कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.

कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.
कुंवारी माता वैष्णवी की अनोखी साधना बनी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र, पेट पर जवारा और कीलों के बिस्तर पर करती हैं तपस्या.

दुर्ग: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के कातरो गांव में नवरात्रि के दौरान कुंवारी माता वैष्णवी की कठिन साधना श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जाता है कि वैष्णवी नौ दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। उनकी साधना को देखने और माता के दर्शन करने के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं।

नवरात्रि में देवी दुर्गा की आराधना के लिए देशभर में अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं। कहीं भक्त उपवास रखते हैं, तो कहीं विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। कातरो गांव में वैष्णवी की साधना भी अपनी अनोखी परंपराओं के कारण लोगों का ध्यान खींचती है।

पेट पर जवारा और अखंड ज्योति स्थापित करने की परंपरा

उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, कुंवारी माता वैष्णवी नवरात्रि के दौरान अपने पेट पर जवारा और ज्योति कलश स्थापित करती हैं। इस साधना को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त इसे माता के प्रति गहरी आस्था और समर्पण से जोड़कर देखते हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैष्णवी की साधना के दौरान कीलों से बने बिस्तर पर लेटने की परंपरा है। नौ दिनों तक कठिन नियमों का पालन करने और शरीर को स्थिर रखने की इस साधना को श्रद्धालु तपस्या के रूप में देखते हैं। हालांकि, साधना की पूरी प्रक्रिया और इससे जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है।

बचपन से ही पूजा-पाठ में रही रुचि

रिपोर्ट के मुताबिक, वैष्णवी की बचपन से ही पूजा-पाठ और देवी-देवताओं की आराधना में गहरी रुचि रही है। परिवार के लोगों ने उन्हें सामान्य जीवन और पढ़ाई के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी धार्मिक साधना के प्रति लगाव बना रहा।

धीरे-धीरे उनकी साधना की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी। अब नवरात्रि के अवसर पर कई श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए कातरो गांव पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

नवमी पर कीलों वाले झूले की परंपरा

कुंवारी माता वैष्णवी की साधना में नवमी का दिन भी विशेष बताया जाता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, नवरात्रि के अंतिम दिन वह कीलों से बने झूले पर बैठकर या खड़े होकर झूलती हैं। इस परंपरा को देखने के लिए भी लोग एकत्र होते हैं।

कुछ श्रद्धालुओं को सोशल मीडिया के माध्यम से वैष्णवी की साधना के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद वे दूसरे राज्यों से भी यहां पहुंचे। भक्त इस अनुष्ठान को आस्था से जोड़कर देखते हैं, जबकि इसकी कठिन प्रकृति को देखते हुए सुरक्षा और सावधानी का ध्यान रखना भी जरूरी है।

नवरात्रि में आस्था और परंपराओं की चर्चा

नवरात्रि का

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *