Category: Dharam

  • लाख कोशिशों के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिले खड़े हनुमान! मंदिर टूटने के बाद अब प्रशासन के सामने नई चुनौती..

    लाख कोशिशों के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिले खड़े हनुमान! मंदिर टूटने के बाद अब प्रशासन के सामने नई चुनौती..

    लाख कोशिशों के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिले खड़े हनुमान! मंदिर टूटने के बाद अब प्रशासन के सामने नई चुनौती..

    मामला उज्जैन के कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक होने वाले सड़क चौड़ीकरण से जुड़ा है. सिंहस्थ 2028 से पहले पुराने शहर के इस हिस्से को व्यवस्थित करने की तैयारी है. प्रशासन ने सड़क की जद में आ रहे मंदिर के भवन को तोड़ दिया लेकिन जब बात हनुमान प्रतिमा को सुरक्षित विस्थापित करने की आई, तो चुनौती बढ़ गई.

    उज्जैन में सड़क बनाम आस्था

    उज्जैन में सड़क बनाम आस्था

    प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी

    प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी

    सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन में सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन इसी विकास के बीच आस्था का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण के लिए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का भवन तोड़ दिया गया. अब जब हनुमान प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाने की कोशिश की गई, तो मामला अटक गया. दावा है कि कई प्रयासों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली. इसके बाद हिंदू संगठनों ने प्रतिमा हटाने का विरोध शुरू कर दिया है.

    मंदिर का भवन टूटा, प्रतिमा टेंट के नीचे विराजमान सड़क चौड़ीकरण की जद में आने के कारण मंदिर का भवन हटाया जा चुका है. फिलहाल हनुमान प्रतिमा को टेंट की छत के नीचे रखा गया है. प्रशासन अब प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह विस्थापित करने का रास्ता तलाश रहा है. वहीं श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों का कहना है कि जब प्रतिमा को हटाने की कोशिश के बावजूद सफलता नहीं मिली, तो इसे अपनी जगह से हटाने की जरूरत ही क्या है.

    मंगलवार को सैकड़ों लोगों ने की महाआरती विरोध के बीच मंगलवार शाम मंदिर स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे. यहां महाआरती की गई, ढोल-ताशे बजाए गए और हनुमान चालीसा का पाठ हुआ. लोगों ने एकजुट होकर प्रशासन से मांग की कि सड़क चौड़ीकरण का काम किया जाए, लेकिन हनुमान प्रतिमा को उसकी मौजूदा जगह से न हटाया जाए. हिंदू संगठनों का दावा है कि प्रतिमा को हटाने की करीब चार बार कोशिश की जा चुकी है. हर बार प्रयास विफल रहा.

    छेनी-हथौड़े से कोशिश, फिर भी नहीं हिली प्रतिमा बताया जा रहा है कि प्रतिमा को नीचे से हटाने के लिए भी प्रयास किए गए. छेनी-हथौड़े की मदद से उसे निकालने की कोशिश हुई, लेकिन प्रशासन को सफलता नहीं मिली. अब अधिकारियों की ओर से विशेषज्ञों की मदद लेने की तैयारी है, ताकि प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाया जा सके.

    इतिहासकार बोले- जगह का भी है ऐतिहासिक महत्व उज्जैन के इतिहास के जानकार भगवती लाल राजपुरोहित के मुताबिक यह प्रतिमा बेहद प्राचीन मानी जाती है. हालांकि लंबे समय से सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण प्रतिमा की मूल भाव-भंगिमा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाती. उनके अनुसार मंदिर का यह स्थान भी उज्जैन के ऐतिहासिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में प्रतिमा को हटाने का मामला केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे धार्मिक और ऐतिहासिक भावनाएं भी जुड़ी हैं.

    प्रशासन के सामने विकास और आस्था दोनों की चुनौती इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के मुताबिक पुरानी और भारी प्रतिमाओं को आधुनिक तकनीक की मदद से सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाना संभव है. लेकिन यहां चुनौती सिर्फ तकनीकी नहीं है. प्रतिमा प्राण-प्रतिष्ठित होने के कारण श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना भी जरूरी है.

  • गणपति स्थापना में न करें ये गलती, जानें बप्पा का मुख और पीठ किस दिशा में होना माना जाता है शुभ..

    गणपति स्थापना में न करें ये गलती, जानें बप्पा का मुख और पीठ किस दिशा में होना माना जाता है शुभ..

    गणपति स्थापना में न करें ये गलती, जानें बप्पा का मुख और पीठ किस दिशा में होना माना जाता है शुभ..

    गणेशोत्सव को लेकर भक्तों में उत्साह बढ़ने लगा है. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है. मान्यता है कि गणपति बप्पा बुद्धि, सुख-समृद्धि देने वाले और सभी विघ्नों को दूर करने वाले देवता हैं33. इसी वजह से गणेश चतुर्थी पर बड़ी संख्या में लोग घर में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं.

    इस साल गणेशोत्सव 14 सितंबर से शुरू होगा और 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ इसका समापन होगा. अगर आप भी घर में बप्पा को विराजमान करने जा रहे हैं, तो मूर्ति की स्थापना करते समय कुछ वास्तु और धार्मिक मान्यताओं का ध्यान रखना जरूरी है.ईशान कोण में गणपति की स्थापना मानी जाती है

    शुभ वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को पूजा-पाठ के लिए बेहद शुभ माना जाता है. ऐसे में गणेश जी की मूर्ति को इस दिशा में रखना अच्छा माना जाता है. अगर ईशान कोण में जगह उपलब्ध नहीं है, तो उत्तर या पश्चिम दिशा में भी गणपति की स्थापना की जा सकती है.किस दिशा में होना चाहिए गणपति का मुख गणपति बप्पा की मूर्ति रखते समय उनके मुख की दिशा का भी ध्यान रखना चाहिए.

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का मुख घर के अंदर की ओर होना चाहिए. वहीं उनकी पीठ दीवार की तरफ होनी चाहिए. मान्यता है कि गणेश जी के सम्मुख भाग में सुख और समृद्धि का वास होता है. इसलिए मूर्ति को इस तरह रखना चाहिए कि उनकी पीठ घर के खुले हिस्से या मुख्य कमरे की ओर न हो.जमीन पर न रखें गणेश जी की मूर्ति गणपति की प्रतिमा को सीधे जमीन पर रखना उचित नहीं माना जाता है.

    मूर्ति की स्थापना के लिए साफ चौकी या पाटे का इस्तेमाल करना चाहिए. चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें. पूजा की जगह भी साफ और पवित्र होनी चाहिए.कैसी हो गणपति की प्रतिमा घर में गणपति की स्थापना के लिए मिट्टी से बनी प्रतिमा को प्राथमिकता दी जाती है. ऐसी प्रतिमा का विसर्जन भी आसानी से किया जा सकता है.

    प्रतिमा लाते समय उसके आकार और स्थापना के लिए उपलब्ध स्थान का भी ध्यान रखना चाहिए.स्थापना के बाद इन बातों का रखें ध्यान गणेश चतुर्थी के दिन स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें. इसके बाद चौकी पर कपड़ा बिछाकर गणपति बप्पा को विराजमान करें. भगवान गणेश को दूर्वा, फूल और मोदक अर्पित करें. विधि-विधान से पूजा और आरती करें. गणपति के घर में रहने तक रोज सुबह- शाम आरती और भोग लगाना शुभ माना जाता है. साथ ही पूजा स्थल की साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें.

  • इस साल शारदीय नवरात्रि कब से शुरू है? नोट कर लें तारीख और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    इस साल शारदीय नवरात्रि कब से शुरू है? नोट कर लें तारीख और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    इस साल शारदीय नवरात्रि कब से शुरू है? नोट कर लें तारीख और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    Shardiya Navratri 2026 Start Date: सालभर में 4 नवरात्रि आती हैं, जिसमें दो गुप्त नवरात्रि, एक चैत्र नवरात्रि और एक शारदीय नवरात्रि. शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है. शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ व्रत का प्रारंभ होता है. प्रतिपदा से लेकर नवमी के 8 या 9 दिन मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं. दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव मनाया जाता है. वहीं शाम को दशहरा का रावण जलाते हैं.

    आश्विन माह का कृष्ण पक्ष पितरों की पूजा, तर्पण, ​श्राद्ध के लिए समर्पित होता है. इसे पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं. उसके बाद का शुक्ल पक्ष दुर्गा पूजा का होता है. शारदीय नवरात्रि में कुछ लोग पूरे 9 दिनों का व्रत रखते हैं, वहीं कुछ प्रतिपदा और अष्टमी का व्रत रखते हैं. दुर्गा अष्टमी और महानवमी के दिन कन्या पूजा करते हैं. आइए जानते हैं कि शारदीय नवरात्रि कब से है? कलश स्थापना का मुहूर्त क्या है?

    शारदीय नवरात्रि शुभारंभ 2026 तारीख

    वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मा​ह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर दिन रविवार को रात 9 बजकर 19 मिनट पर शुरू हो रही है. प्रतिपदा तिथि का समापन 11 अक्टूबर दिन सोमवार को रात 9 बजकर 30 मिनट पर होगा. उदयातिथि की मान्यता के आधार पर शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ 11 अक्टूबर सोमवार से होगा.

    शारदीय नवरात्रि 2026 कलश स्थापना मुहूर्त

    शारदीय नवरात्रि के पहले दिन यानि प्रतिपदा को कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह में 6 बजकर 19 मिनट से सुबह 10 बजकर 12 मिनट तक है. सुबह में घटस्थापना के लिए आपको 3 घंटे 52 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा.

    जो लोग किसी वजह से सुबह में कलश स्थापना न कर पाएं, वे अभिजीत मुहूर्त में दिन में 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट के बीच कर सकते हैं.

    शारदीय नवरात्रि के पहले दिन बनेगा द्विपुष्कर योग

    नवरात्रि की प्रतिपदा को द्विपुष्कर योग बन रहा है, जो रात में 9 बजकर 30 मिनट से रात 10 बजकर 32 मिनट तक रहेगा. इस योग में आप जो शुभ कार्य करते हैं, उसका दोगुना फल प्राप्त होता है.

    नवरात्रि के पहले दिन वैधृति योग प्रात:काल से लेकर रात 9 बजकर 5 मिनट तक रहेगा. उसके बाद से विष्कम्भ योग बनेगा. वहीं चित्रा नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 10 बजकर 32 मिनट तक है, उसके बाद से स्वाति नक्षत्र है. इस तरह से वैधृति योग और चित्रा नक्षत्र में शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा.

    शारदीय नवरात्रि का समापन 2026 तारीख

    इस बार शारदीय नवरात्रि का समापन 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को होगा. उस दिन नवरात्रि का हवन है और विजयादशमी मनाई जाएगी. इस दिन शाम को दशहरा के रावण का दहन होगा.

  • इन तारीखों पर जन्मे बच्चे माता-पिता के लिए माने जाते हैं भाग्यशाली, लाखों में एक होती हैं.

    इन तारीखों पर जन्मे बच्चे माता-पिता के लिए माने जाते हैं भाग्यशाली, लाखों में एक होती हैं.

    इन तारीखों पर जन्मे बच्चे माता-पिता के लिए माने जाते हैं भाग्यशाली, लाखों में एक होती हैं.

    Lucky Children For Parents: हिंदू धर्म और भारतीय परंपरा में संतान को ईश्वर का आशीर्वाद माना गया है. मान्यता है कि बच्चे के जन्म के साथ परिवार के जीवन में नई ऊर्जा, खुशियां और सकारात्मक बदलाव आते हैं. वहीं अंक ज्योतिष में जन्म तारीख के अंकों को विशेष महत्व दिया गया है. न्यूमेरोलॉजी के अनुसार, कुछ तारीखों पर जन्म लेने वाले बच्चों के नंबर माता-पिता के लिए शुभ और उन्नति देने वाले माने जाते हैं. माना जाता है है कि इन खास तारीख में जन्मे बच्चे लाखों में एक होते हैं और अपने कार्यों से सभी को प्रभावित भी करते हैं. इन बच्चों में बचपन से खास व्यवहार देखने को मिल जाता है, जिससे इनके भविष्य के बारे में जानकारी मिलती है. आइए जानते हैं किन तारीख में जन्म लेने वाले बच्चे माता-पिता के लिए सौभाग्य लाते हैं…

    किसी भी महीने की 1, 10, 19 और 28 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 1 होता है और इन अंक के स्वामी ग्रहों के राजा सूर्यदेव हैं. सूर्य ग्रह की वजह से इस अंक को आत्मविश्वास, नेतृत्व और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि 1, 10, 19 या 28 तारीख को जन्म लेने वाले बच्चे परिवार में महत्वाकांक्षा और आगे बढ़ने की ऊर्जा ला सकते हैं. ऐसे बच्चे माता-पिता को अपने करियर, आर्थिक स्थिति और सामाजिक सम्मान को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं. इनके आने के बाद परिवार में नई योजनाएं बन सकती हैं और रुके हुए कामों को पूरा करने की प्रेरणा मिल सकती है.

    किसी भी महीने की 3, 12, 21 और 30 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 3 होता है और इस अंक के स्वामी देवताओं के गुरु बृहस्पति देव हैं. अंक ज्योतिष में गुरु ग्रह को ज्ञान, शिक्षा, संस्कार और मार्गदर्शन के कारक माने जाते हैं. इसलिए 3, 12, 21 और 30 तारीख में जन्मे बच्चों को ज्ञान और सकारात्मक सोच से जुड़ा माना जाता है. मान्यता है कि ऐसे बच्चों के कारण परिवार में शिक्षा, संस्कार और धार्मिक गतिविधियों के प्रति रुचि बढ़ सकती है. माता-पिता को गुरुजनों, शिक्षकों या समाज के सम्मानित लोगों का सहयोग मिलने के योग बन सकते हैं.

    किसी भी महीने की 6, 15 और 24 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 6 होता है और इस अंक का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है. अंक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को प्रेम, सौंदर्य, सुख-सुविधा और पारिवारिक खुशियों का कारक माना जाता है. इसलिए 6, 15 और 24 तारीख को जन्मे बच्चों को परिवार में प्रेम और आपसी सामंजस्य बढ़ाने वाला माना जाता है. इनकी मौजूदगी से घर का माहौल अधिक खुशनुमा और भावनात्मक रूप से मजबूत हो सकता है. पारंपरिक मान्यता के अनुसार, ऐसे बच्चों के कारण माता-पिता के जीवन में सुख-सुविधाओं और पारिवारिक सहयोग की वृद्धि हो सकती है.

    किसी भी महीने की 8, 17 और 26 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 8 होता है और इस अंक का संबंध शनिदेव से माना जाता है. अंक ज्योतिष में शनि कर्म, अनुशासन, धैर्य और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं. 8, 17 और 26 तारीख को जन्मे बच्चों के बारे में अंक ज्योतिष में माना जाता है कि इनकी सफलता धीरे-धीरे लेकिन मजबूत आधार पर आती है. ऐसे बच्चों के आने के बाद माता-पिता अपने भविष्य, धन और जिम्मेदारियों को लेकर अधिक अनुशासित हो सकते हैं. लंबे समय से अटके लक्ष्य पूरे करने की दिशा में परिवार को नई प्रेरणा मिल सकती है. इनका भाग्य अचानक मिलने वाले लाभ से ज्यादा मेहनत और धैर्य से जुड़ा माना जाता है.

    किसी भी महीने की 9, 18 और 27 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 9 होता है और इस अंक के स्वामी ग्रहों के सेनापति मंगल देव हैं. मंगल देव साहस, ऊर्जा, पराक्रम और आत्मविश्वास के प्रतीक माने जाते हैं इसलिए 9, 18 और 27 तारीख को जन्म लेने वाले बच्चों को साहसी और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला माना जाता है. मान्यता है कि ऐसे बच्चे कठिन परिस्थितियों में परिवार का मनोबल बढ़ा सकते हैं. इनके कारण माता-पिता में संघर्ष करने की शक्ति, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की भावना मजबूत हो सकती है.

  • घर को बुरी नजर से बचाना है? मुख्य द्वार पर टांग दें ये एक चीज, बरकत और पॉजिटिव एनर्जी का है खास वास्तु उपाय!

    घर को बुरी नजर से बचाना है? मुख्य द्वार पर टांग दें ये एक चीज, बरकत और पॉजिटिव एनर्जी का है खास वास्तु उपाय!

    Main Door Vastu: सनातन परंपरा में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व है। खासतौर पर घर का मुख्य द्वार बेहद अहम माना जाता है। माना जाता है कि यहीं से घर में हर तरह की ऊर्जा प्रवेश करती है। इसलिए लोग मुख्य द्वार को शुभ बनाए रखने के लिए कई उपाय करते हैं, ताकि घर की बरकत और पॉजिटिविटी बनी रहे। इन्हीं में से एक उपाय घोड़े की नाल लगाने का भी है। वास्तु और ज्योतिष में इस उपाय को सुख-समृद्धि और सकारात्मकता बढ़ाने में काफी प्रभावशाली माना गया है।

    कारगर टोटका

    मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल लगाना शुभ होता है। अगर आप चाहते हैं कि आपके घर में सुख-शांति बनी रहे और नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश न कर सके, तो यह पारंपरिक वास्तु टोटका आपके लिए कारगर साबित हो सकता है। मान्यता है कि यह उपाय घर को बुरी नजर से बचाने में भी मदद करता है।

    क्या होती है घोड़े की नाल?

    घोड़े के पैरों की सुरक्षा के लिए लोहे से बनी यू (U Shape) आकार की एक पट्टी लगाई जाती है। यह घोड़े को चलने और दौड़ने में सहूलियत देती है। पुराने समय में जब यह नाल घिस जाती थी, तो लोग इसे घरों में वास्तु उपाय के रूप में इस्तेमाल करते थे।

    वास्तु में क्यों माना जाता है शुभ?

    वास्तु अनुसार, घोड़े की नाल का संबंध शनि ग्रह और लोहे तत्व से होता है। मान्यता है कि मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल लगाने से घर के भीतर नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर का प्रभाव कम होता है।

    किन दिशाओं में लगाना लाभकारी?

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, अगर घर का मुख्य द्वार उत्तर, उत्तर-पश्चिम या पश्चिम दिशा में है, तो उसके ऊपर बाहर की ओर घोड़े की नाल लगाना शुभ होता है। काले घोड़े की नाल ज्यादा प्रभावशाली मानी जाती है।

    घोड़े की नाल लगाने के फायदे

    • मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल लगाने से घर में सकारात्मकता बढ़ने की मान्यता है।
    • कई लोग इसे नजर दोष से बचाव, आर्थिक परेशानियों से राहत पाने के लिए भी लगाते हैं।
    • ज्योतिषियों के मुताबिक, जिन लोगों की कुंडली में शनि से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए भी यह उपाय लाभकारी होता है।

    घोड़े की नाल लगाने का सही तरीका

    घोड़े की नाल को मुख्य द्वार पर इस तरह लगाएं कि उसका खुला हिस्सा ऊपर की ओर रहे, ताकि शुभ ऊर्जा घर के भीतर बनी रहे। शनिवार का दिन इसके लिए शुभ बताया है। इसे लगाने से पहले गंगाजल से शुद्ध करना भी अच्छा माना जाता है।

    इन बातों का रखें ध्यान

    घोड़े की नाल लगाते समय कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। टूटी, मुड़ी हुई या अत्यधिक जंग लगी नाल का इस्तेमाल न करें। केवल सजावट के लिए बनाई गई नकली नाल प्रभावी नहीं मानी जाती। नाल को जमीन पर फेंकने या पैर लगाने से भी बचें। आज बाजार में कई तरह की नाल उपलब्ध हैं, लेकिन इस्तेमाल की हुई नाल अधिक असरदार मानी जाती है।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • हथेली में सूर्य पर्वत और सूर्य रेखा पर तिल का क्या मतलब है? जानें ज्योतिष उपाय..

    हथेली में सूर्य पर्वत और सूर्य रेखा पर तिल का क्या मतलब है? जानें ज्योतिष उपाय..

    हथेली में सूर्य पर्वत और सूर्य रेखा पर तिल का क्या मतलब है? जानें ज्योतिष उपाय..

    Surya Parvat Par Til Hona: हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की हथेली में अनामिका अंगुली यानि रिंग फिंगर के नीचे के क्षेत्र को सूर्य पर्वत कहा जाता है. सूर्य का संबंध व्यक्ति के कार्यक्षेत्र, पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, धन, संपत्ति, राजकाज, सरकार से संबंध आदि को दर्शाता है. आज ह​म बात करने वाले हैं सूर्य रेखा पर तिल के बारे में. आमतौर पर हथेली पर तिल का होना शुभ नहीं होता है. तिल जहां पर होता है, उसके गुणों को दोषपूर्ण बना देता है, उसके प्रभावों को कम कर देता है. तिल का संबंध राहु से माना जाता है.

    तिल जन्म से है या बाद में बना

    हाथ में तिल दो प्रकार के ​होते हैं. एक जन्म के साथ ही हथेली पर तिल ​होता है. ऐसे तिल को अशुभ नहीं मानते हैं, लेकिन कोई तिल जन्म के बाद बना है तो उसका अशुभ प्रभाव होता है. उससे संभलकर रहने की जरूरत होती है.

    सूर्य पर्वत या सूर्य रेखा पर तिल का निशान

    • यदि आपकी हथेली में सूर्य पर्वत पर या सूर्य की रेखा पर काले तिल का निशान है तो आपको अपने कार्यक्षेत्र में सावधान हो जाना चाहिए. करियर में लापरवाही न करें. इससे आपको हानि हो सकती है.
    • कार्यक्षेत्र में आप पर कोई झूठा या फिर सही का आरोप लगा सकता है.
    • इस समय में आपके सम्मान, पद, प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है.
    • काले तिल के प्रभाव से आपको हड्डियों से जुड़ी कोई समस्या हो सकती है. पीठ और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी परेशानी हो सकती है.
    • सूर्य रेखा पर तिल का निशान होने से आपको चर्म रोग से सावधान रहना चाहिए.
    • कुछ लोगों के हाथ में हृदय रेखा पर काले तिल का निशान ठीक सूर्य पर्वत के नीचे हो तो उनको भी अपने पद, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए.
    • सूर्य पर्वत या सूर्य रेखा का तिल आपके पिता से संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है.

    सूर्य पर्वत के तिल का उपाय

    1. सूर्य पर्वत या सूर्य रेखा पर काला तिल है तो उससे परेशान न हों. आप कुछ ज्योतिष उपायों को करके उसके दुष्प्रभावों को कम या दूर कर सकते हैं.
    2. आप रविवार का व्रत रखें और सूर्य देव की पूजा करें. इस व्रत में नमक का सेवन न करें. इससे लाभ होगा.
    3. प्रतिदिन सूर्य देव को जल से अर्घ्य दें और नमस्कार करें.
    4. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं. इससे सूर्य का प्रभाव बढ़ेगा.
    5. सूर्य का संबंध पिता से होता है. ऐसे में आप अपने पिता की सेवा करें. पिता नहीं हैं तो पिता के समान किसी व्यक्ति की सेवा करें.
    6. रविवार या संक्रांति के दिन सूर्य से संबंधित वस्तुओं जैसे गुड़, गेहूं, लाल फल, लाल रंग के कपड़े, तांबा या तांबे के बर्तन आदि का दान करें.

  • किचन की दीवारों पर कौन-सा रंग है सबसे शुभ? जानिए वास्तु के अनुसार रसोई के लिए सही कलर, जो बढ़ाते हैं सकारात्मक ऊर्जा..

    किचन की दीवारों पर कौन-सा रंग है सबसे शुभ? जानिए वास्तु के अनुसार रसोई के लिए सही कलर, जो बढ़ाते हैं सकारात्मक ऊर्जा..

    किचन की दीवारों पर कौन-सा रंग है सबसे शुभ? जानिए वास्तु के अनुसार रसोई के लिए सही कलर, जो बढ़ाते हैं सकारात्मक ऊर्जा..

    Auspicious Wall Colors for Kitchen: घर की रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती। यह कमरा पूरे परिवार के स्वास्थ्य और खुशहाली से जुड़ी होती है। वास्तु में किचन को घर का ऊर्जा केंद्र माना गया है, इसलिए रसोई की सही दिशा के साथ ही रंगों के चयन पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है, ताकि घर में पॉजिटिव एनर्जी बनी रहे। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, रसोई में सही रंगों का चयन घर में सुख-शांति बनाए रखने में मदद करता है। तो चलिए जानते हैं किचन की दीवारों के लिए कौन-सा रंग सबसे शुभ माना जाता है।

    क्यों महत्वपूर्ण हैं किचन के रंग?

    वास्तु के मुताबिक, रंगों का सीधा प्रभाव व्यक्ति के मन, व्यवहार और घर के वातावरण पर पड़ता है। किचन में इस्तेमाल किए गए रंग वहां के माहौल को ऊर्जावान, शांत या प्रेरणादायक बना सकते हैं। इसलिए रसोई की दीवारों और इंटीरियर के लिए सही रंगों का चयन करना जरूरी माना जाता है।

    1. केसरिया रंग:
      वास्तु के अनुसार, केसरिया रंग ऊर्जा, उत्साह और आत्मविश्वास का प्रतीक होता है। सैफ्रॉन कलर घर में सकारात्मक वातावरण बनाने के साथ ही रिश्तों को मजबूत करने में भी मददगार माना जाता है। पूर्व दिशा में स्थित रसोई के लिए यह रंग विशेष रूप से शुभ बताया जाता है।
    2. सफेद रंग:
      व्हाइट कलर रंग पवित्रता, सादगी और शांति का प्रतीक है। यह रसोई को साफ-सुथरा और ओपन लुक देता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, सफेद रंग का उपयोग घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने में सहायक हो सकता है। खासतौर पर उत्तर-पश्चिम दिशा की रसोई के लिए यह रंग शुभ माना जाता है।
    3. हरा रंग:
      ग्रीन कलर प्रकृति और संतुलन का प्रतीक है। यह आंखों को सुकून देता है। साथ ही रसोई के माहौल को शांत और ताजगी भरा बनाता है। अगर आप किचन में सुकून और प्राकृतिक एहसास चाहते हैं तो हरे रंग का इस्तेमाल कर सकते हैं।
    4. गुलाबी रंग
      : यह रंग प्रेम, स्नेह और पारिवारिक रिश्तों का प्रतीक माना जाता है। वास्तु के मुताबिक, पिंक लकर घर वालों के बीच आत्मीयता बढ़ाने में मदद करता है। ऐसे घर जहां परिवार के सदस्य एक साथ समय बिताना पसंद करते हैं, वहां किचन में गुलाबी रंग अच्छा विकल्प हो सकता है।
    5. नारंगी और ईंट लाल रंग:
      नारंगी और ईंट जैसे लाल रंग को ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक होते हैं। यह रंग रसोई में जीवंतता लाता है और सकारात्मक माहौल बनाने में मदद करता है। दक्षिण-पूर्व दिशा में बने किचन के लिए यह रंग विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।
    6. भूरा और पीला रंग:
      ब्राउन कलर गर्मजोशी और स्थिरता का एहसास कराता है। यह आपकी रसोई को आकर्षक बनाता है। वहीं, पीला रंग खुशहाली और उत्साह का प्रतीक है। ऐसे रसोईघर जहां प्राकृतिक रोशनी कम आती है, वहां यैलौ कलर का इस्तेमाल वातावरण को उजला और जीवंत बनाता है।

    दिशा के अनुसार चुनें रंग

    • पूर्व दिशा की रसोई में ग्रीन, सैफ्रॉन और बेज कलर
    • पश्चिम दिशा की रसोई में सफेद, ग्रे, सिल्वर और गोल्डन रंग
    • उत्तर दिशा की रसोई के लिए ब्लू, ग्रे और ग्रून कलर
    • दक्षिण दिशा की रसोई के लिए लाल, पीला, नारंगी, हरा और बेज कलर

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

    कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

    कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब

    कृष्ण जन्माष्टमी की रात कान्हा के जन्म के साथ ही मानो गोकुल की गलियों में उत्सव उतर आता है. मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में भजन गूंजते हैं और महिलाएं पारंपरिक बधाई गीत गाकर खुशी मनाती हैं. इन्हीं लोकगीतों में एक गीत है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया’. इसकी खासियत यह है कि गीत केवल कृष्ण जन्म की खुशी नहीं बताता, बल्कि उस पूरे लोक संसार की तस्वीर खींच देता है, जहां बच्चे के जन्म पर घर-आंगन से लेकर गलियों तक उत्सव मनाया जाता है.

    कृष्ण की छठी के अवसर पर भी कई क्षेत्रों में ऐसे लोकगीत गाने की परंपरा रही है. हालांकि अलग-अलग इलाकों में गीत के बोल और धुन थोड़े बदल सकते हैं. कहीं इसे बधाई के रूप में गाया जाता है तो कहीं छठी या नामकरण के अवसर पर. गीत की पंक्तियों में गोकुल की खुशियां, रोशनी, ढोल और बधाई देने वालों का उत्साह साफ नजर आता है.

    ‘जन्म लियो दोनों भैया’ में छिपी है गोकुल की खुशी

    गीत की शुरुआत ही उत्सव के माहौल से होती है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया.’ यहां ‘बधैया’ यानी बधाई या खुशी के गीतों की ओर संकेत है. लोकभाषा में ऐसी पंक्तियां किसी शुभ अवसर की सामूहिक खुशी को व्यक्त करती हैं. कृष्ण जन्म की कथा में गोकुल और नंद भवन का विशेष महत्व है. इसलिए इस तरह के लोकगीतों में गोकुल केवल एक स्थान नहीं रहता, बल्कि खुशियों से भरे पूरे संसार का प्रतीक बन जाता है. कल्पना कीजिए, किसी गांव में घर में बच्चे का जन्म हुआ हो और आसपास की महिलाएं एक साथ गीत गाने लगें. यही सामूहिक खुशी इस गीत में भी महसूस होती है.

    दीपों से जगमगाता है पूरा गोकुल

    गीत में आगे ‘जगमग दिए जलत हैं’ और ‘द्वारे-द्वारे दीप जलत हैं’ जैसी भावनाएं आती हैं. इन पंक्तियों के जरिए जन्मोत्सव की रोशनी को सामने रखा गया है. दीप जलाना भारतीय परंपरा में शुभता और मंगल का संकेत माना जाता है. इसलिए कृष्ण जन्म के संदर्भ में दीपों की यह तस्वीर बेहद स्वाभाविक लगती है. गीत सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे गोकुल की गलियां और घरों के दरवाजे दीपों से रोशन हैं और हर ओर कान्हा के जन्म की चर्चा हो रही है.

    गलियों में धूम और ढोल की आवाज

    गीत का एक और आकर्षक हिस्सा है, जिसमें ‘गलियों-गलियों धूम मची है’ और ढोल बजने की बात आती है. लोकगीतों की खूबी यही होती है कि वे बड़े धार्मिक प्रसंग को आम जिंदगी की तस्वीरों से जोड़ देते हैं. कृष्ण के जन्म की खुशी सिर्फ नंद भवन तक सीमित नहीं रहती. गीत में पूरा गोकुल नाचता-गाता नजर आता है. ढोल बज रहे हैं, लोग बधाई दे रहे हैं और हर तरफ उत्सव जैसा माहौल है. यही वजह है कि ऐसे गीत सुनते ही श्रोता कहानी पढ़ने के बजाय उसे महसूस करने लगता है.

    ‘कौन लुटाए हीरे-मोती’ का क्या अर्थ है?

    गीत में ‘कौन लुटाए हीरे मोती’ और ‘कौन लुटाए रुपैया’ जैसी पंक्तियां भी आती हैं. लोकगीतों में इस तरह की भाषा अक्सर खुशी और उदारता दिखाने के लिए इस्तेमाल होती है. यहां हीरे-मोती और रुपयों की बात को केवल धन के अर्थ में देखना जरूरी नहीं है. भाव यह है कि खुशी इतनी बड़ी है कि लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार और बधाई लुटा रहे हैं. आगे राजा के हीरे-मोती लुटाने और मैया के रुपैया लुटाने की कल्पना इसी उत्सव को और रंगीन बना देती है.

    कन्हैया के नाम से जुड़ी है खास खुशी

    गीत में ‘नाम धरो है कन्हैया’ का भाव भी आता है. कृष्ण के बाल रूप को लोक परंपरा में कन्हैया, कान्हा, नंदलाला जैसे स्नेहभरे नामों से पुकारा जाता है. इसलिए नामकरण का संदर्भ गीत को बच्चे के जन्म से आगे एक नए पारिवारिक संस्कार से जोड़ देता है. यही इस गीत की सबसे खूबसूरत बात है. इसमें भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप होने के साथ-साथ एक नवजात बच्चे के घर में आने वाली सामान्य खुशी भी दिखाई देती है. मां का लाड़, परिवार की उमंग और पड़ोसियों की बधाई- सब कुछ लोकभाषा में सहज ढंग से सामने आता है.

  • इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    इन दिशाओं में राशन का भंडारण नहीं माना जाता शुभ, जानिए रसोई की कौन सी दिशा में रखें आटा-चावल-दाल

    Ration Vastu: घर में रखा राशन केवल दैनिक जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं होता, बल्कि वास्तु शास्त्र में इसे समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से भी जोड़ा गया है। इससे घर का वातावरण संतुलित बना रहता है, जबकि गलत स्थान पर रखा राशन रखना कई तरह की परेशानियों का कारण बन सकता है। तो आइए जानते हैं कि आटा, चावल, दाल और अन्य खाद्य सामग्री रखने के लिए कौन-सी दिशा सही मानी जाती है।

    राशन का वास्तु महत्व

    वास्तु शास्त्र में घर के हर हिस्से और वस्तु के लिए एक विशेष ऊर्जा दिशा बताई गई है। अनाज और खाद्य पदार्थों को भी इसी सिद्धांत से जोड़ा गया है। मान्यता है कि सही स्थान पर रखा राशन घर में बरकत बनाए रखता है। ऐसे में घर में अनाज, दाल, आटा और अन्य राशन सामग्री रखते समय दिशा का ध्यान रखना फायदेमंद माना जाता है।

    दक्षिण-पूर्व दिशा है सबसे शुभ

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) राशन के भंडारण के लिए सबसे उपयुक्त है। यह दिशा अग्नि तत्व से संबंधित होती है, इसलिए यहां रखे गए सूखे खाद्य पदार्थ ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। अगर घर में अलग स्टोर रूम उपलब्ध न हो, तो रसोई के दक्षिण या दक्षिण-पूर्व हिस्से में राशन रखने की सलाह दी जाती है।

    ईशान कोण में न रखें राशन

    उत्तर-पूर्व दिशा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए शुभ मानी जाती है। हालांकि, वास्तु के अनुसार इस दिशा में अनाज या अन्य खाद्य सामग्री रखने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इससे घर में आर्थिक असंतुलन और स्थिरता से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

    इन दिशाओं में भी रखें सावधानी

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम दिशा में लंबे समय तक खाद्य पदार्थ रखने से उनमें नमी, कीड़े या खराब होने की समस्या हो सकती है। विशेषकर मौसम में बदलाव के दौरान यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इसलिए राशन को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां वातावरण सूखा और अनुकूल बना रहे।

    ये दिशा भी नहीं मानी जाती अनुकूल

    वास्तु के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा में भी खाद्य पदार्थों का भंडारण अधिक शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि यहां ऊर्जा का संतुलन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है, जिससे राशन की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इसलिए इस दिशा से बचना बेहतर माना जाता है।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    घर में गलत दिशा में लगा शीशा बन सकता है परेशानी की वजह, जानें 5 जरूरी नियम..

    Vastu Shastra For Mirror: घर की सजावट में शीशे का इस्तेमाल आम बात है। शीशा कमरे को बड़ा और रोशन दिखाने में मदद करता है। लेकिन वास्तु शास्त्र में शीशे की दिशा और उसकी स्थिति को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, सही जगह पर लगा शीशा सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक हो सकता है, जबकि गलत दिशा या गलत स्थान पर लगाया गया शीशा घर के माहौल की सकारात्मकता को खत्म कर सकता है।

    खास तौर पर बेडरूम, मुख्य द्वार और दक्षिण-पश्चिम दिशा में शीशा लगाते समय सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। आइए जानते हैं घर में शीशा लगाने के 5 जरूरी वास्तु नियम, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए।

    1. उत्तर या पूर्व दिशा में लगाएं शीशा

    वास्तु के अनुसार घर में शीशा लगाने के लिए उत्तर और पूर्व दिशा को सामान्यतः शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को धन और समृद्धि से तथा पूर्व दिशा को सूर्य के प्रकाश और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। इसलिए इन दिशाओं की दीवार पर शीशा लगाना बेहतर माना जाता है।

    2. मुख्य दरवाजे के ठीक सामने न लगाएं

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, घर के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने शीशा लगाने से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि दरवाजे से घर में आने वाली सकारात्मक ऊर्जा शीशे से वापस बाहर की ओर परावर्तित हो सकती है। इसलिए मुख्य द्वार के सामने शीशा लगाने के बजाय इसे किसी साइड की दीवार पर लगाना बेहतर माना जाता है।

    3. बेड के सामने शीशा लगाने से बचें

    बेडरूम में शीशे की स्थिति को लेकर वास्तु में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। बेड का प्रतिबिंब शीशे में दिखाई देना वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि इससे बेचैनी और नींद में परेशानी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। यदि कमरे में ड्रेसिंग मिरर है, तो उसे इस तरह रखें कि उसमें बेड दिखाई न दे।

    4. टूटा या चटका हुआ शीशा घर में न रखें

    वास्तु मान्यताओं में टूटे, चटके शीशे को घर में रखना अशुभ माना जाता है। इसलिए अगर शीशा टूट गया है या उसमें दरार आ गई है, तो उसे जल्द बदल देना बेहतर है।

    5. दक्षिण-पश्चिम दिशा में शीशा लगाने से बचें

    वास्तु के अनुसार, शीशे के लिए दक्षिण और खासकर दक्षिण-पश्चिम दिशा को अच्छा नहीं माना जाता। इसके बजाय उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है।

    शीशा लगाते समय इन बातों का भी रखें ध्यान

    शीशा हमेशा साफ और अच्छी स्थिति में रखें। वास्तु मान्यताओं के अनुसार शीशे में जो चीज दिखती है, उसका प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए कोशिश करें कि शीशे में कूड़ा, अव्यवस्था, टूटी-फूटी वस्तुएं या अस्त-व्यस्त जगह शीशे में नहीं दिखाई दें। इसके बजाय साफ-सुथरा और रोशन स्थान प्रतिबिंबित होना बेहतर माना जाता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026