से मुंह और गले के कैंसर से जुड़े कुछ हानिकारक माइक्रोब्स का स्तर कम किया जा सकता है? अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के शोधकर्ताओं ने बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर एक अध्ययन किया है, जिसके नतीजे इस दिशा में नई संभावनाएं दिखाते हैं। शोध में इस्तेमाल की गई खास गम से मिले तत्वों ने कैंसर से जुड़े कुछ वायरस और बैक्टीरिया के स्तर को कम करने में असर दिखाया।

    हालांकि, इसे कैंसर का इलाज या बीमारी से बचाव का प्रमाणित तरीका मानना अभी सही नहीं होगा। यह शोध शुरुआती स्तर का है और इसके नतीजों को समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है। फिलहाल इस खोज का महत्व इस बात में है कि वैज्ञानिक मुंह में मौजूद कुछ हानिकारक सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाने के नए तरीके तलाश रहे हैं।

    क्या है बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम?

    यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के स्कूल ऑफ डेंटल मेडिसिन से जुड़े शोधकर्ताओं ने एक विशेष च्युइंग गम विकसित की है। इसे लैबलैब बीन्स नामक फलियों से प्राप्त प्रोटीन की मदद से तैयार किया गया। इस प्रोटीन को FRIL कहा जाता है, जिसमें कुछ वायरस से जुड़ने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता का अध्ययन किया गया है।

    शोधकर्ताओं का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जो मुंह में मौजूद कुछ हानिकारक सूक्ष्मजीवों की मात्रा कम करने में मदद कर सके और सामान्य रूप से मौजूद उपयोगी बैक्टीरिया को यथासंभव सुरक्षित रखे।

    यह सामान्य बाजार में मिलने वाली च्युइंग गम जैसी कोई प्रमाणित कैंसर-रोधी वस्तु नहीं है। इसका इस्तेमाल अभी कैंसर के नियमित इलाज की जगह नहीं किया जा सकता।

    मुंह और गले के कैंसर से जुड़े किन माइक्रोब्स पर हुआ अध्ययन?

    शोध में सिर और गर्दन के कैंसर, यानी हेड एंड नेक स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (HNSCC) से जुड़े कुछ सूक्ष्मजीवों पर ध्यान दिया गया। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

    • ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV): HPV के कुछ प्रकार मुंह के पिछले हिस्से और गले के ऊपरी भाग के कैंसर से जुड़े होते हैं।
    • Porphyromonas gingivalis (Pg): यह बैक्टीरिया मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है। कैंसर के साथ इसके संभावित संबंधों पर भी शोध किया जा रहा है।
    • Fusobacterium nucleatum (Fn): यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जा सकता है और कुछ कैंसर संबंधी अध्ययनों में इसकी भूमिका की जांच की गई है।

    यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी वायरस या बैक्टीरिया का कैंसर से संबंध पाया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह हर व्यक्ति में कैंसर पैदा करेगा। कैंसर के विकास में कई जैविक और पर्यावरणीय कारकों की भूमिका हो सकती है।

    लैब स्टडी में क्या सामने आया?

    शोध में बीन गम से प्राप्त तत्वों का इस्तेमाल करके नमूनों में HPV के स्तर पर असर का आकलन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, लार के नमूनों में HPV का स्तर 93 प्रतिशत तक और मुंह को धोने के बाद लिए गए नमूनों में इसका स्तर 80 प्रतिशत तक कम हुआ।

    शोधकर्ताओं ने प्रोटेग्रिन नामक एक एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड का भी अध्ययन किया। रिपोर्ट में बताया गया कि इसके इस्तेमाल से Pg और Fn बैक्टीरिया का स्तर बहुत कम, कुछ परीक्षणों में लगभग शून्य तक पहुंच गया।

    हालांकि, इन परिणामों को सावधानी से समझना जरूरी है। नमूनों में किसी सूक्ष्मजीव का स्तर कम होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि च्युइंग गम इंसान के शरीर में कैंसर को खत्म कर सकती है, कैंसर होने से रोक सकती है या मरीज की जीवन प्रत्याशा बढ़ा सकती है। इसके लिए मरीजों पर किए जाने वाले व्यवस्थित क्लिनिकल ट्रायल और दीर्घकालिक परिणामों का अध्ययन जरूरी होगा।

    मुंह के अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखने की बात क्यों अहम है?

    मुंह में कई तरह के बैक्टीरिया रहते हैं। इनमें से अनेक सामान्य मौखिक स्वास्थ्य और मुंह के प्राकृतिक माइक्रोबायोम का हिस्सा होते हैं। इसलिए ऐसी तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण हो सकता है, जो हानिकारक सूक्ष्मजीवों पर असर डाले और उपयोगी बैक्टीरिया को कम से कम नुकसान पहुंचाए।

    शोधकर्ताओं ने इस दिशा में चुनिंदा सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाने की संभावना का अध्ययन किया है। लेकिन यह दावा करने के लिए कि यह तरीका हर परिस्थिति में अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखता है और कैंसर के इलाज में बेहतर परिणाम देता है, अतिरिक्त शोध की जरूरत है।

    क्या इस च्युइंग गम से कैंसर का इलाज हो सकता है?

    फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। शोध में सामने आए परिणाम भविष्य के उपचार संबंधी अध्ययनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन किसी लैब स्टडी के नतीजे और मरीजों पर सफल उपचार के बीच महत्वपूर्ण अंतर होता है।

    आगे के क्लिनिकल ट्रायल में यह देखना होगा कि यह तरीका इंसानों में कितना सुरक्षित और प्रभावी है, इसका असर कितने समय तक रहता है और क्या इससे कैंसर की रोकथाम या इलाज के परिणामों में वास्तविक सुधार होता है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि इसका इस्तेमाल किसी मौजूदा उपचार के साथ किया जा सकता है या नहीं।

    इसलिए फिलहाल इस च्युइंग गम को कैंसर का इलाज, प्रमाणित बचाव का उपाय या डॉक्टरों द्वारा सुझाए जाने वाले उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    मुंह के कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए क्या करें?

    मुंह और गले के कैंसर से बचाव के लिए फिलहाल स्थापित स्वास्थ्य उपायों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

    • तंबाकू, गुटखा, खैनी और सुपारी से बचें।
    • धूम्रपान न करें और अल्कोहल का सेवन न करना बेहतर है।
    • मुंह में लंबे समय तक रहने वाले छाले, लाल या सफेद धब्बे, गांठ या निगलने में परेशानी होने पर डॉक्टर से जांच कराएं।
    • HPV टीकाकरण के बारे में डॉक्टर से सलाह लें, क्योंकि कुछ HPV संक्रमणों से जुड़े कैंसर का जोखिम टीकाकरण से कम किया जा सकता है।
    • नियमित दंत जांच कराएं और मुंह की साफ-सफाई का ध्यान रखें।

    अगर मुंह में कोई घाव दो सप्ताह से अधिक समय तक बना रहे या आवाज में बदलाव, लगातार गले में दर्द अथवा निगलने में कठिनाई हो, तो जांच कराने में देरी न करें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख वैज्ञानिक शोध से जुड़ी उपलब्ध जानकारी के आधार पर सामान्य जागरूकता के लिए तैयार किया गया है। बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर हुए शोध के नतीजों को कैंसर के प्रमाणित इलाज या रोकथाम का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। कैंसर से जुड़ी किसी भी समस्या में योग्य डॉक्टर से सलाह लें और निर्धारित उपचार बंद न करें।

  • मध्य प्रदेश में है दो रूठी: बहनों का अनोखा मंदिर, जानिए मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा की रोचक कहानी.

    मध्य प्रदेश में है दो रूठी: बहनों का अनोखा मंदिर, जानिए मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा की रोचक कहानी.

    मध्य प्रदेश में है दो रूठी: बहनों का अनोखा मंदिर, जानिए मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा की रोचक कहानी.

    देवास: मध्य प्रदेश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं लोगों को आकर्षित करती हैं। इन्हीं में एक अनोखा मंदिर देवास की टेकरी पर स्थित है, जहां मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा की पूजा की जाती है। इन दोनों देवियों को लोकमान्यता में सगी बहनें माना जाता है। कहा जाता है कि किसी बात पर दोनों के बीच विवाद हो गया था, जिसके बाद वे एक-दूसरे से दूर जाने लगीं। इस घटना से जुड़ी कहानी आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है।

    देवास की टेकरी पर विराजमान हैं दोनों माताएं

    मध्य प्रदेश के देवास शहर में स्थित माता टेकरी एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। दोनों देवियों के दर्शन के लिए सालभर भक्त पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है।

    स्थानीय धार्मिक परंपरा में बड़ी माता के रूप में मां तुलजा भवानी और छोटी माता के रूप में मां चामुंडा की पूजा की जाती है। टेकरी पर दोनों देवियों के अलग-अलग स्थानों पर विराजमान होने के पीछे एक रोचक लोककथा सुनाई जाती है।

    आखिर क्यों रूठ गई थीं दोनों बहनें?

    लोककथा के अनुसार, मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा सगी बहनें थीं। एक दिन किसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हो गया। देखते ही देखते नाराजगी इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक-दूसरे से अलग रहने का फैसला कर लिया।

    कहानी के मुताबिक, बड़ी बहन मां तुलजा भवानी क्रोधित होकर धरती के भीतर जाने लगीं, जबकि छोटी बहन मां चामुंडा पहाड़ी से नीचे की ओर बढ़ने लगीं। दोनों को इस तरह अलग होते देखकर उनके भक्तों और देवी-देवताओं ने उन्हें रोकने का प्रयास किया।

    हनुमान जी और भैरव बाबा ने की थी रोकने की प्रार्थना

    प्रचलित मान्यता के अनुसार, जब दोनों बहनें एक-दूसरे से दूर जाने लगीं, तब हनुमान जी और भैरव बाबा ने उनसे वहीं रुकने की विनती की। कहा जाता है कि उस समय तक बड़ी माता धरती के भीतर काफी नीचे समा चुकी थीं, जबकि छोटी माता पहाड़ी से नीचे की ओर जा चुकी थीं।

    इसी लोककथा के आधार पर मां तुलजा भवानी की प्रतिमा को धरती में धंसी हुई और मां चामुंडा को उनसे कुछ दूरी पर स्थित माना जाता है। श्रद्धालु इस अनोखी स्थिति को दोनों बहनों की नाराजगी से जुड़ी कथा के रूप में देखते हैं।

    यह ध्यान रखना जरूरी है कि दोनों बहनों के विवाद और उनके अलग होने की कहानी धार्मिक लोकमान्यता है। इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

    देवास की माता टेकरी पर नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। भक्त मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, दोनों माताओं के दर्शन से भक्तों को आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्रि के दिनों में पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियों के कारण मंदिर परिसर में विशेष माहौल रहता है।

    कैसे पहुंचें देवास के माता मंदिर?

    देवास मध्य प्रदेश का प्रमुख शहर है और इंदौर के नजदीक स्थित है। यहां पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

    • रेल मार्ग: देवास रेलवे स्टेशन तक ट्रेन से पहुंचा जा सकता है। इंदौर और उज्जैन से भी देवास के लिए यात्रा की योजना बनाई जा सकती है।
    • सड़क मार्ग: इंदौर, उज्जैन और आसपास के शहरों से बस, टैक्सी या निजी वाहन के जरिए देवास पहुंचा जा सकता है।
    • स्थानीय परिवहन: देवास शहर पहुंचने के बाद माता टेकरी तक जाने के लिए स्थानीय टैक्सी और अन्य साधन मिल सकते हैं। सीढ़ियों या रोपवे की उपलब्धता और संचालन की स्थिति यात्रा से पहले जांच लेना उचित है।

    देवास का यह मंदिर धार्मिक आस्था और लोकपरंपरा का अनोखा संगम है। मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा से जुड़ी दो रूठी बहनों की कहानी इस स्थान को एक अलग पहचान देती है। यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालु दोनों माताओं के दर्शन के साथ इस रोचक लोककथा के बारे में जानने में भी दिलचस्पी रखते हैं।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित लोककथा का वर्णन किया गया है। कथा के विवरणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट नहीं है।

  • पानी की टंकी के चौकीदार शमशेर अली की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, नाली के पास मिला शव; सिर और चेहरे पर चोट के निशान.

    पानी की टंकी के चौकीदार शमशेर अली की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, नाली के पास मिला शव; सिर और चेहरे पर चोट के निशान.

    पानी की टंकी के चौकीदार शमशेर अली की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, नाली के पास मिला शव; सिर और चेहरे पर चोट के निशान.

    बिजनौर: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर क्षेत्र में पानी की टंकी पर चौकीदारी करने वाले 62 वर्षीय शमशेर अली की मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। मंगलवार सुबह उनका शव गांव में स्थित ओवरहेड टैंक परिसर में नाली के पास पड़ा मिला। उनके सिर और चेहरे पर चोट के निशान पाए गए हैं। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल मौत की परिस्थितियों का पता लगाया जा रहा है।

    रात में ड्यूटी पर थे शमशेर अली

    शमशेर अली चांदपुर क्षेत्र के शेख सराय हबीब गांव के निवासी थे। वह गांव में बनी पानी की टंकी पर चौकीदार के रूप में काम करते थे। उनका परिवार गांव में ही रहता था, जबकि वह ज्यादातर समय टंकी परिसर में बने कमरे में रहते थे। बताया गया कि वह सुबह और शाम अपने घर जाते थे और बाकी समय ड्यूटी पर रहते थे।

    सोमवार रात भी शमशेर अली रोज की तरह पानी की टंकी पर ड्यूटी कर रहे थे। मंगलवार सुबह जब स्थानीय लोग टंकी परिसर की ओर पहुंचे तो उन्हें नाली के पास शमशेर का शव पड़ा दिखाई दिया। उनके शरीर पर चोटों के निशान देखकर लोगों ने पुलिस को सूचना दी।

    सिर और चेहरे पर मिले चोट के निशान

    चौकीदार का शव मिलने की जानकारी फैलते ही घटनास्थल पर लोगों की भीड़ जुट गई। सूचना पर चांदपुर कोतवाली के प्रभारी राहुल सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और शुरुआती जांच के बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

    कोतवाली प्रभारी के अनुसार, शमशेर अली के शरीर पर चोट के निशान मिले हैं। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। चोटों की प्रकृति और मौत के वास्तविक कारणों का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा जांच के अन्य तथ्यों से चलेगा।

    हत्या की आशंका, पुलिस जुटा रही जानकारी

    शव पर चोट के निशान मिलने के कारण मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि, मौत के पीछे की वजह और किसी व्यक्ति की संलिप्तता को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। पुलिस आसपास के लोगों से पूछताछ कर रही है और घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी जुटा रही है।

    पुलिस का कहना है कि शिकायत मिलने के आधार पर मुकदमा दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के शुरुआती बयान पर आधारित है। मौत के कारणों और घटना की परिस्थितियों की पुष्टि जांच तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर होगी।

  • कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.

    कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.

    कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.

    दुर्ग: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के कातरो गांव में नवरात्रि के दौरान कुंवारी माता वैष्णवी की कठिन साधना श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जाता है कि वैष्णवी नौ दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। उनकी साधना को देखने और माता के दर्शन करने के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं।

    नवरात्रि में देवी दुर्गा की आराधना के लिए देशभर में अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं। कहीं भक्त उपवास रखते हैं, तो कहीं विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। कातरो गांव में वैष्णवी की साधना भी अपनी अनोखी परंपराओं के कारण लोगों का ध्यान खींचती है।

    पेट पर जवारा और अखंड ज्योति स्थापित करने की परंपरा

    उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, कुंवारी माता वैष्णवी नवरात्रि के दौरान अपने पेट पर जवारा और ज्योति कलश स्थापित करती हैं। इस साधना को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त इसे माता के प्रति गहरी आस्था और समर्पण से जोड़कर देखते हैं।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैष्णवी की साधना के दौरान कीलों से बने बिस्तर पर लेटने की परंपरा है। नौ दिनों तक कठिन नियमों का पालन करने और शरीर को स्थिर रखने की इस साधना को श्रद्धालु तपस्या के रूप में देखते हैं। हालांकि, साधना की पूरी प्रक्रिया और इससे जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है।

    बचपन से ही पूजा-पाठ में रही रुचि

    रिपोर्ट के मुताबिक, वैष्णवी की बचपन से ही पूजा-पाठ और देवी-देवताओं की आराधना में गहरी रुचि रही है। परिवार के लोगों ने उन्हें सामान्य जीवन और पढ़ाई के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी धार्मिक साधना के प्रति लगाव बना रहा।

    धीरे-धीरे उनकी साधना की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी। अब नवरात्रि के अवसर पर कई श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए कातरो गांव पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

    नवमी पर कीलों वाले झूले की परंपरा

    कुंवारी माता वैष्णवी की साधना में नवमी का दिन भी विशेष बताया जाता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, नवरात्रि के अंतिम दिन वह कीलों से बने झूले पर बैठकर या खड़े होकर झूलती हैं। इस परंपरा को देखने के लिए भी लोग एकत्र होते हैं।

    कुछ श्रद्धालुओं को सोशल मीडिया के माध्यम से वैष्णवी की साधना के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद वे दूसरे राज्यों से भी यहां पहुंचे। भक्त इस अनुष्ठान को आस्था से जोड़कर देखते हैं, जबकि इसकी कठिन प्रकृति को देखते हुए सुरक्षा और सावधानी का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    नवरात्रि में आस्था और परंपराओं की चर्चा

    नवरात्रि का

  • गले में बार-बार जमा होता: है बलगम? इन 4 चीजों पर रखें नजर, जानिए क्या खाने-पीने से बढ़ सकती है परेशानी.

    गले में बार-बार जमा होता: है बलगम? इन 4 चीजों पर रखें नजर, जानिए क्या खाने-पीने से बढ़ सकती है परेशानी.

    गले में बार-बार जमा होता: है बलगम? इन 4 चीजों पर रखें नजर, जानिए क्या खाने-पीने से बढ़ सकती है परेशानी.

    गले में बलगम जमा होना, बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस होना या सुबह उठते ही कफ की परेशानी होना कई लोगों के लिए असहज स्थिति बन जाती है। सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और सांस से जुड़ी कुछ बीमारियों के कारण शरीर में म्यूकस यानी बलगम की मात्रा बढ़ सकती है। ऐसे में लोग अक्सर अपनी डाइट में बदलाव करने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या सच में कुछ खास खाद्य पदार्थ बलगम बढ़ाते हैं?

    आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉ. सलीम जैदी ने खानपान और बलगम से जुड़ी कुछ बातों पर चर्चा की है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति में किसी खाद्य पदार्थ का असर एक जैसा नहीं होता। वैज्ञानिक प्रमाण भी इस बात का समर्थन नहीं करते कि दूध या चीनी जैसे सभी खाद्य पदार्थ सीधे तौर पर हर व्यक्ति में बलगम का उत्पादन बढ़ा देते हैं।

    शरीर में बलगम क्यों बनता है?

    बलगम यानी म्यूकस शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। यह नाक, गले और सांस की नलियों की अंदरूनी सतह को नम रखने के साथ धूल, छोटे कणों और रोगाणुओं को रोकने में मदद करता है।

    सामान्य परिस्थितियों में बनने वाला म्यूकस अक्सर महसूस भी नहीं होता। लेकिन सर्दी-जुकाम, फ्लू, एलर्जी या साइनस में सूजन होने पर इसका उत्पादन बढ़ सकता है। कभी-कभी नाक से निकलने वाला म्यूकस गले के पीछे की ओर बहता है, जिसे पोस्ट-नेजल ड्रिप कहा जाता है। इससे बार-बार गला साफ करने, खांसी और गले में कुछ जमा होने जैसा एहसास हो सकता है।

    अगर बलगम लंबे समय तक बना रहता है, तो केवल खानपान को इसका कारण मानना सही नहीं है। इसके पीछे एलर्जी, संक्रमण, अस्थमा, धूम्रपान या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं।

    1. दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स

    दूध, दही, पनीर और चीज जैसे डेयरी उत्पादों को अक्सर बलगम बढ़ाने वाला माना जाता है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह साबित नहीं करते कि दूध पीने से सभी लोगों में शरीर अधिक बलगम बनाने लगता है।

    कुछ लोगों को दूध पीने के बाद मुंह या गले में चिकनाहट और गाढ़ेपन का एहसास हो सकता है। यह एहसास अपने आप में बलगम का उत्पादन बढ़ने का प्रमाण नहीं है।

    अगर आपको लगता है कि किसी खास डेयरी उत्पाद के सेवन के बाद परेशानी बढ़ती है, तो कुछ समय तक अपने लक्षणों पर नजर रखें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या डायटीशियन से सलाह लें। बिना किसी स्पष्ट कारण के सभी डेयरी उत्पाद बंद करने से पोषण पर असर पड़ सकता है।

    2. ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड

    मिठाइयां, मीठे पेय, बिस्कुट और दूसरे अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन संतुलित आहार की जगह लेने पर सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए इनका सेवन सीमित रखना बेहतर है।

    हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी खाने से हर व्यक्ति में सीधे बलगम बढ़ने लगता है। गले में कफ की परेशानी और ज्यादा चीनी के सेवन के बीच सीधा संबंध साबित करने वाले पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

    अगर आपको लगातार बलगम या खांसी की समस्या है, तो केवल चीनी छोड़ने पर निर्भर न रहें। इसके साथ यह भी देखें कि कहीं एलर्जी, संक्रमण या कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्या तो नहीं है।

    3. रेड मीट और ज्यादा तले-भुने खाद्य पदार्थ

    बीफ, पोर्क और लैम्ब जैसे रेड मीट तथा समोसे, पकौड़े और अन्य डीप फ्राइड खाद्य पदार्थों में वसा की मात्रा अधिक हो सकती है। इन्हें नियमित रूप से ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए।

    हालांकि, इन खाद्य पदार्थों को सीधे बलगम बढ़ाने वाला मानने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। कुछ लोगों में भारी या अधिक वसा वाला भोजन एसिड रिफ्लक्स की समस्या को बढ़ा सकता है। एसिड रिफ्लक्स में पेट का एसिड ऊपर गले की ओर आने से खांसी, गले में जलन या बार-बार गला साफ करने जैसी परेशानी हो सकती है।

    यदि आपको भोजन के बाद खांसी या गले में जलन महसूस होती है, तो भोजन की मात्रा कम रखना और खाने के तुरंत बाद न लेटना मददगार हो सकता है।

    4. चाय, कॉफी और अल्कोहल का सेवन

    चाय और कॉफी में कैफीन होता है, जबकि अल्कोहल शरीर पर अलग-अलग तरह से असर डाल सकता है। सामान्य मात्रा में चाय या कॉफी पीने से हर व्यक्ति में डिहाइड्रेशन होने या बलगम गाढ़ा हो जाने की बात सही नहीं है।

    फिर भी, अगर कैफीन वाले पेय या अल्कोहल लेने के बाद आपकी खांसी, गले में जलन या एसिड रिफ्लक्स बढ़ता है, तो इनकी मात्रा कम करना उपयोगी हो सकता है। अल्कोहल का सेवन सीमित रखना या उससे बचना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है।

    बलगम को सामान्य रूप से पतला रखने के लिए पर्याप्त पानी पीना महत्वपूर्ण है। पानी की जरूरत उम्र, मौसम, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    बलगम से राहत पाने के लिए क्या करें?

    पर्याप्त पानी पिएं

    दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर में पानी की कमी से बचने और म्यूकस को बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। गले में खराश या जुकाम होने पर कुछ लोगों को गुनगुने पानी से आराम महसूस होता है।

    गर्म पेय का सहारा लें

    गुनगुना पानी या बिना ज्यादा चीनी वाली गर्म चाय गले को आराम दे सकती है। अदरक या पुदीने से बने पेय भी कुछ लोगों को अच्छा महसूस करा सकते हैं, लेकिन इन्हें बलगम का प्रमाणित इलाज नहीं समझना चाहिए।

    भाप लेते समय सावधानी बरतें

    नाक बंद होने पर नम हवा या गर्म शॉवर से कुछ लोगों को अस्थायी राहत मिल सकती है। लेकिन उबलते पानी के बर्तन से सीधे भाप लेना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे चेहरे और सांस की नलियों में जलने का जोखिम रहता है। भाप में एसेंशियल ऑयल मिलाना भी जरूरी नहीं है और कुछ लोगों में इससे जलन या एलर्जी बढ़ सकती है।

    धुएं और धूल से बचें

    सिगरेट का धुआं, प्रदूषण, धूल और दूसरे उत्तेजक पदार्थ सांस की नलियों में जलन पैदा कर सकते हैं। अगर आपको बार-बार बलगम बनता है, तो धूम्रपान से बचें और धूल या एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से संपर्क कम करने की कोशिश करें।

    घरेलू उपायों पर पूरी तरह निर्भर न रहें

    शहद गले की खराश और खांसी में कुछ राहत दे सकता है, लेकिन यह बलगम बनने के मूल कारण का इलाज नहीं करता। एक साल से कम उम्र के बच्चों को शहद नहीं देना चाहिए। हल्दी, तुलसी या दूसरे घरेलू नुस्खों को भी डॉक्टर द्वारा बताए गए इलाज का विकल्प न बनाएं।

    कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

    अगर बलगम लंबे समय तक बना रहता है, बार-बार लौटता है या उसके साथ लगातार खांसी, बुखार अथवा सीने में परेशानी होती है, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

    बलगम में खून आने, सीने में तेज दर्द या सांस लेने में गंभीर कठिनाई होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लें। सांस की गंभीर परेशानी को घरेलू नुस्खों से ठीक करने की कोशिश न करें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। दूध, चीनी, डेयरी उत्पादों या अन्य खाद्य पदार्थों का असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है और इनके सीधे तौर पर बलगम बढ़ाने के प्रमाण सीमित हैं। लंबे समय तक बलगम, खांसी या सांस संबंधी परेशानी रहने पर डॉक्टर से सलाह लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।

  • कामाख्या मंदिर का रहस्यमयी: कछुआ कुंड, जहां सदियों पुराने कछुओं के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु

    कामाख्या मंदिर का रहस्यमयी: कछुआ कुंड, जहां सदियों पुराने कछुओं के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु

    कामाख्या मंदिर का रहस्यमयी: कछुआ कुंड, जहां सदियों पुराने कछुओं के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु

    गुवाहाटी: असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में माता के दर्शन करने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, शक्ति उपासना और प्राचीन परंपराओं के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर से जुड़ा कछुआ कुंड भी भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि यहां कछुओं के दर्शन करने और सच्चे मन से प्रार्थना करने से भक्तों को मानसिक शांति मिलती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    धार्मिक आस्था का केंद्र है कछुआ कुंड

    कामाख्या मंदिर को देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल किया जाता है। यहां देवी की पूजा-अर्चना के साथ कई प्राचीन धार्मिक परंपराएं भी प्रचलित हैं। कछुआ कुंड को इसी आस्था और परंपरा से जुड़ा एक विशेष स्थान माना जाता है।

    श्रद्धालु इस कुंड में रहने वाले कछुओं को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। यहां आने वाले भक्त कछुओं के दर्शन करते हैं और देवी से सुख, समृद्धि, परिवार की खुशहाली तथा जीवन की परेशानियों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, मनोकामनाएं पूरी होने से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं और लोगों की आस्था पर आधारित हैं।

    200 से 300 साल पुराने बताए जाते हैं कछुए

    कछुआ कुंड को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा यहां रहने वाले कछुओं की उम्र को लेकर होती है। कुछ मान्यताओं में इन कछुओं को 200 से 300 वर्ष पुराना बताया जाता है। उनकी उम्र और लंबे समय से इस स्थान पर मौजूद रहने की कहानियां श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल पैदा करती हैं।

    हालांकि, इन कछुओं की बताई जाने वाली उम्र की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट नहीं होती। इसलिए इस दावे को प्रमाणित तथ्य के बजाय प्रचलित मान्यता के रूप में देखना उचित है।

    भगवान विष्णु के कूर्म अवतार से जुड़ा है धार्मिक महत्व

    हिंदू धर्म में कछुए का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कूर्म यानी कछुए का अवतार धारण किया था। उन्होंने अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को आधार दिया, जिससे समुद्र मंथन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।

    इसी कथा के कारण कछुए को धैर्य, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। कामाख्या मंदिर के कछुआ कुंड से जुड़ी धार्मिक आस्था को भी कई श्रद्धालु इसी पौराणिक परंपरा से जोड़कर देखते हैं।

    मनोकामनाएं पूरी होने की क्या है मान्यता?

    कछुआ कुंड को लेकर स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में कई तरह की मनोकामनाओं का उल्लेख मिलता है। कुछ श्रद्धालु संतान सुख, विवाह में आने वाली बाधाओं से मुक्ति, आर्थिक परेशानियों में राहत और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।

    भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना उन्हें सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संबल देती है। हालांकि, इन धार्मिक मान्यताओं को किसी इच्छा की पूर्ति की गारंटी या प्रमाणित चमत्कार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    कछुआ कुंड के दर्शन करते समय किन बातों का रखें ध्यान?

    कामाख्या मंदिर जाने वाले श्रद्धालु कछुआ कुंड के दर्शन के दौरान मंदिर के नियमों और स्थानीय निर्देशों का पालन करें। यदि वहां कछुओं को भोजन देने की अनुमति हो, तो केवल मंदिर प्रशासन द्वारा स्वीकृत भोजन ही दें। कछुओं को बिना अनुमति चावल, दाल या अन्य खाद्य पदार्थ खिलाने से बचें, क्योंकि गलत भोजन उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।

    इसी तरह, कुंड के पानी को पीने या शरीर पर लगाने से पहले स्थानीय नियमों की जानकारी लेना बेहतर है। धार्मिक स्थलों की स्वच्छता बनाए रखना और वहां रहने वाले जीवों को परेशान न करना भी हर श्रद्धालु की जिम्मेदारी है।

    आस्था और परंपरा का अनोखा संगम

    कामाख्या मंदिर का कछुआ कुंड श्रद्धालुओं के लिए केवल एक जलकुंड नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था,

  • पीलीभीत: रामलीला कमेटी की बैठक में हिसाब-किताब को लेकर खूनी संघर्ष, गोलीबारी में तीन की मौत; दो घायल, मुख्य आरोपी गिरफ्तार

    पीलीभीत: रामलीला कमेटी की बैठक में हिसाब-किताब को लेकर खूनी संघर्ष, गोलीबारी में तीन की मौत; दो घायल, मुख्य आरोपी गिरफ्तार

    पीलीभीत: रामलीला कमेटी की बैठक में हिसाब-किताब को लेकर खूनी संघर्ष, गोलीबारी में तीन की मौत; दो घायल, मुख्य आरोपी गिरफ्तार

    उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के अमरिया कस्बे में रामलीला मेला कमेटी की बैठक के दौरान हुआ विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया। सोमवार रात कमेटी के आय-व्यय का हिसाब और नई कार्यकारिणी के गठन को लेकर शुरू हुई कहासुनी के बीच गोलीबारी हो गई। इस घटना में अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और कुणाल की मौत हो गई, जबकि दो अन्य लोग घायल हुए। गंभीर रूप से घायल रोहित गुप्ता का बरेली में उपचार कराया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, मामले में मुख्य आरोपी कौशल गुप्ता समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

    आय-व्यय के हिसाब और नई कमेटी को लेकर विवाद

    अमरिया कस्बे में हर साल रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसी आयोजन से जुड़ी मेला कमेटी की बैठक सोमवार रात मेला स्थल पर बुलाई गई थी। बैठक में पिछली कमेटी के आय-व्यय का हिसाब प्रस्तुत करने और नई कमेटी के गठन को लेकर चर्चा हो रही थी।

    बताया गया कि अंकित गुप्ता पिछले वर्ष मेला कमेटी के पदाधिकारी रहे थे। इस बार कौशल गुप्ता भी कमेटी में पदाधिकारी बनने की दावेदारी कर रहे थे। बैठक के दौरान कौशल ने कथित तौर पर खर्चों के हिसाब पर सवाल उठाए, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हो गई।

    मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक, अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और उनके साथियों ने आपत्ति जताते हुए शांतिपूर्वक बातचीत करने को कहा। इसी बात को लेकर विवाद बढ़ता चला गया।

    आरोप है कि विवाद के बीच चलाई गईं गोलियां

    पुलिस के प्रारंभिक विवरण के अनुसार, विवाद के दौरान कौशल गुप्ता और उसके साथियों पर गोलीबारी करने का आरोप है। फायरिंग में अंकित गुप्ता और कुणाल के सीने में गोलियां लगीं। दोनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।

    गोलीबारी के दौरान मोहित गुप्ता और रोहित गुप्ता भी घायल हो गए। अचानक गोलियां चलने और चीख-पुकार से मौके पर अफरा-तफरी मच गई। आसपास मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। आरोप है कि फायरिंग के बाद हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए।

    घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। बाद में बरेली में इलाज के दौरान मोहित गुप्ता ने भी दम तोड़ दिया। रोहित गुप्ता का उपचार जारी है।

    तीन लोगों की मौत से इलाके में हड़कंप

    एक ही घटना में तीन लोगों की मौत से अमरिया कस्बे में शोक और तनाव का माहौल बन गया। मृतकों में अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और कुणाल शामिल हैं। बताया गया कि अंकित मेला कमेटी से जुड़े हुए थे।

    घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल की परिस्थितियों का जायजा लिया और मामले से जुड़े तथ्यों की पड़ताल शुरू की।

    कौशल गुप्ता समेत दो आरोपी गिरफ्तार

    घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक सुकीर्ति माधव ने बताया कि कौशल गुप्ता और उसके साथियों पर हत्या का आरोप लगाया गया है। पुलिस उस समय पीड़ित पक्ष की शिकायत का इंतजार कर रही थी, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज किए जाने की बात कही गई।

    समाचार रिपोर्ट के अनुसार, देर रात पुलिस ने मुख्य आरोपी कौशल गुप्ता समेत दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अब गोलीबारी में इस्तेमाल हथियारों, घटना में शामिल अन्य लोगों और विवाद के पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है।

    फिलहाल, पुलिस की जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों और दर्ज शिकायत के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के प्रारंभिक बयान पर आधारित है। आरोपों की पुष्टि और घटना की पूरी परिस्थितियों का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद होगा।

  • EPFO 3.0 में देरी से कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर्स को झटका, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए करना पड़ सकता है इंतजार.

    EPFO 3.0 में देरी से कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर्स को झटका, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए करना पड़ सकता है इंतजार.

    EPFO 3.0 में देरी से कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर्स को झटका, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए करना पड़ सकता है इंतजार.

    देश में कैब चलाने वाले, फूड डिलीवरी करने वाले और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों के लिए EPFO 3.0 से जुड़ी एक अहम अपडेट सामने आई है। इस परियोजना के लागू होने में देरी हो सकती है, जिससे सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसी सुविधाओं से जुड़ने की उम्मीद लगाए बैठे कामगारों को अभी और इंतजार करना पड़ सकता है।

    उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, EPFO 3.0 परियोजना को अक्टूबर 2025 में मंजूरी मिली थी। हालांकि, इसे लागू करने के लिए तकनीकी साझेदार चुनने और टेंडर की प्रक्रिया अभी पूरी की जानी है। इन प्रक्रियाओं के बाद भी सिस्टम को तैयार करने में समय लग सकता है। रिपोर्ट में इसके क्रियान्वयन में करीब एक साल अतिरिक्त लगने की संभावना जताई गई है।

    क्या है EPFO 3.0 और क्यों हो रही है इसकी चर्चा?

    EPFO यानी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन देश में पात्र कर्मचारियों के भविष्य निधि और पेंशन से जुड़े मामलों को संभालता है। EPFO 3.0 को संगठन की तकनीकी व्यवस्था को आधुनिक बनाने वाली परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य सेवाओं को अधिक डिजिटल, सुविधाजनक और कुशल बनाना है।

    इस परियोजना को लेकर गिग वर्कर्स और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के संदर्भ में भी चर्चा हो रही है। इनमें ऐप के जरिए कैब चलाने वाले ड्राइवर, ऑनलाइन ऑर्डर पहुंचाने वाले डिलीवरी पार्टनर्स और निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर शामिल हैं।

    हालांकि, यह समझना जरूरी है कि EPFO 3.0 के तकनीकी अपग्रेड और गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा या पेंशन के दायरे में लाने की व्यवस्था को एक ही बात नहीं मानना चाहिए। इन कामगारों को कौन-सी सुविधा, किस पात्रता और किस प्रक्रिया के तहत मिलेगी, यह संबंधित आधिकारिक नियमों और योजनाओं पर निर्भर करेगा।

    EPFO 3.0 लागू होने में देरी क्यों हो रही है?

    रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना के लिए तकनीकी साझेदार चुनने की प्रक्रिया अभी आगे बढ़ाई जा रही है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी RFP तैयार किया जा रहा है। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया पूरी करनी होगी और तकनीकी व्यवस्था को लागू करने का काम आगे बढ़ेगा।

    ऐसी परियोजनाओं में केवल मंजूरी मिलना पर्याप्त नहीं होता। सॉफ्टवेयर और डिजिटल सिस्टम तैयार करने, डेटा को व्यवस्थित करने, सुरक्षा जांच करने और नई व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी समय चाहिए।

    इसी वजह से EPFO 3.0 के लागू होने में देरी की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इसकी अंतिम समयसीमा और वास्तविक शुरुआत की तारीख की पुष्टि आधिकारिक घोषणा से ही होगी।

    अक्टूबर 2025 में मिली थी मंजूरी

    उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, EPFO 3.0 परियोजना को अक्टूबर 2025 में मंजूरी दी गई थी। उस समय इसे अगले चरण में लागू करने की तैयारी थी, लेकिन तकनीकी साझेदार के चयन और टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण काम आगे बढ़ने में समय लग रहा है।

    इस देरी का असर उन लोगों की उम्मीदों पर पड़ सकता है, जो नई व्यवस्था के जरिए भविष्य निधि, पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से जुड़ने की संभावना देख रहे हैं। हालांकि, किसी भी लाभ की वास्तविक उपलब्धता परियोजना के लागू होने और उससे संबंधित पात्रता नियमों पर निर्भर करेगी।

    किन कामगारों को मिल सकता है फायदा?

    EPFO 3.0 और इससे जुड़ी सामाजिक सुरक्षा की चर्चाओं में कई तरह के कामगार शामिल हैं।

    1. कैब ड्राइवर: ऐप आधारित टैक्सी सेवाओं से जुड़े ड्राइवरों के लिए भविष्य की बचत और सामाजिक सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय हैं। नई व्यवस्थाओं से उन्हें जोड़ने की योजना लागू होती है, तो पात्र कामगारों को लाभ मिल सकता है।

    2. डिलीवरी पार्टनर्स: फूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए सामान पहुंचाने वाले लोग अक्सर काम के आधार पर कमाई करते हैं। सामाजिक सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था उनके भविष्य के लिए उपयोगी हो सकती है।

    3. निर्माण क्षेत्र के मजदूर: कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले कई मजदूरों के लिए नियमित बचत और पेंशन जैसी सुविधाओं तक पहुंच चुनौतीपूर्ण होती है। संबंधित योजनाओं के तहत पात्रता होने पर उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल सकता है।

    4. असंगठित क्षेत्र के अन्य कामगार: ऐसे लोगों के लिए भी सामाजिक सुरक्षा जरूरी है, जिनके पास नियमित वेतन वाली नौकरी या पारंपरिक कर्मचारी लाभ उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, सभी असंगठित कामगार स्वतः EPFO के सदस्य या किसी पेंशन योजना के पात्र नहीं हो जाते।

    क्या अभी कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर्स को पेंशन नहीं मिलेगी?

    इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि EPFO 3.0 के लागू होने में संभावित देरी का अर्थ यह नहीं है कि हर कैब ड्राइवर या डिलीवरी पार्टनर को फिलहाल किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग श्रेणियों के कामगारों के लिए मौजूदा सरकारी योजनाएं और पात्रता के नियम अलग हो सकते हैं।

    इसी तरह, EPFO 3.0 लागू होते ही सभी गिग वर्कर्स को स्वतः पेंशन मिलने लगेगी, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा। इसके लिए संबंधित योजना के नियम, पंजीकरण की प्रक्रिया, योगदान की शर्तें और पात्रता की जानकारी देखना जरूरी होगा।

    कामगारों के लिए इसका क्या मतलब है?

    अगर EPFO 3.0 से जुड़ी नई व्यवस्था लागू होने में अतिरिक्त समय लगता है, तो इससे भविष्य में सामाजिक सुरक्षा से जुड़ने की उम्मीद कर रहे लोगों को इंतजार करना पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल किसी कामगार को अपनी पात्रता या उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी लेने के लिए परियोजना के पूरी तरह लागू होने तक इंतजार करना जरूरी नहीं है।

    कामगारों को अपनी मौजूदा पात्रता के अनुसार उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी लेनी चाहिए और किसी