Category: Dharam

  • मंगलवार के खास उपाय: मंगल देव के 108 नामों का जाप करने की क्या है मान्यता..

    मंगलवार के खास उपाय: मंगल देव के 108 नामों का जाप करने की क्या है मान्यता..

    मंगलवार के खास उपाय: मंगल देव के 108 नामों का जाप करने की क्या है मान्यता..

    Mangal 108 Names: मंगल देव युद्ध के देवता और मंगल ग्रह के स्वामी हैं. मंगल ग्रह उग्र ग्रहों में से एक है जो शक्ति, शाहस शारीरिक ऊर्जा और आत्मविश्वास का कारक है. लेकिन कमजोर मंगल के कारक व्यक्ति को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं. जैसे शारीरिक पीड़ा, मन में भय बना रहना, बात-बात पर क्रोध आना और आत्मविश्वास में कमी आना. अगर मंगल ग्रह को मजबूत करना है तो मंगलवार के दिन मंगल देव के 108 नाम का जाप कर सकते हैं. इससे मंगल ग्रह की स्थिति कुंडली में संतुलित रहेगी.

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी भूमि के पुत्र होने के कारण मंगल देव को ‘भौम’ भी कहा जाता है. पंचाग के सप्तवारों में से मंगलवार के शासक मंगल देव हैं यानी इस दिन की शुरुआत मंगल ग्रह से होती है. ऐले में मंगलवार के दिन मंगल देव की उपासाना कर उनकी विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है. मंगलवार को पूजा करते हुए मंगल देव के 108 नामों का जाप किया जा सकता है ताकि शारीरिक उर्जा बढ़ सके और कुंडली में कमजोर मंगल मजबूत हो सके. मंगल के 108 नामों के संग्रह को मंगल की अष्टोत्तर शतनामावली कहा जाता है.

    मंगल देव के 108 नाम

    1.’ॐ महीसुताय नमः।’

    2. ‘ॐ महाभागाय नमः।’

    3. ‘ॐ मङ्गलाय नमः।’

    4. ‘ॐ मङ्गलप्रदाय नमः।’

    5. ‘ॐ महावीराय नमः।’

    6. ‘ॐ महाशूराय नमः।’

    7. ‘ॐ महाबलपराक्रमाय नमः।’

    8. ‘ॐ महारौद्राय नमः।’

    9. ‘ॐ महाभद्राय नमः।’

    10. ‘ॐ माननीयाय नमः।’

    11. ‘ॐ दयाकराय नमः।’

    12. ‘ॐ मानदाय नमः।’

    13. ‘ॐ अपर्वणाय नमः।’

    14. ‘ॐ क्रूराय नमः।’

    15. ‘ॐ तापत्रयविवर्जिताय नमः।’

    16. ‘ॐ सुप्रतीपाय नमः।’

    17. ‘ॐ सुताम्राक्षाय नमः।’

    18. ‘ॐ सुब्रह्मण्याय नमः।’

    19. ‘ॐ सुखप्रदाय नमः।’

    20. ‘ॐ वक्रस्तम्भादिगमनाय नमः।’

    21. ‘ॐ वरेण्याय नमः।’

    22. ‘ॐ वरदाय नमः।’

    23. ‘ॐ सुखिने नमः।’

    24. ‘ॐ वीरभद्राय नमः।’

    25. ‘ॐ विरूपाक्षाय नमः।’

    26. ‘ॐ विदूरस्थाय नमः।’

    27. ‘ॐ विभावसवे नमः।’

    28. ‘ॐ नक्षत्रचक्रसञ्चारिणे नमः।’

    29. ‘ॐ क्षत्रपाय नमः।’

    30. ‘ॐ क्षात्रवर्जिताय नमः।’

    31. ‘ॐ क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ताय नमः।’

    32. ‘ॐ क्षमायुक्ताय नमः।’

    33. ‘ॐ विचक्षणाय नमः।’

    34. ‘ॐ अक्षीणफलदाय नमः।’

    35. ‘ॐ चतुर्वर्गफलप्रदाय नमः।’

    36. ‘ॐ वीतरागाय नमः।’

    37. ‘ॐ वीतभयाय नमः।’

    38. ‘ॐ विज्वराय नमः।’

    39. ‘ॐ विश्वकारणाय नमः।’

    40. ‘ॐ नक्षत्रराशिसञ्चाराय नमः।’

    41. ‘ॐ नानाभयनिकृन्तनाय नमः।’

    42. ‘ॐ वन्दारुजनमन्दाराय नमः।’

    43. ‘ॐ वक्रकुञ्चितमूर्धजाय नमः।’

    44. ‘ॐ कमनीयाय नमः।’

    45. ‘ॐ दयासाराय नमः।’

    46. ‘ॐ कनत्कनकभूषणाय नमः।’

    47. ‘ॐ भयघ्नाय नमः।’

    48. ‘ॐ भव्यफलदाय नमः।’

    49. ‘ॐ भक्ताभयवरप्रदाय नमः।’

    50. ‘ॐ शत्रुहन्त्रे नमः।’

    51. ‘ॐ शमोपेताय नमः।’

    52. ‘ॐ शरणागतपोषनाय नमः।’

    53. ‘ॐ साहसिने नमः।’

    54. ‘ॐ सद्गुणाध्यक्षाय नमः।’

    55. ‘ॐ साधवे नमः।’

    56. ‘ॐ समरदुर्जयाय नमः।’

    57. ‘ॐ दुष्टदूराय नमः।’

    58. ‘ॐ शिष्टपूज्याय नमः।’

    59. ‘ॐ सर्वकष्टनिवारकाय नमः।’

    60. ‘ॐ दुश्चेष्टवारकाय नमः।’

    61. ‘ॐ दुःखभञ्जनाय नमः।’

    62. ‘ॐ दुर्धराय नमः।’

    63. ‘ॐ हरये नमः।’

    64. ‘ॐ दुःस्वप्नहन्त्रे नमः।’

    65. ‘ॐ दुर्धर्षाय नमः।’

    66. ‘ॐ दुष्टगर्वविमोचनाय नमः।’

    67. ‘ॐ भरद्वाजकुलोद्भूताय नमः।’

    68. ‘ॐ भूसुताय नमः।’

    69. ‘ॐ भव्यभूषणाय नमः।’

    70. ‘ॐ रक्ताम्बराय नमः।’

    71. ‘ॐ रक्तवपुषे नमः।’

    72. ‘ॐ भक्तपालनतत्पराय नमः।’

    73. ‘ॐ चतुर्भुजाय नमः।’

    74. ‘ॐ गदाधारिणे नमः।’

    75. ‘ॐ मेषवाहाय नमः।’

    76. ‘ॐ मिताशनाय नमः।’

    77. ‘ॐ शक्तिशूलधराय नमः।’

    78. ‘ॐ शाक्ताय नमः।’

    79. ‘ॐ शस्त्रविद्याविशारदाय नमः।’

    80. ‘ॐ तार्किकाय नमः।’

    81. ‘ॐ तामसाधाराय नमः।’

    82. ‘ॐ तपस्विने नमः।’

    83. ‘ॐ ताम्रलोचनाय नमः।’

    84. ‘ॐ तप्तकाञ्चनसङ्काशाय नमः।’

    85. ‘ॐ रक्तकिञ्जल्कसन्निभाय नमः।’

    86. ‘ॐ गोत्राधिदेवाय नमः।’

    87. ‘ॐ गोमध्यचराय नमः।’

    88. ‘ॐ गुणविभूषणाय नमः।’

    89. ‘ॐ असृजे नमः।’

    90. ‘ॐ अङ्गारकाय नमः।’

    91. ‘ॐ अवन्तीदेशाधीशाय नमः।’

    92. ‘ॐ जनार्दनाय नमः।’

    93. ‘ॐ सूर्ययाम्यप्रदेशस्थाय नमः।’

    94. ‘ॐ घुने नमः।’

    95. ‘ॐ यौवनाय नमः।’

    96. ‘ॐ याम्यहरिन्मुखाय नमः।’

    97. ‘ॐ याम्यदिङ्मुखय नमः।’

    98. ‘ॐ त्रिकोणमण्डलगताय नमः।’

    99. ‘ॐ त्रिदशाधिपसन्नुताय नमः।’

    100. ‘ॐ शुचये नमः।’

    101. ‘ॐ शुचिकराय नमः।’

    102. ‘ॐ शूराय नमः।’

    103. ‘ॐ शुचिवश्याय नमः।’

    104. ‘ॐ शुभावहाय नमः।’

    105. ‘ॐ मेषवृश्चिकराशीशाय नमः।’

    106. ‘ॐ मेधाविने नमः।’

    107. ‘ॐ मितभाषणाय नमः।’

    108. ‘ॐ सुखप्रदाय नमः।’

    (डिस्क्लेमर- यह जानकारी पारंपरिक धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है. बताए गए उपायों के प्रभाव और परिणाम व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों, आस्था, स्थान तथा अन्य कारकों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. इसे सामान्य सूचना के रूप में देखें और किसी भी प्रकार के निश्चित परिणाम या लाभ का दावा न मानें.)

  • एक रात में खड़ा हो गया पूरा मंदिर! समस्तीपुर के काली मंदिर का रहस्य आज भी बना है पहेली..

    एक रात में खड़ा हो गया पूरा मंदिर! समस्तीपुर के काली मंदिर का रहस्य आज भी बना है पहेली..

    एक रात में खड़ा हो गया पूरा मंदिर! समस्तीपुर के काली मंदिर का रहस्य आज भी बना है पहेली..

    Samastipur Kali Mandir Mystery: बिहार का समस्तीपुर जिला अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. यहां कई ऐसे मंदिर और आस्था केंद्र हैं, जिनसे जुड़ी कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं. लेकिन बूढ़ी गंडक नदी के किनारे स्थित मां काली का एक प्राचीन मंदिर ऐसा भी है, जिसकी कथा आज भी लोगों को हैरान कर देती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में हुआ था. यही वजह है कि यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने रहस्यमयी इतिहास के कारण भी चर्चा में बना रहता है.

    बूढ़ी गंडक किनारे बसा है रहस्य और आस्था का संगम

    समस्तीपुर में बूढ़ी गंडक नदी के तट पर स्थित यह काली मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर दूर-दूर से आने वाले भक्तों को अपनी ओर खींचता है. स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास अंग्रेजी शासन काल से जुड़ा हुआ है. पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं.

    अघोरी बाबा के चमत्कार की सुनाई जाती है कथा

    ग्रामीणों और बुजुर्गों के अनुसार अंग्रेजों के शासनकाल में एक रहस्यमयी अघोरी बाबा इस क्षेत्र में आए थे. उन्होंने बूढ़ी गंडक नदी के किनारे एक सुनसान स्थान को अपनी तपस्थली बनाया और वहीं साधना करने लगे. कहा जाता है कि अघोरी बाबा लंबे समय तक यहां तंत्र साधना में लीन रहे. उनकी तपस्या और आध्यात्मिक शक्तियों को लेकर उस समय भी लोगों के बीच कई चर्चाएं होती थीं.

    एक रात में मंदिर बनने की मान्यता

    स्थानीय मान्यता के अनुसार एक रात ऐसा चमत्कार हुआ, जिसने पूरे इलाके को हैरान कर दिया. लोगों का कहना है कि अघोरी बाबा ने अपनी तंत्र साधना और दैवीय शक्ति के बल पर केवल एक ही रात में इस पूरे मंदिर का निर्माण कर दिया. कहा जाता है कि जब अगली सुबह गांव और आसपास के लोग नदी किनारे पहुंचे, तो वहां एक भव्य मंदिर खड़ा देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए. यह घटना आज भी लोगों के बीच रहस्य और आस्था का विषय बनी हुई है.

    मंदिर निर्माण के बाद अचानक गायब हो गए बाबा

    मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी यह भी है कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अघोरी बाबा अचानक वहां से अंतर्ध्यान हो गए. स्थानीय लोगों का दावा है कि इसके बाद उन्हें कभी किसी ने नहीं देखा. इसी कारण मंदिर को लेकर रहस्य और भी गहरा जाता है. वर्षों बाद भी लोग इस घटना को चमत्कार और दैवीय शक्ति से जोड़कर देखते हैं.

    श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

    समस्तीपुर निवासी एसके झा बताते हैं कि यह मंदिर उनके जन्म से भी पहले का है. उन्होंने बचपन से अपने पूर्वजों और बुजुर्गों से इस मंदिर के बारे में अनेक कहानियां सुनी हैं. उनके अनुसार स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां काली के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत अवश्य पूरी होती है. इसी आस्था के कारण यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

    प्राकृतिक सुंदरता भी बढ़ाती है आकर्षण

    बूढ़ी गंडक नदी के किनारे स्थित होने के कारण यह स्थान प्राकृतिक रूप से भी बेहद सुंदर और शांत दिखाई देता है. मंदिर परिसर का वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है. यही वजह है कि यहां धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी और इतिहास में रुचि रखने वाले लोग भी पहुंचते हैं.

    रहस्य और विश्वास का अनोखा केंद्र

    भले ही मंदिर के निर्माण को लेकर कोई आधिकारिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध न हो, लेकिन स्थानीय मान्यताओं और जनश्रुतियों ने इसे समस्तीपुर की सबसे चर्चित धार्मिक स्थलों में शामिल कर दिया है. एक रात में मंदिर बनने और अघोरी बाबा के अंतर्ध्यान होने की कहानी आज भी लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनी हुई है. यही कारण है कि बूढ़ी गंडक किनारे स्थित यह काली मंदिर आस्था, रहस्य और लोककथाओं का अनोखा संगम माना जाता है.

  • श्री गरुड़ महापुराण – सम्पूर्ण हिन्दी व्याख्या.भाग 5.1 (अध्याय–2)

    श्री गरुड़ महापुराण – सम्पूर्ण हिन्दी व्याख्या.भाग 5.1 (अध्याय–2)

    अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य

    मृत्यु क्यों होती है? – क्या हर मृत्यु पहले से निश्चित होती है? प्रारब्ध, काल और ईश्वर की व्यवस्था का रहस्य

    श्री गरुड़ महापुराण – सम्पूर्ण हिन्दी व्याख्या.भाग 5.1 (अध्याय–2)

    ॥ ॐ नमो नारायणाय ॥

    पिछले अध्याय में हमने जाना कि मृत्यु आत्मा का अंत नहीं, बल्कि शरीर का अंत है। अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि आत्मा अमर है, तो मृत्यु होती ही क्यों है? क्या हर व्यक्ति की मृत्यु पहले से तय होती है, या मनुष्य अपने कर्मों से उसे बदल सकता है?

    गरुड़ पुराण में भगवान श्रीहरि विष्णु गरुड़ जी के इसी प्रश्न का उत्तर अत्यंत गहराई से देते हैं।


    मृत्यु क्यों होती है?

    भगवान विष्णु कहते हैं—

    “हे गरुड़! इस संसार में जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, उसका एक निश्चित काल है। जब उसका कार्य पूर्ण हो जाता है, तब उसका परिवर्तन होता है। यही प्रकृति का सनातन नियम है।”

    मनुष्य का शरीर भी प्रकृति का ही एक अंग है। यह पंचमहाभूतों से बना है और एक निश्चित समय तक ही कार्य करता है। जब शरीर अपने कर्मों का माध्यम नहीं रह जाता, तब आत्मा उसे छोड़कर आगे बढ़ जाती है।

    अतः मृत्यु कोई दंड नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा बनाई गई सृष्टि-व्यवस्था का आवश्यक नियम है।


    क्या हर मृत्यु पहले से निश्चित होती है?

    गरुड़ पुराण के अनुसार प्रत्येक जीव की आयु उसके प्रारब्ध कर्मों से जुड़ी होती है।

    जब आत्मा नया शरीर धारण करती है, तब उसके पूर्वजन्मों के संचित कर्मों में से एक भाग प्रारब्ध बनकर इस जन्म में फल देने आता है। उसी के अनुसार जन्म, परिवार, शरीर, कुछ प्रमुख सुख-दुःख और जीवन की अवधि निर्धारित होती है।

    इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य असहाय है। वर्तमान में किए जा रहे क्रियमाण कर्म उसके भविष्य और अगले जन्मों का निर्माण करते हैं।

    इस प्रकार ईश्वर न्याय करते हैं, लेकिन मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता भी देते हैं।


    काल (समय) की भूमिका

    गरुड़ पुराण में काल को भगवान की महान शक्ति बताया गया है।

    काल न किसी का मित्र है, न शत्रु। वह राजा और भिखारी, विद्वान और अज्ञानी—सभी के साथ समान व्यवहार करता है।

    कोई भी व्यक्ति काल को रोक नहीं सकता। इसलिए ऋषियों ने समय का सदुपयोग करने पर विशेष बल दिया है।

    जो व्यक्ति समय को व्यर्थ गंवाता है, वह वास्तव में अपने जीवन को ही खोता है।


    क्या मृत्यु टाली जा सकती है?

    यह प्रश्न सदियों से मनुष्य के मन में उठता रहा है।

    गरुड़ पुराण का संदेश है कि सामान्य नियम के अनुसार निर्धारित आयु का अंत मृत्यु में होता है। साथ ही, शास्त्र यह भी बताते हैं कि सात्विक जीवन, संयम, धर्माचरण और ईश्वर-भक्ति मनुष्य के जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

    गरुड़ पुराण का मुख्य उद्देश्य मृत्यु की तिथि बताना नहीं, बल्कि यह सिखाना है कि मृत्यु निश्चित है, इसलिए जीवन को व्यर्थ न गँवाएँ।


    ईश्वर मृत्यु क्यों देते हैं?

    भगवान विष्णु कहते हैं—

    यदि मृत्यु न होती, तो सृष्टि का संतुलन कभी बना नहीं रह सकता था।

    नई पीढ़ियाँ जन्म नहीं ले पातीं, कर्मों का चक्र रुक जाता और आत्मा अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे नहीं बढ़ पाती।

    इसलिए मृत्यु विनाश नहीं, बल्कि एक परिवर्तन है—जैसे एक विद्यार्थी एक कक्षा पूरी करके अगली कक्षा में प्रवेश करता है।


    मृत्यु और कर्म का संबंध

    गरुड़ पुराण स्पष्ट करता है कि मृत्यु के बाद आत्मा अपने साथ केवल तीन चीजें लेकर जाती है—

    • अपने कर्म
    • अपने संस्कार
    • अपनी वासनाएँ

    धन, परिवार, पद, सम्मान और शरीर यहीं रह जाते हैं।

    इसी कारण भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—

    “जो मनुष्य जीवन भर धर्म, सत्य और सेवा का पालन करता है, वही मृत्यु के समय निडर रह सकता है।”


    शास्त्रीय प्रमाण

    “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
    तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥”
    (भगवद्गीता 2.27)

    भावार्थ:
    जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है; और जिसकी मृत्यु हुई है, उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य सत्य पर अत्यधिक शोक नहीं करना चाहिए।


    इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

    • मृत्यु ईश्वर की न्यायपूर्ण व्यवस्था का एक भाग है।
    • शरीर नश्वर है, आत्मा शाश्वत है।
    • वर्तमान के श्रेष्ठ कर्म भविष्य का निर्माण करते हैं।
    • समय सबसे मूल्यवान संपत्ति है, इसका सदुपयोग करना चाहिए।
    • मृत्यु से डरने के बजाय ऐसा जीवन जीना चाहिए कि अंत समय में मन शांत और भगवान के स्मरण में स्थित हो।

    अगले अध्याय में

    गरुड़ पुराण – अध्याय 5.1 (भाग–3)

    “मृत्यु के समय शरीर में क्या परिवर्तन होते हैं? पाँच प्राण, इन्द्रियों का लय और अंतिम क्षण का शास्त्रीय वर्णन।”

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे

  • वीजा रिजेक्शन के बाद भी नहीं टूटी उम्मीद! इस मंदिर की मान्यता पर श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास..

    वीजा रिजेक्शन के बाद भी नहीं टूटी उम्मीद! इस मंदिर की मान्यता पर श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास..

    वीजा रिजेक्शन के बाद भी नहीं टूटी उम्मीद! इस मंदिर की मान्यता पर श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास..

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    भारत में आस्था और विश्वास के कई अनोखे रंग देखने को मिलते हैं. भगवान के प्रति लोगों की दीवानगी और श्रद्धा के कई किस्से आपने सुने होंगे. लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां लोग देवी देवताओं को चढ़ावे में मिठाई या फूल नहीं बल्कि अपना पासपोर्ट और वीजा की फाइल चढ़ाते हैं.

    जी हां, दिल्ली और हैदराबाद में बजरंगबली के कुछ ऐसे ही चमत्कारी मंदिर स्थित हैं. इन मंदिरों को लोग अब वीजा वाले हनुमान जी के नाम से जानने लगे हैं.

    यहां हर रोज सैकड़ों की तादाद में ऐसे युवा और लोग पहुंच रहे हैं, जिनका विदेश जाने का सपना किसी न किसी वजह से अटका हुआ है. लोगों की गहरी मान्यता है कि यहां आकर अर्जी लगाने से अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का वीजा पलक झपकते ही मिल जाता है.

    दिल्ली के नेब सराय में लगती है भक्तों की भारी अदालत

    देश की राजधानी दिल्ली के नेब सराय इलाके में वीजा वाले हनुमान जी का एक बेहद मशहूर मंदिर है. इस मंदिर में आपको आम दिनों में भी पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी.

    खासकर शनिवार और मंगलवार के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है. दूर दूर से युवा लड़के लड़कियां अपने हाथों में रंग बिरंगे पासपोर्ट और वीजा के जरूरी दस्तावेज लेकर लाइन में खड़े नजर आते हैं.

    भक्तों का अटूट विश्वास है कि अगर किसी का वीजा बार बार रिजेक्ट हो रहा है, या एम्बेसी से कॉल नहीं आ रही है, तो यहां आकर हनुमान जी के चरणों में अपनी फाइल रखने से सारे काम अपने आप बन जाते हैं.

    हैदराबाद के चिलकुर बालाजी मंदिर से शुरू हुई थी यह अनोखी परंपरा

    वीजा वाले भगवान की यह अनोखी और दिलचस्प परंपरा सबसे पहले आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बॉर्डर पर शुरू हुई थी. हैदराबाद के करीब स्थित चिलकुर बालाजी मंदिर को देश का पहला वीजा मंदिर कहा जाता है.

    ये मंदिर भगवान वेंकटेश्वर यानी बालाजी का है. माना जाता है कि साठ और सत्तर के दशक में जब भारत के आईटी प्रोफेशनल्स और छात्रों का अमेरिका जाने का क्रेज बढ़ा, तब कई युवाओं के वीजा रिजेक्ट होने लगे थे.

    ऐसे में कुछ छात्रों ने यहां आकर मन्नत मांगी और उनका वीजा तुरंत लग गया. बस तभी से इस मंदिर का नाम वीजा बालाजी पड़ गया और आज भी लोग यहां पासपोर्ट लेकर मन्नत मांगने आते हैं.

    पासपोर्ट को भगवान के चरणों में छुआकर लगाई जाती है परिक्रमा

    इन मंदिरों में मन्नत मांगने का तरीका भी बेहद अलग और दिलचस्प है. मंदिर पहुंचने के बाद भक्त सबसे पहले हनुमान जी या बालाजी भगवान के दर्शन करते हैं.

    इसके बाद वे अपने ओरिजिनल पासपोर्ट या वीजा की जेरॉक्स कॉपी को भगवान के चरणों से स्पर्श कराते हैं. कई मंदिरों में मन्नत पूरी करने के लिए भगवान की मूर्ति के इर्द गिर्द 11 या 21 बार परिक्रमा करने का नियम है.

    लोग पूरी श्रद्धा के साथ हाथ में अपनी फाइल थामे भगवान का नाम जपते हुए चक्कर काटते हैं. मंदिर के पुजारियों के मुताबिक भगवान के लिए कोई भी काम असंभव नहीं है, इसलिए वे भक्तों की राह में आने वाली हर कानूनी और कागजी अड़चन को दूर कर देते हैं.

    मन्नत पूरी होने पर नारियल चढ़ाने और धन्यवाद करने दोबारा आते हैं लोग

    सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस दौर में इन मंदिरों की ख्याति अब सात समंदर पार तक पहुंच चुकी है. केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी अपने रिश्तेदारों के जरिए यहां अर्जियां लगवा रहे हैं.

    मंदिर परिसर में आपको ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो अपनी मन्नत पूरी होने के बाद भगवान का शुक्रिया अदा करने आते हैं. नियम के अनुसार जब किसी भक्त का वीजा आ जाता है, तो वह दोबारा मंदिर आकर भगवान को नारियल, मिठाई या लाल चोला चढ़ाता है.

    विज्ञान और आधुनिकता के इस युग में भी ‘वीजा वाले हनुमान जी’ के प्रति लोगों का यह अनोखा भरोसा लगातार बढ़ता ही जा रहा है.

  • दक्षिण भारत के इन मंदिरों का अनोखा चमत्कार! कहीं मूर्ति की धड़कन महसूस होती है, तो कहीं आता है पसीना

    दक्षिण भारत के इन मंदिरों का अनोखा चमत्कार! कहीं मूर्ति की धड़कन महसूस होती है, तो कहीं आता है पसीना

    दक्षिण भारत के इन मंदिरों का अनोखा चमत्कार! कहीं मूर्ति की धड़कन महसूस होती है, तो कहीं आता है पसीना

    दक्षिण भारत के मंदिर सिर्फ पूजा पाठ की जगह नहीं हैं, ये पुराने जमाने की साइंस और कला का ऐसा बेजोड़ नमूना हैं जिसे देखकर आज के इंजीनियर्स का भी सिर चकरा जाता है. हमने मंदिरों के कई तरह के चमत्कारों के बारे में सुना है, लेकिन साउथ में तीन मंदिर ऐसे हैं जहां की मूर्तियां बिल्कुल किसी जीते जागते इंसान की तरह बर्ताव करती हैं.

    कहीं भगवान के सीने में धड़कन महसूस होती है, तो कहीं उन्हें हम इंसानों की तरह पसीना आता है. इन मंदिरों की कहानियां इतनी अनोखी हैं कि इन पर यकीन करना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाता है.

    आइए आज आपको दक्षिण भारत के इन्हीं तीन सबसे अनोखे और रहस्यमयी मंदिरों की सैर पर ले चलते हैं, जहां का सच विज्ञान की समझ से भी कोसों दूर है.

    चिदंबरम नटराज मंदिर का महा रहस्य

    तमिलनाडु में स्थित चिदंबरम नटराज मंदिर भगवान शिव के सबसे खास धामों में से एक माना जाता है. यहां भगवान शिव की नटराज रूप में बेहद खूबसूरत मूर्ति स्थापित है.

    इस मंदिर को लेकर वैज्ञानिकों और रिसर्च करने वालों के बीच हमेशा से एक बड़ी बहस चलती आई है. दावा किया जाता है कि इस मंदिर की मुख्य मूर्ति के ठीक दिल वाली जगह पर अगर बहुत ध्यान से महसूस किया जाए, तो वहां लगातार एक धड़कन की आवाज सुनाई देती है.

    ये धड़कन बिल्कुल वैसी ही होती है जैसी किसी जीवित इंसान के सीने से आती है. यहां तक कि कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यह मंदिर पृथ्वी के चुंबकीय केंद्र पर बना हुआ है, जिसकी वजह से यहां एक बेहद शक्तिशाली ऊर्जा का अहसास होता है.

    इस रहस्य को समझने के लिए कई लोगों ने कोशिश की, लेकिन आज तक कोई भी इसके पीछे की असली वजह का पता नहीं लगा पाया है.

    थिरुमालीरुंचोलई मंदिर का सच

    अब बात करते हैं तमिलनाडु के ही तिरुनेलवेली में बने थिरुमालीरुंचोलई मंदिर की. यह पावन धाम भगवान विष्णु को समर्पित है और यहां का नजारा गर्मियों के दिनों में हर किसी को हैरान कर देता है.

    जब बाहर कड़ाके की धूप होती है और गर्मी का पारा चढ़ने लगता है, तो मंदिर के गर्भगृह में मौजूद भगवान विष्णु की पत्थर की मूर्ति को साक्षात पसीना आने लगता है.

    मूर्ति के चेहरे और शरीर पर पानी की छोटी छोटी बूंदें साफ दिखाई देने लगती हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी आम इंसान को उमस भरे मौसम में पसीना आता है. इस अनोखी घटना को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं.

    मंदिर के पुजारी हर दिन सूती कपड़े से भगवान के इस पसीने को बहुत आदर के साथ पोंछते हैं. विज्ञान के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि एक बंद और ठंडे गर्भगृह में रखे ठोस पत्थर से पानी की बूंदें इस तरह कैसे बाहर निकल सकती हैं.

    पेरूर पट्टेश्वरर मंदिर का अजूबा

    कोयंबटूर के पास स्थित पेरूर पट्टेश्वरर मंदिर अपने आप में प्राचीन कला का एक अद्भुत केंद्र है. लेकिन यहां की सबसे बड़ी चर्चा एक खास मूर्ति को लेकर होती है. इस मंदिर के परिसर में बनी एक मूर्ति की मूंछें समय के साथ अपने आप बड़ी होती जाती हैं.

    स्थानीय लोगों और मंदिर के पुराने पुजारियों का कहना है कि इस मूर्ति की मूंछों के बाल प्राकृतिक रूप से बढ़ते हैं, जिसके कारण एक निश्चित समय के बाद उन्हें हल्का सा तराशा या ठीक किया जाता है.

    निर्जीव पत्थर पर बालों का इस तरह से उगना और उनका बढ़ना किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है. कई लोगों ने इसे महज़ एक वहम माना, लेकिन सालों से इस बदलाव को करीब से देखने वाले भक्त इसे भगवान का साक्षात चमत्कार ही मानते हैं.

    आस्था और विज्ञान की इस अनोखी जंग में जीत हमेशा श्रद्धा की ही होती है

    इन तीनों मंदिरों की अद्भुत घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या वाकई इन प्राचीन मूर्तियों में कोई दिव्य जीवन वास करता है. विज्ञान जहां इसे पत्थरों की खास बनावट, वातावरण की नमी या किसी खास रासायनिक प्रतिक्रिया का नाम देकर टालने की कोशिश करता है, वहीं भक्तों के लिए यह उनके आराध्य का साक्षात रूप है.

    हमारे पूर्वजों ने इन मंदिरों को किस तकनीक और सोच के साथ बनाया था, यह रहस्य आज भी उन ऐतिहासिक दीवारों के भीतर ही दफन है. लेकिन एक बात तो बिल्कुल साफ है भाई, इन मंदिरों में कदम रखते ही जो असीम शांति और चमत्कारों का अहसास होता है, उसे शब्दों में बयां कर पाना नामुमकिन है.

    यही वजह है कि सदियों बाद आज भी इन पवित्र जगहों के प्रति लोगों की आस्था रत्ती भर भी कम नहीं हुई है.

  • मृत्यु क्या है? – गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु का वास्तविक रहस्य

    मृत्यु क्या है? – गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु का वास्तविक रहस्य

    अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य

    भाग 5.1 (अध्याय–1)

    मृत्यु क्या है? – गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु का वास्तविक रहस्य

    ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
    ॥ ॐ नमो नारायणाय ॥

    गरुड़ पुराण का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में मृत्यु, यमलोक और नरक का विचार आता है। इसलिए बहुत से लोग इस ग्रंथ को केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही सुनते या पढ़ते हैं। किंतु यह धारणा पूर्णतः सही नहीं है। गरुड़ पुराण केवल मृत्यु का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने का मार्गदर्शन देने वाला दिव्य शास्त्र है।

    जब भगवान श्रीहरि विष्णु के वाहन और परम भक्त गरुड़ जी ने भगवान से पूछा—

    “हे प्रभु! मृत्यु क्या है? मनुष्य इससे इतना भयभीत क्यों रहता है? और मृत्यु के बाद वास्तव में क्या होता है?”

    तब भगवान विष्णु ने अत्यंत करुणा के साथ मृत्यु का रहस्य बताना प्रारम्भ किया।

    भगवान ने कहा—

    “हे गरुड़! मृत्यु वह नहीं है जिसे संसार का अज्ञानी मनुष्य समझता है। मृत्यु किसी जीव का अंत नहीं, बल्कि उसके शरीर का अंत है। आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। वह केवल एक शरीर को छोड़कर दूसरे मार्ग पर आगे बढ़ती है।”

    यही गरुड़ पुराण का मूल संदेश है।


    मृत्यु से मनुष्य क्यों डरता है?

    भगवान विष्णु कहते हैं कि मनुष्य मृत्यु से नहीं, बल्कि अज्ञान से डरता है।

    जिसे यह ज्ञान नहीं कि वह वास्तव में शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है, वह मृत्यु को सब कुछ समाप्त हो जाना मान लेता है।

    मनुष्य सोचता है—

    • मेरा परिवार छूट जाएगा।
    • मेरा धन यहीं रह जाएगा।
    • मेरा घर, मेरा व्यवसाय, मेरी प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी।
    • अब मेरा क्या होगा?

    यही मोह और अज्ञान मृत्यु के भय का सबसे बड़ा कारण है।

    लेकिन जो मनुष्य आत्मा के स्वरूप को जान लेता है, उसके लिए मृत्यु भय का विषय नहीं रहती। वह इसे ईश्वर की बनाई हुई एक स्वाभाविक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है।


    मृत्यु क्या है?

    गरुड़ पुराण के अनुसार—

    “जब आत्मा अपने कर्मों के अनुसार इस शरीर में रहने का समय पूर्ण कर लेती है, तब वह इस शरीर को छोड़ देती है। इसी घटना को मृत्यु कहते हैं।”

    अर्थात मृत्यु केवल शरीर और आत्मा का अलग होना है।

    शरीर पंचमहाभूतों से बना है—

    • पृथ्वी
    • जल
    • अग्नि
    • वायु
    • आकाश

    इन पाँच तत्वों का एक दिन अपने मूल स्वरूप में लौट जाना निश्चित है।

    आत्मा इन पाँच तत्वों से नहीं बनी है। इसलिए वह इनकी तरह नष्ट भी नहीं होती।


    शरीर और आत्मा में अंतर

    गरुड़ पुराण बार-बार समझाता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान बैठता है।

    शरीर बदलता है—

    • बचपन
    • युवावस्था
    • वृद्धावस्था

    लेकिन इन सभी अवस्थाओं में “मैं” का अनुभव करने वाला कौन है?

    वह आत्मा है।

    शरीर बीमार होता है, बूढ़ा होता है और अंत में समाप्त हो जाता है।

    आत्मा इन सबसे परे है।

    इसीलिए भगवान विष्णु कहते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य शरीर की देखभाल तो करता है, लेकिन अपना पूरा जीवन केवल शरीर के सुख में व्यर्थ नहीं करता। वह आत्मा के कल्याण का भी प्रयास करता है।


    श्रीमद्भगवद्गीता का प्रमाण

    भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

    “न जायते म्रियते वा कदाचित्
    नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
    अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥” (गीता 2.20)

    भावार्थ :

    आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न कभी मृत्यु होती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।

    गरुड़ पुराण इसी सिद्धांत को और विस्तार से समझाता है।


    संसार में जो आया है, उसे जाना भी होगा

    भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—

    इस संसार का यही नियम है।

    • जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य मरेगा।
    • जो बना है, वह एक दिन नष्ट होगा।
    • जो मिला है, वह एक दिन छूट जाएगा।

    राजा हो या भिखारी…

    विद्वान हो या अज्ञानी…

    धनी हो या निर्धन…

    मृत्यु किसी में भेदभाव नहीं करती।

    इसीलिए ऋषि-मुनियों ने कहा है कि मृत्यु संसार का सबसे बड़ा सत्य है।


    फिर मनुष्य को क्या करना चाहिए?

    यदि मृत्यु निश्चित है, तो क्या मनुष्य सब कुछ छोड़कर बैठ जाए?

    भगवान विष्णु कहते हैं—नहीं।

    मृत्यु का ज्ञान मनुष्य को आलसी नहीं, बल्कि सजग बनाना चाहिए।

    मनुष्य को चाहिए कि—

    • सत्य बोले।
    • धर्म का पालन करे।
    • माता-पिता की सेवा करे।
    • किसी के साथ अन्याय न करे।
    • भगवान का स्मरण करे।
    • अपने कर्मों को पवित्र बनाए।

    क्योंकि मृत्यु के बाद धन नहीं, कर्म साथ जाते हैं।


    गरुड़ पुराण का पहला संदेश

    भगवान विष्णु कहते हैं—

    “हे गरुड़! जो मनुष्य मृत्यु को समझ लेता है, वह जीवन को भी सही अर्थों में समझ लेता है।”

    जो व्यक्ति मृत्यु को भूलकर जीता है, वह अक्सर लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार में फँस जाता है।

    लेकिन जो यह स्मरण रखता है कि एक दिन यह शरीर छूट जाएगा, वह अपने प्रत्येक कर्म को सोच-समझकर करता है।

    ऐसा व्यक्ति दूसरों को दुःख नहीं देता, क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि प्रत्येक कर्म का फल उसे अवश्य मिलेगा।


    जीवन की शिक्षा

    गरुड़ पुराण हमें मृत्यु से डरना नहीं सिखाता, बल्कि मृत्यु के माध्यम से सही जीवन जीना सिखाता है।

    यदि हम प्रतिदिन यह स्मरण रखें कि यह शरीर नश्वर है, तो—

    • हमारा अहंकार कम होगा।
    • क्रोध कम होगा।
    • लालच कम होगा।
    • दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा बढ़ेगी।
    • भगवान के प्रति श्रद्धा दृढ़ होगी।

    यही मृत्यु के ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य है।


    अगले अध्याय में

    गरुड़ पुराण – अध्याय 5.1 (भाग–2)

    “मृत्यु क्यों होती है? क्या हर मृत्यु पहले से निश्चित होती है? प्रारब्ध, काल और ईश्वर की व्यवस्था का गूढ़ रहस्य।”

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण
    कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम
    राम राम हरे हरे

  • क्या सपने देते हैं मौत के आने का इशारा? जानिए इस रहस्यमयी दावे की पूरी कहानी..?

    क्या सपने देते हैं मौत के आने का इशारा? जानिए इस रहस्यमयी दावे की पूरी कहानी..?

    क्या सपने देते हैं मौत के आने का इशारा? जानिए इस रहस्यमयी दावे की पूरी कहानी..?

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    मौत एक ऐसा सच है जिसे कोई टाल नहीं सकता। यह जीवन का अंतिम नियम है, लेकिन ज्यादातर लोग इसके बारे में सोचने से बचते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिरी समय में इंसान के मन और चेतना में क्या चलता है?

    Death Dreams Study: इटली के रेज्जियो एमिलिया स्थित IRCCS के विशेषज्ञों ने इसी रहस्य को समझने के लिए गहन अध्ययन किया। उन्होंने 239 विशेषज्ञों से बातचीत कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इस रिसर्च में ‘एंड ऑफ लाइफ ड्रीम्स’ का जिक्र किया गया है, यानी वे अनुभव जो इंसान अपने जीवन के अंतिम चरण में महसूस कर सकता है।

    अंत समय में क्या दिखता है?

    रिसर्च के अनुसार, आखिरी समय में कई लोगों को अपने दिवंगत प्रियजन दिखाई देते हैं। किसी को पुराने रिश्ते याद आते हैं तो किसी को मां या करीबियों की छवि दिखाई देती है। कुछ मरीजों ने बताया कि उन्हें अपने दिवंगत परिजन यह कहते सुनाई देते हैं कि “मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।” ऐसे अनुभव डर पैदा नहीं करते, बल्कि शांति और सुकून देते हैं, जैसे आगे का रास्ता आसान हो।

    सपनों में रोशनी और डरावने दृश्य

    कई लोगों को तेज रोशनी, खुले दरवाजे, ऊंची सीढ़ियां या सुंदर जगहें भी दिखाई देती हैं, जैसे कोई नई दुनिया सामने हो। वहीं कुछ मामलों में लोगों ने सफेद घोड़ा, खूबसूरत नजारे या शांत दृश्य देखने की बात कही है। लेकिन इसके उलट कुछ मरीजों को डरावने साये या भयानक दृश्य भी नजर आए, जिन्हें विशेषज्ञ इंसान के भीतर छिपे डर और अधूरी इच्छाओं का असर मानते हैं।

    मौत के करीब अनुभव का सच

    अक्सर लोग इन अनुभवों के बारे में खुलकर बात नहीं करते, क्योंकि उन्हें गलत समझे जाने का डर रहता है। लेकिन इन घटनाओं से यह समझ आता है कि इंसान मानसिक रूप से मौत को कैसे स्वीकार कर रहा है। अगर अनुभव शांत और सुकून भरे हों तो माना जाता है कि विदाई आसान होती है। विज्ञान इसे यादों और मानसिक तनाव का प्रभाव मानता है, जबकि कुछ लोग इसे आध्यात्मिक अनुभव भी समझते हैं।

  • मक्खन का स्पर्श और शिवलिंग का चमत्कार! इस मंदिर की अनोखी परंपरा जानकर रह जाएंगे दंग..

    मक्खन का स्पर्श और शिवलिंग का चमत्कार! इस मंदिर की अनोखी परंपरा जानकर रह जाएंगे दंग..

    मक्खन का स्पर्श और शिवलिंग का चमत्कार! इस मंदिर की अनोखी परंपरा जानकर रह जाएंगे दंग..

    हमारे देश में देवी देवताओं के कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपने चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. ऐसा ही एक बेहद रहस्यमयी और अनोखा मंदिर देवभूमि हिमाचल प्रदेश में स्थित है. कुल्लू घाटी में पहाड़ों के ऊंचे शिखर पर बने इस मंदिर को बिजली महादेव के नाम से पुकारा जाता है.

    ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यहां का नजारा बेहद खूबसूरत है. लेकिन इस मंदिर की सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि यहां हर 12 साल में आसमान से भयंकर बिजली गिरती है.

    ये बिजली सीधे मंदिर के भीतर स्थापित शिवलिंग पर आकर गिरती है, जिसके बाद का नजारा किसी को भी हैरत में डाल सकता है.

    हर 12 साल में आसमान से बरसती है शिव पर आकाशीय बिजली

    जब इस मंदिर पर आकाशीय बिजली गिरती है, तो जोरदार धमाका होता है. बिजली के इस तगड़े झटके को झेलते ही गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग पूरी तरह से चकनाचूर हो जाता है.

    शिवलिंग के टुकड़े टुकड़े होकर पूरे मंदिर में बिखर जाते हैं. आम तौर पर अगर किसी पत्थर पर इतनी भारी बिजली गिरे, तो वह नामोनिशान खो देता है. लेकिन यहां भगवान शिव का ऐसा अनूठा चमत्कार होता है कि इतने बड़े हादसे के बाद भी कोई नुकसान नहीं होता.

    स्थानीय लोगों का मानना है कि महादेव अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए इस आकाशीय बिजली के झटके को खुद अपने ऊपर झेल लेते हैं.

    मक्खन का लेप लगते ही चमत्कारी रूप से जुड़ जाते हैं टुकड़े

    शिवलिंग के टूटने के बाद मंदिर के पुजारी एक खास परंपरा को निभाते हैं. वो बिखरे हुए शिवलिंग के सभी टुकड़ों को इकट्ठा करते हैं. इसके बाद एक अनोखा मरहम तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह से मक्खन, सत्तू और अनसाल्टेड बटर से बनता है.

    पुजारी इन टुकड़ों को आपस में मिलाकर उस पर मक्खन का गाढ़ा लेप लगाते हैं. जैसे ही ये लेप शिवलिंग पर लगाया जाता है, चमत्कार देखना शुरू हो जाता है. कुछ ही दिनों के भीतर वह टूटा हुआ शिवलिंग वापस अपने पुराने और ठोस रूप में आ जाता है.

    ये देखकर डॉक्टर और वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं कि बिना किसी सीमेंट या गोंद के पत्थर आपस में कैसे पक्के जुड़ जाते हैं.

    दैत्य कुलांत का वध करने के लिए शिव ने बनाया ये स्थान

    इस अनोखे चमत्कार के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है. कहते हैं कि बहुत समय पहले इस घाटी में कुलांत नाम का एक भयंकर राक्षस रहता था.

    वो राक्षस बहुत विशाल था और अजगर का रूप धारण कर सकता था. एक बार उसने पूरी घाटी को पानी में डुबोकर यहां के जीव जंतुओं को मारने की साजिश रची. भगवान शिव ने जब उसका यह रूप देखा, तो उन्होंने राक्षस का वध कर दिया.

    राक्षस का विशाल शरीर एक बड़े पहाड़ में बदल गया, जिसे आज हम कुल्लू घाटी के नाम से जानते हैं. दैत्य के मरने के बाद शिव ने इंद्र देव से कहा कि वे हर 12 साल में यहां बिजली गिराया करें ताकि धरती पर कोई और संकट न आए.

    विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया इस रहस्यमयी चुंबकीय पहाड़ी की गुत्थी

    बिजली महादेव का यह रहस्य आज के आधुनिक विज्ञान के लिए भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. वैज्ञानिकों ने कई बार इस जगह की जांच की है. उनका कहना है कि इस ऊंचे पहाड़ के नीचे भारी मात्रा में चुंबकीय तत्व यानी आयरन ओर्स मौजूद हो सकते हैं.

    इस वजह से जब भी आसमान में बिजली कड़कती है, तो वह इस पहाड़ी की तरफ तेजी से खिंची चली आती है. लेकिन विज्ञान के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि बिजली हमेशा सिर्फ शिवलिंग पर ही क्यों गिरती है.

    साथ ही मक्खन लगाने से पत्थर का खुद ब खुद जुड़ जाना किसी दैवीय शक्ति से कम नहीं लगता. यही वजह है कि हर साल हजारों श्रद्धालु इस अद्भुत चमत्कार को देखने यहां खींचे चले आते हैं.

  • समुद्र मंथन का सबसे बड़ा रहस्य! ये 3 रत्न बने विनाश का कारण, देवताओं ने भी नहीं लगाया हाथ..,?

    समुद्र मंथन का सबसे बड़ा रहस्य! ये 3 रत्न बने विनाश का कारण, देवताओं ने भी नहीं लगाया हाथ..,?

    समुद्र मंथन का सबसे बड़ा रहस्य! ये 3 रत्न बने विनाश का कारण, देवताओं ने भी नहीं लगाया हाथ..,?

    पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की घटना का बहुत बड़ा महत्व है. जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र को मथा, तो उसमें से एक से बढ़कर एक चमत्कारी चीजें बाहर आईं.

    ज्यादातर लोग ये जानते हैं कि समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी और अमृत निकला था. लेकिन इस मंथन से सिर्फ अच्छी और शुभ चीजें ही नहीं निकली थीं. इसमें से कुछ ऐसी भयानक और विनाशकारी शक्तियां भी बाहर आई थीं, जिन्हें देखकर देवता और दानव दोनों ही कांप उठे थे.

    इनमें से तीन चीजें इतनी ज्यादा खतरनाक थीं कि देवताओं ने उन्हें छूने तक से साफ मना कर दिया था. आइए जानते हैं समुद्र मंथन से निकले उन तीन भयानक रत्नों का रहस्य.

    कालकूट नाम का भयंकर विष

    समुद्र मंथन की शुरुआत में ही जो सबसे पहली चीज बाहर आई, वह था कालकूट नाम का भयंकर जहर. ये कोई साधारण विष नहीं था, बल्कि इसकी गर्मी और धुएं से तीनों लोक जलने लगे थे.

    इस विष का असर इतना तेज था कि देवता और असुर दोनों ही अपनी जान बचाकर भागने लगे. किसी भी देवता या दानव में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह इस जहर को हाथ भी लगा सके.

    तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव आगे आए. उन्होंने इस कालकूट विष को अपने हाथ में लिया और पूरा पी गए. माता पार्वती ने शिव जी के गले को दबाकर उस जहर को पेट में जाने से रोका, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए.

    वारुणी यानी मदिरा की उत्पत्ति

    मंथन के दौरान समुद्र की गहराइयों से एक और ऐसी चीज निकली, जिसे देवताओं ने अपनाने से पूरी तरह इंकार कर दिया. ये चीज थी वारुणी, जिसे मदिरा या शराब कहा जाता है.

    वारुणी जब समुद्र से बाहर आई, तो वह एक देवी के रूप में प्रकट हुई थी. वह पूरी तरह से नशे और तामसिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाली शक्ति थी. देवता जानते थे कि मदिरा का सेवन करने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और इंसान या देवता अपने सही मार्ग से भटक जाते हैं.

    इसलिए पवित्र आचरण रखने वाले देवताओं ने वारुणी को छूने से मना कर दिया. अंत में असुरों ने आगे बढ़कर इस मदिरा को सहर्ष स्वीकार कर लिया.

    ज्येष्ठा यानी दरिद्रता की देवी

    समुद्र मंथन से जब धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी प्रकट हुईं, तो हर कोई खुश था. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि माता लक्ष्मी से ठीक पहले समुद्र से उनकी बड़ी बहन भी निकली थीं.

    इनका नाम ज्येष्ठा था, जिन्हें अलक्ष्मी, मूदेवी या दरिद्रता की देवी भी कहा जाता है. ज्येष्ठा का रूप बहुत डरावना था और उनके प्रकट होते ही चारों तरफ उदासी और कंगाली छाने लगी.

    वे जहां भी जातीं, वहां दुख, बीमारी और दरिद्रता अपने आप आ जाती थी. उनके इस विनाशकारी स्वभाव के कारण देवताओं ने उन्हें अपने साथ रखने या छूने से बिल्कुल मना कर दिया. बाद में उन्हें एक ऋषि को सौंप दिया गया और वे पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगीं.

    विनाश के बाद ही मिला अमृत

    इस तरह समुद्र मंथन की पूरी कहानी हमें जीवन का एक बहुत बड़ा सच सिखाती है. जब भी हम किसी बड़े बदलाव या मंथन से गुजरते हैं, तो सबसे पहले बुराई और विनाशकारी चीजें ही सामने आती हैं.

    देवताओं ने धैर्य रखा और इन तीनों खतरनाक शक्तियों यानी कालकूट विष, वारुणी और ज्येष्ठा से दूरी बनाए रखी. उन्होंने अपनी पवित्रता को नहीं खोया और गलत चीजों के लालच में नहीं पड़े.

    यहीं कारण था कि इतनी बड़ी बड़ी बाधाओं और भयानक खतरों को पार करने के बाद अंत में देवताओं को वह दिव्य अमृत और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सकी.

  • क्या आपके घर में किचन और बाथरूम हैं साथ-साथ? जानिए वास्तु के अनुसार इसका शुभ-अशुभ प्रभाव

    क्या आपके घर में किचन और बाथरूम हैं साथ-साथ? जानिए वास्तु के अनुसार इसका शुभ-अशुभ प्रभाव

    क्या आपके घर में किचन और बाथरूम हैं साथ-साथ? जानिए वास्तु के अनुसार इसका शुभ-अशुभ प्रभाव

    वास्तु शास्त्र में घर की दिशा और बनावट को बहुत महत्व दिया गया है। वास्तु नियमों का पालन करने से घर में पॉजिटिविटी और सुख-समृद्धि बनी रहने की मान्यता है। वहीं, कुछ वास्तु संबंधी गलतियां नकारात्मक प्रभाव बढ़ा सकती हैं। इन्हीं में से एक किचन और बाथरूम का एक-दूसरे के बिल्कुल पास होना है। अगर घर में ऐसी स्थिति है तो कुछ आसान उपाय अपनाकर इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की जा सकती है।

    किचन-बाथरूम न हों साथ: वास्तु शास्त्र की माने तो घर में किचन और बाथरूम एक-दूसरे से सटाकर नहीं बनाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ सकता है। अगर पहले से ऐसा निर्माण है तो बाथरूम का दरवाजा इस्तेमाल के बाद हमेशा बंद रखें। ऐसा करने से किचन तक नकारात्मक प्रभाव पहुंचने की संभावना कम मानी जाती है।

    मुख्य द्वार पर सही पौधे:घर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास कांटेदार या दूध निकलने वाले पौधे लगाने से बचना चाहिए। ये घर के वातावरण को नकारात्मक बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। घर के आगे कांटेदार पौधे होते हैं तो दुश्मन बढ़ने लगते हैं। पारिवारिक जीवन में मतभेद बढ़ने लगते हैं और घर के लोगों की सेहत खराब रहती है।

    आग और पानी रखें अलग: रसोई में गैस स्टोव और सिंक या पानी से जुड़े अन्य स्थानों को एक-दूसरे के बिल्कुल पास नहीं रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार अग्नि और जल दो विपरीत तत्व हैं, इसलिए इनके बीच उचित दूरी बनाए रखना बेहतर माना जाता है।

    डस्टबिन: वास्तु शास्त्र की माने तो घर के आगे कूड़ेदान नहीं होना चाहिए। ये घर वालों के लिए कष्टकारी माना जाता है। इसके कारण घर में नकारात्मक ऊर्जा आती है। जो घर के लोगों के स्वभाव में चिड़चिड़ापन लाने और उनकी सेहत खराब करने में जिम्मेदार माना जाता है।

    साफ-सफाई का रखें ध्यान: घर में नियमित रूप से साफ-सफाई करना भी वास्तु का महत्वपूर्ण नियम माना जाता है। मकड़ी के जाले, कबाड़ और बेकार सामान को समय-समय पर हटाते रहने से घर का वातावरण स्वच्छ और व्यवस्थित रहता है। मान्यता है कि साफ-सुथरे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बेहतर बना रहता है।