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  • विदेश जाने की जरूरत : नहीं भारत का ये खूबसूरत द्वीप देखकर भूल जाएंगे विदेशी बीच, प्रकृति का दिखेगा अनोखा नजारा

    विदेश जाने की जरूरत : नहीं भारत का ये खूबसूरत द्वीप देखकर भूल जाएंगे विदेशी बीच, प्रकृति का दिखेगा अनोखा नजारा

    विदेश जाने की जरूरत : नहीं भारत का ये खूबसूरत द्वीप देखकर भूल जाएंगे विदेशी बीच, प्रकृति का दिखेगा अनोखा नजारा

    विदेशों के खूबसूरत बीच और द्वीपों पर घूमने का सपना बहुत से लोग देखते हैं, लेकिन बजट की वजह से हर किसी के लिए विदेश यात्रा करना आसान नहीं होता। हालांकि, अगर आप प्राकृतिक खूबसूरती और शांत माहौल वाली जगह पर घूमना चाहते हैं तो इसके लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं है।

    भारत में भी कई ऐसी जगहें हैं, जहां की खूबसूरती किसी विदेशी डेस्टिनेशन से कम नहीं लगती। ऐसी ही एक खास जगह है असम का माजुली द्वीप, जो ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसा हुआ है।

    ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसा है माजुली

    माजुली असम के जोरहाट क्षेत्र के पास ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित एक प्रसिद्ध नदी द्वीप है। अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, हरियाली और शांत वातावरण की वजह से यह जगह देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से आने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित करती है।

    यहां पहुंचने के बाद आपको चारों तरफ नदी, हरियाली और ग्रामीण जीवन का खूबसूरत मेल देखने को मिलता है। शहरों की भीड़भाड़ से दूर कुछ समय सुकून से बिताने वालों के लिए यह जगह अलग अनुभव देती है।

    प्राकृतिक खूबसूरती देखकर रह जाएंगे हैरान

    माजुली की सबसे बड़ी खासियत इसका प्राकृतिक वातावरण है। ब्रह्मपुत्र नदी के विस्तृत जल क्षेत्र, हरे-भरे इलाके और खुले आसमान का नजारा यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करता है।

    खासकर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय नदी किनारे का दृश्य बेहद खूबसूरत नजर आता है। अगर आपको प्रकृति के बीच फोटोग्राफी करना पसंद है तो यहां कई शानदार तस्वीरें क्लिक की जा सकती हैं।

    सिर्फ घूमने की जगह नहीं, संस्कृति का भी केंद्र

    माजुली सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही मशहूर नहीं है। यह असम की सांस्कृतिक और वैष्णव परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

    द्वीप पर मौजूद कई सत्र (Satras) असम की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समझने का मौका देते हैं। यहां पारंपरिक कला, संगीत, नृत्य और स्थानीय जीवन की झलक भी देखने को मिलती है।

    विदेश जैसा अनुभव, लेकिन देश में

    अगर आप कम बजट में किसी शांत और प्राकृतिक जगह की यात्रा करना चाहते हैं, तो माजुली आपके लिए एक अलग तरह का अनुभव हो सकता है। यहां आपको समुद्र का बीच नहीं, बल्कि विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसे द्वीप की खूबसूरती देखने को मिलेगी।

    यानी खूबसूरत द्वीप और प्राकृतिक नजारों का आनंद लेने के लिए हमेशा विदेश जाने की जरूरत नहीं। असम का माजुली अपने शांत वातावरण, हरियाली, नदी के नजारे और समृद्ध संस्कृति के कारण भारत के खास ट्रैवल डेस्टिनेशंस में अपनी अलग पहचान रखता है।

  • पितृपक्ष में घर लाएं:  ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष में घर लाएं: ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष में घर लाएं:  ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में कुछ विशेष वस्तुओं को घर लाना और पूजा-पाठ में उनका इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है।

    साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी। ऐसे में आइए जानते हैं उन 3 चीजों के बारे में, जिन्हें पितृपक्ष के दौरान घर लाने की परंपरा बताई जाती है।

    1. तांबे, कांसे या पीतल के बर्तन

    पितृपक्ष के दौरान तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन खरीदना कुछ धार्मिक मान्यताओं में शुभ माना जाता है। इन धातुओं के बर्तनों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है। मान्यता है कि इन बर्तनों से पितरों का तर्पण करने से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    2. घर लाएं गंगाजल

    हिंदू धर्म में गंगाजल को पवित्र माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान इसे घर लाना और धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है। मान्यता के अनुसार, गंगाजल से तर्पण करने और पूजा के दौरान इसका उपयोग करने से धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। कुछ परिवार इस अवधि में गंगाजल का छिड़काव भी करते हैं।

    3. काले तिल का करें इस्तेमाल

    पितृपक्ष में काले तिल का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। श्राद्ध और तर्पण के दौरान काले तिल का इस्तेमाल करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काले तिल का दान करना भी शुभ माना जाता है। कई लोग पितृपक्ष के दौरान इन्हें घर लाकर पूजा और तर्पण से जुड़े कार्यों में इस्तेमाल करते हैं।

    पितृपक्ष में इन बातों का भी रखें ध्यान

    पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण करना, श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। इन दिनों सात्विक आचरण और परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा-पाठ करने पर भी जोर दिया जाता है।

    ध्यान दें: तांबे, कांसे या पीतल के बर्तन, गंगाजल और काले तिल से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें जीवन में खुशियां आने या पितृदोष दूर होने की वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

  • 308 पहिए और 200 : टन की मशीनरी! बिहार की सड़क पर दिखा विशाल ट्रक, देखने के लिए उमड़ी भीड़

    308 पहिए और 200 : टन की मशीनरी! बिहार की सड़क पर दिखा विशाल ट्रक, देखने के लिए उमड़ी भीड़

    308 पहिए और 200 : टन की मशीनरी! बिहार की सड़क पर दिखा विशाल ट्रक, देखने के लिए उमड़ी भीड़

    बिहार के कैमूर जिले के कुदरा में इन दिनों एक विशाल ट्रक लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस खास ट्रक को देखकर सड़क से गुजर रहे लोग भी कुछ देर के लिए रुक गए। वजह थी इसका बेहद बड़ा आकार और इस पर लदी करीब 200 टन वजनी भारी मशीनरी।

    बताया जा रहा है कि यह विशाल वाहन बेल्जियम से लाई गई मशीनरी को लेकर भारत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जा रहा है। कुदरा से गुजरते समय इसे देखने के लिए सड़क के दोनों ओर लोगों की भीड़ जमा हो गई।

    308 पहियों वाले ट्रक को देखकर लोग रह गए हैरान

    इस भारी-भरकम ट्रक की सबसे बड़ी खासियत इसके पहिए हैं। जानकारी के मुताबिक, पूरे वाहन में 308 पहिए लगाए गए हैं, ताकि इतनी भारी मशीनरी को सुरक्षित तरीके से सड़क के रास्ते ले जाया जा सके।

    इतने बड़े आकार का वाहन इलाके के लोगों के लिए रोज-रोज देखने वाली चीज नहीं है। यही वजह रही कि जैसे ही ट्रक सड़क से गुजरने लगा, आसपास मौजूद लोगों की नजरें उस पर टिक गईं।

    बेल्जियम से भारत लाई गई है मशीनरी

    इस ट्रक पर करीब 200 टन की भारी मशीनरी लदी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मशीनरी को बेल्जियम से भारत लाया गया है।

    यह मशीनरी समुद्री रास्ते से ओडिशा के पारादीप पोर्ट पहुंची थी। इसके बाद इसे सड़क मार्ग से उत्तर प्रदेश के बलरामपुर स्थित एक चीनी मिल तक ले जाया जा रहा है।

    इतने भारी सामान को सड़क के रास्ते एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम है।

    रेल ओवरब्रिज के नीचे से निकालना था चुनौती

    कुदरा में इस विशाल वाहन को निकालते समय कई जगहों पर विशेष सावधानी बरती गई। खासकर रेल ओवरब्रिज के नीचे

  • बंदर ने सैलून में कराई :मजेदार बॉडी मसाज, वायरल हुआ ‘मोंकेश भाई’ का क्यूट अंदाज; देखें वीडियो

    बंदर ने सैलून में कराई :मजेदार बॉडी मसाज, वायरल हुआ ‘मोंकेश भाई’ का क्यूट अंदाज; देखें वीडियो

    बंदर ने सैलून में कराई :मजेदार बॉडी मसाज, वायरल हुआ ‘मोंकेश भाई’ का क्यूट अंदाज; देखें वीडियो

    सोशल मीडिया पर एक बंदर का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह नाई की दुकान पर कुर्सी पर बैठकर मजे से बॉडी मसाज करवा रहा है. आप भी देखिए ये मजेदार वीडियो.

    अक्सर लोग दिनभर की भागदौड़ और थकान मिटाने के लिए सैलून जाकर सुकून भरी मसाज करवाते हैं. लेकिन जरा सोचिए, अगर कोई जानवर वो भी बंदर नाई की कुर्सी पर आराम से बैठकर बॉडी मसाज लेने लगे तो क्या होगा? सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसा ही बेहद प्यारा और हैरान करने वाला वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर आपकी भी हंसी छूट जाएगी. वायरल वीडियो में एक बंदर सैलून की कुर्सी पर ऐसे बैठा है, मानों वो शहर का कोई बहुत बड़ा VIP ग्राहक हो.

    सैलून की कुर्सी पर राजा बाबू की तरह बैठा बंदर

    वायरल हो रहे इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक बंदर अचानक से किसी नाई की दुकान में दाखिल होता है. उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे आज उसका मूड पूरी तरह से रिलैक्स करने का था. वह बिना किसी डर या झिझक के सीधे सैलून की कुर्सी पर जाकर आराम से बैठ गया. उसके हाव-भाव और शरीर की ढीली पोजीशन यह चीख-चीख कर कह रही थी कि उसे आज बस जमकर मसाज चाहिए.

    नाई ने भी बिना किसी झिझक के शुरू कर दी स्पेशल मसाज

    बंदर के इस अनोखे अंदाज को देखकर नाई भी हैरान रह गया, लेकिन उसने बंदर को भगाने के बजाय उसके साथ दोस्ताना व्यवहार किया. नाई ने बड़े प्यार से बंदर की बॉडी मसाज करना शुरू कर दिया. वीडियो में बंदर आंखें बंद करके इस मुफ्त के स्पा ट्रीटमेंट का पूरा लुत्फ उठाते हुए नजर आ रहा है. नाई भी पूरी शिद्दत से उसकी मालिश करने में जुटा हुआ है.

    ‘मोंकेश भाई’ के नाम से सोशल मीडिया पर मचा तहलका

    यह वीडियो इंस्टाग्राम पर @divya177kumari नाम की यूजर द्वारा शेयर किया गया है. इसके कैप्शन में लिखा है- मोंकेश भाई मसाज का आनंद ले रहे हैं. जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट पर आया, यह आग की तरह फैल गया. लोग इस वीडियो को बार-बार देख रहे हैं और इसपर जमकर मजेदार प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

    लोगों ने पूछा- बिल कौन चुकाएगा?

    इस वीडियो को देखने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने मजे लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जनता के मन में सबसे बड़ा और मजेदार सवाल यही था कि इस शानदार सर्विस का बिल आखिर कौन चुकाएगा? कई यूजर्स ने चुटकी लेते हुए कहा कि मोंकेश भाई ने बिना एक भी रुपया खर्च किए फुल-बॉडी मसाज का लुत्फ उठा लिया. कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में यह भी लिखा कि अगर नाई अपनी टिप की उम्मीद कर रहा है, तो उसे मोंकेश भाई के बटुए के साथ लौटने का लंबा इंतजार करना पड़ेगा.

    अब देखिए ये वायरल वीडियो

     

     

     
     
  • गरबा पंडालों में 4.5 : लाख लड़कियों के दावे से मचा विवाद, BJP विधायक उषा ठाकुर ने कही ये बात.

    गरबा पंडालों में 4.5 : लाख लड़कियों के दावे से मचा विवाद, BJP विधायक उषा ठाकुर ने कही ये बात.

    गरबा पंडालों में 4.5 : लाख लड़कियों के दावे से मचा विवाद, BJP विधायक उषा ठाकुर ने कही ये बात.

    मध्य प्रदेश में नवरात्रि से पहले गरबा आयोजनों में एंट्री को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री उषा ठाकुर के एक बयान ने राजनीतिक और सामाजिक चर्चा को और बढ़ा दिया है। उन्होंने दावा किया कि हर साल करीब 4.5 लाख हिंदू लड़कियां गरबा पंडालों से गैर-हिंदू युवकों के साथ चली जाती थीं।

    उषा ठाकुर ने इस दावे को जनसांख्यिकी से जोड़ते हुए करीब 9 लाख बच्चों का भी जिक्र किया। हालांकि, उनके बताए इन आंकड़ों के समर्थन में किसी सरकारी आंकड़े, आधिकारिक सर्वे या अन्य प्रमाणित स्रोत का उल्लेख सामने नहीं आया है। इसलिए इन संख्याओं को उनके दावे के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक की मांग

    उषा ठाकुर ने गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि आयोजनों में आने वाले लोगों की पहचान सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग अपनी पहचान छिपाकर गरबा पंडालों में प्रवेश करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने ऐसे लोगों को रोकने की बात कही, जो उनकी नजर में धार्मिक पहचान छिपाकर आयोजन में शामिल होते हैं।

    4.5 लाख लड़कियों और 9 लाख बच्चों का दावा

    उषा ठाकुर ने कहा कि उनके अनुसार हर साल बड़ी संख्या में हिंदू लड़कियां गरबा आयोजनों के दौरान दूसरे समुदाय के युवकों के साथ चली जाती थीं। उन्होंने करीब 4.5 लाख लड़कियों का आंकड़ा बताया और इसके बाद करीब 9 लाख बच्चों का जिक्र किया।

    हालांकि, इस दावे को साबित करने के लिए उन्होंने कोई आधिकारिक आंकड़ा या जनसांख्यिकीय अध्ययन पेश नहीं किया। उपलब्ध रिपोर्टों में भी इन संख्याओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    गरबा के धार्मिक स्वरूप पर भी जोर

    उषा ठाकुर ने गरबा को धार्मिक परंपरा और शक्ति की आराधना से जुड़ा आयोजन बताते हुए इसके पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि गरबा केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा भी जुड़ी हुई है।

    उन्होंने आयोजनों में बढ़ते फैशन और दिखावे का जिक्र करते हुए पारंपरिक स्वरूप पर ध्यान देने की बात कही।

    रामेश्वर शर्मा के बयान से भी गरबा पर विवाद

    गरबा में एंट्री को लेकर भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा का बयान भी चर्चा में है। भोपाल के हुजूर से विधायक शर्मा ने कहा कि मुस्लिम युवक गरबा में अकेले क्यों आते हैं और उन्हें अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने आपत्ति जताई।

    इस पूरे मामले के बीच मध्य प्रदेश में नवरात्रि और गरबा आयोजनों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक तरफ आयोजनों की धार्मिक पहचान और सुरक्षा को लेकर तर्क दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नेताओं के बयानों पर राजनीतिक दलों के बीच विरोध और बहस भी सामने आ रही है।

    आंकड़ों को लेकर क्या है स्थिति?

    उषा ठाकुर द्वारा बताए गए 4.5 लाख लड़कियों और 9 लाख बच्चों के आंकड़ों का कोई आधिकारिक स्रोत सामने नहीं आया है। इसलिए इन आंकड़ों को प्रमाणित तथ्य के बजाय भाजपा विधायक के दावे के रूप में ही रिपोर्ट किया जाना चाहिए।

  • गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश की स्थापना के साथ कई घरों में कलश भी स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है, जिसे पूजा में शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब गणपति बप्पा को विदाई देने का समय आता है, तो भक्तों के मन में सवाल उठता है कि कलश पर रखे नारियल और उसके जल का क्या करना चाहिए।

    इस साल 25 सितंबर 2026 को गणेश विसर्जन किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विसर्जन के बाद कलश के नारियल और जल का इस्तेमाल कुछ विशेष तरीकों से किया जा सकता है। आइए जानते हैं इनके बारे में।

    1. नारियल को फोड़कर प्रसाद के रूप में बांटें

    अगर कलश पर रखा नारियल अच्छी स्थिति में है और खराब नहीं हुआ है, तो उसे फोड़कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, पूजा में चढ़ाई गई सामग्री को श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में स्वीकार किया जाता है। परिवार के सदस्य इसे आपस में बांट सकते हैं।

    2. लाल कपड़े में बांधकर रख सकते हैं नारियल

    कुछ धार्मिक मान्यताओं में कलश के नारियल को लाल कपड़े में बांधकर घर के पूजा स्थल या तिजोरी में रखने का सुझाव दिया जाता है। इसे भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में रखा जाता है। यदि आप ऐसा करते हैं, तो नारियल को साफ और सुरक्षित स्थान पर रखें।

    3. गणपति प्रतिमा के साथ विसर्जित करने का विकल्प

    कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार कलश के नारियल को गणपति प्रतिमा के साथ विसर्जित करते हैं। हालांकि, विसर्जन की विधि स्थानीय धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुसार अपनानी चाहिए। प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषित करने से बचें और जहां संभव हो, निर्धारित कृत्रिम विसर्जन स्थल का उपयोग करें।

    4. कलश के जल का क्या करें?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद कलश के जल को श्रद्धापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ लोग इस जल का घर में छिड़काव करते हैं और बचा हुआ पानी किसी पौधे या गमले में डाल देते हैं। ऐसा करते समय ध्यान रखें कि जल में ऐसी सामग्री न मिली हो जो पौधों या मिट्टी को नुकसान पहुंचा सकती हो।

    धार्मिक मान्यताओं का रखें ध्यान

    गणेश विसर्जन के बाद नारियल और कलश के जल के इस्तेमाल की विधियां परिवारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए अपने घर की परंपरा और पूजा कराने वाले पुरोहित के निर्देशों का पालन कर सकते हैं। इन उपायों को धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में समझें।

  • हिंदू परिवार में जन्मे : रुद्र सेन वर्मा, 16 सालों से सिख गेटअप में रहते हैं; लोग प्यार से बुलाते हैं ‘सरदार जी’

    हिंदू परिवार में जन्मे : रुद्र सेन वर्मा, 16 सालों से सिख गेटअप में रहते हैं; लोग प्यार से बुलाते हैं ‘सरदार जी’

    हिंदू परिवार में जन्मे : रुद्र सेन वर्मा, 16 सालों से सिख गेटअप में रहते हैं; लोग प्यार से बुलाते हैं ‘सरदार जी’

    उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रुद्र सेन वर्मा की पहचान अपने आप में काफी अलग है। नाम और सरनेम से उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन पिछले करीब 16 वर्षों से वह पगड़ी, दाढ़ी और मूंछों के साथ सिख गेटअप में नजर आते हैं।

    इलाके में अब उनकी यह पहचान इतनी मशहूर हो चुकी है कि लोग उन्हें उनके नाम से ज्यादा प्यार से ‘सरदार जी’ या ‘पंजाबी वाले’ कहकर बुलाते हैं।

    आर्थिक परेशानियों के बीच छोड़ा घर

    रुद्र सेन वर्मा के मुताबिक, उनके जीवन का एक दौर काफी मुश्किलों से भरा रहा। पारिवारिक परिस्थितियों और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें रोजगार की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़ा।

    कमाई के लिए वह पहले हरियाणा पहुंचे और इसके बाद पंजाब के लुधियाना चले गए। पंजाब में रहने के दौरान उनका वहां के माहौल और लोगों से गहरा जुड़ाव हुआ।

    कब बदला पहनावा?

    पंजाब में रहने के दौरान रुद्र ने सिख समुदाय की वेशभूषा को अपनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने पगड़ी बांधना, दाढ़ी और मूंछें रखना शुरू कर दिया।

    समय के साथ यह पहनावा उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया। आज करीब 16 साल बाद भी वह इसी अंदाज में रहते हैं।

    इलाके में बन गई अलग पहचान

    रुद्र जब अपने क्षेत्र में लौटे तो उनका बदला हुआ पहनावा लोगों के लिए आकर्षण का विषय बन गया। शुरुआत में लोग उन्हें देखकर हैरान होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका यह अंदाज उनकी पहचान बन गया।

    अब स्थानीय लोग उन्हें सम्मान और अपनापन दिखाते हुए ‘सरदार जी’ या ‘पंजाबी वाले’ कहकर बुलाते हैं।

    सिर्फ पहनावा नहीं, जुड़ाव की भी कहानी

    रुद्र सेन वर्मा की कहानी सिर्फ अलग तरह के पहनावे तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उनके जीवन का वह दौर भी जुड़ा है, जब रोजगार की तलाश उन्हें हरियाणा और पंजाब तक ले गई।

    पंजाब में बिताए समय और वहां मिले अनुभवों ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। इसी दौरान उन्होंने ऐसा पहनावा अपनाया, जिसे वह आज भी अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं।

    16 साल बाद भी कायम है वही अंदाज

    समय बदल गया, परिस्थितियां बदलीं और रुद्र अपने क्षेत्र में वापस आ गए, लेकिन उनका पहनावा आज भी वैसा ही है। पगड़ी और दाढ़ी-मूंछ के साथ उनका अलग अंदाज उन्हें आसपास के लोगों के बीच आसानी से पहचान दिला देता है।

    उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि इंसान के जीवन में अलग-अलग जगहों और अनुभवों का कितना गहरा प्रभाव पड़ सकता है। रुद्र ने पंजाब में बिताए वर्षों की यादों और वहां से जुड़े अपने अनुभवों को अपनी रोजमर्रा की पहचान में शामिल कर लिया है।

  • कभी घर-घर पिज्जा : पहुंचाता था ये भारतीय, आज 3 रेस्टोरेंट का मालिक; 11 साल में ऐसे बदली पूरी जिंदगी.

    कभी घर-घर पिज्जा : पहुंचाता था ये भारतीय, आज 3 रेस्टोरेंट का मालिक; 11 साल में ऐसे बदली पूरी जिंदगी.

    कभी घर-घर पिज्जा : पहुंचाता था ये भारतीय, आज 3 रेस्टोरेंट का मालिक; 11 साल में ऐसे बदली पूरी जिंदगी.

    किस्मत कब और कैसे बदल जाए, इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले एक भारतीय शख्स की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है। करीब 11 साल पहले पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया पहुंचे इस शख्स को अपनी पढ़ाई के क्षेत्र में नौकरी नहीं मिली तो उसने पिज्जा शॉप में काम करना शुरू कर दिया।

    शुरुआत में उसका काम लोगों के घरों तक पिज्जा पहुंचाना था। लेकिन उसने इस काम को छोटा समझने के बजाय पूरी मेहनत और लगन के साथ काम किया। सोशल मीडिया पर शेयर की गई कहानी के मुताबिक, कुछ साल बाद उसने उसी पिज्जा बिजनेस में निवेश किया और धीरे-धीरे खुद रेस्टोरेंट का मालिक बन गया।

    आज उसके पास तीन रेस्टोरेंट होने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया में घर, BMW कार और हैदराबाद में भी संपत्ति होने की बात सामने आई है। हाल ही में उसे और उसके परिवार को ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता मिलने का भी दावा किया गया है।

    पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया पहुंचा था

    वायरल सोशल मीडिया पोस्ट के मुताबिक, यह शख्स करीब 11 साल पहले पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे अपने क्षेत्र में मनचाही नौकरी नहीं मिली।

    ऐसे में उसने खाली बैठने के बजाय पिज्जा शॉप में फुल-टाइम नौकरी शुरू कर दी। इस दौरान वह ग्राहकों के घर पिज्जा पहुंचाने का काम करता था।

    शुरुआत भले ही साधारण थी, लेकिन उसने नौकरी के दौरान बिजनेस को करीब से समझना शुरू किया। ग्राहक कैसे जुड़ते हैं, रेस्टोरेंट का काम कैसे चलता है और फ्रेंचाइजी मॉडल किस तरह काम करता है—इन चीजों का अनुभव उसे इसी दौरान मिला।

    तीन साल बाद लिया बड़ा फैसला

    सोशल मीडिया पर शेयर की गई जानकारी के अनुसार, करीब तीन साल तक पिज्जा शॉप में काम करने के बाद उसने अपने करियर को एक नया मोड़ देने का फैसला किया।

    कुछ बचत और पार्टनरशिप की मदद से उसने उसी पिज्जा फ्रेंचाइजी में निवेश किया, जहां वह पहले नौकरी करता था। यानी जिस बिजनेस में वह कभी कर्मचारी के तौर पर काम कर रहा था, उसी में बाद में उसकी हिस्सेदारी हो गई।

    इसके बाद उसने बिजनेस को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।

    कोविड के बाद बढ़ाया कारोबार

    वायरल पोस्ट के मुताबिक, कोरोना महामारी के बाद उसके बिजनेस में तेजी आई। इसके बाद उसने दो और फ्रेंचाइजी हासिल कर लीं।

    इस तरह पिज्जा डिलीवरी करने से शुरू हुआ उसका सफर धीरे-धीरे तीन रेस्टोरेंट तक पहुंच गया। हालांकि, सोशल मीडिया पोस्ट में इन रेस्टोरेंट की कुल कमाई या कारोबार का विस्तृत वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    अब ऑस्ट्रेलिया में घर और BMW का दावा

    कहानी के मुताबिक, कारोबार में सफलता मिलने के बाद उसकी आर्थिक स्थिति भी काफी बेहतर

  • मजबूरी क्या न कराए: महंगे घरों से परेशान लोग खरीद रहे ‘भूतिया घर’, आधी कीमत में मिल रही प्रॉपर्टी.

    मजबूरी क्या न कराए: महंगे घरों से परेशान लोग खरीद रहे ‘भूतिया घर’, आधी कीमत में मिल रही प्रॉपर्टी.

    मजबूरी क्या न कराए: महंगे घरों से परेशान लोग खरीद रहे ‘भूतिया घर’, आधी कीमत में मिल रही प्रॉपर्टी.

    ताइवान में घरों की बढ़ती कीमतों ने लोगों के सामने एक ऐसा विकल्प खड़ा कर दिया है, जिसके बारे में सुनकर शायद आप भी हैरान रह जाएंगे। यहां कुछ लोग महंगी प्रॉपर्टी से बचने के लिए ऐसे घर खरीदने का जोखिम उठा रहे हैं, जिनका अतीत मौत या किसी हिंसक घटना से जुड़ा हुआ है।

    इन संपत्तियों को आमतौर पर ‘हॉन्टेड हाउस’ या ‘मर्डर होम’ कहा जाता है। मंदारिन भाषा में इन्हें ‘Xiong Zhai’ के नाम से जाना जाता है। इन घरों को लेकर लोगों के बीच तरह-तरह की धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं हैं, जिसके कारण इनकी कीमत सामान्य घरों की तुलना में काफी कम हो सकती है।

    सामान्य कीमत से आधे तक सस्ते मिलते हैं ऐसे घर

    ‘Xiong Zhai’ उन संपत्तियों को कहा जाता है, जहां पहले किसी व्यक्ति की मौत हिंसक या परेशान करने वाली परिस्थितियों में हुई हो। ऐसी घटना की जानकारी सामने आने के बाद कई खरीदार उस घर से दूरी बनाने लगते हैं।

    यही वजह है कि इन संपत्तियों की कीमत बाजार की सामान्य दर से काफी नीचे चली जाती है। कुछ मामलों में ऐसे घर सामान्य प्रॉपर्टी की तुलना में करीब आधी कीमत में भी उपलब्ध हो सकते हैं।

    घटना जितनी गंभीर या चर्चित होती है, उस संपत्ति को लेकर खरीदारों की हिचकिचाहट भी उतनी ही बढ़ सकती है। हालांकि इसी वजह से कम बजट वाले कुछ लोगों के लिए ये घर आकर्षक विकल्प बन जाते हैं।

    आर्थिक तरक्की के बावजूद महंगे हैं घर

    ताइवान की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर उद्योग को आर्थिक विकास के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

    लेकिन आर्थिक विकास का असर हर व्यक्ति की घर खरीदने की क्षमता पर एक जैसा नहीं पड़ा है। प्रॉपर्टी की ऊंची कीमतों के कारण कुछ खरीदार अब ऐसे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं, जिन्हें पहले लोग आसानी से नजरअंदाज कर देते थे।

    बैंक भी लोन देने से बचते हैं

    ऐसी संपत्तियों को खरीदने में एक परेशानी यह भी है कि कई बार बैंक इनके लिए लोन देने से हिचकिचाते हैं।

    इसकी एक वजह यह मानी जाती है कि अगर खरीदार भविष्य में लोन नहीं चुका पाता, तो बैंक के लिए ऐसी संपत्ति को दोबारा बेचना मुश्किल हो सकता है। बहुत से लोग ऐसे घरों को अशुभ मानते हैं और उन्हें खरीदने से बचते हैं।

    रियल एस्टेट एजेंट Wu Kaiwen के मुताबिक, कुछ लोगों को यह डर भी रहता है कि ऐसी संपत्ति खरीदने का उनके जीवन या भाग्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि यह धार्मिक और सामाजिक विश्वास हैं, इनका वैज्ञानिक आधार स्थापित नहीं है।

    ‘घोस्ट मंथ’ में और बढ़ जाती है चर्चा

    ताइवान में ऐसी संपत्तियों से जुड़ी मान्यताओं का संबंध वहां की पारंपरिक आध्यात्मिक धारणाओं से भी है। ‘घोस्ट मंथ’ के दौरान मान्यता है कि मृत लोगों की आत्माएं धरती पर लौट सकती हैं।

    इस अवधि में कुछ मंदिरों में आत्माओं के लिए भोजन और अन्य चीजें रखने की परंपरा भी देखने को मिलती है। इसी वजह से इस समय ऐसी मान्यताओं और उनसे जुड़ी संपत्तियों की चर्चा भी बढ़ जाती है।

    घर में शिफ्ट होने से पहले कराते हैं विशेष रस्में

    जो लोग ‘Xiong Zhai’ खरीदने का फैसला करते हैं, उनमें से कुछ नए घर में प्रवेश करने से पहले विशेष धार्मिक या आध्यात्मिक रस्में करवाते हैं।

    आध्यात्मिक मान्यताओं से जुड़े लोगों के अनुसार, इन रस्मों का उद्देश्य घर से जुड़ी पुरानी नकारात्मकता को दूर करना और नए रहने वालों के लिए घर को शुभ बनाना होता है। कुछ लोग इन अनुष्ठानों के जरिए पिछली घटना से जुड़ी कथित नकारात्मक ऊर्जा से बचने की कोशिश करते हैं।

    हालांकि, इन मान्यताओं को वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाता। किसी घर की कीमत पर उसका इतिहास, स्थानीय बाजार, लोकेशन और खरीदारों की धारणा जैसे कई वास्तविक कारक भी असर डाल सकते हैं।

    सस्ता घर या डर से जुड़ी कीमत?

    ताइवान में बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों के बीच ‘Xiong Zhai’ का मामला यह दिखाता है कि कम कीमत में घर खरीदने के लिए कुछ लोग सामाजिक धारणाओं और पुराने इतिहास से जुड़ी परेशानियों को भी स्वीकार करने को तैयार हैं।

    इन घरों में कीमत कम हो सकती है, लेकिन उनके साथ जुड़ी पुरानी घटनाएं और लोगों की मान्यताएं खरीदार के लिए अलग तरह की चुनौती बन सकती हैं।

  • पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    सनातन धर्म में पितरों यानी अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धा और सम्मान देने की परंपरा रही है। कई परिवार अपने घर में पूर्वजों की तस्वीर लगाते हैं और उनकी स्मृति को संजोकर रखते हैं। वास्तु शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार, इन तस्वीरों को लगाते समय दिशा और स्थान का ध्यान रखना चाहिए।

    आइए जानते हैं पितरों की तस्वीर लगाने से जुड़े प्रमुख वास्तु नियम।

    1. किस दिशा में लगानी चाहिए पितरों की तस्वीर?

    वास्तु की कुछ मान्यताओं के अनुसार, पितरों की तस्वीर उत्तर दिशा की दीवार पर लगाना शुभ माना जाता है, ताकि तस्वीर में पूर्वजों का मुख दक्षिण दिशा की ओर रहे। वहीं, कुछ वास्तु परंपराओं में दक्षिण दिशा को भी पितरों से संबंधित माना गया है। इसलिए इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं।

    2. पूजा घर में तस्वीर लगाने से बचें

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, पितरों की तस्वीर को देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ पूजा स्थल में लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। पूर्वजों के सम्मान के लिए घर में अलग और साफ-सुथरा स्थान चुना जा सकता है।

    3. बेडरूम और रसोई में न लगाएं तस्वीर

    कुछ वास्तु मान्यताओं में पितरों की तस्वीर बेडरूम, रसोई और बाथरूम के पास लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके बजाय घर में ऐसी जगह चुनें, जहां तस्वीर सुरक्षित रहे और उसका सम्मानपूर्वक रखरखाव किया जा सके।

    4. जीवित सदस्यों के साथ न लगाएं तस्वीर

    वास्तु की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, दिवंगत पूर्वजों की तस्वीर को जीवित परिवार के सदस्यों की तस्वीरों के साथ लगाने से बचना चाहिए। कई लोग पूर्वजों के लिए अलग स्थान रखना उचित मानते हैं।

    5. एक ही स्थान पर रखें तस्वीरें

    घर में पूर्वजों की बहुत अधिक तस्वीरें अलग-अलग जगहों पर लगाने के बजाय उन्हें एक निर्धारित स्थान पर व्यवस्थित रखना बेहतर माना जाता है। तस्वीरों की संख्या को लेकर वास्तु संबंधी मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।

    6. तस्वीर की साफ-सफाई का रखें ध्यान

    पूर्वजों की तस्वीर को साफ-सुथरा रखें। अगर तस्वीर का फ्रेम टूट गया है या खराब हो गया है, तो उसकी मरम्मत करवाएं। तस्वीर पर धूल जमा न होने दें और उसके आसपास का स्थान भी व्यवस्थित रखें।

    ध्यान दें: पितरों की तस्वीरों की दिशा और उनसे जुड़े नियम वास्तु एवं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग परंपराओं में इनके बारे में अलग सुझाव मिल सकते हैं। इन नियमों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम या किसी अनहोनी की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।