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  • ओडिशा: 21 दिन तक जमीन पर सोना और फिर जलते अंगारों पर चलना! भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त करते हैं हैरान करने वाली साधना.

    ओडिशा: 21 दिन तक जमीन पर सोना और फिर जलते अंगारों पर चलना! भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त करते हैं हैरान करने वाली साधना.

    ओडिशा: 21 दिन तक जमीन पर सोना और फिर जलते अंगारों पर चलना! भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त करते हैं हैरान करने वाली साधना.

    ओडिशा: भारत में आस्था और भक्ति से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। ओडिशा के गंजाम जिले में मनाया जाने वाला ‘दंड नाटा’ भी ऐसी ही एक अनोखी धार्मिक परंपरा है। इसमें भगवान शिव के भक्त लगातार 21 दिनों तक कठिन नियमों का पालन करते हैं। कुछ श्रद्धालु इस दौरान जमीन पर सोते हैं, सादा भोजन करते हैं और नंगे पैर रहते हैं। अनुष्ठान के अंतिम चरण में कुछ प्रतिभागी जलते अंगारों पर चलते हैं, जबकि कुछ शरीर में धातु की सुइयां चुभाने या पीठ की त्वचा में लगे हुक के सहारे झूलने जैसी जोखिम भरी रस्मों में हिस्सा लेते हैं।

    यह परंपरा केवल शारीरिक सहनशक्ति का प्रदर्शन नहीं मानी जाती, बल्कि भक्तों के लिए अपनी मन्नत पूरी करने और भगवान शिव के प्रति समर्पण व्यक्त करने का माध्यम भी है।

    क्या है दंड नाटा की परंपरा?

    दंड नाटा ओडिशा के दक्षिणी हिस्से, विशेष रूप से गंजाम जिले में प्रचलित एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें भाग लेने वाले पुरुष श्रद्धालुओं को ‘दंडुआ’ कहा जाता है। यह अनुष्ठान आमतौर पर ओड़िया नववर्ष ‘पणा संक्रांति’ से पहले आयोजित किया जाता है और इसकी प्रमुख अवधि 21 दिनों की बताई जाती है।

    मान्यता के अनुसार, कुछ श्रद्धालु बीमारी, पारिवारिक परेशानी या जीवन में किसी कठिन परिस्थिति के दौरान भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं। वे मनोकामना पूरी होने पर दंड नाटा में भाग लेने का संकल्प लेते हैं। जब उन्हें लगता है कि उनकी प्रार्थना स्वीकार हो गई है, तो वे इस संकल्प को पूरा करने के लिए अनुष्ठान में शामिल होते हैं।

    भक्तों के लिए यह अपनी मन्नत निभाने और आराध्य के प्रति आभार जताने का तरीका है।

    21 दिनों तक करना पड़ता है कठिन नियमों का पालन

    दंड नाटा में शामिल होने वाले श्रद्धालु अनुष्ठान के दौरान अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली में कई बदलाव करते हैं। प्रचलित विवरणों के अनुसार, वे जमीन पर सोते हैं, नंगे पैर रहते हैं और दिन में एक बार सादा भोजन करते हैं। भोजन में चावल, दाल और सब्जियां शामिल हो सकती हैं, जबकि नमक, तेल और मसालों से परहेज करने की बात भी कही जाती है।

    इस अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन, धार्मिक शुद्धता से जुड़े नियम और पूजा-पाठ भी अनुष्ठान का हिस्सा हो सकते हैं। श्रद्धालु दिन का काफी समय प्रार्थना, धार्मिक गतिविधियों और सामुदायिक जुलूसों में बिताते हैं।

    इन नियमों का उद्देश्य भक्तों के अनुसार मन और शरीर को अनुशासित करना तथा पूजा के लिए स्वयं को तैयार करना है। हालांकि, नियमों का पालन स्थानीय परंपरा और अनुष्ठान के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

    अंतिम चरण में होते हैं जोखिम भरे अनुष्ठान

    दंड नाटा का सबसे चर्चित हिस्सा इसके अंतिम चरण में होने वाली शारीरिक रस्में हैं। इनमें सभी प्रतिभागी एक जैसी गतिविधियां करें, यह जरूरी नहीं है। कुछ श्रद्धालु जलते अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं। कुछ अपने गाल या जीभ में धातु की सुइयां चुभाते हैं।

    कुछ अनुष्ठानों में विशेष लकड़ी के ढांचे या खंभे पर पीठ की त्वचा में हुक लगाकर झूलने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी गतिविधियां देखने के लिए स्थानीय लोग बड़ी संख्या में एकत्र हो सकते हैं।

    श्रद्धालु इन रस्मों को अपनी आस्था, संकल्प और भगवान शिव के प्रति समर्पण से जोड़ते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कठिन तपस्या और अनुष्ठान के जरिए भक्त अपनी मन्नत पूरी करते हैं।

    हालांकि, इन गतिविधियों में गंभीर चोट, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं। इसलिए इन्हें देखकर स्वयं करने की कोशिश करना सुरक्षित नहीं है।

    भगवान शिव से क्यों जुड़ी है यह परंपरा?

    हिंदू धर्म में भगवान शिव को तपस्या, वैराग्य और साधना से जोड़कर देखा जाता है। शिव से संबंधित अनेक धार्मिक परंपराओं में सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर अनुशासित जीवन जीने का महत्व बताया गया है।

    दंड नाटा में भी श्रद्धालु कुछ समय के लिए सामान्य दिनचर्या से अलग होकर कठिन नियमों का पालन करते हैं। उनके लिए शरीर को अनुशासन में रखना और धार्मिक संकल्प पूरा करना भक्ति का हिस्सा है।

    यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अनुष्ठान के दौरान होने वाली असाधारण शारीरिक गतिविधियों को भक्त धार्मिक आस्था के नजरिए से देखते हैं। किसी व्यक्ति का दर्द के प्रति कम प्रतिक्रिया देना अपने आप में किसी अलौकिक शक्ति का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    पूरे गांव और समुदाय की भागीदारी

    दंड नाटा केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। इसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अनुष्ठान के दौरान धार्मिक आयोजन, पूजा-पाठ और जुलूस होते हैं, जिनमें लोग शामिल होते हैं।

    श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी करने के लिए अनुष्ठान करते हैं, जबकि समुदाय के अन्य लोग उनका साथ देते हैं और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनते हैं। इस तरह यह परंपरा स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन से भी जुड़ी हुई है।

    आधुनिक दौर में परंपरा के सामने चुनौतियां

    समय के साथ पारंपरिक धार्मिक आयोजनों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। शहरों की ओर पलायन, बदलती जीवनशैली और युवा पीढ़ी की अलग-अलग प्राथमिकताओं का असर स्थानीय परंपराओं पर भी पड़ सकता है।

    दंड नाटा में शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली कुछ रस्मों को लेकर सुरक्षा और कानूनी सवाल भी उठ सकते हैं। ऐसे में धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने के साथ-साथ प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

    दंड नाटा ओडिशा की उन परंपराओं में शामिल है, जिनमें आस्था, कठिन अनुशासन और सामुदायिक भागीदारी एक साथ दिखाई देते हैं। भक्त इसे भगवान शिव के प्रति समर्पण और मन्नत पूरी करने का माध्यम मानते हैं। वहीं, इसकी जोखिम भरी शारीरिक रस्मों को समझते समय धार्मिक मान्यताओं और स्वास्थ्य सुरक्षा—दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित विवरणों और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। अनुष्ठान की प्रक्रिया अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हो सकती है। शरीर को छेदने, जलते अंगारों पर चलने और हुक के सहारे झूलने जैसी गतिविधियां जोखिम भरी हैं; इन्हें स्वयं करने का प्रयास न करें।

  • आगरा: 3 साल के बच्चे ने बताया पिछले जन्म का राज! खुद को बताता था हत्या के शिकार दुकानदार का रूप, जानिए टीटू सिंह की रहस्यमयी कहानी.

    आगरा: 3 साल के बच्चे ने बताया पिछले जन्म का राज! खुद को बताता था हत्या के शिकार दुकानदार का रूप, जानिए टीटू सिंह की रहस्यमयी कहानी.

    आगरा: 3 साल के बच्चे ने बताया पिछले जन्म का राज! खुद को बताता था हत्या के शिकार दुकानदार का रूप, जानिए टीटू सिंह की रहस्यमयी कहानी.

    आगरा: क्या किसी बच्चे को अपने पिछले जन्म की बातें याद हो सकती हैं? क्या वह ऐसी जगहों, लोगों और घटनाओं के बारे में बता सकता है, जिनसे उसका मौजूदा जीवन में कोई परिचय न रहा हो? उत्तर प्रदेश के आगरा से जुड़ा टीटू सिंह का मामला वर्षों से ऐसे ही सवालों को लेकर चर्चा में रहा है। बताया जाता है कि बचपन में टीटू ने खुद को सुरेश वर्मा नाम के एक दुकानदार से जोड़ते हुए अपने कथित पिछले जीवन की कई बातें बताई थीं। इस मामले को पुनर्जन्म से जुड़े चर्चित दावों में गिना जाता है, हालांकि इसकी सभी कहानियों और निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

    छोटी उम्र में करने लगा था पिछले जन्म की बातें

    मीडिया में प्रकाशित विवरणों के अनुसार, टीटू सिंह का जन्म 1983 में आगरा में हुआ था। बताया जाता है कि जब वह लगभग दो से तीन साल का था, तभी उसने अपने परिवार से कहना शुरू कर दिया कि उसका एक दूसरा परिवार भी है। वह कथित तौर पर किसी दूसरी जगह जाने की बात करता और एक ऐसी दुकान का जिक्र करता था, जिसे वह अपना बताता था।

    दावों के मुताबिक, टीटू उस दुकान को रेडियो और टेलीविजन की दुकान बताता था। वह एक महिला और बच्चों का भी जिक्र करता था, जिन्हें वह अपने पिछले जीवन का परिवार मानता था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वह अपनी कथित पिछली मौत के बारे में भी बातें करता था।

    शुरुआत में परिवार के लिए यह समझना मुश्किल था कि एक छोटा बच्चा ऐसी बातें क्यों कर रहा है। लेकिन जब उसने बार-बार एक जैसी बातें बताईं, तो कथित तौर पर परिवार ने उनके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश की।

    सुरेश वर्मा की जिंदगी से जोड़ा गया मामला

    इस कहानी में सुरेश वर्मा नाम के एक व्यक्ति का जिक्र आता है, जो आगरा में रेडियो और टेलीविजन की दुकान चलाते थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, सुरेश वर्मा की 1983 में हत्या हुई थी। टीटू सिंह के बारे में किए जाने वाले दावों में कहा जाता है कि उसने अपने कथित पिछले जीवन की बातें बताते हुए सुरेश वर्मा की दुकान, परिवार और मौत से जुड़ी कुछ जानकारियों का उल्लेख किया था।

    यही समानताएं इस मामले को चर्चा में ले आईं। हालांकि, किसी बच्चे की बातों और किसी मृत व्यक्ति के जीवन के बीच समानता सामने आने भर से पुनर्जन्म वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हो जाता। ऐसे मामलों में यह देखना भी जरूरी होता है कि जानकारी पहले कैसे दर्ज की गई, उसकी पुष्टि किस तरह हुई और क्या उसके दूसरे सामान्य कारण हो सकते हैं।

    मामले की जांच से जुड़े शोधकर्ताओं का नाम

    बच्चों के पिछले जन्म की कथित यादों पर लंबे समय तक शोध करने वाले अमेरिकी मनोचिकित्सक डॉ. इयान स्टीवेन्सन का नाम इस क्षेत्र के अध्ययन में प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने अलग-अलग देशों में ऐसे हजारों मामलों का दस्तावेजीकरण किया, जिनमें बच्चों ने किसी कथित पिछले जीवन से जुड़ी बातें बताई थीं।

    भारत में डॉ. सत्वंत पासरिचा ने भी इस विषय पर शोध किया। ऐसे मामलों की जांच में आमतौर पर बच्चे के दावों को दर्ज करना, संबंधित परिवारों से जानकारी लेना और फिर उन दावों की उपलब्ध तथ्यों से तुलना करना शामिल होता है।

    टीटू सिंह के मामले को भी पुनर्जन्म से जुड़े चर्चित उदाहरणों में शामिल किया जाता है। हालांकि, इस कहानी के साथ किए जाने वाले कुछ बड़े दावों—खासकर हत्या के आरोपियों की पहचान और दोषसिद्धि में बच्चे की जानकारी की भूमिका—की पुष्टि के लिए पुलिस रिकॉर्ड, अदालत के दस्तावेज और मूल शोध विवरण देखना जरूरी है।

    क्या बच्चे की बातों से हत्या का मामला सुलझा था?

    टीटू सिंह की कहानी के कुछ संस्करणों में दावा किया जाता है कि उसने सुरेश वर्मा की हत्या से संबंधित जानकारियां बताईं और इनसे जांच को मदद मिली। यही बात इस मामले को दूसरी पुनर्जन्म की कहानियों से अलग और अधिक सनसनीखेज बनाती है।

    लेकिन इस दावे को निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस ने कौन-सी जानकारी के आधार पर जांच आगे बढ़ाई, अदालत में क्या सबूत पेश किए गए और दोषसिद्धि का वास्तविक आधार क्या था। केवल प्रचलित कहानी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि बच्चे की कथित यादों से ही हत्या का मामला सुलझ गया था।

    क्या बच्चों को सचमुच पिछले जन्म की यादें आती हैं?

    पुनर्जन्म की मान्यता हिंदू धर्म सहित कई धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में मिलती है। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सवाल अब भी विवाद और शोध का विषय है। कुछ शोधकर्ता बच्चों के ऐसे दावों का व्यवस्थित अध्ययन करते हैं, जबकि आलोचक सामान्य जानकारी के अनजाने संपर्क, परिवार या समाज से सुनी गई बातों, याददाश्त में बदलाव और बाद में कहानी के विस्तार जैसी संभावनाओं पर ध्यान देने की बात कहते हैं।

    ऐसे मामलों में सबसे अहम सवाल यह होता है कि बच्चे ने वास्तव में क्या कहा था, वह बात कब दर्ज की गई और उसकी पुष्टि किस स्वतंत्र स्रोत से हुई। यदि जानकारी पहले से लिखित रूप में दर्ज हो और बाद में स्वतंत्र जांच में मेल खाए, तो उसका मूल्यांकन अधिक गंभीरता से किया जा सकता है। इसके बावजूद, ऐसी समानताएं अपने आप पुनर्जन्म का निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बन जातीं।

    उम्र बढ़ने के साथ कम हो जाती हैं कथित यादें?

    पिछले जन्म की बातें बताने वाले बच्चों के बारे में कई केस रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है कि उम्र बढ़ने के साथ उनकी कथित यादें कम होने लगती हैं। कुछ शोध विवरणों में पांच से आठ साल की उम्र के बीच ऐसी बातों के कमजोर पड़ने का जिक्र है। हालांकि, यह हर बच्चे पर लागू होने वाला कोई निश्चित नियम नहीं है और इससे पुनर्जन्म की पुष्टि भी नहीं होती।

    टीटू सिंह की कहानी भी इसी कारण लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी रही। इसमें बचपन के दावों, एक मृत दुकानदार की जिंदगी से कथित समानताओं और परिवारों के बीच संपर्क की बातें सामने आती हैं।

    टीटू सिंह की कहानी क्यों चर्चा में रहती है?

    टीटू सिंह का मामला लोगों को इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि इसमें एक छोटे बच्चे की कथित यादों को एक वास्तविक व्यक्ति की जिंदगी और हत्या की घटना से जोड़ा जाता है। यह कहानी पुनर्जन्म, स्मृति और चेतना से जुड़े कई सवाल उठाती है।

    हालांकि, इस मामले को समझते समय आस्था, व्यक्तिगत अनुभव और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। जब तक सभी प्रमुख दावों की पुष्टि मूल शोध और आधिकारिक दस्तावेजों से न हो, तब तक इसे पुनर्जन्म का निर्णायक प्रमाण या हत्या सुलझाने की सिद्ध कहानी कहना उचित नहीं होगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के आधार पर तैयार किया गया है। टीटू सिंह से जुड़े कुछ दावों, विशेषकर हत्या की जांच और दोषसिद्धि में उनकी कथित भूमिका, की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। पुनर्जन्म को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में सर्वसम्मति नहीं है।

  • H-1B वीजा वालों के लिए बड़ा अपडेट, TCS-Infosys समेत 8 कंपनियों के ग्रीन कार्ड प्रोसेस पर रोक की खबर से बढ़ी चिंता.

    H-1B वीजा वालों के लिए बड़ा अपडेट, TCS-Infosys समेत 8 कंपनियों के ग्रीन कार्ड प्रोसेस पर रोक की खबर से बढ़ी चिंता.

    H-1B वीजा वालों के लिए बड़ा अपडेट, TCS-Infosys समेत 8 कंपनियों के ग्रीन कार्ड प्रोसेस पर रोक की खबर से बढ़ी चिंता.

    अमेरिका: अमेरिका में H-1B वीजा पर काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड से जुड़ी एक खबर चर्चा में है। उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को आठ बड़ी टेक्नोलॉजी और आईटी कंपनियों की रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के अहम चरण PERM को निलंबित किए जाने की बात कही गई है। इस सूची में TCS, Infosys, Wipro, HCLTech, Cognizant, Capgemini, Microsoft और Adobe के नाम शामिल हैं।

    इस खबर से उन भारतीय कर्मचारियों की चिंता बढ़ सकती है, जो अमेरिका में लंबे समय से काम कर रहे हैं और स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड पाने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि, PERM प्रक्रिया पर रोक और H-1B वीजा रद्द होना दो अलग-अलग बातें हैं। केवल इस खबर के आधार पर यह नहीं माना जाना चाहिए कि सभी प्रभावित कर्मचारियों को नौकरी छोड़नी होगी या तुरंत अमेरिका से लौटना पड़ेगा।

    किन 8 कंपनियों के नाम रिपोर्ट में शामिल हैं?

    रिपोर्ट में पांच प्रमुख आईटी सेवा कंपनियों और तीन अन्य अंतरराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी कंपनियों का उल्लेख किया गया है:

    1. TCS (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज)
    2. Infosys (इन्फोसिस)
    3. Wipro (विप्रो)
    4. HCLTech (एचसीएलटेक)
    5. Cognizant (कॉग्निजेंट)
    6. Capgemini (कैपजेमिनी)
    7. Microsoft (माइक्रोसॉफ्ट)
    8. Adobe (एडोबी)

    हालांकि, इन कंपनियों के नाम वाली सूची और कथित निलंबन के आदेश की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। कर्मचारियों को अपनी कंपनी की HR या इमिग्रेशन टीम से अपने मामले पर लागू स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए।

    PERM क्या है और ग्रीन कार्ड के लिए क्यों जरूरी है?

    PERM का पूरा नाम Permanent Labor Certification है। यह अमेरिका में रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड पाने के एक सामान्य रास्ते का महत्वपूर्ण चरण है।

    इस प्रक्रिया में नियोक्ता को अमेरिकी श्रम विभाग के सामने यह साबित करना होता है कि संबंधित नौकरी के लिए आवश्यक भर्ती प्रक्रिया पूरी की गई है और विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से निर्धारित शर्तों के तहत अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन तथा कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    PERM प्रमाणन के बाद नियोक्ता आम तौर पर अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के पास I-140 याचिका दाखिल कर सकता है। इसके बाद ग्रीन कार्ड की अगली प्रक्रिया कर्मचारी की पात्रता, प्राथमिकता तारीख और वीजा उपलब्धता सहित कई बातों पर निर्भर करती है।

    इसलिए अगर किसी कर्मचारी का मामला अभी PERM चरण में है, तो प्रक्रिया में देरी उसकी स्थायी निवास योजना को प्रभावित कर सकती है।

    क्या H-1B वीजा भी रद्द हो जाएगा?

    नहीं, केवल PERM प्रक्रिया में रुकावट आने से H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं हो जाता। दोनों की कानूनी प्रक्रियाएं अलग हैं।

    H-1B वीजा निर्धारित शर्तों के तहत अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है, जबकि PERM रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के एक रास्ते का हिस्सा है। किसी कर्मचारी की वास्तविक स्थिति उसके वीजा की वैधता, नौकरी, याचिकाओं और लागू आव्रजन नियमों पर निर्भर करती है।

    इसलिए कर्मचारियों को घबराकर नौकरी छोड़ने या अमेरिका लौटने का फैसला करने के बजाय पहले अपने दस्तावेजों और मामले की स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए।

    H-1B पर काम कर रहे भारतीय कर्मचारी अब क्या करें?

    1. ग्रीन कार्ड केस का स्टेटस पता करें। अपनी कंपनी से पूछें कि PERM आवेदन दाखिल हुआ है या नहीं, वह लंबित है या मंजूर हो चुका है और I-140 की क्या स्थिति है।

    2. H-1B की समयसीमा जांचें। अपने वीजा और I-797 से जुड़े दस्तावेजों की वैधता देखें। कुछ परिस्थितियों में निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले कर्मचारियों को छह साल की सामान्य अवधि से आगे भी विस्तार मिल सकता है। अपनी पात्रता की पुष्टि विशेषज्ञ से करें।

    3. नौकरी बदलने से पहले सलाह लें। नई कंपनी H-1B ट्रांसफर और ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप के लिए तैयार है या नहीं, इसकी जानकारी पहले लें। नौकरी बदलने से मौजूदा ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा, यह भी समझें।

    4. परिवार के दस्तावेज व्यवस्थित रखें। जीवनसाथी और बच्चों के वीजा, पासपोर्ट तथा अन्य जरूरी कागजात की वैधता जांचें। H-4 पर रहने वाले परिवार के सदस्यों की स्थिति और रोजगार अनुमति की पात्रता अलग-अलग नियमों पर निर्भर हो सकती है।

    5. दूसरे विकल्पों पर जानकारी लें। कुछ लोगों के लिए O-1 वीजा, EB-1 श्रेणी या नेशनल इंटरेस्ट वेवर (NIW) जैसे विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, इनके लिए अलग पात्रता शर्तें हैं और ये हर कर्मचारी के लिए उपयुक्त नहीं होते।

    6. वित्तीय योजना तैयार रखें। जरूरी खर्चों, बचत, बीमा और परिवार की जरूरतों का आकलन करें। अनिश्चितता के कारण जल्दबाजी में बड़े वित्तीय या करियर संबंधी फैसले न लें।

    7. आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें। अमेरिकी श्रम विभाग, USCIS, अपनी कंपनी की HR टीम और योग्य इमिग्रेशन वकील से जानकारी लें। सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट खबरों के आधार पर कोई बड़ा फैसला न करें।

    क्या कर्मचारियों को तुरंत भारत लौटना पड़ेगा?

    सिर्फ PERM प्रक्रिया में कथित रोक की खबर से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी संबंधित कर्मचारियों को अमेरिका छोड़ना होगा। जिन लोगों का H-1B वीजा वैध है, उनकी स्थिति पर इस खबर का क्या असर होगा, यह उनके व्यक्तिगत मामले और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।

    जिन कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया अभी PERM चरण में है, उन्हें संभावित देरी के बारे में अपनी कंपनी से जानकारी लेनी चाहिए। वहीं, जिनका H-1B विस्तार नजदीक है, उन्हें समय रहते अपनी पात्रता और आवेदन की समयसीमा की समीक्षा करनी चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। आठ कंपनियों के PERM कार्यक्रम पर रोक से संबंधित दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। अपनी इमिग्रेशन स्थिति के बारे में फैसला लेने से पहले आधिकारिक सूचना और योग्य अमेरिकी इमिग्रेशन वकील की सलाह लें।

  • 1933 में बिहार के बैरिस्टर ने सऊदी अरब को दिया था बिजनेस प्लान, जानिए कौन थे मुहम्मद यूनुस.

    1933 में बिहार के बैरिस्टर ने सऊदी अरब को दिया था बिजनेस प्लान, जानिए कौन थे मुहम्मद यूनुस.

    1933 में बिहार के बैरिस्टर ने सऊदी अरब को दिया था बिजनेस प्लान, जानिए कौन थे मुहम्मद यूनुस.

    पटना: भारत के इतिहास में कई ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिनकी कहानियां समय के साथ लोगों की नजरों से दूर हो गईं। बिहार के बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। साल 1933 में हज यात्रा के दौरान उन्होंने सऊदी अरब की सरकार को अर्थव्यवस्था, पर्यटन, परिवहन और हज यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव दिए थे। दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर वही मुहम्मद यूनुस बिहार के पहले प्रधानमंत्री बने, जिन्हें आज के संदर्भ में राज्य का पहला मुख्यमंत्री कहा जाता है।

    1933 में ब्रिटिश दूतावास से भेजी गई थी चिट्ठी

    2 जून 1933 को सऊदी अरब के जेद्दा स्थित ब्रिटिश दूतावास से भारत के वायसराय के कार्यालय को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया था। इस पत्र में बिहार के बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस का उल्लेख किया गया था। बताया गया कि हज यात्रा के दौरान उन्होंने सऊदी सरकार के सामने कई आर्थिक और प्रशासनिक सुझाव रखे थे।

    उनके प्रस्ताव केवल धार्मिक यात्रा की व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनमें परिवहन, पशुपालन, पर्यटन और व्यापार से जुड़े विचार भी शामिल थे। हालांकि, सऊदी अरब के तत्कालीन वित्त मंत्री ने इन सुझावों को खास महत्व नहीं दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनके प्रस्तावों में स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों की पर्याप्त समझ नहीं दिखाई दी थी।

    भारत सरकार ने बिहार सरकार से मांगी जानकारी

    मुहम्मद यूनुस के प्रस्तावों की जानकारी सामने आने के बाद भारत सरकार ने उनके बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने का फैसला किया। 5 जुलाई 1933 को वायसराय के कार्यालय से बिहार सरकार को पत्र भेजा गया। इसके जवाब में 20 जुलाई 1933 को बिहार के मुख्य सचिव डब्ल्यू. बी. ब्रेट ने यूनुस के बारे में जानकारी दी।

    इस जवाब में बताया गया कि मुहम्मद यूनुस पटना हाई कोर्ट के बैरिस्टर थे। उनके पास पर्याप्त संपत्ति थी और उनकी पूंजी का बड़ा हिस्सा पटना की अचल संपत्ति में लगा हुआ था। वे बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके थे और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

    हालांकि, सरकारी आकलन में मुस्लिम समाज के भीतर उनके प्रभाव को सीमित बताया गया था। उनका एक छोटा अखबार भी था, लेकिन उसके दैनिक संचालन में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका नहीं मानी गई। बड़े आर्थिक और विकास संबंधी प्रोजेक्ट संभालने के अनुभव को लेकर भी संदेह जताया गया था।

    सऊदी अरब के लिए क्या थे मुहम्मद यूनुस के सात सुझाव?

    मुहम्मद यूनुस ने हिजाज़ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और हज यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सात प्रमुख सुझाव दिए थे।

    1. घोड़ों के प्रजनन और व्यापार को बढ़ावा देना

    उन्होंने घोड़ों के प्रजनन को बढ़ाने और उनके व्यापार को विकसित करने पर जोर दिया था। इसके लिए वे नज्द क्षेत्र में पशु चिकित्सक भेजने की पेशकश भी करने को तैयार थे।

    2. विदेशी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने की अनुमति

    उनका सुझाव था कि गैर-अरबी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने और जमीन प्राप्त करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने इस विचार को उस समय फिलिस्तीन में यहूदी लोगों को बसाने की नीतियों से जोड़कर प्रस्तुत किया था।

    3. मक्का से मदीना तक रेलवे सेवा दोबारा शुरू करना

    मुहम्मद यूनुस ने हिजाज़ रेलवे को फिर से चालू करने का प्रस्ताव दिया था। उनका मानना था कि इससे यात्रियों की आवाजाही आसान होगी। उन्होंने इस परियोजना में अपनी सेवाएं देने की पेशकश भी की थी।

    4. होटल और विश्राम गृहों की सुविधाएं बेहतर बनाना

    उन्होंने मौजूदा होटलों की स्थिति सुधारने और मदीना जाने वाले मार्ग पर अधिक विश्राम गृह बनाने की जरूरत बताई थी, ताकि हज यात्रियों को सफर के दौरान बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

    5. भारत में हज यात्रा का प्रचार करना

    उनका सुझाव था कि भारत में हज यात्रा को लेकर बड़े स्तर पर प्रचार अभियान चलाया जाए। इसके लिए पुस्तिकाएं प्रकाशित करने जैसे उपायों का उल्लेख किया गया था। इस काम की जिम्मेदारी खुद संभालने में भी उन्होंने रुचि दिखाई थी।

    6. भारतीय मुस्लिम शासकों से संपर्क करना

    उन्होंने हिजाज़ी और भारतीय प्रतिनिधियों का एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल बनाने का प्रस्ताव दिया था। यह प्रतिनिधिमंडल भारत की मुस्लिम रियासतों के शासकों से मिलकर उन्हें हज यात्रा के लिए आमंत्रित करता और सड़कों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता जुटाने का प्रयास करता।

    7. हरम परिसर में भिक्षावृत्ति पर रोक लगाना

    उन्होंने हरम परिसर में भिखारियों के प्रवेश को रोकने का सुझाव भी दिया था। इसका उद्देश्य धार्मिक स्थलों पर व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना था।

    व्यापार से लेकर रियल एस्टेट तक फैले थे उनके कारोबार

    मुहम्मद यूनुस केवल कानून और राजनीति तक सीमित नहीं थे। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वे कई तरह के कारोबारी हितों से जुड़े हुए थे। उनका पशुओं के व्यापार में निवेश था और वे पटना में रियल एस्टेट के कारोबार से भी जुड़े थे।

    इसके अलावा, वे बख्तियारपुर लाइट रेलवे में साझेदार थे और पटना के ग्रैंड होटल के मालिक भी बताए जाते हैं। प्रिंटिंग प्रेस, अखबार और बैंकिंग कारोबार से भी उनका संबंध था।

    इन व्यावसायिक गतिविधियों को देखते हुए उनके सऊदी अरब संबंधी कुछ सुझावों में व्यक्तिगत कारोबारी हितों की संभावित भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, किसी विशेष प्रस्ताव के पीछे उनका उद्देश्य क्या था, इसे समझने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों के विस्तृत अध्ययन की जरूरत है।

    1937 में बने बिहार के पहले प्रधानमंत्री

    मुहम्मद यूनुस की राजनीतिक यात्रा भी उल्लेखनीय रही। 1937 में बिहार में प्रांतीय सरकार के गठन के दौरान वे राज्य के पहले प्रधानमंत्री बने। उस समय ब्रिटिश शासन के अंतर्गत प्रांतों के प्रमुख को प्रधानमंत्री कहा जाता था। स्वतंत्र भारत में इसी पद के लिए मुख्यमंत्री शब्द प्रचलित हुआ।

    इस तरह कानून, कारोबार और राजनीति से जुड़े मुहम्मद यूनुस बिहार के शुरुआती राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण शख्सियत बन गए।

    सऊदी शाही परिवार से भी मिला था सम्मान

    इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू जून 1937 से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, जब मुहम्मद यूनुस बिहार के प्रधानमंत्री थे, तब सऊदी अरब के शासक इब्न सऊद की ओर से उनके सम्मान में एक विशेष उपहार भेजा गया था।

    इसे उस समय की परंपरा में ‘खिलअत’ कहा जाता था। विवरण के अनुसार, इसमें सोने की टोपी, ऊंट के बालों से बना एक चोगा और एक सुंदर शॉल शामिल थे। यह उपहार इब्न सऊद के प्रधानमंत्री के माध्यम से भेजा गया था।

    इस घटना से संकेत मिलता है कि मुहम्मद यूनुस और सऊदी शाही नेतृत्व के बीच संपर्क बना हुआ था। हालांकि, केवल इस उपहार के आधार पर उनके संबंधों की पूरी प्रकृति या निकटता के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    एक चिट्ठी से सामने आई महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व की कहानी

    मुहम्मद यूनुस की यह कहानी उस दौर की है, जब अंतरराष्ट्रीय यात्रा, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर आज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ऐसे समय में एक भारतीय बैरिस्टर का सऊदी अरब की सरकार के सामने रेलवे, होटल, पशुपालन और प्रचार अभियान से जुड़े सुझाव रखना अपने आप में उल्लेखनीय था।

    उनके सभी प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन यह प्रसंग दिखाता है कि वे कारोबार और विकास की संभावनाओं को व्यापक नजरिए से देखते थे। उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए ब्रिटिशकालीन पत्राचार और अन्य ऐतिहासिक अभिलेख महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें शामिल कुछ दावों, पत्राचार और घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि के लिए मूल अभिलेखों तथा विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है।

  • शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना कैसे करें? जानें सामग्री, सही विधि, नारियल रखने का तरीका और नवार्ण मंत्र.

    शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना कैसे करें? जानें सामग्री, सही विधि, नारियल रखने का तरीका और नवार्ण मंत्र.

    शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना कैसे करें? जानें सामग्री, सही विधि, नारियल रखने का तरीका और नवार्ण मंत्र.

    शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के साथ कलश स्थापना का विशेष महत्व माना जाता है। नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना करके देवी का आह्वान किया जाता है और फिर नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश को शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। कलश स्थापना करते समय पूजा स्थल की सफाई, कलश में जल भरने, जौ बोने, नारियल रखने और मंत्र जाप जैसी परंपराओं का पालन किया जाता है। आइए जानते हैं कलश स्थापना की पूरी विधि और इससे जुड़े जरूरी नियम।

    कलश स्थापना के लिए जरूरी सामग्री

    कलश स्थापना से पहले पूजा की सामग्री एक जगह एकत्र कर लें, ताकि पूजा के दौरान कोई परेशानी न हो।

    • मिट्टी या धातु का साफ कलश
    • शुद्ध जल
    • साफ मिट्टी या बालू
    • जौ के बीज
    • कलावा या मौली
    • एक सिक्का
    • जटा वाला नारियल
    • लाल कपड़ा
    • मिट्टी की कटोरी या उपयुक्त पात्र
    • रोली, अक्षत और फूल
    • दीपक, घी और रुई की बत्ती
    • मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा

    पूजा की सामग्री और विधि परिवार की परंपरा तथा स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    1. पूजा स्थल की सफाई और तैयारी

    नवरात्र के पहले दिन सबसे पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। वास्तु और धार्मिक मान्यताओं में उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को पूजा के लिए शुभ माना जाता है। यदि वहां पर्याप्त जगह न हो, तो घर में किसी साफ और शांत स्थान पर भी पूजा की व्यवस्था की जा सकती है।

    चौकी या पूजा स्थल पर साफ कपड़ा बिछाएं। यदि जौ बोने की परंपरा निभाते हैं, तो एक साफ पात्र में मिट्टी डालकर जौ बोने की तैयारी करें। मिट्टी में जरूरत के अनुसार पानी डालें, ताकि वह नम रहे।

    2. कलश में जल भरकर करें स्थापना

    एक साफ कलश लें और उसमें शुद्ध जल भरें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार उसमें सिक्का या अन्य पूजन सामग्री डाल सकते हैं। यदि गंगाजल उपलब्ध हो, तो परंपरा के अनुसार कुछ बूंदें मिलाई जा सकती हैं।

    कलश के जल को पवित्र नदियों का स्मरण करते हुए अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। इस दौरान यह मंत्र पढ़ सकते हैं:

    गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
    नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

    इस मंत्र के माध्यम से गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियों का स्मरण किया जाता है। मंत्र याद न हो, तो श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करके भी पूजा की जा सकती है।

    3. कलश के मुख पर बांधें मौली

    कलश के मुख पर परंपरा के अनुसार मौली या कलावा बांधा जाता है। इसके बाद उसके ऊपर मिट्टी की कटोरी या ऐसा पात्र रखा जा सकता है, जिसमें जौ या चावल रखने की पारिवारिक परंपरा हो।

    यदि जौ बोने के लिए अलग पात्र तैयार किया गया है, तो उसमें मिट्टी की नमी बनाए रखें। जौ के अंकुरों को बढ़ने के लिए उचित वातावरण और थोड़ी देखभाल की जरूरत होती है।

    4. नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर रखें

    कलश स्थापना की कई परंपराओं में जटा वाले नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर मौली से बांधा जाता है। इसके बाद उसे कलश के ऊपर रखे पात्र में स्थापित किया जाता है।

    नारियल रखते समय ध्यान रखें कि कलश स्थिर हो और नारियल के गिरने की आशंका न रहे। यदि आपके घर में कलश स्थापना की कोई अलग विधि प्रचलित है, तो उसी के अनुसार व्यवस्था करें।

    5. कलश के ऊपर दीपक जलाने का नियम

    कुछ परंपराओं में कलश के ऊपर रखे पात्र में दीपक जलाने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके बजाय दीपक को पूजा स्थल पर अलग, स्थिर और सुरक्षित जगह पर रखा जाता है।

    दीपक जलाते समय उसे कपड़े, कागज, पर्दे और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें। पूजा के दौरान जलते दीपक को बिना निगरानी के न छोड़ें। दीपक रखने की दिशा को लेकर अलग-अलग परंपराओं में भिन्न मान्यताएं हो सकती हैं।

    6. कलश के पास शंख रखने की परंपरा

    कुछ परिवारों में कलश के पास शंख रखने की परंपरा है। शंख को पूजा में शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसे साफ स्थान पर रखें और इस तरह व्यवस्थित करें कि वह आसानी से गिर न सके।

    दक्षिणावर्त शंख और उसकी दिशा से जुड़े नियम कुछ धार्मिक परंपराओं में बताए जाते हैं, लेकिन हर घर में एक ही विधि का पालन जरूरी नहीं है। अपनी पारिवारिक परंपरा या पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार पूजा कर सकते हैं।

    7. नवार्ण मंत्र से करें मां दुर्गा की आराधना

    नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा के दौरान नवार्ण मंत्र का जाप विशेष रूप से प्रचलित है। मंत्र इस प्रकार है:

    ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

    कलश स्थापना के दौरान या पूजा के समय श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का जाप किया जा सकता है। यदि मंत्र के उच्चारण में कठिनाई हो, तो मां दुर्गा का नाम लेकर सरल प्रार्थना भी कर सकते हैं।

    पूजा करते समय मंत्रों की संख्या से अधिक श्रद्धा, एकाग्रता और अपनी परंपरा के अनुसार विधि का पालन करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    कलश स्थापना करते समय इन बातों का रखें ध्यान

    • पूजा स्थल और कलश को साफ रखें।
    • कलश को ऐसी जगह रखें जहां वह आसानी से गिर न सके।
    • जौ बोए हैं, तो मिट्टी में उचित नमी बनाए रखें।
    • दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें और उसे बिना निगरानी के न छोड़ें।
    • नारियल, मौली और अन्य सामग्री को अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्यवस्थित करें।
    • किसी मंत्र का उच्चारण याद न हो, तो घबराने के बजाय श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक परंपराओं और प्रचलित पूजा-विधियों पर आधारित है। कलश स्थापना की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती है। पूजा करते समय अपनी पारिवारिक परंपरा या योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन का पालन करें।

  • कानपुर में थाई महिला: का आरोप- शादी के बाद धर्म बदलने का दबाव, 55 लाख की स्पोर्ट्स बाइकें दिलाने का भी दावा

    कानपुर में थाई महिला: का आरोप- शादी के बाद धर्म बदलने का दबाव, 55 लाख की स्पोर्ट्स बाइकें दिलाने का भी दावा

    कानपुर में थाई महिला: का आरोप- शादी के बाद धर्म बदलने का दबाव, 55 लाख की स्पोर्ट्स बाइकें दिलाने का भी दावा

    कानपुर: थाईलैंड की रहने वाली एक महिला ने कानपुर के टेनरी कारोबारी मोहम्मद इरफान पर शादी के बाद धोखा देने, धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने और उससे लाखों रुपये की रकम लेने का आरोप लगाया है। महिला का दावा है कि उसने रिश्ते के दौरान इरफान को करीब 55 लाख रुपये की दो महंगी स्पोर्ट्स बाइकें दिलवाई थीं। आरोप है कि जब उसने अपनी रकम वापस मांगनी शुरू की तो इरफान ने उससे संपर्क कम कर दिया और बाद में बात करना भी बंद कर दिया।

    महिला मंगलवार को मामले की शिकायत लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंची। उसने पुलिस को शादी से जुड़ी तस्वीरें, कार्ड और अन्य दस्तावेज भी दिखाए हैं। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    सोशल मीडिया के जरिए हुई थी पहचान

    महिला के मुताबिक, करीब चार साल पहले सोशल मीडिया के जरिए उसकी मुलाकात इरफान से हुई थी। इरफान कारोबार के सिलसिले में थाईलैंड आता-जाता था। दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और करीब चार साल तक उनका संपर्क बना रहा।

    महिला का दावा है कि करीब दो साल पहले दोनों ने थाई परंपरा के अनुसार शादी की थी। इस दावे के समर्थन में उसने पुलिस को शादी की तस्वीरें, कार्ड और अन्य दस्तावेज सौंपे हैं।

    साथ रहने के लिए धर्म बदलने का आरोप

    महिला का आरोप है कि शादी के बाद जब उसने भारत आकर इरफान के साथ रहने की बात कही तो उसका रवैया बदल गया। उसके मुताबिक, इरफान ने कहा कि अगर उसे भारत में उसके साथ रहना है तो उसे इस्लाम कबूल करना होगा और बुर्का पहनकर रहना पड़ेगा।

    महिला का कहना है कि उसने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया। इसके बाद उसने इरफान से अपनी दी हुई रकम वापस मांगनी शुरू की। आरोप है कि पहले रकम लौटाने में टालमटोल की गई और बाद में उसका फोन उठाना भी बंद कर दिया गया।

    भारत पहुंची तो सामने आई पहली शादी की जानकारी

    महिला के अनुसार, फरवरी 2026 में इरफान भारत लौट आया था। शुरुआत में उसने बीमारी का हवाला दिया, लेकिन बाद में दोनों के बीच संपर्क पूरी तरह टूट गया। कई बार फोन करने के बाद भी जब बात नहीं हुई तो वह कानपुर पहुंच गई।

    महिला का दावा है कि वह एक परिचित के साथ इरफान के लाटूश रोड स्थित घर पहुंची। वहां उसे पता चला कि इरफान पहले से शादीशुदा है और उसके तीन बच्चे हैं।

    महिला ने आरोप लगाया कि घर पहुंचने पर इरफान ने पहले उसे पहचानने से इनकार किया। बाद में पहचानने के बावजूद दोनों के बीच विवाद हुआ। महिला का दावा है कि धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया और विरोध करने पर उसके साथ मारपीट तथा अभद्रता की गई।

    दो स्पोर्ट्स बाइक के लिए 55 लाख रुपये देने का दावा

    महिला ने पुलिस को बताया कि इरफान को महंगी कारों और स्पोर्ट्स बाइक का शौक है। उसका दावा है कि इरफान के दो जन्मदिन के मौके पर उसने दो महंगी बाइकों की खरीद के लिए रकम दी थी।

    उसके मुताबिक, पहली बाइक के लिए करीब 21 लाख रुपये और दूसरी के लिए लगभग 34 लाख रुपये दिए गए। इस तरह दोनों बाइक पर करीब 55 लाख रुपये खर्च होने का दावा किया गया है।

    महिला ने यह भी दावा किया कि इरफान सोशल मीडिया पर इन महंगी बाइकों के साथ तस्वीरें और पोस्ट साझा करता रहा है।

    रेस्टोरेंट गिरवी रखकर पैसे जुटाने का दावा

    महिला का कहना है कि थाईलैंड में उसका रेस्टोरेंट और कैंटीन का कारोबार है। उसका आरोप है कि इरफान पर खर्च करते-करते जब उसके पास पैसे कम पड़ने लगे तो उसने अपना रेस्टोरेंट बैंक के पास गिरवी रखकर लोन लिया।

    उसके मुताबिक, इसके बाद भी जरूरत पड़ने पर उसने अपनी बहन और रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए और इरफान को रकम देती रही। अब वह अपनी रकम वापस मांग रही है, लेकिन इरफान ने उससे संपर्क खत्म कर लिया।

    इरफान की 2012 में हुई थी पहली शादी

    पुलिस जांच के मुताबिक, इरफान की पहली शादी वर्ष 2012 में हुई थी और उसके तीन बच्चे हैं। जाजमऊ में उसके टेनरी कारोबार से जुड़े होने की जानकारी भी सामने आई है।

    पुलिस ने इरफान को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के बाद जब उसे मीडिया के सामने लाया गया तो वह भावुक होकर रोने लगा। दूसरी ओर, इरफान की मां ने थाई महिला के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है।

    मां ने लगाए ब्लैकमेलिंग के आरोप

    इरफान की मां का दावा है कि थाई महिला उनके बेटे को पैसे के लिए फंसा रही है और ब्लैकमेल कर रही है। उनका कहना है कि इरफान ने परिवार को कारोबार में नुकसान होने की बात बताई थी और परिवार ने भी उसकी आर्थिक मदद की थी।

    महंगी बाइकों को लेकर मां का दावा है कि उन्हें इरफान ने अपनी कमाई से खरीदा था। उन्होंने यह भी कहा कि बाइक खरीदने को लेकर परिवार में पहले भी नाराजगी रही थी।

    पुलिस ने दर्ज किया केस

    पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, महिला की शिकायत के आधार पर इरफान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने, मारपीट, धोखाधड़ी समेत अन्य आरोप लगाए गए हैं।

    फिलहाल पुलिस महिला के दावों, शादी से जुड़े दस्तावेजों, पैसों के लेन-देन और दोनों पक्षों के बयानों की जांच कर रही है। महिला और इरफान की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

  • कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.

    कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.

    कैंची धाम में बढ़ती भीड़: से बढ़ा खतरा, रिसर्च ने बताया पहाड़ों की असली क्षमता से कितना ज्यादा पड़ रहा दबाव.

    कैंची धाम: उत्तराखंड के प्रसिद्ध कैंची धाम में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और वाहनों की भारी आवाजाही भले ही पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रही हो, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की सीमित क्षमता को देखते हुए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली भी है। लगातार बढ़ता मानवीय दबाव केवल ट्रैफिक की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन, पार्किंग और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर भी इसका असर पड़ रहा है।

    नीम करोली बाबा से जुड़े कैंची धाम में खास तौर पर सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके चलते आसपास की सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ जाता है और कई बार यात्रियों को लंबे समय तक जाम जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसका असर केवल धार्मिक स्थल तक आने-जाने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों की सामान्य यातायात व्यवस्था पर भी पड़ता है।

    क्या होती है किसी इलाके की कैरिंग कैपेसिटी?

    कैरिंग कैपेसिटी यानी वहन क्षमता का मतलब किसी क्षेत्र की उस अधिकतम क्षमता से है, जितने लोगों, वाहनों और गतिविधियों को वह अपनी प्राकृतिक और बुनियादी सुविधाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाए बिना संभाल सकता है।

    पहाड़ी इलाकों में यह क्षमता मैदानी क्षेत्रों की तुलना में काफी संवेदनशील होती है। यहां पानी के स्रोत, सड़कें, पार्किंग, सीवेज व्यवस्था, कचरा निस्तारण, भूगर्भीय स्थिति और भूस्खलन जैसे जोखिमों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

    यदि किसी इलाके की सुविधाएं सीमित हैं और वहां अचानक उसकी क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग पहुंचने लगें, तो पानी और कचरे से लेकर यातायात और आपदा प्रबंधन तक पूरी व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है।

    नैनीताल की वहन क्षमता को लेकर रिसर्च में क्या सामने आया?

    नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स यानी NIUA की ओर से नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों की वहन क्षमता को लेकर किए गए अध्ययन में पहाड़ी इलाकों की संवेदनशीलता पर जोर दिया गया है।

    अध्ययन में अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर क्षेत्र की क्षमता का आकलन किया गया। केवल भूमि क्षेत्र को आधार मानने पर क्षमता काफी अधिक दिखाई देती है, लेकिन जब पहाड़ी भूगोल, बारिश, भूस्खलन के जोखिम और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को शामिल किया जाता है तो यह क्षमता काफी कम हो जाती है।

    रिपोर्ट में बुनियादी सुविधाओं को भी एक महत्वपूर्ण पैमाना माना गया है। पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं किसी पर्यटन क्षेत्र की वास्तविक क्षमता तय करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

    सुविधाओं पर बढ़ता दबाव सबसे बड़ी चिंता

    पहाड़ी पर्यटन स्थलों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि पर्यटकों की संख्या बढ़ने की रफ्तार कई बार बुनियादी ढांचे की क्षमता से कहीं ज्यादा हो जाती है। बड़ी संख्या में लोग पहुंचने पर पानी की मांग बढ़ती है, कचरा बढ़ता है और सीवेज सिस्टम पर दबाव पड़ता है।

    पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने पर सड़क किनारे वाहनों की संख्या बढ़ जाती है। इससे ट्रैफिक प्रभावित होने के साथ-साथ आपात स्थिति में राहत और बचाव कार्यों में भी परेशानी हो सकती है।

    ज्यादा वाहनों से पहाड़ों पर बढ़ता दबाव

    उत्तराखंड में बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों की संख्या भी इस बढ़ते दबाव की तस्वीर दिखाती है। परिवहन विभाग के ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन यानी ANPR कैमरों से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर की छुट्टियों के दौरान राज्य की सीमाओं और प्रमुख चेक पोस्ट पर बड़ी संख्या में बाहरी वाहन दर्ज किए गए।

    2 अक्टूबर को एक लाख से ज्यादा बाहरी वाहनों की आवाजाही दर्ज हुई, जबकि अगले दो दिनों में भी यह संख्या करीब 90 हजार या उससे अधिक रही। स्थानीय वाहनों को जोड़ने पर कुल वाहन आवाजाही का आंकड़ा डेढ़ लाख से ऊपर पहुंच गया।

    इस तरह की भारी आवाजाही से पहाड़ी सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ता है। साथ ही वाहनों से होने वाला प्रदूषण और पार्किंग की समस्या भी गंभीर हो सकती है।

    भविष्य में पानी और पर्यावरण का संकट बढ़ सकता है

    पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत सीमित होते हैं। ऐसे में पर्यटन और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ने पर पानी की मांग भी बढ़ती है। यदि उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले मांग बहुत अधिक हो जाए तो भविष्य में जल संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।

    इसी तरह कचरे का सही तरीके से निस्तारण नहीं होने पर प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जंगलों, नालों और जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इसका असर स्थानीय वनस्पतियों, वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।

    प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बढ़ सकता है जोखिम

    पहाड़ों में अत्यधिक निर्माण और मानवीय दबाव को प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारी बारिश, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक घटनाओं के दौरान यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग और वाहन मौजूद हों, तो नुकसान और राहत-बचाव की चुनौती दोनों बढ़ सकती हैं।

    इसलिए कैंची धाम जैसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों के लिए केवल ट्रैफिक व्यवस्था सुधारना ही पर्याप्त नहीं है। वहां आने वाले लोगों की संख्या, पार्किंग, पानी, कचरा प्रबंधन, सीवेज और आपदा प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाना भी जरूरी है।

    कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता श्रद्धालुओं और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन पहाड़ों की प्राकृतिक सीमाओं को नजरअंदाज करके बढ़ता दबाव भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है।

  • भोपाल में सगाई से ‘नाराज’ PG डॉक्टर ने महिला डॉक्टर और उसके भाई पर चलाई गोलियां, बाद में खुदकुशी की कोशिश:

    भोपाल में सगाई से ‘नाराज’ PG डॉक्टर ने महिला डॉक्टर और उसके भाई पर चलाई गोलियां, बाद में खुदकुशी की कोशिश:

    भोपाल में सगाई से ‘नाराज’ PG डॉक्टर ने महिला डॉक्टर और उसके भाई पर चलाई गोलियां, बाद में खुदकुशी की कोशिश:

    भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के गांधीनगर इलाके में देर रात फायरिंग की घटना से सनसनी फैल गई। यहां एक पीजी डॉक्टर ने अपनी पुरानी महिला मित्र और उसके भाई पर कथित तौर पर पिस्तौल से तीन गोलियां चला दीं। फायरिंग में दोनों घायल हो गए। वारदात के बाद आरोपी डॉक्टर ने भी कथित तौर पर खुदकुशी की कोशिश की। पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया है, जहां उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है।

    रात करीब 11:30 बजे घर पहुंचा था आरोपी

    पुलिस के मुताबिक, घटना देर रात करीब 11:30 बजे की है। आरोपी डॉक्टर नवीन रोहिला अपनी पुरानी दोस्त डॉक्टर श्वेता ठाकुर के घर पहुंचा था। बताया जा रहा है कि वहां किसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ और इसके बाद आरोपी ने पिस्तौल से फायरिंग कर दी।

    पुलिस के अनुसार, आरोपी ने एक के बाद एक तीन गोलियां चलाईं। इस दौरान महिला डॉक्टर और उनके भाई अभिषेक ठाकुर घायल हो गए। दोनों को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।

    कई साल पुरानी थी दोनों की दोस्ती

    जांच में सामने आया है कि आरोपी और घायल महिला डॉक्टर एक-दूसरे को कई वर्षों से जानते थे। दोनों ने एक साथ कॉलेज में पढ़ाई की थी। उनके बीच करीबी संबंध होने की जानकारी भी पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आई है।

    बाद में महिला डॉक्टर की सगाई हो गई। प्रारंभिक जांच में पुलिस को पता चला है कि इसके बाद आरोपी कथित तौर पर परेशान था। हालांकि, सगाई और फायरिंग के बीच सीधा संबंध क्या है और वारदात की वास्तविक वजह क्या थी, इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।

    फायरिंग के बाद आरोपी ने की खुदकुशी की कोशिश

    महिला डॉक्टर और उनके भाई पर फायरिंग करने के बाद आरोपी डॉक्टर ने कथित तौर पर खुदकुशी करने का प्रयास किया। जानकारी के मुताबिक, उसने रस्सी की मदद से आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन इसमें सफल नहीं हुआ।

    इसके बाद पुलिस ने उसे हिरासत में लिया और इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया। फिलहाल उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है।

    पुलिस ने दर्ज की FIR

    घटना की सूचना मिलते ही गांधीनगर थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने घायलों को अस्पताल पहुंचाने के साथ घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य जुटाए। मामले में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

    पुलिस फायरिंग में इस्तेमाल हथियार और घटना से जुड़े अन्य सबूतों की भी जांच कर रही है। इसके अलावा आरोपी और महिला डॉक्टर के बीच पिछले कुछ समय में हुई बातचीत तथा घटना से पहले के घटनाक्रम की जानकारी जुटाई जा रही है।

    पुलिस अधिकारी ने क्या बताया?

    अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर शैलेन्द्र सिंह चौहान के मुताबिक, गांधीनगर इलाके में एक डॉक्टर ने अपनी पुरानी दोस्त और उसके भाई पर पिस्तौल से फायर किया। दोनों घायल हुए हैं और उनका अस्पताल में इलाज चल रहा है।

    पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपी और महिला डॉक्टर पुराने परिचित थे और दोनों ने एक साथ कॉलेज में पढ़ाई की थी। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।

    असली वजह जांच के बाद होगी साफ

    शुरुआती जानकारी में महिला डॉक्टर की सगाई के बाद आरोपी के परेशान होने की बात सामने आई है, लेकिन पुलिस ने अभी इसे फायरिंग की अंतिम वजह नहीं माना है। जांच एजेंसियां दोनों के पुराने संबंधों, घटना से पहले हुए विवाद और अन्य परिस्थितियों की जानकारी जुटा रही हैं।

    फिलहाल इस घटना में महिला डॉक्टर और उनके भाई घायल हैं, जबकि आरोपी डॉक्टर भी अस्पताल में भर्ती है। पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ही वारदात की वास्तविक वजह और पूरे घटनाक्रम की तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

  • इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    हम्पी: भारत के प्राचीन मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला और अद्भुत नक्काशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। कर्नाटक के हम्पी स्थित विजय विट्ठल मंदिर भी ऐसी ही ऐतिहासिक धरोहर है, जहां पत्थरों से बने कुछ स्तंभों को लेकर सदियों से लोगों की खास दिलचस्पी रही है। इन्हें आमतौर पर संगीतमय स्तंभ या ‘म्यूजिकल पिलर्स’ कहा जाता है।

    इन स्तंभों की खासियत यह है कि इन पर हल्की चोट या थपकी देने पर अलग-अलग तरह की ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं। इसी वजह से इन्हें भारतीय संगीत के सुरों और वाद्य यंत्रों से जोड़कर देखा जाता है।

    15वीं शताब्दी की शानदार वास्तुकला

    विजय विट्ठल मंदिर हम्पी के ऐतिहासिक मंदिर परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम्पी को यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। यह क्षेत्र कभी शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

    विट्ठल मंदिर भगवान विष्णु के विट्ठल स्वरूप को समर्पित है। मंदिर परिसर में प्रसिद्ध पत्थर का रथ भी मौजूद है, लेकिन इसकी वास्तुकला के साथ-साथ संगीतमय स्तंभ भी लोगों का ध्यान खींचते हैं।

    मंदिर के निर्माण और विस्तार का काम विजयनगर काल के अलग-अलग शासकों के दौर में हुआ था। इसी वजह से इसकी वास्तुकला में कई चरणों की झलक दिखाई देती है।

    56 स्तंभों में छिपा है ध्वनि का रहस्य

    मंदिर के महामंडप में मौजूद स्तंभों को बेहद बारीकी से तराशा गया है। मुख्य स्तंभों के आसपास कई छोटे और पतले स्तंभनुमा हिस्से बनाए गए हैं। इन्हीं को ‘संगीतमय स्तंभ’ कहा जाता है।

    इन पर हल्की थाप देने से अलग-अलग आवृत्ति की ध्वनियां पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि इनके बारे में लंबे समय से यह धारणा चली आ रही है कि इन पत्थरों से संगीत के सुर निकलते हैं।

    हालांकि आज संरक्षण के कारण पर्यटकों को इन ऐतिहासिक स्तंभों को छूने या थपथपाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए इनके बारे में प्रचलित जानकारी को पुराने विवरणों और अध्ययनों के संदर्भ में समझना चाहिए।

    क्या पत्थरों के अंदर कोई खोखली जगह थी?

    इन स्तंभों को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कुछ पुराने विवरणों में यह भी दावा मिलता है कि ब्रिटिश काल में इनकी संरचना का रहस्य जानने के लिए कुछ स्तंभों को काटकर देखा गया था।

    कहा जाता है कि जांच के दौरान इनके भीतर कोई छिपा हुआ यंत्र या धातु की संरचना नहीं मिली। हालांकि इस घटना से जुड़े विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि और उनके अलग-अलग संस्करणों को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।

    आखिर पत्थर से आवाज निकलती कैसे है?

    इसका जवाब केवल यह कह देना नहीं है कि पत्थर में कोई खास धातु मौजूद होने के कारण संगीत पैदा होता है। ध्वनि उत्पन्न होने के पीछे पत्थर की संरचना, आकार, लंबाई, मोटाई, तराशने की तकनीक और कंपन के गुण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    जब किसी ठोस संरचना को विशेष आकार दिया जाता है और उस पर चोट की जाती है, तो उसमें कंपन पैदा होता है। अलग-अलग आकार और संरचना वाले हिस्से अलग-अलग आवृत्तियों पर कंपन कर सकते हैं। इसी वजह से उनसे अलग-अलग ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं।

    विजय विट्ठल मंदिर के स्तंभों की खासियत यह है कि प्राचीन शिल्पकारों ने पत्थर को इस तरह तराशा कि उसके विभिन्न हिस्सों में अलग तरह के कंपन पैदा हो सकें। यही प्राचीन स्थापत्य और शिल्प कौशल इस मंदिर को खास बनाता है।

    क्या सच में ‘सारेगामा’ के सातों सुर निकलते हैं?

    मंदिर के संगीतमय स्तंभों को अक्सर भारतीय संगीत के सुरों से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे शाब्दिक रूप से हर स्तंभ से बिल्कुल सटीक सा-रे-गा-मा निकलने के दावे के रूप में नहीं समझना चाहिए।

    असल में इन स्तंभों की विशेषता उनकी ध्वनि और कंपन से जुड़ी है। अलग-अलग स्तंभों या उनके हिस्सों से अलग आवृत्तियों की आवाजें सुनाई देने की बात पुराने विवरणों में मिलती है।

    विजय विट्ठल मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि सदियों पहले बिना आधुनिक मशीनों और कंप्यूटर तकनीक के शिल्पकारों ने पत्थर की संरचना, अनुपात और कंपन को समझते हुए ऐसी अद्भुत वास्तुकला तैयार की।

    आज ये स्तंभ केवल संगीत से जुड़े रहस्य के कारण ही नहीं, बल्कि विजयनगर साम्राज्य की उन्नत स्थापत्य कला और शिल्प कौशल के प्रमाण के रूप में भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

  • मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ: 540 दिन बाद अमित हत्याकांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप दोषी, 51 कॉल और 1000 रुपये के सांप ने खोला राज.

    मेरठ, उत्तर प्रदेश: अमित कश्यप हत्याकांड में करीब 540 दिनों की सुनवाई के बाद अदालत ने उसकी पत्नी रविता कश्यप और उसके कथित प्रेमी अमरदीप को दोषी करार दिया है। मामले में अभियोजन की ओर से 12 गवाह पेश किए गए। पुलिस जांच में सामने आए कॉल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सांप से जुड़ी गवाही को भी अहम साक्ष्य माना गया।

    इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हत्या को कथित तौर पर सांप के डसने से हुई मौत का रूप देने की कोशिश की गई थी। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सर्पदंश का कोई निशान नहीं मिला और मौत का कारण दम घुटना सामने आया।

    हत्या के बाद 51 बार हुई बातचीत

    अभियोजन के मुताबिक, 12 अप्रैल 2025 की रात से अगले दिन तक रविता और अमरदीप के बीच 51 बार बातचीत हुई थी। मोबाइल कंपनियों के अधिकारियों ने अदालत में कॉल डिटेल रिकॉर्ड की पुष्टि की।

    अभियोजन का कहना था कि हत्या के बाद अमरदीप अपनी बुआ के घर चला गया था और वहां से रविता से बार-बार संपर्क कर रहा था। बचाव पक्ष ने इस घटनाक्रम पर अलग दलील दी।

    रविता ने अदालत में दावा किया कि जिस नंबर पर अमरदीप से बातचीत हुई, वह अमित इस्तेमाल कर रहा था और उसने खुद अमरदीप को कोई कॉल नहीं की थी। अभियोजन ने इस दावे को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर चुनौती दी।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    जांच अधिकारी ने अदालत में बताया कि पोस्टमार्टम के अनुसार अमित की मौत 12 अप्रैल की रात ही हो चुकी थी। ऐसे में अगले दिन अमित के मोबाइल से बातचीत होने का दावा संदेह के घेरे में आया।

    अमित की मां मुनेश और भाई मोनू को भी अभियोजन की ओर से गवाह बनाया गया। मां ने अमरदीप को 12 अप्रैल की रात घर से निकलते देखने की बात अदालत में कही।

    अभियोजन ने अमरदीप की गतिविधियों के समय को लेकर भी अदालत में तर्क दिया। बचाव पक्ष की ओर से अमरदीप के मामा ने दावा किया था कि वह रात करीब 10 बजे तक अपनी बुआ के घर पर मौजूद था। अभियोजन ने उसकी आवाजाही के समय और दूरी को सामने रखते हुए अपनी दलील रखी।

    करीब 1000 रुपये में लिया गया था सांप

    मामले में सांप की कहानी भी जांच का अहम हिस्सा बनी। अभियोजन के गवाह कृष्ण ने अदालत में बताया कि उसने करीब 1000 रुपये में सांप उपलब्ध कराया था।

    बताया गया कि सांप की मांग यह कहकर की गई थी कि उसे माता के जागरण में पूजा के लिए इस्तेमाल किया जाना है और वह जहरीला नहीं होना चाहिए। कृष्ण ने यह सांप सपेरे प्रीतम नाथ से लिया था।

    सपेरे प्रीतम नाथ ने अदालत में बताया कि उसने कृष्ण को ‘बूढ़ा घोड़ा पछाड़’ नाम का सांप दिया था। घटना के बाद सुखपाल और पिंटू ने सांप को पकड़कर बोरे में बंद करने की बात कही।

    चारपाई पर मिला था सांप, लेकिन डसने के निशान नहीं

    अभियोजन के अनुसार, सांप को अमित की चारपाई पर रखा गया था ताकि उसकी मौत को सर्पदंश से हुई घटना बताया जा सके। हालांकि, पोस्टमार्टम के दौरान शरीर पर सांप के काटने का कोई निशान नहीं मिला।

    इसके बाद जांच में यह सवाल महत्वपूर्ण बन गया कि अगर मौत सांप के डसने से नहीं हुई तो अमित की जान कैसे गई।

    गला दबाने से हुई मौत

    डॉक्टर कपिल गर्ग की गवाही के मुताबिक, अमित की मौत सांप के काटने से नहीं बल्कि गला और नाक-मुंह दबाने के कारण दम घुटने से हुई थी।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गर्दन पर चोट और संघर्ष के निशान पाए गए। त्वचा