Category: Dharam

  • Kartik Swami Temple: भारत का अनोखा मंदिर, जहां मूर्ति नहीं बल्कि भगवान कार्तिकेय की अस्थियों के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु..

    Kartik Swami Temple: भारत का अनोखा मंदिर, जहां मूर्ति नहीं बल्कि भगवान कार्तिकेय की अस्थियों के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु..

    उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला अपने प्राचीन मंदिरों और धार्मिक महत्व के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां स्थित केदारनाथ, तुंगनाथ, मद्महेश्वर, ओंकारेश्वर, त्रियुगीनारायण, कालीमठ, कोटेश्वर महादेव, अगस्त्यमुनि, रुद्रनाथ, धारी देवी और कई अन्य प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। इन्हीं पवित्र धामों के बीच स्थित है कार्तिक स्वामी मंदिर, जिसे पूरे उत्तर भारत में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को समर्पित सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उनके कुलदेवता का पवित्र धाम भी है।

    कार्तिक स्वामी मंदिर कहां स्थित है?

    कार्तिक स्वामी मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में कनकचौरी गांव के पास क्रौंच पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित है। रुद्रप्रयाग से इसकी दूरी लगभग 38 किलोमीटर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कनकचौरी से करीब 2.5 से 3 किलोमीटर का पैदल ट्रेक करना पड़ता है। यह ट्रेक भले ही छोटा हो, लेकिन रास्ते में दिखने वाले घने जंगल, पहाड़ी मोड़ और हिमालय के अद्भुत नज़ारे यात्रा को यादगार बना देते हैं।

    मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता

    कार्तिक स्वामी मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां भगवान कार्तिकेय की पारंपरिक मूर्ति स्थापित नहीं है। यहां एक पवित्र शिला की पूजा की जाती है, जिसे भगवान कार्तिकेय की अस्थियों का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इस मंदिर का धार्मिक महत्व अन्य मंदिरों से अलग और बेहद विशेष माना जाता है।

    कार्तिक स्वामी मंदिर की पौराणिक कथा

    इस मंदिर से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश, की परीक्षा लेने के लिए उन्हें पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने का कार्य सौंपा।

    कार्तिकेय अपने वाहन पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपनी बुद्धि और भक्ति का परिचय देते हुए माता-पिता की ही परिक्रमा कर ली। शास्त्रों के अनुसार माता-पिता की परिक्रमा संपूर्ण संसार की परिक्रमा के समान मानी जाती है। इसी कारण गणेश जी को प्रथम पूज्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ।

    जब कार्तिकेय को इस निर्णय का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी और आहत हुए। लोकमान्यता के अनुसार उन्होंने अपने शरीर का मांस माता-पिता को अर्पित कर दिया और सांसारिक जीवन से विरक्त होकर तपस्या के लिए क्रौंच पर्वत पर चले गए। कहा जाता है कि उन्होंने यहीं कठोर साधना की और अंततः उनका यह तपस्थल आज कार्तिक स्वामी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

    इसी वजह से यह स्थान त्याग, तपस्या, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

    आध्यात्मिक महत्व

    यह मंदिर केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र भी माना जाता है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु प्राकृतिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करते हैं। कई भक्त मानते हैं कि यहां मन से की गई प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है।

    मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता

    ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण कार्तिक स्वामी मंदिर से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां, चौखंभा पर्वत श्रृंखला और दूर-दूर तक फैली घाटियों का अत्यंत मनमोहक दृश्य दिखाई देता है।

    सूर्योदय के समय जब पहली किरणें हिमालय की चोटियों पर पड़ती हैं और सूर्यास्त के समय पूरा आकाश सुनहरे रंग में रंग जाता है, तब यह स्थान किसी दिव्य लोक जैसा प्रतीत होता है। बादलों के बीच स्थित यह मंदिर प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

    यहां होने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजन

    मंदिर में पूरे वर्ष नियमित पूजा, दर्शन और धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। विशेष अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    प्रमुख आयोजनों में शामिल हैं—

    • कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष पूजा और दीपदान
    • वैकुंठ चतुर्दशी का धार्मिक आयोजन
    • जून माह में आयोजित महायज्ञ
    • प्रतिदिन होने वाली संध्या आरती

    संध्या आरती के समय मंदिर परिसर घंटियों की मधुर ध्वनि और भजनों से गूंज उठता है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

    घंटी बांधने की अनोखी परंपरा

    कार्तिक स्वामी मंदिर की एक विशेष परंपरा घंटी चढ़ाने की भी है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की कामना से मंदिर परिसर में घंटियां बांधते हैं। इसी कारण यहां हजारों घंटियां दिखाई देती हैं, जो इस मंदिर की अलग पहचान बन चुकी हैं।

    कार्तिक स्वामी मंदिर कैसे पहुंचें?

    यदि आप ऋषिकेश से यात्रा शुरू कर रहे हैं, तो सबसे पहले सड़क मार्ग से रुद्रप्रयाग पहुंचना होगा। वहां से कनकचौरी गांव की ओर जाना होता है, जो मंदिर का आधार बिंदु माना जाता है। इसके बाद लगभग 2.5 से 3 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करके मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

    दूरी

    • ऋषिकेश से कनकचौरी – लगभग 181 किलोमीटर
    • सड़क यात्रा – लगभग 7 घंटे
    • रुद्रप्रयाग से कनकचौरी – लगभग 38 किलोमीटर

    रास्ते में क्या-क्या देखने को मिलेगा?

    यात्रा के दौरान कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थल और सुंदर प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलते हैं। घुमावदार पहाड़ी सड़कें, घने जंगल, शांत वातावरण और हिमालय की भव्य पर्वत श्रृंखलाएं इस सफर को बेहद यादगार बना देती हैं।

    यात्रा का आसान प्लान

    • सुबह जल्दी ऋषिकेश से यात्रा शुरू करें।
    • सड़क मार्ग से रुद्रप्रयाग पहुंचें।
    • वहां से कनकचौरी गांव जाएं।
    • कनकचौरी से लगभग 3 किलोमीटर का ट्रेक कर मंदिर तक पहुंचें।
    • दर्शन के साथ हिमालय की मनमोहक सुंदरता और शांत वातावरण का आनंद लें।

    क्या है इस कथा की प्रामाणिकता?

    कार्तिक स्वामी मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत प्राचीन माना जाता है। मंदिर से जुड़ी जो कथा आज सबसे अधिक प्रचलित है, वह मुख्य रूप से लोकपरंपराओं, मंदिर की मान्यताओं और धार्मिक आस्था पर आधारित है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भगवान कार्तिकेय और क्रौंच पर्वत का उल्लेख मिलता है, लेकिन इस कथा का वर्तमान स्वरूप मुख्यतः श्रद्धालुओं की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही आस्था और स्थानीय परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है।

    इसी कारण कार्तिक स्वामी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, भक्ति और हिमालय की दिव्य प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत संगम माना जाता है, जहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति और भगवान कार्तिकेय के आशीर्वाद की कामना लेकर पहुंचते हैं।

  • भगवान विष्णु की महिमा – क्यों कहलाते हैं जगत के पालनकर्ता?गरुड़ पुराण – भाग 2

    भगवान विष्णु की महिमा – क्यों कहलाते हैं जगत के पालनकर्ता?गरुड़ पुराण – भाग 2

    भगवान विष्णु की महिमा – क्यों कहलाते हैं जगत के पालनकर्ता?गरुड़ पुराण – भाग 2

    गरुड़ पुराण के पूर्व खंड में भगवान श्रीहरि विष्णु और उनके परम भक्त गरुड़ जी के मध्य हुए दिव्य संवाद का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु केवल वैकुण्ठ के स्वामी ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता, धर्म के रक्षक और अपने भक्तों के उद्धारकर्ता हैं। जब-जब संसार में अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं या अपने अवतारों के माध्यम से धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

    1. भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप

    गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु को सच्चिदानन्द स्वरूप, अनादि, अनंत और सर्वव्यापी बताया गया है। वे समय, जन्म और मृत्यु से परे हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं की इच्छा से संचालित होता है।

    भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप अत्यंत मनोहारी है। उनका वर्ण वर्षा ऋतु के मेघ के समान श्याम है। वे पीताम्बर धारण करते हैं और उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह तथा कौस्तुभ मणि सुशोभित रहती है। उनके चार हाथों में चार दिव्य आयुध हैं—

    • शंख (पाञ्चजन्य) – धर्म और पवित्रता का प्रतीक।
    • चक्र (सुदर्शन) – अधर्म के विनाश और धर्म की रक्षा का प्रतीक।
    • गदा (कौमोदकी) – शक्ति और न्याय का प्रतीक।
    • कमल – पवित्रता, करुणा और दिव्यता का प्रतीक।

    भगवान शेषनाग पर क्षीरसागर में विराजमान रहते हैं और माता लक्ष्मी सदैव उनके चरणों की सेवा करती हैं।

    शास्त्रीय प्रमाण

    “शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
    विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥”

    भावार्थ: भगवान विष्णु शांति के स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, उनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, वे सम्पूर्ण विश्व के आधार हैं और उनका स्वरूप मेघ के समान श्याम एवं अत्यंत मंगलमय है।


    2. भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार

    जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और धर्म संकट में पड़ता है, तब भगवान विष्णु विभिन्न अवतार धारण करते हैं।

    गरुड़ पुराण सहित अन्य वैष्णव ग्रंथों में प्रमुख अवतारों का वर्णन मिलता है—

    • मत्स्य अवतार – वेदों और जीवों की रक्षा।
    • कूर्म अवतार – समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को सहारा देना।
    • वराह अवतार – पृथ्वी का उद्धार।
    • नरसिंह अवतार – भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु का वध।
    • वामन अवतार – राजा बलि के अहंकार का अंत और धर्म की स्थापना।
    • परशुराम अवतार – अत्याचारी क्षत्रियों का दमन।
    • श्रीराम अवतार – मर्यादा, सत्य और आदर्श जीवन की स्थापना।
    • श्रीकृष्ण अवतार – धर्म, प्रेम, भक्ति और गीता का उपदेश।
    • बुद्ध अवतार – करुणा और अहिंसा का संदेश।
    • कल्कि अवतार – कलियुग के अंत में अधर्म का विनाश।

    इन सभी अवतारों का उद्देश्य केवल एक ही है—सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना।


    3. भक्ति का महत्व

    गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु स्पष्ट कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे मन से उनका स्मरण करता है, उसका कल्याण निश्चित है। भक्ति केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं, बल्कि भगवान पर पूर्ण विश्वास, प्रेम और समर्पण का नाम है।

    धन, पद, ज्ञान और शक्ति भी उस व्यक्ति के लिए अधूरे हैं, जिसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम नहीं है। वहीं एक साधारण व्यक्ति भी यदि निष्कपट भक्ति करता है, तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।

    कलियुग में नाम-स्मरण को सबसे सरल और श्रेष्ठ साधना बताया गया है।

    शास्त्रीय प्रमाण

    “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥”

    भावार्थ: जो भक्त प्रेमपूर्वक एक पत्ता, एक पुष्प, एक फल या थोड़ा जल भी अर्पित करता है, मैं उसे प्रेम से स्वीकार करता हूँ।


    4. भगवान विष्णु की पूजा की विधि

    गरुड़ पुराण के अनुसार भगवान विष्णु की पूजा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि श्रद्धा और पवित्र मन से करनी चाहिए।

    पूजा की सरल विधि—

    1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
    2. भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
    3. तुलसी दल, पुष्प, फल और शुद्ध जल अर्पित करें।
    4. “ॐ नमो नारायणाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
    5. विष्णु सहस्रनाम, गीता या हरिनाम संकीर्तन का पाठ करें।
    6. अंत में भगवान से अपने और समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।

    शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय बताया गया है। तुलसी के बिना विष्णु पूजा अपूर्ण मानी गई है।


    इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    • भगवान विष्णु सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता और भक्तों के रक्षक हैं।
    • जब भी अधर्म बढ़ता है, भगवान किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा करते हैं।
    • सच्ची भक्ति में दिखावा नहीं, बल्कि प्रेम, श्रद्धा और समर्पण आवश्यक है।
    • भगवान को महंगे उपहार नहीं, बल्कि निर्मल हृदय प्रिय है।
    • जो व्यक्ति प्रतिदिन भगवान का स्मरण करता है, उसका जीवन धीरे-धीरे शांति, सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है।

    अगले भाग में पढ़िए:
    धर्म क्या है? गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य का वास्तविक कर्तव्य और धर्म का रहस्य।

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे

  • व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    व्रत में साधारण नमक नहीं, सेंधा नमक ही क्यों? जानिए इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता..

    Sendha Namak in Vrat: व्रत से जुड़े अनेक नियम है जिनका ध्यान रखने से व्रत का संकल्प पूरा होता है और पूरा फल प्राप्त होता है. कुछ व्रत में केवल फलाहार किया जाता है तो कुछ व्रत में एक बार भोजन किया जाता है, कुछ व्रत ऐसे होते हैं जिसमें तय समय तक न तो कुछ खाया जाता है और न ही कुछ पीया जाता है. इसी तरह से व्रत के भोजन को लेकर नियम है की सफेद नमक का सेवन व्रत में नहीं करना चाहिए. वहीं, सेंधा नमक का सेवन वर्जित नहीं होता है.

    व्रत उपवास में साधारण नमक के बजाए केवल सेंधा नमक का सेवन किया जाता है. ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सेंधा नमक का उपायोग करने का बड़ा महत्व हैं. आइए यहां जानें सेंधा नमक का किस ग्रह से संबंध है.

    व्रत में सेंधा नमक का ज्योतिषीय महत्व

    मान्यता है कि सेंधा नमक जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इस नमक के उपयोग से ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर करता है. पूजा के समय सात्विक ऊर्जा को बनाए रखने में भी सेधा नमक मदद करता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्रत हों से मिलने वाली ऊर्जा को संतुलित करता है और यह पृथ्वी तत्व से जुड़ा होता है.

    सेंधा नमक का किस ग्रह से है संबंध

    ज्योतिष अनुसार सेंधा नमक का संबंध चंद्रमा और शुक्र ग्रह से है . चंद्रमा मन का कारक है और शुक्र सुख व समृद्धि का कारक है. व्रत के दौरान सेंधा नमक का सेवन करने से कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है और मानसिक तनाव दूर होता है. बेचैनी या निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है. शुक्र ग्रह मजबूत होता है और धन वृद्धि होता है.

    व्रत में सेंधा नमक का धार्मिक महत्व

    वहीं धार्मिक मान्यता है कि इसके अलावा सकारात्मकता बनाए रखने में सेंधा नमक मदद करता है. साधारण नमक को कई प्रक्रिया से तैयार किया जाता है. जिससे इस नमक उतना शुद्ध नहीं माना जाजा है. यही कारण है कि व्रत और पूजा में सेंधा नमक के उपयोग को मान्यता दी जाती है. इसके सेवन से मन शांत रहता है और भक्ति भाव करने में ध्यान लगता है. सेंधा नमक सात्विक आहार का भाग होता है.

    व्रत में सेंधा नमक से जुड़ी धार्मिक मान्यता

    पुराणों और धार्मिक परंपराओं में बताया जाता है कि व्रत का भोजन सरल और प्राकृतिक होना चाहिए. यह पुण्य प्राप्ति का रास्ता हो सकता है. सेंधा नमक प्राकृतिक रूप से चट्टानों से आते हैं. इसी कारण इसे शुद्ध माना जाता है. एकादशी, नवरात्रि, महाशिवरात्रि, सोमवार से लेकर अन्य कई व्रतों में सेंधा नमक का उपयोग किया जाता रहा है.

    (डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)

  • गूंथे आटे पर क्यों बनाए जाते हैं उंगलियों के निशान? जानिए क्या कहते हैं वास्तु शास्त्र..

    गूंथे आटे पर क्यों बनाए जाते हैं उंगलियों के निशान? जानिए क्या कहते हैं वास्तु शास्त्र..

    गूंथे आटे पर क्यों बनाए जाते हैं उंगलियों के निशान? जानिए क्या कहते हैं वास्तु शास्त्र..

    शास्त्रों के मुताबिक, अगर आटा गूंथकर उसे बिल्कुल गोल और प्लेन छोड़ दिया जाए, तो यह घर में नकारात्मकता ला सकता है. आइए जानते हैं कि आटे पर उंगलियों की छाप छोड़ने के पीछे का धार्मिक और वास्तु कारण क्या है.

    रसोई में काम करते हुए आपने अक्सर अपनी दादी-नानी या घर की महिलाओं को देखा होगा कि वे आटा गूंथने के बाद उस पर अपनी उंगलियों से निशान बना देती हैं. कुछ लोग इसे सिर्फ एक आदत या परंपरा मान लेते हैं. लेकिन, सनातन धर्म और वास्तु शास्त्र में इसे खाने से जुड़ा खास नियम बताया गया है.

    पितरों और पिंड दोष से जुड़ा है कनेक्शन

    वास्तु शास्त्र के मुताबिक, जब आटे को पूरी तरह से गोल, चिकना और प्लेन छोड़ दिया जाता है, तो वह पिंड का रूप ले लेता है. हिंदू धर्म में पिंड का उपयोग मृत पूर्वजों (पितरों) को श्राद्ध या तर्पण के दौरान अर्पित करने के लिए किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जब रसोई में पिंड के आकार का गोल आटा रखा होता है, तो पितर या अन्य अदृश्य नकारात्मक शक्तियां उसकी ओर आकर्षित होने लगती हैं. गूंथे हुए आटे पर उंगलियों के निशान बनाकर उसकी उस विशेष गोलाई (पिंड के आकार) को तोड़ा जाता है. ऐसा करने से वह अन्न जीवित मनुष्यों के खाने योग्य और शुद्ध बना रहता है.

    नकारात्मक ऊर्जा से बचाव

    वास्तु शास्त्र के अनुसार, रसोई घर को पूरे घर का ऊर्जा केंद्र माना जाता है. प्लेन और गोल रखा हुआ आटा रसोई में नकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय कर सकता है. इससे घर के सदस्यों के बीच बिना बात के कलह, मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ने की संभावना रहती है. उंगलियों के निशान बनाने से आटे की ऊर्जा बदल जाती है और वह केवल परिवार के पोषण के लिए सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बनता है.

    मां अन्नपूर्णा का सम्मान और बरकत

    हिंदू संस्कृति में अन्न को ब्रह्म माना गया है और रसोई को मां अन्नपूर्णा का निवास स्थान. आटे की गोलाई को तोड़कर उसे रोटियां बनाने के लिए तैयार करना, मां अन्नपूर्णा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक तरीका है. माना जाता है कि नियम और परंपरा के अनुसार बनाया गया भोजन परिवार में सुख, समृद्धि और बरकत लाता है.

    वैज्ञानिक नजरिया

    धार्मिक कारणों के अलावा इसका एक व्यवहारिक पहलू भी है. पुराने समय में जब संयुक्त परिवार होते थे और रसोई में एक साथ कई काम चलते थे, तब आटे पर उंगलियों के निशान इस बात का संकेत होते थे कि यह आटा पूरी तरह से गूंथा जा चुका है और अब यह रोटी बनाने के लिए तैयार है. इससे रसोई में काम करने वाले दूसरे सदस्यों को भ्रम नहीं होता था

  • Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    Shani-Guru Gochar 2026: सावन में दुर्लभ ग्रह संयोग, इन राशियों के जीवन में आ सकते हैं बड़े उतार-चढ़ाव..

    जुलाई 2026 में शनि की वक्री चाल और गुरु का अस्त होना कई राशियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. जिससे जातकों को धन और करियर के मामले में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

    Shani-Guru Gochar 2026: द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार 30 जुलाई 2026, गुरुवार से सावन की शुरुआत होने वाली है. ज्योतिषियों की मानें तो, इस वर्ष सावन बहुत ही विशेष माना जा रहा है. दरअसल, सावन में गुरु अस्त और शनि वक्री यानी उल्टी चाल चलेंगे. जो कई राशियों के लिए अद्भुत और कुछ के लिए खतरनाक मानी जा रही है. द्रिक पंचांग के अनुसार, शनि 26 जुलाई से वक्री हो जाएंगे. शनि की उल्टी चाल का असर कई राशियों के जीवन में उतार-चढ़ाव ला सकता है. इस समय लोगों को अपने कामों में सावधानी बरतने की जरूरत होगी.

    वहीं, गुरु 15 जुलाई को अस्त हो जाएंगे. गुरु को ज्ञान, धन और संतान का कारक माना जाता है. इनके अस्त होने से शुभ कार्यों, खासकर विवाह जैसे मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. इस दौरान शादी-विवाह जैसे आयोजन नहीं किए जाते हैं. राहु और केतु की स्थिति इस महीने स्थिर रहेगी, इनमें कोई बदलाव नहीं होगा. तो आइए पंडित अरुणेश कुमार शर्मा जी से जानते हैं कि सावन में शनि और गुरु की बदली चाल कौन सी राशियों पर बुरा प्रभाव डालेगी. 

    वृषभ राशि

    वृषभ राशि वालों के लिए यह समय खर्चों से भरा रह सकता है. अचानक आने वाले खर्च आपको परेशान कर सकते हैं. हालांकि, कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिलेंगे, जिससे धीरे-धीरे स्थिति संभलने लगेगी और आप राहत महसूस करेंगे.

    सिंह राशि

    सिंह राशि के जातकों को नौकरी और करियर में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. संभव है कि आप नौकरी बदलने का विचार करें. इस समय अपने काम में पारदर्शिता रखना बहुत जरूरी होगा. खर्चों को नियंत्रित करने की कोशिश करें और कोई भी बड़ा फैसला सोच-समझकर लें.

    कुंभ राशि

    कुंभ राशि वालों के लिए यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है. आपकी योजनाएं उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं देंगी. ऐसे में धैर्य रखना बेहद जरूरी है. जल्दबाजी करने से बचें और अपने काम को धीरे-धीरे आगे बढ़ाएं. पैसों के मामले में सावधानी रखें और किसी को उधार देने से बचें.

  • धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    वास्तु शास्त्र में घर की उत्तर दिशा को धन और समृद्धि से जोड़ा जाता है. इसे कुबेर कॉर्नर भी कहा जाता है. यदि इस स्थान को सही तरीके से व्यवस्थित रखा जाए और कुछ सरल उपाय अपनाएं तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बेहतर माना जाता है.

    धन के देवता कुबेर से जुड़ा है घर का ये खास कोना, जानिए क्या रखने की सलाह दी जाती है,,,

    धन से जुड़े दस्तावेज, तिजोरी या लॉकर को घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखकर उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है. (Photo: ITG)

    घर की उत्तर दिशा को कुबेर कॉर्नर कहा जाता है. यह स्थान धन के देवता भगवान कुबेर का माना जाता है. मान्यता है कि यदि इस दिशा को साफ-सुथरा, हल्का और व्यवस्थित रखा जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बेहतर बना रहता है. साथ ही, धन की आवक भी अच्छी रहती है. इसलिए इस हिस्से की देखभाल को विशेष महत्व दिया जाता है. आइए आपको इस दिशा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हैं.

    साफ-सफाई
    वास्तु के अनुसार, उत्तर दिशा में अनावश्यक सामान, कबाड़ या भारी वस्तुएं जमा नहीं करनी चाहिए. इस स्थान पर अव्यवस्था रहने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है. यदि यह हिस्सा खुला, स्वच्छ और व्यवस्थित रहेगा तो वातावरण अधिक संतुलित और सुखद महसूस हो सकता है.

    तिजोरी और कुबेर यंत्र
    धन से जुड़े दस्तावेज, तिजोरी या लॉकर को घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखकर उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है. वहीं, उत्तर दिशा में कुबेर यंत्र स्थापित करने की भी सलाह दी जाती है. मान्यता है कि इससे समृद्धि और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा को बल मिलता है.

    ये चीजें रखने से भी होगा लाभ
    वास्तु के अनुसार, उत्तर दिशा में छोटे फव्वारे, एक्वेरियम, दर्पण  (आईना) या नीले, हरे और बैंगनी रंग की सजावटी चीजें (डेकॉर आइटम) रखना भी शुभ माना जाता है. इनका उद्देश्य घर के वातावरण में संतुलन और ताजगी बनाए रखना होता है. हालांकि, इनका उपयोग साफ-सफाई और उचित स्थान के साथ ही करना चाहिए.

    इस दिशा में न करें ये गलतियां
    यदि घर की उत्तर दिशा में बाथरूम बना है तो इसे वास्तु के अनुसार आदर्श स्थिति नहीं माना जाता है. ऐसे में छोटे दर्पण या इनडोर प्लांट जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा, इस हिस्से में भारी स्टोरेज, बेकार सामान या लंबे समय से अनुपयोगी वस्तुएं रखने से बचना चाहिए, ताकि यह स्थान सक्रिय और व्यवस्थित बना रहे.

  • श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    श्री रसिकानंद प्रभु जी की अद्भुत एवं प्रमाणिक जीवन कथा

    जब एक उग्र हाथी भी हरिनाम सुनकर भगवान का भक्त बन गया

    प्रमाणिक आधार: यह कथा रसिक-मंगल, भक्ति-रत्नाकर तथा गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्राचीन जीवन-चरित्रों में वर्णित है।

    जन्म और बाल्यकाल

    श्री रसिकानंद प्रभु का जन्म सन् 1590 के आसपास उड़ीसा के रोहिणी क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित वैष्णव परिवार में हुआ। उनका बाल्यकाल का नाम रसिक मुरारी था।

    बचपन से ही उनका मन खेल-कूद में कम और भगवान श्रीकृष्ण के नाम, भजन और संतों की सेवा में अधिक लगता था। वे घंटों श्रीमद्भागवत सुनते और हरिनाम का कीर्तन करते थे।

    उनके माता-पिता समझ गए कि यह बालक साधारण नहीं है, बल्कि भगवान की विशेष कृपा का पात्र है।


    गुरु की खोज

    युवावस्था में उनके हृदय में एक ही इच्छा थी—

    “मुझे ऐसा गुरु मिले जो मुझे श्रीराधा-कृष्ण की निष्कपट भक्ति का मार्ग दिखाए।”

    उसी समय उन्हें ज्ञात हुआ कि श्री श्यामानंद प्रभु उड़ीसा में श्रीकृष्ण-भक्ति का प्रचार कर रहे हैं।

    रसिक मुरारी उनके दर्शन के लिए पहुँचे।

    जैसे ही उन्होंने श्यामानंद प्रभु को देखा, उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे।

    उन्होंने गुरु के चरणों में गिरकर कहा—

    “गुरुदेव! मेरा जीवन श्रीकृष्ण की सेवा के बिना व्यर्थ है। कृपया मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”

    श्यामानंद प्रभु ने उनके विनम्र स्वभाव और गहरी भक्ति को देखकर उन्हें दीक्षा दी।

    दीक्षा के बाद उनका नाम श्री रसिकानंद रखा गया।


    श्रीनाम का प्रचार

    गुरु की आज्ञा से रसिकानंद प्रभु ने उड़ीसा, बंगाल और झारखंड के अनेक गाँवों में श्रीनाम-संकीर्तन का प्रचार आरंभ किया।

    वे जहाँ भी जाते, वहाँ हरिनाम-संकीर्तन, भागवत कथा और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का संदेश देते।

    उनकी मधुर वाणी और प्रेमपूर्ण व्यवहार से हजारों लोग वैष्णव धर्म की ओर आकर्षित हुए।


    उग्र हाथी का चमत्कार

    उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणिक घटना एक उग्र हाथी से जुड़ी है।

    उस समय एक राजा के पास अत्यंत क्रूर और हिंसक हाथी था।

    वह हाथी इतना उग्र था कि अनेक लोगों को घायल कर चुका था। कोई भी उसके पास जाने का साहस नहीं करता था।

    राजा ने जब रसिकानंद प्रभु की महिमा सुनी, तो कुछ लोगों ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया।

    उन्होंने उस क्रोधित हाथी को रसिकानंद प्रभु की ओर छोड़ दिया।

    जब विशाल हाथी गर्जना करता हुआ उनकी ओर दौड़ा, तब वहाँ उपस्थित लोग भय से भागने लगे।

    लेकिन रसिकानंद प्रभु शांत खड़े रहे।

    उन्होंने अपने हाथ में तुलसी की माला लेकर प्रेमपूर्वक कहा—

    “हे कृष्ण के जीव! तुम भी भगवान के हो। श्रीकृष्ण का नाम लो।”

    फिर उन्होंने हरिनाम का कीर्तन आरंभ किया—

    “हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे।”

    वैष्णव ग्रंथों में वर्णित है कि जैसे ही हाथी ने हरिनाम सुना, उसका क्रोध शांत हो गया।

    वह धीरे-धीरे रसिकानंद प्रभु के पास आया, उनके चरणों में सूंड रखकर बैठ गया और शांत हो गया।

    रसिकानंद प्रभु ने उसके मस्तक पर हाथ रखा और उसे भगवान का प्रसाद दिया।

    यह दृश्य देखकर राजा और उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।

    अनेक लोगों ने उसी दिन श्रीकृष्ण-भक्ति को स्वीकार किया।


    अंतिम जीवन

    रसिकानंद प्रभु ने अपने जीवनभर हजारों लोगों को हरिनाम, गुरु-भक्ति और श्रीराधा-कृष्ण की प्रेम-भक्ति का उपदेश दिया।

    उन्होंने अनेक मंदिरों की स्थापना की, वैष्णवों की सेवा की और गुरु श्री श्यामानंद प्रभु की शिक्षाओं का प्रचार किया।

    आज भी उड़ीसा और बंगाल में उनके अनेक मंदिर और स्मृति-स्थल विद्यमान हैं, जहाँ भक्त बड़ी श्रद्धा से उनके चरणों का स्मरण करते हैं।


    कथा से शिक्षा

    • हरिनाम में इतनी शक्ति है कि वह हिंसक हृदय को भी शांत कर सकता है।
    • गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला भक्त भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करता है।
    • प्रेम और करुणा से संसार का सबसे कठोर मन भी बदल सकता है।
    • श्रीकृष्ण का नाम केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, समस्त जीवों के कल्याण का साधन है।

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे
    🙏

  • सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    सृष्टि की उत्पत्ति – ब्रह्मांड की रचना का दिव्य रहस्य..

    गरुड़ पुराण – भाग 1

    गरुड़ पुराण के पूर्व खंड में भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं गरुड़ जी को सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य बताते हैं। यह वर्णन केवल संसार की रचना का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भी समझाता है कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और इस जीवन का उद्देश्य क्या है।

    1. सृष्टि से पहले क्या था?

    भगवान विष्णु कहते हैं कि एक समय ऐसा था जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा, न दिन था और न रात। न देवता थे, न मनुष्य, न पर्वत, न समुद्र। चारों ओर केवल अनंत जल और परमब्रह्म भगवान नारायण का अस्तित्व था।

    उन्हीं की इच्छा से सृष्टि की रचना का संकल्प हुआ। भगवान की योगमाया सक्रिय हुई और सृष्टि का आरंभ प्रारंभ हुआ।

    शास्त्रीय प्रमाण

    “नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।
    अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी॥”

    भावार्थ: भगवान नारायण अव्यक्त प्रकृति से भी परे हैं। उन्हीं से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई और उसी ब्रह्मांड में सभी लोक तथा पृथ्वी की रचना हुई।


    2. ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई?

    भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल पर चतुर्मुख ब्रह्माजी का जन्म हुआ। प्रारंभ में ब्रह्माजी अपने जन्म का कारण नहीं समझ सके। उन्होंने कमल की डंडी के मूल तक पहुँचने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुए।

    तब उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की। भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देकर सृष्टि की रचना का ज्ञान प्रदान किया। उनके आदेश से ब्रह्माजी ने चौदह लोकों, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और समस्त चराचर जगत की रचना की।


    3. पंचमहाभूतों की उत्पत्ति

    गरुड़ पुराण के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि पाँच मूल तत्वों से बनी है, जिन्हें पंचमहाभूत कहा जाता है।

    आकाश – सबसे पहले आकाश की उत्पत्ति हुई, जिससे ध्वनि प्रकट हुई।

    वायु – आकाश से वायु उत्पन्न हुई, जिससे स्पर्श का अनुभव संभव हुआ।

    अग्नि – वायु से अग्नि प्रकट हुई, जिससे प्रकाश और रूप की उत्पत्ति हुई।

    जल – अग्नि से जल उत्पन्न हुआ, जिससे रस और जीवन का आधार बना।

    पृथ्वी – जल से पृथ्वी प्रकट हुई, जिसमें गंध का गुण समाहित हुआ और समस्त जीवों के रहने योग्य संसार बना।

    हमारा शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित है। मृत्यु के बाद यही शरीर पुनः इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा सनातन है।


    4. भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव की भूमिका

    गरुड़ पुराण में त्रिदेवों की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से बताई गई हैं।

    भगवान विष्णु – सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और समस्त ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी इच्छा से ही सृष्टि का आरंभ होता है।

    ब्रह्माजी – भगवान विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना करते हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, लेकिन सर्वोच्च परमात्मा नहीं।

    भगवान शिव – जब सृष्टि का एक चक्र पूर्ण हो जाता है, तब भगवान शिव संहार की लीला करते हैं, जिससे नई सृष्टि के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। उनका संहार विनाश नहीं, बल्कि पुनः सृजन की तैयारी है।

    इस प्रकार सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार तीनों कार्य ईश्वर की दिव्य व्यवस्था के अंतर्गत चलते हैं।


    5. समय चक्र और कल्पों का वर्णन

    गरुड़ पुराण बताता है कि समय कभी रुकता नहीं। ब्रह्मांड एक निश्चित चक्र में चलता है।

    चार युग होते हैं—

    • सतयुग
    • त्रेतायुग
    • द्वापरयुग
    • कलियुग

    इन चारों युगों का एक चक्र महायुग कहलाता है। ऐसे एक हजार महायुग मिलकर ब्रह्माजी का एक दिन अर्थात एक कल्प बनाते हैं। जब ब्रह्माजी का दिन समाप्त होता है, तब आंशिक प्रलय होती है। पुनः उनके दिन के आरंभ में नई सृष्टि का विस्तार होता है।

    ब्रह्माजी के सौ वर्ष पूर्ण होने पर महाप्रलय होती है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान में लीन हो जाता है। समय के इस अनंत चक्र में सृष्टि बार-बार उत्पन्न होती है और पुनः विलीन हो जाती है।


    इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    • भगवान ही सम्पूर्ण सृष्टि के आदि और अंतिम कारण हैं।
    • हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है और एक दिन इन्हीं में मिल जाएगा।
    • केवल आत्मा ही शाश्वत है, इसलिए शरीर के बजाय आत्मा के कल्याण पर ध्यान देना चाहिए।
    • धन, पद और अहंकार सब यहीं रह जाते हैं; केवल कर्म ही आत्मा के साथ जाते हैं।
    • इसलिए मनुष्य को धर्म, सत्य, सेवा और भगवान के नाम-स्मरण में जीवन बिताना चाहिए।

    अगले भाग में:
    भगवान विष्णु की महिमा – क्यों उन्हें जगत का पालनकर्ता और परम पुरुष कहा गया है?

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे

  • इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    इन 4 लोगों के घर का अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए? जानिए धार्मिक मान्यताओं में बताए गए कारण..

    हमारे शास्त्रों और पुराणों में भोजन को लेकर कई जरूरी नियम बताए गए हैं. सनातन धर्म में माना जाता है कि जैसा अन्न होता है, वैसा ही हमारा मन बनता है. गरुड़ पुराण में विशेष तौर पर बताया गया है कि हमें हर किसी के घर का खाना नहीं खाना चाहिए.

    कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके घर का भोजन करने से आपके पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं. इतना ही नहीं, इससे आपकी उम्र भी कम हो सकती है और आपको पाप का भागी बनना पड़ता है. आइए जानते हैं कि गरुड़ पुराण के अनुसार वे कौन से 4 तरह के लोग हैं जिनके घर भूलकर भी खाना नहीं खाना चाहिए.

    ब्याजखोर या सूदखोर का खाना

    इस सूची में पहला नाम उन लोगों का आता है जो गलत तरीके से ब्याज का धंधा करते हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाकर भारी ब्याज वसूलता है, उसका धन अशुद्ध होता है.

    ऐसे सूदखोर का मुख्य मकसद दूसरों को परेशान करके पैसा कमाना होता है. जब आप ऐसे किसी इंसान के घर का खाना खाते हैं, तो उनकी नकारात्मक ऊर्जा आपके भीतर चली जाती है.

    इससे आपके विचार भी दूषित होने लगते हैं और आपके संचित पुण्य धीरे-धीरे घटने लगते हैं. इसलिए मेहनत की कमाई का ही भोजन स्वीकार करना चाहिए.

    चोर या बेईमान के घर का भोजन

    दूसरा नियम चोर, डाकू या बेईमानी से पैसा कमाने वाले लोगों के लिए है. जो व्यक्ति दूसरों का हक मारकर या चोरी करके अपना घर चलाता है, उसके घर में कभी भी सकारात्मकता नहीं हो सकती.

    ऐसे लोगों के घर में बनने वाले भोजन में रोने-धोने और बेबसी की बददुआएं शामिल होती हैं. यदि आप जानते हुए भी किसी चोर या अपराधी के घर का खाना खाते हैं, तो शास्त्रों के अनुसार आप भी उनके पाप में हिस्सेदार बन जाते हैं.

    ये अन्न आपके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है और आपकी आयु को कम करता है.

    गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति

    तीसरी स्थिति किसी ऐसे व्यक्ति की है जो लंबे समय से किसी गंभीर या संक्रामक बीमारी से पीड़ित हो. गरुड़ पुराण में व्यावहारिक कारणों से भी ऐसे घर में भोजन करने से मना किया गया है.

    जो व्यक्ति बहुत बीमार है, उसके आसपास का वातावरण और हवा कीटाणुओं से भरी हो सकती है. पुराने समय में चिकित्सा व्यवस्था आज जैसी नहीं थी, इसलिए संक्रमण से बचने के लिए ये नियम बनाया गया था.

    बीमार व्यक्ति के घर का खाना खाने से आप भी उस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं, जिससे आपकी सेहत बिगड़ सकती है और उम्र घट सकती है.

    किन्नरों के हाथ का भोजन

    चौथा और बेहद महत्वपूर्ण नियम किन्नरों के घर भोजन करने से जुड़ा हुआ है. शास्त्रों में बताया गया है कि किन्नरों को दान देना सबसे उत्तम और पुण्यदायी कार्य माना जाता है.

    उन्हें कपड़े, पैसे और अनाज दान करने से घर में बरकत आती है. लेकिन गरुड़ पुराण के अनुसार, किन्नरों के घर पर जाकर भोजन करने की मनाही है. इसके पीछे कारण ये है कि किन्नरों को समाज में कई तरह के अच्छे-बुरे लोग दान देते हैं.

    उनके पास आने वाले धन में हर तरह के लोगों की ऊर्जा शामिल होती है, इसलिए उनके येां भोजन करने से बचना चाहिए.

  • यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    यमराज भी नहीं छूते इन 3 तरह के लोगों को, गरुड़ पुराण में बताया गया है इसका रहस्य..

    मौत एक ऐसा सच है जिससे कोई भी बच नहीं सकता. गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद की स्थितियों के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है. आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी इंसान का अंत समय आता है, तो यमराज के दूत यानी यमदूत उसे लेने आते हैं.

    गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूतों का रूप बहुत भयानक होता है और वे पापियों को बेरहमी से घसीटते हुए ले जाते हैं. लेकिन इसी पुराण में एक बेहद गुप्त और खास नियम का भी जिक्र मिलता है.

    शास्त्रों के अनुसार 3 तरह के लोग ऐसे होते हैं जिनके पास आने की हिम्मत यमराज के दूत भी नहीं कर पाते. यमदूत इन खास लोगों को कभी हाथ तक नहीं लगाते, बल्कि इनके प्राण लेने के लिए खुद भगवान के दिव्य पार्षद आते हैं. आइए जानते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार कौन से हैं वे खुशकिस्मत लोग.

    प्रभु भक्ति में लीन रहने वाले सच्चे भक्त

    इस सूची में पहला नाम उन लोगों का आता है जो अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति और सिमरन में बिता देते हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार जो व्यक्ति हर समय भगवान का नाम लेता है, उसका अंत समय बहुत शांति से कटता है.

    ऐसे लोगों के मन में मृत्यु का कोई डर नहीं होता. जब उनकी सांसें खत्म होने वाली होती हैं, तो यमराज के भयानक दूत उनके आसपास भी नहीं फटकते. प्रभु का नाम जपने वाले इन लोगों के प्राण हरने के लिए सीधे वैकुंठ धाम से विष्णुदूत आते हैं. वे बहुत सुंदर और शांत रूप में प्रकट होते हैं. वे इन भक्तों की आत्मा को बहुत आदर के साथ अपने दिव्य विमान में बैठाकर ले जाते हैं.

    निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने वाले

    दूसरा नियम उन लोगों के लिए है जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं. शास्त्रों में बताया गया है कि भूखों को खाना खिलाना, बीमारों की सेवा करना और बेसहारा लोगों को आश्रय देना सबसे बड़ा धर्म है.

    जो इंसान बिना किसी लालच के समाज की भलाई करता है, उसके खाते में अपार पुण्य जमा हो जाते हैं. ऐसे दयालु लोगों के पास जाने से यमदूत खुद कतराते हैं.

    यमराज के दूतों को केवल उन लोगों को ले जाने का अधिकार है जिन्होंने जीवन भर दूसरों को सताया हो. दूसरों के आंसू पोंछने वाले परोपकारी लोगों का स्वागत करने के लिए स्वर्ग के देवता खुद आते हैं.

    सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले इंसान

    तीसरी स्थिति उन लोगों की है जो जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएं, कभी झूठ और बेईमानी का रास्ता नहीं चुनते. गरुड़ पुराण के अनुसार सत्य बोलना और अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना भी एक बहुत बड़ी तपस्या है.

    जो लोग माता पिता की सेवा करते हैं, किसी का दिल नहीं दुखाते और धर्म के नियमों का पालन करते हैं, उन्हें यमराज का भय नहीं सताता. यमदूत ऐसे ईमानदार और साफ दिल वाले लोगों को दूर से ही प्रणाम करते हैं.

    इनके प्राण निकलते समय इन्हें बिल्कुल भी दर्द नहीं होता. इनकी आत्मा को सीधे मोक्ष या उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है.

    अच्छे कर्मों का मिलता है ये दिव्य फल

    इस तरह गरुड़ पुराण की यह बातें हमें जीवन को सही दिशा में जीने का संदेश देती हैं. मृत्यु से डरने की बजाय हमें अपने आज के कर्मों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. जो इंसान लालच, नफरत और धोखेबाजी से दूर रहता है, उसका अंत समय अपने आप सुधर जाता है.

    यमदूतों का खौफ सिर्फ उन्हीं के लिए है जो बुरे कामों में डूबे रहते हैं. अगर हमारा मन साफ है और हम भगवान पर भरोसा रखते हैं, तो यमराज के दूत हमारे लिए कोई मायने नहीं रखते. अच्छे कर्म करने वालों को अंत में यमदूतों की यातनाएं नहीं बल्कि ईश्वर की शरण मिलती है.