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  • इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    हम्पी: भारत के प्राचीन मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला और अद्भुत नक्काशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। कर्नाटक के हम्पी स्थित विजय विट्ठल मंदिर भी ऐसी ही ऐतिहासिक धरोहर है, जहां पत्थरों से बने कुछ स्तंभों को लेकर सदियों से लोगों की खास दिलचस्पी रही है। इन्हें आमतौर पर संगीतमय स्तंभ या ‘म्यूजिकल पिलर्स’ कहा जाता है।

    इन स्तंभों की खासियत यह है कि इन पर हल्की चोट या थपकी देने पर अलग-अलग तरह की ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं। इसी वजह से इन्हें भारतीय संगीत के सुरों और वाद्य यंत्रों से जोड़कर देखा जाता है।

    15वीं शताब्दी की शानदार वास्तुकला

    विजय विट्ठल मंदिर हम्पी के ऐतिहासिक मंदिर परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम्पी को यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। यह क्षेत्र कभी शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

    विट्ठल मंदिर भगवान विष्णु के विट्ठल स्वरूप को समर्पित है। मंदिर परिसर में प्रसिद्ध पत्थर का रथ भी मौजूद है, लेकिन इसकी वास्तुकला के साथ-साथ संगीतमय स्तंभ भी लोगों का ध्यान खींचते हैं।

    मंदिर के निर्माण और विस्तार का काम विजयनगर काल के अलग-अलग शासकों के दौर में हुआ था। इसी वजह से इसकी वास्तुकला में कई चरणों की झलक दिखाई देती है।

    56 स्तंभों में छिपा है ध्वनि का रहस्य

    मंदिर के महामंडप में मौजूद स्तंभों को बेहद बारीकी से तराशा गया है। मुख्य स्तंभों के आसपास कई छोटे और पतले स्तंभनुमा हिस्से बनाए गए हैं। इन्हीं को ‘संगीतमय स्तंभ’ कहा जाता है।

    इन पर हल्की थाप देने से अलग-अलग आवृत्ति की ध्वनियां पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि इनके बारे में लंबे समय से यह धारणा चली आ रही है कि इन पत्थरों से संगीत के सुर निकलते हैं।

    हालांकि आज संरक्षण के कारण पर्यटकों को इन ऐतिहासिक स्तंभों को छूने या थपथपाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए इनके बारे में प्रचलित जानकारी को पुराने विवरणों और अध्ययनों के संदर्भ में समझना चाहिए।

    क्या पत्थरों के अंदर कोई खोखली जगह थी?

    इन स्तंभों को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कुछ पुराने विवरणों में यह भी दावा मिलता है कि ब्रिटिश काल में इनकी संरचना का रहस्य जानने के लिए कुछ स्तंभों को काटकर देखा गया था।

    कहा जाता है कि जांच के दौरान इनके भीतर कोई छिपा हुआ यंत्र या धातु की संरचना नहीं मिली। हालांकि इस घटना से जुड़े विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि और उनके अलग-अलग संस्करणों को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।

    आखिर पत्थर से आवाज निकलती कैसे है?

    इसका जवाब केवल यह कह देना नहीं है कि पत्थर में कोई खास धातु मौजूद होने के कारण संगीत पैदा होता है। ध्वनि उत्पन्न होने के पीछे पत्थर की संरचना, आकार, लंबाई, मोटाई, तराशने की तकनीक और कंपन के गुण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    जब किसी ठोस संरचना को विशेष आकार दिया जाता है और उस पर चोट की जाती है, तो उसमें कंपन पैदा होता है। अलग-अलग आकार और संरचना वाले हिस्से अलग-अलग आवृत्तियों पर कंपन कर सकते हैं। इसी वजह से उनसे अलग-अलग ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं।

    विजय विट्ठल मंदिर के स्तंभों की खासियत यह है कि प्राचीन शिल्पकारों ने पत्थर को इस तरह तराशा कि उसके विभिन्न हिस्सों में अलग तरह के कंपन पैदा हो सकें। यही प्राचीन स्थापत्य और शिल्प कौशल इस मंदिर को खास बनाता है।

    क्या सच में ‘सारेगामा’ के सातों सुर निकलते हैं?

    मंदिर के संगीतमय स्तंभों को अक्सर भारतीय संगीत के सुरों से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे शाब्दिक रूप से हर स्तंभ से बिल्कुल सटीक सा-रे-गा-मा निकलने के दावे के रूप में नहीं समझना चाहिए।

    असल में इन स्तंभों की विशेषता उनकी ध्वनि और कंपन से जुड़ी है। अलग-अलग स्तंभों या उनके हिस्सों से अलग आवृत्तियों की आवाजें सुनाई देने की बात पुराने विवरणों में मिलती है।

    विजय विट्ठल मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि सदियों पहले बिना आधुनिक मशीनों और कंप्यूटर तकनीक के शिल्पकारों ने पत्थर की संरचना, अनुपात और कंपन को समझते हुए ऐसी अद्भुत वास्तुकला तैयार की।

    आज ये स्तंभ केवल संगीत से जुड़े रहस्य के कारण ही नहीं, बल्कि विजयनगर साम्राज्य की उन्नत स्थापत्य कला और शिल्प कौशल के प्रमाण के रूप में भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

  • मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ, उत्तर प्रदेश: अमित कश्यप हत्याकांड में करीब 540 दिनों की सुनवाई के बाद अदालत ने उसकी पत्नी रविता कश्यप और उसके कथित प्रेमी अमरदीप को दोषी करार दिया है। मामले में अभियोजन की ओर से 12 गवाह पेश किए गए। पुलिस जांच में सामने आए कॉल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सांप से जुड़ी गवाही को भी अहम साक्ष्य माना गया।

    इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हत्या को कथित तौर पर सांप के डसने से हुई मौत का रूप देने की कोशिश की गई थी। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सर्पदंश का कोई निशान नहीं मिला और मौत का कारण दम घुटना सामने आया।

    हत्या के बाद 51 बार हुई बातचीत

    अभियोजन के मुताबिक, 12 अप्रैल 2025 की रात से अगले दिन तक रविता और अमरदीप के बीच 51 बार बातचीत हुई थी। मोबाइल कंपनियों के अधिकारियों ने अदालत में कॉल डिटेल रिकॉर्ड की पुष्टि की।

    अभियोजन का कहना था कि हत्या के बाद अमरदीप अपनी बुआ के घर चला गया था और वहां से रविता से बार-बार संपर्क कर रहा था। बचाव पक्ष ने इस घटनाक्रम पर अलग दलील दी।

    रविता ने अदालत में दावा किया कि जिस नंबर पर अमरदीप से बातचीत हुई, वह अमित इस्तेमाल कर रहा था और उसने खुद अमरदीप को कोई कॉल नहीं की थी। अभियोजन ने इस दावे को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर चुनौती दी।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    जांच अधिकारी ने अदालत में बताया कि पोस्टमार्टम के अनुसार अमित की मौत 12 अप्रैल की रात ही हो चुकी थी। ऐसे में अगले दिन अमित के मोबाइल से बातचीत होने का दावा संदेह के घेरे में आया।

    अमित की मां मुनेश और भाई मोनू को भी अभियोजन की ओर से गवाह बनाया गया। मां ने अमरदीप को 12 अप्रैल की रात घर से निकलते देखने की बात अदालत में कही।

    अभियोजन ने अमरदीप की गतिविधियों के समय को लेकर भी अदालत में तर्क दिया। बचाव पक्ष की ओर से अमरदीप के मामा ने दावा किया था कि वह रात करीब 10 बजे तक अपनी बुआ के घर पर मौजूद था। अभियोजन ने उसकी आवाजाही के समय और दूरी को सामने रखते हुए अपनी दलील रखी।

    करीब 1000 रुपये में लिया गया था सांप

    मामले में सांप की कहानी भी जांच का अहम हिस्सा बनी। अभियोजन के गवाह कृष्ण ने अदालत में बताया कि उसने करीब 1000 रुपये में सांप उपलब्ध कराया था।

    बताया गया कि सांप की मांग यह कहकर की गई थी कि उसे माता के जागरण में पूजा के लिए इस्तेमाल किया जाना है और वह जहरीला नहीं होना चाहिए। कृष्ण ने यह सांप सपेरे प्रीतम नाथ से लिया था।

    सपेरे प्रीतम नाथ ने अदालत में बताया कि उसने कृष्ण को ‘बूढ़ा घोड़ा पछाड़’ नाम का सांप दिया था। घटना के बाद सुखपाल और पिंटू ने सांप को पकड़कर बोरे में बंद करने की बात कही।

    चारपाई पर मिला था सांप, लेकिन डसने के निशान नहीं

    अभियोजन के अनुसार, सांप को अमित की चारपाई पर रखा गया था ताकि उसकी मौत को सर्पदंश से हुई घटना बताया जा सके। हालांकि, पोस्टमार्टम के दौरान शरीर पर सांप के काटने का कोई निशान नहीं मिला।

    इसके बाद जांच में यह सवाल महत्वपूर्ण बन गया कि अगर मौत सांप के डसने से नहीं हुई तो अमित की जान कैसे गई।

    गला दबाने से हुई मौत

    डॉक्टर कपिल गर्ग की गवाही के मुताबिक, अमित की मौत सांप के काटने से नहीं बल्कि गला और नाक-मुंह दबाने के कारण दम घुटने से हुई थी।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गर्दन पर चोट और संघर्ष के निशान पाए गए। त्वचा

  • पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    नई दिल्ली: घर का बिजली बिल हर महीने के बजट का एक अहम हिस्सा होता है। गर्मियों में एसी, कूलर और पंखों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे भारत में एक महीने में जितनी बिजली खर्च होती है, अगर उसका बिल निकाला जाए तो रकम कितनी होगी?

    हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर महीने करीब 160 से 169 अरब यूनिट बिजली की खपत होती है। उदाहरण के तौर पर अगस्त 2026 में देश में कुल बिजली खपत करीब 169.01 अरब यूनिट दर्ज की गई थी।

    हालांकि, पूरे देश का एक ही बिजली बिल नहीं होता। इसकी वजह यह है कि बिजली की दरें राज्य, उपभोक्ता वर्ग और खपत के स्लैब के अनुसार अलग-अलग होती हैं।

    घरेलू बिजली की औसत दर कितनी है?

    भारत में घरेलू बिजली की औसत दर करीब 6.86 रुपये प्रति यूनिट बताई जाती है। वहीं दुकानों, दफ्तरों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बिजली की औसत दर इससे अधिक होती है और यह करीब 10.28 रुपये प्रति यूनिट के आसपास हो सकती है।

    इसके अलावा बिजली की दरें स्लैब के हिसाब से भी बदलती हैं। यानी कम यूनिट इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता और ज्यादा बिजली खर्च करने वाले उपभोक्ता के लिए प्रति यूनिट दर अलग हो सकती है।

    अगर पूरी बिजली को घरेलू दर से जोड़ें तो कितना बनेगा?

    अगर सिर्फ समझने के लिए अगस्त 2026 की 169.01 अरब यूनिट खपत को 6.86 रुपये प्रति यूनिट की औसत घरेलू दर से गुणा किया जाए, तो रकम करीब 1.16 लाख करोड़ रुपये बैठती है।

    लेकिन यह वास्तविक राष्ट्रीय बिजली बिल नहीं है। इसकी वजह यह है कि देश की पूरी बिजली खपत घरेलू उपभोक्ताओं की नहीं होती। इसमें उद्योग, कारोबार, कृषि, सरकारी संस्थान और अन्य श्रेणियों की बिजली खपत भी शामिल होती है, जिनकी दरें अलग-अलग होती हैं।

    इसलिए वास्तविक बिल की गणना के लिए हर श्रेणी की खपत और उसके संबंधित टैरिफ को अलग-अलग देखना पड़ेगा।

    एक आम परिवार का बिजली बिल कितना आता है?

    हर परिवार का बिजली बिल उसकी खपत, राज्य की दरों और मौसम पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर कई भारतीय परिवारों में मासिक बिजली बिल कुछ सौ रुपये से लेकर कुछ हजार रुपये तक हो सकता है।

    जिन घरों में एसी, गीजर, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और दूसरे ज्यादा बिजली खपत करने वाले उपकरण हैं, वहां बिल काफी अधिक हो सकता है। वहीं कम उपकरण इस्तेमाल करने वाले परिवारों का बिल तुलनात्मक रूप से कम रहता है।

    अगस्त में बिजली की खपत क्यों बढ़ी?

    अगस्त 2026 में भारत की कुल बिजली खपत करीब 169.01 अरब यूनिट रही, जबकि अगस्त 2025 में यह लगभग 149.76 अरब यूनिट थी। यानी सालाना आधार पर बिजली की खपत में करीब 12.85 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

    इस दौरान कई इलाकों में गर्मी और उमस बनी रही। ऐसे मौसम में लोग एयर कंडीशनर, कूलर और दूसरे कूलिंग उपकरणों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसका सीधा असर बिजली की मांग पर पड़ता है।

    बिजली की पीक डिमांड भी बढ़ी

    बिजली की कुल खपत के साथ-साथ एक समय पर सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत यानी पीक डिमांड में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    अगस्त 2025 में अधिकतम बिजली मांग करीब 229.72 गीगावाट थी, जो अगस्त 2026 में बढ़कर लगभग 258.27 गीगावाट तक पहुंच गई। हालांकि यह मई में दर्ज करीब 270.82 गीगावाट की अधिकतम मांग से कम रही।

    बिजली बिल किन चीजों से तय होता है?

    किसी उपभोक्ता का बिजली बिल सिर्फ यूनिट को प्रति यूनिट दर से गुणा करने से तय नहीं होता। इसमें कई दूसरे शुल्क भी शामिल हो सकते हैं। राज्य और बिजली वितरण कंपनी के अनुसार फिक्स्ड चार्ज, ऊर्जा शुल्क, टैक्स, ड्यूटी, सरचार्ज और अन्य नियामकीय शुल्क लग सकते हैं।

    यही वजह है कि एक ही मात्रा में बिजली इस्तेमाल करने वाले दो परिवारों का बिल अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है।

    भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और मौसम, औद्योगिक गतिविधियों तथा घरेलू उपकरणों के इस्तेमाल में बदलाव का सीधा असर बिजली खपत पर पड़ता है। इसलिए पूरे देश के ‘एक महीने के बिजली बिल’ का कोई एक तय आंकड़ा नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय खपत को औसत दरों से जोड़ने पर यह रकम दसियों हजार करोड़ रुपये से लेकर एक लाख करोड़ रुपये से भी अधिक के स्तर पर पहुंच सकती है।

  • गाजियाबाद: बेटे की मौत को हादसा नहीं मान रहे रिटायर्ड वायु सैनिक, तीन दिन से धरने पर बैठे पिता ने मांगी CBI जांच.

    गाजियाबाद: बेटे की मौत को हादसा नहीं मान रहे रिटायर्ड वायु सैनिक, तीन दिन से धरने पर बैठे पिता ने मांगी CBI जांच.

    गाजियाबाद: बेटे की मौत को हादसा नहीं मान रहे रिटायर्ड वायु सैनिक, तीन दिन से धरने पर बैठे पिता ने मांगी CBI जांच.

    गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश: अपने बेटे की मौत के मामले में न्याय की मांग को लेकर एक सेवानिवृत्त वायु सैनिक पिछले तीन दिनों से गाजियाबाद कलक्ट्रेट के बाहर धरने पर बैठे हैं। रिटायर्ड वायु सैनिक खजान सिंह का कहना है कि उनके बेटे आयुष प्रताप सिंह की मौत को शुरुआत में हादसा माना गया था, लेकिन बाद में सामने आए कुछ तथ्यों ने उन्हें घटना पर संदेह करने के लिए मजबूर किया।

    खजान सिंह का कहना है कि वह भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनका कहना है कि जिस दिन देश में एयरफोर्स डे मनाया जा रहा है, उस दिन भी वह कार्यक्रम में शामिल होने के बजाय अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठे हैं।

    दही लेने घर से निकला था बेटा

    खजान सिंह के अनुसार, उनका बेटा आयुष IIT की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। 28 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब एक बजे वह घर से दही लेने के लिए निकला था। काफी देर तक वापस नहीं आने पर परिवार ने उसके मोबाइल पर फोन किया।

    पिता का दावा है कि फोन किसी दूसरे व्यक्ति ने उठाया और बताया कि आश्रम रोड पर आयुष का एक्सीडेंट हो गया है और उसे महात्मा गांधी अस्पताल ले जाया जा रहा है। परिवार के लोग अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने आयुष को मृत घोषित कर दिया।

    CCTV और हेलमेट को लेकर पिता ने उठाए सवाल

    खजान सिंह का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने भी इसे सड़क हादसा ही माना था, लेकिन बाद में उन्हें यह बात संदिग्ध लगी कि आयुष दही लेने के लिए घर से करीब साढ़े तीन किलोमीटर दूर क्यों गया था।

    उन्होंने खुद घटना की जानकारी जुटानी शुरू की। पिता के मुताबिक, घटनास्थल से कुछ दूरी पहले लगे CCTV की फुटेज में आयुष के हेलमेट पहने होने की जानकारी मिली। उनका आरोप है कि हादसे के दौरान उसके सिर और नाक पर चोट लगी, जबकि हेलमेट सड़क के दूसरी तरफ पड़ा मिला। इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर वह घटना की दोबारा जांच की मांग कर रहे हैं।

    ठेकेदार समेत चार लोगों पर लगाया आरोप

    खजान सिंह ने आरोप लगाया है कि पाइपलाइन डालने के काम में कथित भ्रष्टाचार का विरोध करने के कारण कुछ लोगों से उनकी रंजिश थी। उनका दावा है कि इसी विवाद के चलते एक ठेकेदार समेत चार लोगों की भूमिका उनके बेटे की मौत में हो सकती है।

    हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस जांच में ही यह स्पष्ट होगा कि आयुष की मौत सड़क हादसा थी या इसके पीछे कोई अन्य वजह थी।

    छह अक्टूबर से धरना, CBI जांच की मांग

    खजान सिंह के मुताबिक, उन्होंने मामले में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन अभी तक आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसी के विरोध में उन्होंने 6 अक्टूबर से गाजियाबाद कलक्ट्रेट के बाहर धरना शुरू किया है।

    धरने के पहले दिन उन्होंने भूख हड़ताल भी की। किसान यूनियन ने भी उनके आंदोलन को समर्थन दिया है। संगठन की ओर से मुख्यमंत्री के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर मामले की CBI जांच कराने की मांग की गई है।

    परिवार अब मामले की निष्पक्ष जांच और बेटे की मौत की असली वजह सामने लाने की मांग कर रहा है।

  • फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    वृंदावन: संतों की परंपरा में कई साधु अपने कठोर नियमों और खान-पान की विशेष तपस्या के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं में एक नाम फलाहारी महाराज का भी सामने आता है। हाल के एक विवाद के बाद उनके नाम और जीवनशैली को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसी संत को फलाहारी क्यों कहा जाता है और क्या फलाहारी होने का मतलब सिर्फ फल खाना होता है?

    हाल ही में वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के केलीकुंज आश्रम से जुड़े विवाद के बीच श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा, जिन्हें फलाहारी महाराज के नाम से जाना जाता है, की ओर से विराट कोहली से जुड़ा एक दावा सामने आया था। इस दावे में प्रेमानंद महाराज से मुलाकात को लेकर आर्थिक लेनदेन का आरोप लगाया गया था।

    हालांकि, विराट कोहली के प्रवक्ता ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि विराट कोहली और अनुष्का शर्मा प्रेमानंद महाराज के प्रति श्रद्धा और आस्था के कारण उनसे मिलने जाते हैं। ऐसे में इस विवाद से अलग यह जानना भी दिलचस्प है कि ‘फलाहारी’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है।

    संतों को फलाहारी क्यों कहा जाता है?

    हिंदू धार्मिक परंपरा में फलाहारी शब्द ऐसे व्यक्ति या साधु के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आहार में अनाज का त्याग कर देता है और फल, दूध तथा कुछ अन्य सात्विक खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहता है।

    यह किसी व्यक्ति का पारिवारिक नाम या जातिगत पहचान नहीं होती। कई बार साधु अपने धार्मिक संकल्प, तपस्या या साधना के दौरान अनाज का त्याग करते हैं। इसके बाद उनकी इसी जीवनशैली के कारण लोग उन्हें फलाहारी कहकर संबोधित करने लगते हैं।

    क्या फलाहारी संत सिर्फ फल ही खाते हैं?

    फलाहारी शब्द सुनकर अक्सर लोगों को लगता है कि ऐसे संत पूरे जीवन केवल फल खाकर ही रहते होंगे। लेकिन फलाहार का अर्थ हर स्थिति में केवल फल खाना नहीं होता।

    कई फलाहारी साधुओं के आहार में मौसमी फल के साथ सूखे मेवे, मखाना, दूध, दही, मट्ठा, नारियल पानी और अन्य सात्विक चीजें भी शामिल हो सकती हैं। हालांकि यह हर संत के व्यक्तिगत संकल्प और नियम पर निर्भर करता है।

    कुछ साधु अपने नियमों के तहत पके हुए भोजन, मसालों और अनाज से पूरी तरह दूरी बनाए रखते हैं, जबकि फलाहार की अलग-अलग परंपराओं में आहार के नियम अलग हो सकते हैं।

    फलाहार को तपस्या से क्यों जोड़ा जाता है?

    धार्मिक दृष्टि से भोजन पर नियंत्रण को कई साधना परंपराओं में आत्मसंयम का हिस्सा माना गया है। साधु-संत अपने संकल्प के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं और इसे अपनी आध्यात्मिक साधना से जोड़ते हैं।

    इसी वजह से फलाहारी संतों की जीवनशैली आम लोगों से काफी अलग नजर आती है। उनके लिए यह केवल खान-पान का बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और संकल्प का हिस्सा हो सकता है।

    क्या हर फलाहारी संत का आहार एक जैसा होता है?

    ऐसा जरूरी नहीं है। फलाहारी कोई एक तय डाइट चार्ट नहीं है। अलग-अलग संत अपनी साधना और परंपरा के अनुसार अलग नियम अपना सकते हैं।

    इसलिए किसी एक फलाहारी संत के भोजन के आधार पर सभी फलाहारी साधुओं की जीवनशैली के बारे में निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। किसी संत के बारे में यह जानने के लिए उनके स्वयं बताए गए नियमों और परंपरा को ही आधार माना जाना चाहिए।

    फलाहारी महाराज को लेकर हालिया विवाद ने भले ही उनके नाम को चर्चा में ला दिया हो, लेकिन ‘फलाहारी’ शब्द का मूल संबंध साधु-संतों की आहार संबंधी तपस्या और अनाज त्याग की परंपरा से है।

  • रामपुर: शराब के ठेके पर दिनदहाड़े छह गोलियां चलने से सनसनी, 24 से ज्यादा मुकदमों वाले बदमाश की हत्या.

    रामपुर: शराब के ठेके पर दिनदहाड़े छह गोलियां चलने से सनसनी, 24 से ज्यादा मुकदमों वाले बदमाश की हत्या.

    रामपुर: शराब के ठेके पर दिनदहाड़े छह गोलियां चलने से सनसनी, 24 से ज्यादा मुकदमों वाले बदमाश की हत्या.

    रामपुर, उत्तर प्रदेश: बिलासपुर कोतवाली क्षेत्र में गुरुवार को शराब के ठेके पर दिनदहाड़े गोलीबारी से हड़कंप मच गया। बाइक सवार तीन हमलावरों ने एक व्यक्ति पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली लगने से उसकी मौत हो गई। मृतक की पहचान सनी उर्फ सनया के रूप में हुई है।

    शराब के ठेके पर हुई वारदात

    बताया जा रहा है कि सनी गांव स्थित शराब के ठेके पर मौजूद था। इसी दौरान एक बाइक पर सवार होकर तीन हमलावर वहां पहुंचे और उस पर फायरिंग कर दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमलावरों ने करीब छह गोलियां चलाईं और वारदात के बाद मौके से फरार हो गए।

    गोलीबारी से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलने पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल की जांच शुरू की।

    मृतक पर दो दर्जन से ज्यादा मुकदमे

    पुलिस के अनुसार, मृतक मूल रूप से बरेली का रहने वाला था और वर्तमान में बिलासपुर के सुभाषनगर डिबडिबा क्षेत्र में रह रहा था। उसके खिलाफ करीब 24 से ज्यादा मुकदमे दर्ज होने की बात सामने आई है।

    मृतक पर गुंडा एक्ट के तहत भी कार्रवाई हो चुकी थी। पुलिस के मुताबिक, इससे पहले एक मुठभेड़ के दौरान उसे गिरफ्तार किया गया था और उस कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगने से वह घायल हुआ था।

    हमलावरों की तलाश में जुटी पुलिस

    फिलहाल हत्या के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं हो सकी है। पुलिस हमलावरों की पहचान और वारदात के कारणों का पता लगाने में जुटी है।

    पुलिस आसपास के लोगों से पूछताछ करने के साथ घटनास्थल के आसपास उपलब्ध CCTV फुटेज की भी जांच कर रही है। हमलावर किस दिशा से आए और वारदात के बाद किस रास्ते से फरार हुए, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।

    मामले में पुलिस का कहना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ हत्या की वजह और हमलावरों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।

  • अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर का महीना आमतौर पर मानसून की विदाई और मौसम में बदलाव के लिए जाना जाता है। इस दौरान दिन की तेज गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती है और सुबह-शाम हल्की ठंडक महसूस होने लगती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते मिजाज ने इस सामान्य पैटर्न को काफी प्रभावित किया है।

    मौसम विभाग के ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, 2024 का अक्टूबर भारत के लिए बेहद गर्म रहा था। 1901 के बाद के उपलब्ध आंकड़ों में इसे देश के सबसे गर्म अक्टूबर महीनों में दर्ज किया गया। इस दौरान औसत तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा।

    इतिहास में सबसे गर्म अक्टूबर कब रहा?

    अगर किसी एक साल के अक्टूबर में दर्ज औसत अधिकतम तापमान की बात करें, तो 1951 का अक्टूबर खास तौर पर गर्म रहा था। उस दौरान दिल्ली के सफदरजंग मौसम केंद्र पर अक्टूबर का औसत अधिकतम तापमान करीब 36.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।

    इसके अलावा 1941 में औसत अधिकतम तापमान करीब 35.8 डिग्री और 1907 में करीब 35.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। ये आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में असामान्य गर्मी कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है, हालांकि हाल के वर्षों में तापमान और मौसम के पैटर्न में बदलाव को लेकर चिंता बढ़ी है।

    वहीं, 2024 में देश के औसत अक्टूबर तापमान ने भी नया रिकॉर्ड बनाया और यह महीना लंबे समय के औसत की तुलना में काफी गर्म रहा।

    फिर कब आती है गुलाबी ठंड?

    अक्टूबर के दूसरे हिस्से में आमतौर पर उत्तर भारत के कई इलाकों में रात और सुबह के तापमान में धीरे-धीरे गिरावट शुरू हो जाती है। इसी हल्की ठंडक को आम बोलचाल में ‘गुलाबी ठंड’ कहा जाता है।

    हालांकि इसकी कोई एक निश्चित तारीख नहीं होती। किसी साल अक्टूबर के मध्य में ही सुबह-शाम ठंडक महसूस होने लगती है, जबकि गर्म मौसम वाले वर्षों में नवंबर तक गर्मी बनी रह सकती है।

    1951 या 2024 जैसे गर्म अक्टूबर को देखते हुए यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे देश में एक ही तारीख को गुलाबी ठंड ने दस्तक दी थी। मौसम का बदलाव स्थान, हवाओं, बारिश और तापमान के हिसाब से अलग-अलग समय पर होता है।

    अक्टूबर में गर्मी बढ़ने की क्या वजह होती है?

    मानसून की वापसी के बाद भी अगर बारिश और बादल बने रहें तथा हवा में नमी ज्यादा हो, तो कई इलाकों में उमस बनी रह सकती है। दूसरी ओर, उत्तर भारत में ठंडी हवाओं की शुरुआत देर से होने पर तापमान लंबे समय तक सामान्य से ऊपर रह सकता है।

    पश्चिमी विक्षोभ भी उत्तर भारत के मौसम को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण मौसमी प्रणालियों में शामिल हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश या बर्फबारी होने पर वहां से आने वाली ठंडी हवाएं मैदानी इलाकों के तापमान को प्रभावित कर सकती हैं।

    इसके अलावा बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाली मौसम प्रणालियां भी देश के अलग-अलग हिस्सों में नमी, बादल और बारिश के हालात बदल सकती हैं।

    मौसम में बदलाव क्यों है चिंता की बात?

    अक्टूबर में गर्मी बढ़ना सिर्फ असहज मौसम तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक तापमान सामान्य से ऊपर रहने पर बिजली की मांग, फसलों, स्वास्थ्य और स्थानीय मौसम चक्र पर भी असर पड़ सकता है।

    इसी तरह, ठंड की शुरुआत में देरी होने पर सर्दियों का सामान्य पैटर्न भी प्रभावित हो सकता है। हालांकि हर साल मौसम का व्यवहार अलग होता है, इसलिए किसी एक साल के रिकॉर्ड के आधार पर पूरे भविष्य के मौसम का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।

    इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में अत्यधिक गर्मी पहले भी पड़ चुकी है, लेकिन बदलते जलवायु पैटर्न के बीच ऐसे असामान्य तापमान और उनके प्रभावों पर लगातार नजर रखना जरूरी है।

  • मथुरा: तीन दोस्तों के साथ जंगल गया युवक नहीं लौटा, पुलिस डॉग ने गड्ढे तक पहुंचाया; शव बरामद.

    मथुरा: तीन दोस्तों के साथ जंगल गया युवक नहीं लौटा, पुलिस डॉग ने गड्ढे तक पहुंचाया; शव बरामद.

    मथुरा: तीन दोस्तों के साथ जंगल गया युवक नहीं लौटा, पुलिस डॉग ने गड्ढे तक पहुंचाया; शव बरामद.

    मथुरा, उत्तर प्रदेश: कोसीकलां थाना क्षेत्र के बरका गांव में एक युवक की हत्या कर शव जंगल में दफन किए जाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने डॉग स्क्वायड की मदद से जंगल में एक गड्ढे से युवक का शव बरामद किया। मामले में युवक के साथ जंगल गए उसके तीन दोस्तों पर हत्या का आरोप लगाया गया है, जो घटना के बाद से फरार बताए जा रहे हैं।

    सुबह तीन दोस्तों के साथ जंगल गया था युवक

    बरका गांव निवासी शौकीन बुधवार सुबह करीब 8 बजे अपने तीन दोस्तों विष्णु, लक्ष्मण और आशीष के साथ जंगल की ओर गया था। तीनों दोस्त वापस गांव लौट आए, लेकिन शौकीन घर नहीं पहुंचा।

    काफी देर तक उसका इंतजार करने के बाद परिजनों को अनहोनी की आशंका हुई। परिवार के लोग तीनों दोस्तों के घर पहुंचे और शौकीन के बारे में पूछताछ की। आरोप है कि तीनों ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। इसके बाद तीनों गांव से गायब हो गए।

    परिजनों ने जताई हत्या की आशंका

    तीनों दोस्तों के अचानक गायब होने के बाद परिजनों का शक गहरा गया। परिवार ने पुलिस को शिकायत देकर तीनों युवकों पर शौकीन की हत्या करने का आरोप लगाया।

    सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और ग्रामीणों के साथ मिलकर युवक की तलाश शुरू की। काफी तलाश के बाद पुलिस ने डॉग स्क्वायड की मदद लेने का फैसला किया।

    खोजी कुत्ते ने गड्ढे तक पहुंचाया

    रात करीब 9 बजे डॉग स्क्वायड की मदद से जंगल में तलाश शुरू की गई। पुलिस के मुताबिक, खोजी कुत्ता एक स्थान पर पहुंचा, जहां जमीन में गड्ढा था। खुदाई करने पर वहां से शौकीन का शव बरामद हुआ।

    पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी है। हत्या के कारणों का अभी स्पष्ट रूप से पता नहीं चल पाया है।

    शराब पीने के बाद विवाद की आशंका

    कोसीकलां थाना प्रभारी के अनुसार, प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि चारों युवकों ने जंगल में एक साथ शराब पी थी। पुलिस को आशंका है कि इसी दौरान किसी बात को लेकर विवाद हुआ और शौकीन की हत्या कर दी गई। इसके बाद शव को गड्ढा खोदकर जमीन में दबा दिया गया।

    हालांकि, हत्या की वास्तविक वजह और वारदात में तीनों आरोपितों की भूमिका जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

    तीनों नामजद आरोपी फरार

    परिजनों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने तीनों युवकों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस उनकी तलाश में संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है।

    पुलिस का कहना है कि आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में हत्या की पूरी वजह और घटनाक्रम का खुलासा होने की उम्मीद है।

  • दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    नई दिल्ली: प्लेग का नाम आते ही इतिहास की उन भयावह महामारियों की याद आती है, जिन्होंने अलग-अलग दौर में दुनिया की बड़ी आबादी को प्रभावित किया। यर्सिनिया पेस्टिस नामक बैक्टीरिया से होने वाली यह बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित पिस्सुओं के जरिए फैलती है और इसके कुछ रूप बेहद गंभीर हो सकते हैं। हालांकि आज आधुनिक चिकित्सा के कारण प्लेग का इलाज संभव है, लेकिन दुनिया के कुछ हिस्सों में यह बीमारी अब भी मौजूद है।

    हाल ही में रूस के साइबेरिया क्षेत्र में एक महिला लैब कर्मचारी की मौत के बाद गंभीर निमोनिया और प्लेग को लेकर चर्चा तेज हुई थी। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रूस या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उसकी मौत को प्लेग संक्रमण से होने की पुष्टि नहीं की थी। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि महिला ऐसे संस्थान में काम करती थी जहां प्लेग से जुड़े बैक्टीरिया पर शोध किया जाता है।

    इतिहास में प्लेग कई बार बड़े स्तर पर तबाही मचा चुका है।

    जस्टिनियन प्लेग: छठी शताब्दी की भयावह महामारी

    541 ईस्वी के आसपास शुरू हुई जस्टिनियन प्लेग महामारी बीजान्टिन साम्राज्य के बड़े हिस्से में फैल गई थी। कॉन्स्टेंटिनोपल समेत कई क्षेत्रों में इसका गंभीर असर देखने को मिला।

    माना जाता है कि व्यापारिक मार्गों के जरिए यह संक्रमण अलग-अलग इलाकों तक पहुंचा। उस समय बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और महामारी की कई लहरों ने लंबे समय तक समाज को प्रभावित किया। मृतकों की संख्या को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग अनुमान हैं, इसलिए इसके आंकड़े निश्चित नहीं माने जाते।

    इस महामारी ने बीजान्टिन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और सामाजिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला।

    ब्लैक डेथ: यूरोप की आबादी पर सबसे बड़ा असर

    1347 से 1353 के बीच फैली ब्लैक डेथ यानी काली मौत को मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी महामारियों में गिना जाता है। यह यूरोप के साथ एशिया और मध्य पूर्व के कई हिस्सों तक पहुंची।

    व्यापारिक रास्तों के जरिए संक्रमण बंदरगाहों और फिर घनी आबादी वाले शहरों में फैल गया। अलग-अलग ऐतिहासिक अध्ययनों में मृतकों की संख्या के अलग-अलग अनुमान मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि करोड़ों लोगों की जान गई थी।

    यूरोप के कई इलाकों में आबादी का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया। इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव कई दशकों तक महसूस किए गए।

    तीसरी प्लेग महामारी: 1855 से शुरू हुआ लंबा दौर

    1855 में चीन के युन्नान प्रांत से शुरू हुई तीसरी प्लेग महामारी धीरे-धीरे दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंची। उस समय अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार बढ़ रहा था, जिसके कारण संक्रमण चीन से हांगकांग और फिर भारत सहित दूसरे क्षेत्रों तक फैल गया।

    इस महामारी के दौरान दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत हुई। भारत भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ और कई शहरों में बड़े पैमाने पर संक्रमण और मौतें दर्ज की गईं।

    इसी दौर में प्लेग को समझने में बड़ी वैज्ञानिक प्रगति हुई। 1894 में यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया की पहचान प्लेग के कारण के रूप में की गई। इसके बाद बीमारी और चूहों-पिस्सुओं के बीच संबंध को समझने में भी वैज्ञानिकों को मदद मिली।

    लंदन का ग्रेट प्लेग

    1665 में लंदन में प्लेग का एक बड़ा प्रकोप सामने आया, जिसे ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन के नाम से जाना जाता है। करीब एक साल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और शहर की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित हुआ।

    बीमारी के फैलने के साथ शहर के अमीर और सक्षम लोग दूसरे इलाकों की ओर चले गए, जबकि गरीब आबादी के पास शहर छोड़ने के विकल्प सीमित थे। प्रशासन ने संक्रमण रोकने के लिए संक्रमित घरों को अलग रखने और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए।

    1666 की लंदन की भीषण आग के बाद प्लेग के मामलों में कमी आई, लेकिन केवल आग को ही बीमारी के खत्म होने की वजह मानना सही नहीं होगा। बीमारी के प्रसार में स्वच्छता, मौसम, आबादी की स्थिति और अन्य कई कारकों की भूमिका थी।

    क्या आज भी मौजूद है प्लेग?

    प्लेग को अब केवल इतिहास की बीमारी नहीं माना जा सकता। दुनिया के कुछ हिस्सों में इसके मामले आज भी सामने आते हैं। यह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में मौजूद रहता है जहां संक्रमित जंगली कृंतक और पिस्सू पाए जाते हैं।

    हालांकि आधुनिक चिकित्सा ने स्थिति को काफी बदल दिया है। समय पर पहचान और उचित एंटीबायोटिक उपचार मिलने पर प्लेग का इलाज संभव है। इसके अलावा निगरानी, स्वच्छता, संक्रमित जानवरों और पिस्सुओं के संपर्क से बचाव जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय बीमारी के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    प्लेग का इतिहास यह दिखाता है कि किसी संक्रामक बीमारी की शुरुआती पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और समय पर उपचार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। सदियों पहले जहां इस बीमारी ने बड़े पैमाने पर जनहानि की, वहीं आज चिकित्सा विज्ञान के विकास ने इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित करना संभव बनाया है।

  • मोहाली: जीरकपुर के नेचर पार्क में गर्दन कटा शव मिलने से हड़कंप, हत्या की आशंका; मृतक की पहचान नहीं

    मोहाली: जीरकपुर के नेचर पार्क में गर्दन कटा शव मिलने से हड़कंप, हत्या की आशंका; मृतक की पहचान नहीं

    मोहाली: जीरकपुर के नेचर पार्क में गर्दन कटा शव मिलने से हड़कंप, हत्या की आशंका; मृतक की पहचान नहीं

    मोहाली, पंजाब: जीरकपुर के पीरमुछल्ला स्थित नेचर पार्क में गुरुवार सुबह एक व्यक्ति का गर्दन कटा शव मिलने से इलाके में हड़कंप मच गया। सुबह सैर के लिए पहुंचे लोगों ने शव देखा तो पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस और फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी।

    मृतक की अभी पहचान नहीं हो पाई है। शव से गर्दन अलग होने के कारण शुरुआती तौर पर हत्या की आशंका जताई जा रही है, हालांकि पुलिस ने अभी हत्या की पुष्टि नहीं की है।

    सुबह करीब 9 बजे मिली सूचना

    पुलिस को घटना की जानकारी सुबह करीब 9 बजे मिली। इसके बाद टीम ने नेचर पार्क के आसपास के इलाके को घेरकर जांच की। फोरेंसिक टीम ने मौके से जरूरी साक्ष्य जुटाए।

    पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि मृतक कौन है और वह पार्क तक कैसे पहुंचा।

    पार्क में हुई वारदात या कहीं और हत्या?

    जांच में पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि हत्या नेचर पार्क के अंदर ही की गई या किसी अन्य स्थान पर वारदात को अंजाम देने के बाद शव यहां लाकर छोड़ा गया।

    पार्क में हरियाणा की तरफ से आने का रास्ता है, जबकि पंचकूला की ओर से भी यहां पहुंचा जा सकता है। ऐसे में पुलिस इन रास्तों और आसपास की गतिविधियों की जानकारी जुटा रही है।

    CCTV फुटेज खंगाल रही पुलिस

    पुलिस आसपास लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगालने की तैयारी कर रही है। इसके अलावा पार्क के आसपास रहने वाले लोगों और सुबह वहां मौजूद लोगों से भी पूछताछ की जा रही है।

    जांच अधिकारियों का फोकस मृतक की पहचान करने के साथ-साथ यह पता लगाने पर है कि वह आखिरी बार किन लोगों के संपर्क में था।

    पोस्टमार्टम के बाद स्पष्ट होगी मौत की वजह

    शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के बाद मौत की वास्तविक वजह और गर्दन अलग होने की परिस्थितियों को लेकर अधिक जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

    फिलहाल पुलिस मामले को हत्या समेत अन्य संभावित कोणों से जांच रही है और मृतक की पहचान कराने के प्रयास जारी हैं।