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  • वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    काले चने में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फोलेट और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें वेट लॉस से लेकर पाचन और मसल्स की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. तो चलिए आपको बताते हैं काले चने खाने के फायदे के बारे में.

    सुबह का नाश्ता दिन की शुरुआत के लिए बेहद जरूरी माना जाता है. अगर नाश्ते में कुछ ऐसा शामिल किया जाए जो पेट को लंबे समय तक भरा रखे और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी दे, तो यह सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है. रातभर पानी में भिगोकर रखे गए काले चने भी ऐसा ही एक विकल्प हैं. काले चने में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फोलेट और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें वेट लॉस से लेकर पाचन और मसल्स की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. हालांकि, हर व्यक्ति के लिए इनका सेवन एक जैसा फायदेमंद हो, यह जरूरी नहीं है. तो चलिए आपको बताते हैं काले चने खाने के फायदे के बारे में.

    वेट लॉस मददगार काले चने प्रोटीन और फाइबर के साथ आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम समेत कई जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत होते हैं. रातभर भिगोए हुए चने सुबह खाने से लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है. इससे बार-बार कुछ खाने की इच्छा कम करने में मदद मिल सकती है. इसी वजह से वेट लॉस जर्नी में भी लोग इन्हें अपनी डाइट का हिस्सा बनाते हैं.

    पाचन के लिए हो सकते हैं फायदेमंद काले चनों में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होता है. यह कब्ज की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है. हालांकि, कुछ लोगों को चने खाने के बाद गैस, पेट फूलने या अपच की समस्या हो सकती है. ऐसे लोगों को शुरुआत में कम मात्रा में चने खाने चाहिए और शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान देना चाहिए.

    मसल्स की सेहत के लिए मददगार काले चनों में मौजूद प्रोटीन मांसपेशियों के रखरखाव और शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली के लिए जरूरी होता है. इनमें आयरन भी पाया जाता है, जो शरीर के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. हालांकि, सिर्फ काले चने खाने से शरीर की पूरी आयरन या प्रोटीन जरूरत पूरी नहीं होती. इसलिए इन्हें संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना बेहतर है.

    इन बातों का रखें ध्यान काले चनों को खाने से पहले अच्छी तरह धोकर पर्याप्त समय तक पानी में भिगोना चाहिए. अगर चने खाने से लगातार गैस या पाचन संबंधी परेशानी होती है, तो इनकी मात्रा कम करें. किसी बीमारी, पाचन संबंधी समस्या या डॉक्टर की बताई विशेष डाइट का पालन करने वाले लोगों को नियमित रूप से अधिक मात्रा में चने खाने से पहले डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह लेनी चाहिए.

  • गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, शिक्षा, धन, विवाह, संतान और सौभाग्य का कारक माना जाता है. कुंडली में गुरु की स्थिति कमजोर होने पर व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. खासतौर पर पढ़ाई-लिखाई में बाधा, करियर में रुकावट, आर्थिक परेशानियां और विवाह में देरी जैसी स्थितियों को गुरु की कमजोरी से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि गुरु को मजबूत करने के लिए पुखराज धारण करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, हर व्यक्ति के लिए महंगा रत्न खरीदना संभव या जरूरी नहीं माना जाता. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार के दिन कुछ सरल उपाय करके भी बृहस्पति देव की कृपा पाने का प्रयास किया जा सकता है.

    क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है बृहस्पति ग्रह?

    वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को देवगुरु कहा गया है. इसे ज्ञान, विवेक, धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, संतान, विवाह और समृद्धि से संबंधित ग्रह माना जाता है. मान्यता है कि कुंडली में गुरु शुभ और मजबूत स्थिति में हो तो व्यक्ति को जीवन में सही मार्गदर्शन, ज्ञान और अवसर प्राप्त होते हैं. वहीं गुरु के कमजोर होने पर निर्णय लेने में कठिनाई, शिक्षा या नौकरी में रुकावट और आर्थिक मामलों में परेशानी जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं.

    गुरुवार को करें पीले रंग का उपाय

    बृहस्पति देव को पीला रंग प्रिय माना जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनना या पूजा में पीले रंग की वस्तुओं का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा करते समय पीले फूल, पीले फल या पीली मिठाई अर्पित की जा सकती है. मान्यता है कि इससे गुरु ग्रह से जुड़े शुभ प्रभावों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है.

    केले के पेड़ की पूजा की मान्यता

    गुरुवार के दिन केले के पेड़ की पूजा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केले के पौधे में भगवान विष्णु का वास माना जाता है. गुरुवार की सुबह स्नान के बाद केले के पेड़ की पूजा करें और वहां हल्दी, चने की दाल तथा गुड़ अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक दीपक जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान किया जा सकता है.

    चने की दाल और गुड़ का करें दान

    गुरु ग्रह को प्रसन्न करने के लिए गुरुवार को जरूरतमंद व्यक्ति को पीली वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है. इस दिन चने की दाल, गुड़, पीले वस्त्र या हल्दी का दान किया जा सकता है. अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि इससे गुरु से संबंधित सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में मदद मिलती है.

    गुरु मंत्र का जाप करें

    गुरुवार के दिन बृहस्पति देव से जुड़े मंत्र का जाप करना भी एक सरल उपाय माना जाता है. पूजा के समय शांत मन से “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप किया जा सकता है. नियमित रूप से मंत्र जाप करने से मन को एकाग्र करने और आध्यात्मिक अनुशासन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है.

    गुरुजनों का सम्मान भी माना जाता है जरूरी

    ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं में गुरु, शिक्षक और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान बृहस्पति से जोड़ा जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन अपने गुरु, शिक्षक या किसी योग्य बुजुर्ग का आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है. जरूरतमंद विद्यार्थियों की पढ़ाई में सहायता करना या किसी को ज्ञान और शिक्षा से जुड़ी सामग्री देना भी सकारात्मक कार्य माना जाता है.

    पुखराज के बिना भी कर सकते हैं ये उपाय

    पुखराज बृहस्पति का प्रमुख रत्न माना जाता है, लेकिन इसे धारण करने से पहले कुंडली के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित माना जाता है. यदि कोई व्यक्ति पुखराज नहीं पहनना चाहता या खरीदना संभव नहीं है, तो गुरुवार की पूजा, पीली वस्तुओं का दान, गुरुजनों का सम्मान और मंत्र जाप जैसे सरल धार्मिक उपाय किए जा सकते हैं. इन उपायों को आस्था और नियमितता के साथ करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

  • उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    बॉडी को हेल्दी और एक्टिव रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि जरूरी है। इसके लिए वॉकिंग एक आसान और सुविधाजनक एक्सरसाइज है, जिसे लगभग हर उम्र के लोग अपनी क्षमता के अनुसार कर सकते हैं। काम के दौरान छोटे ब्रेक में या फोन पर बात करते समय भी पैदल चलने को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि वजन को कंट्रोल रखने, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी कई क्रोनिक बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।

    हर उम्र के शरीर की क्षमता और शारीरिक जरूरतें अलग होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 5 साल के बच्चे से लेकर 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए वॉक और फिजिकल एक्टिविटी का समय अलग-अलग तय किया गया है। WHO के अनुसार 18 से 64 साल के वयस्कों को हर सप्ताह कम से कम 150 से 300 मिनट की मध्यम-तीव्रता वाली एरोबिक शारीरिक गतिविधि (Brisk Walking) करनी चाहिए।

    The Lancet Public Health Study 2022 के हालिया अध्ययनों के अनुसार 60 वर्ष से कम उम्र के वयस्कों के लिए रोज़ाना 8,000-10,000 कदम और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए 6,000-8,000 कदम चलना सेहत के लिए सबसे प्रभावी माना गया हैं। Centers for Disease Control and Prevention (CDC) सलाह देता है कि बच्चे और किशोर रोज़ाना कम से कम 60 मिनट तक बॉडी को एक्टिव रखें। अगर आपको कोई पुरानी बीमारी जैसे गंभीर घुटने का दर्द, हृदय रोग या सांस की समस्या है, तो अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही वॉक का समय और गति तय करें। अगर आप भी रोज़ाना वॉक करते हैं, तो WHO की इन गाइडलाइंस के ज़रिए जानिए अपनी उम्र के हिसाब से आपको रोजाना कितनी देर और किस गति से टहलना चाहिए…

    उम्र के अनुसार वॉक का चार्ट

    ब्रिस्क वॉकिंग (Brisk Walking) की पहचान कैसे करें?

    अक्सर लोग साधारण वॉक और ब्रिस्क वॉक के अंतर को नहीं समझते हैं। आप इस अंतर को समझना चाहते हैं तो आप खुद से टेस्ट कर सकते हैं। आप टॉक टेस्ट की मदद से ब्रिस्क वॉक और नॉर्मल वॉक के अंतर को समझ सकते हैं।

    अगर आप चलते-चलते गाना गा पा रहे हैं तो आपकी वॉक की रफ्तार धीमी है।

    अगर आप चलते-चलते आसानी से बात कर पा रहे हैं, लेकिन गाना नहीं गा सकते तो यह परफेक्ट ब्रिस्क वॉक है।

    यदि बात करने में भी सांस फूल रही है तो आपकी वॉक की गति बहुत तेज़ है।

    वॉक करने का सही तरीका और टिप्स

    अगर आप वॉक करना शुरु कर रहे हैं तो आप शुरुआत में 5 मिनट वार्म-अप (धीमी वॉक) से शुरुआत करें और अंत में 5 मिनट कूल-डाउन करें।

    वॉक करते समय सही ग्रिप वाले स्पोर्ट्स शूज़ और आरामदायक सूती कपड़े पहनें।

    वॉक पर जाने से पहले और आने के बाद थोड़ा पानी ज़रूर पीएं।

    दिनभर में कदम बढ़ाने के स्मार्ट हैक्स अपनाएं

    जो लोग एक साथ 45-60 मिनट नहीं निकाल पाते, उनके लिए छोटे-छोटे हैक्स अपनाना बेहद असरदार साबित होगा। आप अपने स्टेप्स को बढ़ाना चाहते हैं तो लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें।

    फोन पर बात करते समय बैठकर बात करने के बजाय टहलें।

    नजदीकी दुकान या बाजार जाने के लिए स्कूटर और बाइक की जगह पैदल जाएं।

    ऑफिस या घर पर हर 1 घंटे के काम के बाद 5 मिनट का वॉक ब्रेक लें।

    डिस्क्लेमर:जिन्हें आर्थराइटिस (घुटनों का दर्द), सांस की बीमारी (Asthma) या हृदय रोग है, वे डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से ही अपनी वॉक का समय और स्पीड तय करें।

  • कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    इस साल शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. तो चलिए आपको बताते हैं शारदीय नवरात्रि की जरूरी डेट कौन-कौन सी है.

    शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. भक्त माता रानी की आराधना के साथ व्रत रखते हैं और घरों में कलश स्थापना कर विधि-विधान से पूजा करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा की श्रद्धा से पूजा करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. साल 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा.

    कब होगी घटस्थापना? शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026, रविवार से होगी. इसी दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाएगी और मां शैलपुत्री की पूजा होगी. दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के पंचांग के अनुसार घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है. वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा. शहर के अनुसार मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है.

    नवरात्रि में कब होगी अष्टमी और नवमी? 2026 में नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग खास रहेगा. 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी के पूजन किए जाएंगे. इस दिन मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन, हवन और विशेष पूजा भी की जाती है.

    कब है दशहरा 2026? नवरात्रि के बाद 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. इस दिन भगवान राम की रावण पर विजय की याद में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है. कई जगह रामलीला और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.

    नवरात्रि 2026 की पूरी लिस्ट 11 अक्टूबर: घटस्थापना, मां शैलपुत्री पूजा 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी पूजा 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा पूजा 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा पूजा 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता पूजा 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी पूजा 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि पूजा 18 अक्टूबर: मां महागौरी पूजा 19 अक्टूबर: दुर्गा अष्टमी और महानवमी, मां सिद्धिदात्री पूजा 20 अक्टूबर: विजयादशमी यानी दशहरा

  • पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    भारतीय महिलाओं के पारंपरिक श्रृंगार में बिछिया का खास स्थान माना जाता है। शादी के बाद पैरों की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया को कई परिवारों में सुहाग और वैवाहिक जीवन की पहचान से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, बिछिया की परंपरा केवल श्रृंगार या वैवाहिक पहचान तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।

    पैर की उंगलियों में पहनी जाने वाली इस छोटी सी चांदी की अंगूठी को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर इसे खास तौर पर दूसरी उंगली में ही क्यों पहना जाता है और क्या इसका स्वास्थ्य से भी कोई संबंध है?

    दूसरी उंगली में ही क्यों पहनी जाती है बिछिया?

    परंपरागत रूप से बिछिया पैर की दूसरी उंगली में पहनने का चलन है। भारतीय परंपराओं और कुछ आयुर्वेदिक मान्यताओं में इस उंगली को शरीर के कुछ खास नसों और दबाव बिंदुओं से जुड़ा हुआ माना जाता है।

    एक्यूप्रेशर से जुड़ी लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार, पैर की इस उंगली पर हल्का दबाव पड़ने से शरीर में कुछ विशेष बिंदु सक्रिय हो सकते हैं। इसी वजह से पुराने समय में बिछिया पहनने को केवल आभूषण नहीं, बल्कि एक पारंपरिक अभ्यास के तौर पर भी देखा जाता रहा है।

    हार्मोन और पीरियड्स से भी जोड़ी जाती है बिछिया

    बिछिया को लेकर एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि पैर की दूसरी उंगली पर लगातार हल्का दबाव पड़ने से महिलाओं के प्रजनन तंत्र से जुड़े हिस्सों पर प्रभाव पड़ सकता है। कुछ पारंपरिक दावों में इसे हार्मोनल संतुलन और मासिक धर्म से भी जोड़ा जाता है।

    हालांकि, इन दावों को वैज्ञानिक तथ्य मानना सही नहीं होगा। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अभी ऐसे

  • अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    ब्रिटेन में एक कपल के साथ ऐसा अनोखा वाकया हुआ, जिसे वे शायद जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे। अस्पताल जाने के दौरान महिला की डिलीवरी इतनी जल्दी शुरू हो गई कि उन्हें रास्ते में ही कार रोकनी पड़ी। आखिरकार बच्चे का जन्म अस्पताल के बजाय KFC के कार पार्क में हो गया।

    इस घटना की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बच्चे का नाम Cody रखा गया, लेकिन अब परिवार उसे प्यार से ‘कर्नल कोडी’ कहता है। इसकी वजह KFC के मशहूर संस्थापक Colonel Sanders से जुड़ी है।

    अस्पताल जाते समय अचानक बढ़ गया लेबर पेन

    रिपोर्ट के मुताबिक, 33 वर्षीय केटी मर्फी अपने 32 वर्षीय पार्टनर स्टीफन किर्बी के साथ अस्पताल जा रही थीं। केटी को तेज लेबर पेन हो रहा था और स्टीफन उन्हें कार से अस्पताल लेकर निकले थे।

    स्थिति को देखते हुए उन्होंने एंबुलेंस को भी फोन कर दिया। इसी दौरान उन्हें आसपास की लोकेशन बतानी थी, लेकिन रास्ते में ही हालात तेजी से बदलने लगे।

    स्टीफन की नजर Bromsgrove में A38 के पास मौजूद KFC आउटलेट पर पड़ी। वह जगह दोनों के लिए जानी-पहचानी भी थी। ऐसे में उन्होंने तुरंत कार को KFC के कार पार्क में ले जाकर रोक दिया।

    कार पार्क में ही हो गई डिलीवरी

    KFC पहुंचते-पहुंचते केटी को महसूस हुआ कि बच्चे का जन्म अब किसी भी पल हो सकता है। स्टीफन ने तुरंत कार रोकी और उनकी मदद करने के लिए पहुंचे।

    कुछ ही देर में केटी ने बेटे को जन्म दे दिया। यानी अस्पताल पहुंचने से पहले ही बच्चे ने दुनिया में कदम रख दिया था।

    राहत की बात यह रही कि एंबुलेंस भी करीब पांच मिनट बाद वहां पहुंच गई। इसके बाद मां और बच्चे को अस्पताल ले जाया गया।

    बेटे का नाम रखा Cody, प्यार से बुलाते हैं ‘कर्नल कोडी’

    बच्चे का नाम Cody रखा गया है। उसका वजन करीब 7 पाउंड 8 औंस बताया गया है और परिवार के मुताबिक वह पूरी तरह स्वस्थ है।

    लेकिन उसके जन्म की जगह की वजह से परिवार ने उसे एक मजेदार निकनेम भी दे दिया है। KFC के संस्थापक Colonel Sanders के नाम से जोड़ते हुए परिवार अब उसे प्यार से ‘Colonel Cody’ कहता है।

    परिवार का कहना है कि शायद यह नाम अब Cody के साथ जिंदगीभर जुड़ा रहेगा।

    अस्पताल में भी मंगाया गया KFC

    इस घटना की जानकारी अस्पताल की मिडवाइफरी टीम को मिली तो वहां भी यह किस्सा चर्चा का विषय बन गया।

    परिवार के मुताबिक, स्टाफ ने इस अनोखे संयोग को मजाकिया अंदाज में लिया और रात के खाने के लिए KFC भी ऑर्डर किया गया।

    परिवार अब मजाक में यह भी कहता है कि Cody का पहला जन्मदिन KFC में मनाया जा सकता है। यहां तक कि उसके पहले वीकेंड जॉब को लेकर भी परिवार मजाक करता है।

    सुबह अस्पताल से भेज दिया गया था घर

    स्टीफन ने बताया कि उसी दिन सुबह केटी और उन्हें अस्पताल से घर भेज दिया गया था, क्योंकि उस समय डॉक्टरों को लगा था कि डिलीवरी में अभी कुछ समय बाकी है।

    लेकिन शाम होते-होते केटी की तकलीफ काफी बढ़ गई। इसके बाद दोनों दोबारा अस्पताल के लिए निकल पड़े।

    रास्ते में करीब आधे घंटे की ड्राइव के दौरान उन्हें कार रोकने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिल रही थी। तभी KFC का आउटलेट नजर आया और स्टीफन ने तुरंत वहां कार ले जाकर रोक दी।

    कुछ ही मिनट बाद उनका बेटा दुनिया में आ चुका था।

    KFC ने भी दी मजेदार प्रतिक्रिया

    इस अनोखे मामले पर KFC की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने

  • कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली डल झील इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है। जिस झील की खूबसूरती कभी बॉलीवुड फिल्मों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती थी, उसके कई हिस्सों में अब गंदगी, सीवेज और घनी खरपतवार दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर झील के पर्यावरण के साथ-साथ पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।

    एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, श्रीनगर में हर दिन करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 73 फीसदी यानी करीब 147 मिलियन लीटर सीवेज का पर्याप्त उपचार नहीं हो पाता और यह डल झील या झेलम नदी जैसे जलस्रोतों तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि अब डल झील की सफाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समस्या सिर्फ झील की सतह साफ करने से दूर होगी या इसके लिए पूरी सीवेज व्यवस्था में बदलाव जरूरी है।

    डल झील की हालत क्यों बिगड़ रही है?

    डल झील और झेलम नदी श्रीनगर के लिए बेहद महत्वपूर्ण जलस्रोत हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों में बढ़ती आबादी, अतिक्रमण, निर्माण गतिविधियों, कचरे और सीवेज ने इन जलस्रोतों पर दबाव बढ़ाया है।

    सबसे बड़ी चिंता बिना पर्याप्त उपचार के सीवेज के जलस्रोतों में पहुंचने को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, श्रीनगर में रोज पैदा होने वाले करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज में से लगभग 73 फीसदी का उपचार नहीं हो पाता। यानी हर दिन बड़ी मात्रा में गंदा पानी झील और नदी तक पहुंच रहा है।

    इसके अलावा खराब ड्रेनेज व्यवस्था और पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट भी समस्या को बढ़ा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ स्थानों पर पानी के निकास के रास्तों में रुकावट के कारण झील का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है।

    सिर्फ सीवेज ही जिम्मेदार नहीं

    डल झील की समस्या केवल सीवेज तक सीमित नहीं है। स्थानीय निवासियों और एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, झील के आसपास बढ़ता निर्माण, अतिक्रमण, कूड़ा-कचरा और जल निकासी की खराब व्यवस्था भी इसकी स्थिति पर असर डाल रही है।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर गंदा पानी झील में पहुंचता रहेगा तो केवल ऊपर से खरपतवार हटाने या गाद निकालने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषित पानी झील में पहुंच ही न सके।

    कमल के फूलों की जगह दिखने लगी घनी खरपतवार

    डल झील की बदली हुई तस्वीर स्थानीय लोगों के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। स्थानीय निवासी एजाज अहमद के मुताबिक, एक समय ऐसा था जब लोग झील के पानी का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए करते थे और शिकारे के आसपास पीले और सफेद कमल के फूल नजर आते थे।

    अब झील के कई हिस्सों में अजोला की हरी परत और घनी खरपतवार दिखाई देती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कुछ हिस्सों में पानी की स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां शिकारे चलाना भी मुश्किल हो रहा है।

    एक अन्य स्थानीय निवासी अब्दुल रज्जाक का कहना है कि आज की डल झील पहले जैसी नहीं रही। उनका कहना है कि झील के आसपास बढ़ती आबादी और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं ने इसकी स्थिति को काफी प्रभावित किया है।

    डल झील की हालत का पर्यटन पर क्या असर पड़ेगा?

    डल झील केवल एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं है, बल्कि कश्मीर के पर्यटन की पहचान भी है। शिकारे, हाउसबोट और झील का खूबसूरत नजारा यहां आने वाले पर्यटकों के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर झील की हालत लगातार खराब होती रही तो इसका असर पर्यटन पर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव उन लोगों की आय पर भी पड़ेगा, जिनका रोजगार शिकारे, हाउसबोट, पर्यटन सेवाओं और आसपास के कारोबार से जुड़ा है।

    इसलिए डल झील की समस्या को केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसका संबंध स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की आजीविका से भी है।

    हर साल सफाई के बावजूद क्यों बनी हुई है समस्या?

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, झील की सफाई के लिए समय-समय पर मशीनों और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि उनका कहना है कि सफाई का असर झील के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह जाता है।

    कुछ इलाकों में खरपतवार और गंदगी हटाने के बाद स्थिति बेहतर दिखाई देती है, लेकिन झील के दूसरे हिस्सों में समस्या बनी रहती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रशासन और जनता दोनों को अपनी भूमिका निभानी होगी।

    उनके मुताबिक, सरकार को जहां सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था मजबूत करनी होगी, वहीं लोगों को भी झील और उसके आसपास कचरा फेंकने से बचना होगा।

    एक्टिविस्ट ने बताई समस्या की जड़

    डल झील की सफाई से जुड़े स्थानीय एक्टिविस्ट तारिक पतलू का कहना है कि केवल सफाई अभियान चलाने से झील की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, झील में गंदा पानी पहुंचने की समस्या को सबसे पहले रोकना होगा।

  • घुमक्कड़ माने जाते हैं : इन 3 राशियों के लोग, नई जगहों की सैर और दुनिया देखने का होता है सपना

    घुमक्कड़ माने जाते हैं : इन 3 राशियों के लोग, नई जगहों की सैर और दुनिया देखने का होता है सपना

    घुमक्कड़ माने जाते हैं : इन 3 राशियों के लोग, नई जगहों की सैर और दुनिया देखने का होता है सपना

    ज्योतिष शास्त्र में राशियों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव, पसंद और रुचियों के बारे में कई तरह की मान्यताएं बताई जाती हैं। कुछ राशियों को यात्रा और रोमांच से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इन राशि के लोगों को नई जगहों पर जाना, अलग-अलग लोगों से मिलना और नए अनुभव हासिल करना पसंद होता है।

    इसी वजह से ज्योतिषीय मान्यताओं में कुछ राशियों के जातकों को घुमक्कड़ स्वभाव वाला बताया जाता है। आइए जानते हैं उन 3 राशियों के बारे में।

    1. मेष राशि

    मेष राशि के स्वामी मंगल माने जाते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस राशि के लोग ऊर्जावान और उत्साही स्वभाव के होते हैं। इन्हें घूमना-फिरना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना पसंद हो सकता है।

    मेष राशि के जातक समय मिलने पर अचानक यात्रा की योजना भी बना सकते हैं। खास बात यह मानी जाती है कि इन्हें घूमने के लिए हमेशा किसी साथी की जरूरत नहीं होती। ये अकेले यात्रा करने का आनंद भी ले सकते हैं।

    2. मिथुन राशि

    मिथुन राशि के स्वामी बुध माने जाते हैं। ज्योतिष में बुध को जिज्ञासा, सीखने और संवाद से जोड़कर देखा जाता है। इसी आधार पर माना जाता है कि मिथुन राशि के लोगों को नई जगहों और नए अनुभवों को जानने में रुचि हो सकती है।

    प्रकृति के बीच समय बिताना, अलग-अलग स्थानों की सैर करना और नए लोगों से बातचीत करना इन्हें पसंद आ सकता है। इसी वजह से मिथुन राशि को भी यात्रा पसंद करने वाली राशियों में शामिल किया जाता है।

    3. धनु राशि

    धनु राशि को ज्योतिष में सबसे अधिक यात्रा और रोमांच से जुड़ी राशियों में गिना जाता है। इस राशि के लोगों को नई जगहों की यात्रा करने, अलग-अलग संस्कृतियों को जानने और नए लोगों से मिलने का शौक होने की मान्यता है।

    धनु राशि के जातकों को लंबी यात्राएं और एडवेंचर पसंद आ सकते हैं। छुट्टियों के दौरान भी ये नए स्थानों की तलाश में निकलना पसंद कर सकते हैं। इनके लिए यात्रा सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि नए अनुभव हासिल करने का जरिया भी मानी जाती है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं में यात्रा से जुड़ी ये राशियां

    ज्योतिष के अनुसार मेष, मिथुन और धनु राशि के लोगों को यात्रा और नई जगहों की खोज से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, किसी व्यक्ति का वास्तविक स्वभाव केवल उसकी राशि से तय नहीं होता। व्यक्तिगत रुचियां, परिस्थितियां और जीवनशैली भी यात्रा करने की पसंद को प्रभावित करती हैं।

    नोट: राशियों से जुड़े ये विवरण ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित व्यक्तित्व-विश्लेषण नहीं माना जाता।

  • नीचे नदी, बीच में सुरंग और ऊपर पुल-मंदिर! प्रकृति का ऐसा अनोखा नजारा देखकर रह जाएंगे हैरान..

    नीचे नदी, बीच में सुरंग और ऊपर पुल-मंदिर! प्रकृति का ऐसा अनोखा नजारा देखकर रह जाएंगे हैरान..

    नीचे नदी, बीच में सुरंग और ऊपर पुल-मंदिर! प्रकृति का ऐसा अनोखा नजारा देखकर रह जाएंगे हैरान..

    भारत में ऐसी कई जगहें हैं, जहां प्रकृति और इंसानी आस्था का अनोखा मेल देखने को मिलता है। ऐसी ही एक जगह का जिक्र सामने आया है, जहां नीचे नदी बहती है, चट्टानों के बीच सुरंग दिखाई देती है और उसके ऊपर बना रास्ता किसी प्राकृतिक पुल जैसा नजर आता है।

    इस जगह के आसपास बना मंदिर और पहाड़ों के बीच से गुजरता रास्ता इसे और भी खास बना देता है। ऊंचाई पर पहुंचने के बाद सामने फैले विशाल पहाड़, खुले मैदान और बादलों का नजारा ऐसा लगता है जैसे आप किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हों।

    नीचे बहती है सरस्वती नदी

    इस जगह की सबसे खास बात इसके नीचे बहने वाली नदी है। चट्टानों के बीच से नदी का पानी लगातार बहता रहता है और आसपास का प्राकृतिक वातावरण इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है।

    नदी के बीच या आसपास बनी प्राकृतिक संरचनाएं लोगों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं लगतीं। पानी, चट्टानों और पहाड़ों का यह मेल इस जगह को बेहद अनोखा रूप देता है।

    चट्टानों के बीच बनी है रहस्यमयी सुरंग

    नदी के ऊपर और आसपास चट्टानों के बीच एक सुरंग जैसी संरचना भी दिखाई देती है। इसके ऊपर से गुजरने वाला रास्ता देखने में किसी प्राकृतिक पुल जैसा लगता है।

    यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले लोगों को ऐसा अनुभव होता है जैसे प्रकृति ने खुद अपनी इंजीनियरिंग से इस जगह को तैयार किया हो।

    ऊपर बना मंदिर बढ़ाता है खूबसूरती

    इस प्राकृतिक संरचना के पास एक मंदिर भी स्थित है। नदी, चट्टानों और मंदिर का एक साथ दिखाई देना इस जगह को धार्मिक और प्राकृतिक दोनों नजरिए से खास बना देता है।

    मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों और ऊंचे रास्ते से गुजरना पड़ता है। जैसे-जैसे कोई ऊपर की ओर बढ़ता है, आसपास का नजारा भी बदलता जाता है।

    सीढ़ियां चढ़ते ही बदल जाता है पूरा नजारा

    ऊंचाई पर पहुंचने के बाद नीचे की नदी और आसपास के पहाड़ों का दृश्य बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। साफ मौसम में दूर-दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएं और आसमान में तैरते बादल इस जगह को और आकर्षक बना देते हैं।

    सुबह या शाम के समय सूर्य की रोशनी पहाड़ों और बादलों पर पड़ती है तो पूरा वातावरण और भी मनमोहक नजर आता है।

    क्यों कहा जाता है ‘धरती का स्वर्ग’?

    चारों तरफ पहाड़, बादल, हरियाली और प्राकृतिक शांति होने की वजह से इस तरह की जगहों को लोग अक्सर ‘धरती का स्वर्ग’ कहकर संबोधित करते हैं।

    यहां का वातावरण शहरों की भीड़ और शोर से बिल्कुल अलग महसूस होता है। प्रकृति के करीब समय बिताने और पहाड़ों की खूबसूरती देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं।

    प्रकृति और आस्था का अनोखा संगम

    इस जगह की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां प्राकृतिक सुंदरता के साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है। नीचे बहती नदी, चट्टानों की संरचना, ऊंचाई पर बने मंदिर और चारों तरफ फैले पहाड़ मिलकर इसे एक अलग पहचान देते हैं।

    यही वजह है कि यह गांव और इसके आसपास का इलाका प्रकृति प्रेमियों के साथ-साथ धार्मिक यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

    भारत की भौगोलिक विविधता को देखें तो ऐसी जगहें यह एहसास कराती हैं कि प्रकृति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में कितने अद्भुत नजारे संजोकर रखे हैं।

  • पेट के अंदर छिपा : था बच्चा! ‘प्रेग्नेंट गुड़िया’ का अनोखा डिजाइन देखकर हैरान रह गए लोग, इंटरनेट पर छिड़ी बहस..

    सोशल मीडिया पर इन दिनों एक अनोखे खिलौने ने लोगों का ध्यान खींच लिया है। यह गुड़िया देखने में सामान्य लगती है, लेकिन इसके डिजाइन की खासियत जानकर लोग हैरान रह गए। गुड़िया के पेट के अंदर एक छोटा सा बेबी टॉय रखा गया है, जिसे बाहर निकालकर गुड़िया की गोद में रखा जा सकता है।

    इस अलग तरह के कॉन्सेप्ट ने लोगों के बीच बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे क्रिएटिव और मजेदार खिलौना बता रहे हैं, तो कई लोगों को इसका डिजाइन अजीब और थोड़ा असहज करने वाला लग रहा है।

    क्या है इस ‘प्रेग्नेंट डॉल’ की कहानी?

    सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही जानकारी के मुताबिक, इस खिलौने को ‘Zuru Mini Baby Mom & Baby Surprise’ कहा जाता है। यह एक डॉल और छोटे बेबी के सेट के रूप में तैयार किया गया है।

    इस खिलौने की सबसे खास बात इसका डिजाइन है। गुड़िया के पेट के अंदर एक छोटा बेबी टॉय फिट किया गया है। पेट का हिस्सा खोलने पर यह छोटा बेबी बाहर निकाला जा सकता है। इसके बाद उसे गुड़िया की गोद में रखकर अलग से इस्तेमाल किया जा सकता है।

    गुड़िया के पेट से निकलता है छोटा बेबी

    इस खिलौने को इस तरह डिजाइन किया गया है कि गुड़िया के पेट के अंदर रखा छोटा बेबी आसानी से बाहर निकाला जा सके। इसके बाद बच्चे को गुड़िया की गोद में रखने का विकल्प दिया गया है।

    यही फीचर इसे बाकी सामान्य डॉल्स से अलग बनाता है और इसी वजह से इंटरनेट पर लोग इसके डिजाइन को लेकर तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।

    किसी को पसंद आया डिजाइन, तो किसी को लगा अजीब

    खिलौने को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग हैं। कुछ लोगों ने इसे अनोखा और क्रिएटिव बताया। उनका कहना है कि बच्चों के खिलौनों में इस तरह के नए कॉन्सेप्ट लोगों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं।

    वहीं, कई लोगों को गुड़िया के पेट के अंदर से बच्चे को निकालने का कॉन्सेप्ट थोड़ा अजीब लगा। कुछ यूजर्स ने सवाल उठाया कि बच्चों के लिए खिलौने का ऐसा डिजाइन कितना सामान्य माना जाए।

    कमेंट्स में लोगों ने जमकर लिए मजे

    इस खिलौने को लेकर लोगों ने मजेदार टिप्पणियां भी कीं। किसी ने मजाक में कहा कि अगर गुड़िया के साथ बच्चा मिल रहा है तो अब उसके पिता को भी पैकेज में शामिल कर देना चाहिए था।

    वहीं, कुछ लोगों ने मजाक करते हुए कहा कि काश असल जिंदगी में भी बच्चे का जन्म इतना आसान होता।

    ऐसी टिप्पणियों ने इस अनोखे खिलौने को लेकर चर्चा को और बढ़ा दिया।

    क्या यह सच में ‘प्रेग्नेंट’ गुड़िया है?

    दरअसल, इसे असली प्रेग्नेंसी से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। यह सिर्फ एक खिलौना है, जिसे मां और बेबी के कॉन्सेप्ट पर डिजाइन किया गया है।

    गुड़िया के पेट के अंदर रखा छोटा बेबी उसके डिजाइन का हिस्सा है। सोशल मीडिया पर इसे आसान भाषा में ‘प्रेग्नेंट डॉल’ कहा जा रहा है, जिसकी वजह से यह लोगों के बीच ज्यादा चर्चा में आ गई।

    बच्चों के लिए खरीदते समय रखें ध्यान

    अगर माता-पिता इस तरह का खिलौना खरीदने की सोच रहे हैं तो निर्माता की ओर से दी गई उम्र सीमा और सुरक्षा संबंधी जानकारी जरूर देखनी चाहिए। छोटे हिस्सों वाले खिलौनों के मामले में खास तौर पर यह देखना जरूरी है कि वे बच्चे की उम्र के हिसाब से उपयुक्त हैं या नहीं।

    फिलहाल इस अनोखी डॉल के डिजाइन ने इंटरनेट पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। कोई इसे क्रिएटिव खिलौना मान रहा है, तो किसी को इसका कॉन्सेप्ट अजीब लग रहा है। यही अलग-अलग प्रतिक्रियाएं इस खिलौने को सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना रही हैं।