प्रकृति अपने अनोखे और दुर्लभ चमत्कारों से समय-समय पर लोगों को हैरान करती रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय फूल लोगों का ध्यान खींच रहा है। अपनी अनोखी बनावट और दुर्लभता के कारण इसे लोग ‘हिमालयी हीरा’ या ‘डायमंड फ्लावर’ कह रहे हैं।
क्या है ‘हिमालयी हीरा’? सोशल मीडिया पर जिस पौधे को ‘डायमंड फ्लावर’ कहा जा रहा है, उसका वैज्ञानिक नाम रियम नोबाइल (Rheum nobile) है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे पदमचाल या केन्जो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पारदर्शी और चमकदार संरचना इसे अन्य पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है, यही वजह है कि इसे ‘हिमालयी हीरा’ की उपाधि मिली है।जीवन में सिर्फ एक बार खिलता है फूलइस पौधे की सबसे अनोखी विशेषता इसका जीवन चक्र है। जहां अधिकांश पौधे हर साल फूल देते हैं, वहीं रियम नोबाइल अपने पूरे जीवन में केवल एक बार ही फूल देता है। इस प्रक्रिया में करीब 7 से 15 साल का समय लग सकता है। फूल खिलने के बाद धीरे-धीरे पौधे का जीवन चक्र समाप्त होने लगता है।ऊंचाई में इंसान को भी दे सकता है टक्करयह दुर्लभ पौधा अपनी लंबाई के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 3.2 फीट से 6.5 फीट तक पहुंच सकती है। वायरल वीडियो में यह पौधा पहाड़ों के बीच इंसानों के बराबर या उनसे भी ऊंचा दिखाई देता है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है।
13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर होता है विकसितरियम नोबाइल सामान्य स्थानों पर नहीं उगता। यह हिमालय के दुर्गम और ठंडे इलाकों में समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर (करीब 13,000 फीट) या उससे अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है। कम ऑक्सीजन और बेहद कम तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इसका विकसित होना प्रकृति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।वीडियो के बाद संरक्षण की उठी मांगसोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग इस दुर्लभ पौधे को छूते और तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सोशल मीडिया यूजर्स ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतने दुर्लभ पौधों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनका संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी प्रकृति के इस अनमोल उपहार को देख सकें।
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है.
समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने ऐसी अद्भुत दुनिया खोजी है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. हाल ही में दक्षिण अटलांटिक महासागर में एक रिसर्च अभियान के दौरान शोधकर्ताओं ने एक विशाल कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) की खोज की है. यह रीफ लगभग वैटिकन सिटी के आकार जितना बड़ा बताया जा रहा है और समुद्री जीवों से भरा हुआ है. बताया गया कि वैज्ञानिक समुद्र के भीतर मौजूद ‘कोल्ड सीप्स’ यानी ऐसे स्थानों की तलाश कर रहे थे, जहां समुद्र की गहराई से गैस और खनिज निकलते हैं. लेकिन खोज के दौरान उन्हें विशाल और जीवंत कोरल साम्राज्य मिल गया. यह रीफ दुर्लभ प्रजाति के कोरल बैथेलिया कैंडिडा से बना है और इसे इस प्रजाति का अब तक का सबसे बड़ा रीफ माना जा रहा है.
समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने क्या-क्या खोजा
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है. समुद्र की गहराई में रिकॉर्ड किए गए वीडियो में रंग-बिरंगे कोरल, समुद्री जीवों की हलचल और जीवन से भरा पूरा पारिस्थितिकी तंत्र साफ नजर आया. सबसे दिलचस्प बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस अभियान के दौरान 28 ऐसी प्रजातियां भी इकट्ठा की हैं, जिन्हें विज्ञान की दुनिया के लिए नई प्रजातियां माना जा रहा है. अगर आगे की जांच में इसकी पुष्टि होती है, तो यह समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि होगी.
क्या बोलो एक्सपर्ट्स
मामले में एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी खोजें समुद्री जीवों की विविधता समझने में मदद करती हैं. इससे यह भी पता चलता है कि समुद्र की गहराइयों में अभी भी बहुत कुछ ऐसा छिपा है, जिसके बारे में इंसानों को जानकारी नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये खोज एक बार फिर साबित करती है कि पृथ्वी पर अभी भी कई रहस्य बाकी हैं और समुद्र की गहराइयों में ऐसी अनदेखी दुनियाएं मौजूद हैं, जो हर नई खोज के साथ हमें चौंका रही हैं.
माना जाता है कि रसोई और यहां रखी चीजों से जुड़े हर छोटे-बड़े नियमों का पालन सही से किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे ही तवे को लेकर भी कुछ नियम बताए गए हैं। आपने अक्सर अपनी मम्मी या दादी-नानी से सुना होगा कि तवे को कभी उल्टा नहीं रखना चाहिए। कहते हैं कि तवे को उल्टा रखना शुभ नहीं होता और इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है। तो चलिए जानते हैं इस पर क्या कहता है वास्तु शास्त्र
राहु ग्रह से है तवे का संबंध
रोटी, परांठा, चीला, डोसा आदि बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तवा केवल खाना बनाने का एक बर्तन नहीं। इसे वास्तु में विशेष महत्व दिया गया है। तवे का संबंध राहु ग्रह से माना जाता है। इसलिए इसे रखने का तरीका बहुत मायने रखता है। मान्यता है कि तवे को उल्टा रखने से घर की सुख-समृद्धि और माहौल पर बुरा असर पड़ सकता है।
क्यों नहीं रखना चाहिए उल्टा तवा?
वास्तु शास्त्र के अनुसार, तवे को कभी भी उल्टा करके नहीं रखना चाहिए। खासतौर पर रात में खाना बनाने के बाद इसे तुंरत साफ करके सीधा रखने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि आपकी इस एक छोटी सी आदत से घर में हमेशा पॉजिटिविटी बनी रहती है और नकारात्मक प्रभावों से बचाव होता है।
आर्थिक परेशानी का संकेत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तवे को उल्टा रखने से घर की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। इससे अनावश्यक खर्च बढ़ने और धन संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही परिवार की सुख-शांति पर भी असर पड़ने की बात कही जाती है।
राहु दोष और तनाव
वास्तु मान्यताओं के अनुसार, उल्टा तवा रखने से राहु दोष बढ़ सकता है। इसकी वजह से घर में विवाद, मानसिक तनाव और आपसी मतभेद बढ़ने की आशंका रहती है। कुछ जगहों पर इसे परिवार के मुखिया के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने से भी जोड़ा जाता है।
तवे से जुड़े वास्तु नियम
तवे का उपयोग करने के बाद उसे अच्छी तरह साफ करके सुखा लें और हमेशा सीधा रखें। इसके अलावा तवे को ऐसी जगह रखने की सलाह दी जाती है, जहां बाहर से आने वाले व्यक्ति की सीधी नजर तवे पर न पड़े।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
देश-दुनिया के कोने-कोने में कई खूबसूरत और आस्था को प्रगाढ़ करते देवालय हैं, जिनके शिखर मात्र से भक्तों का मन प्रसन्न हो जाता है। मात्र देवालय या शिखर ही नहीं बल्कि मंदिर के आस पास की जगह भी बेहद खूबसूरत और उससे जुड़ी कथा हैरत में डालती है।
ऐसा ही नारायण को समर्पित राजस्थान में एक खूबसूरत गांव है, जो नारायण को समर्पित है। खास बात है कि नारायण के इस गांव में मिट्टी के कच्चे घरों में कभी ताले नहीं लगते और साल 2024 में बेस्ट टूरिज्म विलेज का खिताब भी मिल चुका है। राजस्थान की अरावली पर्वत शृंखला की गोद में बसा एक अनोखा गांव आज पूरे देश और दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। नाम है देवमाली।
अजमेर जिले के ब्यावर क्षेत्र का यह छोटा सा गांव न केवल अपनी प्राचीन मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं ने इसे भारत का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव बना दिया है।साल 2024 में केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग ने विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर देवमाली गांव को बेस्ट टूरिज्म विलेज का प्रतिष्ठित खिताब प्रदान किया था।
यह पुरस्कार ब्यावर के तत्कालीन कलेक्टर और गांव की सरपंच ने ग्रहण किया था। राजस्थान पर्यटन विभाग भी इस गांव को विशेष रूप से प्रचारित कर रहा है।देवमाली गांव भगवान देव नारायण को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि लगभग एक हजार वर्ष पहले जब देव नारायण भगवान यहां पधारे थे, तो गांव के सभी पत्थर और चट्टानें उन्हें नमन करने के लिए झुक गई थीं। आज भी गांव के चारों ओर झुकी हुई चट्टानें इस पौराणिक कथा की गवाही देती हैं।
देवमाली की सबसे बड़ी खासियत यहां के घर हैं। पूरे गांव में कोई भी पक्का मकान नहीं बनाया जाता। घर केवल पीली मिट्टी और गाय के गोबर से बनाए जाते हैं। हर दो-तीन महीने में इनकी लिपाई-पुताई होती है, जिसे शुद्धिकरण माना जाता है। गांववासी मानते हैं कि भगवान देव नारायण ने वचन दिया था, “मेरा मंदिर पक्का रखो, तुम्हारे घर कच्चे रखो”। इस परंपरा को आज भी सख्ती से निभाया जाता है।
सबसे अनोखी बात यहां के घरों में कभी ताले नहीं लगते।गांववासी गर्व से कहते हैं कि सदियों से यहां न चोरी होती है और न कोई विवाद। चाहे कोई करोड़पति हो या साधारण किसान, सब एक समान कच्चे घरों में रहते हैं। व्यसनों पर भी पूर्ण प्रतिबंध है, न शराब, न मांस का उपयोग होता है।
शनिवार को दूध नहीं बेचा जाता, उसे खीर बनाकर या पड़ोसियों में बांट दिया जाता है।देवमाली पर्यटकों को पारंपरिक ग्रामीण जीवन का शानदार अनुभव कराता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव अरावली की हरी-भरी वादियों से घिरा हुआ है। यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन देव नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मंदिर में दर्शन करने व मत्था टेकने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
दुनिया में कई बार ऐसी चीजें सामने आती हैं, जिनकी असली पहचान सामने आने में दशकों लग जाते हैं। अंटार्कटिका से जुड़ी एक ऐसी ही हैरान करने वाली खोज इन दिनों चर्चा में है। करीब 40 साल तक एक दराज में सामान्य पत्थर की तरह पड़ा एक नमूना जब वैज्ञानिकों की नजर में आया और उसकी गहराई से जांच की गई, तो उसकी असली पहचान ने सभी को चौंका दिया।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिसे इतने वर्षों तक मामूली पत्थर समझकर रखा गया था, वह दरअसल एक दुर्लभ डायनासोर की पूंछ की हड्डी का जीवाश्म निकला।
1985 में अंटार्कटिका से मिला था नमूना
इस जीवाश्म की कहानी करीब चार दशक पुरानी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1985 में अंटार्कटिका में एक वैज्ञानिक अभियान के दौरान यह नमूना मिला था। खोज के बाद इसे ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के कैम्ब्रिज स्थित भूवैज्ञानिक संग्रह में सुरक्षित रख दिया गया।
नमूना वहां लंबे समय तक पड़ा रहा, लेकिन इसकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच नहीं हो सकी। हाल के वर्षों में जब विशेषज्ञों ने पुराने जीवाश्मों और भूवैज्ञानिक नमूनों की दोबारा जांच शुरू की, तब यह नमूना भी उनके सामने आया।
इसके बाद इसकी बारीकी से जांच की गई और पता चला कि यह कोई साधारण चट्टान नहीं है।
जांच में सामने आई डायनासोर की कहानी
वैज्ञानिकों की जांच में संकेत मिला कि यह टाइटेनोसॉर नाम के विशाल शाकाहारी डायनासोर की पूंछ की हड्डी का हिस्सा है।
टाइटेनोसॉर विशाल आकार वाले शाकाहारी डायनासोरों का एक समूह था। इनके जीवाश्म दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मिले हैं। लेकिन अंटार्कटिका से डायनासोर के जीवाश्मों का मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
यही वजह है कि करीब 40 साल तक संग्रह में रखे इस नमूने की पहचान सामने आने के बाद वैज्ञानिकों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।
आज बर्फ से ढका अंटार्कटिका कभी था हरा-भरा
आज अंटार्कटिका का नाम सुनते ही बर्फ से ढका विशाल इलाका आंखों के सामने आता है। लेकिन करोड़ों साल पहले इस महाद्वीप का वातावरण बिल्कुल अलग था।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी के प्राचीन इतिहास के अलग-अलग दौर में अंटार्कटिका का मौसम आज की तुलना में काफी गर्म रहा होगा। यहां वनस्पतियां और जंगल मौजूद थे और विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु भी रहते थे।
डायनासोर का यह जीवाश्म उसी प्राचीन दुनिया की झलक देता है। इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उस समय अंटार्कटिका का पर्यावरण कैसा था और वहां रहने वाले जीव किस तरह के थे।
पुराने संग्रहों में छिपे हैं कई और राज
इस खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दुनिया के संग्रहालयों और शोध संस्थानों में दशकों पुराने हजारों जीवाश्म और भूवैज्ञानिक नमूने सुरक्षित रखे हुए हैं। इनमें से कई की पहचान या वैज्ञानिक महत्व अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।
नई तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के जरिए अब पुराने नमूनों की दोबारा जांच की जा रही है। ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में वैज्ञानिकों को पुराने संग्रहों से ही कई और महत्वपूर्ण जीवाश्म मिलें।
40 साल बाद बदली एक ‘पत्थर’ की पहचान
करीब चार दशक तक दराज में पड़े इस नमूने की कहानी यह बताती है कि वैज्ञानिक खोज हमेशा नई जगह पर खुदाई करने से ही नहीं होती। कई बार किसी संग्रह में वर्षों से रखी चीज भी बड़े वैज्ञानिक रहस्य का जवाब अपने अंदर छिपाए होती है।
जिस नमूने को कभी साधारण पत्थर समझकर रख दिया गया था, वही अब अंटार्कटिका के प्राचीन इतिहास और डायनासोरों की दुनिया को समझने में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन गया है।
एक मध्यवर्गीय परिवार का सबसे बड़ा सपना होता है कि कब उसके पास अपना घर होगा। एक घर को लेने के लिए आम आदमी अपने पूरे जीवन की जमापूंजी लगा देता है। इतना ही नहीं वो अपने आने वालों सालो की कमाई को भी एक घर को खरीदने में लगा देता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई से नया आशियाना तलाशते हैं ताकि परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। लेकिन कई बार हम वास्तु के नियमों को अनदेखा कर देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की गलत दिशा आपके फ्लैट में वास्तु दोष उत्पन्न कर सकता है। इसके साथ ही आपके घर में नकारात्मकता भी फैला सकता है। तो चलिए जानते हैं कि नया फ्लैट खरीदते समय किन महत्वपूर्ण वास्तु नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है।
मुख्य प्रवेश द्वार
वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का मुख्य द्वार उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व दिशा में होना सबसे अधिक शुभ माना जाता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित मुख्य द्वार को सामान्यतः कम शुभ माना जाता है। वहीं ध्यान रखें कि दरवाजे के सामने सीढ़ियां, बंद दीवार या संकरी गैलरी न हो।
रसोई की दिशा
रसोई की दिशा हमेशा दक्षिण-पूर्व दिशा में होना सबसे शुभ माना जाता है। दक्षिण-पूर्व दिशा अग्नि तत्व की दिशा मानी जाती है। इसके अलावा उत्तर-पश्चिम दिशा भी रसोई यानी किचन के लिए उत्तम होता है।
मास्टर बेडरूम की दिशा
फ्लैट का मास्टर बेडरूप की दिशा का भी ध्यान रखें। मास्टर बेडरूम दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना अच्छा माना जाता है। इस दिशा में मास्टर बेडरूम होने से आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता मजबूत होता है।
टॉयलेट की दिशा
फ्लैट खरीदते समय टॉयलेट की दिशा का जरूर ध्यान रखें। टॉयलेट कभी भी उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए। वास्तु के अनुसार यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। शौचालय का स्थान पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना बेहतर माना जाता है।
बालकनी और खिड़कियों की दिशा
उत्तर और पूर्व दिशा में खुलने वाली बालकनी या बड़ी खिड़कियां घर में प्राकृतिक प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा लाने में सहायक मानी जाती हैं।
फ्लैट का आकार
वास्तु शास्त्र के अनुसार, फ्लैट का आकार वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। ऐसे फ्लैट सबसे अच्छे माने जाते हैं। वहीं फ्लैट का उत्तर-पूर्व दिशा खुला होना चाहिए तभी सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा। वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) को सबसे पवित्र दिशा माना गया है
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
नई दिल्ली। ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में शामिल डार्क मैटर को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक दिलचस्प संकेत मिला है। अमेरिका में जमीन के करीब एक मील नीचे स्थापित एक बेहद संवेदनशील डिटेक्टर ने एक ऐसी घटना रिकॉर्ड की है, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इसे डार्क मैटर की सीधी खोज कहना अभी जल्दबाजी होगी।
LZ डिटेक्टर ने दर्ज किया खास संकेत
यह संकेत LUX-ZEPLIN (LZ) नाम के डिटेक्टर से मिला है। इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील डार्क मैटर डिटेक्टरों में माना जाता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके जरिए ऐसे कणों की तलाश कर रहे हैं, जो डार्क मैटर के रहस्य को समझने में मदद कर सकें।
करीब 250 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम ने लगभग दो साल तक डिटेक्टर से मिले डेटा का विश्लेषण किया। इस टीम में छह देशों के 39 संस्थानों से जुड़े शोधकर्ता शामिल हैं।
विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों को एक ऐसी घटना दिखाई दी, जिसमें किसी कण के एक परमाणु से टकराने के संकेत मिले। यही घटना अब वैज्ञानिकों के लिए खास दिलचस्पी का विषय बनी हुई है।
क्या यह WIMP कण हो सकता है?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस घटना के पीछे WIMP यानी Weakly Interacting Massive Particle की भूमिका हो सकती है। WIMP को डार्क मैटर के संभावित कणों में से एक माना जाता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर डार्क मैटर का कोई कण सामान्य पदार्थ के परमाणु से टकराता है, तो उससे बेहद कमजोर संकेत पैदा हो सकता है। LZ जैसे डिटेक्टरों को इसी तरह के बेहद सूक्ष्म संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है।
हालांकि, सिर्फ एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वैज्ञानिकों ने वास्तव में डार्क मैटर का कण पकड़ लिया है।
2.6 सिग्मा का संकेत कितना महत्वपूर्ण?
इस घटना को वैज्ञानिकों की ओर से 2.6 सिग्मा का महत्व दिया गया है। विज्ञान में सिग्मा का इस्तेमाल किसी परिणाम की सांख्यिकीय मजबूती को समझने के लिए किया जाता है।
आमतौर पर किसी नई वैज्ञानिक खोज को बेहद मजबूत प्रमाण मानने के लिए करीब 5 सिग्मा का स्तर महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में 2.6 सिग्मा का परिणाम दिलचस्प तो है, लेकिन इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिक गैटस्कैल ने भी स्पष्ट किया है कि टीम यह दावा नहीं कर रही कि उसने डार्क मैटर की खोज कर ली है। उनके मुताबिक, वैज्ञानिकों ने जरूर कुछ असामान्य और दिलचस्प देखा है, लेकिन इसकी सही व्याख्या के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।
आखिर क्या है डार्क मैटर?
डार्क मैटर ब्रह्मांड के उन रहस्यमयी घटकों में से है, जिन्हें सीधे देखा नहीं जा सकता। यह सामान्य पदार्थ की तरह प्रकाश को उत्सर्जित या परावर्तित नहीं करता, इसलिए इसे सीधे पहचानना बेहद मुश्किल है।
फिर भी वैज्ञानिकों को इसके अस्तित्व के मजबूत संकेत मिलते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण इसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव है, जो आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड में मौजूद दूसरी वस्तुओं की गति को प्रभावित करता है।
वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, ब्रह्मांड के कुल पदार्थ का लगभग 85 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर हो सकता है। यही वजह है कि इसके वास्तविक स्वरूप और कणों की पहचान करना आधुनिक भौतिकी के सबसे बड़े सवालों में से एक बना हुआ है।
LZ डिटेक्टर से मिला नया संकेत इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुराग जरूर हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों को इसे पुख्ता खोज मानने के लिए अभी और डेटा तथा स्वतंत्र प्रमाणों की जरूरत होगी।
रात के आसमान में चमकते ग्रहों को देखकर शायद ही कभी किसी के मन में यह सवाल आया हो कि आखिर ग्रहों का आकार गोल क्यों होता है? क्या वे चौकोर, त्रिकोण या पिरामिड जैसे भी हो सकते थे? इसका जवाब सीधे तौर पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से जुड़ा है।
सौरमंडल के सभी ग्रह आकार और संरचना में एक-दूसरे से काफी अलग हैं। कोई चट्टानी है तो कोई गैसों से बना विशाल ग्रह। इसके बावजूद इन सभी में एक समानता है—ये सभी लगभग गोलाकार हैं। इसके पीछे ग्रह का अपना गुरुत्वाकर्षण सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
कैसे बनते हैं ग्रह?
ग्रहों के बनने की प्रक्रिया में अंतरिक्ष में मौजूद धूल, गैस और छोटे-छोटे चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे एक-दूसरे से टकराकर जुड़ते हैं। समय के साथ जब इन पदार्थों की मात्रा बढ़ती जाती है, तो उनका गुरुत्वाकर्षण भी मजबूत होने लगता है।
एक समय ऐसा आता है जब यह गुरुत्वाकर्षण आसपास मौजूद दूसरे पदार्थों को अपनी ओर खींचने लगता है। इस तरह ग्रह का आकार लगातार बढ़ता जाता है और वह अपने आसपास के क्षेत्र में मौजूद काफी मात्रा में पदार्थ को भी आकर्षित कर लेता है।
गुरुत्वाकर्षण ग्रह को गोल कैसे बनाता है?
किसी बड़े खगोलीय पिंड में गुरुत्वाकर्षण उसके केंद्र से हर दिशा में पदार्थ को अपनी ओर खींचता है। जब किसी ग्रह का आकार काफी बड़ा हो जाता है, तो यह खिंचाव उसकी सतह को अधिक समान रूप में ढालने लगता है।
मान लीजिए ग्रह की सतह पर कहीं कोई हिस्सा बहुत ज्यादा बाहर निकला हुआ है। गुरुत्वाकर्षण उस अतिरिक्त पदार्थ को धीरे-धीरे अंदर की ओर खींचने की कोशिश करेगा। इसी तरह ग्रह के अलग-अलग हिस्सों पर गुरुत्वाकर्षण का असर पड़ता रहता है।
लंबे समय तक चलने वाली इस प्रक्रिया का परिणाम एक ऐसा आकार होता है जो लगभग गोल दिखाई देता है।
यही कारण है कि किसी बड़े ग्रह का लंबे समय तक क्यूब या पिरामिड जैसे कोणीय आकार में बने रहना स्वाभाविक नहीं है। गुरुत्वाकर्षण ऐसे उभरे हुए कोनों और किनारों को समतल करने की दिशा में काम करता है।
क्या सभी ग्रह बिल्कुल गोल होते हैं?
यह कहना सही नहीं होगा कि हर ग्रह पूरी तरह परफेक्ट गेंद की तरह गोल है। वास्तव में ज्यादातर ग्रह लगभग गोलाकार होते हैं, लेकिन उनके घूमने की गति के कारण उनमें थोड़ा बदलाव आ जाता है।
बुध और शुक्र अपेक्षाकृत ज्यादा गोलाकार ग्रह हैं। वहीं बृहस्पति और शनि जैसे तेजी से घूमने वाले ग्रह अपने ध्रुवों के पास कुछ चपटे दिखाई देते हैं।
इसका कारण उनकी तेज घूर्णन गति है।
तेजी से घूमने पर ग्रह क्यों चपटा हो जाता है?
जब कोई ग्रह अपनी धुरी पर घूमता है, तो उसकी भूमध्य रेखा के आसपास का हिस्सा बाहर की ओर उभरने लगता है। इसे इक्वेटोरियल बल्ज यानी भूमध्यरेखीय उभार कहा जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पदार्थ को केंद्र की ओर खींचता है, जबकि घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा के आसपास बाहर की ओर प्रभाव पैदा होता है। दोनों के बीच संतुलन बनने से ग्रह पूरी तरह गोल न रहकर थोड़ा चपटा हो जाता है।
शनि सबसे ज्यादा चपटा ग्रहों में से एक
सौरमंडल में शनि का भूमध्यरेखीय उभार काफी ज्यादा है। इसकी भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवों के बीच की चौड़ाई से लगभग 10.7 फीसदी अधिक है।
बृहस्पति में यह अंतर करीब 6.9 फीसदी है। इसलिए दोनों ग्रहों को पूरी तरह गोल गेंद की बजाय थोड़ा चपटे आकार के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।
दूसरी ओर पृथ्वी और मंगल अपेक्षाकृत छोटे और धीमी गति से घूमने वाले ग्रह हैं, इसलिए उनमें यह प्रभाव काफी कम दिखाई देता है। पृथ्वी की भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवीय चौड़ाई से करीब 0.3 फीसदी ज्यादा है, जबकि मंगल में यह अंतर लगभग 0.6 फीसदी है।
यूरेनस और नेपच्यून में भी घूर्णन के कारण कुछ चपटापन मौजूद है।
आखिर चौकोर ग्रह क्यों नहीं बनते?
किसी ग्रह का चौकोर या पिरामिड जैसा आकार बनाए रखने के लिए उसके कोनों और किनारों को लंबे समय तक अपनी जगह पर टिके रहना होगा। लेकिन बड़े खगोलीय पिंडों में गुरुत्वाकर्षण लगातार पदार्थ को उनके केंद्र की ओर खींचता रहता है।
इसलिए जैसे-जैसे ग्रह पर्याप्त बड़ा और भारी होता जाता है, गुरुत्वाकर्षण उसके अनियमित हिस्सों को कम करता जाता है और आकार लगभग गोल हो जाता है।
यानी ग्रहों के गोल होने की वजह यह नहीं है कि अंतरिक्ष में हर चीज स्वाभाविक रूप से गेंद जैसी होती है, बल्कि ग्रह के विशाल आकार और उसके गुरुत्वाकर्षण का लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव इसका मुख्य कारण है।
छोटे अंतरिक्ष पिंड, जैसे कई क्षुद्रग्रह, इस नियम का अलग रूप दिखाते हैं। उनका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत नहीं होता कि वे अपनी पूरी सतह को गोलाकार बना सकें। इसलिए वे अक्सर टेढ़े-मेढ़े और अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
धरती पर कश्मीर को स्वर्ग कहा जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि धरती पर प्राकृतिक देवलोक भी मौजूद है। हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में स्थित बिष्णुपुर शहर की, जो बंगाल की समृद्ध विरासत का प्रतीक है।
यहां के मंदिर सिर्फ अध्यात्म और आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि खुद में एक इतिहास को समेटे हैं। यह छोटा सा शहर अपने प्रसिद्ध उत्कृष्ट शिल्प कौशल के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें सिर्फ मिट्टी का इस्तेमाल होता है। पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में स्थित बिष्णुपुर शहर अपने आप में अनोखा है।
बिष्णुपुर शहर में कई मंदिर बने हैं जो प्राचीन होने के साथ-साथ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इस कला को देखने के लिए न सिर्फ देश के अलग-अलग राज्यों से बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। इस शहर में बने सभी मंदिरों को सिर्फ मिट्टी से बनाया गया है और किसी तरह के सीमेंट और पत्थर का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
मंदिर का बनाव बंगाल की समृद्ध विरासत की गवाही देता है।पक्की मिट्टी से तैयार इन मंदिरों की दीवारों पर महाभारत और रामायण काल की कहानियों को प्रतिमा के जरिए उकेरा गया है। यही कारण है कि यहां की मिट्टी की प्रतिमाओं में आस्था के साथ कला की छठा भी दिखती है। इन मंदिरों पर की गई जटिल मिट्टी की नक्काशी धार्मिक और सांस्कृतिक कहानियों का एक समृद्ध ताना-बाना बुनती है,
जो इन्हें भारत की स्थापत्य और ऐतिहासिक विरासत का अभिन्न अंग बनाती है।यूनेस्को ने इन मंदिरों को बेहतरीन नमूनों की अस्थायी सूची में शामिल किया है और हर साल इन मंदिरों को देखने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां आपको रासमंच मंदिर, जोड़ बांग्ला मंदिर, मदन मोहन मंदिर, रघुनाथ जीऊ मंदिर, नूतन महल, विष्णुपुर हवा महल जैसे कई मंदिर देखने को मिल जाएंगे और मुख्यत: वैष्णव धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यहां घूमने का सही समय सितंबर से दिसंबर और फरवरी-मार्च रहता है। इस समय मौसम का तापमान कम रहता है और यह घूमने के लिए सही तापमान है। इस वक्त सबसे ज्यादा संख्या में पर्यटक घूमने के लिए बिष्णुपुर शहर पहुंचते हैं।
Ajab Gajab 11 साल के इस बच्चे ने समुद्र किनारे खेलते हुए पत्थर का अजीब टुकड़ा देखा. बच्चे ने तुरंत उस अजीब पत्थर को अपने पास रख लिया. मगर जब वैज्ञानिकों ने उस पत्थर की जांच की तब वो 18 लाख साल पुराना खजाना निकला.
छोटी उम्र में ही बच्चे कभी-कभी ऐसा कारनामा कर देते हैं जिसके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह जाता है. ऐसा ही एक हैरान करने वाला मामला इंग्लैंड से सामने आया है. यहां 11 साल एक के बच्चे ने खेल-खेल में ऐसी खोज कर डाली, जिसने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है. न्यूयॉर्क पोस्ट में छपी एक खबर के मुताबिक 11 साल के इस बच्चे ने समुद्र किनारे खेलते हुए पत्थर का अजीब टुकड़ा देखा. बच्चे ने तुरंत उस अजीब पत्थर को अपने पास रख लिया. मगर जब वैज्ञानिकों ने उस पत्थर की जांच की तब वो 18 लाख साल पुराना खजाना निकला.
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समुद्र किनारे टहल रहा था बच्चा
रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना 24 मई की है. इंग्लैंड के सफोक इलाके के बोड्सी बीच पर 11 साल का चार्ली ऑर्चर्ड-लिसल अपनी मां एलेनोर के साथ टहल रहा था. तभी उसकी नजर लहरों के पास पड़े एक अजीब से पत्थर पर गई. बच्चे ने उसे पत्थर समझकर उठा लिया. मगर तभी परिवार को समझ आ गया कि ये कोई साधारण पत्थर नहीं है. बाद में वैज्ञानिक जांच के बाद पता चला कि वो साधारण पत्थर करीब 18 लाख साल पुराना हाथी का दांत निकला. मामले में चार्ली की मां ने बताया कि बीच पर पहुंचने से कुछ मिनट पहले ही उनका बेटा हाथियों के बारे में बात कर रहा था और कह रहा था कि उसे हाथी बहुत पसंद हैं. ऐसे में हाथी से जुड़ी इतनी बड़ी चीज मिलना उनके लिए किसी संयोग से कम नहीं था.
बच्चे ने खोजा 18 लाख साल पुराना खजाना
परिवार ने उस चीज की तस्वीरें एक्सपर्ट्स को भेजीं. जांच के बाद लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के जीवाश्म वैज्ञानिक प्रोफेसर एड्रियन लिस्टर ने पुष्टि की कि यह अनानकस अर्वरनेन्सिस नाम की विलुप्त हो चुकी हाथी की प्रजाति का ऊपरी जबड़े का दाढ़ वाला दांत है. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह प्रजाति करीब 85 लाख साल पहले से लेकर 20 लाख साल पहले तक धरती पर रहती थी. यह आज के अफ्रीकी हाथियों की रिश्तेदार मानी जाती है और इसकी ऊंचाई करीब 8 फीट से ज्यादा होती थी.
समुद्र की लहरों से बाहर निकला हाथी दांत
करीब 4 इंच चौड़ा यह दांत लाखों साल तक जमीन के अंदर दबा रहा. समय के साथ यह पूरी तरह खनिज में बदल गया, इसलिए आज भी इसकी बनावट काफी अच्छी हालत में है. लाखों साल पुराना हाथी दांत मिलने पर एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये जीवाश्म बोड्सी के रेड क्रैग इलाके की चट्टानों में दबा हुआ था. समुद्र की लहरों और तटीय कटाव की वजह से यह बाहर निकल आया और किनारे तक पहुंच गया, जहां चार्ली की नजर इस पर पड़ी.